शुक्रवार, 12 दिसंबर 2014

गीता इवेंट नहीं है

           श्रीमद्भगवद्गीता को लेकर देश में अचानक बहस हो रही है और इस बहस को पैदा करने में संघ समर्थित संतों-महंतों और-मीडिया की बड़ी भूमिका है। इवेंट बनेगा तो मीडिया हो-हल्ला होगा! इवेंट बनाना मासकल्चर का अंग है जबकि गीता संस्कृति का अंग है। गीता जयन्ती के मौके पर विभिन्न संघी नेताओं के भाषणों ने मनोरंजन करके गीता की ओर ध्यान खींचा है। गीता को सनसनी बनाना, संविधान से महान बताना,मनोरोग के उपचार की पुस्तक बताना अपने आपमें विवादास्पद और अविवेकपूर्ण बातें हैं।अविवेक हमेशा से फासिस्टों का ईंधन रहा है। संघ-संत और मीडिया के लिए गीता का इवेंट और अविवेकवाद से अधिक महत्व नहीं है। गीता-गीता कहने से भाजपा या किसी भी दल के मतों में इजाफा होने वाला नहीं है। क्योंकि गीता में जो विचार निहित हैं वे भाजपा-संघ-संतसमाज के स्वभाव से मेल नहीं खाते।

गीता के बारे में सबसे बड़ा सवाल तो यह है कि सैंकड़ों सालों के बाद आज भी गीता जनप्रिय क्यों है ? भारत का अन्य कोई ग्रंथ इतना जनप्रिय क्यों नहीं है ? गीता की जनप्रियता दिनों-दिन क्यों बढ़ी? भाजपा-संघ- तय कर लें कि उनको गांधी-नेहरु-आंबेडकर का गीता का आख्यान चाहिए ? या फिर गपोड़ी संतों की व्याख्या चाहिए ? गीता को संतों ने नहीं विद्वानों –दार्शनिकों और सामाजिक हस्तियों ने जनप्रिय बनाया है । गीता को समझने के लिए उसकी शाब्दिक व्याख्या में जाने की बजाय उसके मर्म की खोज की जानी चाहिए।

गीता को इवेंट बनाने के चक्कर में संतों –संघियों ने गीता का जन्मदिन खोज निकाला,जो कि अनैतिहासिक है, अनैतिहासिकता के पैमाने फासिज्म की वैचारिक मदद करते हैं, इस अनैतिहासिकता का फासिस्ट चरमोत्कर्ष तब सामने आया जब एक संघी नेता ने गीता को संविधान से भी ऊपर दर्जा देने की बात कही! दूसरे ने मनोरोगों के इलाज की रामबाण दवा कहकर पेश किया! इस तरह का इरेशनलिज्म हमेशा से फासिज्म की अभिव्यक्ति शैली का अभिन्न हिस्सा रहा है। इस प्रसंग में पंडित जवाहरलाल नेहरु ने लिखा है ''गीता का संदेसा सांप्रदायिक या किसी एक खास विचार के लोगों के लिए नहीं है।क्या ब्राह्मण और क्या अजात,यह सभी के लिए है। यह कहा गया है कि '' सभी रास्ते मुझ तक पहुँचाते हैं।'' इसी व्यापकता की वजह से सभी वर्ग और सम्प्रदाय के लोगों को गीता मान्य हुई है।''

