शनिवार, 17 मई 2014

कांग्रेस की पराजय के प्रमुख कारण

इस बार के लोकसभा चुनाव में विकास के मुद्दे ने सभी मुद्दे अपहृत कर लिए इन अपहृत मुद्दों में बड़ा मुद्दा स्त्री के अधिकारों और सुरक्षा संबंधी मसलों से जुड़ा था। यह दुर्भाग्यजनक है कि स्त्री के सवाल जो विगत दो साल से मीडिया में सबसे ज्यादा स्थान घेरे रहे वे सवाल मीडिया में से ठेलकर बाहर कर दिए गए। यह प्रक्रिया क्यों और कैसे संपन्न हुई यह विचारणीय समस्या है। दूसरी बड़ी समस्या यह है कि नव्य उदार आर्थिक नीतियों के जनविरोधी पहलू की तो चर्चा हुई लेकिन विकल्प की नीतियों पर कोई बात नहीं हुई।

कांग्रेस के केन्द्रीय नेतृत्व ने इसबार के लोकसभा चुनाव में सबसे बड़ी चूक यह की कि उसने मनमोहन सिंह को सामने रखकर चुनाव नहीं लड़ा। भारतीय समाज में बूढ़ा नेता साखदार होता है। मनमोहन सिंह को सामने रखकर चुनाव लड़ा जाता तो परिणाम भिन्न होते और राजनीतिक जबावदेही के नाते उन्हें जनता में भेजना चाहिए था लेकिन अफसोस यह कि जनता में मनमोहन कम से कम गए। मनमोहन सिंह देश की नीतियों के प्रतीक हैं वे चुनाव के समय चुप रहेंगे तो यह बात देश की जनता हजम नहीं कर सकती।

कांग्रेस के दोनों नेताओं सोनिया गांधी और राहुल गांधी ने  कांग्रेस की पराजय तो मानी  लेकिन इस पराजय में कांग्रेस की जनविरोधी नीतियों और कांग्रेसी नेता और जनता के बीच में पैदा हुए अलगाव को नहीं देखा।
   कांग्रेस को रेखांकित करना चाहिए कि वे कौन सी नीतियां है जिनके कारण जनता से कांग्रेस का अलगाव बढ़ा। कांग्रेस यदि अपनी नीतियों के जनविरोधी चरित्र को नहीं देखेगी तो वह पराजय के सही कारणों को नहीं खोज पाएगी। वह यह भी नहीं देख पाएगी कि कांग्रेस का क्षय क्यों हो रहा है।
कांग्रेस को बताना होगा कि उसकी नीतियों के गर्भ से भाजपा जैसा अनुदार दल शक्तिशाली कैसे बना। भाजपा की शक्ति में इजाफा मनमोहन युग में हुआ है। कांग्रेस ने जिस ग़रीब विरोधी एजेण्डे को राजनीतिक बुलंदियाँ पर पहुँचाया है उसे चुनौती देना फ़िलहाल किसी भी दल का लक्ष्य नहीं है फलत:विकल्पहीनता पैदा हुई है और इस विकल्पहीनता को मोदी ने आक्रामक नव्य उदार एजेण्डे से भरा है और इस काम में जनता ने मोदी के हाथों सत्ता सौंपकर अपने लोकतांत्रिक दायित्व का पालन किया है।
अब देखना है कि मोदी अपने कार्यकाल में कांग्रेस की जनविरोधी नीतियों को ख़त्म करते हैं या उन पर ही चलते हैं ? यहाँ नेता बदला है, दल बदला है। नव्य उदार आर्थिक नीतियाँ नहीं बदली हैं। देखना होगा मोदी नव्य उदार नीतियों के प्रति संघ के स्वदेशी एजेण्डे के साथ आते हैं या मनमोहन नीतियों को जारी रखते हैं।






मोदी की जीत से निकलती संभावनाएं


अन्ना आंदोलन के आने के साथ अस्मिता की राजनीति की विदाई का सिलसिला शुरु हुआ तो मोदी की जीत के साथ अस्मिता की राजनीति के समापन का मध्याह्न है। मोदी की जीत के साथ नए किस्म की चुनौती सामने आई है।मोदी स्वयं अस्मिता की पैदाइश थे और अंत में स्वयं अस्मिता के खिलाफ खड़े हुए। कहने का अर्थ है अस्मिता हमेशा अस्मिता को ही खाती है। मोदी ने हिन्दुत्व की अस्मिता का अंत करके संघ के बड़े प्रकल्प का समापन किया है।

लोकसभा चुनाव परिणाम बता रहे हैं कि अस्मिता की राजनीति जा रही है और आक्रामक नव्य उदारीकरण की राजनीति आने वाली है। यह राजनीति से वकील,दलील और प्रतिवाद के अंत की शुरुआत है।

मायावती का जाना, लालू-नीतीश का पराभव ,मोदी का विकास को प्रमुख और हिंदुत्व को प्रच्छन्न बनाना नए किस्म के नजरिए और लामबंदी की मांग करता है।उल्लेखनीय है राममंदिर आंदोलन से अस्मिता की राजनीति परवान चढ़ी थी और संघ के मोदी प्रकल्प ने ही अस्मिता की राजनीति का अंत कर दिया है।

मोदी की जीत का सकारात्मक पक्ष है ज्योतिषी झूठे साबित हुए ,नामांकन के दिन को दोष था उसका भी कोई मोदी पर असर नहीं हुआ। कुल मिलाकर ज्योतिषी और ज्योतिष असत्य साबित हुई।लोकसभा चुनावों को 18देशों के 43प्रतिनिधियोंने देखा।

इसबार के लोकसभा चुनाव में जनता ने कांग्रेस को हराया है साथ ही उनकी बनायी जनविरोधी नीतियों को भी ख़ारिज किया है। सवाल यह है मोदी क्या मनमोहन सिंह की जनविरोधी नीतियों का विकल्प पेश करेंगे ? यदि वे नई नीति पेश नहीं करते तो इसका यही अर्थ होगा कि उनके पास देश के विकास का मनमोहन मार्ग छोड़कर और कोई मार्ग नहीं है। क़ायदे से मोदी नई नीतियाँ लेकर आएँ । भाजपा की जीत में मोदी की निश्चित रुप से महत्वपूर्ण भूमिका है। लेकिन यह जीत मूलतःवैचारिक जीत है।यह व्यक्तिविशेष की जीत नहीं है। यह नव्य उदार नीतियों की अब तक की सबसे बड़ी जीत है।लंबे समय के बाद पहलीबार किसी दल को पूर्ण बहुमत मिला है। मोदी की जीत इस अर्थ में महत्वपूर्ण है क्योंकि मोदी को इन नीतियों को लागू करने के लिए पूर्ण बहुमत मिला है।

जनता महान है, जनता कभी गलत नहीं करती, इस पूजाभाव से जनता को न देखें। लोकतंत्र में वोट का महत्व है। लेकिन जरुरी नहीं है कि जनता का फैसला सही ही हो। इसका अर्थ यह होगा कि आम जनता ने मनमोहन सिंह या कांग्रेस को 2बार चुनकर नव्य आर्थिक उदारीकरण के कार्यक्रम को स्वीकार कर लिया था। जबकि सच्चाई यह नहीं है।

मोदी के नेतृत्व में एनडीए की जीत वस्तुतः नव्य आर्थिक उदारीकरण की जीत है ।वे ताकतें हारी हैं जो विकल्प खोज रही थीं । मोदी को मिला बहुमत निश्चित रुप से उदारीकरण की मुहिम को तेज करेगा,इससे उदारीकरण के अधूरे कामों को पूरा करने का अवसर मिलेगा। संसद चलेगी,सरकार दौडेगी,पूंजीपति चैन की नींद सोएंगे। युवा सपने देखेंगे।

लोकसभा परिणामों में पुंसवाद महान होकर आया है औरतों का प्रतिनिधित्व देखें जरा।औरतें हाशिए पर चली गयी हैं,अल्पसंख्यक संसद में कम हो गए हैं। गोवा से 2 में से कोई सांसद महिला नहीं। झारखंड में 14 में से कोई महिला सांसद नहीं। कर्नाटक में 28 में सिर्फ 1 महिला सांसद है।  इसबार संसद में 61 महिला सांसद चुनी गयी हैं। यह आंकड़ा हमारे लोकतंत्र के स्त्री विरोधी चरित्र को सामने लाता है और हम गर्व करते हैं कि माँ का सम्मान करते हैं,बहन को प्यार करते हैं। अरे भाई जरा लोकतंत्र में औरत की जगह तो तय करके दे दो ।जिस लोकतंत्र में औरत हाशिए के बाहर हो वह लोकतंत्र पुंसवाद की उर्वर भूमि है।यह गर्व की नहीं शर्म की बात है।छत्तीसगढ़ से 11 सांसदों में मात्र 1 महिला सांसद चुनी गयी है। यह कैसा विकास है जो महिलाओं को घर में ठेल देता है।हिमाचल से कोई नहीं,अंडमान -निकोबार से कोई नहीं,आंध्र से 1 महिला संसद पहुँची है।म.प्र. से 4महिलाएं चुनी गयीं,राजस्थान से1 महिला , हरियाणा से कोई महिला नहीं,बिहार से 2,गुजरात से 1 महिला चुनी गयी है लोकसभा के लिए।लोकसभा के लिए केरल से कोई महिला नहीं चुनी गयी, बेहतर शिक्षा का नतीजा है या कुछ और कारण हैं।

यूपी,बिहार-म.प्र.,राजस्थान में लोकतंत्र में बहुसंख्यकवाद का नया प्रयोग हुआ है । यह लोकतंत्र के लिए अशुभ संकेत है।मुस्लिम प्रतिनिधित्व ग़ायब है।

मोदी की जीत मुग्धभाव से देखने की बजाय आँखें खोलकर देखें। यूपी में जो मोदी हवा चली है उसमें विकास के साथ साथ अन्य वैचारिक मान्यताएं प्रच्छन्न रुप में काम करती रही हैं।
यह कैसे हो सकता है कि यूपी से कोई मुसलमान न जीते। यह प्रच्छन्न तरीकों से चलाए गए बहुसंख्यकवाद के नए किस्म के ध्रुवीकरण की अभिव्यक्ति है। इसे विकास और जनता की आकांक्षा की आड़ में छिपाने की कोशिश की जा रही है। पहलीबार ऐसा हुआ है कि जो ऐसा दल केन्द्र में सत्ता में बहुमत लेकर आया है उसके सांसदों में अल्पसंख्यक हाशिए के बाहर हैं। यह फिनोमिना चिंता की चीज है।

एक अन्य चीज मैं अभी तक समझ नहीं पाया हूँ कि अदानी के बारे में सबसे पहले अरविंद केजरीवाल के बोलने के बाद ही चुनाव में उसकी ओर ध्यान गया। सवाल यह है कि विगत दस साल में किसी भी वामनेता ने अदानी के मसले को देश के सामने क्यों नहीं रखा। कभी देश की प्रतिष्ठित पत्रिकाओं ने उसके बारे में केजरीवाल के बोलनेके पहले जनता को क्यों नहीं बताया ?

