सोमवार, 2 मई 2016

भगतसिंह को आतंकवादी-क्रांतिकारी किसने कहा ॽ

         जिस देश में मूर्ख मंत्री हो उस देश की भगवान भी रक्षा नहीं कर सकते ! मूर्ख मंत्री अपने को ज्ञानी की तरह पेश कर रहे हैं,ज्ञानियों को वे अज्ञानी करार दे रहे हैं।इसे कहते हैं बुद्धिजीवी विरोधी माहौल।हाल में भगतसिंह के मामले में जिस तरह का आचरण केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्री स्मृति ईरानी ने किया है उसकी मिसाल भारत में मिलनी मुश्किल है।ईरानी के भक्त कमाल के ´अक्लमंद´ हैं जो बिना पढ़े ही हल्ला करने लगते हैं ! कहने को ये सब टैक्नोसेवी हैं लेकिन अक्ल से एकदम पैदल ! बेबकूफी और संचार क्रांति का विरल सह-संबंध इन दिनों हम भारत में देख रहे हैं ! वे हल्ला कर रहे हैं इतिहासकार विपन चन्द्रा ने भगतसिंह को ´आतंकवादी क्रांतिकारी´क्यों लिखाॽ कभी ठीक से इतिहास पढ लिया होता तो इस सवाल का उत्तर भी मिल जाता !

भारत में क्रांतिकारी आंदोलन के प्रवर्तकों में से एक थे डा.भूपेन्द्रनाथ दत्त ,उनकी एक किताब है ´अप्रकशित राजनीतिक इतिहास,(नवभारत पब्लिशर्स,कलकत्ता 1953) ।यह पूरी किताब क्रांतिकारियों के कारनामों से भरी है।इस किताब की भूमिका में उन्होंने लिखा है ´ क्रांतिकारियों का वास्तविक कार्य,जिसे ´आतंकवाद´कहा जाता है,आंदोलन का बाह्य प्रकाश मात्र था।पराधीनता की ग्लानि जब जब असह्य हो उठी,तब तब सभी देशों में देशप्रेम का प्रकाश आतंकवाद के रूप में दीख पड़ा।आतंकवाद जन-आंदोलन नहीं, बल्कि निष्फल प्राणों का कूड़ा-करकट जलाकर देशप्रेम की आग प्रज्वलित करने का प्रतीक है।´

स्वाधीनता संग्राम के दौरान आतंकवाद के बारे में डा.भूपेन्द्रनाथ दत्त के उपरोक्त कथन के जरिए उसके चरित्र,प्रकृति और उत्पत्ति के बारे में सरल ढ़ंग से समझ सकते हैं। अब हमसे यह न पूछो कि भूपेन्द्र दत्त कौन हैं ॽ इंटरनेट पर जाओ पता चल जाएगा ! स्वामी विवेकानंद के पास जाओ पता चल जाएगा ! उस जमाने में रूसी आतंकवाद से भारत के क्रांतिकारी किस तरह प्रभावित थे,इस पर उस दौर में ´मॉडर्न रिव्यू´ने लिखा ´हमारे सबसे बड़े रेडीकल राज्य सचिव को अवश्य ही बम फेंकनेवाला पैदा करने के अद्वितीय कृतित्व का श्रेय मिलना चाहिए।बंगाल में आतंकवाद के अंतिम कारण को सरकार की सोलहों आने स्वार्थी,स्वेच्छाचारी और अत्याचारी नीतियों में खोजना होगा। उसे खोजना होगा उस घृणापूर्ण और अपमानजनक तरीके में जिसे अधिकांश सरकारी और गैरसरकारी एंग्लो-इंडियनों ने बंगालियों के प्रति मंतव्य प्रकट करने और उनसे व्यवहार करने में अपनाया है।उन्होंने बंगालियों की भावनाओं को बूटों तले रौंदा है और उनके तथ्यों तथा आंकड़ों द्वारा समर्थित सबसे बड़े और सबसे तर्कसंगत आवेदनों पर जरा भी कान नहीं दिया। भावना और तरीकों में प्रशासन के रूसीकरण ने जनता के एक छोटे से हिस्से को रूसी आतंकवाद के तरीकों को अपनाने को बाध्य कर दिया है।´



भारत में आतंकवादी क्रांतिकारी´ आंदोलन की परंपरा बहुत पुरानी है।इसे आजकल के आतंकियों के साथ एकमेक नहीं करना चाहिए।

अक्ल का अजीर्ण है स्मृति ईरानी को

      मोदी सरकार में मानव संसाधन मंत्री स्मृति ईरानी के यहां अक्ल का अजीर्ण हो गया है।इसके कारण वे आए दिन अनाप-शनाप बोलती और एक्शन लेती रहती हैं।उनके अक्ल के अजीर्ण का ताजा नमूना है विपन चन्द्रा की किताब ´India’s Struggle for Independence´(1988) प्रतिबंध लगाने का सुझाव देना और दिल्ली वि.वि.के द्वारा उनके आदेश का तुरंत पालन करते हुए इस किताब की बिक्री पर रोक लगाना,पाठ्यक्रम में पाबंदी लगाना।

