बुधवार, 18 जून 2014

नए मतवाले

        एक जमाना था नारा लगता था 'जीना है तो मरना सीखो ,कदम-कदम पर लडना सीखो। 'लेकिन अब यह नारा कहीं गुम हो गया है। अब तो एक ही नारा है 'जीना है तो तिकड़म सीखो।'

तिकड़म की कला में जो लोग पलकर बड़े हुए हैं वे इन दिनों मतवालों की तरह घूम रहे हैं। वे सारी दुनिया से बेखबर हैं। उनकी चिंता में फेसबुक है ,चैटिंग है,फिल्मों की गॉसिप है,लुभावने रसीले किस्से हैं। वे मोदी के दीवाने हैं,कारपोरेट कल्चर के फेन हैं।उनको अन्ना अच्छा लगता है क्योंकि वो हर आंदोलन को टीवी इवेंट बनाता है।

वे संघर्ष को टीवी इवेंट के रुप में देखना पसंद करते हैं। लेकिन आश्चर्यजनक बात है कि इन दीवानों को अफगानिस्तान,श्रीलंका,इराक आदि के कत्लेआम प्रभावित नहीं करते। वह तो यही मानकर चल रहे हैं कि इस्लामिक देशों में तो हिंसाचार आम बात है। मुसलमानों को तो लड़ लड़कर मर जाना चाहिए। उसे इससे भी कोई लेना देना नहीं है कि आर्थिकमंदी से कौन कितना प्रभावित हो रहा है। वह तो अपने कैरियर और कम्पटीशन की तैयारी के अंग के रुप में मंदी और अन्य सामयिक खबरों पर नजर रखे हुए है। क्योंकि उसे अपडेट रखना है, कहीं पेपर खराब न हो जाय। यानी सामाजिक-राजनीतिक सचेतनता अब उसके संघर्ष का नहीं कैरियर का हिस्सा है।

नए मतवालों के लिए स्वाधीनता संग्राम का किस्सागोई से ज्यादा कोई महत्व नहीं है। वे उस दौर के स्कैंडल में रस लेते हैं।इन मतवालों को स्वाधीनता संग्राम के मूल्य प्रभावित नहीं करते बल्कि इनकी रुचि तो स्वाधीनता आंदोलन के इतर प्रसंगों में है। वह स्वाधीनता संग्राम का मतलब नेहरु-गांधी के किस्से मानता है और भगतसिंह आदि उसे भटके हुए युवक नजर आते हैं।

यह ऐसा मतवाला है जिसे मूल्य नहीं, सड़कें,चमकदार भवन,मीडिया की सुर्खियां,सत्ता की कुर्सियां, कंपनी के टर्नओवर और नए नए गजट अपील करते हैं। वह नई फैशन पर फिदा है। उनकी चाल निराली है। वह पढ़ता है लेकिन किताबें कम और कम्पटीशन मास्टर टाइप चीजें ज्यादा पढ़ता है।बेस्टसेलर उसकी पहली पसंद है।

वह शिक्षित है लेकिन अन्य केलिए अपनी शिक्षा का कोई इस्तेमाल नहीं करना चाहता। उसको नौकरी चाहिए लेकिन गांवों में नहीं। इनमें से अनेक को टीचिंग में नौकरी चाहिए लेकिन शहरों में।यह ऐसा दीवाना है जो शहरों के अलावा अन्यत्र नहीं रहना चाहता। फैशन और स्टायल का यह वर्ग दीवाना है। इसमें से कुछ लोग हिन्दी साहित्य में भी आ रहे हैं। जमकर कविता-कहानी-उपन्यास भी लिख रहे हैं। लेकिन छोटे छोटे दायरों में मित्रमंडली बनाकर जीना इसकी नई प्रथा है। वह साहित्यिक हो या मतवाला हो, सब अपने छोटे समूहों में मगन होकर रह रहे हैं। बड़े मित्र समूहों और संघर्षशील संगठनों की चौपालें और हरकतें म्यूजियम की चीजें हो गयी हैं।



नए मतवाले धर्म से मुक्त हैं लेकिन साम्प्रदायिकचेतना से लैस हैं। ये साम्प्रदायिक प्रचार की कॉमनसेंस बातों को सच्चे विचार मानकर विश्वास करते हैं। साम्प्रदायिक कॉमनसेंस में आस्थावान होने के कारण वह अब हर चीज को इस कॉमनसेंस के आधार पर छानने-फटकने लगे हैं। शादी करने से लेकर वोट देने तक साम्प्रदायिकचेतना उसके स्वभाव को निर्धारित करती है। यह ऐसा व्यक्ति है जो स्वभाव से सरल है और विचार से साम्प्रदायिक है।

मंगलवार, 17 जून 2014

कातिलों के बाराती


वे नशे की दुनिया में ले जा रहे हैं। वे हमें मनोरंजन-ज्ञान-राजनीति आदि कुछ इस तरह खिला-पिला रहे हैं कि हम चटखोर हो गए हैं ,उनके दिए को पाने को तरसते हैं। वे हमें जालिम बना रहे हैं, और हमें समझा रहे हैं कि वे आदमी बना रहे हैं। जबकि वे हमें निठल्ला बना रहे हैं, उपभोक्ता बना रहे हैं।कह रहे हैं हुनरमंद ,कौशलपूर्ण,तकनीकी गुरों में मास्टर बना रहे हैं।

हम खुश हैं कि हम हुनरमंद बन रहे हैं,कंज्यूमर बन रहे हैं, हम खुश हैं कि हम किसी संगठन में नहीं हैं, हम खुश हैं कि हमने मार्क्सवाद से पल्ला झाड़ लिया है, मजदूरों के संगठनों और नेताओं से दूरी बना लीहै, हम खुश हैं कि हमारे देश में कम्युनिस्ट खत्म होते जा रहे हैं, हम खुश हैं कि परिवर्तन की लडाई अब बेमानी और बेअसर हो गयी है। हम खुश हैं कि हमने विकासदर के लक्ष्य हासिल करने शुरु कर दिए हैं, हम खुश हैं सेंसेक्स उछल रहा है लुढ़क रहा है।हम खुश हैं कि हमारा पीएम लिखा भाषण नहीं पढ़ता, हिन्दी में बोलता है,दहाड़ता है, हम खुश हैं कि उसका सीना 56 इंच का है।

लेकिन हम भूलते जा रहे हैं कि वे हमें कातिलों का बाराती बना रहे हैं। वे हमें कातिल बनने की कला सिखा रहे हैं। जी हां, सच मानिए हम-आप सब कातिल बनने की कला सीख रहे हैं और कातिलों के कातिबों के चेले बन गए हैं। मेरी बात को आप हँसकर मत उडाइए। वे बहुत सुनियोजित ढ़ंग से हमें संगठन मात्र से घृणा करना सिखा रहे हैं, वे हमें संगठित होकर प्रतिवाद करने की मनोदशा से दूर ले जा रहे हैं, मेरा मानना है संगठन बनाने की प्रक्रिया से दूर ले जाने के सारे प्रयास अंततःकातिल बनाने की साजिश का हिस्सा हैं।

हममें से अधिकांश लोग बहुत ही सहज भाव से लोकतांत्रिक संगठनों के प्रति अपनी घृणा और बेरुखी का इजहार कर रहे हैं। मजदूरों,किसानों ,दलितों,आदिवासियों के संगठनों और उनके संघर्षों के खिलाफ कही गयी बातों को बड़ी आसानी से मान लेते हैं, उन बातों पर यकीन करने लगते हैं, इस सबका परिणाम यह निकला है कि हम कातिलों के बाराती बनकर रह गए हैं। कातिलों के बाराती कभी कल्याण नहीं कर सकते। कातिलों के बाराती तो कत्ल ही करेंगे और कत्ल करने का ही हुनर सिखाएंगे। कत्ल होने पर ताली बजाएंगे या फिर दर्शक की तरह आनंद लेंगे। हमें कोई बैचैनी नहीं हुई कि नर्मदा बाँध की ऊँचाई बढ़ाने से लाखों लोग उजड़ जाएंगे, हमें कहीं कोई टीवी बाइटस नजर नहीं आई इसके खिलाफ,असल में हमें अच्छा कातिल बनाया जा रहा है, पहले से बेहतर कातिल बनाया जा रहा है।