गीता मात्र हिन्दुओं का ग्रन्थ नहीं है ,वह पूरे भारतीय जनता की विरासत का अंग है,वैसे ही जैसे नाथों-सिद्धों का साहित्य समूची मानवता की विरासत का अंग है,जिस तरह चार्वाक हमारी विरासत का अंग हैं।सवाल यह है विरासत में से क्या चुनें और उसे किस नजरिए से देखें ? पंडित नेहरु ने लिखा है ''बौद्धकाल से पहले जब इसकी रचना हुई,तब से आजतक इसकी लोकप्रियता और प्रभाव घटे नहीं है,और आज भी इसके लिए हिंदुस्तान में पहले –जैसा आकर्षण बना हुआ है।विचार और फ़िलसफ़े का हर एक सम्प्रदाय इसे श्रद्धा से देखता है और अपने-अपने ढ़ंग से व्याख्या करता है।संकट के वक़्त,जब आदमी का दिमाग सन्देह से सताया हुआ होता है और अपने फ़र्ज के बारे में उसे दुविधा दो तरफ़ खींचती होती है,वह रोशनी और रहनुमाई के लिए गीता की तरफ ओर भी झुकता है,क्योंकि यह संकट–काल के लिए लिखी गयी कविता है- राजनैतिक और सामाजिक संकटों के अवसर के लिए और उससे भी ज्यादा इन्सान की आत्मा के संकट-काल के लिए। ''

सवाल यह है क्या संघ परिवार आज किसी संकट से गुजर रहा है ? क्या वे अपने अंदर विचारधारा का संकट देख रहे हैं और उससे निकलने का मार्ग गीता में खोज रहे हैं ? पंडित नेहरु ने साफ लिखा है गीता ''संकट-काल के लिए लिखी कविता'' है। नेहरु ने गीता के मर्म को उद्घाटित करते हुए लिखा '' यह हमें जिंदगी के फ़र्जों और कर्तव्यों का सामना करने के लिए पुकारती है,लेकिन हमेशा इस तरह कि इस रुहानी ज़मीन और विश्व के बड़े मकसद को नज़र-अंदाज़ न किया जाय।हाथ-पर-हाथ रखकर बैठ रहने की बुराई की गयी है और यह बताया गया है कि काम और ज़िदगी को युग के सबसे ऊँचे आदर्शों के अनुसार होना चाहिए,क्योंकि हर एक युग में ख़ुद आदर्श बदलते रहते हैं। एक खास जमाने के आदर्श-युग-धर्म- का सदा ध्यान रखना चाहिए।''

'' चूंकि आज के हिंदुस्तान पर मायूसी छायी हुई है और उसके चुपचाप रहने की भी एक हद हो गई है,इसलिए काम में लगने की यह पुकार ख़ासतौर पर अच्छी मालूम पड़ती है।यह भी मुमकिन है कि जमाने-हाल के लफ़्जों में,इस पुकार का समाज के सुधार की और समाज-सेवा की और अमली,बेगरज़ देशभक्ति के और इन्सानी दर्दमंदी के पुकार की सेवा समझा जाय।गीता के अनुसार ऐसा काम अच्छा होता है,लेकिन इसके पीछे रुहानी मकसद का होना लाजिमी है।यह काम त्याग की भावना से किया जाना चाहिए और उसके नतीजों की फ़िक्र न करनी चाहिए। अगर काम सही है,तो नतीजे भी सही होंगे,चाहे वे फौरन न जाहिर हों,क्योंकि कार्य-कारण का नियम हर-हालत में अपना काम करेगा ही ।''