इस पुस्तक में विपनचन्द्रा के अलावा मृदुला मुखर्जी,आदित्य मुखर्जी ,सुचेता महाजन और के.एन पन्निकर के लिखे अध्याय भी हैं।विपन चन्द्रा ने भूमिका के अलावा इस किताब के कुल39 अध्यायों में से 22अध्याय स्वयं लिखे हैं।बाकी अन्य के लिखे हैं।मूल समस्या है भगतसिंह को ´क्रांतिकारी आतंकवादी´के रूप में सम्बोधित करने को लेकर ।यह किताब1988 में आई।तब से लेकर आज तक सारे देश में यह किताब बेहद जनप्रिय है।लाखों छात्रों ने इसका लाभ उठाया है।इसके पहले इस पदबंध को लेकर कभी किसी ने कोई आपत्ति प्रकट नहीं की।हाल ही में अचानक एक टीवी कार्यक्रम में इस पदबंध का जिक्र आया और मंत्री महोदया ने राजाज्ञा जारी करके किताब को पढ़ाए जाने पर पाबंदी लगादी।इससे एक बात तो साफ है कि मोदी सरकार और आरएसएस उन तमाम धर्मनिरपेक्ष इतिहासकारों को सहन करने की स्थिति में नहीं हैं जो साम्प्रदायिक नजरिए का विरोध करते हैं।स्मृति ईरानी का विपनचन्द्रा आदि की किताब पर जो रूख सामने आया है वह इस बात का भी प्रमाण है कि सत्ता के अंदर किस तरह असहिष्णुता भरी पड़ी है।इससे यह भी पता चलता है कि मोदी सरकार किसी भी तरह के वैज्ञानिक अनुसंधान को पसंद नहीं करती और ज्योंही कहीं पर कोई मौका मिलता है तुरंत हमलावर कार्रवाई करने पर उतारू हो जाती है।मंत्री महोदया के आदेस पर दिल्ली वि.वि. प्रशासन ने विभागीय स्वायत्तता का उल्लंघन किया है, बिना इतिहास विभाग से पूछे सीधे कार्रवाई करके नई घटिया मिसाल कायम की है। सामान्यतौर पर विभाग को अकादमिक मामलों में फैसले लेने का हक है,मंत्री या वीसी को भी यह हक नहीं है। खासतौर पर जिस तरह से इस किताब पर पाबंदी लगायी गयी है वह निंदनीय है और सरकार की फासिस्ट मनोदशा की अभिव्यंजना है।

सवाल यह है भगतसिंह आदि को ´क्रांतिकारी आतंकवादी´कहने का सिलसिला कहां से शुरू हुआ ॽ क्या क्रांतिकारियों को विपनचन्द्रा ने सम्बोधित करके इस पदबंध की शुरूआत की या फिर पहले से इसका कहीं आरंभ होता है।इससे भी बड़ा सवाल यह है कि आतंकवादी किसे कहें ॽआतंकवादी की परिभाषा क्या है ॽस्वयं पीएम नरेन्द्र मोदी विश्व के नेताओं और संयुक्त राष्ट्र संघ का भी आतंकवाद की परिभाषा बनाने के लिए आह्वान कर चुके हैं। सवाल यह है आरएसएस की नजर में आतंकवाद की परिभाषा क्या है ॽभारत सरकार की नजर में आतंकवाद की परिभाषा क्या है ॽ क्रांतिकारी और क्रांति की परिभाषा क्या है ॽ इससे भी बड़ा सवाल यह है क्या किसी राजनीतिक संगठन या आरएसएस जैसे संगठन के नजरिए से भारत का इतिहास लिखा जा सकता है ॽ



इतिहास लेखन एक स्वतंत्र अनुशासन है,उसके नियम,परंपराएं और दृष्टियां हैं।सामग्री संकलन की शोध पद्धतियां हैं।इनको लंबे अकादमिक विचार-विमर्श के आधार पर निर्मित किया गया है,इनके बारे में किसी नेता के मूड़ और विचारों के आधार पर फैसला नहीं हो सकता।इतिहास का क्षेत्र इतिहासकारों का है ,वह राजनेताओं के जंग की जगह नहीं है।आरएसएस इतिहासलेखन को इतिहासकारों के दायरे से बाहर लाकर राजनेताओ की,संघ के काल्पनिक इतिहासकारों की कर्मशाला बनाना चाहता है।काल्पनिक इतिहास की अशिक्षित समाज में उपजाऊ जमीन होती है,वे किंवदन्तियों और पुराकथाओं को ही इतिहास के रूप में पेश करते हैं।वे इतिहासलेखन के किसी भी वैज्ञानिक पद्धतिशास्त्र को नहीं मानते।लेकिन अकादमिक जगत कल्पनाशास्त्र और किंवदन्तियों से नहीं चलता उसके लिए अकादमिक अनुशासन में प्रवेश करने, बुद्धि,विवेक और अकादमिकश्रम की जरूरत पड़ती है,जाहिरातौर पर आरएसएस के लोग इन सब पर विश्वास नहीं करते,वे अकादमिक अनुशासन को संघ के अनुशासन के जरिए अपदस्थ करने पर उतारू हैं,इससे भी शर्मनाक बात है कि दिल्ली वि. वि. के उपकुलपति महोदय संघ के अनुशासन को मानकर एक्शन ले रहे हैं।