लोकसभा चुनाव में कितनी जनता किसके कार्यक्रम के साथ है यदि इसे देखा जाए तो 125करोड़ की आबादी में भाजपा की बहुत सुखद स्थिति नहीं है।भाजपा को मात्र 17 करोड़ वोट मिले हैं,यानी 31.3फीसदी वोट मिले हैं। इसके अलावा बाकी जनता भाजपा के कार्यक्रम के साथ नहीं है। यह स्थिति तब है जबकि भाजपा ने बेशुमार पैसा प्रचार और अन्य मेनीपुलेशन के साधनों पर खर्चकिया। यह आंकड़ा चुनाव कमीशन का है। इसलिए हमें कम से कम समझ साफ रखनी चाहिए कि बहुसंख्यक जनता अभी भी भाजपा के साथ नहीं है। इसके बावजूद यह सच है कि भाजपा जीत गयी है,सरकार बनाएगी।हमें इंतजार करना होगा कि वे क्या करते हैं और किनके हित में काम करते हैं।





















रविवार, 11 मई 2014

मोदी के गुडियाघर की गुडियाएं


मोदी पर मुग्ध औरतें फेसबुक में कम हैं लेकिन मतदाताओं में ज्यादा हैं। सवाल यह है कि भाजपा को औरतों के वोट क्यों मिलते हैं,जबकि यह खुला सच है  औरतों के बारे में मोदी के आधुनिक विचार नहीं हैं। फेसबुकपर सक्रिय मोदीभक्त औरतें वैज्ञानिक विवेचना की अपेक्षा आसपास के लोगों की बातों से ज्यादा प्रभावित हैं।
   मोदीभक्त औरतों में बड़ा अंश उन औरतों का है जो अपने लिए रक्षक चाहती हैं। स्त्री की स्वतंत्र,मुक्त और स्वायत्त भूमिका को अस्वीकार करती हैं। ये वे औरते हैं जो आज्ञा-पालन के समय स्वतंत्र रहने का दिखावा करती हैं। अन्य अवसरों पर शांत रहने का दिखावा करती हैं। इनमें एक वर्ग ऐसी औरतों का भी है जो निरंकुशता और अत्याचार को अपने स्वार्थ के वशीभूत होकर स्वीकार करती हैं। इनमें वे औरतें भी हैं जो कहने को किताबों का सम्मान करती हैं लेकिन शब्दों के अर्थ समझे बिना पन्ने पलटती रहती हैं। वे मोदी पर बोल रही हैं लेकिन मोदी की राजनीति को बिना जाने, मोदी और संघ के स्त्री के प्रति अनुदार नजरिए को बिना जाने। ये असल में मोदी के गुडियाघर की गुडियाएं हैं।
    जो औरत मोदी के मुखड़े में देश का मुखड़ा देख रही है उनके बारे में यही कहेंगे कि उनको देश की समझ पैदा करनी होगी। देश कोई नेता का मुखड़ा नहीं है। देश कोई दलीय विचारधारा नहीं है। वे मोदीप्रेम में इस कदर मगन हैं कि उनको किसी भी किस्म का मोदी विरोधी विचार पसंद नहीं है। एक नागरिक के नाते, एक स्त्री के नाते उनका मोदीबोध वस्तुतःलोकतंत्र और लोकतांत्रिक मूल्यों के निषेध की विचारधारा के बुनियादी आधारों पर टिका है । यह मोदीबोध सुविधाबोध है।


मोदी की हिमायती औरतें


नरेन्द्र मोदी पर हमारी आलोचनाएं राजनीतिक हैं। उन सभी आलोचनाओं का एक आयाम राजनीतिक है तो दूसरा आयाम सांस्कृतिक और पितृसत्तात्मक है। असल में मोदी की आड़ में हम सबके मन में पितृसत्ता विचारधारा फल फूल रही है । यह सबसे घृणित विचारधारा है। यह उस समय और भी खतरनाक होती है जब कोई स्त्री जाने-अनजाने पितृसत्ता की हिमायत करे। मोदी की हिमायत अंततः पितृसत्ता की हिमायत है। 

मोदी पितृसत्ता के अनुदार रुपों का साक्षात प्रतिनिधि रुप है। पितृसत्ता के लिबरल रुपों और अनुदार रुपों में इस चुनाव में सीधी टकराहट है। राहुल गांधी-सोनिया गांधी पितृसत्ता के लिबरल रुपों के प्रतिनिधि हैं। इसके विपरीत मोदी पितृसत्ता के अनुदार रुपों के नुमाइंदे हैं। इन दोनों में यह वैचारिक अंतर हमें लिबरल को चुनने की ओर ठेल रहा है। पितृसत्तात्मक लिबरल विचारधारा अंततः संकट की घड़ी में स्त्री विरोधी या स्त्री समर्थक हो सकती है। समस्या यह है कि किस तरह का सामाजिक दबाव पैदा करते हैं। शाहबानो केस के समय कट्टरपंथी मुसलमानों का दबाव था और लिबरल पितृसत्ता को हमने स्त्री विरोधी भूमिका अदा करते देखा। राजीव गांधी ने शाहबानो और मुसलिम औरतों के हकों के खिलाफ कदम उठाए। लेकिन निर्भयाकांड के समय सोनिया गांधी ने स्त्रीहित में कदम उठाए,कड़े कानून बनाने में सक्रिय भूमिका निभायी,क्योंकि जन दबाव था।

इसके विपरीत मोदी का अनुदार पितृसत्तात्मक रुप है और आचरण है जिसको संघ की विचारधारा और उसके सहयोगी संगठनों के जरिए पूरे देश में लागू किया जा रहा है। कांग्रेस और कांग्रेसियों ने कभी अन्तर्जातीय विवाह का विरोध नहीं किया बल्कि उसे बढ़ावा दिया। इसके विपरीत संघ और उसके सहयोगी संगठनों ने अंतर्जातीय विवाह करने वालों पर खुलेआम हमले किए।लोगों को अंतर्जातीय विवाह करने से रोका । इसके सैंकड़ों उदाहरण हैं।

गुजरात में 2002 के दंगों में सैंकड़ों औरतों के साथ जो हुआ वह भूलने वाली चीज नहीं है। उसी तरह राजीव गांधी के एक वाक्य के कारण सिख औरतों के जो जघन्य हिंसाचार हुआ वह भी भूलने वाली चीज नहीं है, फिर भी एक बड़ा अंतर है जो सोनिया गांधी को राजीव गांधी से अलग करता है। सोनिया गांधी ने कम से कम खुलेआम,उनके पीएम ने संसद में 1984 के जघन्य कांड के लिए संसद और देश से माफी मांगी है। फिर भी 1984 के अपराध भूलना संभव नहीं है।

कांग्रेस के अंदर एक तबका है जिसका अनुदारवादी नजरिया है और यह तबका बीच बीच में चमक मारता है। लेकिन मोदी के साथ तो सरेआम स्त्री हकों पर हमले करने वाले लोग सक्रिय हैं। वे निर्लज्जता के स्त्री विरोधी फैसलों की हिमायत करते हैं।

मैं एक बात अभी तक नहीं समझ पाया कि मोदी यदि मातृभक्त हैं तो अपनी माँ को अपने पास क्यों नहीं रखते ? यह कैसा प्रेम है जिसमें एकल मोदी के पास माँ रहना नहीं चाहती, माँ मोदी से दूर रहना चाहती है। मोदी बार बार माँ की खबर लेने जरुर जाते हैं। माँ अपनी राजी खुशी की खबर भी देती है,माँ उनको आशीर्वाद भी देती है, क्योंकि वह माँ है और स्त्री है। लेकिन मोदी की माँ उनके साथ नहीं रहती। उसका साथ न रहना मोदी के किसी आचार-व्यवहार का प्रतिवाद है। औरतें प्रतिवाद भिन्न तरीके से करती हैं वे मर्दों की तरह प्रतिवाद नहीं करतीं। मोदी की माँ का मोदी से अलग रहना , मोदी का अकारण अपनी पत्नी को छोड़कर रहना,ये दो घटनाएं निजी होते हुए भी सार्वजनिक हैं और आमलोगों का ध्यान खींचती हैं। ये वे घटनाएं हैं जो मोदी के अंदर छिपे अनुदार पितृसत्तात्मक नजरिए की अभिव्यक्ति भी हैं।

हमारे समाज में एक बड़ा तबका है जो अनुदार पितृसत्ता का भक्त है और कठमुल्लों की तरह जीता है। इसमें वे लोग ज्यादा हैं जो पढ़े लिखे हैं, विदेशों में रहते हैं , मध्यवर्ग से आते हैं।

गरीबों में अनुदार पितृसत्ता का आधार बहुत कमजोर है। गरीब औरतें पितृसत्ता से आए दिन मुठभेड़ करती रहती हैं और अपने लिए मार्ग तलाशती रहती हैं। लेकिन अधिकांश शिक्षित औरतों और मर्दों में अनुदार पितृसत्ता हमेशा माँ की आड़ में औरत का शिकार करती है। माँ की आड़ में औरतों के हकों पर हमले करती है।

ये लोग माँ-बेटे के संबंधों को पितृसत्तात्मक संदर्भ के बिना देखना ही नहीं चाहते। माँ को पितृसत्ता के संदर्भ में देखने का अर्थ है औरत को पुरुष के मातहत के रुप में देखना। माँ के शोषण के रुप देखें तो इनलोगों से नफरत होने लगेगी। ये वे लोग हैं जो माँ को स्वायत्त औरत के रुप में नहीं देखते।

माँ एक स्वायत्त सामाजिक स्त्री इकाई है और उसको माँ की बजाय स्त्री के रुप में देखना चाहिए। माँ के पदबंध का प्रयोग करके माँ को तो ये लोग मातहत बनाते ही हैं साथ ही स्त्री को मातहत रखते हैं।

हीगेल ने कहा था 'सन्तान का जन्म माता-पिता की मृत्यु भी है।' इसी तरह माँ के प्रति जिस व्यक्ति में सम्मानभाव है उसके अंदर क्या अपनी पत्नी या स्त्री मात्र के प्रति सम्मानभाव है ? मोदी इस मामले एकसिरे से नकारात्मक स्थान पर खड़े हैं। उनके अंदर माँ के प्रति जो सम्मान भाव है वह सम्मानभाव अपनी पत्नी के प्रति नहीं है। यह खुला सच है।

जो लोग स्त्री में माँ ही माँ देखते हैं वे जान लें कि औरत में यदि माँ ही माँ देखेंगे तो स्त्री कभी स्वायत्त पहचान अर्जित नहीं कर सकती।इसमें मातृत्व पर जोर है इससे स्त्री की स्थिति में बदलाव नहीं आएगा। स्त्री बदले इसके लिए जरुरी है उसे मातृत्व के दायरे के बाहर निकालें।

स्त्री का निरासक्त माँ बने रहना स्त्री को पिछडा बनाए रखता है और उसे आधुनिक आत्मनिर्भर स्त्री के रुप में विकसित नहीं होने देता।

माँ तो औरत के व्यक्तित्व का एक अंश है ,समग्र नहीं है। हमें स्त्री को उन कार्यों के बाहर निकालने के बारे में सोचना चाहिए जिनको वह सदियों से करती आ रही है। मसलन् माँ का बच्चे पालना, केयर करना,आशीर्वाद देना, प्यार करना,घर की देखभाल करना। माँ ये सारे काम हजारों सालों से करती रही है और ये काम उसकी गुलामी की अवस्था के प्रतीक हैं। औरत को इन कामों के दायरे बाहर निकलना होगा। मोदी की मुश्किलें यहीं पर हैं।

जो मोदी और उनकी मां के बीच के संबंध को लेकर भावविह्वल हैं वे भी अंततः अपनी भावविह्वलता में औरत को गुलाम बनाए रखने का शास्त्र रच रहे हैं। माँ को हमने पालन-पोषण करने वाली मशीन बनाया है उसे साक्षात जीवन का आनंद लेने वाली स्वायत्त औरत नहीं बनाया है। हम माँ-बेटे के प्यार के महिमामंडन में जाने-अनजाने पुराने अनुदार माँ-बेटे के संबंध की हिमायत कर रहे हैं। यह हिमायत मूलतः हिटलर के विचारों की हिमायत है।

हिटलर मानता था स्त्री का काम है बच्चे पैदा करना और परिवारीजनों की घर के अंदर रहकर सेवा करना। अनुदार पितृसत्ता के संघी हिमायतियों और उनके फेसबुक अनुयायियों को माँ-बेटे का वह रुप पसंद है जो मोदी और उनकी माँ के बीच में है।यह रुप वैचारिक तौर पर हिटलर के द्वारा तय की गयी लक्ष्मण-रेखा के बाहर नहीं जाने देता।

मेरे लिए चिन्ता तब और होती है जब कोई आधुनिक पढ़ी-लिखी औरत अपने भावों-विचारों में मोदीभक्त हो और उसके अनुदार पितृसत्तात्मक विचारों की भी भक्त हो।यह कम्प्लीट पुंसवादी गुलामी है।

