बुधवार, 24 नवंबर 2010

पश्चिम बंगाल के आर्थिक कुप्रबंधन से बेखबर क्यों हैं वामनेता

        पश्चिम बंगाल में तीन संकट है पहला संकट है अर्थव्यवस्था का। दूसरा संकट है ममता की राजनीतिक बढ़त का और तीसरा संकट है माकपा की आंतरिक बदइंतजामी का। वाममोर्चा सरकार को इन तीनों संकटों का एक ही साथ सामना करना पड़ रहा है। इनमें सबसे भयानक संकट है राज्य की अर्थव्यवस्था के कुप्रबंधन का। वाममोर्चा सरकार साढ़े तीन दशक से शासन में है लेकिन राज्य का आर्थिक प्रबंधन अभी तक अपनी बेढ़ब चाल से चलना बंद नहीं हुआ है। आर्थिक कुप्रबंधन की इतनी बुरी मिसाल अन्यत्र किसी भी राज्य में देखने को नहीं मिलेगी।
   पश्चिम बंगाल के आर्थिक कुप्रबंधन का आलम यह है कि राज्य का कर्जा लगातार बढ रहा है। 35 सालों में कोई भी वैकल्पिक रास्ता राज्य सरकार खोज नहीं पायी है। वाम शासन के आर्थिक कुप्रबंधन के कारण ही राज्य कर वसूली के मामले में आशानुरूप परिणाम हासिल नहीं कर पाया है। कम से कम अर्थव्यवस्था की दुर्दशा के लिए वाममोर्चा शासन ममता बनर्जी के ‘बाधा डालो’ मोर्चा को जिम्मेदार नहीं ठहरा सकता है।
     वाम मोर्चा के शासन के दौरान अर्थव्यवस्था का संकट किस ऊँचाई पर पहुँच गया है इसका अंदाजा राज्य कर्मचारियों को समय पर मिलने वाली तनख्बाह से नहीं लगाया जा सकता। यह सच है राज्य कर्मचारियों को मासिक पगार समय पर मिल जाती है। लेकिन यह आर्थिक सुप्रबंधन का परिणाम नहीं है। इतने लंबे समय तक शासन करने के बाद भी वाममोर्चा वैकल्पिक आर्थिक मॉडल पश्चिम बंगाल में विकसित नहीं कर पाया। इस असफलता के पीछे कौन से कारण हैं ?  
    आर्थिक सुप्रबंधन इससे पता चलेगा कि राज्य किस तरह अपने लिए धन जुटाता है ? कर वसूली की दशा क्या है ? पश्चिम बंगाल का अधिकांश कामकाज रिजर्व बैंक के कर्जे से चल रहा है। रिजर्व बैंक की ताजा रिपोर्ट के अनुसार कर्जगीर 17 राज्यों में पश्चिम बंगाल सबसे ऊपर है। उल्लेखनीय है 1977 में जब वाममोर्चा शासन में आया था तब राज्य पर रिजर्व बैंक का मात्र 11,403 करोड़ का कर्जा था। आज यह कर्जा बढ़कर 1,92,000 करोड़ रूपये हो गया है। यानी बंगाल के प्रति व्यक्ति के ऊपर वामशासन के दौरान 22 हजार रूपये का कर्जा लद चुका है।
    वामशासन में आमदनी और खर्चे के बीच में अंतराल बढ़ा है। अर्थशास्त्र की भाषा में पश्चिम बंगाल में प्रति व्यक्ति 39,656 रूपये कमाता है,इसमें से मात्र 17,132 रूपयेघर ले जा पाता है। ताजा आंकड़ों के अनुसार राज्य की आर्थिक अवस्था खस्ता है और इस खस्ता हाल अर्थव्यवस्था से निकलने का कोई सहज मार्ग नजर नहीं आ रहा है। इस संकट को कम करने के लिए वित्तमंत्री असीमदास गुप्ता ने हाल ही में कुछ वस्तुओं पर एक प्रतिशत वैट बढ़ाने का प्रशासनिक फैसला किया है। अब उपभोक्ताओं से 13.5 प्रतिशत वैट लिया जाएगा। यह वैट माइक्रोवेब कुकिंग रेंज से लेकर म्यूजिक सिस्टम तक लगेगा। इससे राज्य को 200 करोड़ रूपयों की आय होने की उम्मीद है।
    इसके अलावा राज्य सरकार अपने खर्चों में 10 प्रतिशत की विभिन्न मदों में कटौती करके 1000 करोड़ रूपये बचाने की कोशिश करेगी। वित्तमंत्री का यह भी तर्क है कि राज्य सरकार ने छठे वेतन आयोग की सिफारिशों के आधार पर नए वेतनमान लागू किए हैं। इसके कारण राज्य के वेतन आदि पर होने वाले खर्चे में 35-40 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी हुई है। इसके अलावा महंगाई भत्ते की दूसरी किश्त का भुगतान भी करना है,दूसरी ओर केन्द्र सरकार ने केन्द्रीय फंड से मिलने वाले सात हजार करोड़ रूपये का अब तक भुगतान नहीं किया है ।  वित्तमंत्री का कहना  है कि पश्चिम बंगाल ही कर्ज पर नहीं चल रहा केन्द्र सरकार भी कर्ज पर चल रही है और उस पर 35 लाख करोड़ रूपये का कर्जा है।    
    मजेदार बात यह है वाम सरकार प्रशासनिक आदेश से एक प्रतिशत वैट बढ़ा रहा है जबकि यही वामपंथी दल दिल्ली में केन्द्र सरकार को प्रशासनिक आदेश से कर लगाने, दाम बढ़ाने आदि का विरोध करते रहे हैं। राज्य के वित्तमंत्री ने माना है राज्य आर्थिक ‘समस्या’ से गुजर रहा है। लेकिन वे इसे आर्थिक ‘संकट’ मानने को तैयार नहीं हैं।
   आर्थिक कुप्रबंधन को सुप्रबंधन के नाम से प्रसारित करने वाले वामनेताओं को यह जानकर आश्चर्य होगा कि सन् 2008-09 के दौरान बिहार ने राज्य के सकल घरेलू उत्पाद में  3.0 प्रतिशत अतिरिक्त की कर वसूली की,मध्यप्रदेश ने 2.0 प्रतिशत,छत्तीसगढ़ 1.3 प्रतिशत,उत्तरप्रदेश 1.1 प्रतिशत अतिरिक्त कर वसूली की।
   इसके विपरीत पश्चिम बंगाल में बजट करघाटा 3.7 प्रतिशत दर्ज किया गया। हम जानना चाहते हैं वाम शासित राज्य सरकार भाजपा ,जद(यू) और बसपा के द्वारा संचालित राज्य सरकारों से भी खराब आर्थिक प्रबंधन क्यों कर रहे है ? ये आंकड़े रिजर्व बैंक के हैं। किसी दल के नहीं हैं।
    वित्तमंत्री का यह कहना गलत है कि बढ़े हुए नए वेतनमानों के कारण कर्ज बढ़ा है। यह बात एकदम गलत है। कर्ज लेकर सरकार चलाने का सिलसिला नए वेतनमान लागू होने के पहले से चला आ रहा है। मसलन् राज्य पर सन् 1977 में 11,403 करोड़ रूपये कर्ज था जो ,सन् 2008-09 में बढ़कर 1,48,110 करोड़ रूपये हो गया। सन् 2010-11 में यह बढ़कर 1,92,000 करोड़ रूपये हो गया है। जबकि नए वेतनमान एकसाल पहले ही लागू किए गए हैं। राज्य लंबे समय से कर्ज लेकर खर्चा चलाता रहा है। इसके अलावा राज्य ने विभिन्न उपायों के जरिए बाजार से भी पैसा उठाया है।      
पश्चिम बंगाल में आर्थिक कुप्रबंधन का आलम यह है कि  97.5 प्रतिशत आंगनबाड़ी का काम ठेकेदारों के जरिए हो रहा है। 97 प्रतिशत उचित मूल्य की दुकानें निजी स्वामित्व में चल रही हैं। 75 प्रतिशत आंगनबाड़ी संस्थाओं के पास निजी बिल्डिंग नहीं है। 66 प्रतिशत आंगनबाड़ी के पास पीने के पानी की सुविधा नहीं है। राज्य में 41.2 लाख बच्चे हैं जो अभी तक इंटीग्रेटेड चाइल्ड डवलपमेंट सर्विस स्कीम के बाहर हैं। 
     पश्चिम बंगाल में बच्चों में कुपोषण चरम पर है। कुपोषण के शिकार मात्र 41 प्रतिशत बच्चों तक ही अतिरिक्त भोजन पहुँच पाया है। कुपोषण के शिकार मात्र 24 प्रतिशत बच्चों को स्वास्थ्य केन्द्रों  के पास भेजा गया है। सार्वजनिक वितरण प्रणाली की अवस्था और भी खराब है । राज्य में 3 लाख नकली राशनकार्ड हैं। 31 लाख बच्चे ऐसे हैं जिन्हें स्कूल में खाना नहीं मिलता।  अपर प्राइमरी के 43 प्रतिशत बच्चे हैं जिन्हें स्कूल में दोपहर का भोजन नहीं मिलता। 11 प्रतिशत प्राइमरी स्कूल के बच्चे हैं जिन्हें दोपहर का भोजन नहीं मिलता। आश्चर्य की बात यह है कि यह सब जानने के बाबजूद राज्य वामनेताओं को आर्थिक कुप्रबंधन नजर क्यों नहीं आता ? 

