शनिवार, 3 मई 2014

बहुलतावाद 'इवेंट' नहीं है नामवरजी !



हिन्दी आलोचना इनदिनों गंभीर संकट से गुजर रही है। विधा के रुप में देखने की बजाय इवेंट के रुप में समीक्षा लिखी जा रही है। आलोचना इवेंट नहीं है।वह समाचार भी नहीं है।आलोचना महिमा मंडन या महोत्सव भी नहीं है कि आलोचक को नायक के रुप में पेश किया जाय। लेकिन फिलहाल आलोचना में यह खेल खूब चल रहा है। आलोचना की धुरी है अवधारणा । लेकिन अधिकांश आलोचकों ने अवधारणा में सोचना और लिखना बंद कर दिया है अथवा आलोचना से तदर्थ रिश्ता बना लिया है। फलतः आलोचना में विभ्रमों की बाढ़ आ गयी है। आत्मज्ञान और कॉमनसेंस के आधार पर ज्यादा लिखा जा रहा है । इस प्रवृति को विश्लेषित करने के मेरे सामने दो अवधारणाएं हैं 'वर्गसंघर्ष' और 'बहुलतावाद' ।

सन् 2001 में नामवर सिंह ने कहा 'कभी-कभी बड़े आलोचक भी आत्मरति के शिकार हो जाते हैं और उनके भी कई अन्धबिन्दु होते हैं।डॉ.रामविलास शर्मा ने सुमित्रानन्दन पन्त पर जो लिखा, वह 'आत्मरति' ही था। इसी प्रकार कार्ल मार्क्स के लिए ' वर्ग संघर्ष' एक ऐसा अंधबिन्दु है ,जिससे परे वे कुछ और देख ही नहीं सके। दुर्भाग्यवश भारत में कई मार्क्सवादियों ने भी उनके 'अन्धबिन्दु' को ज्यों का त्यों उठा लिया। वे मजदूर के शोर में किसान को और वर्ग के शोर में जाति और वर्ण को भूल गए।'
सवाल यह उठता है क्या मार्क्स के यहां 'वर्गसंघर्ष' 'आत्मरति ' या अंधबिन्दु है ? यह सच है हिन्दी आलोचना ने और खासकर प्रगतिशील आलोचना ने जाति और वर्ण के सवाल की घनघोर उपेक्षा की है। दलितों के लेखन की उपेक्षा की है।
लेकिन 'वर्गसंघर्ष' की अवधारणा को समीक्षा में स्थापित करने में एक जमाने में आलोचकों को अतिरिक्त जोर देना पड़ा। उनके लिए यह धारणा नई थी और समीक्षा में इसको कोई मानता नहीं था। मुश्किल यह है कि समीक्षकों ने 'वर्ग संघर्ष' की धारणा को राजनीतिक अर्थशास्त्र को समझे बिना इस्तेमाल किया। जबकि राजनीतिक अर्थशास्त्र के बिना 'वर्ग' और 'वर्गसंघर्ष' को समझा नहीं जा सकता।
मार्क्स के यहां यह 'अंधबिन्दु' नहीं है। इंग्लैंड में किस तरह का पूंजीवादी समाज विकसित हो रहा था और औद्योगिक सभ्यता में किस तरह के अन्तर्विरोध पैदा हो रहे थे उनकी मीमांसा करते हुए वर्ग की अवधारणा सामने आती है। कम्युनिस्ट घोषणापत्र का आरंभ ही वर्गसंघर्ष की धारणा से होता है।
मार्क्स वर्ग और वर्गसंघर्ष के परे किसी भी समाज को नहीं देखते। वर्गों के आगमन के साथ ही वर्गसंघर्ष पैदा होता है ।वर्गीयचेतना का उदय होता है। मार्क्स के लिए 'वर्गसंघर्ष' की धारणा मात्र भाषायी पदबंध नहीं है जिसे मनमाने ढ़ंग से बदला जाय या तोड़मरोड़ कर पेश कर दिया जाय। उनके लिए यह दृष्टिकोण का अंग है। वर्गसंघर्ष की धारणा के बिना मार्क्सवादी विश्वदृष्टिकोण नहीं बनता ।यह सामाजिक परिवर्तन के नियमों का पता करने की कुंजी है।
वर्गीयसमाज है तो वर्गसंघर्ष भी होगा। एक मार्क्सवादी की यह जिम्मेदारी है कि वर्गसंघर्ष के रूपों ,देशज विशिष्टताओं और जटिलताओं की खोज करे। यह दुर्भाग्य की बात है हिन्दी समीक्षा में वर्गसंघर्ष की धारणा का कई समीक्षकों ने यांत्रिक रूप में और बिना समझे इस्तेमाल किया है। जबकि मार्क्स-एंगेल्स के लिए यह एक क्रिएटिव धारणा है वे इसे लेकर किसी भी किस्म की अंतिम राय नहीं देते। यह शोषक-शोषित का संघर्ष मात्र नहीं है बल्कि उसके अनेक आयाम हैं। यह बंद धारणा नहीं है ,बल्कि खुली धारणा है।कालांतर में इससे जुड़े नए रुपों का जन्म हुआ। वर्गसंघर्ष और वर्ग की धारणा में भी बदलाव आया।
दूसरी बात यह है अर्थशास्त्र, राजनीति,दर्शन और कलाओं में वर्गसंघर्ष और वर्गसंबंधों की प्रकृति एक जैसी अभिव्यक्त नहीं होती,मसले भी एक जैसे नहीं होते। नामवर सिंह ने कहा है साहित्य में हाशिया बहुत महत्वपूर्ण होता है। यह बात वर्गसंघर्ष की धारणा पर भी लागू होती है। मार्क्स ने जब वर्गसंघर्ष की धारणा का प्रतिपादन किया था तो उस समय यह हाशिए पर थी ,आज भी हाशिए पर है।
नामवर सिंह अधिकांश समय सिर्फ सवाल उठाते हैं। किसी भी समस्या पर ठहरकर विचार नहीं करते। घटनाओं,वस्तुओं,कृति,कृतिकार आदि के प्रति उनकी चलताऊ टिप्पणियां समीक्षा को हल्का बनाती हैं। इससे 'आलोचना' का 'समाचार' में रुपान्तरण हुआ है। आलोचना सनसनीखेज खबर बनी है। अब लोग आलोचना नहीं पढ़ते बल्कि नामवर ने क्या कहा,यह देखते हैं। इससे आलोचना का खबर में रुपान्तरण हुआ है।
आलोचक का काम सनसनी पैदा करना नहीं है। हिन्दी समीक्षा में 'वर्ग' और 'वर्गसंघर्ष' की अवधारणा का जिन आलोचकों ने जमकर इस्तेमाल किया है वे भारतीय पूंजीवाद की मीमांसा के प्रति उदासीन रहे हैं और कम्युनिस्ट पार्टी के बयानों से ही पूंजीवाद की समझ बनाते रहे हैं। लंबे समय तक कम्युनिस्ट पार्टी के नेताओं की भी भारतीय पूंजीवाद को लेकर कोई सुसंगत समझ नहीं थी। खासकर सन् 1947 के पहले तो एकदम सुसंगत समझ नहीं थी ।आजादी के बाद भी सन् 1970 के बाद ही कुछ गंभीर काम हुआ ।
प्रगतिशील आलोचकों ने अपनी पहल पर न तो कभी पूंजीवाद को जानने की कोशिश की और नहीं कभी राजनीतिक अर्थशास्त्र के साथ वर्गसंघर्ष की धारणा के सर्जनात्मक संबंध को भारत के संदर्भ में विश्लेषित किया । वे सरलीकरणों का इस्तेमाल करते रहे हैं। मसलन्, पूंजीवाद लुटेरी व्यवस्था है । फलतः शोषण, उत्पीडन, असमानता आदि के अलावा वे किसी और चीज को देख ही नहीं पाए। वे पूंजीवाद पर एकायामी नजरिए से विचार करते हैं । जबकि सच यह है पूंजीवाद एक समग्र व्यवस्था है और उसके पास समाज,संस्कृति,राजनीति, जीवनशैली आदि के बारे में गतिशील और रुढ़िबद्धताहीन नजरिया है। इसे संशय और अविश्वास के आधार पर नहीं समझा जा सकता । इकहरे ढ़ंग से या अछूतभाव से पूंजीवाद को समझना मुश्किल है। पूंजीवाद को समझने के लिए सरलीकरणों से बचने की जरुरत है।जो लोग सरलीकरणों में लिख रहे हैं वे ही इसे लेकर संशय और अविश्वास के शिकार भी हैं। संशय और अविश्वास का भाव हमेशा अज्ञान या पल्लवग्राही ज्ञान से पैदा होता है। हिन्दी आलोचक इनदिनों पल्लवग्राही ज्ञान से काम चला रहे हैं। बिना सोचे समझे अधकचरे ढ़ंग से अवधाणाओं का इस्तेमाल कर रहे हैं इससे आलोचना की व्यापक क्षति हुई है। इस संवृत्ति को समझने के लिए एक और उदाहरण देखें।
नामवर सिंह ने लिखा है “ बहुलतावाद सेक्युलर होने की गारंटी नहीं है।इस बहुलतावाद में जातियों और सम्प्रदायों का पदानुक्रम था तथा हर युग में विशेषाधिकार सम्पन्न एक धर्म और सम्प्रदाय का वर्चस्व था। लेकिन बहुलतावाद के बिना सेक्युलर होना संभव नहीं है।”
नामवर सिंह की बहुलतावाद को लेकर बुनियादी समझ ठीक नहीं है। वे बहुलतावाद को सामाजिक संरचनाओं के संदर्भ में देख रहे हैं। यदि बहुलतावाद को सामाजिक संरचनाओं के संदर्भ में देखेंगे तो समाजवाद के बाद भी जातियां रहेंगी और उनके बीच में अंतर भी रहेगा।पदानुक्रम भी रहेगा। इसके अलावा नए किस्म का विशेषाधिकार संपन्नवर्ग के रूप में कम्युनिस्ट पार्टी रहेगी।ऐसा सोवियत संघ में रहा है। रूसी जाति का वर्चस्व वहां सबसे बड़ी इल्लत थी।
भारत में बहुलतावाद सिर्फ जातियों के स्तर पर ही नहीं है बल्कि धर्म ,राजनीति और संस्कृति के स्तर पर भी है। समाज में यह संभव नहीं है कि सामाजिक संरचनाओं में बहुलतावाद हो और कला,राजनीति,धर्म,दर्शन में न हो। सोवियत संघ के पराभव के अनेक कारणों में से एक बड़ा कारण है विचार,राजनीति और कलाओं में कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा बहुलतावाद का खात्मा। वे समाज में बहुलतावाद मानने को तैयार थे लेकिन जीवन के अन्य क्षेत्रों में नहीं । फलतः सोवियत संघ बिखर गया।
बहुलतावाद को मानने का अर्थ है समाज से लेकर कलाओं तक इसकी भूमिका को नए सिरे से परिभाषित करना। हमारे देश में बहुलताबाद हर स्तर पर है लेकिन इसे नए सिरे परिभाषित करने की जरूरत है। संविधान निर्माताओं ने आज से 65 साल पहले बहुलतावाद को भारत की विविधता को परिभाषित करते हुए खोला था।इधर के सालों में बहुलतावाद को लेकर अनेक किस्म के नए सोच भी सामने आए हैं। इनमें नामवर सिंह की भी एक राय है जो एकदम अवैज्ञानिक है। नामवर सिंह की समझ में कई बुनियादी गड़बड़ियां हैं ,वे मानते हैं “बहुलतावाद सेक्युलर होने की गारंटी नहीं है।”
असल में सार्वजनिक जीवन में सेक्युलर सभी धर्मों को समानता का दर्जा देता है । धार्मिक कामकाज में राज्य हस्तक्षेप नहीं करता । राजनीति में धर्म को हस्तक्षेप नहीं करने देता। ठीक बहुलतावाद यही काम करता है वह विभिन्न संस्कृतियों को स्वायत्त सांस्कृतिक परिवेश प्रदान करता है,सांस्कृतिक विकल्पों के लिए स्थान देता है। विभिन्न मान्यताओं और नीतियों को समान स्थान देता है। इच्छानुसार संगठन बनाने की स्वतंत्रता की गारंटी करता है। नागरिक को विकल्प चुनने का मौका देता है। विविध किस्म के अनुभव देता है।
भारत में बहुलतावाद का आधार है उदार पूंजीवाद। इसमें पदानुक्रम और भेदभाव रहेगा । इसके कारण बहुलतावाद में भी भेदभाव ,शोषण , असमानता है। बहुलतावाद की खूबी है कि इसमें आप पुराने और नए ढ़ंग से एक साथ सोच सकते हैं और जी सकते हैं।मसलन् ऐसे लोग भी रहेंगे जो जाति मानते हैं और ऐसे लोग भी रहेंगे जो जाति नहीं मानते। नयी और पुरानी संरचनाओं में अन्तर्विरोध बना रहेगा। इससे मुक्ति संभव नहीं है क्योंकि उदार पूंजीवाद ने हमारे देश में पर्सुएशन के आधार पर अन्तर्विरोधों को हल करने का मार्ग अपनाया है। इस नजरिए से देखें तो भारतीय बहुलतावाद का पश्चिमी बहुलतावाद से गहरा अंतर है। इसी तरह जाति के सवालों को भी पर्सुएशन और समानता के आधार पर हल करने के प्रयास होते रहे हैं।इसीलिए जाति के प्रति नए पुराने दोनों ही रुप सक्रिय हैं।
बहुलतावाद की पश्चिम में धुरी है नए का दबाव और सत्ता की नए के प्रति पक्षधरता।इसके विपरीत भारत में बहुलतावाद की धुरी में दबाव जैसा तत्व नहीं है। यहां पर पर्सुएसन से काम लेते हैं। मसलन् यहां पर अधिकांश लोग आज भी जाति को मानते हैं ,समाज में छोटा तबका है जो जाति को नहीं मानता। संविधान में इन दोनों के लिए स्थान है और पर्सुएशन के आधार पर जाति उन्मूलन के प्रयास किए जा रहे हैं। बहुलतावाद के प्रति दबाव की बजाय पर्सुएशन पर जोर देना वस्तुतःलोकतांत्रिक भाव है।आप भगवान और विज्ञान दोनों को एक साथ मान सकते हैं और ये दोनों समाज में एक साथ रह सकते हैं। समाज में खाप पंचायतें और पंचायतें एक साथ रह सकती हैं। विभिन्न नागरिकों को समान अधिकार हैं,साथ ही अनेक समुदायों के निजी अधिकारों को भी संविधान संरक्षण देता है और उनमें हस्तक्षेप नहीं करता।
सामाजिक समूहों की निजता और सामूहिकता के बीच में पर्सुएशन के आधार पर संतुलन बनाने पर जोर है। विभिन्न जातियों को अपनी मान्यताओं, रीति-रिवाजों, मूल्यों आदि को बरकरार रखने का हक है। संविधान उनसे वंचित नहीं करता। इस समूची प्रक्रिया में उदारतावादी पूंजीवादी मूल्यों का धीमी गति से प्रचार –प्रसार हुआ है । धीमी गति और प्रच्छन्न तरीकों से वैचारिक, सांस्कृतिक और जीवनशैलियों को बदला गया है। मसलन् स्त्रियों के पहनावे में आए रेडीकल परिवर्तनों को देखें।बिना किसी राजाज्ञा के सभी औरतों के वस्त्रों का रुपान्तरण हुआ है,इस रुपान्तरण में विज्ञापन की पर्सुएशन कला की केन्द्रीय भूमिका है।
बहुलतावाद को पूंजीवादी गतिशीलता तब मिलती है जब वह जाति ,संस्कृति या धर्म की सीमाओं का अतिक्रमण करता है। यह अतिक्रमण विभिन्न कारणों से संभव है। कभी यह अतिक्रमण स्वतः होता है,कभी परिस्थितियां अतिक्रमण करने को मजबूर करती हैं ,कभी राज्य की नीतियों के कारण होता है और कभी जीवनशैली में आए बदलाव के कारण होता है। बहुलतावाद को यदि जड़ या स्थिर केटेगरी मानेंगे तो स्थितियां समझ में नहीं आएंगी।
मसलन् धर्म में मौजूद वैविध्य और उसकी सामाजिक भूमिका में भी बदलाव आया है। धर्म को संविधान के पैरामीटर के दायरे में रहकर काम करना होता है।जातियों को भी संविधान की लक्ष्मण रेखा माननी होती है।पूर्व-आधुनिक व्यवस्थाओं में बहुलतावाद था लेकिन उसका नियामक और नियमित करने वाला साझा आधार नहीं था। पूंजीवादी उत्पादन संबंधों और पूंजीवादी राज्य व्यवस्था आने के साथ संविधान के पैरामीटर के आधार पर बहुलतावाद को व्याख्यायित किया गया।
संविधान ने समानता और व्यक्ति की स्वतंत्रता को आधार बनाकर बहुलतावाद और धर्मनिरपेक्षता दोनों की व्याख्या की है और इन दोनों को लोकतंत्र का अपरिहार्य अंग माना है। आधुनिक पूंजीवादी राज्य के उदय के पहले भी धार्मिक-सांस्कृतिक और सामाजिक बहुलतावाद था लेकिन उसको कभी व्यक्ति की स्वतंत्रता और समानता के आधार नहीं देखा गया। व्यक्ति की स्वतंत्रता और समानता के आधार पर देखने की परंपरा पूंजीवादी राज्य व्यवस्था के आगमन के साथ आरंभ हुई।
इस प्रसंग में समाजवाद की भी मुश्किलें सामने आई हैं। वहां समानता तो है लेकिन व्यक्ति स्वतंत्रता नहीं है। फलतः बहुलतावाद को समाजवाद में सत्ता के दमन और दबाव का सामना करना पड़ा।
बहुलतावाद और धर्मनिरपेक्षता के लिए समानता ही काफी नहीं है बल्कि व्यक्ति की स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की आजादी भी चाहिए। धर्मनिरपेक्षता यदि इन दोनों के बिना होगी तो उसके अधिनायकवाद या सर्वसत्तावाद में तब्दील हो जाने की संभावनाएं हैं। धर्मनिरपेक्षता को प्रभावी होना है तो उसे व्यक्ति की स्वतंत्रता ,समानता और अभिव्यक्ति की आजादी को आधार बनाना होगा। खाली समानता और न्याय के आधार पर परिभाषित धर्मनिरपेक्षता वस्तुतः अधिनायकवादी धर्मनिरपेक्ष राज्य को जन्म देती है।यही वजह है कि आपातकाल में भारत के संविधान के आमुख में धर्मनिरपेक्ष और समाजवाद पदबंध जोडे गए। यह वह दौर था जब राजनीतिक बहुलतावाद को अस्वीकार किया गया।
समाज में सामाजिक-धार्मिक-सांस्कृतिक बहुलतावाद रहे इसके लिए यह जरूरी है कि राजनीतिक बहुलतावाद भी रहे। समानता और न्याय पर आधारित धर्मनिरपेक्षता में राजनीतिक बहुलतावाद के खत्म कर दिए जाने की संभावनाएं हैं। आपातकालीन भारतीय अनुभव और समाजवादी देशों का अनुभव इस धारणा को पुष्ट करता है। अतःधर्मनिरपेक्षता के लिए समानता और न्याय ही काफी नहीं है इसके साथ व्यक्ति की स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की आजादी भी जरूरी है। इससे राजनीतिक बहुलतावाद और लोकतंत्र को बचाए रखने में मदद मिलती है, पर्सुएशन से दिल जीतने वाली नीति के लिए भी वातावरण बनाने में मदद मिलती है।
समाजवाद ,सर्वसत्तावाद या अधिनायकवादी शासन व्यवस्थाएं धर्मनिरपेक्षता को तो मानती हैं लेकिन व्यक्ति की स्वतंत्रता ,अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और पर्सुएशन की नीति को नहीं मानते। दबाब और वर्चस्व की नीति बहुलतावाद का निषेध है। उदार पूंजीवाद में पर्सुएशन एक बड़ा उपकरण है जिसके जरिए आधुनिकीकरण की प्रक्रिया संपन्न होती है। बहुलतावाद को उन समाजों में क्षति पहुँची है जहां दबाव की राजनीति रही है।
भारत का संविधान सभी जातियों और धर्मों के मानने वालों की प्राइवेसी मानता है और निजी संस्कारों की सुरक्षा की गारंटी देता है । संविधान में विभिन्न समुदायों के निजी कानूनों को भी मान्यता दी गयी है।
सरकार निजी मान्यताओं, मूल्यों और संस्कारों में तब तक हस्तक्षेप नहीं कर सकती जब तक कोई शिकायत न करे।शिकायत करने पर समस्या का समाधान संविधान सम्मत आधार पर होता है। यहां तक कि सरकार पुरानी सड़ी-गली रीतियों और रिवाजों के मामले में भी हस्तक्षेप नहीं कर सकती। पूंजीवादी राज्य का यह लिबरल रूप समाज के तानेबाने को पर्सुएशन के आधार पर बदलने में विश्वास करता है। राज्य चाहे तो जबर्दस्ती कर सकता है लेकिन उससे राज्य का लिबरल ढांचा बुरी तरह प्रभावित हो सकता है। यहां तक कि सड़ी गली मान्यताओं और कुरीतियों के खिलाफ जन आक्रोश जब व्यक्त होता है या उनके खिलाफ कोई नागरिक शिकायत करता है तो राज्य सक्रिय होता है।
नामवर सिंह जिस आधार पर सेक्युलरिज्म को परिभाषित करते हैं उनको यही लगता है कि अभी भारतीय समाज में सेक्युलरिज्म को 'वर्क-आउट' करना बाकी है। सच यह है भारतीय संदर्भों में धर्मनिरपेक्षता संवैधानिक तौर पर परिभाषित है और राज्य कमोवेश उसका पालन कर रहा है। लेकिन राजनीतिकदलों के आचरण में इसका अभाव है।
नामवर सिंह की यह चिन्ता जायज है कि “केवल राज्य के सेक्युलर होने से हमारा काम नहीं चल सकता,समाज को सेक्युलर होना पड़ेगा।” सवाल यह है इसके लिए क्या करें ? इसकी कोई परिकल्पना नामवर सिंह नहीं देते।
सवाल यह है धर्मनिरपेक्ष समाज की परिकल्पना क्या है ? क्या मानवाधिकारों को दरकिनार करके धर्मनिरपेक्ष समाज संभव है ?मानवाधिकारों की चेतना और उनके आधार पर विभिन्न स्तरों पर संगठनों का निर्माण ही धर्मनिरपेक्ष समाज को पुख्ता बना सकता है। हमें शीतयुद्ध और समाजवाद के नजरिए से बाहर निकलकर धर्मनिरपेक्षता,वर्गसंघर्ष और बहुलतावाद के बारे में सोचना चाहिए।


