स्त्री के अंदर अनुदार पितृसत्तात्मक विचारधारा बेहद खतरनाक होती है यह विचारधारा स्त्री के आधुनिकीकरण की विरोधी है। यह औरत की स्वायत्तत और लोकतांत्रिक पहचान का निषेध करती है।

संघ ने दुर्गावाहिनी और इस तरह के संगठनों के जरिए औरतों में अनुदार पितृसत्ता का जमकर प्रचार किया है। ये वे औरतें हैं जो अनुदार पितृसत्ता की रक्षा के लिए किसी भी हद तक जाकर स्त्री अधिकारों का हनन कर सकती हैं।ये ही औरतें वैचारिक तौर पर मोदी भक्ति में फेसबुक से लेकर राजनीति तक सक्रिय हैं।











रविवार, 4 मई 2014

अस्मिता ,वर्चस्व और अमेरिकी जेल व्यवस्था

अमेरिका ने अपने देश में इस तरह की संस्कृति निर्मित की है जिसमें पुलिस और न्याय की हिंसा सामान्य और वैध लगती है। जिस तरह हमारे देश में आंदोलनकारियों पर लाठीचार्ज करना आमलोगों को वैध लगता है वैसे ही अमेरिकी समाज में भी पुलिस की हिंसा और आतंक को मीडिया प्रचार ने वैध बनाया है। सामान्य नागरिकों पर की गई पुलिस हिंसा को आजकल अमेरिका में लोग नॉर्मल एक्ट की तरह लेते हैं। एक जमाना था कि साधारण सी पुलिस कार्रवाई पर सारा देश हुंकार भर उठता था लेकिन लेकिन इन दिनों ऐसा कुछ भी नहीं होता।

आमलोगों में पुलिस के खिलाफ प्रतिवाद की भावना के लोप में मीडिया के रीगनयुगीन मॉडल की केन्द्रीय भूमिका है।यह प्रचार किया गया कि जो पुलिस के खिलाफ प्रचार या प्रतिवाद करते हैं वे क्रिमिनल हैं। यह भावना पैदा की गयी है कि पुलिस के खिलाफ वे ही लोग ज्यादा हल्ला मचाते हैं जो गलत धंधा करते हैं। ये ही लोग कानून तोड़ते हैं, नशीले पदार्थों का सेवन करते हैं , गुण्डागर्दी करते हैं या हिंसा करते हैं ,आदि।

प्रसिद्ध मार्क्सवादी मीडिया सिद्धांतकार बौद्रिलार्द के अनुसार रीगनयुगीन अमेरिकी परिप्रेक्ष्य में सीनिरियो या परिदृश्य महत्वपूर्ण है। अब सब कुछ सीनिरियो के कमिटमेंट और प्रस्तुति पर निर्भर है। अपराध हुआ है फोटो दिखाओ,कैमरे में कैद करो,टीवी पर प्रसारित करो। किसी व्यक्ति का गिरफ्तार होना और फिर उसका टीवी फोटो या सीन में प्रसारण ही महत्वपूर्ण मान लिया गया है। सीनिरियो के लिए कमिटमेंट असल में रीगन युग में जन्म लेता है। रीगन स्वयं फिल्म अभिनेता थे और कैलीफोर्निया के थे। उनके राष्ट्रपति बनने के बाद मीडिया में मूलगामी परिवर्तन यह आया कि सीनिरियो की प्रस्तुति महत्वपूर्ण मान ली गयी। खासकर विज्ञापन से लेकर टीवी तक सीनिरियो का महत्व बढ़ गया। विज्ञापन और टीवी दृश्यों के जरिए ही इमेजों के निर्माण,विध्वंस ,नियंत्रण और मेनीपुलेशन की पूरी दुनिया में बाढ़ आ गयी।

रीगन ने अपनी फिल्मी इमेज को अमेरिका की फिल्मी इमेज के निर्माण में सफलता के साथ इस्तेमाल किया। सामान्य जिंदगी जीने के लिए ब्लैकमेलिंग का मूलभूत गुण के रूप में इस्तेमाल किया। मीडिया प्रस्तुतियों में कहा गया सामान्य जिंदगी जीना चाहते हो तो ब्लैकमेलिंग करो। सहजजीना चाहते हो तो व्यक्तिगत हितों को तरजीह दो सामाजिक हितों की उपेक्षा करो।

अमेरिका आज जिस संकट में घिरा है उसका समाधान तब तक संभव नहीं लगता तब वह सामूहिक समाधान की धारणा को महत्ता नहीं देता। रीगनशासन ने इमेज को महान बनाया। कमाते हो तो अच्छे हो,इसमें यह महत्वहीन हो गया कि कैसे कमाते हो। अब प्रिफॉर्मेस पर जोर था। विज्ञापन ने लुक को महत्ता दी। इमेज प्रचारित रहे, चाहे जो करो। लुक के आधार निजी और सामाजिक बीमारियों को भी छिपा लिया गया। रीगन को कैंसर था लेकिन कैंसर जैसी बीमारी को भी लुक की ओट में छिपा लिया गया। यानी नई रणनीति में बीमारी भी लुक का हिस्सा बना दी गयी।

अब राजनीतिक खामियां या व्वस्था की खामियां या बेबकूफियां महत्वहीन हो गयीं, महत्वपूर्ण थी तो बस अमेरिका की इमेज। सुंदर,चमकीले,साफ-सुथरे,न्यायप्रिय,बहुलतावादी अमेरिका की इमेज की अहर्निश वर्षा ने अमेरिकी समाज के स्याह इलाकों को सामने आने ही नहीं दिया। इन स्याह इलाकों में से एक है अमेरिकी जेलप्रणाली।

अमेरिका की रीगनयुग से मीडिया में जिस तरह की इमेज वर्षा होती रही है उसके आधार पर अमेरिकी समाज और उसके तानेबाने को समझना मुश्किल है। मीडिया निर्मित इमेजों के आधार पर अमेरिका के राजनीतिक सत्य को नहीं जान सकते। यही हाल इन दिनों भारत का है। हमारी समस्त सरकारें खास किस्म के स्थायी शासन का भरोसा देती रही हैं। राजनीतिक स्थायित्व के ऊपर जोर देने के कारण भूलों, भ्रष्टाचार और असफलताओं को सरकार के लिए विध्वंसक नहीं माना जाता। अब भूलों और गलतनीतियों के कारण सरकारों का पतन नहीं होता। अब नेताओं पर जनता गर्व नहीं करती और नेता भी अपने फैसलों पर गर्व नहीं करते। यह वह परिदृश्य है जिसे रीगनयुग ने निर्मित किया और इस पैराडाइम में हम अभी भी जी रहे हैं।

अमेरिकी समाज में पुलिस और न्यायपालिका के खिलाफ नागरिकों के प्रतिवाद को मीडिया से एकदम धो-पोंछकर साफ कर दिया गया है। नई सूचना तकनीक के रूप में इंटरनेट और मोबाइल के आने के बाद से समूचे समाज की नजरदारी बढ़ा दी गयी है। अमेरिकी शासक जितना अपने देश के बाहर आतंकित और असुरक्षित हैं अपने देश में भी उतने ही आतंकित और असुरक्षित हैं। बाहर वे सीधे सेना,सूचना और अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं और बहुराष्ट्रीय निगमों के जरिए हमला करते हैं देश में पुलिस नजरदारी और गिरफ्तारी के जरिए नागरिक अधिकारों पर हमले करते हैं।

अमेरिकी समाज में कारपोरेट घरानों की लूट और मनमानी के खिलाफ प्रतिवाद संभव नहीं है साथ ही पुलिस हिंसाचार और अत्याचार के विरोध में भी प्रतिवाद करना संभव नहीं है।आंकड़े बताते हैं कि अमेरिका में जेलबंदियों में आधे के करीब लोग नशीले पदार्थो की तस्करी या अवैध सेवन संबंधी मामलों में गिरफ्तार किए गए हैं। " नेशनल ड्रग कंट्रोल पॉलिसी" संगठन के द्वारा जारी सन् 2009 की रिपोर्ट में अमेरिका के 10 महानगरों में किए गए एक सर्वे में कहा गया है कि इन शहरों में गिरफ्तार किए गए 87 फीसदी लोग अवैध नशीले पदार्थों के सेवन के शिकार पाए गए हैं। तरूणों में वैध नशीली दवाओं का प्रयोग अच्छी-खासी मात्रा में होता है।

सवाल यह उठता है कि अमेरिकी समाज में अवैध नशीले पदार्थों के सेवन का इतना व्यापक सामाजिक आधार क्यों और कैसे बना ? असल में ,शीतयुद्धीय राजनीति के तहत रीगन प्रशासन ने ड्रगवार के नाम से जो नीति अख्तियार की उसने अमेरिका के बाहर और अंदर आमलोगों को नशीले पदार्थों की लत का शिकार बनाया और यह काम बड़े सुनियोजित ढ़ंग से किया गया। ड्रगवार से लैटिन अमेरिका के साथ अमेरिका के अंदर का युवावर्ग भी बड़ी संख्या में प्रभावित हुआ।

ड्रगवार के कारण नशे की लत और अपराधकर्म में तेजी से इजाफा। विदेशों में ड्रगवार को माफिया गिरोहों, भाड़े के सैनिकों और अमेरिकी सैन्यहितों के विस्तार के साथ लागू किया गया और देश के अंदर युवाओं में नशे की लत,पॉपकल्चर,पॉप म्यूजिक और अपराधकर्म का त्रिकोणीय फार्मूला लागू किया गया इसके नियंत्रण के लिए बड़े पैमाने पुलिस प्रणाली और जेल व्यवस्था का विस्तार किया गया। जनसंख्या के एक बड़े हिस्से को जेलों में बंद रखकर जहां एक ओर गुलामी को बढ़ावा दिया गया वहीं दूसरी ओर ड्रगवार के जरिए जन नियंत्रण के लक्ष्य को भी हासिल किया गया। नॉम चोम्स्की ने “डिटरिंग डेमोक्रेसी” नामक किताब में लिखा है कि नशीले पदार्थों से जुड़े अपराधों के कारण संगठित अपराधकर्म को बढ़ावा मिला। यह माना जाता है कि अमेरिका की करव्यवस्था में आधे से ज्यादा कर तो ड्र्ग ट्रेड से ही आता है। नशीले पदार्थ वैध बिकें या अवैध बिकें वे असल में नशीले पदार्थ ही हैं। उल्लेखनीय है अमेरिका में तम्बाकू वैध है , मरिजुआना वैध नहीं है।क्योंकि मरिजुआना को कहीं पर भी पैदा किया जा सकता है। मरिजुआना की बिक्री करना मुश्किल है। जबकि तम्बाकू के साथ ऐसा नहीं है। यही वजह है अमेरिका की 60 फीसदी से ज्यादा आबादी मरीजुआना पीती है.इधर के तीन दशकों में अमेरिकी युवाओं में मरिजुआना को छोड़कर अन्य ज्यादा नशीले पदार्थों के सेवन की ओर उन्मुख हुए हैं। इसके कारण समाज में अनेक किस्म की गंभीर बीमारियां भी फैली हैं। तम्बाकू और शराब के सेवन से मरने वाले युवाओं की संख्या का अनुपात जेलों में बंद कैदियों की संख्या से भी ज्यादा है। नशेड़ियों को सजा और जुर्माने के जरिए भी प्रशासन को बड़ी मात्रा में धन मिलता है।

चोम्स्की ने लिखा है कि सोवियत संघ के पतन के बाद अमेरिकी विश्व नीति में तीसरी दुनिया के देशों के खिलाफ हिंसाचार और जोर-जबर्दस्ती प्रभुत्व में लेने का मनोभाव व्यक्त हुआ है। घरेलू स्तर पर आम जनता को विभिन्न तरीकों से नियंत्रण में रखने और धमकाने के साथ तुरंत गिरफ्तार करके सजा दिलाने के मैथड का जमकर दुरूपयोग किया गया है।

