शुक्रवार, 13 जून 2014

घर के बंधनों से मुक्त औरत की तलाश में

        औरतों के पक्ष में फेसबुक पर लिखते ही अनेक मित्र हैं जो यह कहने लगते हैं कि भाई साहब ! शैतान औरतों का भी ख्याल कीजिए। उन मर्दों का भी ख्याल कीजिए जो औरतों के लगाए मिथ्या आरोपों के शिकार होते हैं। सच है कि समाज में ऐसी औरतें भी हैं जो दुष्ट हैं और परेशान करती हैं लेकिन इनसे भी हजारगुना ज्यादा संख्या उन औरतों की है जो सचमुच में पीडित हैं, दमन की शिकार हैं और अधिकारहीन अवस्था में जी रही हैं।

संविधान में समानता के अधिकार के बावजूद वे अधिकारहीन हैं। इन अधिकारहीन औरतों पर ही पुरुषों के हमले सबसे ज्यादा हो रहे हैं। लोग सोचते हैं कि औरतें घर में रहती हैं तो सबसे ज्यादा सुरक्षित हैं लेकिन सच यह है कि वे घर में सबसे ज्यादा असुरक्षित हैं।

अधिकांश औरतें आज भी पुरुष जगत के अंतर्गत ही जिंदगी जी रही है। वे हर समय पुरुष के पूरक की तरह सेवा करती रहती हैं। वे जहां एक ओर पुरुष के पूरक की तरह काम करती हैं वहीं दूसरी ओर उसे चुनौती भी देती हैं। इस विरोधाभासी स्थिति के कारण ही वे समाज में अपनी जगह बनाती हैं। औरत बचपन से यही सीखकर बड़ी होती है कि औरत को पुरुषों की बातें माननी चाहिए फिर कालान्तर में इसी धारणा से वह मुठभेड़ करती है।

औरत की समूची संरचना इस कदर बनी होती है कि वह आलोचना,जाँच-पड़ताल आदि से बचती है। वह पुरुष के मूल्यांकन और राय की आराधना करती है। वह पुरुष को रहस्यमय मूर्ति की तरह देखती है। स्त्री की दृष्टि में शक्ति ही महान है इसलिए वह पुरुष की शक्तिशाली के रुप में पूजा करती है।

स्त्री में अनुकूलन की प्रबल प्रवृति होती है । सीमोन के शब्दों में कहें तो पुनर्निर्माण और विध्वंस उसका सहज स्वभाव नहीं है। वह विद्रोह की अपेक्षा समझौते पसंद करती है। चूंकि स्त्री को घर-परिवार की चौखट से बाँध दिया गया है फलतः वह उसी में रमण करती रहती हैं ऐसी स्थिति से लोकमंगल और स्वतंत्रता के बारे में उससे सकारात्मक पहल की उम्मीद कम ही करें।घर के बंधनों से उसे मुक्त करो वह स्वतंत्रता और लोकमंगल के सवालों पर सक्रिय मिलेगी।



स्त्री को समर्थ बनाने के लिए उसे घर से बाहर निकालना जरुरी है। उसको सार्वजनिक तौर पर विभिन्न सवालों पर बोलना चाहिए। स्त्री के लिए अस्पृश्यता के सभी दायरों तोड़ने की जरुरत है ।औरत सुरक्षित रहे,आत्मनिर्भर बने और मानवीय जीवन जिए इसके लिए उसके अंदर स्वतंत्रता का बोध पैदा करने की जरुरत है ।

बुधवार, 11 जून 2014

सभ्यता से डरे हम लोग


      हमारे देश में लोग बदमाश से नहीं डरते ।बल्कि बदमाशों के साथ रहते हैं। दंगाई से नफरत नहीं करते बल्कि उसको वोट देते हैं और पूजा करते हैं। हमारे देश में पत्थर की मूर्तियों से दूर नहीं रहते बल्कि उनकी रोज पूजा करते हैं। उनको घर में रखते हैं।सम्मान करते हैं। हमारे देश में लोग जिस चीज से डरते हैं वह है सभ्यता।

सभ्यता और सभ्य आदमी से लोग डरते हैं। सभ्य को मित्र नहीं बनाते असभ्य को मित्र बनाते हैं। ईमानदार से दूर रहते हैं,धूर्त-चालाक और बेईमान के साथ गलबहियां देकर रहते हैं। औरत के साथ विवाह करते हैं,बेटी की तरह पैदा करते हैं,माँ की तरह मानते हैं, लेकिन औरतों के साथ सबसे ज्यादा हिंसाचार करते हैं। हिंसा और असभ्यता के माहौल को हमारे देखकर यही महसूस होता है कि हमारे देश में सभ्य होना गाली है !

सवाल यह है सभ्य से हम क्यों दामन छुडाना चाहते हैं ? सभ्य होना क्या बुरी बात है ? सभ्य क्या सक्षम नहीं होते ? फेसबुक और सामाजिक जीवन में असभ्यता का जो वैभव दिखाई देता है वह बार बार यही संदेश देता है कि सभ्य होना सही नहीं है! असभ्य रहो,मजे में रहो!