मंगलवार, 23 नवंबर 2010

नव्य उदार यथार्थ और मार्क्सवादी असफलताएं


        मार्क्सवादी आलोचक  फ्रेडरिक जेम्सन ने मौजूदा दौर के संदर्भ में मार्क्सवाद की पांच थीसिस प्रतिपादित की हैं। इनमें दूसरी थीसिस में उन्होंने उन खतरों की ओर ध्यान खींचा है जो मार्क्सवाद के लिए आ सकते हैं या आए हैं और जिनसे मार्क्सवादी आंदोलन को धक्का लगा है। उत्तर आधुनिक परिस्थितियों के आने साथ मार्क्सवादी चिंतन को नव्य उदार आर्थिक नीतियों और उसके गर्भ से पैदा हुए बाजार ने सबसे बड़ा खतरा पैदा किया है। इन नीतियों के इतने व्यापक और भयावह रूपान्तरणकारी परिणाम होंगे इसका कोई भी मार्क्सवादी पूर्वानुमान नहीं लगा पाया।
     नव्य उदारतावाद के खिलाफ विचारधारात्मक तर्कसंघर्ष में मार्क्सवादी आम लोगों का दिल जीतने ,उन्हें इसके परिणामों के बारे में समझाने में असमर्थ रहे। इस समस्या के दो स्तर थे, पहला स्तर स्वयं मार्क्सवादियों के लिए था वे खुद समझ ही नहीं पाए कि नव्य उदार आर्थिक नीतियों का क्या परिणाम निकलेगा। उनका इन नीतियों के प्रति तदर्थ रवैय्या था। जब वे स्वयं दुविधाग्रस्त थे तो वे अन्य को कैसे समझाते ? इससे संकट और भी गहरा हो गया। नव्य उदारतावाद के पक्ष में सारी दुनिया में इकतरफा प्रचार अभियान चला है।
   दूसरी समस्या यह आयी कि नव्य उदार परिवर्तनों के गर्भ से जो परिवर्तन पैदा हुए उनसे मार्क्सवादी लाभ नहीं उठा पाए। वे उस यथार्थ को पकड़ ही नहीं पाए जो नव्य उदार आर्थिक नीतियों के गर्भ से जन्मा है। उन्हें यह सामान्य सी बात समझ में नहीं आई कि कम्यूटर आज के मनुष्य की अपरिहार्य जरूरत है। भारत में लंबे समय तक अनेक मार्क्सवादी कम्प्यूटरीकरण के पक्ष में नहीं थे। लंबे अर्से के बाद उन्होंने हथियार डाले। इस चक्कर में मजदूरवर्ग को उन्होंने पिछड़ी कठमुल्ला चेतना के हवाले कर दिया। पश्चिम बंगाल और केरल कम्प्यूटर क्रांति में पिछड गए और बाकी देश आगे निकल गया। समूचा सोवियत संघ और पुराना समाजवादी देशों का समूह इस परिवर्तन को नहीं समझने के कारण तबाह हो गया। सोचिए 18 साल तक सोवियत संघ की कम्युनिस्ट पार्टी ने पार्टी कॉमरेड वैज्ञानिकों को काफ्रेंस में कम्प्यूटर की उपयोगिता पर बहस करने की अनुमति नहीं दी।
   उत्तर आधुनिकतावाद के संदर्भ में मार्क्सवादियों की सफलताएं कम हैं असफलताएं ज्यादा हैं। सबसे बड़ी असफलता है नव्य उदार आर्थिक नीतियों के गर्भ से पैदा हुई असुरक्षा, अव्यवस्था,विस्थापन और भय को संगठनबद्ध न कर पाना। नव्य उदार दौर में मजदूरवर्ग के क्षय को वे रोक नहीं पाए और असंगठित मजदूरवर्ग की तबाही को अपने संगठनों के जरिए एकजुट नहीं कर पाए। आज महानगरों में लाखों असंगठित मजदूर हैं जो किसी भी वाम संगठन में संगठित नहीं हैं।
     मजदूरवर्ग के अंदर नव्य उदारतावाद ने जो भय पैदा किया उसे भी प्रभावशाली ढ़ंग से मार्क्सवादी लिपिबद्ध नहीं कर पाए। इसका व्यापक दुष्परिणाम निकला है,मजदूरों की आवाज सामान्य वातावरण से गायब हो गयी है। नव्य उदारपंथी एजेण्डा वाम संगठनों में आ घुसा है। वे इससे बचने की युक्ति नहीं जानते।
   इसी प्रसंग में फ्रेडरिक जेम्सन ने लिखा, ‘‘तर्कमूलक संघर्ष (जैसा कि यह सीधी वैचारिक लड़ाई के विरुध्द है) अपने विकल्पों की साख समाप्त करके और थीमैटिक प्रसंगों की एक पूरी श्रृंखला को अनुल्लेखनीय घोषित करके सफलता हासिल करता है। यह राष्ट्रीकरण, विनियमन, घाटा व्यय, कीन्सवाद, नियोजन, राष्ट्रीय उद्योगों की सुरक्षा, सुरक्षा नेट, तथा अंतत: स्वयं कल्याणकारी राज्य जैसी पूर्ववर्ती गंभीर संभावनाओं को निर्णायक रूप में अवैध घोषित करने के लिए क्षुद्रीकरण, निष्कपटता, भौतिकस्वार्थ, 'अनुभव', राजनीतिक भय ऐतिहासिक सबक को 'आधार' मानने का आग्रह करता है। कल्याणकारी राज्य को समाजवाद बताना बाजारवाद का उदारवादियों (अमरीकी प्रयोग में जैसा कि 'न्यू डील लिबरल्स' में किया गया है) तथा वामपंथियों दोनों पर दोहरी जीत दिलाता है। इस प्रकार आज वामपंथ ऐसी स्थिति में आ गया है जब उसे बड़ी सरकारों या कल्याणकारी राज्यों का समर्थन करना है। सामाजिक प्रजातंत्र की समीक्षा करने की जो वामपंथियों की विस्तृत और परिष्कृत परंपरा रही है, उसके लिए यह कार्य खासकर वामपंथियों को इतिहास की द्वंद्वात्मक समझ जितनी होनी चाहिए उतनी नहीं होने के कारण बेहद लज्जित करने वाला है। खास तौर पर, ऐतिहासिक स्थितियों में परिवर्तन तथा उनके अनुरूप उपयुक्त राजनीतिक और कार्यनीतिगत प्रतिक्रिया के बारे में पुन: कुछ बोध प्राप्त करना वांछनीय है। लेकिन यह भी तथाकथित इतिहास के अंत यानी आम तौर पर उत्तरआधुनिक की मौलिक अनैतिहासिकता के साथ बहस की मांग करता है।’’
 मार्क्सवादी फ्रेडरिक जेम्सन ने आगे लिखा है, ‘‘इसी बीच मनोराज्य (यूटोपिया) से जुड़ी चिंताएं जो इस भय से उत्पन्न होती हैं कि हमारी वर्तमान पहचान, हमारी आदतें और आकांक्षा पूर्ति के तरीकों का निर्माण करने वाली चीज कतिपय नई सामाजिक व्यवस्था में समाप्त हो जाएगी तथा सामाजिक व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन आज कुछ समय पहले की तुलना में अधिक संभव है। स्पष्टतया दुनिया के आधे से अधिक भाग में और न केवल प्रभावशाली वर्गों में आज निस्सहाय लोगों के जीवन में परिवर्तन की आशा का स्थान 'नष्ट हो जाने के भय' ने ले लिया है। इस प्रकार की मनोराज्य-विरोधी (एंटी-यूटोपियन) चिंताओं को दूर करना अनिवार्य है जो कि सांस्कृतिक निदान और उपचार के रूप में किया जाना चाहिए न कि बाजार के सामान्य बहस और अलंकार की इस या उस विशेषता से सहमति जताकर इससे बचना चाहिए।’’
‘‘मानव-स्वभाव मूल रूप से अच्छा और सहयोगी है या फिर बुरा और आक्रामक। यदि यह सर्वसत्तात्मक राज्य (लेवियाथन) को नहीं तो कम से कम बाजार को वश में रखने की अपेक्षा करता है, ये सारे तर्क वास्तव में मानवतावादी और विचारधारात्मक हैं (जैसा कि अलथूसर ने कहा है) और इसके स्थान पर रैडिकल परिवर्तन और सामूहिक परियोजना का परिप्रेक्ष्य लाना चाहिए। साथ ही वामपंथियों को बड़ी सरकारों या फिर कल्याणकारी राज्यों का आक्रामक रूप से बचाव करना चाहिए तथा मुक्त बाजार के ऐतिहासिक ध्वंसात्मक रिकार्ड को देखते हुए बाजारवाद पर लगातार प्रहार करते रहना चाहिए ।’’