बंदीजनों को अमेरिकी समाज में सामान्य नागरिक से भिन्न नजर से देखा जाता है। सामान्य नागरिक को अमेरिकी प्रशासन ने “हम” और बंदीजन को “तुम” की कोटि में रखकर विभाजित किया है। इसमें “हम” के पास नागरिक अधिकार हैं,”तुम” के पास नागरिक अधिकार नहीं हैं। “तुम” केटेगरी के लोगों को नियंत्रण में रखने लिए अमेरिका के बजट का बहुत बड़ा हिस्सा कानून-व्यवस्था के ढाँचे पर खर्च होता है। यही स्थिति अमेरिका के बाहर है अमेरिका ने पाकिस्तान इराक,अफगानिस्तान, लीबिया आदि में विकास पर कम और सैन्य साजो -सामान खरीदने के लिए सहायता ज्यादा दी है।

अमेरिका ने ड्रगवार के बहाने देश के बाहर पराए मुल्कों यानी लैटिन अमेरिकी देशों की जनता की सेना से ठुकाई की, देश की जनता की पुलिस से ठुकाई करायी। देश के बाहर प्रतिक्रांतिकारी ताकतों को संगठित किया और देश में माफिया गिरोहों को संगठित किया।

कैदी नागरिक होता है। कैदी को अ-नागरिक मानकर किया गया बर्ताब सीधे मानवाधिकार का उल्लंघन है। अमेरिकी समाज में किसी भी अपराध में सजा पाए व्यक्ति को मतदान देने के नागरिक अधिकार से वंचित कर दिया जाता है और इस कारण लाखों अमेरिकी बाशिंदे नागरिक अधिकारों से वंचित हैं और दोयमदर्जे के नागरिक की हैसियत से जी रहे हैं। कोई व्यक्ति अपराध करने के कारण जब नागरिक अधिकार से वंचित किया जाता है तो यह उसके लिए दोहरी सजा है और यह सजा फांसी की सजा से भी बदतर है। नागरिक अधिकारों को किसी बहाने नहीं छीना जा सकता। इस समूचे पहलू को अस्मिता और मानवाधिकार परिप्रेक्ष्य में समझें तो बेहतर ढ़ंग से देख पाएंगे।

मैं क्या हूँ यह महत्वपूर्ण नहीं है। महत्वपूर्ण यह है कि मैं समाज में जिंदा हूँ और एक मनुष्य के रूप में जब मेरी उपस्थिति है तो यह मेरी मनुष्य के रूप में उपस्थिति है और मनुष्य के अलावा जितनी भी अस्मिताएं या पहचान के रूप है वे अप्रासंगिक हैं। व्यक्ति की पहचान को स्थान के आधार पर तय करना ठीक नहीं है। मैं घर पर रहूँ या जेल में। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता।इससे मेरी पहचान तय नहीं हो सकती। ज्योंही आप किसी व्यक्ति की पहचान को उसके जेल में रहने के कारण निर्धारित करते हैं आप पाते हैं कि इस तरह संबंधित व्यक्ति की ही नहीं उसके परिवारीजनों,नाते-रिश्तेदारों और जाति या समुदाय या धार्मिक समूह की भीपहचान तय करने लगते हैं। अतः स्थान विशेष के आधार पर व्यक्ति और समुदाय की पहचान निर्धारित नहीं की जानी चाहिए। जेल के आधार पर जब किसी व्यक्ति की पहचान तय करते हैं तो उस व्यक्ति के अंदर स्थायी तौर पर अपराधबोध और कुंठा भर देते हैं। जेलबंदी का जिस पर लेबिल लगा होता है उसे हमेशा दागी अपराधी के रूप में देखा जाता है।

सवाल यह है कि अस्मिता के जब विभिन्न रूप बदलते हैं तो उनको अवस्था विशेष से जोड़कर देखा जाता है। मसलन् एक अविवाहित लड़की की अस्मिता विवाह करते ही बदलती है,वह विवाहिता कहलाने लगती है,माँ बनते ही वह माँ की अस्मिता हासिल कर लेती है। एक ही लड़की एक ही साथ लड़की,पत्नी,माँ आदि की अस्मिताओं से गुजरती है। यानी व्यक्ति की अस्मिता उसकी अवस्था के अनुसार बदलती रहती है,ऐसी अवस्था में एक जेलबंदी की अस्मिता को स्थायी तौर पर दागी अपराधी के रूप में देखना सही नहीं है। वह जब तक जेल में था वह अपराधी था। लेकिन जब वह सजा काट चुका वह अपराधी नहीं रहा।

अमेरिका में अपराधी व्यक्ति पर लगा दाग उसका,उसके परिवार का और उसके समुदाय का कभी पीछा नहीं छोड़ता और इस तरह व्यक्ति अहर्निश अपराधबोध से ग्रस्त कुंठा और हताशा में जीता है। यह अपराध और अपराधी के प्रति साम्राज्यवादी नजरिया है। जरूरत है इस नजरिए को बदलने की।

मैं अभी प्रोफेसर हूँ और नागरिक भी हूँ। बुनियादी पहचान मेरी नागरिक की है।नागरिक की पहचान के परिप्रेक्ष्य में ही मेरी पहचान के बाकी रूपों को परिभाषित किया जाना चाहिए। लेकिन 60 साल बाद नौकरी से अवकाश ग्रहण कर लूँगा तब में प्रोफेसर नहीं रहूँगा। मेरी प्रोफेसर की पहचान कक्षा में उपस्थिति के समय प्रमुख होगी और नागरिक की पहचान गौण होगी। लेकिन कक्षा के बाहर में नागरिक हूँ, पिता हूँ,चतुर्वेदी हूँ,पति हूँ आदि। इनमें से पहचान का प्रत्येक रूप किसी न किसी सामाजिक अवस्था से जुड़ा है।मैंने ज्योतिष से आचार्य भी किया है तो मैं जब किसी का फलादेश बता रहा होता हूं तो मेरी पहचान एक ज्योतिषी के रूप में होगी न कि एक प्रोफेसर के रूप में। इसी तरह एक कैदी जब तक जेल में है वह कैदी है साथ में नागरिक भी है।

आधुनिक युग में नागरिक अस्मिता के बिना अन्य किसी पहचान का कोई मूल्य नहीं है।आधुनिक समाज में नागरिक होना ही आधुनिक होना है। नागरिक के अधिकारों,मान्यताओं और मूल्यों की रोशनी में हमें पहचान के सभी रूपों को परिभाषित करना चाहिए। नागरिक की पहचान सभी किस्म की अस्मिता या पहचान का मूलाधार है। पहचान के जितने भी रूप हैं वे नागरिक की पहचान के साथ मिलकर ही अपनी स्थिति निर्धारित करते हैं। नागरिक नहीं तो आधुनिक नहीं।अमेरिकी न्याय की यह आयरनी है कि नागरिक को जब किसी अपराध में सजा मिलती है तो उसको मतदान के अधिकार से वंचित कर दिया जाता है।

आमतौर पर संकीर्णतावादी और फंडामेंटलिस्ट विचारधारा के लोग यह मांग करते देखे जाते हैं कि अपराधियों को कठोर से कठोर सजा दी जाय। इन लोगों का मानना है कठोर सजा देने से अपराधी फिर से अपराध नहीं करता। लेकिन यह धारणा व्यवहार में सच साबित नहीं हुई है। अमेरिका में कठोर सजाएं सुनाए जाने के बाद भी अपराधों में गिरावट नहीं आई है।इस तरह के विचारक आमतौर पर अपराध को नैतिकता से जोड़कर देखते हैं और बढ़ते अपराधों को नैतिक ह्रास का लक्षण बताते हैं। सच यह नहीं है। बल्कि ऐसा करके वे नैतिकता के क्षय का भय पैदा करते हैं और कठोरतम दण्ड के प्रावधान की मांग करते हैं। अपराधी के लिए कठोर दंड़ और नैतिकता के क्षय का भय एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। ये दोनों कंजरवेटिव और फासिस्ट विचारधाराओं से जुड़ा नजरिया है।

कठोर दंड की मांग अंततःराजनीति में अधिनायकवाद को जन्म देती है।अमेरिकी सत्ता की मनमानी से आज सारी दुनिया परेशान है।वहां सत्ता पर कारपोरेट तानाशाही का कब्जा है। अपराध और कठोरदंड से भय के कारण लोकतंत्र बाधित हुआ है और सर्वसत्तावादी विचारधाराएं मजबूत हुई हैं। कारपोरेट अधिनायकवाद का मार्ग प्रशस्त हुआ है । ये लोग आए दिन न्याय के अधिनायकवादी समाधान सुझाते रहते हैं और इसके बहाने हाशिए के लोगों पर वर्चस्व स्थापित करने की कोशिश करते हैं।

ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में देखें तो अमेरिकी जेल प्रणाली 200साल पुरानी है। इसमें दो तरह के प्रयोग किए किए गए। पहला प्रयोग गरीबों को दंडित करने के लिहाज से कारागार बनाकर आरंभ किया गया। 18वीं शताब्दी के अंतिम दो दशकों में यह प्रणाली आरंभ की गयी।आरंभ में अस्थायी बंदीघर के रूप में जेल का इस्तेमाल किया जाता था।जब तक कोई बंदी मुकदमे से बरी नहीं हो जाता उसे बंदी कराए रखने के लिए जेलों का इस्तेमाल करते थे और उसे बंदी रखते थे।इस प्रसंग में उल्लेखनीय है कि अमीरलोग तो जुर्माना देकर छूट जाते थे लेकिन गरीबों को जुर्माना न भरने के कारण जेलों में बंद रखा जाता था।गरीबों को जेलों में तरह-तरह की यातनाएं दी जाती थीं और अनेक मामलों में सार्वजनिक तौर पर दंडित किया जाता था।यह पूरी प्रणाली अनेक उपनिवेशों में भी लागू की गयी।उनदिनों सार्वजनिक तौर पर दंडित करने का प्रावधान था।

पूंजीवाद के आगमन के समय बड़े पैमाने पर समूचे यूरोप में चोरियां हो रही थीं, छोटे छोटे चोरों को सुधारने के लिहाज से 1557 से बड़े पैमाने पर खाली घरों में सुधारघर बनाए गए और चोरों को इनमें बंदी बनाकर रखा जाता था। खासकर ब्रिटेन में इस तरह के सुधारघर थे।इनमें बंद लोगों से जबरिया श्रम कराया जाता था और यह प्रयोग काफी सफल रहा।कालांतर में इस तरह के संस्थान समूचे ब्रिटेन और यूरोप में फैल गए।लेकिन उस जमाने में सुधारघरों मे जो बंदी थे वे छोटे-मोटे अपराधों में बंदी हुआ करते थे और ये गरीब लोग थे।इन बंदियों को यातनाएं दी जाती थीं,दण्डित किया जाता था और अन्यत्र भी भेज दिया जाता था। इस तरह के बंदीघर या सुधारघर का विचार सबसे पहले इंग्लिश समाजसुधारक जॉन हार्वर्ड के दिमाग में आया और इस तरह के सुधारघर सबसे पहले ब्रिटिश उपनिवेश अमेरिका में बनाए गए।बाद में ब्रिटेन में बने।

उस जमाने में शारीरिक दंड़ और फांसी दोनों का ही विलियम पेन ने जमकर विरोध किया और कहा कि इन दोनों किस्म के दण्ड देने से बेहतर है लंबी सजाएं देना।अमेरिकी क्रांति के दौरान भी जेलों में शारीरिक यातनाएं देने का जमकर विरोध हुआ और ब्रिटिश औपनिवेशिक न्याय प्रणाली की जमकर आलोचना की गयी। इस तरह की आलोचना करने वालों में डा. बेंजामिन रश का नाम सबसे ऊपर आता है।रश साहब पेनसिलवेनिया में सर्जन थे और अमेरिकी स्वाधीन क्रांति के अमर जनगायक भी थे। उनके लिखे दो चर्चित पर्चे हैं। इन दोनों पर्चों ने अमेरिका में जेलसुधार की प्रक्रिया को जन्मदिया और विगत 200सालों में वह विभिन्न पड़ावों से गुजरती हुई मौजूदा प्रणाली तक पहुंची है।बाद में कैदी को जेल में पृथक कमरे में बंद रखने,एक निश्चित स्थान तक आने-जाने, उस पर नजर रखने के प्रावधान किए गए।