सभ्यता की मांग है कि विवेकवाद अर्जित करें। हमारे यहां उल्टी हवा चल रही है। इरेशनल या विवेकहीन बातों को तवज्जह दी जाती है। नॉनशेंस की पूजा की जाती है। इरेशनल से बड़ा असभ्यता का कोई रुप नहीं है। हम भारतवासी जितनी ऊर्जा नॉनसेंस चीजों पर खर्च करते हैं उसका आधा वक्त भी विवेकवादी और सभ्य चीजों पर खर्च करें तो भारत सोने की चिडिया हो जाय।

फिलहाल स्थिति यह है किभारत में चिडियाएं भी रहना पसंद नहीं करतीं, वे भी कम हो रही हैं। मौसम बिगडा हुआ है। हम हैं कि विवेक से काम लेने की बजायभगवान की कृपा का इंतजार कर रहे हैं। प्रकृति और पर्यावरण के साथ विवेकपूर्ण संबंध बनाएं तो चीजें सुधर सकती हैं। हमने प्रकृति और पर्यावरण के साथ विवेकपूर्ण संबंध नहीं बनाया है बल्कि केजुअल संबंध बनाया है। उपभोग का संबंध बनाया है।

हम कितने सभ्य हैं और कितने असभ्य हैं ? इसका कोई सटीक मानक बनाना तो संभव नहीं है लेकिन यह तय है कि सभ्यता वंशानुगत नहीं होती,उसे अर्जित करना पड़ताहै। हमारी मानसिकता यह है कि हम अर्जित करने के लिए श्रम नहीं करना चाहते। हम चाहते हैं कि कोई ऐसा फार्मूला हो जो हमें घर बैठे सभ्य बना दे। हमें यह भी सिखाया गया है कि फलां-फलां वस्तुएं घर में हों तो सभ्यता घर में दाखिल हो जाती है। वस्तुएं के जरिए सभ्य कहलाने की आशा मृगतृष्णा है।

वस्तुएं सभ्य नहीं बनातीं। सभ्य बनने के लिए पहली शर्त है कि हम यह मानें कि निज को बदलेंगे और सचेत रुप से बदलेंगे। सभ्य वह है जो निज को और अन्य को प्यार करना जानता है।जिसके मन में अन्य के लिए जगह नहीं है वह सभ्य नहीं हो सकता। जब तक आप निजी जंजालों में फंसे रहेंगे सभ्य नहीं बन सकते। निजी जंजालों के बाहर निकलकर सामाजिक होने, अन्य के प्रति निजी सरोकारों को व्यक्त करने से सभ्यता का विकास होता है।अपने लिए न पढ़कर,देश के लिए पढ़ना, अपने लिए न लिखकर अन्य के मसलों और जीवन की समस्याओं पर लिखना, हर क्षण अन्य की चिन्ताओं को अपनी चिन्ताएं बनाने से सभ्यता का विकास होता है।

सभ्य बनने के लिए अपने से बाहर निकलकर झांकने की कला विकसित करनी चाहिए। निहित-स्वार्थों में डूबे रहना और अनालोचनात्मक ढ़ंग से चीजों, वस्तुओं,व्यक्तियों और विचारों को देखने से सभ्यता का विकास बाधित होता है।



सभ्यता के विकास के लिए जरुरी है कि हम चीजों को व्यापक फलक पर रखकर देखने का नजरिया विकसित करें। सभ्य वह है जिसके पास व्यापक फलक में रखकर देखने का नजरिया है। आप जितना व्यापक फलक रखकर देखेंगे वस्तुएं,घटनाएं आदि उतनी ही साफ नजर आएंगी। हम बौने क्यों हो गए क्योंकि हमने दुनिया को देखने का फलक छोटा कर लिया। हम अनुदार क्यों हुए क्यों कि हमारी समझ निजी दृष्टि से आगे बढ़ नहीं पायी। हमें निजी दृष्टिकोण की नहीं विश्वदृष्टिकोण की जरुरत है।सभ्यता हमें विश्व दृष्टिकोण से देखने के लिए प्रेरित करती है। विश्व दृष्टिकोण के आधार पर देखने के कारण हम अनेक किस्म की सीमाओं और कट्टरताओं से सहज ही मुक्त हो सकते हैं।

सोमवार, 9 जून 2014

माकपा की इमेज दांव पर

          माकपा इस समय सबसे गहरे संकट में है। जिस तरह का संकट फिलहाल माकपा के सामने है वैसा उसने पहले कभी महसूस नहीं किया। खासकर प्रकाश कारात को महासचिव बनाए जाने के बाद से माकपा को आम जनता में साख के संकट से गुजरना पड़ रहा है। माकपा की साख में बट्टा लगा है और उसके लिए माकपा सामूहिक तौर पर जिम्मेदार है।

माकपा के साधारण सदस्यों को आज जितनी जिल्लत आम लोगों में झेलनी पड़ रही है उतनी पहले कभी नहीं झेलनी पड़ी । माकपा पर पहले कईबार राजनीतिक हमले हुए हैं लेकिन एक संघर्षशील दल के रुप में उसकी साख बनी रही। लेकिन प्रकाश कारात की लीडरशिप में माकपा की संघर्षशील दल की इमेज पूरी तरह खत्म हो गयी है। यह संयोग है कि यूपीए-1 सरकार के अंतिम साल में कांग्रेस के साथ जो मुठभेड़ हुई उसमें माकपा को मनमोहन सिंह पूरी तरह बर्बाद करने में सफल रहे।

एक जमाना था माकपा को मजदूरों-किसानों की जंगजू पार्टी के रुप में लोग जानते थे लेकिन इनदिनों उसकी यह इमेज गायब हो चुकी है। त्रासद बात यह है कि माकपा का नेतृत्व इस चीज से वाकिफ होते हुए भी कोई सटीक कदम नहीं उठा पा रहा है। बार बार स्टीरियोटाइप बातें मीटिंगों में कही जा रही हैं, रिव्यू में कही जा रही हैं। माकपा जिस संकट में है उसमें पार्टी की स्टीरियोटाइप बातें मदद नहीं करेंगी और नहीं स्टीरियोटाइप लोग ही मदद कर पाएंगे। माकपा के सामने आज इमेज का संकट है,साख का संकट है।