रविवार, 7 दिसंबर 2014

वफादार प्रकाशन सम्बन्ध के प्रतिवाद में



     हिन्दी में पुस्तक प्रकाशन वफ़ादारी के युग में है। लेखक और प्रकाशक का रिश्ता "वफ़ादार उत्पादक प्रकाशन सम्बन्ध" पर टिका है। इस सम्बन्ध के दायरे में अधिकांश लेखक और प्रकाशक जीने के लिए अभिशप्त हैं।यह मूलत:वफ़ादारी का गैर-पूँजीवादी सम्बन्ध है। इस सम्बन्ध में किसी क़िस्म की प्रकाशकीय आधुनिकता नहीं है। 
        "वफ़ादार उत्पादक सम्बन्ध" की लाक्षणिक विशेषता है "सब कुछ अनौपचारिक है",लेखक को नहीं मालूम कि उसकी पुस्तक कहाँ बिक रही है? कितनी बिक रही है और कितनी आय कर रही है ?अधिकांश प्रकाशक , लेखक के साथ कोई लिखित अनुबंध नहीं करता, कोई लिखित दस्तावेज़ लेखक को मुहैय्या नहीं कराता। मज़ेदार बात यह है कि यह हरकत वह लेखक संघ के धाकड नेताओं के साथ भी करता है। लेखक संघों के तक़रीबन सभी बडे नेता किसी न किसी प्रकाशक की वफ़ादार सूची में वरीयता से ऊपर स्थान बनाए हुए हैं। वे अपने अल्पहितों की तो सोचते हैं लेकिन लेखक के सामान्य हितों को लेकर कभी कोई प्रयत्न नहीं करते।
      इस वफ़ादार सम्बन्ध के कारण लेखक-प्रकाशक सम्बन्धों का पूँजीवादी सम्बन्ध विकसित नहीं हो पाया है। लेखक संघ वफ़ादारी के आगे देख ही नहीं पा रहे हैं। उनकी जो भूमिका हो सकती थी उसका पालन नहीं कर पा रहे हैं। क्योंकि "अनौपचारिकता" और "निजी वफ़ादारी " से आगे वे देख ही नहीं पा रहे हैं। यह लेखक संघ के क्षय की सूचना है और "निजी वफ़ादारी" के महान बनने का संकेत भी है!  
      "निजी वफ़ादारी" का साइड इफेक्ट है कि लेखक संघ के सभी बडे लेखकों की आँखों के नीचे हिन्दी के अधिकांश बडे प्रकाशक, लेखकों का खुलेआम शोषण कर रहे हैं ,लेकिन कभी किसी लेखक संघ को किसी प्रकाशक के दरवाज़े पर आंदोलन करते नहीं देखा गया । क्या हम यह मान लें कि हिन्दी के प्रकाशकों के द्वारा प्रकाशन के नियमों का पालन हो रहा है ?
       समस्या का सबसे दुर्भाग्यजनक पक्ष यह है कि हिन्दी के सबसे बडे प्रकाशक ने सभी आंदोलनकारी लेखक नेताओं को अपना वफ़ादार बनाकर बंधुआ बना लिया है !हमारे नामी लेखक बंधुओं को इस बंधुआभाव से कोई परहेज़ नहीं है ।  सवाल यह है कि लेखक- प्रकाशक सम्बन्ध को पेशेवर पूँजीवादी सम्बन्ध बनाने में 'प्रलेसं' ,'जसम'और 'जलेसं' की कोई भूमिका बनती है या नहीं ? क्या कभी इन संगठनों ने हिन्दी के एकमात्र बडे प्रकाशन समूह के खिलाफ कोई बयान तक जारी करके लेखक के हितों के लिए कोई प्रयास किया ? मैं निजी तौर पर कोलकाता के कई लेखकों को जानता हूं जिनको इस प्रकाशक ने एक भी पैसा रॉयल्टी का नहीं दिया , यहाँ तक कि वह कोई अनुबंध तक नहीं करता। इस बडे नामी प्रकाशक का वफादार बनाने का तरीक़ा यह है कि वह लेखक संगठन के लिए विज्ञापन दे देता है या उनकी पत्रिका को किताब के रुप में छाप देता है,वह लेखक संघ को १०-२०फीसदी रॉयल्टी देकर अपनी वफ़ादारी निभा देता है, वफादार लेखक ख़ुश हो जाता है कि यह क्या कम है कि प्रकाशक ने हमारी पत्रिका छाप दी या किताब छापकर रॉयल्टी दे दी! 