उस समय जेलप्रणाली का प्रधान लक्ष्य था कैदी के लिए एकांत, श्रम, और अहर्निश नजरदारी। ऐतिहासिक नजरिए से देखें तो अमेरिकी जेलप्रणाली ने आरंभ में जो मॉडल अपनाया उसका लक्ष्य था वर्गीय नियंत्रण और नस्लीय नियंत्रण। सन् 1814 के न्यूयार्क जेल के रिकॉर्ड बताते हैं कि जेल में बंद 29फीसदी लोग काले थे। सन् 1833 की रिपोर्ट बताती है कि जिन राज्यों में जनसंख्या में 1नीग्रो और 30गोरेलोग रहते थे,वहीं पर इन राज्यों की जेलों में 1काला और 4गौरवर्ण के कैदी बंद थे।दक्षिणी राज्यों में 19वीं सदी में जेलों में बंद कैदियों की संख्या 75प्रतिशत के करीब थी। इन राज्यों में आमतौर पर कैदियों को निजी लोगों को ठेके पर दे दिया जाता था।इसके कारण दक्षिणी राज्यों में खुलेआम गुलामप्रथा फलीफूली। इसे ठेकेदारी प्रथा भी कहते हैं।अमेरिका के दक्षिणी राज्यों में काले लोगों के खिलाफ जिस नग्नतम रूप में अमानवीय व्यवहार किया जाता था वह उस दौर में एक मिसाल माना जाता है।मसलन् सामान्य से अपराध के मामले में उस जमाने में पुलिस वाला नीग्रो को पकड़कर ले जाता था और फिर उसे लंबी सजा देकर बंद कर दिया जाता था, इस तरह नीग्रो जाति पर बर्बर जुल्म ढाए गए उनको गुलामी के लिए मजबूर किया गया। यही वजह है अमेरिका के दक्षिणी राज्यों में गुलामगिरी के खिलाफ सबसे तेज प्रतिक्रिया हुई। अमेरिकी जेलों में बंद कैदियों को सुनियोजित ढ़ंग से नशे की लत डाली जाती थी। उनको कोकीन,हेरोइन,अफीम आदि सप्लाई दी जाती थी। इस दुष्परिणाम यह होता था कि वे जब जेलों से बाहर निकलते थे तो नशे के आदी हो चुके होते थे और बाहर निकलकर फिर से अपराधकर्म में लिप्त हो जाते थे और फिर से लौटकर जेल में पहुँच जाते थे।

अमेरिकी जेलप्रणाली में दूसरा बड़ा प्रयोग 1929-30 की मंदी के समय किया गया। इस प्रयोग के दौरान यह पाया गया कि दूसरे विश्वयुद्ध के समय जेलों में कैदी कम थे और उसके पहले और बाद में कैदियों की संख्या ज्यादा थी।

बीसवीं शताब्दी के आरंभ में अमेरिका में नशीले पदार्थों के सेवन और उससे जुड़े अपराधों की बाढ़ आती है। फलतः इसदौर की जेलप्रणाली में नशीले पदार्थों के सेवन को आधार बनाकर चिन्तन आरंभ हुआ। सन् 1929 के आसपास आई मंदी के दौर में देखा गया कि तेजी से बेकारी बढ़ी है और अपराध भी बढ़े हैं। अपराधों का सिलसिला बंद हुआ है द्वितीय विश्वयुद्ध आने के साथ।युद्ध के दौरान अपराध का आंकड़ा तेजी से कम हो जाता है। लेकिन ज्योंही युद्ध खत्म होता है अपराधियों और बेकारों की संख्या में तेजी से उछाल आता है।यही वह दौर है जब दंड की टिकाऊ प्रणाली की हिमायत की जाती है।बेकारीऔर मंदी के कारण अपराधियों की संख्या में आया उछाल आंकड़ों से भी पुष्ट होता है।

सन् 1999 में अमेरिकी जेलों में प्रति एक लाख लोगों में 476लोग बंदी थे।यह संख्या 1929 की मंदी में जेलों में बंद लोगों की संख्या से तीन गुना ज्यादा है।अमेरिकी फेडरल जेलों में बंद लोगों की संख्या 1999 से 2000 में 9फीसदी बढ़ी है ।यानी अमेरिका के समस्त राज्यों की जेलों में 1990 में प्रति एक लाख की आबादी में 458लोग जेल में बंद थे जो 2000 में बढ़कर 702 हो गए।

सन् 2000 में फेडरल जेलों में बीस लाख लोग जेलों में बंद थे।ताजा आंकड़े बताते हैं कि अमेरिका के विभिन्न राज्यों में जेलों में कैदियों की संख्या बेशुमार है। इन जेलों में जेलों की क्षमता से 33 फीसदी ज्यादा कैदी बंद हैं। जून 2003 में न्याय सांख्यिकी विभाग के द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार विगत 4सालों ( 1999-2003)में जेलों में बंदियों की संख्या में तेजी से वृद्धि हुई है।जेलों में बंद कैदियों में औरतों की भी बड़ी तादाद है। इन चार सालों में कुल जेलबंदियों में 5.0प्रतिशत औरतों की संख्या बढ़ी है। खासकर टैक्सास और कैलीफोर्निया में बंदियों की संख्या में तेजी से इजाफा हुआ है।जबकि 9राज्यों में बंदियों की संख्या में गिरावट दर्ज की गयी है। अमेरिकी जेलों में बंदी लोगों का प्रोफाइल बताता हैकि कैदियों में 60फीसदी अल्पसंख्यक हैं।इनकी उम्र 20साल से नीचे है।अमेरिका की समग्र जेल बंदी संख्या सन् 2003 में 6.9 मिलियन यानी 70लाख दर्ज की गयी थी ।

नई अमेरिकी जेल प्रणाली और न्याय प्रणाली कठोर दण्ड देने की नीति पर आधारित है और इसके अनुकूल परिणाम नहीं निकले हैं। बंदियों पर किए गए अनुसंधान बताते हैं बंदियों को कड़े दण्ड देने की नीति के कारण अपराधों में कोई कमी नहीं आई है। इसके विपरीत कठोर दण्ड देने से हिंसक और आक्रामक व्यवहार में इजाफा हुआ है। अपराधियों को कठोर देने से उनमें आक्रामकता बढ़ी है और वे और भी हिंसक हो उठे हैं। जेलों में इन बंदियों के आक्रामक व्यवहार का अन्य कैदियों पर भी बुरा असर देखा गया है। शोधकर्ताओं का मानना है कि अपराधी को दुरूस्त करने के लिए दण्ड देकर सुधारने की बजाय सामाजिक व्यवहार और सामाजिक शिक्षा से दुरूस्त करने पर जोर दिया जाना चाहिए। लेकिन अमेरिकी न्यायप्रणाली में इसके लिए कोई जगह ही नहीं है।

अमेरिका में बढ़े अपराध और जेलों में स्थान के अभाव के कारण अमेरिकी प्रशासन ने एक पद्धति इजाद की और उन अपराधों को रेखांकित किया है जिनमें कम से कम सजा दी जाए। कम सजा के प्रावधान का समाज पर क्या असर हुआ उसका मूल्यांकन करने के लिए एक कमीशन बनाया गया जिसने 20साल के अनुभवों को समेटते हुए अपनी रिपोर्ट दी। इस रिपोर्ट में बताया गया कि कम अवधि की सजा पाने वाले कैदियों की संख्या में 155फीसदी इजाफा हुआ है। 52 फीसदी जजों ने माना कि न्यूनतम सजा देने के मामले में विषमता देखी गयी है। 62फीसदी जजों ने कहा कि सभी किस्म के मामलों में न्यूनतम सजा देने का औसत प्रतिशत बहुत ज्यादा रहा है। ये राय सन् 2010 की है।

अमेरिका में एक फिनोमिना यह भी देखने में आया है कि समुदाय विशेष के लोगों को चिह्नित करके अपराधी की केटेगरी में बदनाम कर दिया जाता है। जिस व्यक्ति को एकबार जेल हो जाती है उसके बाद उसका परिवार और सामाजिक समुदाय हमेशा अपराधी के नाम से जाना जाता है फलतःएक तरह की सामूहिक यंत्रणा से संबंधित नागरिक को गुजरना पड़ता है।

मसलन, न्यूयार्क को ही लें,पूर्वी न्यूयार्क के इलाके में रहने वाले लोगों में अपराध एक कॉमन फिनोमिना बना दिया गया है। इन बस्तियों में ऐसे परिवार ज्यादा रहते हैं जिनका कोई न कोई सदस्य किसी न किसी समय जेल में रहा है या जाने वाला है। यह फिनोमिना अकेले न्यूयार्क शहर में ही नहीं है अन्य अमेरिकी शहरों में भी इस फिनोमिना को देख सकते हैं।

अमेरिका की समस्त जेलों ( संघ और केन्द्र की ) में आधे से ज्यादा बंदी काले लोग हैं। गोरे बंदियों की तुलना में काले बंदियों की संख्या सात गुना ज्यादा है। सन् 1996 तक के आंकड़ों के अनुसार अमेरिका की समग्र काली आबादी के 30फीसदी लड़के कभी न कभी जेल में बंद जरूर रहे हैं। गोरी औरतों से 421फीसदी ज्यादा काली औरतें नशीले पदार्थों के सेवन के चक्कर में जेलों में बंद रही हैं। बंद औरतों में तीन-चौथाई औरतों के बच्चे हैं। 15लाख से ज्यादा बंदी औरतों के छोटे-छोटे बच्चे हैं। जेलों में बंद आधी से ज्यादा काली औरतें अपने बच्चों को जेल में रहते हुए कभी नहीं देख पाएंगी।

अमेरिकी न्यायप्रणाली में अपराध के कारण अपराधी के साथ-साथ पूरा परिवार टूट जाता है। यही वजह है कि अमेरिका में पितारहित बच्चों की संख्या में तेजी से इजाफा हुआ है। अमेरिकी सिस्टम की दूसरी पीड़ादायक बात यह है कि जिन लोगों को एकबार जेल हो जाती है उनका मतदान का अधिकार खत्म हो जाता है। सरकारी घर पाने का अधिकार खत्म हो जाता है,बैंक से कर्ज नहीं मिलता,विकास योजनाओं के लाभों से इनको वंचित कर दिया जाता है। इन स्थितियों में जब कोई बंदी सजा काटकर सामाजिक जीवन में वापस लौटकर एक भले शहरी की जिंदगी गुजारना चाहे तो उसके लिए कोई संभावना ही नहीं बचती। बल्कि उसे पहले से भी कठिन सामाजिक परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है। यह एक तरह से अमेरिकी प्रणाली में नस्लवादी शोषण और उत्पीड़न का अंतहीन चक्र है जिसमें काले लोगों को जीना पड़ता है। यह भी कह सकते हैं कि अमेरिकी समाज में जेल यात्रा कर आए व्यक्ति के लिए नए सिरे से भले आदमी की जिन्दगी जीने की अमेरिकी सत्ता कोई संभावनाएं ही नहीं छोड़ती।

अमेरिकी समाज में काले और हिस्पनिक समुदाय के अघिकांश लोग घेटो में रहते हैं। एकदम दमघोंटू अभावग्रस्त माहौल में रहते हैं। हर शहर में इनके लिए दमघोंटू घेटो बस्तियां बनी हैं जो शहर के भीतरी इलाकों में बसी हैं। इन घेटो बस्तियों में रहने वालों की जीवनशैली बेहद खराब है। उल्लेखनीय है अमेरिकी जेलों में बंद लोगों में आधी संख्या उनकी है जो नशीले पदार्थों के सेवन के जुर्म में पकड़े गए हैं। उल्लेखनीय है घेटो में रहने वालों की शिक्षा पर कम और जेलों के रखरखाब पर ज्यादा खर्चा किया जा रहा है। रेण्ड कारपोरेशन के द्वारा कराए एक सर्वे से पता चला है कि नशीले पदार्थों के सेवन के लिए दिए गए कठोर दंड की व्यवस्था ने समाज में असुविधाएं ज्यादा पैदा की हैं। कठोर दंड देने से लोग और ज्यादा बिगड़े हैं, पीड़ितों के परिवार में तबाही मची हुई है।