रविवार, 1 मई 2016

ऐसे किया श्रीमती इंदिरा गांधी के खिलाफ प्रतिवाद

         मैं अपने जीवन में सुहेल हाशमी को कभी नहीं भूल सकता।उनके कारण मुझे जमकर लाठियां खानी पड़ीं,नई कमीज फट गयी।वाकया है जेएनयू में श्रीमती इंदिरा गांधी के आने का ,संभवतः1981-82 का सत्र था।छात्रसंघ ने फैसला लिय़ा था कि इंदिरा गांधी के कैंपस प्रवेश का विरोध किया जाए।जेएनयू के पुराने कैंपस में अंतर्राष्ट्रीय अध्ययन संस्थान के सामने मैदान में पंडाल बनाकर श्रीमती गांधी के लिए मंच सजाया गया था। कैंपस के मुख्य गेट पर तत्कालीन छात्रसंघ अध्यक्ष अमरजीत सिंह सिरोही,महामंत्री अजय पटनायक,(सम्प्रति, जेएनयू शिक्षकसंघ के अध्यक्ष) नेतृत्व दे रहे थे।छात्रसंघ के ऑफिस के सामने तकरीबन 2000छात्र-कर्मचारी, मैं,सुहेल हाशमी,उपाध्यक्ष आर.वेणु आदि थे।हमलोगों के साथ इतिहासकार हरबंस मुखिया भी थे।इंदिरा गांधी के मुख्य गेट से प्रवेश करते ही सिरोही ने हाईजंप लिया और कमांडो घेरा तोड़ते हुए सीधे इंदिरा गांधी की कार के ऊपर जाकर गिरे,इसके बाद मुख्यगेट पर जमकर लाठी चार्ज शुरू हो गया।छात्रसंघ के सामने हम लोग नारे लगा रहे थे,पुलिस हमें ठेल रही थी,अचानक सुहेल ने मुझे उत्साहित किया औरमैंने पुलिस के घेरे को तोड़ा और इसके बाद जमकर लाठी चार्ज हुआ,सैंकड़ों लोग घायल हुए,पुलिस मुझे बेरहमी से मारते हुए ले गयी,उस समय छात्रों-कर्मचारियों का हजारों कंठो से प्रतिवाद सुनकर सारा कैंपस गूँज उठा इंदिरा गांधी वापस जाओ । उस लाठी चार्ज में सैंकड़ों छात्र घायल हुए लेकिन छात्रों ने वि वि की संपत्ति पर हमला नहीं किया,गुस्सा था और नारेथे।सारा आंदोलन अहिंसक था।दूसरे दिन के अखबारों में आंदोलन की खबर सुर्खियों में थी,इंदिरा गांधी का भाषण कहीं नहीं था।छात्रों ने बड़े कौशल के साथ इंदिरा गांधी के भाषण के दौरान पंडाल के अंदर लगातार उठकर पूरे भाषणभर प्रतिवाद किया और प्रतिवाद करने वाले छात्रों को पुलिस उठाती रही।पंडाल में अंदर गांधी बोल रही थीं,बाहर हजारों छात्र इंदिरा गांधी मुर्दाबाद,इंदिरा गांधी वापस जाओ,के नारे लगा रहे थे,डीडी टीवी चैनल ने पूरा भाषण रिकॉर्ड किया और उसका जो अंश टीवी पर दिखाया उसमें भाषण के समानांतर नारे जमकर गूंज रहे थे। इस बीच में एक घटना और घटी पुलिस वाले मुझे मारते -मारते वीसी ऑफिस के नीचे गाडियों के गैराज में ले गए ,वहां खड़ा करके चले गए,मैं कुछ देर बाद मौका निकालकर वहां से निकलकर फिरसे भीड़ में आ गया।इंदिरा गांधी के कैंपस से जाने के बाद हमलोग तत्कालीन वीसी नायडुम्मा से मिलने गए उनको मांगपत्र दिया,सवाल किया कि पुलिस को कैंपस में क्या उन्होंने बुलाया था तो उन्होंने कहा नहीं,हमने कहा पुलिस लाठीचार्ज के लिए माफी मांगो,उन्होंने वाकायदा माफी मांगी,प्रेस रिलीज जारी करके पुलिस लाठीचार्ज की निंदा की। पुलिस को फोन करके कहा कि गिरफ्तार छात्रों को तुरंत रिहा करो।इस तरह हम लोगों ने शांतिपूर्ण-अहिंसक प्रतिवाद का एक अध्याय पूरा किया।