जलेसं के इलाहाबाद सम्मेलन पर - लोकतंत्र से भागकर लोकतंत्र नहीं मिलता काॅमरेड !

लोकतंत्र हमारे समाज की प्राणवायु है और इस प्राणवायु को अबाध और स्वच्छ होना चाहिए । लेकिन यह संभव नहीं लग रहा। इलाहाबाद में हाल ही में जनवादी लेखक संघ के राष्ट्रीय सम्मेलन से भी लोकतंत्र की स्वच्छ वायु प्रवाहित नहीं हुई है। नयी कमेटी बनी है । हम चाहेंगे कि यह संगठन और भी ज़्यादा बेहतर ढंग से काम करे। कुछ सवाल हैं जिन पर विचार करना बेहद ज़रुरी है।

देश में लोकतांत्रिक होने की पहली शर्त है सम्मान और समानता के नज़रिए से लेखक को देखना ,उसके नागरिक अधिकारों की रक्षा करना । इस मामले में जनवादी लेखकों को अभी कई किलोमीटर की यात्रा करनी होगी । वे अभी भी ' मैं' और 'तुम' में वर्गीकृत करके सोच रहे हैं ।
कल तक जो लेखक जनवादी लेखक संगठन का सदस्य था अपना था ।आज सदस्य नहीं है तो पराया है , वर्गशत्रु है, भ्रष्ट है, बाज़ारू है। इस नज़रिए से जलेसं जब तक लेखकों को देखेगा कभी भी 'मैं' और 'तुम' के पापबोध से निकल नहीं पाएगा।
दुखद है जलेसं में 'हम' का भाव ख़त्म हो गया है। लेखक पर निजी हमले घटिया क़िस्म की गुण्डागर्दी है ,इससे बचा जाना चाहिए। जलेसं कोई लेखकीय प्रमाणपत्र जारी करने वाला संगठन नहीं है।
जनवादी लेखक संगठन के कुछ पदाधिकारियों के व्यवहार को छोड़कर अधिकांश लेखक अभी भी सामंती मनोदशा में सोचते और व्यवहार करते हैं। यह बात उनके आचरण में भी झलकती है। जलेसं सबसे पहले इस दयनीय दशा को दुरुस्त करे।
सांगठनिक अहंकार घटिया क़िस्म की चीज़ है जिसका जलेसं के सदस्यों ने जमकर विकास किया है। सांगठनिक अहंकार के नाम पर साहित्यिक दादागिरी पैदा हुई है । इससे जलेसं में उदार परंपराएँ नष्ट हुई हैं।आंतरिक लोकतंत्र नष्ट हुआ है।
लोकतंत्र में विनम्रता ज़रुरी चीज़ है हेकडीबाज कभी लोकतांत्रिक नहीं हो सकता और न इस तरह के लेखक कभी समाज में वैचारिक नेतृत्व कर सकते हैं। सांगठनिक हेकड़ीबाजों ने मुखर होकर जलेसं में दबाव बना लिया है यह जलेसं के अंदर लोकतंत्र के हेकडीतंत्र में बदलने का संकेत है और यह जलेसं के हाशिए पर चले जाने की सूचना भी है। यह वह माहौल है जिसमें इलाहाबाद सम्मेलन सम्पन्न हुआ। बेहतर होता संगठन आंतरिक मसलों पर विचार करता लेकिन यह सब न करके औपचारिक ढंग से राष्ट्रीय सम्मेलन कर लिया गया।
इलाहाबाद सम्मेलन में कोई नया फ़ैसला नहीं हुआ और नहीं जलेसं के संविधान में मौजूद लोकतंत्रविरोधी चोर दरवाज़े बंद करने के बारे में कोई ठोस क़दम ही उठाए गए ।
यह सच है कि जनवादी लेखक संगठन स्वायत्त संगठन है लेकिन यह स्वायत्तता वहीं तक है जहाँ तक भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) ने रेडलाइन खींची हुई है। संगठन के आंतरिक गठन पर माकपा का नियंत्रण है। यह नियंत्रण ख़त्म हो तब ही सही मायने में जलेसं लोकतांत्रिक बन पाएगा।
उल्लेखनीय है माकपा के हिंदी उर्दू साहित्य शून्य नेताओं के नियंत्रण में इसका लंबे समय से संचालन होता रहा है । लंबे समय से माकपा के ऐसे नेतागण इस संगठन के कामकाज को देखते रहे हैं जो हिंदी -उर्दू साहित्य की साझा परंपरा से एकदम अनभिज्ञ हैं । इससे माकपा की इस संगठन को लेकर गंभीरता का पता चलता है।
जनवादी लेखक संघ यदि देश में अपना स्थान बनाना चाहता है तो उसे माकपा के चंगुल और निर्देशन से मुक्त करना होगा। फ़िलहाल इसके चांस नहीं हैं। माकपा के केन्द्रीय नेतृत्व से लेकर स्थानीय नेतृत्व का इस संगठन पर जिस तरह का नियंत्रण है उससे लेखक संगठन की पहलकदमी नष्ट हुई है, संगठन में लोकतंत्र नष्ट हुआ है।जलेसं में हर काम पार्टी के आदेश पर होता है। पार्टी के आदेश पर ही लेखक से संबंध तय किए जाते हैं। पार्टी के सचिव ने यदि किसी लेखक के बारे में कह दिया कि फ़लाँ लेखक माकपा में नहीं है या माकपा आलोचक है उससे दूर रहो तो संगठन के कर्त्ता ठीक तेजगति से उस दिशा में चल देते हैं। इससे संगठन में साहित्यिक भ्रष्टाचार फैला है । सचिव होने की प्रधान शर्त है माकपा का सदस्य होना। यह विचारणीय समस्या है कि जलेसं के गठन के बाद से महासचिव कोई ग़ैर माकपाई नहीं हुआ। यह फिनोमिना कमोबेश सारे राज्यों में है। यह संगठन के बंधक बनाए रखने की अलोकतांत्रिक समझ है।
जनवादी लेखक संघ की कार्यप्रणाली में माकपा नेतृत्व के हस्तक्षेप को नीचे तक देख सकते हैं। घटिया क़िस्म की गुटबाजियां संगठन में जारी हैं। जिनको कभी ख़त्म करने का केन्द्रीय नेतृत्व ने प्रयास नहीं किया । मूल बात यह कि माकपा के हस्तक्षेप से जलेसं किस तरह स्वायत्त बने यह समस्या अभी भी बनी हुई है। माकपा के मौजूदा नज़रिए को देखते हुए इस स्थिति में सुधार की संभावनाएँ नज़र नहीं आतीं। इसका दुष्परिणाम यह है कि लेखक संघ की स्वायत्त नीतिगत राय कहीं पर भी नज़र नहीं आती। इससे संगठन में राजनीतिक मसलों पर प्रस्तावों में माकपा से न तो भिन्न भाषा मिलती है और न भिन्न नज़रिया ही दिखाई देता है।
जनवादी लेखक संघ की नई चिंताएँ लेखकीय सवालों और समस्याओं पर सक्रिय होती नजर नहीं आ रहीं। यहाँ तक कि इलाहाबाद सम्मेलन में भी कोई नयी चीज़ सामने नहीं आयी है। स्टीरियोटाइप घिसी पिटी भाषा में प्रस्तावों में चीजें रखी गयी हैं।
इलाहाबाद सम्मेलन का एक ही संदेश है कि जलेसं का भारत की वास्तविकता से संबंध टूट चुका है।