कायदे से देखें तो अमेरिका में जेल-औद्योगिक समूह का निर्माण हो चुका है। आमलोग खेतों-खलिहानों में काम करने की बजाय जेल की चौकीदारी ज्यादा पसंद करते हैं। अमेरिकी सामाजिक सेवाओं की तरह जेल व्यवस्था का भी निजीकरण कर दिया गया है। जेल बनाना और उनको चलाना बहुत बढ़िया मुनाफे का धंधा है। लगातार नए-नए जेलों का प्रत्येक शहर में निर्माण हो रहा हैऔर ये स्थानीय निजी जेल भी अमेरिकी जनगणना के रिकॉर्ड का हिस्सा है।

मसलन् विगत 30सालों में न्यूयार्क में घेटो वाले इलाकों में 30 नए बहुमंजिला जेल बनाए गए हैं। इन जेलों के रखरखाब पर आम करदाता जनता का पैसा खर्च होता है। मसलन् 1997 में प्रति कैदी 8डालर खर्चा आता था जो 1999 में बढ़कर 30 डॉलर हो गया। एक अनुमान के अनुसार जेल में बंदी व्यक्ति पर सालाना पन्द्रह फीसदी खर्चा बढ़ा है। चूंकि जेल और कैदी अब कारपोरेट मुनाफावृद्धि का हिस्सा हैं अतः अब गिरफ्तारियां और सजाएं भी खूब हो रही हैं। जितनी ज्यादा लोगों को गिरफ्तारी और सजा उतना ही ज्यादा मुनाफा। जेल-उद्योग में लगे कारपोरेट घरानों के दबाब के चलते ही अमेरिका की अधिकांश सरकारी जेलों को भी निजी हाथों में सौंप दिया गया है। सन् 1990 के बाद से अमेरिका के तकरीबन सभी राज्यों ने कानून बनाकर सरकारी जेलों को निजी हाथों में सौंप दिया है। विभिन्न जेलों के साथ विभिन्न वस्तुओं की उत्पादक बड़ी कंपनियों का समझौता है और बंदियों के बनाए सामान को ये कंपनियां खरीदकर बाजार में बेचती हैं। अथवा वे अपना माल कैदियों से बनवाते हैं।

सन् 1980 से सन् 2000 के बीच में जेलबंदियों ने तकरीबन 2विलियन डॉलर का सामान बनाया । मसलन् साबुन,कम्प्यूटर पुर्जे,ऑफिस फर्नीचर,गोल्फ वॉल,कपड़े,चटाई आदि बनानेवाले बंदी को 1.10 डॉलर प्रतिघंटे मजदूरी मिलती है। जबकि सामान्य नियम के तौर पर एक मजदूर को जेल के बाहर 10 डॉलर प्रतिघंटा देना होता है। अतः बाहर काम कराना महंगा पड़ता है ,यही वजह है कि कंपनियां बंदियों से सस्ती दर पर काम कराती हैं। यह एक तरह की गुलाम प्रथा है।

अमेरिकी जेलों में सस्ते श्रम को कारपोरेट घराने व्यापक पैमाने पर इस्तेमाल कर रहे और बंदियों से वस्तुतः गुलामों की तरह काम ले रहे हैं,साथ ही इनका सामाजिक जीवन भी दोयमदर्जे के नागरिक जैसा है। शोषण की स्थिति यह है कि एयरलाइंस कंपनियों से लेकर हीरो होण्डा कंपनी तक के कामों में ये बंदी जुटे रहते हैं। एक जमाने में ओहिओ राज्य में ट्रांसवर्ल्ड एयरलाइंस जेल में बंद कैदी को फोन से टिकट बुक करने का 5डॉलर प्रतिघंटा देती थी। इसी तरह हीरो होण्डा अपने एसेम्बली लाइन काम के लिए जेलकैदी को 2.05डॉलर प्रतिघंटा देती थी, इसके खिलाफ मजदूर यूनियनों ने जमकर प्रतिवाद किया था और उसके बाद यह योजना बंद कर दी गयी।

अमेरिकी न्यायप्रणाली की न्यायप्रियता की आमतौर पर मीडिया में बड़ी प्रशंसा की जाती है और उसके अन्यायपूर्ण पहलुओं की अनदेखी की जाती है। अमेरिकी न्यायप्रणाली में गोरी नस्ल का वर्चस्व है और गैर-गौरवर्ण के नागरिकों को आएदिन अन्याय झेलना पड़ता है। अमेरिकी न्याप्रणाली में नस्लभेदीय रूझानों की कभी मीडिया और सार्वजनिक जीवन में चर्चा नजर नहीं आती।अमेरिकी न्यायप्रणाली का लक्ष्य है अफ्रीकी –अमेरिकियों को नियंत्रण में रखना।

पूंजीवादी व्यवस्था की यह सामान्य विशेषता है कि वह जहां पर अपना पैर पसारती है वहीं पर सामाजिक मनुष्य की मौत हो जाती है। एकाकीपन, अलगाव,एकांत,अजनबियत आदि को इतनी जल्दी प्रसार मिलता है कि नागरिक समझ नहीं पाता कि आखिर यह सब कैसे हो रहा है। सामाजिक की मौत ही वह प्रस्थान बिन्दु है जहां से राज्य आसानी से नागरिक पर अपना अधिकार जमा लेता है और शासकवर्ग उसे अपनी विचारधारा के घेरे में ले लेता है। एक अध्ययन के अनुसार अमेरिकी जेलों में बंद अमेरिकी नागरिकों की संख्या विलक्षण रूप से बहुत ज्यादा है। अध्ययन बताता है कि विश्व की 5फीसदी आबादी अमेरिका में रहती है और उसके 25फीसदी लोग जेलों में बंद हैं। जेलबंदियों के मामले में भी अमेरिका का दुनिया में फीसदी और संख्या के लिहाज से सर्वोच्च स्थान है।

अमेरिकी जेलों में बंद लोगों का प्रोफाइल बताता है कि बंदी बनाने के मामले में भी अमेरिका में नस्लभेद है। मसलन् युवा अफ्रीकी-अमेरिकन कैदियों की संख्या गोरे कैदियों की संख्या से ज्यादा है। स्थिति यहां तक खराब है कि जेलखाने गुलामी के लिए पट्टे पर दिए जाते हैं। अमेरिका में यह मिथ प्रचारित है कि काले लोग बलात्कारी होते हैं और गोरी औरतें मानती हैं उनको गुलाम बनाए रखना ,मारदेना और काले लोगों पर सख्त निगरानी आदि जायज हैं।

अमेरिका के नागरिकों की पश्चिमी यूरोप के नागरिकों की तुलना में आय 5 से 8 गुना ज्यादा है। जबकि अहिंसक अपराधों के मामले में अमेरिका में जापान की तुलना में सत्रह गुना ज्यादा अपराध होते हैं। सन् 1970 की तुलना में अमेरिका के राज्यों में अपराधों में 500 गुना इजाफा हुआ है। अपराधों की हालत यह है अहिंसक अपराधों में लंबी सजाएं भोगने वालों की संख्या तेजी से बढ़ी है और जेलों में जगह नहीं है।

मिशेल फूको ने “डिसप्लिन एंड पनिश”( 1975) में विस्तार से यह बात रेखांकित की है कि जेल प्रणाली से अपराधों में कमी नहीं आई है बल्कि अपराधी ज्योंही जमानत पर छूटते थे वे पहला केस खत्म होने के पहले फिर जेल में आ जाते थे।जो लोग जेलों में बंदी हुआ करते थे उनसे काम कराया जाता था और उनको श्रम के गुण और ईमानदारी का पाठ भी पढ़ाया जाता था।

मिशेल फूको ने अपनी किताब में विस्तार के साथ फ्रांसीसी जेलों की दशा और सामाजिक स्थिति का सुंदर वर्णन किया है। जेलप्रणाली के सुधार के वर्षों में जेल में श्रम कराने और उस श्रम से बनी वस्तुओं को बाजार में बेचकर मुनाफा कमाने की परंपरा आरंभ हो गयी थी।अब जेल और फैक्ट्री एक हो गए थे। बेंथम ने विस्तार के साथ इस पहलू पर ध्यान खींचा है।जेरेमी बेंथम ने लिखा है कि जेल और फैक्ट्री दोनों को एकांत में संगठित किया जाता था और दोनों पर अहर्निश नजरदारी रखी जाती थी। इससे व्यक्ति को बांटने और श्रम कराने में मदद मिलती थी। उन दिनों जेलों में कैदियों के सुधार पर कम और उनसे मुनाफे के लिए श्रम ज्यादा कराया जाता था। फलतः इससे कैदी सुधरे कम लेकिन उन्होंने मुनाफा ज्यादा पैदा किया।

बेंथम ने उदार दण्ड प्रणाली का एक तरह से मॉडल पेश किया।जिसमें अपराधी को वैध एकाकी शोषण के लिए तैयार किया जाता था।इसके विपरीत कार्ल मार्क्स ने ’’पवित्र परिवार’’ नामक पुस्तक में लिखा अपराध के लिए एकाकी व्यक्ति को सजा नहीं दी जानी चाहिए बल्कि अपराध के अ-सामाजिक स्रोत को नष्ट किया जाना चाहिए। प्रत्येक व्यक्ति को मनुष्य की तरह विकास करने का अवसर दिया जाना चाहिए।यदि व्यक्ति को वातावरण बनाता है तो वातावरण को मानवीय होना चाहिए। यदि मनुष्य स्वभावतः सामाजिक है तो वह समाज की सही प्रकृति का विकास करेगा। उसकी शक्ति की प्रकृति को एकाकी व्यक्ति के आधार पर नहीं बल्कि समाज की शक्ति के आधार पर परखा जाना चाहिए।कालांतर में पूंजी(भाग-1) में मार्क्स ने लिखा कि अधिकांश अपराधी अति जनसंख्या वाले निचले तबकों से आते हैं और ये वे लोग हैं बेकार हैं।मार्क्स ने यह भी लिखा है कि बेकारों की संख्या जितनी घटती जाती है अपराधियों की समाज में संख्या उसी अनुपात में घटती जाती है। यानी बेकारी घटने का अर्थ है बेकारों की फौज और अपराधियों की संख्या मॆं गिरावट।

मार्क्स ने रेखांकित किया है कि अपराध को व्यक्तिगत की बजाय सामाजिक आधार पर देखा जाना चाहिए।यह एक तरह से वर्चस्वशाली ताकतों के सामाजिक वर्चस्व की अभिव्यक्ति भी है। अपराध को जन्म देने वाली परिस्थितियों को बनाए रखकर वर्चस्वशाली ताकतें अपने सामाजिक-आर्थिक वर्चस्व को बनाए रखती हैं।







मोदी का गरीबप्रेम


भारत में एक विषय है जिस पर मध्यवर्ग से लेकर संसद तक ,नेताओं के बयानों से लेकर सरकारी सर्कुलरों तक अ-गंभीर भाव दिखता है वह है गरीबी। गरीबी की इन सबकी अपनी-अपनी व्याख्याएं और परिभाषाएं हैं।इन सभी व्याख्याओं में गरीबी से जान छुडाने  का भाव है । लेकिन गरीबी पीछा छोडने को तैयार नहीं है। दिलचस्प बात यह है कि इन सबकी गरीबी से लड़ने में कोई दिलचस्पी नहीं है। 

      हाल ही में गुजरात के गरीबभक्त नरेन्द्र मोदी की सरकार का गरीबप्रेम उजागर हुआ है।गुजरात में  गांवों में 324 रुपये और शहर में 501 रुपये से ज्यादा कमाने वालों को गरीब नहीं माना जाता। यानी 11 रुपये रोज कमाने वाला ग्रामीण गरीबी रेखा से ऊपर माना जाता है।  'नई दुनिया' में छपी खबर के मुताबिक गुजरात सरकार के खाद्य-आपूर्ति विभाग की ओर से जारी एक निर्देश में कहा गया है कि शहरी इलाकों में 16 रुपये 80 पैसे रोजाना और ग्रामीण इलाकों में 10 रुपये 80 पैसे रोजाना से कम कमाने वालों को ही बीपीएल कार्ड के योग्य माना जाए। 

कुछ अर्सा  पहले केंद्रीय योजना आयोग अपने गरीबप्रेम को उजागर करते हुए बता चुका था कि देश में शहर में 32 रुपये और गांव में 26 रुपये रोजाना कमाने वाला गरीब नहीं होता। हमारी समझ में यह नहीं आता कि मोदी योजना आयोग के दायरे में रहते हैं या उसके बाहर रहते हैं   ? 
    हम तो यही कहेंगे भारत में रहने वाले सभी गरीब हैं ! यहां अमीर नहीं रहते ! फिर यह अमीर-गरीब की परिभाषा का झंझट ही खत्म हो जाएगा !! या फिर मान लें कि सब अमीर रहते हैं तो गरीब को खोजने के पचड़े से बच जाएंगे !! या फिर यह मान लें कि भारत में रहने वाले सभी नागरिक बीपीएल कार्ड के हकदार हैं ! इसके बाद तो देश में अमीर-गरीब सदभाव के साथ देश में रह सकेंगे!!