छात्र राजनीति का महाख्यान है जेएनयू- 1-

      छात्र राजनीति का महाख्यान है जेएनयू। छात्र अस्मिता की राजनीति का आरंभ सन् 65-66 में बीएचयू में समाजवादियों ने किया और जेएनयू ने उसे सन् 1972-73के बाद से नई बुलंदियों तक पहुँचाया। देश में छात्र अस्मिता और छात्र राजनीति को लोकतांत्रिक बोध देने में एसएफआई की बड़ी भूमिका रही है, खासकर जेएनयू में। जेएनयू लोकतांत्रिक छात्र राजनीति की प्रयोगशाला है। इस प्रयोगशाला के निर्माण में मार्क्सवादियों, समाजवादियों और फ्री थिंकरों की केन्द्रीय भूमिका रही है।
आमतौर पर शिक्षा का देश में जो वातावरण है वह छात्रों को सामाजिक जड़ताओं और रूढियों से मुक्त नहीं करता। इसके विपरीत जेएनयू के संस्थापकों का सपना था शिक्षा को रूढियों और सभी किस्म की वर्जनाओं से मुक्ति का अस्त्र बनाया जाए। शिक्षा केन्द्र वर्जनाओं से मुक्ति के तीर्थ बनें। जेएनयू के वातावरण में सभी किस्म की वर्जनाओं से मुक्ति का संदेश छिपा है। जेएनयू में पढ़ने वाला छात्र सामान्य प्रयत्न से सामाजिक रूढियों और वर्जनाओं से मुक्त होता है । जेएनयू की संरचना में वर्जना और अछूतभाव के लिए जगह नहीं है।
भारतीय समाज की सबसे बड़ी बाधा है वर्जनाएं ,अछूतभाव और भेदभाव की सभ्यता। जेएनयू का इसी सभ्यता के साथ विचारधारात्मक संघर्ष है। जेएनयू का वातावरण निषेधों और वर्जनाओं के वातावरण का विकल्प देता और इस विकल्प को तैयार करने में जेएनयू के छात्रों और छात्र राजनीति की केन्द्रीय भूमिका रही है। यह वातावरण किसी एक नेता, प्रशासक, संगठन आदि की देन नहीं है बल्कि सामुदायिक प्रयासों की देन है। सामुदायिक प्रयासों ने जाने-अनजाने जेएनयू की धुरी बायनरी अपोजीशन को बना दिया। यहां पर छोटा बड़ा और बड़ा छोटा बन जाता है। भेदों की अनुभूति गायब है।
भारतीय समाज में तरह-तरह के भेद हैं किंतु जेएनयू में अभेद का वैभव है। जेएनयू भेदों को समझता है किंतु मानता नहीं है। बाकी विश्वविद्यालय भेदों को समझने के साथ भेदों में जीते हैं। शिक्षा के लिए भेद और वर्जनाएं सबसे बुरी चीजें हैं। इन्हीं दोनों चीजों को जेएनयू ने निशाना बनाया है। जेएनयू वास्तव अर्थों में संस्थान है यहां प्रत्येक स्तर पर सभी वर्ग शिरकत करते हैं। खासकर छात्रों की शिरकत अभूतपूर्व है। देश के किसी भी विश्वविद्यालय में प्रत्येक स्तर पर छात्रों की शिरकत, सम्मान और साख वैसी नहीं है जैसी जेएनयू में है। फैसलेकुन कमेटियों में सभी स्तरों पर छात्रों की शिरकत और छात्रों की राय का सम्मान जेएनयू की सबसे बड़ी पूंजी है।
जेएनयू का कोई भी आख्यान छात्रों के बिना नहीं बनता। जेएनयू छात्रों की पहचान ज्ञान ,राजनीति और लोकतांत्रिक नजरिए से बनी है। लोकतंत्र की महानता का जैसा आख्यान जेएनयू ने तैयार किया है वैसा दुनिया के किसी भी देश में देखने को नहीं मिलता। जेएनयू के छात्रों के पास दुनिया को देखने का एक विशिष्ट नजरिया है,जीवनशैली और स्वायत्ताता बोध है। यही वजह है जेएनयू का छात्र भिन्न नजर आता है।
जेएनयू के वातावरण में व्यक्तित्व रूपान्तरण की अद्भुत शक्ति है। आप किसी भी पृष्ठभूमि के हों जेएनयू में दाखिला लेने के बाद बदले बिना नहीं रह सकते। व्यक्तित्व रूपान्तरण की इतनी जबर्दस्त स्वाभाविक शक्ति अन्यत्र कहीं देखने को नहीं मिलती। आखिरकार परिवर्तन की यह शक्ति आती कहां से है ?
मैं अपने छोटे से तजुर्बे के आधार पर कह सकता हूँ कि जेएनयू की स्वाभाविक धारा में शामिल होने के बाद कोई भी छात्र और अध्यापक अपने को बदले बिना नहीं रह सकता। जो बदल नहीं पाते थे वे संग्रहालय की धरोहर नजर आते थे। बदलो या धरोहर बनो। यही वह प्रस्थान बिंदु है जहां से जेएनयू का वातावरण किसी भी छात्र की जीवनशैली और नजरिए को प्रभावित करता है।
जेएनयू में सन् 1979 में जब प्रवेश परीक्षा देने आया तो सबसे पहले गंगा ढाबे पर अनिल चौधरी से परिचय हुआ। वह उस समय एसएफआई के और छात्र संघ के महासचिव थे। उनसे मिलने का प्रधान कारण था वह मथुरा के थे। मैं भी मथुरा का था। उन्होंने बड़े ही आत्मीयभाव से स्वागत किया और अनौपचारिक ढ़ंग से व्यवहार किया। अनिल के अंदाज में खासकिस्म का गर्वीला ठेठ देसी भाव था जो अपनी चाल-ढाल और बातचीत की भाषा में अभिजात्य भावबोध को चुनौती देता था। वह तीक्ष्णबुद्धि और तेजतर्रार छात्रनेता था। अनेक विलायत पलट नेता उसके नजरिए के सामने बौने नजर आते थे। समस्याओं को सुलझाने की उसकी अपनी देशी शैली थी और भाषण का स्थानीय मथुरिया अंदाज था।
मथुरिया अंदाज की विशेषता है बेबाकी मुखरता। अंग्रेजी भाषी अभिजात्य पृष्ठभूमि के लोग उसकी पारदर्शी बुद्धि की दाद देते थे। अनेक बार छात्र आन्दोलन के संकट के क्षणों में अनिल की मेधा बिजली की चमक की तरह दिखती थी, अनिल की हमदर्दी और संवेदनशीलता के सारे कॉमरेड कायल थे और अपने सुख-दुख का उसे साथी मानते थे।