माकपा की इमेज को हाल के लोकसभा चुनाव में सबसे बड़ा झटका इस बात से लगा है कि इस पार्टी के समर्थकों का एक हिस्सा खुलेआम मोदीलहर की भेंट चढ़ चुका है और अभी जो समर्थक हैं वे भविष्य में पार्टी के साथ रहेंगे इस पर भी संदेह है।

माकपा की इमेज को जो संकट पैदा हुआ है उसका प्रधान कारण है माकपा नेतृत्व का नयी पूंजीवादी वास्तविकताओं के अनुरुप वैकल्पिक यथार्थवादी लोकतांत्रिक कार्यप्रणाली का विकास न कर पाना। साथ ही व्यवहारवादी राजनीति में प्रभावशाली न हो पाना।

माकपा के नेतृत्व को सोचना होगा कि नयी पार्टी कैसे बनाएं। माकपा का अभी जो ढ़ांचा है वह एकसिरे से अप्रासंगिक हो चुका है। उसमें कोई पारदर्शिता नहीं है। पार्टी के नाम पर बंद कोठरियां हैं जिनमें बैठकर पार्टी कैडर और नेता काम करते हैं। पार्टी कैसे खुले में काम करे और पार्टी सदस्य किस तरह खुलेरुप में आम जनता में काम करें,बोलें,रीयलटाइम में हस्तक्षेप करें,कैसे आम लोगों से लिबरल धरातल पर मिलें और संवाद करें,किस तरह पार्टी सदस्य और नेता अपने को लोकतांत्रिक बनाएं आदि समस्याओं पर खुले में बहस चलानी होगी। माकपा को एक क्रांतिकारी और लिबरल दोनों के बीच में संतुलन से काम करने की आदत डालनी होगी। कार्यक्रम क्रांतिकारी हो, लेकिन आचार-व्यवहार और संवाद लिबरल हो। लक्ष्य क्रांति हो लेकिन लिबरल मार्ग पर चलकर किस तरह आम जनता का दिल जीतें,सदस्यों,पूर्व सदस्यों और गैर पार्टी जनता से कैसे संबंध बनाएं इस पर पुराने फ्रेमवर्क के बाहर निकलना होगा।

माकपा का पुराना फ्रेमवर्क कंजरवेटिव है। अनुदार है। इसमें संवाद,विवाद एकतरफा होता है। इसमें नेता कहते हैं और कार्यकर्ता अनुकरण करते हैं। नेता सोचते हैं और जनता दर्शक रहती है,कैडर गूंगा अनुयायी होता है। इंटरनेट युग में इस तरह का इकतरफा ढांचा पार्टी को संवादहीन मशीन बना देता है। पार्टी मेम्बर रोबोट की तरह काम करते हैं,रोबोट की तरह बोलते हैं और रोबोट की तरह दैनंदिन जीवन में आम लोगों से व्यवहार करते हैं। पश्चिम बंगाल में तो 34 साल के वाम शासन में स्थितियां बेहद त्रासद और पीडादायक दशा में पहुँच गयी थीं।

माकपा के अनुदार ढांचे के कारण पश्चिम बंगाल में चमचे और दलालवर्ग की पार्टी में हैसियत बढ़ गयी, पार्टी का विभिन्न स्तरों पर अपराधीकरण हुआ।समूचा पार्टी तंत्र कमोबेश इनलोगों के हाथों बंधक है।

पार्टी की सारी सद-इच्छाएं बेकार हैं यदि वह पार्टी का आंतरिक और बाहरी तंत्र नहीं बदलती। माकपा के पार्टी तंत्र में नेता के अलावा सब चुप रहते हैं। नेता की मनोदशा पूरी तरह अ-लोकतांत्रिक रही है। नेता किसी भी स्तर पर लोकतंत्र का सम्मान नहीं करते और न लोकतांत्रिक नजरिए को सम्मान की नजर से देखते हैं। इसका सीधे असर यह हुआ कि आम जनता में जहां पर माकपा का असर रहा है वहां पर भी कंजरवेटिव तत्व या असामाजिक तत्व बेहद ताकतवर बन गए और अब वे और भी ज्यादा अनुदारवाद और अपराधीकरण की मांग करने लगे या और भी ज्यादा अनुदारदलों और अपराधी तत्वों की ओर जा रहे हैं।

ध्यान रहे लोकतंत्र में कंजरवेटिव भावबोध का जितना प्रचार करेंगे अनुदारवाद बढ़ेगा। आमलोगों को लिबरल बनाना हमारा लक्ष्य होना चाहिए। लेकिन माकपा ने क्रांति और पार्टी के नाम पर जो ढ़ांचा और व्यवहार आम जनता में विकसित किया उसने उदारवाद की बजाय अनुदारवाद को ज्यादा पुख्ता बनाया। हमारे इर्दगिर्द जो अनुदारवादी लहर दक्षिणपंथ के नाम पर दिखाई दे रही है उसे निर्मित करने में माकपा के अनुदारवादी रवैय्ये की भी भूमिका रही है। वामपंथी अनुदारवाद की कमजोरी है वह दक्षिणपंथी अनुदारवाद की लहर के सामने टिक नहीं पाता।

माकपा सुधरे इसकी पहली शर्त है कि वह सभी किस्म के अनुदारवाद के खिलाफ पार्टी के अंदर और बाहर जमकर संघर्ष करे। नेताओं-कैडर आदि को खुलकर बोलने, संवाद करने और लोकतंत्र का सम्मान करने की शिक्षा दे। लोकतंत्र का सम्मान और लोकतांत्रिक आचरण को विकसित किए बिना यह संभव नहीं है।