शनिवार, 3 मई 2014

बहुलतावाद 'इवेंट' नहीं है नामवरजी !



हिन्दी आलोचना इनदिनों गंभीर संकट से गुजर रही है। विधा के रुप में देखने की बजाय इवेंट के रुप में समीक्षा लिखी जा रही है। आलोचना इवेंट नहीं है।वह समाचार भी नहीं है।आलोचना महिमा मंडन या महोत्सव भी नहीं है कि आलोचक को नायक के रुप में पेश किया जाय। लेकिन फिलहाल आलोचना में यह खेल खूब चल रहा है। आलोचना की धुरी है अवधारणा । लेकिन अधिकांश आलोचकों ने अवधारणा में सोचना और लिखना बंद कर दिया है अथवा आलोचना से तदर्थ रिश्ता बना लिया है। फलतः आलोचना में विभ्रमों की बाढ़ आ गयी है। आत्मज्ञान और कॉमनसेंस के आधार पर ज्यादा लिखा जा रहा है । इस प्रवृति को विश्लेषित करने के मेरे सामने दो अवधारणाएं हैं 'वर्गसंघर्ष' और 'बहुलतावाद' ।

सन् 2001 में नामवर सिंह ने कहा 'कभी-कभी बड़े आलोचक भी आत्मरति के शिकार हो जाते हैं और उनके भी कई अन्धबिन्दु होते हैं।डॉ.रामविलास शर्मा ने सुमित्रानन्दन पन्त पर जो लिखा, वह 'आत्मरति' ही था। इसी प्रकार कार्ल मार्क्स के लिए ' वर्ग संघर्ष' एक ऐसा अंधबिन्दु है ,जिससे परे वे कुछ और देख ही नहीं सके। दुर्भाग्यवश भारत में कई मार्क्सवादियों ने भी उनके 'अन्धबिन्दु' को ज्यों का त्यों उठा लिया। वे मजदूर के शोर में किसान को और वर्ग के शोर में जाति और वर्ण को भूल गए।'
सवाल यह उठता है क्या मार्क्स के यहां 'वर्गसंघर्ष' 'आत्मरति ' या अंधबिन्दु है ? यह सच है हिन्दी आलोचना ने और खासकर प्रगतिशील आलोचना ने जाति और वर्ण के सवाल की घनघोर उपेक्षा की है। दलितों के लेखन की उपेक्षा की है।
लेकिन 'वर्गसंघर्ष' की अवधारणा को समीक्षा में स्थापित करने में एक जमाने में आलोचकों को अतिरिक्त जोर देना पड़ा। उनके लिए यह धारणा नई थी और समीक्षा में इसको कोई मानता नहीं था। मुश्किल यह है कि समीक्षकों ने 'वर्ग संघर्ष' की धारणा को राजनीतिक अर्थशास्त्र को समझे बिना इस्तेमाल किया। जबकि राजनीतिक अर्थशास्त्र के बिना 'वर्ग' और 'वर्गसंघर्ष' को समझा नहीं जा सकता।
मार्क्स के यहां यह 'अंधबिन्दु' नहीं है। इंग्लैंड में किस तरह का पूंजीवादी समाज विकसित हो रहा था और औद्योगिक सभ्यता में किस तरह के अन्तर्विरोध पैदा हो रहे थे उनकी मीमांसा करते हुए वर्ग की अवधारणा सामने आती है। कम्युनिस्ट घोषणापत्र का आरंभ ही वर्गसंघर्ष की धारणा से होता है।
मार्क्स वर्ग और वर्गसंघर्ष के परे किसी भी समाज को नहीं देखते। वर्गों के आगमन के साथ ही वर्गसंघर्ष पैदा होता है ।वर्गीयचेतना का उदय होता है। मार्क्स के लिए 'वर्गसंघर्ष' की धारणा मात्र भाषायी पदबंध नहीं है जिसे मनमाने ढ़ंग से बदला जाय या तोड़मरोड़ कर पेश कर दिया जाय। उनके लिए यह दृष्टिकोण का अंग है। वर्गसंघर्ष की धारणा के बिना मार्क्सवादी विश्वदृष्टिकोण नहीं बनता ।यह सामाजिक परिवर्तन के नियमों का पता करने की कुंजी है।
वर्गीयसमाज है तो वर्गसंघर्ष भी होगा। एक मार्क्सवादी की यह जिम्मेदारी है कि वर्गसंघर्ष के रूपों ,देशज विशिष्टताओं और जटिलताओं की खोज करे। यह दुर्भाग्य की बात है हिन्दी समीक्षा में वर्गसंघर्ष की धारणा का कई समीक्षकों ने यांत्रिक रूप में और बिना समझे इस्तेमाल किया है। जबकि मार्क्स-एंगेल्स के लिए यह एक क्रिएटिव धारणा है वे इसे लेकर किसी भी किस्म की अंतिम राय नहीं देते। यह शोषक-शोषित का संघर्ष मात्र नहीं है बल्कि उसके अनेक आयाम हैं। यह बंद धारणा नहीं है ,बल्कि खुली धारणा है।कालांतर में इससे जुड़े नए रुपों का जन्म हुआ। वर्गसंघर्ष और वर्ग की धारणा में भी बदलाव आया।
दूसरी बात यह है अर्थशास्त्र, राजनीति,दर्शन और कलाओं में वर्गसंघर्ष और वर्गसंबंधों की प्रकृति एक जैसी अभिव्यक्त नहीं होती,मसले भी एक जैसे नहीं होते। नामवर सिंह ने कहा है साहित्य में हाशिया बहुत महत्वपूर्ण होता है। यह बात वर्गसंघर्ष की धारणा पर भी लागू होती है। मार्क्स ने जब वर्गसंघर्ष की धारणा का प्रतिपादन किया था तो उस समय यह हाशिए पर थी ,आज भी हाशिए पर है।
नामवर सिंह अधिकांश समय सिर्फ सवाल उठाते हैं। किसी भी समस्या पर ठहरकर विचार नहीं करते। घटनाओं,वस्तुओं,कृति,कृतिकार आदि के प्रति उनकी चलताऊ टिप्पणियां समीक्षा को हल्का बनाती हैं। इससे 'आलोचना' का 'समाचार' में रुपान्तरण हुआ है। आलोचना सनसनीखेज खबर बनी है। अब लोग आलोचना नहीं पढ़ते बल्कि नामवर ने क्या कहा,यह देखते हैं। इससे आलोचना का खबर में रुपान्तरण हुआ है।
आलोचक का काम सनसनी पैदा करना नहीं है। हिन्दी समीक्षा में 'वर्ग' और 'वर्गसंघर्ष' की अवधारणा का जिन आलोचकों ने जमकर इस्तेमाल किया है वे भारतीय पूंजीवाद की मीमांसा के प्रति उदासीन रहे हैं और कम्युनिस्ट पार्टी के बयानों से ही पूंजीवाद की समझ बनाते रहे हैं। लंबे समय तक कम्युनिस्ट पार्टी के नेताओं की भी भारतीय पूंजीवाद को लेकर कोई सुसंगत समझ नहीं थी। खासकर सन् 1947 के पहले तो एकदम सुसंगत समझ नहीं थी ।आजादी के बाद भी सन् 1970 के बाद ही कुछ गंभीर काम हुआ ।
प्रगतिशील आलोचकों ने अपनी पहल पर न तो कभी पूंजीवाद को जानने की कोशिश की और नहीं कभी राजनीतिक अर्थशास्त्र के साथ वर्गसंघर्ष की धारणा के सर्जनात्मक संबंध को भारत के संदर्भ में विश्लेषित किया । वे सरलीकरणों का इस्तेमाल करते रहे हैं। मसलन्, पूंजीवाद लुटेरी व्यवस्था है । फलतः शोषण, उत्पीडन, असमानता आदि के अलावा वे किसी और चीज को देख ही नहीं पाए। वे पूंजीवाद पर एकायामी नजरिए से विचार करते हैं । जबकि सच यह है पूंजीवाद एक समग्र व्यवस्था है और उसके पास समाज,संस्कृति,राजनीति, जीवनशैली आदि के बारे में गतिशील और रुढ़िबद्धताहीन नजरिया है। इसे संशय और अविश्वास के आधार पर नहीं समझा जा सकता । इकहरे ढ़ंग से या अछूतभाव से पूंजीवाद को समझना मुश्किल है। पूंजीवाद को समझने के लिए सरलीकरणों से बचने की जरुरत है।जो लोग सरलीकरणों में लिख रहे हैं वे ही इसे लेकर संशय और अविश्वास के शिकार भी हैं। संशय और अविश्वास का भाव हमेशा अज्ञान या पल्लवग्राही ज्ञान से पैदा होता है। हिन्दी आलोचक इनदिनों पल्लवग्राही ज्ञान से काम चला रहे हैं। बिना सोचे समझे अधकचरे ढ़ंग से अवधाणाओं का इस्तेमाल कर रहे हैं इससे आलोचना की व्यापक क्षति हुई है। इस संवृत्ति को समझने के लिए एक और उदाहरण देखें।
नामवर सिंह ने लिखा है “ बहुलतावाद सेक्युलर होने की गारंटी नहीं है।इस बहुलतावाद में जातियों और सम्प्रदायों का पदानुक्रम था तथा हर युग में विशेषाधिकार सम्पन्न एक धर्म और सम्प्रदाय का वर्चस्व था। लेकिन बहुलतावाद के बिना सेक्युलर होना संभव नहीं है।”
नामवर सिंह की बहुलतावाद को लेकर बुनियादी समझ ठीक नहीं है। वे बहुलतावाद को सामाजिक संरचनाओं के संदर्भ में देख रहे हैं। यदि बहुलतावाद को सामाजिक संरचनाओं के संदर्भ में देखेंगे तो समाजवाद के बाद भी जातियां रहेंगी और उनके बीच में अंतर भी रहेगा।पदानुक्रम भी रहेगा। इसके अलावा नए किस्म का विशेषाधिकार संपन्नवर्ग के रूप में कम्युनिस्ट पार्टी रहेगी।ऐसा सोवियत संघ में रहा है। रूसी जाति का वर्चस्व वहां सबसे बड़ी इल्लत थी।
भारत में बहुलतावाद सिर्फ जातियों के स्तर पर ही नहीं है बल्कि धर्म ,राजनीति और संस्कृति के स्तर पर भी है। समाज में यह संभव नहीं है कि सामाजिक संरचनाओं में बहुलतावाद हो और कला,राजनीति,धर्म,दर्शन में न हो। सोवियत संघ के पराभव के अनेक कारणों में से एक बड़ा कारण है विचार,राजनीति और कलाओं में कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा बहुलतावाद का खात्मा। वे समाज में बहुलतावाद मानने को तैयार थे लेकिन जीवन के अन्य क्षेत्रों में नहीं । फलतः सोवियत संघ बिखर गया।
बहुलतावाद को मानने का अर्थ है समाज से लेकर कलाओं तक इसकी भूमिका को नए सिरे से परिभाषित करना। हमारे देश में बहुलताबाद हर स्तर पर है लेकिन इसे नए सिरे परिभाषित करने की जरूरत है। संविधान निर्माताओं ने आज से 65 साल पहले बहुलतावाद को भारत की विविधता को परिभाषित करते हुए खोला था।इधर के सालों में बहुलतावाद को लेकर अनेक किस्म के नए सोच भी सामने आए हैं। इनमें नामवर सिंह की भी एक राय है जो एकदम अवैज्ञानिक है। नामवर सिंह की समझ में कई बुनियादी गड़बड़ियां हैं ,वे मानते हैं “बहुलतावाद सेक्युलर होने की गारंटी नहीं है।”