छात्र राजनीति का महाख्यान है जेएनयू -2-

       जेएनयू की 'स्प्रि ‍ट' का स्रोत हैं छात्र। छात्रों की एकता,सहनशीलता,मि‍तव्ययता, अनौपचारि‍कता, बौद्धि‍कता आदि‍ के सामने सभी नतमस्तंक होते हैं। जेएनयू की पहचान जी.पार्थसारथी, नायडूम्मा, मुनीस रजा,जीएस भल्ला या नामवर सिंह से नहीं बनती। जेएनयू की पहचान की धुरी है ''छात्र स्प्रिट'। यह 'छात्र स्प्रिट' सारी दुनि‍या में कहीं पर भी देखने को नहीं मि‍लेगी। जेएनयू की 'छात्र स्प्रिट' का आधार न वाम वि‍चारधारा है न दक्षि‍णपंथी वि‍चारधारा है। बल्कि लोकतांत्रि‍क अकादमि‍क वातावरण,वि‍चारधारात्मक वैवि‍ध्य, और लोकतांत्रि‍क छात्र राजनीति‍ इसकी आत्मा है। जेएनयू के वातावरण और 'छात्र स्प्रि ‍ट' को नि‍र्मि‍त करने में अनेक वि‍चारधाराओं की सक्रि‍य भूमि‍का रही है। जेएनयू का अकादमि‍क वातावरण वि‍चारधाराओं के संगम से बना है। जेएनयू में आपको एक नहीं अनेक वि‍चारधाराओं के अध्ययन-अध्यापन और सार्वजनि‍क वि‍मर्श का अवसर मि‍लता है । इस अर्थ में जेएनयू वि‍चारधाराओं का वि‍श्ववि‍द्यालय है। सि‍र्फ वाम वि‍चारधारा का वि‍श्ववि‍द्यालय नहीं है।फर्क इतना है कि‍ अन्यत्र वि‍श्ववि‍द्यालयों में वि‍चारधाराओं के अध्ययन -अध्यापन को लेकर इस तरह का खुलापन,सहि‍ष्णु और लोकतांत्रि‍क भाव नहीं है जि‍स तरह का यहां पर है।
जेएनयू की 'छात्र स्प्रिट' के अनेक नजारे हमारी आंखों से गुजरे हैं। आज भी इस 'छात्र स्प्रिट' को आप व्यंजि‍त होते देख सकते हैं। मुझे मई 1983 का ऐति‍हासि‍क क्षण याद आ रहा है। यह क्षण कई अर्थों में छात्र राजनीति‍ के सभी पुराने मानक तोड़ता है और नए मानकों को जन्मं देता है। यह वह ऐति‍हासि‍क क्षण है जि‍समें जेएनयू अपना समस्त पुराना कलेवर त्यागकर नया कलेवर धारण करता है। छात्रों में अभूतपूर्व एकता,अभूतपूर्व भूल और अभूतपूर्व क्षति‍ के दर्शन एक ही साथ हुए हैं। जेएनयू की अभूतपूर्व क्षति‍ के लि‍ए सि‍र्फ उस समय के छात्रसंघ के नेतृत्व को दोष देना सही नहीं होगा। मई 1983 की जेएनयू की तबाही के लि‍ए छात्र बहानाभर थे। असल खेल तो प्रशासकों ने खेला था। उस खेल में अधि‍कांश नामी गि‍रामी शि‍क्षकों ने प्रशासन का समर्थन कि‍या था। एकमात्र जीपी देशपाण्डे ,प्रभात पटनायक, सुदीप्ति‍‍ कवि‍राज, उत्सा पटनायक, पुष्पेंशपंत आदि ने खुलेआम छात्रों का पक्ष लि‍या था,प्रशासकों के खि‍लाफ आवाज उठायी थी। बाकी सब तो 'बदलो' ,' बदलो' कर रहे थे। मई 83 की घटना के साथ जेएनयू की समस्त पुरानी ऐति‍हासि‍क मान्याताएं, धारणाएं, वि‍श्वास, संस्कार,आदतें, राजनीति‍क मान्यताएं, प्रशासनि‍क नजरि‍या,प्रशासकीय नीति‍यां सब कुछ धराशायी हो गए । मई 83 की घटना को बहाना बनाकर जेएनयू को सुनि‍योजि‍त ढ़ंग से प्रशासकों ने तोड़ा। इस कार्य में लोकल प्रशासकों से लेकर केन्द्रीय शि‍क्षा मंत्रालय तक सभी का हाथ था। छात्र आंदोलन को तो महज बहाने के रूप में इस्तेमाल कि‍या गया था। मई छात्र आंदोलन नहीं होता तब भी जेएनयू में बुनि‍यादी परि‍वर्तन आते। मई 83 के भयानक दमन के बाद भी 'छात्र स्प्रि ट' खत्म नहीं हुई । सारे प्रशासकीय और नीति‍गत परि‍वर्तनों को लाने का बुनि‍यादी लक्ष्य था 'छात्र स्प्रिट' को नष्ट करना। छात्रों ने कभी भी यह लक्ष्य हासि‍ल करने दि‍या।उल्लेखनीय है मई आंदोलन के कारण 170 से अधिक छात्र निष्कासित हुए,एक साल दाखिले नहीं हुए,370से अधिक छात्रों पर 20 से अधिक केस दो साल तक चलते रहे। मई 83 के भयानक उत्पीडन और दमन के बावजूद छात्रों की एकता,भाईचारा, राजनीति‍क सहि‍ष्णुता और बंधुत्व बना रहा। उल्लेखनीय है मई 83 में मैं वहां की राजनीति‍ का अनि‍वार्य हि‍स्सा‍ था। जेएनयू की स्टूडेण्ट फेडरेशन ऑफ इण्डिया की जेएनयू यूनि‍ट का अध्यक्ष और दि‍ल्ली राज्य का उपाध्यक्ष था। बाद में सन् 1984 -85 के छात्रसंघ चुनाव में अध्यक्ष बनने वाला जेएनयू का एकमात्र हि‍न्दीभाषी छात्र था। जेएनयू कि‍सी व्यक्ति का बनाया नहीं है, कुछ व्यंक्तियों का भी बनाया नहीं है। वह प्रोफेसरों का भी बनाया नहीं है। जेएनयू को बनाया है छात्र स्प्रिट ने। कि‍सी महापंडि‍त ने जेएनयू नहीं बनाया। जेएनयू में व्यक्ति नहीं 'स्प्रिट' महत्वपूर्ण है। कर्मण्यता और छात्रसेवा महत्वपूर्ण है। जेएनयू 'छात्र स्प्रिट' की धुरी है कर्मण्यता। जो छात्रों के लि‍ए काम करेगा उसे वे प्यार करते हैं। वे राजनीति‍ पर ध्यान पीछे देते हैं कर्मण्यता पर ध्यान पहले देते हैं। अकर्मण्यक होने पर वे कि‍सी भी धाकड़ नेता को घूल चटा सकते हैं। छात्रों के बीच कौन कि‍तना समय देता है, उनकी तकलीफों में कौन कि‍तना ध्यान देता है,कि‍तना समय उनकी सुख दुखभरी जिंदगी में शेयर करता है। इन चीजों को जेएनयू की 'छात्र स्प्रिट' पहचानती है। कोई बढ़ि‍या नेता हो लेकि‍न छात्रों के बीच में नहीं छात्रसंघ के दफतर में क्लर्क की तरह बैठा रहे। छात्रसंघ की कार्रवाईयों को ही महत्व दे। सार्वजनि‍क तौर पर कम मि‍ले या लोगों में कम घुले मि‍ले तो ऐसे नेता को जेएनयू के छात्र पसंद नहीं करते।