दुख इस बात का है हमने कातिल को ही अपना संरक्षक बना लिया है। हम पर कोई विपत्ति आती है तो हम अपने लोकतांत्रिक संगठनों के पास नहीं जाते प्रतिवाद संगठित नहीं करते अपितु कातिलों के दरवाजों पर गुहार लगाने जाते हैं।

कातिलों से दया की गुहार लगाकर आप देश नहीं बदल सकते। कातिलों से खैरात लेकर अपना सामाजिक दर्जा ऊँचा नहीं बना सकते। कातिलों की सिफारिश से आप न्याय के मानक नहीं बना सकते। कातिल के पास जाने का अर्थ सिर्फ स्वार्थ सिद्धि ही नहीं है बल्कि कातिल बनना भी है। आप ही सोचें कि आपने अपने जीवन में कातिलों से मेल-मोहब्बत-मुलाकात कितनी की है और जनता के संगठनकर्ताओं के साथ कितनीबार मिले हैं। तकलीफ तब होती है जब ईमानदार को भी आप कातिलों का बाराती बनाने का काम करने लगते हैं।

यह सच है आपको वर्गसंघर्ष से नफरत है, मार्क्सवाद से नफरत है और आपके पास इनलोगों से नफरत के हजारों किस्से-कहानियां हैं। यह भी सच है इनमें से अनेक किस्से सच भी हैं लेकिन इससे भी बड़ा सच है कि हमें इस समाज को कातिलों से बचाना है और यह काम कातिलों का बाराती बनकर संभव नहीं है। यह काम संगठन करने वालों से नफरत करके संभव नहीं है।

जो लोग समाज में संगठन बनाने का काम कर रहे हैं और खासकर लोकतांत्रिक संगठन बनाने का काम कर रहे हैं वे ही असल में देश निर्माण का काम कर रहे हैं। देश का मतलब है जनता को संगठित करो, लोकतांत्रिक चेतना से लैस करो।अधिकारों के प्रति उसे सचेत करो। देश का मतलब सड़कें-भवन,ताकतवर नेता नहीं है। देश का मतलब है जनता की उन्नतचेतना।जनता की एकता और सामाजिक-राजनीतिक उसूलों की रक्षा करने की त्याग भावना। हमने ऐसा समाज बनाया है जिसमें त्याग करके जीने वाले को बेबकूफ और तिकड़मी-धूर्त-जालसाज को अक्लमंद माना जाता है। हमारे समाज में ईमानदार आदर्श नहीं हैबल्कि येन-केन-प्रकारण अपना काम साधने वाला अक्लमंद माना जाता है उसे ही हम सफल व्यक्ति मानते हैं। जो सफल है वही महान है। असल में यह धारणा बुनियादी तौर पर गलत है। यह धारणा मानवता विरोधी है।






औरत को थाने नहीं महिला संगठन चाहिए


      औरतों के साथ बलात्कार और हिंसाचार थमने का नाम नहीं ले रहा। पहले कहा गया सख्त कानून बनाओ,निर्भया कांड के बाद कानून सख्त बन गया। अब बदायूं कांड के बाद के कह रहे हैं सख्त सरकार बनाओ,वह भी बन जाएगी, धैर्य रखो, लेकिन पहले यह तो सोचो भाजपा की सख्त-ताकतवर सरकार मध्यप्रदेश में है और दिल्ली में भी है, लेकिन बलात्कार और हिंसाचार थम नहीं रहे हैं।बलात्कारी न तो कानून से डर रहे हैं और न सख्त सरकारों से। वे इतने निडर क्यों हैं ?

औरतों के साथ हिंसाचार कानून और सरकार बदलने मात्र से नहीं थमेगा। औरतों को संगठित होकर लंबे संघर्ष के लिए कमर कसनी होगी। औरत की सुरक्षा का मामला मात्र जेण्डर प्रश्न नहीं है, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का सवाल है।पितृसत्ता के वर्चस्व के सभी रुपों के खिलाफ संघर्ष का मामला है। यह औरत के स्वभाव को बदलने का मामला भी है।

औरतों की लड़ाई कानूनी लडाई नहीं है और नहीं यह सरकार पाने की लडाई है ,वह सामाजिक परिवर्तन की लडाई है ,इसमें जब तक औरतें सड़कों पर नहीं निकलेंगी और निरंतर जागरुकता का प्रदर्शन नहीं करेंगी, तब तक स्थितियां बदलने से रहीं । इन दिनों पुंस हिंसाचार का जो तूफान समाज में चल रहा है उसमें इजाफा ही होगा।

आयरनी यह है कि औरतों के ऊपर हो रहे हिंसाचार के खिलाफ औरतें अभी तक सड़कों पर निकलने को तैयार नहीं हैं। कहीं पर भी हजारों-लाखों औरतों के जुलूस नजर नहीं आ रहे। स्थिति इतनी भयावह है कि पीड़िता को देखकर भी हम अनदेखा कर रहे हैं। पुरुषों के लिए बलात्कार एक खबर होकर रह गयी, वहीं औरतों के लिए जुल्म। हमें इन दोनों के दायरे से निकलकर औरत को संघर्ष की प्रक्रिया में लाना होगा। औरत संघर्ष करेगी तो हिंसाचार थमेगा। हमें औरत को संघर्ष करने के लिए प्रेरित करना होगा। हमें औरतों को सामाजिक हलचलों से दूर रखने की मनोदशा बदलनी होगी। औरतों को भी अ-राजनीतिक होकर जीने की आदत और अभ्यासों को त्यागना होगा। औरत को अ-राजनीतिक बनाने में पुंस समाज को लाभ रहा है।

औरत अ-राजनीतिक न बने हमें उसके उपाय खोजने होंगे। औरतों में सामाजिक-राजनीतिक जागरुकता पैदा करने के उपायों पर विचार करना होगा और यह काम औरतों के बिना संभव नहीं है। पहली कड़ी के तौर पर औरतों को अखबार पढ़ने, टीवी न्यूज देखने और राजनीतिक खबरों में दिलचस्पी लेने की आदत डालनी होगी।

औरत को सीरियल संस्कृति और मनोरंजन संस्कृति के बंद परकोटे से बाहर निकलना होगा। मनोरंजन की कैद में बंद औरत अपनी रक्षा नहीं कर सकती। यह वह औरत है जो सामाजिक -राजनीतिक भूमिका से संयास ले चुकी है।

यह सच है कि औरतें रुटिन कामों को सालों-साल करती रहती हैं और घरों में बैठे हुए बोर होती रहती हैं, लेकिन इससे भी बड़ा सच यह है कि सीरियल या मनोरंजन प्रोडक्टों का रुटिन आस्वादन और भी ज्यादा बोर करता है। उनका अहर्निश आस्वादन हमें बोर और सामाजिक तौर पर निष्क्रिय बनाता है।

औरत सामाजिक तौर पर निष्क्रिय न बने इसके लिए औरतों को यह जानना होगा कि वे जिसे आनंद या मनोरंजन समझ रही हैं वह तो उनकी बोरियत बढ़ाने वाला संसाधन है। औरत को मनोरंजन की नकली भूख को खत्म करने के लिए मनोरंजन के असली और कारगर रुपों को अपनाना होगा।