असल में सार्वजनिक जीवन में सेक्युलर सभी धर्मों को समानता का दर्जा देता है । धार्मिक कामकाज में राज्य हस्तक्षेप नहीं करता । राजनीति में धर्म को हस्तक्षेप नहीं करने देता। ठीक बहुलतावाद यही काम करता है वह विभिन्न संस्कृतियों को स्वायत्त सांस्कृतिक परिवेश प्रदान करता है,सांस्कृतिक विकल्पों के लिए स्थान देता है। विभिन्न मान्यताओं और नीतियों को समान स्थान देता है। इच्छानुसार संगठन बनाने की स्वतंत्रता की गारंटी करता है। नागरिक को विकल्प चुनने का मौका देता है। विविध किस्म के अनुभव देता है।
भारत में बहुलतावाद का आधार है उदार पूंजीवाद। इसमें पदानुक्रम और भेदभाव रहेगा । इसके कारण बहुलतावाद में भी भेदभाव ,शोषण , असमानता है। बहुलतावाद की खूबी है कि इसमें आप पुराने और नए ढ़ंग से एक साथ सोच सकते हैं और जी सकते हैं।मसलन् ऐसे लोग भी रहेंगे जो जाति मानते हैं और ऐसे लोग भी रहेंगे जो जाति नहीं मानते। नयी और पुरानी संरचनाओं में अन्तर्विरोध बना रहेगा। इससे मुक्ति संभव नहीं है क्योंकि उदार पूंजीवाद ने हमारे देश में पर्सुएशन के आधार पर अन्तर्विरोधों को हल करने का मार्ग अपनाया है। इस नजरिए से देखें तो भारतीय बहुलतावाद का पश्चिमी बहुलतावाद से गहरा अंतर है। इसी तरह जाति के सवालों को भी पर्सुएशन और समानता के आधार पर हल करने के प्रयास होते रहे हैं।इसीलिए जाति के प्रति नए पुराने दोनों ही रुप सक्रिय हैं।
बहुलतावाद की पश्चिम में धुरी है नए का दबाव और सत्ता की नए के प्रति पक्षधरता।इसके विपरीत भारत में बहुलतावाद की धुरी में दबाव जैसा तत्व नहीं है। यहां पर पर्सुएसन से काम लेते हैं। मसलन् यहां पर अधिकांश लोग आज भी जाति को मानते हैं ,समाज में छोटा तबका है जो जाति को नहीं मानता। संविधान में इन दोनों के लिए स्थान है और पर्सुएशन के आधार पर जाति उन्मूलन के प्रयास किए जा रहे हैं। बहुलतावाद के प्रति दबाव की बजाय पर्सुएशन पर जोर देना वस्तुतःलोकतांत्रिक भाव है।आप भगवान और विज्ञान दोनों को एक साथ मान सकते हैं और ये दोनों समाज में एक साथ रह सकते हैं। समाज में खाप पंचायतें और पंचायतें एक साथ रह सकती हैं। विभिन्न नागरिकों को समान अधिकार हैं,साथ ही अनेक समुदायों के निजी अधिकारों को भी संविधान संरक्षण देता है और उनमें हस्तक्षेप नहीं करता।
सामाजिक समूहों की निजता और सामूहिकता के बीच में पर्सुएशन के आधार पर संतुलन बनाने पर जोर है। विभिन्न जातियों को अपनी मान्यताओं, रीति-रिवाजों, मूल्यों आदि को बरकरार रखने का हक है। संविधान उनसे वंचित नहीं करता। इस समूची प्रक्रिया में उदारतावादी पूंजीवादी मूल्यों का धीमी गति से प्रचार –प्रसार हुआ है । धीमी गति और प्रच्छन्न तरीकों से वैचारिक, सांस्कृतिक और जीवनशैलियों को बदला गया है। मसलन् स्त्रियों के पहनावे में आए रेडीकल परिवर्तनों को देखें।बिना किसी राजाज्ञा के सभी औरतों के वस्त्रों का रुपान्तरण हुआ है,इस रुपान्तरण में विज्ञापन की पर्सुएशन कला की केन्द्रीय भूमिका है।
बहुलतावाद को पूंजीवादी गतिशीलता तब मिलती है जब वह जाति ,संस्कृति या धर्म की सीमाओं का अतिक्रमण करता है। यह अतिक्रमण विभिन्न कारणों से संभव है। कभी यह अतिक्रमण स्वतः होता है,कभी परिस्थितियां अतिक्रमण करने को मजबूर करती हैं ,कभी राज्य की नीतियों के कारण होता है और कभी जीवनशैली में आए बदलाव के कारण होता है। बहुलतावाद को यदि जड़ या स्थिर केटेगरी मानेंगे तो स्थितियां समझ में नहीं आएंगी।
मसलन् धर्म में मौजूद वैविध्य और उसकी सामाजिक भूमिका में भी बदलाव आया है। धर्म को संविधान के पैरामीटर के दायरे में रहकर काम करना होता है।जातियों को भी संविधान की लक्ष्मण रेखा माननी होती है।पूर्व-आधुनिक व्यवस्थाओं में बहुलतावाद था लेकिन उसका नियामक और नियमित करने वाला साझा आधार नहीं था। पूंजीवादी उत्पादन संबंधों और पूंजीवादी राज्य व्यवस्था आने के साथ संविधान के पैरामीटर के आधार पर बहुलतावाद को व्याख्यायित किया गया।
संविधान ने समानता और व्यक्ति की स्वतंत्रता को आधार बनाकर बहुलतावाद और धर्मनिरपेक्षता दोनों की व्याख्या की है और इन दोनों को लोकतंत्र का अपरिहार्य अंग माना है। आधुनिक पूंजीवादी राज्य के उदय के पहले भी धार्मिक-सांस्कृतिक और सामाजिक बहुलतावाद था लेकिन उसको कभी व्यक्ति की स्वतंत्रता और समानता के आधार नहीं देखा गया। व्यक्ति की स्वतंत्रता और समानता के आधार पर देखने की परंपरा पूंजीवादी राज्य व्यवस्था के आगमन के साथ आरंभ हुई।
इस प्रसंग में समाजवाद की भी मुश्किलें सामने आई हैं। वहां समानता तो है लेकिन व्यक्ति स्वतंत्रता नहीं है। फलतः बहुलतावाद को समाजवाद में सत्ता के दमन और दबाव का सामना करना पड़ा।
बहुलतावाद और धर्मनिरपेक्षता के लिए समानता ही काफी नहीं है बल्कि व्यक्ति की स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की आजादी भी चाहिए। धर्मनिरपेक्षता यदि इन दोनों के बिना होगी तो उसके अधिनायकवाद या सर्वसत्तावाद में तब्दील हो जाने की संभावनाएं हैं। धर्मनिरपेक्षता को प्रभावी होना है तो उसे व्यक्ति की स्वतंत्रता ,समानता और अभिव्यक्ति की आजादी को आधार बनाना होगा। खाली समानता और न्याय के आधार पर परिभाषित धर्मनिरपेक्षता वस्तुतः अधिनायकवादी धर्मनिरपेक्ष राज्य को जन्म देती है।यही वजह है कि आपातकाल में भारत के संविधान के आमुख में धर्मनिरपेक्ष और समाजवाद पदबंध जोडे गए। यह वह दौर था जब राजनीतिक बहुलतावाद को अस्वीकार किया गया।
समाज में सामाजिक-धार्मिक-सांस्कृतिक बहुलतावाद रहे इसके लिए यह जरूरी है कि राजनीतिक बहुलतावाद भी रहे। समानता और न्याय पर आधारित धर्मनिरपेक्षता में राजनीतिक बहुलतावाद के खत्म कर दिए जाने की संभावनाएं हैं। आपातकालीन भारतीय अनुभव और समाजवादी देशों का अनुभव इस धारणा को पुष्ट करता है। अतःधर्मनिरपेक्षता के लिए समानता और न्याय ही काफी नहीं है इसके साथ व्यक्ति की स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की आजादी भी जरूरी है। इससे राजनीतिक बहुलतावाद और लोकतंत्र को बचाए रखने में मदद मिलती है, पर्सुएशन से दिल जीतने वाली नीति के लिए भी वातावरण बनाने में मदद मिलती है।
समाजवाद ,सर्वसत्तावाद या अधिनायकवादी शासन व्यवस्थाएं धर्मनिरपेक्षता को तो मानती हैं लेकिन व्यक्ति की स्वतंत्रता ,अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और पर्सुएशन की नीति को नहीं मानते। दबाब और वर्चस्व की नीति बहुलतावाद का निषेध है। उदार पूंजीवाद में पर्सुएशन एक बड़ा उपकरण है जिसके जरिए आधुनिकीकरण की प्रक्रिया संपन्न होती है। बहुलतावाद को उन समाजों में क्षति पहुँची है जहां दबाव की राजनीति रही है।
भारत का संविधान सभी जातियों और धर्मों के मानने वालों की प्राइवेसी मानता है और निजी संस्कारों की सुरक्षा की गारंटी देता है । संविधान में विभिन्न समुदायों के निजी कानूनों को भी मान्यता दी गयी है।
सरकार निजी मान्यताओं, मूल्यों और संस्कारों में तब तक हस्तक्षेप नहीं कर सकती जब तक कोई शिकायत न करे।शिकायत करने पर समस्या का समाधान संविधान सम्मत आधार पर होता है। यहां तक कि सरकार पुरानी सड़ी-गली रीतियों और रिवाजों के मामले में भी हस्तक्षेप नहीं कर सकती। पूंजीवादी राज्य का यह लिबरल रूप समाज के तानेबाने को पर्सुएशन के आधार पर बदलने में विश्वास करता है। राज्य चाहे तो जबर्दस्ती कर सकता है लेकिन उससे राज्य का लिबरल ढांचा बुरी तरह प्रभावित हो सकता है। यहां तक कि सड़ी गली मान्यताओं और कुरीतियों के खिलाफ जन आक्रोश जब व्यक्त होता है या उनके खिलाफ कोई नागरिक शिकायत करता है तो राज्य सक्रिय होता है।
नामवर सिंह जिस आधार पर सेक्युलरिज्म को परिभाषित करते हैं उनको यही लगता है कि अभी भारतीय समाज में सेक्युलरिज्म को 'वर्क-आउट' करना बाकी है। सच यह है भारतीय संदर्भों में धर्मनिरपेक्षता संवैधानिक तौर पर परिभाषित है और राज्य कमोवेश उसका पालन कर रहा है। लेकिन राजनीतिकदलों के आचरण में इसका अभाव है।
नामवर सिंह की यह चिन्ता जायज है कि “केवल राज्य के सेक्युलर होने से हमारा काम नहीं चल सकता,समाज को सेक्युलर होना पड़ेगा।” सवाल यह है इसके लिए क्या करें ? इसकी कोई परिकल्पना नामवर सिंह नहीं देते।
सवाल यह है धर्मनिरपेक्ष समाज की परिकल्पना क्या है ? क्या मानवाधिकारों को दरकिनार करके धर्मनिरपेक्ष समाज संभव है ?मानवाधिकारों की चेतना और उनके आधार पर विभिन्न स्तरों पर संगठनों का निर्माण ही धर्मनिरपेक्ष समाज को पुख्ता बना सकता है। हमें शीतयुद्ध और समाजवाद के नजरिए से बाहर निकलकर धर्मनिरपेक्षता,वर्गसंघर्ष और बहुलतावाद के बारे में सोचना चाहिए।


















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