छात्र राजनीति का महाख्यान है जेएनयू-3-

             जेएनयू की एक आयरनी है कि इसमें आइकॉन विरोधी भावबोध है। इसके बावजूद कुछ छात्रनेता ऐसे भी हुए जो अपने को जेएनयू के आइकॉन या प्रतीक पुरूष के रूप में प्रतिष्ठित करने में सफल रहे। इनमें जिसने सबसे ज्यादा शोहरत और साख हासिल की है वह देवी प्रसाद त्रिपाठी यानी डीपीटी। इन दिनों वह राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव हैं। देवी प्रसाद त्रिपाठी से मेरी पहली मुलाकात सन् 1979 के अक्टूबर महिने में छात्रसंघ के चुनाव के मौके पर हुई। त्रिपाठीजी के बारे में मैं लगातार अन्तर्विरोधी बातें सुनता रहता था। खासकर जेएनयू आने के बाद अनेक एसएफआई नेता थे जो नहीं चाहते थे कि त्रिपाठी जी को कभी भी एसएफआई और उससे जुड़े मंचों पर बुलाया जाए। मजेदार बात यह थी कि ये नेतागण उनके बारे में तरह-तरह की कानाफूसी भी किया करते थे। एक अवस्था तो यह भी आयी कि माकपा के दिल्ली राज्य नेतृत्व से यह तय करा लिया गया कि त्रिपाठी को कभी जेएनयू चुनाव में प्रचार के लिए नहीं बुलाया जाएगा। सन् 1979 में डी.रघुनंदन को एसएफआई ने अध्यक्ष पद पर लड़ाने का फैसला लिया। आखिरी समय में स्थितियां एसएफआई के अनुकूल नहीं थीं। उस साल एआईएसएफ के साथ चुनावी समझौता भी नहीं हो पाया था। अंत में झक मारकर जेएनयू पार्टी ब्रांच ने निर्णय लिया कि देवीप्रसाद त्रिपाठी को प्रचार के लिए इलाहाबाद से बुलाया जाए। देवी प्रसाद त्रिपाठी उस समय इलाहाबाद विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान विभाग में अध्यापन कार्य कर रहे थे और माकपा के उ.प्र. राज्य कमेटी सदस्य थे। इलाहाबाद में पार्टी का काम मूलत: उन्हीं के जिम्मे था। उल्लेखनीय है उनके इलाहाबाद में पार्टी कार्य देखने के दौरान ही पहलीबार इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अध्यक्ष पद पर एसएफआई ने चुनाव जीता था। त्रिपाठीजी की इन सारी स्थितियों के बावजूद जेएनयू के कुछ नेताओं का उनके प्रति गुटपरस्तभाव मुझे आज तक समझ में नहीं आया। मेरी समझ है जब एक व्यक्ति पार्टी का सदस्य है तो उसके प्रति पार्टी के अंदर भेदभाव नहीं होना चाहिए। डीपीटी के संदर्भ में माकपा के अंदर भेदभाव और गुटपरस्ती को मैंने पहलीबार जब देखा तो माथा ठनका था। कई बार इस मसले को लेकर पार्टी में गर्मागर्म बहसें भी हुईं और उसका यह सुपरिणाम था कि मैं त्रिपाठीजी को देखना चाहता था, मैंने कुलदीपकुमार से अपनी इच्छा व्यक्त की मेरी डीपीटी से मुलाकात करा दो। कुलदीप ने कहा वे रघु के चुनाव प्रचार के लिए आ रहे हैं तुम मेरे साथ रहना मुलाकात हो जाएगी और त्रिपाठी आए तो सबसे पहले उन्हें खाना खिलाने के लिए हम दोनों डाउन कैम्पस में कटवारिया सराय में एक रेस्टोरैंट में ले गए हम तीनों ने जमकर खाना खाया और खूब बातें की। अंत में खाना खाकर तकरीबन ग्यारह बजे रात को हम ऊपर कैम्पस में आए और गोदावरी होस्टल (लड़कियों का) में चुनावसभा स्थल पर पहुँचे और तकरीबन एक बजे करीब डीपीटी ने अपना भाषण शुरू किया जो तकरीबन ढाई घंटे का था । इतना लंबा धारावाहिक, आकर्षक, विचारों से भरा भाषण्ा सुनकर सभी छात्र मुग्ध थे, मेरे लिए यह विलक्षण अनुभव था। मैंने अनेक नेताओं के भाषण सुने थे, सबसे लंबे भाषण के रूप में जयप्रकाशनारायण और चन्द्रशेखर का भाषण