औरतें अ-राजनीति के दायरे के बाहर आएं इसके लिए जरुरी है कि वे अपनी पहल पर लोकतांत्रिक महिला संगठनों की शाखाएं अपने मुहल्ले में खोलें और नए सिरे से सामाजिक सवालों पर मिलने-जुलने और काम करने का सिस्टम तैयार करें। आज स्थिति यह है कि भारत के अघिकांश मुहल्लों में महिला संगठन नहीं हैं। महिला संगठनों के बिना महिलाओं को नहीं बचा सकते।



महिलाओं को हर इलाके में थाने नहीं महिला संगठनों की जरुरत है। महिलाओं के इस तरह के संगठनों की जरुरत है जो निरंतर महिलाओं के सवालों पर सोचें और महिलाओं को सक्रिय-शिक्षित करें। महिलाएं सक्रिय-शिक्षित और संगठित बनेंगी तब ही हिंसाचार रुकेगा।

सोमवार, 16 जून 2014

मार्क्सवाद की दुखती रग

  कल पुराने मित्र कैसर शमीम साहब से लंबी बातचीत हो रही थी। वे मोदी के चुनाव में जीतकर आने के बाद से बेहद कष्ट में थे और कह रहे थे कि मैं तो सोच ही नहीं पा रहा हूँ कि क्या करुँ ? वे राजनीतिक अवसाद में थे। हमदोनों जेएनयू के दिनों से भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) से जुड़े थे। वे जेएनयू में पार्टी में आए थे,मैं मथुरा से ही माकपा से जुडा हुआ था। कैसर साहब ने एक सवाल किया कि आखिरकार माकपा के सदस्य या हमदर्द भाजपा में क्यों जा रहे हैं ? माकपा का आपको पश्चिम बंगाल में क्या भविष्य नजर आता है ?  मैंने उनसे जो बातें कही वे आप सबके लिए भी काम आ सकती हैं इसलिए फेसबुक पर साझा कर रहा हूँ ।
     मैंने कैसर शमीम से कहा कि माकपा को पश्चिम बंगाल में दोबारा पैरों पर खड़ा होना बहुत ही मुश्किल  है। माकपा इस राज्य में समापन की ओर है। इसके कई कारण हैं जिनमें प्रधान कारण है माकपा का लोकतंत्र में हार-जीत के मर्म को न समझ पाना या समझकर अनदेखा करना।
     लोकतंत्र में चुनावी हार-जीत को हमें गंभीरता से लेना चाहिए। जो नेता हार गए हैं या जिन नेताओं के नेतृत्व में पार्टी हारी है वे आम जनता में घृणा के पात्र बन जाते हैं। पश्चिम बंगाल में बुद्धदेव भट्टाचार्य सिंगूर-नंदीग्राम की घटना के बाद घृणा के पात्र बनगए। उनको चुनाव अभियान का अगुआ बनाकर माकपा ने गलती की थी। यह सिलसिला जारी है।
    समूची जनता माकपा से जितनी नफरत करती थी वह नफरत उसने बुद्ध दा में समाहित कर दी ,यह सच है कि निजी तौर पर बुद्धदा बेहतर व्यक्ति हैं,सुसंस्कृत ईमानदार नेता हैं। लेकिन मुश्किल यह है कि वे माकपा और वाममोर्चे के मुख्यमंत्री थे फलतः वे अपने प्रशासन के साथ अपनी पार्टी के अदने से कार्यकर्ता की भूलों के लिए भी जबावदेह थे। यही वजह है कि ईमानदार होने बावजूद वे आम जनता में घृणा के प्रतीक बन गए। यही हाल माकपा के राज्यसचिव विमान बसु का है। वे भी माकपा के घृणा प्रतीक बन गए, इसी तरह निचले स्तर पर अनेक नेता हैं जो आम जनता में घृणा के प्रतीक बन गए हैं। इनको पार्टी हटाने में असफल रही है।यही वजह है कि माकपा लगातार जनाधार खो रही है।
    कोई नेता घृणा प्रतीक क्यों बन जाता है ,यह बात तब तक समझ में नहीं आएगी जब तक हम आम जनता की हार-जीत की भावना को न समझें। लोकतंत्र में माकपा अकेला ऐसा दल है जो घृणा प्रतीकों को पार्टी के शिखर पर बिठाए रखता है। यह अकेला ऐसा दल है जिसकी पोलिट ब्यूरो और केन्द्रीयसमिति में अधिकतर सदस्य वे हैं जो जनता में जाकर कभी चुनाव नहीं लड़े हैं।
   लोकतंत्र में चुनाव न लड़कर लोकतंत्र का संचालन करने की कला सर्वसत्तावादी कला है। इससे नेता का जनता के साथ लगाव के स्तर का पता नहीं चलता। आज वास्तविकता यह है कि माकपा के अधिकांश कमेटियों के मेम्बर या सचिव कहीं से नगरपालिका चुनाव तक जीतकर नहीं आ सकते। ईएमएस नम्बूदिरीपाद या ज्योति बसु इसलिए बड़े दर्जे के नेता थे क्योंकि उनकी जनता मेंजडें थीं।वे जनता में कई बार चुने गए।
     पश्चिम बंगाल और केरल से पार्टी की सर्वोच्च कमेटियों में  अधिकांश नेता चुनाव लड़कर अपनी वैधता को जनता में जाकर पुष्ट करते रहे हैं।
    लोकतंत्र में रहकर यह देखना ही होगा कि माकपा के किस नेता से जनता घृणा कर रही है ? पश्चिम बंगाल के प्रसंग में यह सबसे बड़ी असफलता है कि आम जनता जिन नेताओं से नफरत करती है वे अभी भी पार्टी पदों पर बने हुए हैं। जबकि ऐसे नेताओं को बिना किसी हील-हुज्जत के पार्टी की जिम्मेदारियों से मुक्त करना चाहिए।
     कैसर साहब ने यह भी पूछा था कि क्या वजह है कि माकपा के लोग भाजपा की ओर जा रहे हैं ? मैंने कहा कि इसके कई कारण हैं,इनमें पहला कारण है बंगाली जाति खासकर मध्यवर्गीय बंगाली की मनोदशा। इस वर्ग के लोग परंपरागत तौर पर सत्ताभक्त रहे हैं। उनका किसी विचारधारा से कोई लेना-देना नहीं है। अंग्रेजों के जमाने से सत्ताभक्त बंगालियों की समृद्ध परंपरा रही है और यह परंपरा आजादी के बाद और भी मजबूत हुई है। वामशासन में मध्यवर्गीय बंगाली वाम के साथ था ,लोग कहते थे कि यह वाम विचारधारा का असर है, मैं उस समय भी आपत्ति करता था और आज भी करता हूँ।
    बंगाली मध्यवर्ग मे बहुत छोटा अंश है जो वैचारिक समझ के साथ वाम के साथ है, वरना ज्यादातर मध्यवर्गीय बंगाली सत्ताभक्त हैं । वे वैचारिकदरिद्र हैं। इस वैचारिकदरिद्र बंगाली मध्यवर्ग में ममता सरकार आने के बाद भगदड़ मची और रातों-रात मध्यवर्ग के लोग कल तक ममता को 'लंपटनेत्री' कहते थे ,अब 'देवी' कहने लगे हैं। मोदी की विजय दुंदुभि ने भी उनको प्रभावित किया है और वे लोग भाजपा की ओर जा रहे हैं। भाजपा की मुश्किलें इससे बढ़ेंगी या घटेंगी,यह मुख्य समस्या नहीं है। मुख्य समस्या है कि मध्यवर्ग  के इस चरित्र को किस तरह देखें ?