     वफादार लेखकनेता भूल जाते हैं कि प्रकाशक अपनी इस तथाकथित सदाशयता की आड़ में बारीकी से अपने सरप्लस कमाने के धंधे को चमका रहा है ! वे कभी प्रकाशक द्वारा की जा रही अनैतिक हरकतों पर नहीं बोलते। स्थिति इतनी भयावह है कि राज्य के स्तर पर , विभाग के स्तर पर, विश्वविद्यालय में पुस्तक ख़रीद के स्तर पर, सरकारी थोक खरीद के स्तर पर हिन्दी के सबसे बडे प्रकाशक ने सबसे घृणित हथकंडे अपनाए हैं और लेखक संगठनों की ओर से कभी कोई बयान तक नहीं आया! 
     हिन्दी के बडे प्रकाशक किस तरह काम करते हैं उसके नमूने हर राज्य में बिखरे पड़े हैं। अभी कुछ समय पहले तक बिहार में सरकारी स्तर पर होने वाली खरीद में एक हिन्दी के संघपरस्त प्रकाशक की इजारेदाराना भूमिका, जो कई सालों से चल रही थी , सारी किताबें उससे ही ख़रीदी जा रही थीं, उसके खिलाफ किसी संगठन ने चूँ तक नहीं की, बाद में नीतीश सरकार ने इस मामले का संज्ञान लिया और वह प्रकाशक काली सूची के हवाले कर दिया गया। सवाल यह है कि एकप्रकाशक विशेष को ही मोटे ठेके कैसे मिल रहे हैं ? एक प्रकाशक विशेष को हाल ही में छत्तीसगढ़ से बहुत मोटा ठेका मिला है। प्रकाशक विशेष को इजारेदाराना ढंग से खरीद का ठेका मिलना, क्या हम सब लेखकों के लिए चिन्ता की बात नहीं है ? लेकिन "जलेसं" या "जसमं" और "प्रलेसं" के सभी बडे नेताओं के मुँह बंद हैं ! यही वह बिन्दु है जहाँ पर हम सबको लोकतांत्रिक प्रकाशकीय दृष्टिकोण अपनाने की ज़रुरत है। वफ़ादारी  का संबंध अ-लोकतांत्रिक सम्बन्ध है और यह लेखक विरोधी सम्बन्ध है। 
                   मैं अब तक ५० किताबें लिख चुका हूँ और मैंने आरंभ में यह निर्णय लिया कि मैं किताब उसी प्रकाशक को दूँगा जो लेखक के साथ पारदर्शिता रखे, रॉयल्टी दे, संयोग की बात है कि मैंने जिस प्रकाशक को किताबें दीं वह सभी लेखकों को रॉयल्टी देता है , बाकी तथ्य भी लेखक के साथ शेयर करता है। लेकिन हिन्दी का सबसे बड़ा प्रकाशक यह काम नहीं करता, इसके मालिक कईबार मुझसे किताब माँग चुके हैं , बदले में मोटी रक़म पहले देने का वायदा भी कर चुके हैं ,लेकिन मैंने उनको विनम्रतापूर्वक मना कर दिया । कहने का आशय यह कि लेखक संघ कम से कम इस तरह के प्रकाशक को किताब न दे जो इजारेदाराना हरकत करता हो, बिक्री के लिए घूस देता हो,लेखक को रॉयल्टी न देता हो। कम से कम लेखक की मान मर्यादा की रक्षा का दायित्व "वफादार लेखक-प्रकाशक सम्बन्ध" से ऊपर है। 