भारत में विद्रोह -कार्ल मार्क्स

     विद्रोही सिपाहियों के हाथ में दिल्ली के आने और मुगल सम्राट के राज्याभिषेक की उनके द्वारा घोषणा किए जाने के बाद, 8 जून को ठीक एक महीना बीता है। लेकिन, ऐसा कोई खयाल मन में रखना कि भारत की प्राचीन राजधानी पर, अंग्रेजी फौजों के विरुद्ध, विप्लवी हिंदुस्तानी अधिकार बनाए रह सकेंगे, निरर्थक होगा। दिल्ली की हिफाजत के लिए केवल एक दीवाल और एक मामूली सी खाई है, जबकि उसके चारों तरफ की, और उससे ऊंची-ऊंची जगहों पर जहां से उसकी गतिविधि को रोका जा सकता है अंग्रेजों ने कब्जा कर रखा है। इसलिए, उन दीवारों को तोड़े बिना भी, केवल उसके पानी की सप्लाई को काटकर ही, बहुत थोड़े समय के अंदर, वे बागियों को आत्मसमर्पण करने के लिए मजबूर कर दे सकते हैं।
    इसके आलावा, विद्रोही सिपाहियों की एक ऐसी असंगठित भीड़ जिसने स्वयं अपने अफसरों को मार डाला है, अनुशासन के बंधनों को तोड़ कर टुकड़े-टुकड़े कर दिया है और जो अभी तक ऐसा कोई आदमी ढूंढ़ने में सफल नहीं हुई है जिसको वह अपना सर्वोच्च सेनापति बना सकेनिश्चित रूप से ऐसी शक्ति नहीं है जो किसी गंभीर और दीर्घकालीन प्रतिरोध का संगठन कर सके। गड़बड़ हालत में मानो और भी गड़बड़ी पैदा करने के लिए, दिल्ली की रंग-बिरंगी फौजें नए-नए आदमियों के आने से रोजाना बढ़ती जा रही हैं। बंगाल प्रेसीडेंसी के कोने-कोने से बागियों के नए-नए गिरोह आकर उनमें शामिल होते जा रहे हैं। 
     मालूम होता है जैसे किसी पूर्वनिर्धारित योजना के अनुसार वे सब उस हतभागे शहर में अपने को झोंकते जा रहे हैं। 30 और 31 मई को किलेबंदी की दीवारों के बाहर विद्रोहियों ने जो दो हमले किए थे, उनके पीछे आत्मविश्वास या शक्ति की किसी अनुभूति की अपेक्षा निराशा की ही भावना अधिक काम करती मालूम होती थी। इन दोनों ही हमलों में उन्हें भारी नुकसान हुआ और वे पीछे ढकेल दिए गए। आश्चर्य की चीज तो केवल ब्रिटिश कार्रवाइयों की सुस्ती है। एक हद तक इसकी वजह मौसम की भयानकता और आवाजाही के साधनों की कमी हो सकती है। 
    फ्रांसीसियों के पत्र बताते हैं कि कमांडर-इन-चीफ जनरल एंसन के अलावा लगभग 4,000 यूरोपियन सैनिक घातक गर्मी के शिकार बन चुके हैं, और इस बात को तो अंगरेजी अखबार तक मंजूर करते हैं कि दिल्ली के पास की लड़ाइयों में सैनिकों को दुश्मन की गोलियों की अपेक्षा गर्मी से अधिक नुकसान पहुंचा है। उनके पास आने-जाने के साधनों के अभाव के फलस्वरूप, अंबाला में तैनात मुख्य ब्रिटिश सेनाओं को दिल्ली पर धावा बोलने के लिए वहां तक पहुंचने में लगभग सत्ताइस दिन लग गए, यानी औसतन हर दिन वे लगभग डेढ़ घंटा चल सके। और भी देरी अंबाला में भारी तोपों के न होने की वजह से हो गई। परिणामस्वरूप, अंबाला की फौजों को सबसे नजदीक के शस्त्रागार से, जो सतलज के उस पार फिल्लौर में था, हमला करने की एक गाड़ी लाने की आवश्यकता पड़ी।
इस सब के कारण, दिल्ली के पतन का समाचार किसी भी दिन आ सकता है; लेकिन उसके आगे क्या होगा? भारतीय साम्राज्य के परंपरागत केंद्र पर विद्रोहियों के एक महीने के निर्विरोध अधिकार ने बंगाल की फौज को एकदम छिन्न-भिन्न कर देने में, कलकत्ते से लेकर उत्तर में पंजाब तक और पश्चिम में राजपूताना तक, विद्रोह और सेना-त्याग की आग को फैला देने में और भारत के एक किनारे से दूसरे किनारे तक ब्रिटिश सत्ता की जड़ों को हिला देने का काम करने में यदि जबरदस्त योग दिया था, जो इस बात को मान लेने से बड़ी दूसरी गलती नहीं होगी कि दिल्ली के पतन से चाहे उसके कारण सिपाहियों की पांतों में घबड़ाहट भले फैल जाए विद्रोह दब जाएगा, उसकी प्रगति रुक जाएगी या ब्रिटिश शासन की पुनर्स्थापना हो जाएगी। बंगाल की पूरी देशी फौज में लगभग 80 हजार सैनिक थे। इनमें लगभग 28 हजार राजपूत, 23 हजार ब्राह्मण, 13 हजार मुसलमान, 5 हजार दलित जातियों के हिंदू, और बाकी यूरोपियन थे। विद्रोह, सेना-त्याग, या बर्खास्तगी के कारण इनमें से 30 हजार गायब हो गए हैं। जहां तक उस सेना के बाकी हिस्से का सवाल है, तो उसकी कई रेजीमेंटों ने खुलेआम एलान कर दिया है कि वे ब्रिटिश सत्ता के प्रति वफादार रहेंगी और उसका समर्थन करेंगी, लेकिन जिस मामले को लेकर देशी सेनाएं इस वक्त लड़ाई कर रही हैं, उसके संबंध में ब्रिटिश सत्ता का साथ वे नहीं देंगी : देशी रेजीमेंटों के विद्रोहियों के विरुध्द कार्रवाइयों में अंगरेज अधिकारियों की वे सहायता नहीं करेंगी, बल्कि इसके विपरीत, वे अपने 'भाइयों' का साथ देंगी। कलकत्ता से लेकर आगे के लगभग प्रत्येक स्टेशन पर इस बात की सचाई प्रमाणित हो चुकी है। देशी रेजीमेंटें कुछ समय तक निष्क्रिय रहीं; लेकिन, ज्योंही उन्होंने यह समझ लिया कि वे काफी मजबूत हो गई हैं, त्योंही उन्होंने व्रिदोह कर दिया। जिन रेजीमेंटों ने अभी तक कोई घोषणा नहीं की है, और जिन देशी बाशिंदों ने विद्रोहियों का अभी तक साथ नहीं दिया है, उनके बारे में लंदन टाइम्स के एक भारतीय संवाददाता ने जो कुछ लिखा है, उससे उनकी 'वफादरी' के संबंध में कोई संदेह नहीं रह जाता : वह लिखता है, 'अगर आप पढ़ें कि सब कुछ शांत है, तो इसका मतलब यह समझिए कि देशी फौजों ने अभी तक खुली बगावत नहीं की है; कि आबादी का असंतुष्ट भाग अभी तक खुले विद्रोह में नहीं आया है; कि या तो वे बहुत कमजोर हैं, या अपने को कमजोर समझते हैं, या फिर वे अधिक अनुकूल अवसर की राह देख रहे हैं। जहां आप बंगाल की किसी घुड़सवार या पैदल देशी रेजीमेंट के अंदर 'वफादारी के प्रदर्शन' की बात पढ़ें, तो समझ लीजिए कि इस तरह से जिन रेजीमेंटों की अनुकूल चर्चा की गई है उनमें से केवल आधी ही वास्तव में वफादार हैं; बाकी आधी सिर्फ दिखावा कर रही हैं, जिससे कि उचित अवसर आने पर वे यूरोपियनों को और भी कम चौकस पाएं; अथवा, जिससे कि संदेहों को दूर करके, अपने विद्रोही साथियों को वे और भी अधिक सहायता देने की शक्ति प्राप्त कर लें।'
पंजाब में, देशी फौजों को भंग कर ही खुले विद्रोह को रोका जा सका है। अवध में केवल लखनऊ की रेजीडेंसी पर अंग्रेजों का कब्जा कहा जा सकता है; बाकी सब जगहों पर देशी रेजीमेंटों ने विद्रोह कर दिया है, अपने गोले-बारूद के साथ वे भाग गई हैं; तमाम बंगलों को जलाकर उन्होंने खाक कर दिया है, और बाहर जाकर वे उस आबादी के साथ मिल गई हैं जिन्होंने स्वयं हथियार उठा लिए हैं। अंगरेजी फौज की वास्तविक स्थिति इस तथ्य से सबसे अच्छी तरह स्पष्ट हो जाती है कि पंजाब और राजपूताना दोनों में उसने अब उड़नदस्ते कायम करने की जरूरत समझी है। इसका मतलब हुआ कि अपनी बिखरी फौजों के बीच संचार व्यवस्था को बनाए रखने के लिए अंगरेज न तो सिपाहियों की अपनी फौज पर भरोसा कर सकते हैं और न देशी लोगों पर। प्रायद्वीप युध्द के दिनों में फ्रांसीसियों की भांति ही अंगरेजों का भी जमीन के केवल उसी टुकड़े पर और उस टुकड़े के पड़ोस के केवल उसी भाग पर अधिकार है जहां स्वयं उनकी फौजें कब्जा किए हुए हैं। अपनी फौज के बाकी बिखरे हुए लोगों के बीच संचार संबंध के लिए उन्हें उड़नदस्तों पर ही निर्भर करना पड़ता है। इन उड़नदस्तों का काम, जो स्वयं बहुत जोखिम भरा है, जितने ही व्यापक क्षेत्र में फैलता जाता है, स्वाभाविक रूप से वह उतना ही कम कारगर होता जाता है। ब्रिटिश फौजों की वास्तविक अपर्याप्तता इस बात से और सिध्द हो जाती है कि विद्रोही स्थानों से खजानों को हटाने के लिए वे देशी सिपाहियों से मदद लेने के लिए मजबूर हो गए थे। और उन्होंने, बिना किसी अपवाद के, रास्ते में विद्रोह कर दिया था और उन खजानों को, जो उन्हें सौंपे गए थे, लेकर भाग खड़े हुए थे। इंग्लैंड से भेजे गए सिपाही, अच्छी से अच्छी हालत में भी, नवंबर से पहले वहां नहीं पहुंचेंगे, और मद्रास और बंबई प्रेसीडेंसियों से यूरोपियन सैनिकों को हटाना और भी खतरनाक होगामद्रास के सिपाहियों की 10वीं रेजीमेंट में असंतोष के लक्षण पहले ही प्रकट हो चुके हैं। इसलिए, बंगाल की पूरी प्रेसीडेंसी में नियमित टैक्सों की वसूली के विचार को छोड़ देना होगा और टूट-फूट की प्रक्रिया को यों ही चलने देना होगा। अगर हम यह भी मान लें कि बर्मियों की हालत और नहीं सुधरेगी, ग्वालियर का महाराजा अंगरेजों का समर्थन करता रहेगा और नेपाल का शासकजिसके पास सबसे अच्छी भारतीय फौज है, खामोश रहेगा; असंतुष्ट पेशावर अशांत पहाड़ी कबीलों के साथ नहीं मिल जाएगा और फारस (ईरान) का शाहइ हेरात को खाली कर देने की मूर्खता नहीं करेगा तब भी, बंगाल की पूरी प्रेसीडेंसी को फिर से जीतना होगा, और संपूर्ण एंग्लो-इंडियन सेना को फिर से संगठित करना होगा। इस विशाल कार्य का पूरा कर पूरा व्यय ब्रिटिश जनता के मत्थे पड़ेगा। जहां तक लाड्र्स सभा में लार्ड ग्रैनबिल द्वारा व्यक्त किए गए इस विचार का संबंध है कि इस कार्य के लिए, भारतीय कर्जों की मदद से, ईस्ट इंडिया कंपनी स्वयं आवश्यक साधन जुटा लेगी, जो यह कहां तक सही है, इसे बंबई के रुपए के बाजार पर उत्तर पश्चिमी प्रांतों की अशांत हालत का जो असर पड़ा है, उसी से समझा जा सकता है। देशी पूंजीपतियों के अंदर फौरन जबरदस्त घबड़ाहट फैल गई है, बैंकों से बहुत भारी-भारी रकमें निकाल ली गई हैं, सरकारी हुंडियों का बिकना लगभग असंभव हो गया है, और बड़े पैमाने पर न सिर्फ बंबई में, बल्कि उसके आसपास भी रुपयों को गाड़कर छिपाना आरंभ हो गया है।