साझा संस्कृति संगम के घोषणापत्र में कहा गया है ' भारतीय समाज इस समय फ़ासीवाद के मुहाने पर खड़ा है। सच तो यह है कि देश के अनेक हिस्सों में लोग अघोषित फ़ासीवाद की परिस्थिति में ही सांस ले रहे हैं। '
उपरोक्त भाषा और समझ दर्शाती है कि जलेसं समस्या को ठोस रुप में देखना नहीं चाहता । लेखक जब चीज़ें ठोस वास्तविक उदाहरणों के बिना पेश करने लगें तो इसे लेखकीय चालाकी कहा जाता है। यह ख़तरनाक स्थिति है।
जलेसं को उन इलाक़ों का विवेचन करना चाहिए जहाँ पर अघोषित फासीवाद है ,यह भी देखना चाहिए कि अघोषित फासीवाद में माकपा की भी कोई भूमिका है या नहीं ? मैं पश्चिम बंगाल के अनुभव से कह सकता हूँ कि माकपा ने वामशासन के दौरान अघोषित आतंक का जो तानाबाना बुना था आज वही माकपा के लिए गले की हड्डी बन गया है।
पश्चिम बंगाल में माकपा के शासन में जिस तरह आमलोगों के जीवन में हस्तक्षेप किया गया वह लोकतंत्र को कलंकित करने वाली चीज़ है और उसके कारण वहाँ पर पराजय हुई।
दुखद बात यह है कि जलेसं ने कभी माकपा रचित अलोकतांत्रिक माहौल और संरचनाओं की आलोचना नहीं की। एक वाक्य तक इस महान घोषणापत्र में नहीं लिखा गया।
लेखकों और नागरिकों का अपमान करना लोकतंत्र का अपहरण है और वामशासन में माकपा ने पश्चिम बंगाल में यह काम जमकर किया है। ज़रुरत इस बात की है कि जलेसं इस फिनोमिना पर आलोचनात्मक नज़रिए से विचार करे।
संघ परिवार के फासिज्म से लड़ने के लिए ज़रुरी है कि माकपा के अलोकतांत्रिक कार्यकलापों की भी आलोचना की जाय लेकिन जलेसं तो माकपा के सांस्कृतिक -सामाजिक अपराधों पर एकदम चुप है । वे चुप क्यों हैं? यह सवाल उठना स्वाभाविक है ? यही वह बिंदु है जहाँ पर हमें माकपा से जलेसं की स्वतंत्रता की और भी ज़्यादा ज़रुरत महसूस होती है । मैं जलेसं के केन्द्रीय नेतृत्व की असफलताओं की लिस्ट बताना नहीं चाहता । लेकिन यह माँग तो रहेगी कि लेखक संगठन में पदाधिकारी उसे बनाएँ जो हिंदी-उर्दू का लेखक हो ? हाल ही में पश्चिम बंगाल में जलेसं के अध्यक्ष हासिम अब्दुल हलीम चुने गए हैं। वे लेखक नहीं हैं । यह संकेतमात्र है उस समस्या का जिसमें माकपा प्रवेश करती है। वे बेहतर इंसान हैं माकपा के नेता हैं लेकिन लेखक नहीं हैं।
जलेसं के इलाहाबाद घोषणापत्र में नयी उदार आर्थिक नीतियों की जमकर आलोचना की गयी है। लेकिन मित्रलोग भूल गए कि अबपीछे मुड़कर लौट नहीं सकते और यह एकमात्र अपरिहार्य मार्ग है ।
विश्व व्यापार संगठन में शामिल होने के बाद पीछे हटने या अन्य किसी मार्ग पर चलने का विकल्प नहीं बचा है।

इलाहाबाद घोषणापत्र में सही कहा गया है कि 'इसी दौर में राष्ट्रीय आंदोलन की उदारवादी और जनोन्मुखी प्रेरणाएं और मूल्य तेज़ी से टूटे बिखरे हैं और बांये बाजू़ की वैकल्पिक चुनौती और प्रतिरोध की परंपरा भी कमज़ोर पड़ी है।'
इसके कारणों का जलेसं आदि संगठन अभी तक मूल्याँकन क्यों नहीं कर पाए ? यदि कहीं किया है तो उसका ज़िक्र होना चाहिए।जनोन्मुखी प्रेरणाएँ और मूल्य क्यों टूटे ? अपने दायित्व से बचने का यह उपाय है कि दूसरों पर ज़िम्मेदारी डालो । देश में उदारवादी परंपराएँ कमज़ोर क्यों हुईं, सांगठनिक तौर पर इस पर सुसंगठित बहस के बिना राय देना सही नहीं है।सवाल यह है कि फंडामेटलिस्टों के दबाव के सामने पश्चिम बंगाल का वामशासन क्यों झुका ? तसलीमा नसरीन की किताब पर पाबंदी क्यों लगायी गयी ? और तसलीमा नसरीन को वोटबैंक राजनीति और फंडामेंटलिज्म के दबाव में वामशासन ने क्यों राज्य से बाहर निकाल दिया? आदि सवालों के उत्तर खोजने होंगे, यह नमूना मात्र है।
उदार परंपराओं के क्षय में वामपंथ की भूमिका को आलोचनात्मक नज़रिए से देखे बिना उस पतन की जड़ें नजर नहीं आएंगी जहाँ हम सब आजकल पहुँच गए हैं। बुर्जुआजी को गरियाना आसान है लेकिन माकपा की अनुदारदृष्टि पर बातें करना मुश्किल काम है । यह दायित्व तो जलेसं को लेना होगा कि वह मीमांसा करे और बताए कि उदार परंपराओं और मूल्यों का ह्रास क्यों हुआ और माकपा की इस प्रसंग में क्या भूमिका रही है?
माकपा के लोग जिस तरह की घृणा का प्रचार अपने से अलग हुए लेखकों और बुद्धिजीवियों के ख़िलाफ़ करते हैं वह निंदनीय है । अफ़सोस की बात है जलेसं के नेतृत्व में भी घृणा की यह बीमारी घर कर गयी है। इस प्रसंग में एकाधिक उदाहरण दिए जा सकते हैं । बेहतर यही है कि उदार मूल्यों के पतन के कारणों को समग्रता में विश्लेषित किया जाय और लेखकों के बीच में खुली बहस चलायी जाय। इलाहाबाद घोषणापत्र के बहाने बहस हो सकती है लेकिन जलेसं का रवैय्या बहस का कम नज़र आता है और मसलों को फ़र्श के नीचे छिपाने का ज़्यादा नज़र आता है। मसलों को फ़र्श के नीचे खिसकाना लोकतंत्र का अंत है।

जनतंत्र , फासिज्म , जनता की राय और प्रौपेगैण्डा

मीडिया में मीडियावालों ,दलीय प्रवक्ताओं और 'ओपिनियन मेकरों' की राय व्यक्त होती है। वहाँ जनता की वही राय व्यक्त होती है जो 'समाचार फ्लो' या ' प्रायोजित कार्यक्रम की संगति' में हो। मीडिया के लोग या उनके भक्त मीडिया समीक्षक यही कहते हैं कि मीडिया वही पेश करता है जो जनता कहती है। सच यह नहीं है। 

मीडिया का काम जनता की राय पेश करना नहीं है बल्कि प्रायोजक के लिए माहौल बनाना मुख्य लक्ष्य है। वह प्रायोजक के पक्ष में दर्शकों ,श्रोताओं में संस्कार , स्वीकृति और विनिमय भावना पैदा करता है। यह विनिमय का कार्य व्यापार जहाँ एक ओर वैचारिक समर्थक बनाने में भूमिका अदा करता है वहीं दूसरी ओर धन के रुप में मुनाफ़ा भी पैदा करता है।
मोदी की आक्रामक प्रचारनीति और संघ की भूमिका के अधिकांश नीतिगत फ़ैसले संघ की नीति से संचालित हैं, संघ सक्रिय संगठन है। इसका क़तई अर्थ नहीं है कि देश में फासीवाद आ गया है। भारत में लोकतंत्र है और लोकतंत्र के पैराडाइम पर काम करने के लिए भाजपा भी मजबूर है। भाजपा की कार्यशैली के कई रुप हैं। वे प्रत्यक्ष रुप से नग्न पूँजीवादी दल के रुप में काम कर रहे हैं ।

देश में सामाजिक शक्ति संतुलन अभी फासीवाद के पक्ष में नहीं है। आज भी देश में लोकतंत्र के पक्ष में सामाजिक -राजनीतिक संतुलन है और हर स्तर पर लोकतांत्रिक शक्तियों के पक्ष में शक्ति संतुलन बना हुआ है। संसद, विधानसभा और न्यायपालिका संविधान के नियमों के तहत काम कर रहे हैं। इसके अलावा विभिन्न वर्गों के बीच में लोकतांत्रिक संगठनों की पकड़ आज भी मज़बूत है। ऐसे में फासीवाद के मुहाने पर देश को खड़ा कहना सही नहीं है।
लोकतंत्र में फासीवादी संगठन भी सक्रिय रह सकते हैं। लेकिन जब वे हर क्षेत्र में निर्णायक हो जाएँ तब ही फासीवाद की दस्तक कह सकते हैं। 

शुक्रवार, 2 मई 2014

माकपा का संकट और नई चुनौतियां

 इसबार के लोकसभा चुनाव में कम्युनिस्ट पार्टियां जितनी दिशाहीन रही हैं वैसी वे पहले कभी नहीं थीं। दिशाहीनता पर किसी भी नेता को अफसोस नहीं है बल्कि उलटे वे दिशाहीनता की हिमायत कर रहे हैं। यह दिशाहीनता दो कारणों से पैदा हुई है इसका पहला कारण है नेतृत्व की साख नहीं है। दूसरा कारण है कि मौजूदा दौर को लेकर कम्युनिस्ट पार्टियों के पास कोई स्पष्ट नीतिगत समझ नहीं है।खासकर माकपा में ये दोनों कारण साफ तौर पर देखे जा सकते हैं।

       यह सच है माकपा ने लोकतांत्रिक राजनीति में वैकल्पिक नीति और आचार-व्यवहार के बेहतरीन मानकों का निर्माण किया है। ईमानदारी,सादगी,जनता के प्रति वचनबद्धता में यह दल अन्य दलों से बेहतर भूमिका निभाता रहा है। लेकिन फिलहाल जो लीडरशिप है उसकी कोई साख न तो नेताओं में है और न जनता में है।
    लोकसभा चुनाव को लेकर माकपा का नजरिया एकदम कूपमंडूकों जैसा है। इस चुनाव में माकपा अपने लिए न तो नए मित्र खोज पायी और न नए चुनावी समझौते ही कर पायी और यह नेतृत्व की सबसे बड़ी असफलता है।
  मसलन, इसबार बिहार में वामदल आपस में लड़ रहे हैं। उनका कोई मित्र नहीं है। उनका किसी से समझौता नहीं हो पाया, उनको किसी ने मित्र नहीं बनाया, यही हाल यूपी का है।
   मसलन् माकपा के महासचिव प्रकाश कारात कह रहे हैं कि भविष्य में तीसरे मोर्चे की सरकार बन सकती है और कांग्रेस को उसे समर्थन करना चाहिए और प्रधानमंत्री मुलायम सिंह यादव होंगे। कारात से पूछा जाना चाहिए कि सपा से माकपा को यूपी में चुनावी समझौता करने में सफलता क्यों नहीं मिली ? यदि सपा गंभीर है और माकपा के साथ उसके रिश्ते बेहद भरोसेमंद हैं तो माकपा और सपा में यूपी और पश्चिम बंगाल में कम से कम सीटों का समझौता तो हो ही सकता था। यही बात जद(यू) पर बिहार और कर्नाटक में लागू होती है।
    प्रकाश कारात को इस सवाल का जबाव देना होगा कि इसबार माकपा का अन्य दलों के साथ चुनावी समझौता क्यों नहीं हो पाया ? स्थिति यहां तक खराब है कि जयललिता के साथ समझौता होते होते टूट गया।
   पहलीबार माकपा का पूरे देश में केरल,पश्चिम बंगाल के बाहर किसी भी दल से कोई चुनावी समझौता नहीं हो पाया। इस तरह की स्थिति विगत 50सालों में पहलीबार देखने में आई है। यह लीडरशिप की सबसे बड़ी असफलता है।यह साधारण असफलता नहीं है।
    दूसरी बड़ी असफलता यह है कि माकपा के केन्द्रीय नेतृत्व ने इस चुनाव में किसी भी किस्म का राजनीतिक आक्रमण न तो कांग्रेस के खिलाफ किया है और न भाजपा के खिलाफ किया है। प्रचार अभियान में इस तरह की असफलता इस बात का प्रतीक है कि केन्द्रीय नेतृत्व लोकतंत्र में अनमने ढ़ंग से या तदर्थ भाव से भाग ले रहा है।
    माकपा नेतृत्व के अनमनेपन का एक और उदाहरण लें तो बात समझ में आएगी। हाल ही में पश्चिम बंगाल में माकपा नेता गौतम देव ने प्रेस कॉँफ्रेस करके ममता सरकार पर गंभीर आरोप लगाए और ये आरोप माकपा के राज्य कार्यालय में बैठकर लगाए। सवाल यह है यदि ये आरोप गंभीर हैं तो इनको दिल्ली में प्रकाश कारात ने प्रेस कॉफेंस करके प्रेस को क्यों नहीं बताया ?
    ममता बनर्जी से जंग क्या लोकल नेताओं के बल पर लड़ सकते हैं ?यह त्रासद है कि मीडिया कवरेज की महत्ता जानते हुए भी केन्द्रीय नेतृत्व हमलावर नहीं हो पा रहा है और छुटभैय्ये नेताओं के जरिए फायरिंग कर रहा है। इससे शत्रु को मारना संभव नहीं है। यह दुर्भाग्य जनक है कि पूरे चुनाव में पश्चिम बंगाल को लेकर केन्द्रीय नेतृत्व को जिस तरह की पहलकदमी करनी चाहिए थी वह नहीं हुई। क्यों नहीं हुई यह सवाल बहुत महत्वपूर्ण है। लोकतंत्र में माकपा नेताओं में पहलकदमी का अभाव एकदम अस्वाभाविक बात है और इसकी किसी भी तर्क से हिमायत नहीं की जा सकती।
     माकपा नेतृत्व इसबार के लोकसभा चुनाव में कई स्तरों पर फेल हुआ है। लोकसभा चुनाव के परिणाम कुछ भी आएं। माकपा की सीटें बढ़ें या घटें, लेकिन ये खामियां रहेंगी।माकपा को कायदे से नेतृत्व की अक्षमता और प्रभावशाली प्रचार नीति की असफलता के कारणों की गहराई में जाकर जाँच करनी चाहिए।   

कॉमरेड ! लोकतंत्र बिना बलिदान के नहीं बचेगा !