इंटरनेट युग में माकपा ने यदि जल्द ही अपने को पुराने फ्रेमवर्क से बाहर नहीं निकाला तो उसके सामने अप्रासंगिकता का खतरा पैदा हो जाएगा। लोकसभा चुनाव परिणाम बताते हैं कि केरल और पश्चिम बंगाल में माकपा का जनाधार तेजी से खिसक रहा है और उसके वोटर भाजपा की ओर भाग रहे हैं। जनता जब एकबार साथ छोड़ देती है तो वापस विश्वास जीतना कठिन होता है। यही वजह है कि समूचे उत्तर भारत में माकपा नदारत है। उत्तरभारत में माकपा या वाम के केन्द्र खत्म हो गए हैं। अब केरल-पश्चिम बंगाल की बारी है।



रविवार, 8 जून 2014

मोदी सरकार के हिन्दीप्रेम के खतरे और सीमाएं

       लेखकों-बुद्धिजीवियों में एक बड़ा तबका है जो हिन्दी के नाम पर सरकारी मलाई खाता रहा है। इनमें वे लोग भी हैं जो कहने को वाम हैं,इनमें वे भी हैं जो सोशलिस्ट हैं,ये सब मोदी के हिन्दीप्रेम के बहाने सरकारी मलाई के आनंद-विनोद में' मोदी ही हिन्दी है और हिन्दी ही मोदी है' ,कहकर मोदी के हिन्दीराग में शामिल होने जा रहे हैं।

सब जानते हैं कि मोदी को हिन्दी से कोई लगाव नहीं है। संघ को भी हिन्दी से कोई खास लेना-देना नहीं है। अधिकांश समर्थ संघियों के बच्चे कान्वेंट स्कूलों में पढ़ने जाते हैं। संघ और उनके नेताओं के लिए हिन्दी का जनता के सामने प्रतीकात्मक महत्व है। हिन्दी उनके हिन्दू राष्ट्रवाद के पैकेज का हिस्सा है। अब इस राष्ट्रवाद को विकास के नाम से बेचा जारहा है। यहां सोवियत अनुभव को समझने की जरुरत है।

सोवियत संघ आज अनेक देशों में विभाजित हो चुका है। इस विभाजन के अनेक कारणों की चर्चा हुई है। लेकिन एक कारण की ओर कम ध्यान गया है। सोवियत संघ में स्टालिन के जमाने में समूचे देश में रुसी भाषा कोअन्य जातियों पर थोपा गया और अन्य जातीय भाषाओं की उपेक्षा की गयी। इसके कारण अंदर ही अंदर भाषायी तनाव बना रहा। हमारे बहुत सारे विचारक यह मान रहे थे कि सोवियत संघ में जातीय समस्या हल कर ली गयी है। लेकिन असल में रुसीभाषा को सभी जातीयताओं पर थोपकर जो क्षति अन्य भाषाओं की हुई उसकी ओर किसी का ध्यान नहीं गया। भारत में आजादी मिलने के बाद यह समस्या सामने आई कि देश किस भाषा में काम करे और केन्द्र किस भाषा में काम करे। इसका समाधान त्रिभाषा फार्मूले के आधार पर निकाला गया। मोदी सरकार यदि त्रिभाषा फार्मूले को नहीं मानती है तो उसे पहले संसद में जाकर त्रिभाषा फार्मूले का विकल्प पेश करके पास कराके लाना चाहिए।

नए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने दफ्तर के सभी काम हिन्दी में करने का फैसला लिया है। यह हिंदीप्रेमी के नाते स्वागतयोग्य कदम है। लेकिन इसके राजनीतिक परिणामों पर भी हमें नजर रखनी होगी। रुसीभाषा के दुष्परिणामों को सोवियत संघ भोग चुका है और कई देशों में विभाजित हो चुका है। प्रधानमंत्री कार्यालय के कामकाज की हिन्दी यदि मुख्यभाषा होगी तो फिर देश की अन्यभाषाओं का क्या होगा ?उन गैर हिंदीभाषाओं का क्या होगा जिनके लोगों ने भाजपा और उनके सहयोगियों को वोट दिया है?

सवाल यह है कि प्रधानमंत्री कार्यालय में हिन्दी में कामकाज पर मुख्यबल देने के पीछे राजनीतिक मकसद क्या है ? प्रधानमंत्री कार्यालय कोई व्यक्तिगत दफ्तर नहीं है। यह मोदीजी का निजी दफ्तर भी नहीं है। यह प्रधानमंत्री कार्यालय है। किस भाषा में काम होगा या होना चाहिए यह प्रचार की नहीं व्यवहार की चीज है।नीति की चीज है। यदि हिन्दी में काम होता है तो यह जरुरी है कि गैर हिन्दीभाषी राज्यों के साथ प्रधानमंत्री का पत्राचार उनकी भाषा में ही हो। सिर्फ हिंदी में नहीं।

मसलन् प्रधानमंत्री की कोई चिट्ठी आंध्र या तमिलनाडु के मुख्यमंत्री को भेजी जानी है तो वह संबंधित मुख्यमंत्रियों की भाषा में जाए तब तो भाषाओं के बीच में समानता पैदा होगी। लेकिन यदि पत्र हिंदी में जाएगा तो तनाव पैदा होगा। देश में विभाजन के स्वर मुखर होंगे। फिलहाल मीडिया में जिस तरह प्रधानमंत्री कार्यालय की कामकाजी भाषा हिंदी किए जाने की खबरें जारी की गयी हैं उसमें बहुसंख्यकवाद के भाषायी मॉडल के लक्षण अभिव्यंजित हो रहे हैं। बहुसंख्यकवाद और हिंदी एक-दूसरे के सहज ही जुडवां भाई भी बन जाते हैं और वह सहज ही अपने आप में विभाजनकारी दिशा ग्रहण कर सकते हैं।हम चाहते हैं कि मोदी सरकार पहले यह तय करे कि वह त्रिभाषा फार्मूले को मानती है या नहीं,भाजपा के चुनाव घोषणापत्र में इस बावत कुछ भी साफ नहीं है। मोदी सरकार यदि त्रिभाषानीति को नहीं मानती तो नया विकल्प सुझाए देश में आम राय बनाए।