      मध्यवर्गीय बंगालियों का एक बड़ा हिस्सा अब सीधे माकपा से दामन छुडाने में लगा है। मैं 2005 से माकपा में नहीं हूँ लेकिन मैं अब तक इस संगठन की यथाशक्ति मदद करता रहा हूँ। इसबार के लोकसभा चुनाव में भी चंदा दिया और और अन्य किस्म की मदद की। लेकिन जो लोग माकपा के स्तंभ कहलाते थे वे दूसरे पाले में नजर आए।
    माकपा के नेताओं में यह विवेक ही नहीं है कि वे लोकतांत्रिक भावनाओं, मूल्यों और अनुभूतियों के राजनीतिकमर्म को समझें। मैं विगत 15सालों से लगातार लिख रहा हूँ कि माकपा के नेतृत्व में वे लोग आ गए हैं जिनसे जनता नफरत करती है। मेरी बात पर किसी ने ध्यान नहीं दिया क्योंकि वे चुनाव जीत रहे थे। वे जब चुनाव जीत रहे थे तब भी आम जनता में नेताओं का एक तबका घृणा का पात्र था और आज भी है। इनमें विमान बसु और बुद्धदेव का नाम सबसे ऊपर है।
    आम जनता में माकपा के नेताओं के असंवैधानिक क्रियाकलापों के कारण घृणा पैदा हुई है और इस अनुभूति को माकपा किसी तरह कम नहीं कर सकती।
     माकपा के पराभव का एक अन्य कारण है कि माकपा के वोटबैंक में तमाम किस्म के स्थानीय प्रतिक्रियावाद का शरण लेना। वोटबैंक राजनीति के कारण लोकल प्रतिक्रियावाद के खिलाफ कभी संघर्ष नहीं चलाया गया। लोकल प्रतिक्रियावाद के तार बाबा लोकनाथ से लेकर तमाम पुराने समाजसुधार संगठनों के सदस्यों के बीच में फैले हुए हैं। इसमें मुस्लिम प्रतिक्रियावाद भी शामिल है। तमाम किस्म की विचारधाराओं के साथ रमण करने वाली माकपा आजकल इन तमाम किस्म के प्रतिक्रियावादी नायकों के संगठनों के समर्थन के अभाव में अधमरी नजर आ रही है।इसके बावजूद एक तथ्य साफ है कि पश्चिम बंगाल में आम जनता में प्रतिक्रियावाद मजबूत हुआ है। भोंदूपन, अंधविश्वास और प्रतिगामिता में इजाफा हुआ है। इसका राज्य के वामदलों के विचारधारात्मक क्रियाकलापों की असफलता से गहरा संबंध है।
     प्रतिक्रियावाद आसानी से किसी भी विचारधारा में शरण लेकर रह सकता है और मौका पाते ही वो भाग भी सकता है या पलटकर हमला भी कर सकता है। मैं एक वाकया सुनाता हूँ। एक कॉमरेड थे बडे ही क्रांतिकारी थे एसएफआई के महासचिव या ऐसे ही पद पर थे ,राज्यसभा के लिए नामजद किए गए, हठात कुछ महिने बाद पाया गया कि वे भाजपा में  चले गए। मैंने पूछा कि भाईयो यह कैसी मार्क्सवादी शिक्षा है जो सीधे भाजपा तक पहुँचा देती है ? किसी के पास जबाव नहीं था। कहने का आशय यह कि माकपा की लीडरशिप से लेकर नीचे तक अनुदारवाद और कट्टरतावाद बड़ी संख्या में सदस्यों में रहा है। यही अनुदारवाद अब खुलकर भाजपा की ओर जा रहा है।
    एक अन्य चीज वह यह कि अनुदारवाद एक किस्म सामाजिक अविवेकवाद है जिसमें अपराधीकरण की प्रवृत्ति होती है।यह अचानक नहीं है कि माकपा का बड़े पैमाने पर अपराधीकरण हो गया और कोई देखने को तैयार नहीं है।
     मैं जब 1989 में पश्चिम बंगाल आया था तो बड़ी आशाओं के साथ आया था, पार्टी ब्रांच में बात हो रही थी कि कौन कहां काम करेगा, सब मेम्बर अपने तरीके से बता रहे थे कि मैं वहां काम करूँगा,यहाँ काम करुँगा, अधिकतर लोग अपने –अपने मुहल्ले में काम करने के लिए कह रहे थे, मैंने भी कहा कि मैं अपने मुहल्ले में पार्टी से जुड़कर काम करूँगा। उनदिनों कॉं.अनिल विश्वास पार्टी ब्रांच संभालते थे, वे यहां के मुख्यनेताओं में से एक थे, बाद में राज्य सचिव बने, पोलिट ब्यूरो में रखे गए। वे तुरंत बोले कि तुमको मुहल्ले में काम नहीं करने देंगे, मैंने पूछा क्यों ,वे बोले नीचे पार्टी में गुण्डे भरे हैं तुम देखकर दुखी होओगे और पार्टी से मोहभंग हो जाएगा।
   उल्लेखनीय है मेरी  शिक्षा की ब्रांच थी और उसमें सभी मेम्बर नामी लोग थे और लोकल थे,मैं अकेला बाहर से गया था,मेरे लिए अनिल विश्वास का बयान करेंट के झटके की तरह लगा, मैं काफी दिनों विचलित रहा और उन लोगों ने मुझे लोकल स्तर पर पार्टी से दूर रखा।
    कहने का आशय यह कि पार्टी के नेता जानते थे कि निचले स्तर पर किस तरह के अपराधी घुस आए हैं। इस घटना के कुछ दिन बाद कोलकाता एयरपोर्ट पर मेरी प्रकाश कारात से मुलाकात हुई हम दोनों एक ही फ्लाइट से दिल्ली आए, प्रकाश ने पूछा यहां की पार्टी कैसी लग रही है, मैंने अनिल विश्वास वाली बात कही तो वो चौंका लेकिन उसके पास मेरे सवालों का जबाव नहीं था ।मेरा सवाल था कि माकपा ने जान-बूझकर जनपार्टी बनाने के चक्कर में अपराधियों को पार्टी में क्यों रख लिया है ?  
    मेरे कहने का आशय यह है कि माकपा में अनुदारवाद, कट्टरतावाद और अपराधीकरण ये तीनों प्रवृत्तियां लंबे समय से रही हैं और पार्टी नेतृत्व इनसे वाकिफ रहा है। इन तीनों प्रवृत्तियों को पूंजीवाद के खिलाफ घृणा फैलाने की आड़ में संरक्षण मिलता रहा है।
     यह खुला सच है कि पश्चिम बंगाल में माकपा सबसे बड़ा दल रहा है और उसने पूरे राज्य में आम जनता के जीवन के हर क्षेत्र में वर्चस्व बनाकर रखा। राज्यतंत्र को पार्टीतंत्र में रुपान्तरित कर दिया, अब वही माकपा अपने बनाए ताने-बाने और ढाँचे से पीड़ित है क्योंकि सरकार में ममता आ गयी। ममता को विरासत में ऐसा तंत्र मिला जिसमें पार्टीतंत्र की जी-हुजूरी करने की मानसिकता पहले से ही भरी हुई थी।
        पश्चिम बंगाल में भाजपा के वोट बढ़ने का एक और बड़ा कारण है कि पश्चिम बंगाल के मूल निवासी बंगालियों का एक बड़ा हिस्सा जो कल तक माकपा के साथ था वह तेजी से भाजपा की ओर जा रहा है। साथ ही हिन्दीभाषी लोग एकमुश्तभाव से भाजपा की ओर जा चुके हैं। इन दोनों समूहों को भाजपा की ओर मोडने में बहुसंख्यकवाद और हिन्दीवाद ने मदद की है।इसबार के चुनाव में भाजपा ने बहुसंख्यकवाद और हिन्दीवाद का घर –घर मोदी प्रचार अभियान में इस्तेमाल किया है।                    