पश्चिम बंगाल गंभीर संकट में है। लोकसभा के तीसरे चरण के मतदान के समय वामदलों का चुनाव को लेकर जो रवैय्या रहा है वह चिंता की बात है। यह सच है कि तीसरे चरण में 9लोकसभा सीटों पर बड़े पैमाने पर जाली वोट डाले गए,मतदान केन्द्रों पर चुनाव एजेंट बिठाने में वामदलों की असुविधा हुई।मतदाताओं को घरों से नहीं निकलने दिया गया। बड़े पैमाने पर हिंसा हुई,कई लोग मारे गए। इसके बावजूद यह सच है कि वामदलों और खासकर माकपा का इसबार के लोकसभा चुनाव को लेकर जो रुख सामने आया है वह किसी भी तरह से स्वागतयोग्य नहीं है।
            ममता सरकार आने के पहले से ही माकपा में राजनीतिक निष्क्रियता आ गयी थी, जिसको केन्द्रीय नेतृत्व ने कभी गंभीरता से नहीं लिया। ममता सरकार आने के बाद माकपा के सदस्यों और हमदर्दों पर तृणमूल के गुण्डों के हमले बढ़े हैं। ये हमले वामशासन में भी हो रहे थे जिनको रोकने की कभी कोशिश नहीं की गयी और ईंट का जबाव पत्थर से देने के चक्कर में सारे राज्य को एक ऐसी अंधी प्रतिस्पर्धा में झोंक दिया गया जिसमें से यह राज्य अभी तक निकल ही नहीं पाया है।
        ममता सरकार आने के बाद माकपा ने व्यवहार में एक नीति अख्तियार की है कि ममतावाहिनी जहां हिंसा करे वहां से हट जाओ, यदि वह पोलिंग बूथ पर हिंसा करे तो वहाँ से हट जाओ, यदि वह गली-मुहल्ले , बस्ती इलाके या गांव में हिंसा करे तो वहां से हट जाओ। यानी हिंसा देखो और हट जाओ। यह नीति बुनियादी तौर पर माकपा के अंदर पैदा हुए पराजयबोध की देन है।
     इसका पहला साइड इफेक्ट यह है कि कई सौ माकपा सदस्य मारे गए हैं और हजारों लोगों को घर छोड़कर अन्यत्र रहना पड़ रहा है।माकपा सदस्यों में खास किस्म का पलायनबोध पैदा हुआ है।
     हिंसा का प्रतिकार भागकर नहीं किया जा सकता। लोकतंत्र में माकपा ने जो जगह बनायी है वह पलायन करके नहीं बनायी है। माकपा को भागने की बजाय सामना करने और लोकतंत्र की रक्षा के लिए जान देने की भावना से काम लेना होगा।
      लोकतंत्र को बचाना है तो हिंसा का दृढ़ता के साथ सामना करना होगा। विगत दिनों हुए छात्रसंघ चुनावों में एसएफआई ने जिस तरह पलायनवादी रुख अख्तियार किया उससे छात्र आंदोलन की अपूरणीय क्षति हुई है। हिंसा से अपने सदस्यों को बचाने के नाम पर छात्रसंघों को ममतावाहिनी के हवाले कर दिया गया, अधिकांश स्थानों पर वे बिना चुनाव के ही जीत गए।
    यह दुर्भाग्यजनक है कि जिस संगठन के लाखों सदस्य हों वो छात्रसंघ के चुनावों में मैदान से इसलिए हट जाय क्योंकि हिंसा हो रही है।यही हाल ग्राम पंचायतों के चुनावों में हुआ है।
 कॉमरेड, हिंसा को आप पलायन करके नहीं रोक सकते। हिंसा को रोकने के लिए जरुरी है कि उसका डटकर सामना किया जाय। दुखद बात यह है कि पलायन करके भी एसएफआई अपने सदस्यों पर हमले रोक नहीं पायी और अनेक सदस्य मारे गए।
   लोकतंत्र में पीठ पर गोली मत खाओ,सीने पर गोली खाओ। घर में या गली में हिंसकों के हाथों मत मरो, पोलिंग बूथ की रक्षा करते हुए मरो।
   पश्चिम बंगाल की यह नियति है कि यहां यदि वामदलों को लौटना है तो उनको पोलिंग बूथों की रक्षा करते हुए ,यूनियन का चुनाव लड़ते हुए,लोकतंत्र के मुहानों पर जान देनी होगी।
    पश्चिम बंगाल में लोकतंत्र महज विमर्श का विषय नहीं है बल्कि यह अपराधी गिरोहों की शरणस्थली बन चुका है। लोकतंत्र को बचाना है तो अपराधी गिरोहों से सीधे मुठभेड़ करनी होगी। छिप छिपकर लड़ना और पिटनाबंद करना होगा।
     पश्चिम बंगाल में लोकतंत्र कॉमरेडों की कुर्बानी मांग रहा है। कुर्बानी के बिना पश्चिम बंगाल को अपराधीकरण से बचाना संभव नहीं है। पश्चिम बंगाल में असाधारण परिस्थितियां हैं। यहां पर सामान्य लोकतांत्रिक गतिविधियों के लिए वैध रास्तों पर अपराधी गिरोहों ने कब्जा जमा लिया है।अपराधी गिरोहों को हमेशा के लिए नेस्तनाबूद करने के लिहाज से कमर कसनी होगी वरना पश्चिम बंगाल में लोकतंत्र को बचाना संभव ही नहीं होगा।
    अभी भी समय है अगले दो चरणों के मतदान में मतदान केन्द्रों पर जाकर मोर्चा लेने की जरुरत है। कायरों की तरह जीने से बेहतर है कि मतदान केन्द्रों पर जाओ और वोट दो, वोट डलवाओ,काम करो और कोई रोके या डराए तो मतदान केन्द्र पर ही जान दो, मरो,पिटो लेकिन मतदान केन्द्र मत छोड़ो। मतदान केन्द्र आज वोट के साथ कॉमरेडों का बलिदान भी चाहता है। कॉमरेड , लोकतंत्र बिना बलिदान के नहीं बचेगा।   

उत्तर आधुनिकता का पुनर्पाठ


फ़्रेडरिक जेम्सन ने कहा 'उत्तर आधुनिकता परवर्ती पूँजीवाद का सांस्कृतिक तर्क है।' यानी यह न बुरा है और न अच्छा है बल्कि यह तो एक अवस्था है जिसमें सबको रहना है और इसे लेकर सबको राय ज़ाहिर करनी है ।
भारत और यूरोप में उत्तर आधुनिक परिस्थितियों में बुनियादी अंतर है । यूरोप में उत्तर आधुनिकता आई है सत्तर के बाद के वर्षों में वहाँ पर द्वितीय विश्व युद्ध के बाद यूरोप के निर्माण की प्रक्रिया शिखर पर थी जापान के निर्माण का काम ख़त्म हो चुका था । पूँजीवादी विकास शिखर पर था । मुद्रा स्थिर थी ।बाज़ार सामानों से भरे पड़े थे। अमेरिका वियतनाम में करारी हार के कगार पर था । अमेरिकी समाज में ज़बर्दस्त आंदोलन थे । महँगाई थी। विकास एक जगह जाकर ठहर गया था । क़र्ज़ बढ़ रहे थे । डेविडहर्वे के शब्दों में कहें तो पूँजी को डी रेगुलेट किया गया , सार्वजनिक क्षेत्र के संस्थानों का निजीकरण किया गया। मुद्रा का अवमूल्यन हुआ। मज़दूरों के हकों पर हमले बढे।
इसके विपरीत भारत की स्थिति थी। यहाँ पर बैंकों का राष्ट्रीयकरण हुआ। पाक से १९७१ में हम युद्ध जीते । शानदार रेल हड़ताल हुई। बड़े पैमाने पर १९७४-७५ में आंदोलन हुए। आपातकाल आया।इंदिरा हारी । इंदिरा की वापसी हुई । लेकिन १९९०-९१ तक आते आते देश गहरे संकट में फँस गया और मनमोहन अर्थशास्त्र का जन्म हुआ। बेकारी और महँगाई के साथ सरकारी ख़ज़ाने में बहुत कम मुद्रा थी।
आपातकाल में उपग्रह छोड़ा गया । राजीवयुग में कम्प्यूटर क्रांति हुई । टीवी का विकास हुआ। सन् १९८० के बाद धीरे धीरे कुछ ऐसा घटा जिसको देखकर लगता था कि लोग इतिहास से बदला लेने पर आमादा हैं । मसलन् ओबीसी आरक्षण, राममंदिर आंदोलन, असम और पंजाब के आंदोलन आदि की एक ही धुन थी कि इतिहास में जो ग़लतियाँ की गयी हैं उनको दुरुस्त करना है । दलितसाहित्य और स्त्री साहित्य में भी इसे लेकर बग़ावत दिखाई दी। वे भी साहित्य में इतिहास के ख़िलाफ़ थे। इतिहास को नहीं मानते थे।
पहले रेगुलेशन पर ज़ोर था ,अब डी रेगुलेशन पर ज़ोर था । पहले लाइसेंस राज था अब लाइसेंस राज का खात्मा कर दिया गया। हर क्षेत्र में डीरेगूलेशन को लागू किया गया ।काम के घंटे बढ़ा दिए गए। पूरे सिस्टम का कम्प्यूटरीकरण आरंभ हुआ । प्रिंटयुग से कम्प्यूटर युग में आ गए। बाज़ार से माॅल के दौर में आ गए। महिलाओं ,अल्पसंख्यकों , किसानों ,मज़दूरों और आदिवासियों पर हमले तेज़ हुए। जातीय घृणा में इज़ाफ़ा हुआ। कल्याणकारी राज्य का चरित्र बदलने का प्रयास किया गया।
बहुराष्ट्रीय कंपनियों का कारोबार अंधाधुँध गति से बढ़ा। विश्व व्यापार संगठन के ढाँचे और नियमों से हमने अपने को बाँध लिया और देश में सभी क्षेत्रों में डीरेगूलेशन या विनिमयन को लागू कर दिया। सार्वजनिक संपदा और संसाधनों की खुली लूट हुई और उसे औने-पौने दामों पर निजी क्षेत्र को सौंप दिया गया । एक तरह से सार्वजनिक संपदा और कृषिभूमि के ख़िलाफ़ कारपोरेट युद्ध की घोषणा थी।
समूचे देश में नव-धनाढ्यों की आँधी आ गयी। देखते ही देखते हर शहर में करोड़पति पैदा हो गए । मध्यवर्ग के लोग करोड़पति हो गए। यह नए क़िस्म के फ्लेगजिबिल , फ़्री फ्लोटिंक और सामंजस्यवादी नए क़िस्म के यथार्थ का आगमन था।
मसलन पहले कार वाला अमीर था और अमीर से हम नफरत करते थे ,लेकिन नई वास्तविकता यह है कि हर मध्यवर्गीय व्यक्ति के पास कार है और कार अब अमीरी का प्रतीक नहीं रह गयी है। कलर टीवी अमीरों की चीज़ थी लेकिन अब नहीं है। फ़ोन बड़े लोगों के यहाँ हुआ करता था ,आज सबके हाथ में है।
हर स्तर पर सर्जनात्मक क्रांति हुई है। विज्ञापन से लेकर पुस्तक प्रकाशन तक सर्जनात्मक सौंदर्य की वर्षा हो रही है। नए क़िस्म की ग्लोबल अस्मिता ने पैर फैला दिए हैं। पहले पूँजी का सौंदर्य पर प्रभाव सीमित क्षेत्र तक था । लेकिन नई स्थितियों में पूँजी के वैभव ने आम जीवन पर असर डालना आरंभ कर दिया है । सब्सीडी पर हमले हो रहे हैं।
ग्लोबल स्तर पर चीन का पूँजीवादी बाज़ार के रुप में उदय बहुत बड़ी परिघटना है । इसने बहस के समूचे आधार को ही बदल दिया है । मज़ेदार बात यह है कि हमारा हिंदी का लेखक अभी भी नक्सलबाडी आंदोलन में फँसा है या शीतयुद्ध के मानकों में उलझा पड़ा है।
नए युग की ख़ूबी है तकनीक हमारे संचार ,राजनीति, संस्कृति आदि का निर्धारण कर रही है। समाजवाद का विघटन और कम्युनिस्ट पार्टियों के जनाधार में ज़बर्दस्त गिरावट ने मेहनतकश जनता को असहाय अवस्था में छोड़ दिया है।
महाख्यान का अंत हुआ है। बाज़ार में भयानक प्रतिस्पर्धा जन्म ले चुकी है और इससे राजनीति भी प्रभावित हुई है । अमेरिकी वर्चस्व में गिरावट आई है। चीन का महाशक्ति के रुप में उदय हुआ है । नई परिस्थितियों में राज्य के पास पूँजी निवेश को नियंत्रित करने का अधिकार नहीं रहा। राज्य जब निवेश को नियंत्रित नहीं कर सकता तो वह सूचना को भी नियंत्रित नहीं कर सकता ।
किसी एक नरेटिव पर लोगों की नज़र नहीं टिकी है बल्कि लोग अलग अलग क़िस्म के नरेटिव में ध्यान लगाए हैं । यही महाख्यान के अंत का अर्थ है ।
नव्य आर्थिक उदारीकरण के दौर में व्यक्ति के निजी हितों को तरजीह दी गयी। सामाजिक हित के सवालों को पीछे छोड़ दिया गया।
फ़्रेडरिक जेम्सन ने उत्तर आधुनिकता को परवर्ती पूँजीवाद का सांस्कृतिक तर्क कहा । लेकिन इसे नव्य आर्थिक उदारीतरण की विचारधारा भी कह सकते हैं। यह कोई आकाश से टपकी धारणा नहीं है बल्कि ऐतिहासिक तौर पर विकसित हुई अवधारणा है ।
बाज़ार से लेकर व्यक्ति तक मेकओवर का ग्लोबल रुप देखने में आ रहा है । इस पर सोचने की ज़रुरत है।
हिंदी में " उत्तर आधुनिकतावाद "नाम सुनकर ही समीक्षक भड़क जाते हैं । मैं तो स्वयं यह ग़ुस्सा अनेकबार देख चुका हूँ। नाम सुनकर राय बनाना और फिर उलटी सीधी राय बनाना यह हिंदी में आम बात है और दुर्भाग्यजनक बात यह है कि यह काम समीक्षकों ने किया है।
समस्या नामकरण की नहीं है समस्या बदले हुए यथार्थ को समझने और उसकी सही समझ बनाने से जुड़ी है। हिंदी समीक्षा अभी शैशव काल में है। यहाँ किसी भी अवधारणा पर कोई गंभीर लेखन नहीं हो रहा । ठोस धारणाओं के निर्माण और विमर्श का काम नहीं हो रहा। जो काम हुआ है वह हमें अवधारणाओं की सही समझ नहीं देता।
मसलन हमने आलोचना में आधुनिकतावाद , रैनेसां, औद्योगिकीकरण , प्रगतिशील साहित्य ,लोकतंत्र, भारत विभाजन ,भूमंडलीकरण आदि को लेकर कोई गंभीर अवधारणात्मक विवेचन का काम नहीं किया है । हमारे यहाँ तात्कालिक या सांगठनिक या मित्रतावश या उत्सवधर्मी आलोचना है इसमें वस्तुगतता का भयानक अभाव है।
साहित्य समीक्षा के अनेक मार्ग हैं । किसी को रैनेसां का मार्ग पसंद है ।किसी को भक्ति आंदोलन का मार्ग पसंद है ।किसी को १९१७ की अक्टूबर क्रांति से प्रभावित मार्ग पसंद है।किसी को प्रतिवाद का नक्सलबाडी मार्ग पसंद है ।कोई आधुनिकता तो कोई दलितसाहित्य या स्त्री साहित्य के मार्ग से गुज़रना चाहता है। किसी को विवेकवादी परंपरा का मार्ग पसंद है किसी को राष्ट्रवादी परंपरा का मार्ग पसंद है।
यानी साहित्य समीक्षा में हम एक नहीं अनेक मार्गों से यात्रा करते हैं । कोई अस्मिता के मार्ग से समीक्षा की यात्रा कर रहा है तो कोई समुदाय या वर्ग के मार्ग से साहित्य समीक्षा के मार्ग पर चल पडा है । इन सभी मार्गों में अंतर्क्रियाएं हैं जिनकी हमें अनदेखी नहीं करनी चाहिए।
साहित्य की आलोचना के जिस मार्ग से भी यात्रा करें सवाल यह है कि जाना कहाँ है ? किस तरह के साहित्य के ज़रिए जाना चाहते हैं और अंततः क्या करना चाहते हैं ?
साहित्य समीक्षा में रमण करते समय अंतर्क्रियाएं और प्रक्रिया महत्वपूर्ण हैं । यदि अंतर्क्रियाओं और प्रक्रिया की उपेक्षा करेंगे तो यह संभव है कि समीक्षा अविवेकवाद के टीले पर खड़ी मिली ।
मसलन दलित साहित्य या स्त्री साहित्य पर बातें करते समय अन्य साहित्य रुपों और विचारधाराओं के साथ चल रही अंतर्क्रियाओं और प्रक्रिया की अनदेखी न करें। वरना स्त्रीसाहित्य के नाम पर समीक्षा में अविवेकवाद पैदा होगा और इससे स्त्रीसाहित्य का स्वाभाविक विकास और साहित्यबोध बाधित होगा । इससे साहित्यिक अधिनायकवाद पैदा होगा ।
उत्तर आधुनिक नज़रिए से देखें तो पाएँगे कि हम सब असंपूर्ण साहित्य परंपरा में जी रहे हैं। किसी मार्ग विशेष के ज़रिए साहित्य का समग्र नज़रिया बनाना कठिन हो गया है ।
साहित्य में दृष्टियों की अंतर्क्रियाओं को हमें सिद्धांतत: मानना पड़ेगा और अंतर्विषयवर्ती पद्धति से काम लेना होगा।प्रधान और गौण के वर्गीकरण के बाहर निकलकर बहुलतावादी नज़रिए से देखना पड़ेगा ।