(4 अगस्त 1857 के न्यूयार्क डेली ट्रिब्यून, अंक 5082 में प्रकाशित हुआ।)



सोमवार, 22 नवंबर 2010

भारतीय सेना में विद्रोह- कार्ल मार्क्स

फूट डालो और राज्य करो, रोम के इसी महान नियम के आधार पर ग्रेट ब्रिटेन लगभग डेढ़ सौ वर्ष तक अपने भारतीय साम्राज्य पर अपना शासन बनाए रखने में कामयाब हुआ था। जिन विभिन्न नस्लों, कबीलों, जातियों, धार्मिक संप्रदायों और स्वतंत्र राज्यों के योग से उस भौगोलिक एकता का निर्माण हुआ है जिसे भारत कहा जाता है, उनके बीच आपसी शत्रुता फैलाना ही ब्रिटिश आधिपत्य का बुनियादी उसूल रहा है। लेकिन, बाद के काल में, उस आधिपत्य की परिस्थितियों में एक परिवर्तन हुआ। सिंध और पंजाब की फतह के बाद, एंग्लो-इंडियन साम्राज्य न केवल अपनी स्वाभाविक सीमाओं तक फैल गया था, बल्कि स्वतंत्र भारतीय राज्यों के अंतिम चिह्नों को भी पैरों तले कुचल कर उसने नष्ट कर दिया था। तमाम लडाकू देशी जातियों को वश में कर लिया गया था, देश के अंदर के तमाम बड़े झगड़े खतम हो गए थे, और हाल में अवध के (अंगरेजी सलतनत मेंअनु.) मिला लिए जाने की घटना ने संतोषप्रद रूप से इस बात को सिध्द कर दिया था कि तथाकथित स्वतंत्र भारतीय राज्यों के अवशेष केवल अंगरेजों की दया पर ही जिंदा हैं। इसलिए ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थिति में एक जबरदस्त परिवर्तन आ गया था। अब वह भारत के एक भाग की मदद से दूसरे भाग पर हमला नहीं करती थी; वह अब उसके शीर्ष स्थान पर आसीन हो गई थी और सारा भारत उसके चरणों में पड़ा था। अब वह फतह करने का काम नहीं कर रही थी, वह सर्वविजेता बन गई थी। उसकी मातहत सेनाओं को अब उसके साम्राज्य का विस्तार करने की नहीं, बल्कि उसे केवल बनाए रखने की जरूरत थी। सिपाहियों को बदल कर उन्हें पुलिस मैन बना दिया गया था; 20 करोड़ भारतवासियों को अंगरेज अफसरों की मातहती में 2 लाख सैनिकों की देशी फौज की मदद से दबा कर रखा जा रहा है, और इस देशी फौज को केवल 40 हजार अंगरेज सैनिकों की सहायता से काबू में रखा जा रहा है। प्रथम दृष्टि में ही यह स्पष्ट हो जाता है कि भारतीय जनता की फर्माबरदारी उस देशी फौज की नमकहलाली पर आधारित है जिसे संगठित करके ब्रिटिश शासन ने, साथ ही साथ, भारतीय जनता के प्रतिरोध के एक प्रथम आम केंद्र को भी संगठित कर दिया है। उस देशी फौज पर कितना भरोसा किया जा सकता है, यह हाल की उसकी उन बंगावतों से बिलकुल स्पष्ट है जो, फारस (ईरान) के साथ युध्द के कारण, बंगाल प्रेसिडेंसी (प्रांत) के यूरोपियन सैनिकों से खाली होते ही वहां पर आरंभ हो गई थीं। भारतीय सेना में इससे पहले भी बंगावतें हुई थीं, लेकिन वर्तमान विद्रोह उनसे भिन्न है, उसकी कुछ अपनी विशिष्ट और घातक विशेषताएं हैं। यह पहली बार है जबकि सिपाहियों की रेजीमेंटों ने अपने यूरोपीय अफसरों की हत्या कर दी है; जबकि अपने आपसी विद्वेषों को भूल कर, मुसलमान और हिंदू अपने सामान्य स्वामियों के खिलाफ एक हो गए हैं; जबकि 'हिंदुओं द्वारा आरंभ की गई उथल-पुथल ने दिल्ली के राज्य सिंहासन पर वास्तव में एक मुसलमान बादशाह को बैठा दिया है;जबकि बंगावत केवल कुछ थोड़े से स्थानों तक ही सीमित नहीं रही है; और, अंत में, जबकि एंग्लो इंडियन सेना का विद्रोह अंगरेजों के प्रभुत्व के विरुध्द महान एशियाई राष्ट्रों के असंतोष के आम प्रदर्शन के साथ मिलकर एक हो गया है। इसमें रत्ती भर भी संदेह नहीं कि बंगाल की सेना का विद्रोह फारस (ईरान) और चीन के युध्दों के साथ अभिन्न रूप से जुड़ा हुआ है।
बंगाल की सेना में चार महीने पहले जो असंतोष फैलने लगा था, उसका तथाकथित कारण यह बताया जाता है कि देशी फौजों को यह डर था कि सरकार उनके धर्मकर्म में हस्तक्षेप करेगी। कहा गया है कि सिपाहियों में जो कारतूस बांटे गए थे, उनके कागजों में गाय और सुअर की चर्बी लगी हुई थी, और इसलिए उनको दांत से काटने की आज्ञा को देशी फौजियों ने अपने धार्मिक रीतिरिवाजों में दखलंदाजी माना, और यही चीज स्थानीय फसादों के लिए एक सिगनल बन गई। 22 जनवरी को कलकत्ते से थोड़े ही फासले पर स्थिति छावनियों में भयानक आग लग गई। 25 फरवरी को बरहमपुर में 19वीं देशी रेजीमेंट ने बंगावत कर दी जिसके सैनिकों को उन कारतूसों के प्रति विरोध था। 31 मार्च को इस रेजीमेंट को भंग कर दिया गया। मार्च के अंत में, बैरकपुर में स्थित 34 वीं सिपाही रेजीमेंट ने परेड ग्राउंड पर अपने एक सैनिक को भरी हुई बंदूक लेकर एकदम अगली कतार तक आगे बढ़ जाने दिया; वहां से बंगावत के लिए अपने साथियों को आह्वान करने के बाद उसे अपने एडजुटेंट और सार्जेंट-मेजर पर हमला करने और उन्हें घायल करने दिया। इसके बाद जो जबरदस्त हाथापाई हुई, उसके दौरान सैकड़ों सिपाही चुपचाप खड़े तमाशा देखते रहे और कुछ दूसरों ने इस मारपीट में शामिल होकर अपनी बंदूकों के कुंदों से अफसरों की मरम्मत की। इसके बाद उस रेजीमेंट को भी भंग कर दिया गया। अप्रैल महीने का श्रीगणेश इलाहाबाद, आगरा, अंबाला आदि कई छावनियों में बंगाली सेना की आगजनी से, मेरठ में हल्के घुड़सवारों की तीसरी रेजीमेंट की बंगावत से, और मद्रास और बंबई की सेनाओं में इसी प्रकार की बागी प्रवृत्तियों के प्रदर्शन से हुआ। मई के आरंभ में अवध की राजधानी लखनऊ में भी एक विद्रोह की तैयारी हो रही थी, लेकिन सर एच. लारेंस की सतर्कता ने उसे रोक दिया था। 9 मई को मेरठ की तीसरी हल्की घुड़सवार सेना के बागियों को जेल ले जाया गया जिससे कि उन्हें जो भिन्न-भिन्न सजाएं दी गई थीं उन्हें वे काटें। अगले दिन की शाम को, 11वीं और 20वींदो देशी रेजीमेंटों के साथ तीसरी घुड़सवार सेना के सैनिक परेड मैदान में इकट्ठे हो गए। जो अफसर उन्हें शांत और अनुशासित करने की कोशिश कर रहे थे उनको उन्होंने मार डाला, छावनियों में आग लगा दी और जितने अंगरेजों को वे पा सके, उन सबको उन्होंने काट डाला। ब्रिगेड के अंगरेज सैनिकों के भाग ने यद्यपि पैदल सेना की एक रेजीमेंट, घुड़सवार सेना की एक रेजीमेंट, और पैदल घुड़सवार तोपखाने की एक भारी शक्ति जमा कर ली थी, लेकिन रात होने से पहले वे कोई कार्रवाई न कर सके। बागियों को वे कोई चोट न पहुंचा सके, और उन्होंने वहां से उन्हें खुले मैदान में, मेरठ से लगभग चालीस मील के फासले पर स्थित दिल्ली के ऊपर, धावा करने के लिए चला जाने दिया। वहां 38वीं, 54वीं और 74वीं पैदल सेना की रेजीमेंटों की देशी गैरीसन, और देशी तोपखाने की एक कंपनी भी उनके साथ शामिल हो गई। ब्रिटिश अफसरों पर हमला बोल दिया गया, जितने भी अंगरेजों को विद्रोही पकड़ सके उनकी हत्या कर दी गई, और दिल्ली के पिछले मुगल बादशाह के वारिस को भारत का बादशाह घोषित कर दिया गया। मेरठ की मदद के लिए, जहां पुन: व्यवस्था स्थापित कर ली गई थी, भेजी गई फौजों में से देशी घुड़सवार और पैदल सिपाहियों की छह कंपनियों ने, जो 15 मई को वहां पहुंची थीं, अपने कमांडिंग अफसर मेजर फ्रेजर को मार डाला और फौरन देहात की तरफ चल पड़ीं। उनके पीछे-पीछे घुड़सवार तोपखाने की फौजें और छठे ड्रैगन गाड्र्स की बहुत सी टुकड़ियां उन्हें पकड़ने के उद्देश्य से निकल पड़ीं। पचास या साठ बागियों को गोली मार दी गई, लेकिन बाकी भाग कर दिल्ली पहुंचने में सफल हो गए। पंजाब के फीरोजपुर में 57वीं और 45वीं देशी पैदल रेजीमेंटों ने बंगावत कर दी, लेकिन उन्हें बलपूर्वक कुचल दिया गया। लाहौर से आने वाले निजी पत्र बताते हैं कि तमाम देशी फौजें खुले तौर से बागी बन गई हैं। 19 मई को कलकत्ता में तैनात सिपाहियों ने सेंट विलियम के किले पर अधिकार करने की असफल कोशिश की थी। बुशायर से बंबई आई तीन रेजीमेंटों को तुरंत कलकत्ता रवाना कर दिया गया।
इन घटनाओं का सिंहावलोकन करते समय मेरठ के ब्रिटिश कमांडर के रवैए के संबंध में हर आदमी को हैरत होती है। लड़ाई के मैदान में उसका देर से आना और ढीले-ढाले ढंग से उसके द्वारा बागियों का पीछा किया जाना उससे भी कम समझ में आता है। दिल्ली जमुना के दाहिने तट पर और मेरठ उसके बाएं तट पर स्थित है। दोनों तटों के बीच दिल्ली में केवल एक पुल है। इसलिए भागते हुए सिपाहियों का रास्ता काट देने से अधिक आसान चीज दूसरी न होती!
इसी दरम्यान, तमाम अप्रभावित जिलों में मार्शल लॉ लगा दिया गया है। मुख्यतया भारतीय फौजी टुकड़ियां उत्तर पूर्व और दक्षिण से दिल्ली की तरफ बढ़ रही हैं। कहा जाता है कि पड़ोसी राजे-रजवाड़ों ने अंगरेजों के पक्ष में होने का एलान कर दिया है। लंका चिट्ठियां भेज दी गई हैं कि लार्ड एलगिन और जनरल एशबर्नहम की सेनाओं को चीन जाने से रोक दिया जाए और, अंत में, पखवाड़े भर के अंदर ही 14 हजार अंगरेज सैनिक इंगलैंड से भारत भेजे जा रहे हैं। भारत के वर्तमान मौसम के कारण और आवाजाही के साधनों की एकदम कमी की वजह से ब्रिटिश फौजों के आगे बढ़ने में चाहे जो रुकावटें सामने आएं, लेकिन बहुत संभव यही है कि दिल्ली के विद्रोही बिना किसी लंबे प्रतिरोध के ही हार जाएंगे। लेकिन, इसके बावजूद, यह उस भयानक दुखांत नाटक की मात्र भूमिका है जो वहां अभी खेला जाएगा।
 (15 जुलाई 1857 के न्यूयार्क डेली ट्रिब्यून, अंक 5056, में एक संपादकीय लेख के रूप में प्रकाशित हुआ।)