रविवार, 15 जून 2014

नरेन्द्र मोदी की दक्षिणपंथी आंधी

       सोलहवीं लोकसभा के लिए हुए चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को पूर्ण बहुमत मिल गया है। केन्द्र में पहली बार ऐसा हुआ है कि कांग्रेस से इतर किसी एक दल को बहुत मिला है । इसबार के चुनाव में अधिकांश राजनीतिक पार्टियां राष्ट्रीय स्तर पर परंपरागत ढ़ंग से चुनाव लड़ रही थीं। सिर्फ भाजपा, आम आदमी पार्टी और कांग्रेस ने प्रचार के नए हथकण्डे अपनाए । भाजपा की जीत का मूलाधार है दक्षिणपंथी पापुलिज्म । ऐसा नहीं है कि दक्षिणपंथी पापुलिज्म पहलीबार हमारे बीच में आया है। विभिन्न रुपों में यह क्षेत्र विशेष में सक्रिय रहा है। हमारे समाज में पहले भी पापुलिज्म या लहर देखी गयी है। इनमें कई लहरें उदारतावाद केन्द्रित थी। लेकिन इसबार के पापुलिज्म की धुरी है अनुदारवाद।मसलन् सन् 1971 और 1977 के पापुलिज्म की धुरी उदारवादी कार्यक्रम था। यहां तक कि राष्ट्रीय मोर्चे की सरकारों के गठन में उदारतावादी पापुलिज्म की बड़ी भूमिका थी ।

जिसे मीडिया ने मोदी लहर कहा वह वस्तुतःसंघ का पापुलिज्म है। इस पापुलिज्म को वस्तुगत ढ़ंग से खोलकर पढ़ा जाना चाहिए। पापुलिज्म या लहर को हमेशा विचारधारात्मक तौर पर विश्लेषित किया जाना चाहिए। इसे सिरों की गिनती तक रखकर न देखें।

पापुलिज्म या लहर हमेशा संदर्भकेन्द्रित होती है। मोदी लहर के दोछोर हैं एक छोर पर मनमोहन सरकार की असफलताएं हैं तो दूसरे छोर पर संघ की विचारधारा है। इन दोनों छोरों के सम्मिश्रण से मोदी लहर बनाने में आक्रामक मीडिया रणनीति की महत्वपूर्ण भूमिका है। इस लहर की अंतर्वस्तु है अनुदारलोकतंत्र और नव्य-उदार आर्थिक नीतियां । मोदी की सफलताओं का जो भी आख्यान पेश किया गया वह वस्तुतःनव्य उदार आर्थिक नीतियों की सफलता का आख्यान है।

मोदी लहर के बहाने नव्य आर्थिक नीतियों की सफलताओं को जनता के गले उतार दिया गया। जो काम मनमोहन सिंह सरकार न कर पायी वह काम मोदी ने कर दिखाया। गुजरात मॉडल के नाम पर पक्ष-विपक्ष की बहस अंततःमनमोहन सरकार की नीतियों पर ही केन्द्रित रही है। मोदी यदि एक ओर गुजरात की सफलता का गान कर रहे थे तो दूसरी ओर जिन सफल राज्यों को पेश किया गया वे भी मनमोहन नीतियों का ही प्रकारान्तर से बखान कर रहे थे।

इस नजरिए से देखें तो 16वीं लोकसभा के चुनाव मूलतःमनमोहन सिंह द्वाराअपनायी गयी आर्थिक नीतियों के कार्यान्वयन की समीक्षा पर लड़े गए। इसमें गुजरात मॉडल की जमकर चर्चा हुई और मीडिया चर्चा होने और भाजपा के जीतने को यह मान लिया गया कि गुजरात मॉडल सफल है। यानी चुनावी जीत को सफलता का पैमाना मान लिया गया। जबकि चुनावी जीत को किसी भी किस्म के विकास की सफलता का पैमाना नहीं बनाया जा सकता है।

मजेदार बात यह है कि केन्द्र सरकार द्वारा संचालित योजनाओं को कार्यान्वित करके गुजरात मॉडल बना है। लेकिन इसका यश मनमोहन सिंह सरकार को नहीं मिला।यश मिला है नरेन्द्र मोदी को। मनमोहन सिंह सरकार पर आरोप है कि वह भ्रष्ट और निकम्मी सरकार है। यानी यह चुनाव नीतियों के परिवर्तन के लिए नहीं लड़ा गया अपितु नव्य उदार आर्थिक नीतियों को लागू करने में कौन बेहतर भूमिका निभा सकता है उस पहलू पर लड़ा गया। उल्लेखनीय है आम आदमी पार्टी का भी नव्य आर्थिक नीतियों से कोई मतभेद नहीं था। वामदलों का मतभेद था, वे वैकल्पिक नीतियों की बातें करते रहे हैं इसका खामियाजा उनको भुगतना पड़ा और उनको करारी हार का सामना करना पड़ा। कहने का आशय यह कि 16वीं लोकसभा का चुनाव जिन तीन प्रमुख मोर्चों के बीच लड़ा गया उनमें नव्य उदार आर्थिक नीतियां साझा तत्व है।

इस बार के चुनाव की विशेषता थी कि यह चुनाव बहुकोणीय होते हुए भी विचारधारात्मक तौर पर दो दलों के बीच में ही था। कांग्रेस बनाम भाजपा के बीच में ही चुनाव था। देश के संचालन में इन दोनों दलों में से किसी एक दल की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है। इस वास्तविकता को मोदी ने प्रसारित किया । मोदी के हमले के केन्द्र में मूलतः कांग्रेस का नेतृत्व था।

मोदी ने कांग्रेस पर हमला करने के साथ क्षेत्रीयदलों के भ्रष्टशासन पर भी हमला बोला।क्षेत्रीय समस्याओं को उठाया।

मोदी ने अपने प्रचार में केन्द्र सरकार के भ्रष्टाचार और निकम्मेपन को मूलतः निशाना बनाया। भ्रष्टाचार और निकम्मेपन को निशाना बनाते हुए समूचे कम्युनिकेशन को विस्तार दिया। अपने को कांग्रेस के विकल्प के रुप में ही नहीं बल्कि समूची राजनीतिक व्यवस्था के विकल्प के रुप में पेश किया। राजनीतिक जीवन में मूल्यों में आई गिरावट को निशाना बनाया। उन आख्यानों और संदर्भों का इस्तेमाल किया जो राजनीतिक मूल्यों में आई गिरावट को व्यक्त करते थे।साथ ही उसने सख्त नेता की इमेज को पेश किया। इसके लिए जनता को गोलबंद करने का काम प्रच्छन्न बहुसंख्यकवाद के जरिए किया गया।

उल्लेखनीय है भारतीय जनता पार्टी और संघ परिवार खुलेआम हिन्दूराष्ट्र की हिमायत का काम वह बड़े ही स्थूल ढ़ंग से करते रहे है। लेकिन इस बार उनकी प्रचार टीम ने बहुसंख्यकवाद को मीडिया के प्रचार अभियान से निकालकर परंपरागत निजी प्रचार में इस्तेमाल किया। मीडिया में कांग्रेस के नेतृत्ववाली यूपीए सरकार के भ्रष्टाचार और निकम्मेपन और क्षेत्रीयदलों के भ्रष्टाचार और निकम्मेपन को निशाना बनाया। विकास के सपने को उछाला।