मोदीभक्त प्रतीकों और उन्मादी तर्कों के जरिए हिन्दी भाषा को लेकर सतही बहसों को उछाल रहे हैं। हिन्दी पर बातें विद्वानों के आप्तवचनों के जरिए न करके व्यवहार में देखकर करें।मोदीभक्त नेट पर भाषा के सवाल को नेता की अभिव्यक्ति की भाषा का सवाल बनाकर पेश कर रहे हैं।

भाषा का सवाल नेता की अभिव्यक्ति का सवाल नहीं है। भाषा हमारे सामाजिक जीवन की प्राणवायु है।नेता किस भाषा में बोलते हैं, आईएएस किस भाषा में बोलते हैं, इससे भाषा समृद्ध नहीं होती। भाषा समृद्ध होती है तब जब उसकी शिक्षा लेते हैं। हिन्दी की दशा सबसे ज्यादा हिन्दीभाषी राज्यों में खराब है।सबसे खराब ढांचा है शिक्षा-दीक्षा का।

देश को कौन चला रहा है ? व्यापारी या बाजार की शक्तियां चला रही हैं या केन्द्र सरकार ? कमाल के तर्कशास्त्री हिंदी में ।वे मोदी से हिंदी के उत्थान की उम्मीद कर रहे हैं।

मित्रो !पहले देश के व्यापारियों को खासकर हिन्दी व्यापारियों को हिन्दी में व्यापार के खाते-बही लिखने के लिए राजी करलो। इन व्यापारियों में बहुत बड़ा हिस्सा भाजपा का लंबे समय से वोटर भी है।

हिन्दी राष्ट्रोन्माद पैदा करने की भाषा नहीं है। यह दैनंदिन जीवन की भाषा है। लेकिन हिन्दीभाषी व्यापारी लंबे समय से हिन्दी में काम करना बंद कर चुके हैं। कब से उन लोगों ने हिन्दी में काम करना बंद किया यह पता करें। क्यों बंद किया यह भी पता करें। हिंदी का सबसे पहले बाजार की शक्तियों के बीच में व्यवहार होना चाहिए। व्यापारी के कामकाज में व्यवहार होना चाहिए। पता करें जिस दुकान से सामान खरीद रहे हैं उसका बिल किस भाषा में है ?

सवाल यह है व्यापारियों ने अपनी भाषा में काम करना क्यों बंद कर दिया? कारपोरेट घराने नौकरी के लिए देशजभाषाओं की उपेक्षा क्यों करते हैं ? क्या यहां पर देशभक्ति की मांग करना नाजायज है?

ध्यान रहे पूंजीवाद भाषाओं का शत्रु है। पूंजीपतिवर्ग का देशज भाषाओं के साथ बैर है।ऐसे में कारपोरेट घरानों के नुमाइंदे चाहे मोदी हों या मनमोहन हों, इनसे देशजभाषाओं की रक्षा की उम्मीद करना बेमानी है। भाषा उनके लिए प्रतीकात्मक कम्युनिकेशन से ज्यादा महत्व नहीं रखती।

मेरा बचपनः गंगा दशहरा और पतंगें

        आज गंगा दशहरा है । दशहरा आते ही तरुणाई के दिन याद आते हैं। तरुणाई इसलिए भी याद आती है क्योंकि सारे दिन पतंगें उडाया करते थे। दशहरा आने के तकरीबन डेढ़ माह पहले से ही पतंगों का दौर शुरु हो जाता था। मथुरा में अपने जीवन के सबसे सुंदर और आनंद भरे दिन वे ही थे जो तरुणाई के दिन थे। 15 साल की उम्र से लेकर 20साल के बीच के पांच साल बहुत ही आनंद के थे।

मथुरा में शायद ही कोई पतंग बेचने वाला हो जिससे पतंग,माजा और सादा डोर की बडी मात्रा में खरीद न की हो। पतंगबाजी के चक्कर में सभी बेहतरीन पतंगबाजों और पतंग का सामान बेचने वाले मुश्लिम दुकानदारों के साथ मित्रता हो गयी। यह उम्र इसलिए भी याद आती है क्योंकि पतंगबाजी का सारा खर्चा माँ और दादी वहन करती थी।

गंगा दशहरे के दिन सुबह पांच बजे से पतंगों के पेच शुरु हो जाते थे और वे सारे दिन चलते थे। कमाल की गर्मी सहन करने की क्षमता थी उन दिनों। सारे दिन छत पर तपती दोपहरी में पतंगों में व्यस्त रहता था। हर छत पर मित्रगण पतंगें उडाते और हंगामा करते थे।

पतंगों का शौक बेहद सर्जनात्मक शौक है। इधर के युवाओं में इस शौक का ह्रास हुआ है। लेकिन हमलोगों के जमाने में तरुणों का यह सबसे बढ़िया पासटाइम शौक हुआ करता था। सारी गर्मी और बरसात का सीजन पतंगों में व्यस्त रहते थे।

पतंगें हमें कल्पनाशील बनाती हैं और मन को निर्विकार भी बनाती हैं। पतंगबाजी में मशगूल तमाम मित्रों को मैंने कुण्ठारहित और आनंद में देखा है। यह ऐसा शौक है जो सदियों से चला आ रहा है। जो लोग युवाओं के लिए क्रिएटिव क्षेत्र खोजते रहते हैं उनके लिए यह बेहतरीन विकल्प हो सकता है।