रविवार, 21 नवंबर 2010

हेल्थ योगी बाबा रामदेव की राजनैतिक यात्रा- हरीशंकर साही

                       
         बाबा रामदेव ने योग की शिक्षा को जन-जन तक पहुँचाने का कभी प्रण किया था। उनके प्रण के पीछे ध्येय था कि वह भारत के लोगों को रोग मुक्त कराना चाहते हैं। उनके बारे में कहा जाता है कि वह एक ब्रह्मचारी संत है। ब्रह्मचारी संत आमतौर पर उन लोगो के लिए प्रयुक्त किया जाता है, जो मोह माया से दूर है। परन्तु एक मोह माया से दूर सन्यासी अगर राजनीति की बात करने लगे तब उस पर शंका होने लगती है। रामदेव जो मूलतः हरियाणा के एक साधारण परिवार से संबंधित हैं। अपने योग सिखाने के कारण भारत में एक बडे योग गुरू के रूप पूजे जाते थे। परन्तु अब उनका कुछ दूसरा रूप दिखाई देता है।
           कभी बाबा अपने शिविरों में अपने विभिन्न आसन सिखाते थे। उनके शिविरो में व्यक्ति योगिक जागिंग, शीर्षासन, सर्वांगासन जैसे कई आसन व भस्त्रिका, कपालभाति, अनुलोम-विलोम जैसे कई प्राणायाम सीखते थे। उन्होने ग्रन्थों में लिखी प्राणायाम की क्रिया को सरल करके आम जनता के सम्मुख प्रस्तुत किया। बाबा के इन प्रयोगों से आम जनता में प्राणायाम के प्रति एक जबरदस्त आकर्षण बढा। इसमें भी कोई शंका नही है कि इन योगाभ्यासों से आम जनता को लाभ भी हुआ। धीरे-धीरे बाबा के योग की धूम देश विदेश की सीमा को लांघ गई। अमेरिका के मशहूर अखबार न्यूयार्क टाइम्स ने भी बाबा रामदेव को विशेष विशेषण देते हुए लिखा था ‘‘एक भारतीय जिसने योग की रियासत को बनाया’’। अपनी बढ़ती प्रसिद्धि के बाद बाबा रामदेव ने अपने विशेष सहयोगी बालकृष्ण के साथ मिलकर हरिद्वार में एक अत्यन्त विशाल और आधुनिक सुविधा पूर्ण पतंजलि योग पीठ की स्थापना की।
           इस पूरे चक्र के दौरान उन पर तमाम आरोप भी लगे। कभी रामदेव के खास सहयोगी  और पुराने योग समारोहों में सबसे प्रमुख रूप से दिखने वाले कर्मवीर का साथ छोड जाना। कर्मवीर एक बी00एम0एस0 डाक्टर थे और पतंजलि आयुर्वेद फार्मेसी के पूर्व प्रमुख भी। उन्होंने रामदेव का साथ छोडते हुए उन पर तब कई आरोप भी लगाये थे। परन्तु उस समय बाबा केवल लोगों को स्वास्थ्य देने की बात करते थे और उनके योग की दीवानी जनता ने इस पर ध्यान भी नहीं दिया। जिसके फलस्वरूप कर्मवीर नेपथ्य में चले गये। फिर बाद में भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) की वृंदा करात ने तो उन पर बाकायदा उनके आयुर्वेदिक उत्पादों में जानवरों की हड्डियों की मिलावट का आरोप जडा। जिससे वह 2006 में जाँच रिपोर्ट में वह साफ बच तो गये। परन्तु कम्युनिस्ट आज भी अपने आरोपों से पीछे नही हटे हैं। वहीं बाबा के अन्य आलोचकों ने विदेश में दान में मिले द्वीप पर  सवाल उठाये। उन पर सबसे नया आरोप दान में मिले हेलीकाप्टर को लेकर लगा। दूसरी ओर बाबा के सुविधाभोगी होने के बारे में चर्चा उठनी शुरू हो गई हैं।
             बाबा रामदेव के उत्तर प्रदेश के विभिन्न जनपदों में चलाये उनके योग शिविरो एवं स्वाभिमान यात्रा को काफी नजदीक से अनुभव करने के बाद उन्हें ऐसा संत मानने में शंका उत्पन्न हो जाती है। जो मोह-माया से दूर हो।
     बाबा रामदेव ने अपनी उत्तर प्रदेश की यात्रा बिजनौर जनपद से शुरू की थी। बाद में शाहजहाँपुर, रामपुर, पीलीभीत, लखीमपुर-खीरी, बहराइच, श्रावस्ती, बलरामपुर, गोण्डा होते हुए यह यात्रा चलती रही। इस पूरी यात्रा के दौरान उन्होने जनपदों के मुख्यालयों पर प्रातः 5 बजे से 7.30 तक योग शिविर किये। बाद में इन्ही जनपदों के दूर-दराज के क्षेत्रों में जनसंबोधन होते हैं जो राजनीति का महत्वपूर्ण अंग माने जाते हैं। बाबा अपने शिविरों से पहले जनपद में रात्रि विश्राम करते हैं। जो ज्यादातर उस जिले के किसी बडे धनाढ्य या प्रभावशाली व्यक्ति के यहाँ होता है।
              रामदेव के प्रातः काल में लगने वाले योग शिविरों में जनता योग सीखने के उद्देश्य से जमा होती है। परन्तु रामदेव योग सिखाने का नाम तो लेते हैं, लेकिन उनका तरीका सिखाने से ज्यादा दिखाने का होता है। बहराइच के उनके योग शिविर में शामिल होने आये राकेश सिंह कहते हैं कि ‘‘ बाबा इतने ज्यादा गति से योग करते हैं कि सीखना तो दूर देखना भी मुश्किल हो जाता है’’। बाबा अपने योग शिविरो में योग सिखाते-सिखाते राजनीतिक परिस्थितियों पर भाषण देने लगते है। बहराइच के ही योग शिविर में बाबा योग सिखाते हुए गोवा में हो रहे पुर्तगालियों के कार्यक्रम के बारे में भाषण देना शुरू कर दिया। वहीं इन शिविरों या उसके बाद की जनसभाओं में अपने योगपीठ के आयुर्वेद दवाईयों की चर्चा करने से नही चूकते हैं। इन योग शिविरो में आये लोगों को वह योग के साथ-साथ दवाईयां भी खरीदने की सलाह देते हैं। जो हरिद्वार से उनके संस्थान से आती हैं, और शिविर के दौरान मौजूद रहती हैं।
              उनके योग शिविरो में मुख्य दानकर्ताओ का नाम भी बाबा के मंच पर लिखा होता है जिससे दानकर्ता भी भरपूर प्रचार पा सके। योग सीखने के दौरान आये लोगो को योग का ज्ञान कितना मिलता है यह तो नहीं कहा जा सकता। परन्तु राजनैतिक बयान जरूर सुनने को मिलता है। कहीं बाबा भ्रष्टाचार का मुख्य मुद्दा बनाते हैं तो कहीं अपने प्रयासो को बताते हैं। उनका कहना है केन्द्र सरकार के मंत्री ए0 राजा को उनके प्रयासों के चलते ही त्यागपत्र देना पडा। कहीं कहीं उनकी कथनी और करनी में अन्तर भी दिखता है जब वह बातें तो गरीबों के उत्थान की करते है। परन्तु उनके सारे सम्मेलन किसी बडे धनाढ्य के घर ही होते हैं।
              योग शिविरों के बाद वह जिले के छोटे ब्लाकों में भी जाते हैं और राजनेताओं की तरह जनसंपर्क भाषण देते है। इन जनसंपर्कों के दौरान वह पूरी तरह मुखर होकर सरकारों को कोसते हैं और चेतावनी देते हैं कि मात्र दो वर्षों का समय वह दे रहे हैं। अन्यथा उन्हें राजनीति में कूदना पडेगा, जिससे वह राजनीतिक व्यवस्था को बदल देंगे। रामदेव अपने भाषणो के दौरान सनसनी फैलाने में भी कोई कसर बाकी नही छोडते हैं। श्रावस्ती के जमुनहा ब्लाक के अपने दौरे के दौरान उन्होंने यह कहकर सबको चौंका दिया कि उनसे 2 करोड रूपये की रिश्वत मांगी गयी थी। उनका इशारा उस समय की सरकार की ओर था जब उनका पतंजलि योगपीठ बन रहा था। इसी प्रकार उन्होंने अन्य जनसभाओं में 300 लाख करोडं के काले धन की भी चर्चा की। उन्होंने एक जनसभा में बडे़ नोट छापने को लेकर अंग्रेजों की लुटेरी संस्कृति का भी आरोप सरकार पर लगाया और साथ ही सरकार से बडे़ नोटों को बंद करने की अपील की। बाबा रामदेव के अनुसार बडे नोट ही भ्रष्टाचार के जनक हैं बडे नोट खत्म भ्रष्टाचार खत्म। अगर इनकी सलाह पर अमल हो जायेगा तो बाजार में कितना नकद रूपया लेकर चला जा सकेगा इस पर उनके विचार शून्य रहे।
               बाबा रामदेव के बारे में अब यह कहा जा सकता है कि वह देश को बदलने के नाम पर अपनी राजनैतिक महत्वकांक्षा पूरी करना चाह रहे हैं। अपनी जनसभाओं में वह आजकल उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती की काफी तारीफ करते हैं। वहीं साथ ही साथ उनको राहुल गांधी का मायावती सरकार पर सवाल उठाना अच्छा नहीं लगता। राहुल पर आरोप लगाते हुए नाम लिए बिना कहते हैं कि उन्हे अपने पार्टी के शासन वाले राज्यों में जाकर शासन व्यवस्था देखनी चाहिए। अन्य बाबाओं या नेताओं के राजनीति में सफल ना हो पाने के सवाल पर वह अपने को सर्वश्रेष्ठ और चरित्रवान कहते हैं। वह  जनता के करीब भी रहना चाहते है, पर साथ ही विशिष्ट श्रेणी की सुरक्षा भी चाहते हैं। देश भ्रमण के अपने कार्यक्रमों में योग को उन्होंने मात्र एक भीड जुटाऊ की तरह बना रखा है। कभी योग के नाम पर देश के मसीहा बने रामदेव आज उस सम्मान को राजनीतिक महत्वाकांक्षा के लिए भुनाने निकले हैं। अब यह फैसला तो देश की जनता ही करेगी कि बाबा कितने योगी है और कितने राजनीतिक खेवनहार।

मनमोहन सिंह फेसबुक पर कब आओगे ?