मीडिया में विकास के आख्यान और विकास की समस्याओं पर जोर दिया जबकि निजी परंपरागत प्रचार अभियान में बहुसंख्यकवाद का सघन प्रचार अभियान चलाया गया। मसलन् , संघ के लोगों ने घर –घर जाकर हिन्दुत्व के नाम पर वोट मांगे ,पर्चे बाँटे और हिन्दुत्व के नाम पर एकजुट होने की अपील की। इसका उनको लाभ मिला। बहुसंख्यकवाद की गोलबंद करने की प्रक्रिया मीडिया से तकरीबन गायब रही।इक्का-दुक्का टीवी रिपोर्ट के अलावा कहीं पर यह मीडिया में नजर नहीं आई। यहां तक कि राजनीतिकदलों को भी बहुसंख्यकवाद की आड़ में चल रहा साम्प्रदायिक प्रचार अभियान नजर नहीं आया। सब यही कहते रहे कि संघ सक्रिय है,लेकिन क्या प्रचार कर रहा है इस ओर मीडिया और राजनीतिकदलों का एकसिरे से ध्यान ही नहीं गया।

बहुसंख्यकवाद का ही परिणाम है कि अनेक राज्यों से मुसलमान सांसद चुनकर ही नहीं आए। खासकर उत्तरभारत से मुसलिम सांसदों का न चुना जाना अपने आप में समस्या है। तकरीबन 27राज्य हैं जहाँ से कोई मुसलिम सांसद नहीं चुना गया। बहुसंख्यकवाद का पापुलिज्म में बदलना स्वयं में बड़ी परिघटना है। इससे नए किस्म के सामाजिक-सांस्कृतिक ध्रुवीकरण की संभावनाएं जन्म लेंगी। नए किस्म की समस्याएं भी आएंगी जिनकी हमने कल्पना नहीं की है। 16वीं लोकसभा में मात्र 24 मुसलिम सांसद चुने गए हैं,जबकि विगत लोकसभा में 30 सांसद थे।

इस चुनाव के पहले आसएसएस हमेशा राजनीतिक प्रचार में हिन्दुत्व का जमकर मीडिया में इस्तेमाल करता था। लेकिन इसबार सचेत रुप से किसी भी संघीनेता ने हिन्दुत्व की बात नहीं की। विश्व हिन्दू परिषद और भाजपा के इक्का-दुक्का नेताओं को छोड़कर किसी ने मीडिया में सीधे हिन्दुत्व की बात नहीं की। जबकि जमीनी स्तर पर संघ ने बहुसंख्यकवाद का वोट देने की अपील के बहाने जमकर प्रचार किया। एकजुट होकर वोट देने की अपील की । म.प्र. में तो एकमुश्त वोट देने की अपील करते हुए पर्चे भी बाँटे गए।

विकास के पापुलिज्म के अंदर पतली बारीक तह में लिपटा बहुसंख्यकवाद इसलिए हजम हो गया क्योंकि वह पापुलिज्म के अंग के रुप में आया था। पापुलिज्म के फ्रेम में यदि बहुसंख्यकवाद पेश करेंगे तो यह वैसे ही लगेगा जैसे समाजवाद या लोकतंत्र स्वीकार्य विचारधारा लगती है। पापुलिज्म के कारण बहुसंख्यकवाद जनप्रिय होकर आमलोगों के कॉमनसेंस का हिस्सा बन गया। संघ ने इसबार हिन्दुत्व को एक विचारधारा के रुप में नहीं पापुलिज्म के कॉमनसेंस के रुप में प्रचारित-प्रसारित किया।

भारत में पापुलिज्म को कभी लोकतंत्र के लिए खतरा नहीं माना गया बल्कि लोकतंत्र की अभिव्यंजना का महत्वपूर्ण रुप माना गया। हमारे यहां पापुलिज्म के कई अतिवादी-हिंसक रुप प्रचलन में रहे हैं जिनको हम माओवाद प्रभावित इलाकों या आतंकवाद-पृथकतावाद प्रभावित इलाकों में देख सकते हैं लेकिन ये सभी हिंसक रुप आज तक अपनी सामाजिक स्वीकृति अर्जित नहीं कर पाए हैं।

भारत में आपातकाल वह मूलाधार है जहाँ से राजनीति करवट लेती है। खासकर कांग्रेस और संघ की राजनीति करवट लेती है। आपातकाल के बाद तेजी से कांग्रेस और संघ में तनाव किसी न किसी रुप में बना रहा है। इस क्रम में कांग्रेस का निरंतर क्षय हुआ है और संघ की शक्ति में निरंतर इजाफा हुआ है।

राममंदिर आंदोलन हो या आरक्षण विरोधी आंदोलन हो , सबमें संघ की शक्ति बढ़ी है। यहाँ तक कि हाल के वर्षों में हुए अन्ना आंदोलन में भी संघ की शक्ति में इजाफा हुआ । कहने का तात्पर्य है कि आपातकाल के बाद भारत में उठे सभी किस्म के पापुलर आंदोलनों के साथ संघ ने अपना संबंध किसी न किसी रुप में बनाए रखा इससे संघ के व्यापक जनाधार का निर्माण हुआ।

शिक्षा से लेकर स्वयंसेवी आंदोलनों तक संघ के बहुआयामी नेटवर्क काम कर रहे हैं और वे यथाशक्ति अपने को स्थानीय लोगों से जोड़े रखते हैं।यह जुड़ाव दंगे से लेकर शादी-ब्याह तक साफ देख सकते हैं।

संघ में परंपरागत लिबरल हैं तो अनुदार-कट्टरपंथी भी हैं और संघ इन दोनों में संतुलन बनाकर चलता है। जहाँ जिनको प्रभावशाली देखता है वहाँ उनका इस्तेमाल करता है। संघ के अंदर हिंदुत्व के अंदर उदार-अनुदार की कशमकश को आए दिन साफ देख सकते हैं। यह कशमकश इन दिनों विकास के नव्य-उदार मॉडल और स्वदेशी आंदोलन के अंतर्विरोध के रुप में देख सकते हैं।

जो लोग स्वदेशी आंदोलन को पसंद करते हैं वे विकास के नव्य उदार मॉडल का विरोध करते हैं। वे खुलेआम मोदी के खिलाफ भी बोलते रहे हैं। इस अंतर्विरोध को ध्यान में रखें तो सही ढ़ंग से देख पाएंगे कि संघ में किस तरह लिबरल और अनुदार के बीच छद्म टकराहट है। असल में ये दो मार्ग हैं हिन्दुत्वरुपी बहुसंख्यकवाद को आम जनता में ले जाने के लिए।

संघ उदार-अनुदार दोनों ही मार्गों का एक साथ इस्तेमाल करता रहा है और आगे भी करेगा। इससे वह अपने सांगठनिक तनावों को कम करने में सफल हो जाता है। मसलन् यदि आप लिबरल हिन्दुत्व कोमानते हैं तो संघ में रह सकते हैं अनुदार या कट्टरपंथी हैं तब भी रह सकते हैं।इनमें से किसी एक वजह से संघ के दायरे बाहर जाने की जरुरत नहीं है।अथवा संघ के दायरे के बाहर सोचने की जरुरत नहीं है। इस अर्थ में संघ ने अपने यहाँ उदार-अनुदार का व्यापक रुप में समावेश कर लिया है और सांगठनिक विभाजन की संभावनाओं को ही खत्म कर दिया है। यही वजह है संघ को छोड़ने वालों की संख्या बहुत कम रही है। जितनी बड़ी तादाद में लोगों ने कांग्रेस या कम्युनिस्ट पार्टियों को छोड़ा है उतनी बड़ी तादाद में भाजपा को छोड़ने वाले नहीं मिलेंगे। इसका एक कारण और भी है संघ की विचारधारा के असर में आने के बाद व्यक्ति का विवेकवादी राजनीतिक सोच व्यवहारवादी हो जाता है। वह रेशनल नजरिए की बजाय व्यवहारवादी नजरिए के आधार पर सोचने लगता है। इसी व्यवहारवाद को नरेन्द्र मोदी ने अपने प्रचार अभियान में इस्तेमाल किया और सबके साथ चुनावी समझौता करने का फैसला किया, इस क्रम में 25दलों के साथ राजनीतिक समझौता किया।