पतंगें हमारी प्रतिस्पर्धा की क्षमता को शमित करती हैं। वहां पाना महत्वपूर्ण नहीं खोना महत्वपूर्ण है। पतंगबाजी में पेच लडाना महत्वपूर्ण है। पतंग किसी न किसी की तो कटेगी। पतंगबाजी में भी पतंग और डोर लूटने का मजा ही कुछ और है।

मार्च से जुलाई तक पतंगों के लंबे-लंबे पेच देखना और दूसरे की छतों या यमुना पार मैदान में नदी किनारे जाकर डोर लूटना और कटी पतंग को लूटना कौशलपूर्ण मेहनत का काम हुआ करता था। इन दिनों लोग पतंगें तो उडाते हैं लेकिन कटी पतंग और डोर लूटने का काम नहीं करते।

मैं अपने जीवन में 15 से बीस साल के बीच की अवधि में पांच साल तक पतंगों के हर साल टूर्नामेंट करने और उनमें अन्य टीमोॆं को भाग लेने के लिए प्रेरित करने का काम बडे मन से करता था। नंदलाल -बसंतलाल जिनको प्यार से नंदो-बसंतो कहते थे,ये दो हमारी टीम के मेम्बर थे।

उन दिनों हर साल मथुरा के महाविद्या के मैदान में पतंगोॆ का टूर्नामेंट होता था जिसमें बरेली,मुरादाबाद,बरेली मथुरा, अलीगढ़ ,हाथरस मथुरा और लखनऊ के सभी बडे पतंगबाज टीम के साथ शामिल होते थे। कईबार यह टूर्नीामेंट कई दिनों तक चला। सुबह से शाम तक पेच होते थे। प्रत्येक टीम को दस -दस पतंगें लडाने का मौका मिलता था। एक साथ कई टीमों के पेच होते रहते थे और उस टूर्नामेंट को देखने के लिए शहर से बड़ी संख्या में युवाओं की भीड़ मैदान में टीलों पर बैठी आनंद लेती रहती थी।

बहुसंख्यकवाद नया विभाजनकारी नारा

बहुसंख्यकवाद का नया विभाजनकारी चेहरा सामने आया है। किसी एक इलाके में किसी समुदाय विशेष को निशाना बनाओ या धर्मविशेष के किसी अनुयायी को निशाना बनाओ।उसके बाद समुदाय विशेष को प्रच्छन्न तरीके से प्रचार अभियान चलाकर एकजुट करो। एकजुट होकर वोट डालने की अपील करो। यह सब काम विगत लोकसभा चुनाव में हो चुका है। फिलहाल महाराष्ट्र पर नजर है पूना से बहुसंख्यकवाद का प्रचार आरंभ हो चुका है। सावधान रहें।

बहुसंख्यकवाद वैसे ही खतरनाक है जैसे अल्पसंख्यकवाद। पूना के बारे में आज नभाटा में लिखा है- "पुणे में अब 'पहचान' का डर: लोगों ने बदला पहनावा, हटाई दाढ़ी", इस तरह शीर्षक के साथ खबरें नहीं दी जाएं । वैसे भी यह खबर अपने आप में संकेत है कि देश को दक्षिणपंथी राजनीति के नए एजेण्डे के आधार पर एकजुट किया जा रहा है।यह खतरनाक किस्म का विभाजनकारी ध्रुवीकरण है।इस तरह के ध्रुवीकरण की सभी राजनीतिकदलों को निंदा करनी चाहिए और इसके खिलाफ सचेत रुप से जनता को जाग्रत करना चाहिए।

गुजरात में बहुसंख्यकवाद का सफल प्रयोग करने के बाद यूपी में मुजफ्फरनगर को केन्द्र में रखकर बहुसंख्यकवाद की जिस राजनीति की फसल को राजनेताओं ने काटा है वह सत्ता के शिखर तक पहुँचाने का मार्ग बनी है।

बहुसंख्यकवाद हमारे देश में साम्प्रदायिकता का नया नाम है। इसके बारे में हम सबको गंभीरता से सोचने की जरुरत है।यूपी- बिहार में बहुसंख्यकवाद की विजय दुंदुभि को हम सब देख नहीं पाए। यूपी में पुण्यात्माओं की विजयलहर अखिलेश सरकार की असफलता या यूपी में कानून व्यवस्था की बिगडी स्थिति से पैदा हुई जीत नहीं थी । यूपी के विजयी पूना में नया प्रयोग कर रहे हैं।

हम सब अपने स्तर पर बिना किसी दल विशेष को गाली दिए सीधे बहुसंख्यकवाद की राजनीति का विरोध करें और इसकी आड़ में चल रहे प्रपंचों को पहचानें। बहुसंख्यकवाद की आंधी हमेशा किसी न किसी बहाने से आरंभ होती है। मुजफ्फरनगर में लड़कियों के साथ छेडखानी का मामला था,पूना में फेक आईडी के जरिए शिवाजी और बालठाकरे के बारे में गंदी बातें लिखने का मामला सामने आया है।उसके बाद बहाना बनाकर संबंधित मुस्लिम युवक की हत्या कर दी गयी और बाद में पूना में समुदाय विशेष के लोगों पर हमले हुए हैं।

नभाटा के अनुसार पूना में तनाव है।कई जगहों पर हमले और तोड़फोड़ की कार्रवाई हुई है। बहुसंख्यकवाद के लिए फेसबुक पोस्ट तो बहाना है। असल में वे फेसबुक पोस्ट से नाराज होते तो उसे हटाने के लिए शिकायत कर सकते थे,हत्या करने की क्या जरुरत थी।

मोहसिन की हत्या के बाद साफ संदेश है कि बहुसंख्यकवाद के नारे के इर्दगिर्द एकजुट हो। महाराष्ट्र सरकार को इस मामले में सख्ती से काम लेना चाहिए। कांग्रेस को जल्दी से अपने को वैचारिक निकम्मेपन से मुक्त करने की जरुरत है।