उत्तर आधुनिक अवस्था और समाज को जानने के लिए नई संवेदना और नई चेतना की ज़रुरत है। यह ऐसा समाज है जिसमें लोग तमाशा देखते हैं ,हस्तक्षेप नहीं करते।अराजक राजनीतिक आंदोलन पैदा हो जाते हैं ।
समूचे समाज में पूँजीवाद का बोलबाला है। साहित्य में नई प्रवृत्तियाँ जन्म लिया है। आधुनिकतावादी रुपों के प्रति असंतोष व्यापक तौर पर व्यक्त हो रहा है। रुढिबद्धता, बोरियत और नक़ली आशाओं का संचार में वर्चस्व है। स्थानीय स्तर पर पश्चिमी संस्कृति के प्रति ग़ुस्सा कम और प्रेम ज़्यादा है। मीडिया से लेकर स्थापत्य तक और संस्कृति से लेकर प्रफाॅर्मिंग आर्ट तक बड़े मूलगामी परिवर्तन हुए हैं।

लोकतंत्र और लोकतांत्रिक संरचनाओं के विकास के साथ तीव्रगामी भूमंडलीय कम्युनिकेशन नेटवर्क का विकास हुआ है ।
आधुनिककाल आने के साथ जो कलारुप विकसित होते हैं वे पुराने कलारुपों को रुपान्तरण के लिए मजबूर करते हैं। कम्युनिकेशन की तकनीक की संगति में भाषा ,कला और साहित्य रुपों का तेज़ी से विकास होता है । सामान्यतौर पर हमने कम्युनिकेशन तकनीक एवं कलाओं के अंतस्संबंध की अनदेखी की है। लेकिन उत्तर आधुनिक अवस्था हमें साहित्य और कम्युनिकेशन तकनीक के अंतस्संबंध पर विचार के लिए मजबूर करती है।
रेल,दूरसंचार ,प्रेस , रेडियो और फ़िल्म के आने के साथ कला एवं साहित्यरुपों में किस तरह के बदलाव आए हमने कभी गंभीरता से उनका विश्लेषण नहीं किया ।
कम्युनिकेशन तकनीक के नए रुपों ने कला और साहित्य में स्टाइल या शैलियों की बाढ़ पैदा की है । स्टाइल में जितने प्रयोग इस दौर में हुए हैं उतने पहले कभी नहीं हुए।
आधुनिककाल में नए प्रयोगों की आधार स्थली है उपन्यास विधा। कम्युनिकेशन तकनीक और आम संचार के रिश्ते में बुनियादी बदलाव आया है ।
आधुनिकता के साथ आमलोगों में "औचक "भाव से चीज़ों को देखने की प्रवृत्ति बढ़ी है।
हर क्षेत्र में "नए" की माँग बढ़ी है । "नए" के पदबंध का हर क्षेत्र में उपयोग बढ़ा है ।
ल्योतार के अनुसार उत्तर आधुनिकतावाद का मतलब यथार्थवाद का अंत नहीं है। बल्कि इसका मतलब है कि लेखक को समुदाय के रुप में देखें और समुदाय के रुप में स्वीकृति प्रदान की जाय अथवा उसे बीमार मानकर उसका उपचार किया जाय। हमारे बीच ऐसे अनेक लेखक हैं जिनके पास आधुनिकतावाद या प्रगतिवाद की कोई विरासत नहीं बची है। इसके कारण वे आधुनिकतावाद या प्रगतिवाद की परंपरा या दायरों का अतिक्रमण गए हैं। लेखक के वैचारिक अतिक्रमण को कभी गंभीरता से विश्लेषित नहीं किया गया। इसके कारण न तो कभी लेखक की मदद कर पाए और नहीं समझ ही पाए ,उलटे उसके प्रति संदेह बढ़ा । उस पर हमले किए।
विगत चालीस सालों में यथार्थ के नाम पर जो बहसें चलीं उससे सामयिक यथार्थ को समझने में मदद कम मिली। दूसरी ओर बुर्जुआजी की इतिहास में प्रतिष्ठा बढ़ती चली गयी ।यथार्थवाद के बहाने या यथार्थ रुपान्तरण के बहाने सिस्टम के जो चित्र पेश किए गए उनसे यथार्थ कम और कृत्रिम यथार्थ ज़्यादा सामने आया ।
नए तकनीकी जगत ने इतिहास के हरक्षण को मूल्यवान बना दिया है। एक फ़ोटो के हज़ार फ़ोटो ,हर क्षण के फ़ोटो ,आदि की प्रक्रिया ने इतिहास में हर अनुभव और संवेदना को सुरक्षित करने और दर्ज करने की संभावनाएँ पैदा की हैं। अब भाषा के हर रुप और सभी क़िस्म के वाक्यों के संरक्षण की संभावनाएं पैदा हो गयी हैं। इस क्रम में कम्युनिकेशन की नयी संहिता या कोड भी पैदा हुआ है । आप यदि इस कोड को खोलना जानते हैं तो यथार्थ समझ पाएँगे।
इधर के दौर में "यथार्थ" और "अस्मिता"पर केन्द्रित ख़ूब लिखा गया है । लेकिन यह युग इनके लिए पाठकों या दर्शकों की गारंटी नहीं देता । अब साहित्य में " सौंदर्य क्या है ? पर बात नहीं हो रही बल्कि "कला में क्या कहा जा रहा है " इस पर बातें हो रही हैं। फलतः यथार्थ के सवालों की जमकर उपेक्षा हो रही है और अकादमिक माँग-पूर्ति या उपयोगितावादी या नारेबाज़ी का साहित्य ख़ूब लिखा जा रहा है ।
आम जनता में समस्याओं को लेकर बेचैनी है लेकिन वह रेडीमेड समाधान चाहती है। जनता के अनुभवों में अवसाद ने बड़ी जगह घेर ली है। जनता चाहती है कि सरल ढंग से कहा जाए।इस बीच में जनता की जीवनशैली बदली है और उपभोग की डिक्टेटरशिप ने हमारे जीवन में आधिपत्य स्थापित कर लिया है । मनोरंजन की धारणा बदली है और "ख़ाली समय " की धारणा लोकप्रिय हुई है । "यथार्थ की नब्ज़" से लेखक की पकड़ से छूट गयी है जिसे वह संकीर्ण क़िस्म के ऐतिहासिक विवरण और ब्यौरों के ज़रिए भर रहा है । इसका परिणाम यह निकला है कि वह जो लिख रहा है उसमें सामयिक यथार्थ की कहीं से गंध नहीं मिलती फलत: उसका पाठक और समाज से अलगाव भी बढ़ा है । यह नीत्शे के शब्दों में एक तरह का निहिलिज्म है।
उत्तर आधुनिक दशा हो या आधुनिकता हो वहाँ पर दर्द और आनंद का द्वंद्वात्मक संबंध और अंतर्क्रियाएं साफ़ नज़र आती हैं। आनंद के जितने भी विषय हैं वे व्यक्ति के निजीदर्द से ही पैदा हुए हैं।
उत्तर आधुनिक लेखन में ऐसा बहुत सा लेखन आ रहा है जिसमें समीक्षकों के अनुसार सौंदर्य नहीं है। ऐसा भी लेखन आ रहा है जो "रुपरहित रुप" से गढ़ा हुआ है।
नया फिनोमिना है रुपरहित ,संवेदनारहित प्रस्तुतियों पर ज़ोर और वर्तमान के प्रति अंधप्रेम।
उत्तर आधुनिक अवस्था के कारण लेखक नियमरहित लेखन पर ज़ोर दे रहे हैं। यह वह दौर है जब चीज़ें घट जाने के बाद नियम बनते हैं। हमने क्या किया उसके बाद नियम बनते हैं ।
लेखन में शब्द इवेंट की तरह आ रहे हैं ।ये वे इवेंट हैं जो लेखक के ज़ेहन में बहुत देर से आए हैं। या यों कहें जिनको बहुत देर से साहित्य में व्यंजित होने का मौक़ा मिला है ।
उत्तर आधुनिक लेखन हमेशा बिडम्बनाओं के गर्भ से ख़ासकर भविष्य की बिडम्बनाओं के गर्भ से पैदा होता है ।
ल्योतार का मानना है हमारा काम यथार्थ सप्लाई करना नहीं है। बल्कि ऐसी कल्पनाओं की सृष्टि करना है जो पहले कभी लेखक के मन में नहीं आईं। या कभी पेश नहीं की गयीं । इस प्रसंग में हम दलित और स्त्री साहित्य देख सकते हैं।
उत्तर आधुनिक भाषाखेल को समझें ,इस खेल की ख़ूबी है कि यह रुपान्तरणकारी है। नया नारा है "सीमाएँ तोड़ो अंतराल भरो", लोग विभिन्न रुपों में सीमाएँ तोड़ रहे हैं । यह नारा आलोचना से लेकर विधा तक सबकी सीमाएँ तोड़ी जा रही हैं। साहित्य और सामाजिक यथार्थ के जटिल संबंधों की ओर ध्यान गया है। इन दिनों साहित्य के पाठकों पर वैचारिक या राजनीतिक प्रभाव की व्यापक चर्चा हो रही है ।
परंपरागत समीक्षा ने श्रेष्ठ और बाज़ारू साहित्य का अंतर किया था लेकिन उत्तर आधुनिकों ने इस विभाजन को नहीं माना। "डिफरेंस" और " हाइब्रीडिटी" पर ज़ोर दिया गया। विधाओं में मिश्रण से लेकर पापुलरकल्चर तक के प्रयोगों पर ज़ोर दिया ।
ल्योतार ने लिखा उत्तर आधुनिकतावाद का अर्थ है स्थानीय परिस्थितियों को सीमित संदर्भ में देखा जाय। इसमें व्यक्ति के स्तरों को खोजा जाय ।
बौद्रिलार्द के अनुसार यह युग इमेज और सूचना के उत्पादन का युग है । पहले भौतिक वस्तुओं के उत्पादन पर ज़ोर था । उत्तर आधुनिकता में स्थानीयअवस्था पर ज़ोर है और सार्वभौम का निषेध है।
उत्तर आधुनिक अवस्था में अस्मिता की राजनीति केन्द्र में आ गयी है। रीतिवादी ढंग से इसके रुपों की सृष्टि हुई है। अस्मिता पर बहस कम और सृजन पर ज़ोर ज़्यादा है। अस्मिता के लेखक ठहरकर संवाद नहीं करना चाहते , वे उसके मसलों पर बहस करने की बजाय मनवाने पर ज़ोर ज़्यादा दे रहे हैं। यानी अस्मिता है और मानो। जो नहीं मानता उसको अछूतभाव से देखा जा रहा है। इसने अस्मिता की राजनीति का आतंक पैदा किया है । वस्तुगत तौर पर देखें तो अस्मिता की राजनीति का अस्मिता से ही पंगा है। अस्मिता की उपयोगिता के सवाल बड़े सवाल हो गए हैं ।
संवादहीन अस्मिता विमर्श वस्तुत:अस्मिता का रीतिवाद है। यह अस्मिता के प्रति आलोचनात्मक नज़रिए से वाद-विवाद-संवाद का निषेध करता है। इसकी अस्मिता के जड़ इतिहास में दिलचस्पी है । अस्मिता के गतिशील और रुपान्तरित पक्षों में कोई दिलचस्पी नहीं है। दलित और स्त्री आत्मकथाओं पर चल रही बहसों में हम इसे साफ़तौर पर देख सकते हैं।