भारत में इन दिनों मीडिया में भ्रष्टाचार को लेकर कोहराम मचा हुआ है। इस कोहराम के कारण संसद ठप्प है। लेकिन फेसबुक पर वैसी सरगर्मी नहीं है जैसी होनी चाहिए। ब्लॉग जगत में भी वह उत्तेजना नहीं है जो होनी चाहिए।
   फेसबुक को अमेरिका में आम जनता को सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों पर गोलबंद करने,जनता को प्रतिवाद जुलूसों के लिए इकट्ठा करने का औजार बना लिया गया है। लेकिन भारत में अभी तक यह नहीं हो पाया है। हमें इस सवाल पर विचार करना चाहिए कि आखिरकार वे कौन से कारण हैं जिनके कारण भारत में संचारक्रांति के जरिए धन तो कमाया जा सकता है,संचार किया जा सकता है लेकिन राजनीतिक तौर पर जनता को सड़कों पर नहीं उतारा जा सकता है ? हो सकता है यह स्थिति ज्यादा दिन न रहे। उम्मीद करें कि जल्द ही इसमें बदलाव आए।
    इसके बावजूद आज की वास्तविकता यह है कि संचार क्रांति का वाहक मध्यवर्ग है और जिस दौर में यह क्रांति हमारे बीच में दाखिल हुई है उस समय मध्यवर्ग सक्रिय सामाजिक-राजनीतिक हस्तक्षेप करने वाले समुदाय के रूप में गायब हो चुका था।
     भारत का मध्यवर्ग मूलतः राजनीतिक तौर पर अपाहिज है। इसमें राजनीतिक हस्तक्षेप की क्षमता नहीं है। यह वर्ग व्यवहारवाद और अर्थवाद की गिरफ्त में है और इसने अराजनीति का मार्ग पकड़ लिया है। इसने सचेत ढ़ंग से सत्ता के साथ अपने को बांध लिया है।
     दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि इसने संचार क्रांति के साथ नागरिक के नाते संबंध अभी तक विकसित ही नहीं किया है। उसने उपभोक्ता के रूप में संबंध बनाया है। आजादी के पहले मध्यवर्ग की राजनीतिक आवाज थी,राजनीतिक सक्रियता थी।लेकिन आजादी के बाद उसने राजनीति को त्याग दिया है और निजी धंधे में लगा दिया है। मध्यवर्ग के लोग अखबार पढ़ते हैं,टीवी देखते हैं, बड़े-बड़े विषयों पर विवाद करते हैं,चर्चा करते हैं। लेकिन राजनीतिक तौर सक्रिय नजर नहीं आते। राजनीति को उसने जिह्वासुख और सत्तासुख का हिस्सा बना दिया है।
    संचार क्रांति के बाद अमेरिका,ब्रिटेन,फ्रांस,चीन,इण्डोनेशिया,ईरान आदि अनेक देशों में मध्यवर्ग की सामाजिक-राजनीतिक सक्रियता और हस्तक्षेप में इजाफा हुआ है लेकिन भारत में उल्टा हुआ है।
      संचार क्रांति के बाद मध्यवर्ग की सामाजिक -राजनीतिक निष्क्रियता बढ़ी है। संचार क्रांति ने भारत के मध्यवर्ग में उपभोग के क्षेत्र में क्रांति की है। मध्यवर्ग की बतकही को बढ़ावा दिया है लेकिन मध्यवर्ग को सामाजिक-राजनीतिक तौर पर अपाहिज बनाया है।
    भारत में संचार क्रांति खासकर फेसबुक ,ब्लॉगिंग,सामाजिक मीडिया आदि के क्षेत्र में एक खास किस्म का ठंड़ापन है। राजनीतिक सक्रियता का अभाव है। हमारे यहां ये मंच प्रतिक्रिया के मंच हैं। इनमें किसी भी किस्म की नयी राजनीतिक खोज या सरकारी गुप्त दस्तावेजों का रहस्योदघाटन अभी तक नहीं हुआ है। ये दैनन्दिन संचार के माध्यम बनकर रहे गए हैं। इसके विपरीत अमेरिका आदि देशों में मध्यवर्ग के बीच में राजनीतिक गोलबंदी के मंच के रूप में फेसबुक-ब्लॉगिंग आदि की महत्वपूर्ण भूमिका सामने आयी है।
     भारत में संचारक्रांति में शामिल मध्यवर्ग की वास्तविकता यह है कि इसके पास मानवाधिकारों की चेतना नहीं है । इसके विपरीत अधिकांश मध्यवर्गीय लोग मानवाधिकार हनन के इस या उस रूप का इस्तेमाल करते रहे हैं। साथ ही भारत में सिविल सोसायटी आंदोलन बेहद कमजोर अवस्था में है। इसके कारण मध्यवर्ग अभी तक संचार क्रांति को लोकतांत्रिक राजनीति से जोड़ ही नहीं पाया है। अमेरिका आदि देशों में संचारक्रांति और सिविल सोसायटी आंदोलन के बीच में गहरा गठबंधन है। भारत में सिर्फ बाजार और उपभोग के साथ गठबंधन है।
    फेसबुक वगैरह सामाजिक नेटवर्क साइटों की सबसे बड़ी बात यह है कि ये हायरार्की और अनुशासन को नहीं मानतीं। किसी भी राजनीतिक संगठन के लिए ये दो जरूरी चीजें हैं। यही वजह है कि राजनीतिक दलों में फेसबुक आदि के इस्तेमाल के प्रति जागरूकता नजर नहीं आती और संचार क्रांति के दायरे में खासकर फेसबुक,ब्लॉगिंग आदि के दायरे में जो लोग आते जा रहे हैं उनमें हायरार्की और अनुशासन नहीं होता और फलतः वे किसी दल विशेष से नहीं बंध पाते। इससे भारत जैसे देश में संगठनहीनता की भावना बढ़ी है।
     कुछ लोग यह मानते हैं कि फेसबुक के जरिए बनाया गया सामाजिक बंधन मजबूत होता है तो दूसरे लोग कह रहे हैं फेसबुक ने कमजोर सामाजिकता को जन्म दिया है। फेसबुक आदि सामाजिक मीडिया ने भारत में जीवन व्यवहार पर प्रभाव डालना आरंभ कर दिया है। सामाजिक बंधन भले ही कमजोर हों लेकिन दैनन्दिन व्यवहार को प्रभावित करना आरंभ कर दिया है। सामाजिक मीडिया के यूजरों में व्यवहार के नार्मलाइजेशन की प्रक्रिया के कारण अनेक नए किस्म की संचार संभावनाएं जन्म ले रही हैं। मसलन भारत में मध्ययुगीन मानसिकता और मूल्यबोध का अभी भी दबदबा है अतः फेसबुक आदि सामाजिक मीडिया में धर्म,ज्योतिष बढ़ी है।