संसद ,अंधविश्वास और वैज्ञानिकचेतना



जिस देश में प्रधानमंत्री से लेकर सांसद तक अंधविश्वासी और गँवार संतों की चरणरज को परम प्रसाद मानते हों!कूपमंडूक और जाहिल संतों को प्रेरक मानते हों!जिस देश के सांसद कूपमंडूक ज्ञान को विज्ञान मानते हों और लाखों जनता उनको जय- जय हो करके चुनती हो! गंभीरता से सोचो उस देश की संसद की चेतना कैसी होगी ?  हमने कभी लोकतंत्र के परम स्वायत्तरुप संसद और "परम मनुष्य "सांसदों के बारे में वैज्ञानिकचेतना की कसौटी पर बातें नहीं कीं।इससे अनेक क़िस्म के लोकतांत्रिक अंधविश्वास फैले हैं।
    लोकतंत्र में दो तरह के अंधविश्वास हैं, पहली कोटि में परंपरागत अंधविश्वास आते हैं, ये हमें विरासत में मिले हैं, दूसरी कोटि में पूँजीवादी अंधविश्वास आते हैं जो हमें पूँजीवाद के आगमन के साथ समाजवाद और बुर्जुआ लोकतंत्र ने दिए हैं। मज़ेदार बात है हमने कभी न तो समाजवादरचित अंधविश्वासों पर बहस की और न बुर्जुआ अंधविश्वासों पर सवाल खड़े किए । समाजवाद ने पुराने या विरासत में प्राप्त अंधविश्वासों को नष्ट किया लेकिन नए समाजवादरचित अंधविश्वासों पर किसी को सवाल ही खड़े करने नहीं दिया गया। भारत में भी अंग्रेज़ों के ज़माने से लेकर आजतक ईश्वर की सत्ता को ख़ारिज करना अपराध घोषित कर दिया गया, मज़ेदार बात तो यह है कि हमारे यहाँ भगवान के नाम पर ज़मीन-जायदाद होती है, भगवान मुकदमे लड़ता है!ऐसे में उसके न होने की बातें करना तो "महान अपराध "ही माना जाएगा!संविधान की सौगंध सबसे बड़ा अंधविश्वास है! सांसदों का आचरण उसके अनुरूप नजर ही नहीं आता,इसके बावजूद सांसद महान हैं! कहने का आशय यह कि बुर्जुआ लोकतंत्र में पुराने और नए अंधविश्वास बने रहते हैं , विभिन्न तरीक़ों के जरिए उनको क़ानूनी और अन्य क़िस्म का संरक्षण मिला हुआ है।

        संसद को लेकर जिस तरह का पूजाभाव हमारे ज़ेहन में है वह अपने आपमें एक रुढि है, सांसदों को लेकर जो मान्यता है वह भी रुढिग्रस्त है,इससे भी बड़ी बात यह कि लोकतंत्र भी रुढियों और तथाकथित लोकतांत्रिक अंधविश्वासों से भरा हुआ है। लोकतांत्रिक अंधविश्वास न हों तो लोकतंत्र ख़त्म हो जाय। हमने कभी विचार ही नहीं किया है हमारे सांसद कितने वैज्ञानिकचेतना संपन्न है? कोई सर्वे भी नहीं किया कि जिन सांसदों को हम आज़ादी के बाद से लेकर आज तक चुनते रहे वे वैज्ञानिकचेतना से लैस हैं या नहीं? सच यह है हमारे अधिकांश सांसद अंधविश्वासी और अवैज्ञानिक चेतना से लैस हैं।इसके बावजूद संसद महान हैं!
   हमारे न्यायाधीशों में अधिकांश में वैज्ञानिकचेतना का अभाव है,इसके बावजूद न्याय महान है !न्यायाधीश महान हैं! ये धारणाएँ बताती हैं कि हमारे अंधविश्वास और रुढियों के खिलाफ कोई गंभीर जंग न तो संसद में लड़ी गयी और न संसदीय संरचनाओं में ही लड़ी गयी।
      यूपीएससी पास करने वाले अधिकतर "महानजन" भगवान के आगे भीख माँगते,रोते बिसूरते देखे गए हैं! जिस देश के क्रीम कहे जानेवाले "महानजनों" में अंधविश्वास का यह आलम हो वहाँ वैज्ञानिकचेतना की रक्षा करना , उसका प्रचार- प्रसार करना बहुत ही मुश्किल काम है। ऐसी अवस्था में भारत विश्वगुरु कैसे बन सकता है ?
वैज्ञानिकचेतना हासिल करना नए मनुष्य के निर्माण के आत्मसंघर्ष की प्रक्रिया से जुडा है। हमने अपने देश में सतही संरचनाओं को तो यूरोप की नक़ल पर तैयार कर लिया , यूरोप जैसे कपड़े पहन लिए हैं, यूरोपीय वस्तुएँ जमा कर लीं,लेकिन नए यूरोपीय वैज्ञानिक मूल्यों को ग्रहण नहीं किया , मूल्यों की पुरानी मीनारों में बंद रहकर हम विश्वगुरु का सपना देख रहे हैं लेकिन साक्षात जीवन में घट रही अनहोनी और अमानवीय ज़िन्दगी के प्रति बेख़बर बने हुए हैं। 
     वैज्ञानिकचेतना की सबसे बड़ी खूबी है कि हम अमानवीय मूल्यों और ऐसी चीजों को न मानें जिनको यथार्थ में रेशनल तर्क की कसौटी पर परख न सकें।हमारे वैज्ञानिक सोच का आलम यह है कि हमने सवाल खड़े करने बंद कर दिए हैं!" हाँ जी-हाँ जी कहना उसी गाँव में रहना", की मनोदशा ने पुरानी और नई रुढियों और अंधविश्वासों के प्रति हमें गूँगा बना दिया है। वैज्ञानिकचेतना हमने गूंगेपन से मुक्त करती है।" हाँ जी" के गुलामबोध से मुक्त करती है ।सोचो क्या गूंगाभारत विश्वगुरु बन सकता है ?