साहित्य में सार्वभौम भाषा या साहित्यांदोलन की भाषा के प्रयोग की परंपरा रही है। लेकिन उत्तर आधुनिक लेखकों ने सार्वभौम भाषा का निषेध किया है । इसके विकल्प के तौर पर "निजी (प्राइवेट)भाषा", "निजी शैली" या "निजी मैनरिज्म" पर ज़ोर दिया । सामाजिक जीवन के चित्र सार्वभौम भाषा में पेश करने की बजाय निजी भाषा में पेश किए हैं। आज बड़े पैमाने पर दलित साहित्य या स्त्री साहित्य में जिस भाषा का प्रयोग हो रहा है वह "निजी भाषा" है। विलक्षण बात यह है कि पेशेवर लोगों में यह भाषा आ गयी है । आज लेखक इस तरह से लिख रहा है गोया वह किसी अन्य द्वीप का बाशिंदा हो। वह ऐसी भाषा बोल रहा है जो उसे सबसे भिन्न बनाती है। यह वह भाषा है जिसे विविधता के नाम पर पढ़ें और भूलें।
"निजी भाषा" का आर्थिक निजीकरण की प्रक्रिया से गहरा संबंध है । इसके अलावा "मृतभाषा" के जमकर प्रयोग हो रहे हैं। ख़ासकर नेताओं के भाषणों में यह भाषा ख़ूब इस्तेमाल की जा रही है।
"मृतभाषा" की शुरुआत आपातकाल के साथ होती है। सन् 1977 के बाद यह परवान चढ़ती है और राममंदिर आंदोलन, आरक्षण आंदोलन ,पृथकतावादी आंदोलन और आतंकी आंदोलन में यह मांसल बनती है और सोनिया,माया,मुलायम ,अन्ना हज़ारे आदि इसके नायक हैं। यह भाषणकला से बेहतरीन गद्यभाषा की विदाई की सूचना भी है।
उत्तर आधुनिक अवस्था के आने के साथ "व्यक्तिवाद" और "व्यक्ति" का एक विषय के रुप में साहित्य में अंत हो जाता है । ख़ासकर विगत 40 सालों में आई आत्मकथाओं में इसे आसानी से देखा जा सकता है। दलित और स्त्री की आत्मकथाओं में "व्यक्ति" के तौर पर कम और समूह या समुदाय के सदस्य के रुप पर ज़्यादा ज़ोर है।
आधुनिकता के दौर में व्यक्ति और व्यक्तिवाद एक महत्वपूर्ण फिनोमिना के तौर पर पैदा होता है वहीं पर " मैं" और "निजी अस्मिता" की अभिव्यक्ति पर भी ज़ोर था । उत्तर आधुनिकता के आते ही पुराने व्यक्तिवाद और व्यक्ति का अंत हो जाता है ।

भाषा में समय भी होता है। इसमें सामाजिक समय , मानवीय समय, अतीत ,भविष्य और स्मृति भी समाहित होती है। इसमें निजी अस्मिता भी होती है। ये सब समय के साथ बदलते रहते हैं। भाषा में समय की अनुभूतियाँ भी होती हैं । वाक्य स्थिर नहीं होते। वे "समय" के साथ
चलते हैं। इसलिए भाषा और समय को एक साथ रखकर देखना चाहिए ।
नई उत्तर आधुनिक भाषा में एक पहलू उन्मादी भाषिक अनुभव का भी है। यह ऐसी भाषा है जो लेखक के भौतिक आधार से पूरी तरह कटी है। निजी अस्मिता को नहीं जानती। "मैं" को नहीं जानती। वह लेखन को 'अन्य' के लेखन से जोड़कर नहीं देखती। उसके साथ अंतर्क्रिया नहीं करती। यह संवृत्ति दलित और स्त्री लेखन में है।
जबकि पुराने मध्यकालीन स्त्री और दलितलेखन में यह नहीं है। यह उत्तर आधुनिक लेखक समय पर सवारी करने की कोशिश में है जो कि असंभव कार्य है। वह ऐसे यथार्थ को रच रहा है जिसमें आनंद नहीं है। बल्कि आनंद का विलोम ज़्यादा व्यक्त हुआ है । 