समूचे मीडिया प्रचार में व्यवहारवाद को ही मूलाधार बनाया गया। “अच्छे दिन आने वाले हैं” यह नारा सर्वजन स्वीकृति पा गया ,क्योंकि कोई व्यक्ति ऐसा नहीं है कि जो भविष्य में अच्छे दिन देखना न चाहता हो।

पापुलिज्म के नजरिए से मोदी ने समूचे देश की जनता को अपने सम्बोधन के निशाने पर रखा। “भ्रष्ट सरकार”, “निकम्मी सरकार” से लेकर “माँ-बेटे की सरकार ” तक का जो आख्यान है वह कांग्रेस के अंदर जो आभिजात्य है उसे उदघाटित करता है। कांग्रेस के अभिजनों की तीखी आलोचना करते हुए मोदी ने अपने को किसी दल का नहीं बल्कि पूरे सिस्टम का विकल्प बनाकर पेश किया । साथ ही राजनीति को सभी किस्म की गंदगी से मुक्त करने की बात कही। “देश को कांग्रेस से मुक्त करो” का नारा दिया। राजनीति को सारवान बनाने का संकल्प व्यक्त किया।

पापुलिज्म के आधार पर जब कोई प्रचार रणनीति अपनायी जाती है तो उसमें किसी न किसी व्यक्ति को निशाने पर रखा जाता है उसके बारे में नकारात्मक प्रचार पर जोर दिया जाता है। इसबार निशाने पर नव्य़ आर्थिक नीतियां नहीं थीं, बल्कि मनमोहन सरकार और गांधी परिवार था। मनमोहन सिंह को सोनिया गांधी के इशारे पर नाचने वाले प्रधानमंत्री के रुप में पेश किया गया।

मोदी ने जनता के सभी तबकों को सम्बोधित करने की कोशिश की। “भ्रष्टाचार” और “निकम्मेपन” के आधार पर कांग्रेस का विरोध किया।अपने को विकल्प के रुप में पेश किया। मोदी के प्रचार की दूसरी बड़ी विशेषता है कि उसने उदारतावादी नजरिए का “सबका विकास” के नारे तहत विरोध किया। अल्पसंख्यकों के हितों के संरक्षण के सवालों को हाशिए के बाहर खदेड़ दिया।

हमारे उदार लोकतंत्र में अल्पसंख्यकों के हितों के संरक्षण के सवाल हमेशा से प्रमुख रहे हैं।लेकिन “सबका विकास” का नारा ऊपर से देखने में अच्छा लगता है लेकिन इसका मूल वैचारिक लक्ष्य है उदार लोकतंत्र का विरोध करना। वे इसके जरिए यह भी कहना चाहते हैं कि बहुसंख्यक समाज को सीमित दायरे में रहकर भूमिका अदा करनी चाहिए और इसके लिए संविधान की आड़ ली गयी।

जब भी अल्पसंख्यकों और खासकर मुसलमानों के सवाल उठाए गए तुरंत विरोध किया गया और कहा गया हम तो धर्म,जाति आदि से ऊपर उठकर सबका विकास चाहते हैं। संविधान के अनुसार काम करेंगे, संतुष्टीकरण नहीं करेंगे। मुसलमानों के हितों के संरक्षण को राजनीतिक तुष्टीकरण कहकर नकारात्मक बनाकर पेश किया।

मोदी और संघ परिवार का इस प्रसंग में कहना यही है कि इस देश में जो कुछ भी करना है उसके लिए बहुसंख्यक जनता ( हिन्दू जनता) की स्वीकृति जरुरी है। मुसलमानों के लिए जो कुछ किया गया है वह तुष्टीकरण है यानी उसे बहुसंख्यक हिन्दू जनता की स्वीकृति हासिल नहीं है। फलश्रुति यह कि जो कुछ करना चाहते हो हिन्दुओं की स्वीकृति लेकर करो।यही वह बिन्दु है जहां से बहुसंख्यकवाद की विचारधारा आम जनता के जेहन में उतारी गयी। मुसलमानों के तुष्टीकरण की बातें उठाकर मोदीपंथी लोग लोकतंत्र में मुसलमानों के प्रति बनी आम सहमति पर भी सवाल उठा रहे हैं। यानी बहुसंख्यकवाद लोकतंत्र में बनी उदार आम सहमति को निशाना बनाता है।उसके प्रति घृणा पैदा करता है।

मोदी के प्रचार अभियान में वे मुद्दे खूब उठाए गए जिनको अमूमन लोकसभा चुनाव में नहीं उठाया जाता। मसलन् उसने राज्यों के विकास ,खासकर विरोधी सरकारों के विकास संबंधी कार्यों को निशाना बनाया। इसके समानान्तर अपने विकास मॉडल को मध्यवर्गीय आकांक्षाओं से जोड़कर पेश किया ।



औरत के लिए सुरक्षित जगह की तलाश


औरत के लिए कौन सी जगह सबसे ज्यादा सुरक्षित है ? क्या वह घर में सुरक्षित है ? खेत में सुरक्षित है ? थाने में सुरक्षित है ? सुप्रीमकोर्ट के वकील के साथ सुरक्षित है ? विश्वविद्यालय-कॉलेज में सुरक्षित है ? अस्पताल में सुरक्षित है ? जी,वह इनमें से सब जगह बार –बार हमलों का शिकार हुई है।
    औरत की सुरक्षा का सवाल जब भी उठा है तो हमने कड़े कानून की बातें की, जल्द न्याय की बातें की  ,उसके लिए संसाधनों की बातें की ? लेकिन फिर भी यह पाया कि औरत सबसे ज्यादा असुरक्षित है। अदालतें थक  चुकीहैं ,नेताओं की जुबान थक गयी है, जुलूस निकालने वाले थक गए हैं ,लेकिन औरत के लिए एक सुरक्षित स्थान अभी तक तय नहीं कर पाए हैं। औरत असुरक्षित क्यों है इसके कारणों की बुनियाद को टटोला जाना चाहिए।
     औरत के लिए सुरक्षित जगह फिलहाल तो कहीं पर भी नजर नहीं आती। इसका कारण है कि हम औरत पर बातें नहीं कर रहे ,हम उसकी सुरक्षा पर बातें कर रहे हैं। औरतों के बारे में बातें करते ही फब्तियां कसनी आरंभ हो जाती हैं। औरतों के सवालों और खासकर सुरक्षा के सवाल का संबंध सुरक्षा के अभाव से नहीं औरत के प्रति हमारे नजरिए से जुड़ाहै। हम औरत को किस रुप में देखते हैं और औरत स्वयं को किस रुप में देखती है,ये दोनों सवाल एक-दूसरे के पूरक हैं। औरत के बारे में हमें स्त्री-पुरुष दोनों के नजरिए की छानबीन करनी चाहिए। औरत पर बातें करते समय किसी एक के नजरिए पर ही नजर नहीं रखें बल्कि दोनों ओर नजर रखें।
     औरत के प्रति मन में जो भाव हैं उसी से तय होगा कि औरत के जीवन में किस तरह की सुरक्षा है। खिड़कियां बंद करके औरत को कभी सुरक्षा नहीं मिल सकती। हमें घर और दिमाग की खिड़कियां खोलनी होंगी। औरत के स्टीरियोटाइप सोच से बाहर निकलकर यथार्थ रुप में स्त्री के बारे में सोचना होगा। औरत के बारे में जहां एक ओर कृत्रिम औरत की इमेज से बाहर निकलने की जरुरत है वहीं दूसरी ओर पूर्वाग्रहों के आधार पर औरत को देखने की परंपरा और आदतों को भी त्यागने की जरुरत है। औरत को देखते-देखते हमारे मन में औरत का परंपरागत रुप आदत की तरह घर कर बैठा है । इससे निकलने की जरुरत है।
    औरत पर हमलों की शुरुआत पहले भाषा में होती है। वाचिकतौर पर हम पहले हमले करते हैं और वाचिक हमले बंद हों।ये हमले कायिक हमलों से ज्यादा खतरनाक और पीडादायक होते हैं। चालू जुबान में कहें तो सुनो औरत पर वाचिक हमले बंद करो। ये हमले करते-करते समूचे समाज की मनोदशा ऐसी बना दी है कि औरत पर हमले हमें रुटिन और स्वाभाविक लगने लगे हैं। औरत बदलने के पहले हमें औरत के प्रति अपनी भाषा बदलनी होगी। बोलने का लहजा बदलना होगा। इसके लिए सरकार बदलने की नहीं जुबान बदलने की जरुरत है।