      इसके अलावा डिशकशन ,गपशप,हलो-हाय,दुआ-सलाम,नमस्कार-प्रणाम आदि की बाढ़ आ गयी है। विचारों का आदान-प्रदान बढ़ा है। सामाजिक संबंध भले ही कमजोर रहें लेकिन संचार बढ़ा है।
    भारत में सामाजिक मीडिया के राजनीतिक इस्तेमाल में इजाफा न हो पाने का प्रधान कारण है विभिन्न राजनीतिक दलों में ईसाक्षरता का अभाव। आज भी राजनीतिक प्रचार के लिए मीडिया की मदद पर ही राजनीतिक दल निर्भर करते हैं। वे ईमेल से लेकर फेसबुक तक किसी भी मीडियम को अपने संगठन की गतिविधि के साथ नत्थी नहीं कर पाए हैं।
     यहां तक कि कांग्रेस जैसा दल भी अभी तक संचार क्रांति के माध्यमों के साथ अपने को नीचे तक जोड़ नहीं पाया है। जबकि देश में संचार क्रांति का श्रेय उन्हें ही दिया जाता है। हम नहीं जानते सोनिया गांधी,राहुल गांधी,प्रकाशकारात,सीताराम येचुरी,लालकृष्ण आडवाणी आदि के फेसबुक पर कितने मित्र हैं,इन नेताओं ने अभी तक फेसबुक में दर्ज तक नहीं कराया है। लेकिन वे चाहते हैं अमेरिका के साथ प्रतिस्पर्धा करना।
     जैसाकि हम सब जानते हैं कि अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के फेसबुक पर 15.7 मिलियन दोस्त हैं।ट्विटर पर उनका 5.9 मिलियन लोग अनुसरण करते हैं। ओबामा अपने अनेक नीतिगत फैसलों पर आम राय बनाने के लिए संवाद करते हैं। लेकिन भारत में अभीतक मनमोहन-आडवाणी फेसबुक पर नहीं आए हैं। ऐसे में संचार क्रांति को राजनीति से कैसे जोड़ सकते हैं ?
     मजेदार बात है कि हमारे नेता चीन के साथ प्रतिस्पर्धा का सपना देखते हैं लेकिन वे जानते हैं कि प्रतिस्पर्धा नहीं कर सकते। चीन में अधिकांश मंत्रियों और पार्टीनेताओं के ब्लॉग हैं। वे नियमित लिखते हैं और सैंकड़ो-हजारों की तादाद में प्रतिक्रिया प्रतिदिन पाते हैं। वेनेजुएला के राष्ट्रपति से लेकर महान क्रांतिकारी फिदेल कास्त्रो तक सभी को संचार क्रांति के किसी न किसी मीडियम में सक्रिय रूप में देख सकते हैं लेकिन भारत में राजनेताओं में सामाजिक मीडिया के प्रति कोई उत्साह ही नजर नहीं आता। यहां तक कि युवानेता राहुल गांधी भी अभी फेसबुक और ब्लॉगिंग तक नहीं पहुँच पाए हैं। ऐसे में संचार क्रांति को राजनीतिकचेतना के परिवर्तन का अस्त्र बनाने का सपना भारत में पूरा होने में अभी और देर लगेगी।
     अभी भारत की वास्तविकता यह है यहां का मध्यवर्ग पूरी तरह संचारक्रांति के सक्रिय मोबाइल उपभोक्ता में रूपान्तरित हुआ है। वह इसके आगे बहुत धीमी गति से जा रहा है। कारपोरेट घरानों में सामाजिक मीडिया को समृद्ध करने कीओर रूझान नजर नहीं आ रहे हैं। भारत का कारपोरेट जगत इंटरनेट को लेकर सिर्फ व्यापार तक ही सक्रिय है। व्यापार के अलावा अन्य गतिविधियों में उसकी कोई खास दिलचस्पी नहीं है। सरकारी वेबसाइट ठंडी पड़ी रहती हैं। हमारे यहां केन्द्र और राज्य सरकारों ने कभी भी नीतिगत सवालों ,सरकारी कार्यक्रमों और नीतियों के पक्ष में मीडिया का सुनियोजित इस्तेमाल नहीं किया। मीडिया के इस्तेमाल का अर्थ उनके लिए है सरकारी विज्ञापन दे देना। आज भी केन्द्र सरकार या राज्य सरकारें अपनी किसी भी नीति या कार्यक्रम पर इंटरनेट पर बहस नहीं चला रहे हैं। हमें सोचना चाहिए कि सरकारों की निष्क्रियता क्यों है ?
     कम्प्यूटर कोई खिलौना नहीं है। इंटरनेट कोई कनेक्शन मात्र नहीं है। जिसे बेच दिया जाए और बाजार से पैसा उठा लिया जाए। हमें राहुल गांधी और सैम पित्रोदा से आज सवाल करना चाहिए कि कम्प्यूटर क्रांति का क्या यही अर्थ है कि घरों और दफ्तरों में कम्प्यूटर-लेपटॉप पहुँचा दिए जाएं। दुकानों को संचार उपकरणों से भर दिया जाए ?  सत्ता पर बैठे लोग जबाब दें खासकर राहुल गांधी-सोनिया गांधी जबाब दें कि केन्द्र सरकार अपनी नीतियों पर इंटरनेट पर बहस क्यों नहीं चलाती ? क्यों नहीं प्रत्येक मंत्री इंटरनेट पर अपने मंत्रालय के कामकाज के बारे में बहस करता ? सांसदों को हम इंटरनेट और फेसबुक पर देख क्यों नहीं पाते ? जबकि उन्हें संचार की सारी सुविधाएं भारत सरकार देती है।
      जो सासद.मंत्री,प्रधानमंत्री इंटरनेट पर विभिन्न मसलों पर अपने वोटरों और नागरिकों से संवाद ही न करे तो उसकी सभी संचार सुविधाएं ले ली जानी चाहिए। संचार सुविधाएं जनता की सेवा के लिए हैं। उससे संवाद बनाने के लिए हैं। हमारे नेताओं को खासकर प्रधानमंत्री को इस मामले में पहल करके नए इंटरनेट युग का आरंभ करना चाहिए।  सभी मंत्रियों और सांसदों को फेसबुक-ब्लॉगिग आदि के जरिए संवाद करने की हिदायत दी जानी चाहिए तब ही संचार क्रांति और राजनीति में भारत में पैदा हुए महा-अंतराल को हम कम कर पाएंगे।        