अरविन्द केजरीवाल फिनोमिना

अरविन्द केजरीवाल फिनोमिना

25 April 2014 at 21:21
अरविंद केजरीवाल दिल्ली के मुख्यमंत्री बने फिर इस्तीफा दिया। फिलहाल वे बनारस से लोकसभा चुनाव लड़ रहे हैं। भारतीय राजनीति के संदर्भ में कई मायनों में यह विलक्षण फिनोमिना है । केजरीवाल ने लंबे समय से परंपरागत राजनीति से भिन्न सामाजिक सरोकारों की वैकल्पिक राजनीति की है। 'सूचना प्राप्ति अधिकार' से लेकर 'जन-लोकपाल बिल' तक विभिन्न मसलों पर आम जनता के विभिन्न तबकों में गंभीर राजनीतिक और वैचारिक प्रचार अभियान चलाया है। उन्होंने आम लोगों को जाग्रत ,संगठित और संघर्ष के लिए प्रेरित करने का काम निस्वार्थ भाव से किया है। यही काम उनकी राजनीतिक पूंजी भी है । 
    केजरीवाल फिनोमिना इसलिए महत्वपूर्ण है कि उसने स्वयंसेवी संगठनों की संसदीय राजनीति में भाग न लेने की प्रतिज्ञा को तोड़ा है। इस समय देश में तकरीबन 40हजार के करीब स्वयंसेवी सामाजिक संगठन हैं जो विभिन्न मसलों पर आम जनता में विभिन्न सामाजिक स्तरों पर काम कर रहे हैं। इन संगठनों की यह साझा राजनीतिक प्रतिबद्धता रही है कि संसदीय चुनावी राजनीति से दूर रहो, राजनीतिक दबाब समूह के रुप में काम करो और जनता को जाग्रत करो,शिक्षित करो और उसके बुनियादी मसलों पर संघर्ष करो । इन संगठनों की सांगठनिक क्षमता सीमित है,लेकिन संगठनों की संख्या असंख्य है और इनका राजनीतिक दबाब किसी भी बड़े राजनीतिक दल से ज्यादा रहा है ।
    केजरीवाल फिनोमिना को समझने के लिए एनजीओ राजनीति में विगत 25सालों में आए उभार और  विकास को जानना जरुरी है । केजरीवाल फिनोमिना के निर्माण में एनजीओ राजनीति की बहुत बड़ी भूमिका है। एनजीओ संगठनों की राजनीति मूलतःमानवाधिकारों की रक्षा और नागरिकसमाज के निर्माण की राजनीति है । मानवाधिकारों की चेतना के विकास और स्वीकृति दिलाने में एनजीओ संगठनों की केन्द्रीय भूमिका रही है ।
एनजीओ राजनीति का लक्ष्य संसद-विधानसभा या पंचायतें नहीं रही हैं । अधिकांश सक्रिय एनजीओ संगठनों की सामाजिक सक्रियता के प्रमुख विषय  हैं - आम लोगों की जिंदगी में विकास,नए आर्थिक विकास,खेती,बाँध,नहर,प्रकृति,साम्प्रदायिकता ,शिक्षा, साक्षरता,  सूचना प्राप्ति अधिकार,भ्रष्टाचार आदि मसलों की क्या भूमिका है और उनको क्या करना चाहिए । राजनीतिक दलों की कार्यप्रणाली से भिन्न ये संगठन कमोबेश जनता की शिरकत और उनके द्वारा ही फैसले लेने पर जोर देते रहे हैं ।इसने आम नागरिकों में दलीय राजनीतिक संगठनों से भिन्न किस्म का माहौल पैदा किया है ।
      केजरीवाल का राजनीति में आना या आम आदमी पार्टी का जन्म कोई आकस्मिक घटना नहीं है । यह चंद व्यक्तियों की राजनीतिक महत्वाकांक्षा की भी अभिव्यक्ति नहीं है। यह कारपोरेट षडयंत्र की दुरभिसंधि का परिणाम भी नहीं है।  आम आदमी पार्टी का उदय असल में स्वयंसेवी संगठनों की जनशिरकत की राजनीतिक प्रक्रिया का स्वाभाविक परिणाम है । जन-लोकपाल बिल का आंदोलन नहीं भी हुआ होता तो एकदिन इस प्रक्रिया के गर्भ से आम आदमी पार्टी जैसे किसी राजनीतिक दल का उदय होता । जन लोकपाल बिल के आंदोलन ने स्वयंसेवी संगठनों और जनशिरकत की राजनीतिक प्रक्रिया को सघन और तेज बनाया।
केजरीवाल फिनोमिना और आम आदमी पार्टी विचारधाराहीन नहीं है। यह फिनोमिना परंपरागत अर्थ में विचारधारा को नहीं मानता । यह समस्याकेन्द्रित मानवाधिकार परिप्रेक्ष्यों की अभिव्यक्ति है।  परंपरागत राजनीतिक दलों का आम जनता की समस्याओं के प्रति विचारधारा केन्द्रित नजरिया रहा है। मसलन् वे विचारधारा के आधार पर जनता को गोलबंद करते हैं और फिर उसे समस्या के साथ जोड़ने की कोशिश करते हैं। जमता उनके यहां दर्शकीय भूमिका अदा करती है। उनके यहां दर्शक और दाता का भाव है। जनता दर्शक है ,और राजनीतिकदल दाता हैं । जनता अनुयायी और वे नेता हैं।
    नेता जैसे बताए जनता वैसे करे। जनता की राय तब ही ली जाएगी जब नेता कहे या दल कहे। जनता की वही बात नेता या दल मानेगा जो अनुकूल हो । वे ही मसले उठाए जाएंगे जो दल या नेता बताए। उसी परिप्रेक्ष्य में लड़ाई लड़ी जाएगी जो दल या नेता ने तय कर दिया है। इसी फ्रेमवर्क में परंपरागत राजनीतिक दल निचले स्तर पर काम करते रहे हैं । इसके कारण जनता और दल या नेता के बीच में असमान संबंध बना है। इकतरफा कम्युनिकेशन हुआ है। बेमेल और स्वार्थी भ्रष्ट रिश्ता बना है। इस रिश्ते में ईमानदारी,जनशिरकत,मानवाधिकारों की चेतना,लोकतांत्रिक मानवीय व्यवहार और आचरण की कोई जगह नहीं रही। इस प्रक्रिया के कारण 20वीं सदी के उत्तरार्ध में निर्मित लोकतंत्र की सभी बुनियादें नष्ट हो गयीं। यह लोकतंत्र का सर्वसत्तावादी मार्ग है।
   लोकतंत्र के सर्वसत्तावादी मार्ग पर चलने के कारण हमारे संविधान में चित्रित सपने का अंत हो गया । संविधान,लोकतंत्र,धर्मनिरपेक्षता,समाजवाद मखौल,हास्य-व्यंग्य की विषयवस्तु में तब्दील हो गया । हमारे यहां  राजनीतिक सर्वसत्तावाद को धर्मनिरपेक्षता बनाम साम्प्रदायिकता, राष्ट्रीय एकता बनाम सामाजिक विभाजन, वामपंथी बनाम दक्षिणपंथी,प्रगतिशील बनाम प्रतिक्रियावादी ,धर्मनिरपेक्षता बनाम छद्म धर्म निरपेक्षता, एक परिवार का शासन बनाम कांग्रेसविरोध,संघ बनाम कांग्रेस,लोहिया बनाम नेहरु आदि विभिन्न केटटेगरी में वर्गीकृत किया और पैंसठ सालों से इन्हीं ध्रुवीकरणों में बाँधकर राजनीति का मूल्यांकन करते रहे । राजनीतिक सर्वसत्तावाद को हमने कभी निशाना नहीं बनाया। इस मामले में वामदलों से लेकर दक्षिणपंथी भाजपा तक सभी दल लोकतंत्र के नाम पर सर्वसत्तावाद का ही किसी न किसी रुप में अनुकरण करते रहे हैं ।
लोकतंत्र के आवरण में पल्लवित सर्वसत्तावाद ने लोकतंत्र की अपूरणीय क्षति की है। मसलन् कांग्रेस को यही सर्वसत्तावाद आपातकाल तक ले गया। भाजपा को2002 के गुजरात जनसंहार,अकालीदल को आतंकवाद-पृथकतावाद,शिवसेना को साम्प्रदायिकता,द्रमुकदलों को अंध क्षेत्रीयतावाद,वामदलों को निरुद्योगीकरण और पार्टीतंत्र की सत्ता-महत्ता तक ले गया । आमतौर पर लोकतंत्र पर बातें करते  समय हमने स्वतंत्र और स्वतःस्फूर्त जनशिरकत की सभी संभावनाओं को खत्म करके नियोजित लोकतंत्र में अपने राजनीतिक तंत्र का रुपान्तरण कर दिया । कमोबेश यह प्रक्रिया सभी दलों में घटित हुई ।
   केजरीवाल फिनोमिना राजनीतिक सर्वसत्तावाद को एकसिरे से खारिज करता है । जो लोग आम आदमी पार्टी को विचारधाराहीन होने का लेबिल लगा रहे हैं वे नहीं जानते कि राजनीति के जितने भी प्रचलित दलीय रुप हैं वे स्वयं में समस्याग्रस्त हैं। उनके पास अपनी सीमाओं से निकलने का कोई मार्ग नहीं है। मसलन्, भाजपा हो वामदल हों किसी के पास जनशिरकत को सुनिश्चित करने वाली न तो धारणा है और न सांगठनिक संरचनाएं ही है ।
   केजरीवाल फिनोमिना नियोजित जनता, पैसा देकर,दादागिरी या दबाब के जरिए जुटायी गयी जनता से भिन्न स्वतःस्फूर्त्त शिरकत करने वाली जनता की धारणाओं के आधार पर पैदा हुआ राजनीतिक फिनोमिना है । जिस गति से आम आदमी पार्टी से आमलोग सदस्यता ले रहे हैं वह अपने आप में विलक्षण  फिनोमिना है । किसी भी लोकतांत्रिक देश में किसी दल के साथ इतनी बड़ी तादाद में और इतने कम समय में आम लोगों ने दलीय मेम्बरशिप नहीं ली है । आम आदमी को जोड़ने की रणनीतियों को आम आदमी पार्टी सुगम और सर्वसुलह बनाया है । बिना किसी मध्यस्थ के आप सीधे सदस्यता ले सकते हैं ।अब दल है और जनता है। इन दोनों के बीच नेता नामक तत्व का लोप हो गया है । मसलन् आप फोन करें,एसएमएस करें.ऑनलाइन भरे और सदस्यता मिल जाएगी। सदस्यता लेने का यह तरीका प्रत्यक्षतः नेता की विदाई का आख्यान कह रहा है । पहले किसी भी दल का सदस्य होने के लिए नेता या कार्यकर्ता को पकड़ना पड़ता था और वही मेम्बरशिप दिलाता था लेकिन आम आदमी पार्टी ने इस समूचीप्रक्रिया को पारदर्शी और जनसुलभ बनाकर सर्वसत्तावादी राजनीति की बुनियाद में मट्ठा डाल दिया है ।
     सर्वसत्तावादी राजनीति की नींव सदस्य बनाने के नियम से बुनियादी तौर पर जुड़ी है । परंपरागत दलों में सदस्य बनने के लिए नेता या कार्यकर्ता से मिलना जरुरी था, यही नेता जनता और दल के बीच मध्यस्थ या सेतु होता है। यह राजनीति का सबसे भ्रष्ट तत्व है और यही सर्वसत्तावादी राजनीति की धुरी है । यहीं से दलाल पैदा हुआ है। कोई भी काम कराना हो तो इसी मीडिलमैन को पकड़ना होता है । मंत्री,सांसद,विधायक औदि तब कार्य करते हैं जब कोई मिडिलमैन आपके साथ हो। विगत 65 सालों में इसी मिडिलमैन ने विभिन्न स्तरों पर दलाल की भूमिका अदा की और आज यह हर दल में सबसे ज्यादा ताकतवर है। मसलन् सोनिया गांधी या नरेन्द्र मोदी से ज्यादा ताकतवर इनके मिडिलमैन हैं । आम आदमी पार्टी ने अपनी पार्टी सदस्यता को सरल-सुगम और सर्वसुलभ कराकर नेता की विदाई करके सदस्यता को जनशिरकत के पैराडाइम में ले जाकर खड़ा कर दिया है । यह सर्वसत्तावादी राजनीति के अंत की घोषणा भी है । 
   केजरीवाल फिनोमिना ने आम जनता की उम्मीदों को नए शिखर दिखाए हैं। आम आदमी बहुत उम्मीदें कर रहा है। उम्मीदें जगाना नई बातनहीं है, हर आंदोलन या नए राजनीतिक नारे के साथ जनता में उम्मीदें जगती रही हैं। लेकिन केजरीवाल से उम्मीदें अलग किस्म की आशाएं लेकर आई हैं और नए राजनीतिक संबंध को लेकर आई हैं । परंपरागत राजनीतिकदलों की जीत के साथ यह उम्मीद रहती थी  हमने वोट दे दिया अब तुम काम करो, हम पाच साल बाद देखेंगे। पांच साल बाद मूल्यांकन करेगे। मतदाता यह मानकर चलता है कि हमने वोट दिया और हमारा काम खत्म और अब नेता की जिम्मेदारी है वह अपना वायदा निभाए। इस इकतरफा संबंध को आम आदमी पार्टी ने उलट दिया है ।
    आम आदमी पार्टी बार-बार हर बड़े मसले पर जनता में जाने,जनता की राय लेने, सबकुछ जनता के बीच में साफगोई के साथ पेश करने पर जोर दे रही है । वे जो भी फैसला लेते हैं टीवी लाइव कवरेज के जरिए आम जनता में सीधे सम्प्रेषित करते हैं । इंटरनेट पर सभी फैसलों की जानकारी देते हैं । जनशिरकत को महत्व देते हुए सत्ता में जाने का फैसला दिल्ली के मुहल्लों में सभाएं करके किया। 
       विगत तीन दशकों में देश के विभिन्न हिस्सों में स्वयंसेवी संगठनों का जिस तरह नेटवर्क उभरकर सामने आया है और उसने मीडिया और समाज में विभिन्न समयों पर जो नए किस्म के लोकतांत्रिक राजनीतिकबोध और मानवाधिकारकेन्द्रित राजनीतिक प्रक्रिया को जन्म दिया है उससे स्थानीय स्तर पर मीडिया भी प्रभावित होता रहा है । उल्लेखनीय है कि मीडिया में स्थानीय स्तर पर स्वयंसेवी संगठनों के संघर्षों का कवरेज बराबर आता रहा है। यहां तक कि अनेकबार इस कवरेज ने राष्ट्रीय मीडिया में भी प्रमुखता के साथ स्थान बनाया है ।
      केजरीवाल फिनोमिना पर विचार करते समय हमें भारत के बदलते सार्वजनिक माहौल (पब्लिक स्फेयर) पर गंभीरता से विचार करना चाहिए । विगत30सालों में टेलीविजन और इंटरनेट ने आम आदमी के संपर्क,संबंध और संप्रेषण के तौर-तरीकों ने नए किस्म के जीवन संबंधों और जीवनशैली को जन्म दिया है । टेलीविजन और इंटरनेट जहां पर भी पहुँच रहे हैं वहां पर पुराने नजरिए में बदलाव आना शुरु हुआ है । दुनिया को देखने और समझने का संस्कार बदला है । इससे राजनीतिकदलों और जनता के संबंधों में बदलाव आया है। सार्वजनिक बहस के मुद्दे अब वे हैं जिनको मीडिया (टीवी-इंटरनेट) प्रमुखता से पेश करता है।
     प्रेसयुग से इलैक्ट्रोनिक युग में दाखिल होने के साथ भारत ने तेजी से साइबर युग में प्रवेश किया। टेलीविजन क्रांति के चंद वर्षों बाद ही कम्प्यूटर क्रांति और बाद में साइबरक्रांति में आम जनता दाखिल हो गयी । इसने परंपरागत राजनीति और उसके जनता से जुड़ने, संवाद करने और जनता को गोलबंद करने के पुराने तरीकों को एक ही झटके में बदल दिया ।राजनीति और सामाजिक सत्य के बीच में तनाव को सघन बना दिया ।
    टेलीविजन युग आने के पहले तक राजनीति और सामाजिक सत्य में परंपरागत अनुकरणवादी संबंध होता था ।यह संबंध स्वाभाविक राजनीतिक प्रक्रियाओं से निर्देशित होता था। लेकिन टेलीविजन आने के बाद से राजनीति और सामाजिक सत्य का संबंध गुणात्मक तौर पर बदल गया ।
     पहले राजनीतिक दल सामाजिक  सत्य को अनुभवों और अनुमानों के आधार पर पेश करते थे। टेलीविजन आने के राजनीतिविज्ञान के नियमों का प्रयोग बढ़ा। धीरे धीरे हम चुनावी भविष्यवाणियों के दौर में दाखिल होते हैं। जनमतसंग्रह के दौर में दाखिल होते हैं। चुनाव पूर्व जनमत सर्वेक्षण और चुनाव के बाद जनमत संग्रह की प्रक्रिया में दाखिल होते हैं । इसने राजनीति को अनुमानों से परे ले जाकर राजनीतिविज्ञान के ठोस चिंतन और नए किस्म के सोच-विचार के तंत्र के साथ जोड़ा। वहीं दूसरी ओर स्वयंसेवी संगठनों ने जमीनी स्तर पर तथ्यसंग्रह करके राय बनाने की पद्धति का ईमानदारी से पालन किया और उनको बेहतर सामाजिक-राजनीतिक परिणाम मिले । पहलीबार राजनीतिविज्ञान को लोकतंत्र की सेवा में लगाया गया। परंपरागत दलों ने राजनीति का इस्तेमाल किया है राजनीतितविज्ञान का नहीं । स्वयंसेवी संगठनों और जनमत सर्वेक्षण करने वालों ने राजनीतिविज्ञान और लोकतंत्र के बीच में नए रिश्ते का आरंभ किया। इससे लोकतंत्र और राजनीति दोनों को समझने में बहुत बड़ी मदद मिली है । राजनीति के सत्य को विज्ञान के जरिए जानना और फिर राजनीति में  परिवर्तन की ओर ध्यान गया ।
      परंपरागत तरीके से राजनीति करने वाले दलों का जनता के साथ अन्तर्विरोध बढ़ा। परंपरगत दल समझ ही नहीं पा रहे हैं कि जनता के सत्य को कैसे जानें और उसमें निहित समस्याओं के समाधान कैसे करें । इसका दुष्परिणाम यह निकला कि परंपरागत राजनीतिकदल लगातार अपनी साख खोते चले गए । वे राजनीति तो कर रहे थे लेकिन राजनीतिविज्ञान को जाने और माने बिना । राजनीतिकदल यदि राजनीतिविज्ञान की मदद से देश को समझने की कोशिश करते तो देश और दलों की प्रकृति ही कुछ और होती । मसलन् राजनीतिक दलों ने कभी भी किसी भी समस्या के वैज्ञानिक कारणों को जानने और उसके अनुसार समाधान खोजने का काम नहीं किया। बार-बार समस्या आने के बाद  तदर्थ समाधान खोजे गए और यह मान लिया गया कि अब समस्या को बेहतर ढ़ंग से हल कर लिया जाएगा। लेकिन समस्या इससे और जटिल बनी है। मसलन् बलात्कार के खिलाफ हुए निर्भयाकांड विरोधी आंदोलन को ही लें इस आंदोलन के दबाब में जो कानूनी बदलाव किए गए हैं वे समस्या की विकरालता और व्यापकता को बुनियादी तौर पर देख  ही नहीं पाते। बलात्कार की घटना को रोकने के लिए कानूनी बदलाव एक सीमित कदम है असल में हमें बलात्कार की जडों को नष्ट करने  बारे में सोचने की जरुरत है । बलात्कार की जड़ों को राजनीतिविज्ञान की मदद के बिना समझना मुश्किल है।
      हमारी अब तक की राजनीतिक प्रक्रिया और दलीय राजनीति आम जनता को लोकतंत्र और लोकतांत्रिक मूल्यों की सत्ता-महत्ता का बोध पैदा कराने में असफल रही है।राजनीतिकदल आम जीवन का लोकतांत्रिकीकरण करने में असफल रहे हैं । आम जीवन के लोकतांत्रिकीकरण के अभाव के कारण ही हमें तमाम सामाजिक-राजनीतिक समस्याओं से आज मुठभेड़ करनी पड़ रही है । हमारे देश में लोकतंत्र को आए 65साल हो गए लेकिन आज भी हम आम नागरिक को लोकतांत्रिक अधिकार क्या होते हैं ? वे क्यों जरुरी हैं ?लोकतांत्रिक मूल्य क्या हैं और उनको समृद्ध करना क्यों जरुरी है ,यह समझा नहीं पाए हैं ।
    हमारे देश में लोकतंत्र है लेकिन जनता में लोकतांत्रिकबोध,लोकतांत्रिक मूल्य और लोकतांत्रिक व्यवहार एकसिरे से गायब है । यह अजीब आयरनी है कि देश को बचाने के काम को लोकतंत्र बचाने के लक्ष्य से पृथक करके देखने वालों की संख्या बहुत है । देश की एकता और अखंड़ता किसी मनोभाव विशेष या देशज उन्माद पर निर्भर नहीं करती । हमने देश और लोकतंत्र की अन्तर्ग्रथित समझ का कभी प्रचार प्रसार ही नहीं किया । हमेशा यही संदेश दिया है कि देश का मतलब दल विशेष या परिवार विशेष या नेताविशेष या धर्म विशेष का शासन है । भारत का मतलब न तो कांग्रेस है,नहीं हिन्दुओं का देश है और नहीं राजनीतिक दल विशेष का देश है ।
     लोकतंत्र में नागरिक महत्वपूर्ण होता है। नागरिक अधिकार महत्वपूर्ण होते हैं।नागरिक अधिकारों का संरक्षण और पल्लवन करने वाली संस्थाएं महत्वपूर्ण होती हैं । नागरिक मान-मर्यादाएं और नागरिक संस्कार महत्वपूर्ण होते हैं। हमारा समूचा समाज अभी तक जातिगत और धार्मिक संस्कारों के दायरों में बंद है,हमने आम आदमी को कभी इन बंद दरवाजों की कैद से बाहर निकालकर जानने –समझने की कोशिश नहीं की । हमने उसमें कभी नागरिकबोध पैदा नहीं किया। केजरीवाल फिनोमिना का महत्वपूर्ण प्रस्थान बिंदु यही है। वह व्यक्ति को जाति और धर्म की पहचान की कैद से एक ही झटके में मुक्त करके नए पैराडाइम में ले जाने में सफल हुआ है ।
    केजरीवाल फिनोमिना  ने राजनीतिकदलों की अनुमान पर आधारित राजनीति और विभिन्न समस्याओं पर अनुमान आधारित बयानबाजी से आगे निकलकर तथ्यपूर्ण बयानबाजी और शोधपरक बयानबाजी को महत्ता दी, राजनीतिक दलों को राजनीतिविज्ञान के अनुसार प्रत्येक विषय पर अनुसंधान करने,किसी भी समस्या को उठाने के पहले  उस पर रिसर्च करने का तरीका पेश करके राजनीति के व्यवहार को राजनीति के विज्ञान से जोड़ा है । मसलन्, जनता की समस्या विशेष को उठाने के पहले उसकी जड़ों तक तहकीकात करना और उस समस्या पर उठाए गए सभी कदमों को विभिन्न पहलुओं से समझने का काम किया है। यह पद्धति जनलोकपाल बिल पर बहस के दौरान बहुत ही सटीक ढ़ंग से सामने आई है।
      केजरीवाल फिनोमिना ने उन तमाम स्वयंसेवी संगठनों को संसदीय जनतंत्र में शिरकत करने और संसदीय मंचों पर अपनी जगह बनाने की संभावनाओं को खोला है। आज विभिन्न स्वयंसेवी संगठनों के कार्यकर्त्ता आम आदमी पार्टी में बड़ी संख्या में शामिल हो रहे हैं और वे लोग भी शामिल हो रहे हैं जो पहले किसी न किसी राजनीतिक दल में थे लेकिन अपने को कुंठित और निराश महसूस कर रहे थे और सामाजिक हस्तक्षेप के लिए छटपटा रहे थे । इससे सामाजिक तौर पर राजनीति को लेकर निराशा का वातावरण टूटा है । राजनीति में शिरकत बढ़ी है। वे तमाम ईमानदार लोग जो एक समय राजनीति को लेकर निराश थे,अपने को हस्तक्षेप करने में असमर्थ महसूस कर रहे थे वे तेजी से आम आदमी पार्टी में शामिल हो रहे हैं और यही वे लोग भी हैं जो आम आदमी पार्टी के गठन के पहले जनलोकपाल बिल पर चल रहे अन्ना आंदोलन में शिरकत कर रहे थे ।
   केजरीवाल फिनोमिना इसलिए महत्वपूर्ण है कि उसने 'अ-राजनीति¬' की राजनीति के बहाने उन तमाम लाखों-करोड़ों लोगों को अपनी ओर आकर्षित किया जो राजनीति को बुरा समझते थे । इसके साथ पापुलिज्म के सभी रुपों और पापुलिज्म के खेल में शामिल सभी रंगत के लोगों के साथ अपने संपर्क-संबंधों को खुला भी रखा । मसलन् , कश्मीर के सवाल पर जनमत संग्रह की मांग करना भी सही है और राष्ट्रीय एकता की बात कहना भी सही है । यह मिला-जुला नजरिया आम आदमी पार्टी के एक वरिष्ठ सहयोगी का है । वे नागरिक अधिकारों की रक्षा के तहत इस नजरिए का प्रचार करते रहे हैं । राष्ट्रीय एकता के नाम पर वे देश के देशभक्तों को भी सम्बोधित कर रहे हैं और जनमत संग्रह के नाम पर कश्मीरी पृथकतावादियो को भी सम्बोधित कर रहे हैं । उसी तरह आम आदमी पार्टी के समर्थक अनेक नेता हैं जो सिंगूर-नंदीग्राम के सवाल पर वामदलों का विरोध करते रहे हैं जिससे वे पश्चिम बंगाल में चल रहे पापुलिज्म को भी भुना रहे हैं  और पश्चिम बंगाल के बाहर धर्मनिरपेक्षता के नाम पर वामदलों के साथ भी संगति बनाए रखते हैं । यही हाल माओवादी संगठनों को लेकर है। मूल बात यह है कि आम आदमी पार्टी में शामिल नेतागण पापुलिज्म को किसी भी कीमत पर छोड़ने को तैयार नहीं हैं। पापुलिज्म के साथ जुड़े रहने का एक नमूना निर्भयाकांड पर दिल्ली में चला बलात्कार विरोधी जनादोलन है। इस आंदोलन को राजनीतिक तौर पर आम आदमी पार्टी के नेताओं ने पूरी तरह भुनाया ।
      दिलचस्प बात यह है कि निर्भयाकांड आंदोलन जब चल रहा था तो उनसे जुड़े लोग लोग जो इंडिया अगेंस्ट करप्शन,जन लोकपाल बिल आंदोलन आदि नामों से विभिन्न संगठनों में काम कर रहे थे। उन लोगों ने निर्भयाकांड के बाद जब आम आदमी पार्टी बनायी तो उसके बाद दिल्ली में विगत सवा साल में बलात्कार की घटनाओं में बेशुमार वृद्धि हुई है लेकिन उन्होंने कोई जुलूस तक नहीं निकाला,कोई आंदोलन नहीं किया,यहां तक कि किसी बलात्कार पीड़ित महिला को जाकर सांत्वना देने या उसके संबंध में बयान तक जारी नहीं किया। दिल्ली और उसके बाहर सभी किस्म के आंदोलनों से जुड़ना और पापुलिज्म की पिच को बनाए रखना यही उनका लक्ष्य रहा है । अफजल गुरु को फांसी दिए जाने के सवाल पर उन तमाम लोगों ने आपत्ति की थी जो इन दिनों आम आदमी पार्टी में जाने का प्रयास कर रहे हैं । यही हाल हरियाणा की बदनाम खाप पंचायत को लेकर है । 
     समस्या यह है कि आम आदमी पार्टी में ऐसे लोग आ रहे हैं जिनके विभिन्न राष्ट्रीय या क्षेत्रीय सवालों पर अलग-अलग नजरिए रहे हैं और वे तेजी से आम आदमी पार्टी में शामिल हो रहे हैं। ऐसे लोगों के आम आदमी पार्टी में शामिल होने के पहले के नजरिए और शामिल होने के बाद के नजरिए में अंतर करना होगा ,समस्या यह है कि विभिन्न मसलों पर आम आदमी पार्टी का नीतिगत रुख अभी साफ होना बाकी है। होसकता है आम आदमी पार्टी के सुसंगत नजरिए के आने के बाद विभिन्न मतावलम्बी लोग अपने को आम आदमी पार्टी के नजरिए में बांध लें,यदि वे अपने स्वतंत्र दृष्टिकोण पर कायम रहते हैं तो आम आदमी पार्टी को भविश्य में बिखरने से कोई नहीं बचा सकता । आम आदमी पार्टी को समझना होगा कि स्वयंसेवी संगठन और राजनीतिक दल की कार्यप्रणाली और राजनीतिक जिम्मेदारी में अंतर है।
स्वयंसेवी संगठनों में एक बड़ा हिस्सा है जिसकी भारत के संविधान और संसद में कोई आस्था नहीं है। वे संविधान को नहीं मानते । फलतः वे दलीय राजनीति का विरोध करते हैं । स्वयंसेवी संगठन होने के नाते वे लोकतांत्रिक संरचनाओं में जबावदेही से मुक्त हैं । वे देश की नीतियों के बंधनों से मुक्त हैं,वे प्रशासनिक आदेशों से बंधे नहीं हैं ।
      आम आदमी पार्टी बन जाने के बाद केजरीवाल राजनीतिकदल की भूमिका से बंधने के लिए बाध्य हैं। वे उन नीतियों को मानने को बाध्य हैं जो संसद द्वारा स्वीकृत हैं। वे उन कन्वेंशनों और परंपराओं को मानने को बाध्य हैं जो एक राजनीतिकदल पर लागू होती हैं,वे उन नियमों को मानने को मजबूर हैं जो मुख्यमंत्री पर लागू होते हैं ।
    एनजीओ  स्वयंसेवक के पास अनंत स्वतंत्रता होती है,लोकतांत्रिक संस्थानों के प्रति उसकी कोई जिम्मेदारी नहीं होती,वे अपने संगठन और अपने विचार के सर्वतंत्र स्वतंत्र नेता होते हैं। लेकिन मुख्यमंत्री और राजनीतिक दलों के लिए स्वतंत्रता की लक्ष्मण रेखा खिंची हुई है और केजरीवाल को उसी लक्ष्मणरेखा में रहकर काम करना होगा ।
    समग्रता में देखें तो हर हालत में पापुलिज्म के साथ जुड़ना और अपने जनाधार का विस्तार करना यही आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ताओं की आम आदमी पार्टी के गठन के पहले रणनीति रही है और यह रणनीति आज उनको मदद कर रही है विभिन्न रंगत के लोग तेजी से आम आदमी पार्टी की सदस्यता ले रहे हैं ।अनेक लोग ऐसे भी हैं जो बिना जाने-बिना सोचे भी सदस्यता ले रहे हैं ।
   केजरीवाल फिनोमिना की सबसे बड़ी खूबी है कि उसने जनता के प्रासंगिक सवालों को केन्द्र में रखा है और एकाग्रभाव से उसको बार-बार मीडिया और इंटरनेट के जरिए प्रचारित किया है । इसके कारण उनके बारे में यह राय भी बनी है कि 'बात तो ठीक कह रहा है केजरीवाल'। 
'बात तो ठीक कह रहा है केजरीवाल' मुहावरा आमलोगों में चल निकला है। कस्बों और देहात में आमलोग कुछ इसी तरह मुहावरे में केजरीवाल फिनोमिना पर चुटकियां लेते नजर आ रहे हैं । केजरीवाल फिनोमिना का आम जनता का मुहावरा बन जाना और 'आम आदमी' नाम पर विगत कई सालों में कांग्रेस के प्रचार अभियान को अपनी प्रचारकला में शामिल करके इस्तेमाल कर लेना,एकदम विरल घटना है। 'आम आदमी का हाथ ,कांग्रेस के साथ' का नारा कांग्रेस की सबसे ताकतवर कैम्पेन का हिस्सा रहा है सन् 2009 के चुनाव के समय और धीरे धीरे कांग्रेस इस नारे को भूल गयी और आम आदमी पार्टी ने इस कैम्पेन पर अप्रत्यक्षतौर पर वैचारिक हमला करके इस नाम (आम आदमी) के साथ जुड़ी जनप्रियता को सीधे अपने पक्ष में करलिया । मीडिया और आम जनता में प्रचार में यदि उन पदबंधों का इस्तेमाल किया जाए जिन पर विज्ञापनबाजी हो चुकी है और मीडिया का पर्याप्त कवरेज आता रहा है तो पदबंध की जनप्रियता का बहुत जल्द लाभ उठाया जा सकता है । केजरीवाल एंड कंपनी ने यही किया है। उन्होंने 'आम आदमी ' की जनप्रियता को देखकर ही अपने दल का नाम आम आदमी पार्टी रखा। 