     जो लोग औरत की सुरक्षा के नाम पर बड़ी बड़ी बातें कहते हैं वे सिर्फ एक बार भाषा बदल दें। स्थितियां तेजी से बदलने लगेंगी। औरत को पाना है उसे सामाजिक सुरक्षा देनी है तो पहले उसे भाषा में पाने की कोशिश करो। दूसरी चीज है जो हमें करनी होगी वह है औरत की निजता या प्राइवेसी की रक्षा। हमारे समाज में हर आदमी औरत की निजता पर हमले कर रहा है। औरत की निजता पर हमले घर में हो रहे हैं और फिर बाहर दूसरे ढ़ंग से औरत को बेइज्जत किया जा रहा है। हम औरतों के दायरों में जाना बंद करें। हमने औरत को इस कदर घेर रखा हैकि उसका कोई निजी दायरा या प्राइवेसी नहीं बची है।       

शनिवार, 14 जून 2014

आँसू क्यों निकलते हैं ?


      कुछ लोगों के लिए आँसू नाटक हैं तो कुछ लोगों के लिए परम सत्य हैं। कुछ लोग यह भी मानते हैं कि आंसू पीड़ा की अभिव्यक्ति हैं। असल में आंसू बहुअर्थी होते हैं। वे अन्य चीजों के साथ स्नायविक कमजोरी की अभिव्यक्ति होते हैं। जो लोग स्नायविक तौर पर मजबूत होते हैं वे जल्दी नहीं रोते लेकिन जो स्नायविक दुर्बलता के लक्षणों से ग्रस्त होते हैं उनके जल्द ही किसी भी बात पर आंसू निकल पड़ते हैं। आम धारणा है पुरुष कम आंसू बहाते हैं लेकिन जो स्नायविक दुर्बलता के शिकार हैं वे खूब रोते हैं। लेकिन जिस औरत में स्नायविक नियंत्रण की क्षमता होती है उसका अपने आंसुओं पर भी नियंत्रण होता है। औरत जब आंसुओं से प्रतिवाद नहीं कर पाती तब वह असंगत हिंसा और उन्माद का सहारा लेती है।

औरत या मर्द के आंसू नकली हैं या असली हैं। यह महत्वपूर्ण नहीं है। महत्वपूर्ण सवाल यह है कि आंसुओं का सागर सदियों से बहता चला आ रहा है,इस सागर में आत्मगतता कम हुई है या बढ़ी है ? औरत पहले की तुलना में आज ज्यादा आंसू बहाती है या पहले ज्यादा बहाती थी ? क्या आंसू सर्जनात्मक क्षमता का अपव्यय हैं ? आंसू जब निकलते हैं तो वे शीतलता देते हैं या और ज्यादा अशांत कर देते हैं ? आंसू औरत को विनम्र बनाते हैं या उग्र बनाते हैं ? आंसू उसके भावों को सीधे सम्प्रेषित करते हैं या उसके विषाद को गहरा बनाते हैं ? आंसुओं में डूब जाने के बाद औरत शिथिल हो जाती है लेकिन कुछसमय बाद फिर से ऊर्जस्वित होकर सहजभाव से सक्रिय हो उठती है। यह भी सोचें कि आंसू उसके सामाजिक अलगाव को कम करते हैं या बढ़ाते हैं ?

आंसुओं पर दयाभाव से नहीं वस्तुगत मानवीय भाव से विवेकवादी नजरिए से सोचना चाहिए। आंसुओं की खूबी है कि वे विवेक को धुंधला बनाते हैं। आत्मगत अनुभूतियों को सघन बनाते हैं। आंसुओं पर अविश्वास नहीं करना चाहिए और नहीं उनको नकारात्मक नजरिए से देखना चाहिए। बल्कि रेशनल या विवेकवादी नजरिए से देखना चाहिए।

कोई व्यक्ति जब विवेकवादी नजरिए से बोल नहीं पाता या सोच नहीं पाता तो आंसू निकलते हैं। आंसू गम ,खुशी,आनंद,अवसाद सबमें निकल पड़ते हैं, वे रोकने पर भी नहीं रुकते। मुश्किल यह भी है कि हमने आंसुओं को दुख का पर्याय़ बना दिया है।अमूमन आंसुओं का दुख से कम संबंध होता है।अधिकतर मामलों में अभिव्यक्ति की असमर्थता के कारण आंसू निकल पड़ते हैं। मैं निजी तौर पर यह परिस्थिति अनेकबार झेल चुका हूँ। आंसू कोई औरत की खास विशेषता नहीं है। वे पुरुषों के भी निकलते हैं और खूब निकलते हैं।

आंसुओं का नैतिकता,पाप-पुण्य आदि से कोई संबंध नहीं है। आंसू असल में मानवीय अभिव्यक्ति का एक आदिम प्रकार है। मनुष्य जिस तरह अपनी अभिव्यक्ति के लिए भाषा का इस्तेमाल करता है, भाव-भंगिमाओं का इस्तेमाल करता है। वैसे ही वह आंसुओं का भी इस्तेमाल करता है। आंसू वस्तुतः अभिव्यक्ति का एक रुप है। इसका लिंगविशेष से कोई संबंध नहीं है। यह प्राणीमात्र की विशेषता है। मैंने पशुओं को भी आंसू बहाते देखा है।



कहने का तात्पर्य यह है कि आंसू को स्त्री से जोड़कर नहीं देखना चाहिए यह तो सभी प्राणियों की अभिव्यक्ति का एक रुप है। आंसू के पीछे कौन सा भाव काम कर रहा है यह संदर्भ पर निर्भर करता है। अतः आंसुओं का अर्थ आंसू बहाने वाले के जीवन के बाहर सामाजिक संदर्भ पर निर्भर करता है। आंसू बाह्य सामाजिक आचरण या अन्य के आचरण के प्रति मानवीय भाव की अभिव्यक्ति है। इसी अर्थ में आंसू में निजी नहीं सामाजिक सत्य की भूमिका होती है, अन्य के सत्य की भूमिका होती है। आंसुओं में प्राणी की मनोदशा की द्वयर्थकता छिपी रहती है। अन्तर्विरोध छिपे रहते हैं। आंसू मन का ठंडा नमकीन पानी नहीं है बल्कि वह मानसिक द्वंद्व की अभिव्यंजना हैं।

विशिष्ट पोस्ट

मेरा बचपन- माँ के दुख और हम

         माँ के सुख से ज्यादा मूल्यवान हैं माँ के दुख।मैंने अपनी आँखों से उन दुखों को देखा है,दुखों में उसे तिल-तिलकर गलते हुए देखा है।वे क...