अज्ञेय जन्म शताब्दी वर्ष पर विशेष- बलाओं की मां है साम्प्रदायिकता

    स.ही.वा.अज्ञेय हिन्दी के बड़े साहित्यकार हैं। उनकी प्रतिष्ठा उनमें भी है जो उनके विचारों से सहमत नहीं हैं। अज्ञेय के बारे में प्रमुख समस्या है कि उन्हें किस रूप में याद करें ? क्या उन्हें धिक्कार और अस्वीकार के साथ देखें ? क्या वे सचमुच में ऐसा कुछ लिख गए हैं जिसके कारण उन्हें याद किया जाए ?
    मेरे मन में अज्ञेय को लेकर लंबे समय से कई सवाल उठते रहे हैं मसलन् क्या एक व्यक्ति मार्क्सवाद में दीक्षित होने के बाद उसके प्रभाव से मुक्त हो जाता है ? क्रांतिकारी अज्ञेय और आधुनिकतावादी अज्ञेय में ऐसे कौन से तत्व हैं जिनसे हम सीख सकते हैं ? हिन्दी के समीक्षकों ने अज्ञेय के साथ क्या न्याय किया है ? क्या क्रांतिकारी अज्ञेय का लेखन आज के दौर में हमारी कोई मदद कर सकता है ?
   मुझे अज्ञेय इसलिए पसंद हैं कि वे साहित्य को अभिव्यक्ति नहीं संप्रेषण मानते हैं। हिन्दी के अधिकांश आलोचकों ने साहित्य को अभिव्यक्ति माना है। अज्ञेय ने संप्रेषण माना है। अज्ञेय ने लिखा है-‘‘ मैंने हमेशा माना है कि रचना का पहला धर्म अभिव्यक्ति नहीं है,संप्रेषण है।’’ साहित्य को संप्रेषण मानने का अर्थ है उसे कम्युनिकेशन के रूप में देखना। यह साहित्य का विकसित नजरिया है।
    एक और महत्वपूर्ण बात है जो अपील करती है वह है लेखक के नाते उनका यह कहना कि कहानी लेखन मुझे इसलिए बंद करना पड़ा ,क्योंकि कहानी लिखने से अर्थवत्ता का एहसास नहीं हो रहा था।
    संप्रेषण के लिए उन्हें जब कहानी नाकाफी लगने लगी तो उन्होंने कहानी लिखना बंद कर दिया।  उन्हें जो नजरिया नाकाफी लगा उसे छोड़ दिया। वे आज के तमाम हिन्दी लेखकों की तरह नहीं हैं जो किसी नजरिए से इसलिए चिपके हैं क्योंकि उन्हें उससे प्यार है,पुराना संबंध है,विचारधारात्मक लगाव है,लेकिन व्यवहार में उसे नहीं लागू करते।
    ऐसे ढ़ेर सारे लेखक हैं जिनके नजरिए ,साहित्य और जीवन में महा-अंतराल है। अज्ञेय इस अर्थ में बड़े लेखक हैं कि वे जिस विचार को मानते थे उसे व्यवहार में, साहित्य में ,पत्रकारिता में उतारने की क्षमता भी रखते थे।
   अज्ञेय के नजरिए के दो छोर हैं ,पहला है अर्थवत्ता, और दूसरा है संप्रेषण। अर्थवत्ता की तलाश में उनको विचारधारात्मक रूपान्तरण करना पड़ा और संप्रेषण के लिए विधा रूपों में नए प्रयोगों की ओर जाना पड़ा।
    अज्ञेय लिखने के लिए लिखने में विश्वास नहीं करते थे। विचारधारात्मक आग्रहों के आधार पर नहीं लिखते थे बल्कि संप्रेषण के लिए लिखते थे। लेखन को संप्रेषण मानना बड़ी उपलब्धि है और यह हिन्दी की पहली और दूसरी परंपरा से भिन्न परंपरा है। संप्रेषण पर जोर देने का अर्थ है समाज और पाठक को केन्द्र में रखकर लिखना। उसे साथ लेकर चलना।
     अज्ञेय उन चंद लेखकों में हैं जो मौजूदा दौर की बेहतर समझ रखते थे। सामयिक यथार्थ को ज्यादा गहराई से पहचानते थे। उन्होंने लिखा है- ‘‘ जानकारी हासिल करने के (या जानकारी को विकृत करके जबरन वह विकृति स्वीकार कराने के ) साधन लगातार ऐसे लोगों के दृढ़तर नियंत्रण में चले जा रहे हैं जिन पर हमारा नियंत्रण लगातार कमजोरतर होता जा रहा है। यहां तक कि स्वयं हम कहां खड़े,और जिस युग अथवा काल-खंड में जी रहे हैं वह वास्तव में क्या है ,उससे हमारा रिश्ता क्या अथवा कैसा है ,यही पहचानना हमारे लिए दिन-प्रतिदिन कठिनतर होता जा रहा है। ’’
   अज्ञेय का मुझे अच्छा लगने का एक और कारण है उनका साम्प्रदायिकता और अधिनायकवाद विरोधी नजरिया। इस प्रसंग में मुझे उनकी एक कहानी ‘मुस्लिम-मुस्लिम भाई -भाई’ याद आ रही है। यह छोटी बड़ी शानदार कहानी है। इस कहानी में मुस्लिम साम्प्रदायिकता को बेपर्दा किया गया है। पूरी कहानी का ढ़ांचा एकदम धर्मनिरपेक्ष है। इस कहानी के आरंभ में अज्ञेय ने साम्प्रदायिकता को ‘डर’ और 'छूत' की बीमारी कहा है। लिखा है डर ‘‘बला नहीं बलाओं की माँ है।’’ ..‘‘ जहां डर आता है,वहां तुरंत घृणा और द्वेष और कमीनापन आ घुसते हैं, और पीछे-पीछे न जाने मानवात्मा की कौन कौन-सी दबी हुई व्याधियां !’’
अज्ञेय ने जिस तरह मुस्लिम साम्प्रदायिकता को नंगा करते हुए ‘मुस्लिम-मुस्लिम भाई-भाई’ कहानी लिखी थी। उसी तरह हिन्दू साम्प्रदायिकता को निशाना बनाते हुए ‘रमंते तत्र देवता’ कहानी लिखी थी। इन दोनों कहानियों में रेखांकित किया गया है कि किस तरह दोनों ही रंगत की साम्प्रदायिकता  ने औरतों को निशाना बनाया है। यह कहानी 1946 के कलकत्ता में हुए दंगों पर लिखी गयी है। उस समय कोलकाता कैसा था इस पर अज्ञेय ने लिखा ‘‘शहर बहुत से छोटे-छोटे हिन्दुस्तान-पाकिस्तान में बंट गया था। जिनकी सीमाओं की रक्षा पहरेदार नहीं करते थे, लेकिन जो फिर भी परस्पर अनुल्लंघ्य हो गए थे। लोग इसी बंटी हुई जीवन-प्रणाली को लेकर भी अपने दिन काट रहे थे।’’
   इसी कहानी में एक अन्य जगह लिखा है ‘‘ नफ़रत के एक-एक बीज से हमेशा सौ-सौ जहरीले पौधे उगे हैं। नहीं तो यह जंगल यहां उगा कैसे ,जिसमें आज हम-आप खो गए हैं और क्या जानें निकलेंगे कि नहीं ? हम रोज़ दिन में नफ़रत का बीज बोते हैं और पौधा फलता है तो चीखते हैं कि धरती ने हमारे साथ धोखा किया !’’   
                 

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