पूना में सामने जो खिलाडी हैं वे तो नकली खिलाडी हैं,असली खिलाडी तो कोई और हैं। उनको राजनीतिक तौर पर चिह्नित करने की जरुरत है। बहुसंख्यकवाद का नारा है भय पैदा करो और बहुसंख्यकों एकजुट करो।

मंगलवार, 3 जून 2014

बलात्कार के प्रतिवाद और नागरिक औरत की तलाश में

    
 
  मीडिया में बलात्कार की ख़बरों का सुर्खियों में आना और नेताओं का बलात्कार को लेकर हाय हाय करना रोज़मर्रा का नाटक है। 
   बलात्कार कोई मीडिया इवेंट नहीं है। बलात्कार के यथार्थ चित्र मीडिया के क़िस्सों और बाइट्स से भी ज़्यादा भयानक हैं। बलात्कार हमारे समाज और लोकतंत्र की प्रकृति को समझने का प्रस्थान बिंदु है। यह हमारे लोकतंत्र के समस्त दावों को खोखला साबित करता है ।
    लेनिन कहा करते थे यदि किसी समाज की हक़ीक़त जानना है तो पता करो औरत की दशा क्या है ? हमलोग जब भी लोकतंत्र की बातें करते हैं तो सतही मसलों को केन्द्र में रखकर बातें करते हैं। औरत को केन्द्र में रखकर बातें नहीं करते। औरत हमारी सृष्टि की धुरी है।
   अभी लोकसभा चुनावों के परिणामों की स्याही सूखी नहीं है । हम अपने अंदर झाँकने के लिए तैयार नहीं हैं। लोकसभा चुनाव में हमने औरतों के सवालों पर बातें तक नहीं कीं।
    मोदी से लेकर शोहदों तक सभी ने जितने भाषण दिए उनमें  औरत का मसला ठीक से उठाया ही नहीं गया। जब भी औरत का मसला उठा तो अपने को श्रेष्ठ और दूसरे को हेयऔर निकम्मा सिद्ध करने के लिहाज़ से उठाया गया। औरत को भी क़ानून -व्यवस्था का मसला बना दिया गया। सरकार को  निकम्मा घोषित करने का औज़ार बना दिया गया और वोट जुगाड़ करने की मशीन में तब्दील कर दिया गया। कभी किसी भी दल ने औरतों के सवालों पर बुनियादी ढंग से बातें नहीं कीं।
   स्थिति इतनी बदतर है कि आज भी हम बदायूँ की घटना को यूपी सरकार को गिराने या बदनाम करने के लक्ष्य से आगे देखने को तैयार नहीं हैं। हम यह जानने और समझने को तैयार नहीं हैं कि हमारा देश 'बलात्कारियों का देश 'कैसे हो गया? क्यों हमारे देश में औरत को ही पग-पग पर लांछन, उत्पीड़न और बलात्कार का सामना करना पड़ता है? वे कौन सी ताक़तें और जीवन मूल्य हैं जो औरत पर हो रहे अत्याचारों की तह तक हमें जाने नहीं देते ? 
          बलात्कार की जड़ें हमारे समाज में हैं। समाज की मूल्य संरचना में हैं। औरत को मातहत मानने या दोयमदर्जे का नागरिक मानने की मानसिकता में हैं। वास्तविकता यह है कि हमने अपने देश में लोकतंत्र का कम और वोटतंत्र का ज़्यादा विकास किया है। हमने नागरिकचेतना और आधुनिकभावबोध पैदा करने की बजाय उपभोक्ताबोध पैदा करने पर ज़ोर दिया है। औरत को समाज में नागरिक नहीं माना यहाँ तक कि पुरुष को भी नागरिक नहीं माना। हमारा समाज अभी तक नागरिक समाज बना ही नहीं है। 