मैं मथुरा में सुन चुका था। किंतु डीपीटी के भाषण के बाद जो अनुभूति भाषणकला के प्रति पैदा हुई वह आनंददायी थी। डीपीटी का भाषण आकर्षक,सरस, मानवीय और विचारधारात्मक था। यह भाषण द्विभाषी था। अधिकांश समय अंग्रेजी को मिला तकरीबन आधा घंटा हिन्दी में भी बोले। अनिलचौधरी और रमेश दधीचि के अलावा त्रिपाठीजी तीसरे छात्र नेता थे जो हिन्दी में भी थोड़ा समय बोलते थे। रघु के चुनाव की यह अंतिम सभा थी और इसमें प्रकाश कारात, सीताराम येचुरी ने भी भाषण दिया और जब त्रिपाठीजी बोल रहे थे वे दोनों मुग्धभाव से सुन रहे थे और बार-बार यह संकेत भी कर रहे थे कि त्रिपाठी को सुनना एक आनंद से कम नहीं है। मजेदार बात यह थी कि उन्हें इतना मजा आ रहा था कि प्रत्येक बीस मिनट के बाद एक स्लिप डीपीटी की ओर बढ़ा देते थे कि बीस मिनट और बोलो। किसी नेता के भाषण के प्रति किसी नेता का यह आग्रह निश्चित रूप से विरल चीज थी। डीपीटी के भाषण शुरू होने के बाद कैम्पस में और कहीं पर किसी भी संगठन को अपनी चुनावी सभा जारी रखने में जबर्दस्त मुश्किलों का सामना करना पड़ता था। विपक्ष के सभी नेता और कार्यकत्तर्ाा अपनी सभा खत्म करके उनका भाषण सुनने चले आते थे ,रघु की चुनाव सभा में कहने को मंच पर प्रकाश कारात और सीताराम येचुरी बैठे थे वे पहले ही भाषण दे चुके थे उनके भाषणों के दौरान वह हलचल और सुनने की बेचैनी नहीं देखी गयी जो त्रिपाठी के भाषण के समय देखी गयी। त्रिपाठी को लंबे समय तक विपक्ष की सभाभंग करने वाले वक्ता के रूप में भी जाना जाता था। त्रिपाठी के भाषण के प्रति आम छात्रों में एक तरह का पागलपन था। मैंने अनेक छात्रों से पूछा कि भाई ऐसा क्या है जो पागल की तरह सुनने आ गए, सभी एक ही बात कहते थे कि त्रिपाठी को सुनने में मजा आता है। त्रिपाठी के भाषण के बाद जाना कि भाषण को आनंद देने वाला होना चाहिए। अमूमन नेतागण भाषणों के जरिए बोर करते हैं। त्रिपाठी के भाषणों में रस होता था। त्रिपाठी ने अपनी भाषणकला में राजनीतिक भाषण कला में समाजवादी, कम्युनिस्ट और पंडितों की कथाशैली का सम्मिश्रण करके एक ऐसा फॉरमेट तैयार किया था जिसमें समाजवादियों की तरह विचारधारात्मक विवाद थे, कथाओं की तरह आनंद और आख्यान था साथ ही कम्युनिस्टों की समाहार शैली भी थी। त्रिपाठी की कोशिश हुआ करती थी कि श्रोताओं को कुछ देर के लिए दैनन्दिन जंजाल के बाहर ज्ञान के जंजाल में आनंद लेने को तैयार किया जाए। फलत: भाषण में विवाद ,समाहार,और आनंद की त्रिवेणी का एक अच्छी विचारोत्तोजक सुबह में मिलन होता था। त्रिपाठी का भाषण आधी रात के बाद कभी शुरू होता था और सुबह सूर्योदय के पहले तक चलता था। रघु के चुनाव के समय जो जलवा था वही जलवा अगले साल वी. भास्कर के चुनाव के समय भी था और दोनों ही मौकों पर मैन ऑफ द मैच त्रिपाठी थे। त्रिपाठी का हिन्दी का देशी ठाठ हिन्दीभाषी प्रान्तों के छात्रों को बेहद अपील करता था। डीपीटी अकेले वक्ता थे जिनकी अभिजन और गैर अभिजनों में समान अपील और सम्मान था। रघु की चुनाव सभा खत्म करने के बाद डीपीटी और मै,ं कुलदीपकुमार के पेरियार होस्टल स्थित कमरे में चले आए तब त्रिपाठीजी ने अपने हंसी-मजाक वाले अंदाज में ही मुझसे अपनी ज्योतिष संबंधी जिज्ञासाएं रखीं और इस तरह मैंने पहलीबार किसी माक्र्सवादी को ज्योतिषी से प्रश्न करते पाया।