सन् 2014 के लोकसभा चुनाव के बारे में मीडिया कवरेज के चरित्र की उपेक्षा करके कोई बात नहीं हो सकती। न्यूज टेलीविजन चैनलों ने विगत 5 सालों में खबरें कम राष्ट्रीय उन्माद ज्यादा पैदा किया है । मेनीपुलेशन को महामीडियम और संप्रेषक बनाया है। अब हम देखते हैं और दौडते हैं , सोचते नहीं हैं । टीवी का महा मंत्र है मध्यवर्ग को हाँको। अविवेक को महिमामंडित करो। शार्टकट को मूल्यवान बनाओ। ये सभी डिजिटल स्क्रीन मेनीपुलेशन के आधारसूत्र हैं । इनको हम टीवी और इंटरनेट कवरेज के रुपों जैसे अन्ना का हठ,बाबा रामदेव का योग,मोदी का महामोह और अब आप पार्टी  के ' लोकतंत्र मुक्तियज्ञ' में देख सकते हैं । हाँको का अहर्निश पुरश्चरण और इन सबके पीछे मध्यवर्ग को हाँककर ले जाने की परिणतियों पर गंभीरता सोचने की जरुरत है।
     भारत का लोकतंत्र, मध्यवर्गीय शार्टकट और नीतिहीनता की देन नहीं है। यह लंबे संघर्ष और गंभीर नीति विमर्शों के गर्भ से पैदा हुआ है। जो लोग शार्टकट में समाधान तलाश रहे हैं वे जान लें शार्टकट  में किसी समस्या का समाधान संभव नहीं है। जो कहता है कि मैं एक्शन करुँगा मुझे सत्ता दो,उससे ठहरकर बातें करो, नीतियों के बारे में पूछो और तसल्ली से सोचो फिर राय बनाओ। तसल्ली के साथ सोचे बिना लोकतंत्र समृद्ध नहीं होता । शार्टकट मध्यवर्गीय रुमानी राजनीतिक रास्ता हमेशा सामाजिक-राजनीतिक विभाजन और हिंसा की ओर ले जाता है । इसके अनेक उदाहरण विगत 65 सालों में देखे गए हैं।  
     मध्यवर्ग की अनालोचनात्मक और शार्टकट में सबकुछ पाने की मनोदशा का टीवी चैनलों ने बड़ी बारीकी से दोहन किया है । अन्ना के पीछे मध्यवर्ग क्यों था ? क्योंकि वह शार्टकट में परिणाम चाहता था।मोदी पर बलिहारी क्यों है ?क्योंकि शार्टकट में बिना सोचे समझे एक्शन का नायक लग रहा है। "आप " पार्टी या केजरीवाल क्यों मुग्ध कर रहा है ?क्योंकि जल्दी से भ्रष्टाचार खत्म कर देनेवाली जादुई झाडू उसके पास है !
     टीवी एंकरों से लेकर समाचार संपादकों तक यह विभ्रम फैला हुआ है कि जल्दी-जल्दी सामाजिक परिवर्तन कर रहे हैं । दो मिनट में 100 या 50 या 25 खबरें देने वाले समाचार मूल्य निर्माता कैसे हो सकते हैं ? जिनके पास समाचार के लिए स्पेस नहीं है वे हमें सिखा रहे हैं कि जीवन के हल स्पीड न्यूज की तरह खोजो , नेता की हेडलाइन देखो और उसके पीछे चलो!
      टेलीविजन ने नीतिविहीन शब्दवीर नेताओं को महिमामंडित किया है और यह बेहद खतरनाक पक्ष है। अन्ना,मोदी,बाबा रामदेव,केजरीवाल सबकीशब्दवीरता के नए नए बाइटस दिखाकर मध्यवर्ग की विवेकहीन मनोदशा का जमकर दोहन किया जा रहा है । जो लोग यह मानते हैं कि मध्यवर्ग के अधिकांश लोग पढे-लिखे होते हैं ,अक्लमंद होते हैं। उनसे मैं असहमत हूँ।
     मध्यवर्ग कितना अक्लमंद है यह देखना हो तो इसवर्ग की बिना सोचे-समझे विकास कर रही समूची युवापीढ़ी को देखो,यह देखने के लिए कहीं दूर जाने की जरुरत नहीं है अपने आसपास के किसी भी कॉलेज-विश्वविद्यालय में जाकर देखो कि हमारा युवा किस रुप में निर्मित हो रहा है ।
    युवाओं और मध्यवर्ग के प्रति  रोमैंटिक और अनालोचनात्मक भावबोध छोड़कर हमें गंभीरता से इस मसले पर हस्तक्षेप करने की जरुरत है ।शार्टकट मानसिकता और टेलीविजन उन्माद के बीच बन रहे मध्यवर्गीय सोच के तानेबाने को छिन्न-भिन्न करने की जरुरत है । मध्यवर्ग या टेलीविजन जो कह रहा है उसकी अंतर्वस्तु की गंभीरता के साथ समीक्षा करने की जरुरत है।
   टीवी चैनलों ने नीतिविहीनता को महान बनाया है। शोर या टीवी हंगामे को लोकतांत्रिक राजनीति का नाम दिया है । टीवी के टॉक शो या नेता की आमसभा -प्रेस कॉफ्रेस के   लाइव कवरेज से राजनीतिक दलों या नेताओं की प्रासंगिकता तय होने लगेगी तो हम बहुत गंभीर संकट में फंसने जा रहे हैं । अन्ना,मोदी और अब केजरीवाल के बारे में नीतिविहीन ढ़ंग से जिस तरह महिमामंडन चल रहा है वह लोकतंत्र के लिए शुभलक्षण नहीं है।
        नव्य आर्थिक उदारवाद ने ऐसा मध्यवर्ग निर्मित किया है जो किसी गंभीर आलोचनात्मक नीतिगत मंथन में शामिल नहीं होना चाहता वह तो बस चटपट एक्शन चाहता है । जो एक्शन करे ,वह महान है । लोकतंत्र का नायक बनने लायक है। यह मनोदशा लोकतंत्र का नहीं अविवेक और सर्वसत्तावाद का आधार तैयार कर रही है।
     सर्वसत्तावाद की नई रणनीति है विवेक से दूर रहो, नीतियों पर बहस मत करो।वोट दो,एक्शन देखो। क्या कहा जा रहा है ,उस पर सोचो मत। विश्वास करो।जो डिजिटल स्क्रीन पर दिखे वही सत्य है। जो डिजिटल स्क्रीन पर न दिखे ,वह असत्य है।   यानी अब विवेक ,नीति,कुर्बानी,भाईचारा आदि महत्वपूर्ण नहीं हैं डिजिटल स्क्रीन महत्वपूर्ण है ,इसलिए डिजिटल स्क्रीन पर ज्यादा से ज्यादा दिखने की भेड़चाल आरंभ हो गयी है। जिसनेता को जितना ज्यादा दिखाया जा रहा है ,समझो वही नेता महान है ,वही काम का है, वही लोकतंत्र का नायक है। यानी मध्यवर्ग के विवेक को टीवी या इंटरनेट स्क्रीन ने अपहृत कर लिया है और यही वह बिंदु है जहां पर सतर्क नीतिगत वाद-विवाद-संवाद को लोकतंत्र की विभिन्न दृष्टियों की कसौटी पर परखा जाना चाहिए।

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