    हम लिंग समाज में जी रहे हैं। ' ये औरत है वो मर्द है' की मानसिकता में जी रहे हैं। औरत-मर्द के संबंधों के आधार पर ही एक- दूसरे के बारे में सोचते हैं।हमने अपने संबंधों को नागरिक संबंधों में रुपान्तरित नहीं किया है। आज भी औरतें सबसे ज़्यादा शारीरिक हिंसा की शिकार क्यों हैं? क्योंकि औरत को शरीर या योनि से ज़्यादा हमारा समाज सोचने को तैयार नहीं है। 
    औरत  या योनि देह नहीं नागरिक है। जीवंत मनुष्य है। औरत का समूचा विमर्श अभी भी माँ , बेटी, बहन के सम्बोधनों से बन रहा है। हम औरत को इन सम्बोधनों और इनसे जुड़े सामाजिक संबंधों से परे जाकर देखने को तैयार नहीं हैं। औरत को जब तक हम इन संबंधों में देखेंगे तब तक औरत पर हमले जारी रहेंगे। औरत की अवस्था और भी बदतर होगी। 
     भारत में नया भारत तब बनेगा जब हम नागरिक के रुप में औरत- मर्द को देखेंगे । लिंगाधारित असमान संबंधों को हमने कभी बुनियादी तौर पर बदलने की मुहिम नहीं चलायी। औरत को लिंगाधारित संबंधों के परिप्रेक्ष्य में रखकर देखने से औरत की मातहत की सामाजिक दशा में बदलाव नहीं आएगा। औरत इस परिप्रेक्ष्य में हमेशा पुरुष संदर्भ से ही परिभाषित होती रही है। 
    औरत को माँ,बहन, बेटी के रुप में देखने का अर्थ है उसे पुरुष संदर्भ में देखना। नागरिक के रुप में औरत को देखा जाय इसकी पहली सीढ़ी है कि हम औरत को 'व्यक्ति' के रुप में देना आरंभ करें और क्रमश : 'व्यक्ति'रुप में उसकी सत्ता,महत्ता और अधिकारों को परिभाषित करें। 
        औरत को व्यक्ति के रुप में न देख पाने के कारण ही हम उसे मनुष्य के रुप में भी नहीं देख पाते। वह हमारी चेतना में लिंग होती है या माँ -बहन-बेटी होती है ,इसके अलावा उसकी कोई अवस्था नहीं होती।
      औरतों पर बढ़ रहे शारीरिक हमलों और बलात्कार की घटनाओं का एक अन्य कारण है मर्दानगी का नग्न प्रदर्शन और उसके श्रेष्ठत्व पर ज़ोर। मर्दानगी को हमारे मीडिया से लेकर राजनीति, संस्कृति से लेकर शिक्षा तक, धर्म से लेकर न्याय तक सबने महिमामंडित किया है।मर्दानगी को अपरिहार्य मान लिया गया है। मर्दानगी का हमारे यहाँ जो विकल्प औरतों की महिमा के नाम पर सुझाया जाता है वह भी मर्दानगी के ही लक्षणों को पुष्ट करता है। मर्दानगी का अहर्निश प्रचार- प्रसार हमारे मनोजगत को संचालित करता रहता है। यह हमें स्वाभाविक लगने लगा है।
    सामाजिक विकास के लिए मर्दानगी का महिमामंडन या फिर परंपरागत भावबोध का महिमामंडन इस तरह किया जाता है कि हम स्वतंत्र रुप में औरत की व्यक्ति और नागरिक के रुप में स्थिति को परिभाषित ही नहीं कर पाते। औरत को नागरिक के रुप में हम अभी तक अपने मन में बिठा नहीं पाए हैं। यह हमारे लोकतंत्र की अब तक की सबसे बड़ी त्रासदी है।
     हमने लोकतंत्र में नागरिक की पहचान को अर्जित नहीं किया और न उसके लिए कोई आंतरिक और सामाजिक संघर्ष ही चलाया। हमने मान लिया कि हम नागरिक हैं और हमारा समाज लोकतांत्रिक है। 
     लोकतंत्र या नागरिकबोध प्रदत्त नहीं होता, वह संवैधानिक घोषणाओं के साथ ही हमें नहीं मिल जाता बल्कि उसके लिए सचेत रुप में सामाजिकस्तर पर संघर्ष चलाने की ज़रुरत है। इस काम को हमारे यहाँ अभी तक किसी ने नहीं किया। 
      हमने औरत को शिक्षित बनाया, नया उत्पादक बनाया लेकिन औरत और समाज में नागरिकबोध पैदा नहीं किया। औरत के ऊपरी उपकरण बदले लेकिन उसकी आंतरिक संरचनाएँ पुरानी बनी रहीं। हमें कमाऊ औरत चाहिए लेकिन नए मूल्यबोधवाली नागरिकबोध से युक्त औरत नहीं चाहिए । यही वह बिंदु है जहाँ से औरत के हकों और उसके शरीर पर बराबर हमले हो रहे हैं। 
       औरत को हम क़ानून -व्यवस्था का मसला न मानें। औरतें क़ानून भंजक नहीं हैं।लेकिन औरतें हमारे क़ानूनी मशीनरी की शिकार जरुर हैं। हमारी सारी क़ानूनी मशीनरी और समाज पूरी तरह से औरत को शक की नज़र से देखता है।
    औरतें सुरक्षित रहें इसके लिए ज़रुरी है कि हम उन पर विश्वास करना सीखें । औरत पर शक करना उसका अपमान है। औरत पर शक के कारण ही यह मानसिकता बनी है कि औरत तो पापिन होती है। नागिन होती है। औरत को हमने न तो समाज में सम्मान से देखा और नहीं घर में सम्मान और विश्वास की नज़र से देखा। इसके अलावा औरत के अंदर पुंसवादी मूल्यों और विश्वासों को भी बिठाया गया है। आज वास्तविकता यह है कि औरत का साथ देने को औरत ही तैयार नहीं होती। 
     औरत आज जितनी अकेली और असहाय है उतनी असहाय और कमज़ोर वह पहले कभी नहीं थी। हम औरत को पूँजीवादी उत्पादन संबंधों के परिप्रेक्ष्य में नए सिरे से परिभाषित करें तो चीज़ें ज़्यादा साफ़ नज़र आएँगी। 
    औरत के दो शत्रु हैं । पहला शत्रु है पूँजीवाद और दूसरा शत्रु हैं पितृसत्ता। औरत को मुक्ति हासिल करने के लिए पुंसवाद के ख़िलाफ़ समझौताहीन संघर्ष चलाना होगा। औरत इस संघर्ष में सफलता हासिल करें इसके लिए ज़रुरी है पुरुष भी उसका साथ दें। 
   औरत को संरक्षण के लिए क़ानून चाहिए लेकिन पुंसवादी नज़रिए से रहित। भाई ,पिता,बेटा चाहिए लेकिन पुंसवाद के बिना। औरत को हम औरत रहने दें उसे पुंसवादी साँचे में न ढालें। औरत को पुंसवादी साँचे में ढालने और पुंसवादी नज़रिए से देखने के कारण ही औरत आज सबसे ज़्यादा असहाय और हिंसा की शिकार है।
    हम सब एकजुट होकर पुंसवादी विचारधारा और पुंसवादी मूल्यों का हर स्तर पर विरोध करें। पुंसवाद के ख़िलाफ़ संघर्ष घर के अंदर और हमारे दिलोदिमाग़ के अंदर चलाने की ज़रुरत है। 
      

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