छात्र राजनीति का महाख्यान है जेएनयू-4-

        जेएनयू के प्रतीक पुरूषों में तीन कॉमरेडों का नाम आता है ये हैं देवीप्रसाद त्रिपाठी, प्रकाश कारात और सीताराम येचुरी। इनमें से एकमात्र देवी प्रसाद त्रिपाठी ने सबसे ज्यादा कुर्बानियां दीं। आपातकाल में 18 महीनों तक जेल में रहे। जबकि बाकी दोनों का किसी भी किस्म की कुर्बानी देने का रिकॉर्ड नहीं है। यह बात दीगर है कि प्रकाशकारात और सीताराम येचुरी को माकपा के शीर्ष नेतृत्व में जगह मिली। इन दोनों नेताओं के व्यक्तित्व की अपनी-अपनी निजी विशेषताएं हैं। किंतु कुछ साझा विशेषताएं भी हैं। दोनों माक्र्सवाद की किताबी भाषा से अच्छी तरह वाकिफ हैं। दोनों का माक्र्सवाद और हिंदुस्तान के प्रति दर्शकीय संबंध है। प्रकाश कारात ने जेएनयू में सन् 1980 में भास्कर वेंकटरमन के अध्यक्ष पद हेतु आखिरी चुनाव प्रचार सभा की। तब से प्रकाशकारात ने कभी छात्र चुनाव सभाओं में हिस्सा नहीं लिया।इसी साल से चुनाव के मुख्य वक्ताओं में मेरा नाम शामिल हुआ जो 1987तक बना रहा। प्रकाश कारात का भाषण पार्टी प्रेस विज्ञप्ति, पार्टी कक्षा और पार्टी के संपादकीय शैली का मिश्रित रूप था ,उसके भाषणों में जिंदगी की धड़कनों का अभाव खटकता था, चाहकर भी वह अंत तक इस कमजोरी से मुक्त हो पाया। प्रकाश के इस स्वभाव का जीवन और पार्टी के प्रति यांत्रिक और संवेदनाहीन समझ से गहरा संबंध है। कम्युनिस्ट पार्टी के अंदर जो लोग स्टालिन टाइप व्यक्तित्व से प्रभावित हैं उन्हें प्रकाश अपील करता है। साधारण छात्रों में उसके भाषण्ाों की न्यूनतम अपील होती थी, सिर्फ एसएफआई के सदस्यों का एक हिस्सा ही उसे आदर्श वक्ता के रूप में पसंद करता था। इसके विपरीत सीताराम येचुरी के भाषणों में पब्लिक स्कूल के डिबेटरों की शैली थी, यह शैली जेएनयू के पब्लिक स्कूल मार्का छात्रों को अपील करती थी, इसी शैली के कारण सीताराम को मीडिया में भी ज्यादा पसंद किया जाता है। पब्लिक स्कूल मार्का वक्तृता शैली मूलत: आभिजात्य पापुलिज्म को संबोधित करती है। आभिजात्य पृष्ठभूमि के छात्रों में सीताराम की जनप्रियता जबर्दस्त थी । उल्लेखनीय है आभिजात्य की जनप्रियता खोखली और अस्थायी होती है। यही वजह है सीता के भाषणों का क्षणिक प्रभाव होता था। वह जिस क्षण बोलता है तत्काल ही प्रभावहीन हो जाता है। आप जब तक भाषण सुनते हैं अच्छा लगता है, भाषण बंद और प्रभाव भी खत्म। इसके विपरीत डीपीटी के भाषणों में आख्यान और विचार की सम्मिश्रित पध्दति का प्रयोग था। डीपीटी का भाषण सुनते हुए छात्र आनंद लेते थे बाद में उसे स्मरण करके बहस करते थे। बहस अंतर्वस्तु और भाषणकला दोनों को लेकर होती थी। जेएनयू की वामपंथी छात्र संस्कृति को बनाने में जिन छात्रों की भूमिका महत्वपूर्ण थी और जो आइकॉन नहीं थे किंतु अपने जमाने के जेएनयू के बेहतरीन छात्र होने के साथ बेहतरीन संगठनकर्ता थे इनमें सर्वप्रथम दो नाम आते हैं पहला रमेश दीक्षित का और दूसरा है सुनीत चोपड़ा का। इन दोनों ने अपने-अपने तरीके से जेएनयू के छात्र आंदोलन की बुनियाद का निर्माण किया।ये दोनों देश में एसएफआई जैसे विशाल छात्र संगठन के संस्थापक सदस्यों में भी हैं। सुनीत इन दिनों माकपा में हैं,खेतमजदूर यूनियन के राष्ट्रीय पदाधिकारी हैं,वर्षों माकपा की केन्द्रीय कमेटी के सदस्य रहे हैं जबकि रमेश दीक्षित राष्ट्रवादी कांग्रेस के केन्द्रीय नेतृत्व का अंग हैं। इन दोनों छात्रनेताओं ने लंबे समय तक जेएनयू के उदात्त मानवीय चरित्र को अपने दैनन्दिन व्यवहार और विचारधारात्मक कार्यों से आगे बढ़ाया। इनके अलावा उस जमाने में छात्र आंदोलन के अग्रणी नेताओं में दिनेश अवरोल, प्रबीर पुरकायस्थ, अशोकलता जैन, इंदु अग्निहोत्री,सुहैल हाशमी, दिलीप उपाध्याय ,सीताराम प्रसाद सिंह, कैशर शमीम, रमेश दधीचि ,मनमोहन ,अनिल चौधरी ,डी.रघुनंदन आदि के नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।

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