शुक्रवार, 5 दिसंबर 2014

अरविंद केजरीवाल और नैतिकता के कसाई



अरविंद केजरीवाल से मेरे कोई मुहब्बत नहीं है!मैं उनके ग़लत फ़ैसलों की रीयलटाइम आलोचना भी करता रहा हूँ, लेकिन अरविंद केजरीवाल मेरा बार -बार ध्यान खींचता है! आख़िरकार कोई बात तो है जो मुझे उसके हर एक्शन पर सोचने और लिखने को मजबूर करती है। मेरी तरह लाखों लोग हैं जो उसके एक्शन पर बोलते हैं, सक्रिय होते हैं, यहाँ तक कि उसके प्रतिस्पर्धी दलों की भी नींद ग़ायब रहती है! ख़ासकर उनलोगों के लिए केजरीवाल सिरदर्द है जो अनैतिक हैं , कारपोरेट ग़ुलाम हैं और देशविरोधी हैं। इसलिए केजरीवाल को एक व्यक्ति के रुप में नहीं फिनोमिना के रुप में देखें तो बेहतर होगा। 
     केजरीवाल कोई अजूबा नेता नहीं है। वह सामान्य मध्यवर्गीय परिवार से आया नेता है ,जिसके आदर्श हैं और उन आदर्शों के लिए जीने की जिसमें तमन्ना है, त्याग-भावना है। केजरीवाल इसलिए ताक़तवर फिनोमिना है क्योंकि उसने अपने लोकतांत्रिक विचारों के लिए जोखिम उठाया है। लोकतांत्रिक विचारों के लिए जोखिम उठाना और उनके लिए राजनीतिक संरचनाओं का निर्माण करना, जनता को गोलबंद करना आदि चीज़ें केजरीवाल को ठोस भौतिक शक्ति बना रही हैं। केजरीवाल चुनाव हारें या जीतें यह महत्वपूर्ण नहीं है, महत्वपूर्ण है उसका लोकतंत्र के प्रति अटूट प्रेम और उस प्रेम को सामाजिक -राजनीतिक सांगठनिक क्षमता में रुपान्तरित करना, यह बड़ा काम है, इस काम के सामने सारी सरकारी कुर्सियाँ बौनी हैं। 
         हमारे यहाँ लोकतंत्र के लिए मर मिटने का जज़्बा तक़रीबन ख़त्म हो चुका है,ऐसे में केजरीवाल जैसे अनेक लोकतांत्रिक नेताओं की ज़रुरत है। केजरीवाल की विशेषता है कि उसका हर क़दम सामाजिक बहस पैदा करता है। विभिन्न कसौटियों पर उसे कसा जाता है,यह काम हमलोग किसी और नेता के लिए नहीं करते ।मसलन् , केजरीवाल हवाईजहाज़ से दुबई गए तो विवाद हो रहा कि वे किस क्लास में गए ? मज़ेदार बात है हर नेता हवाई जहाज़ से चलता है, हर सांसद हवाई यात्रा करता है लेकिन कहीं पर कोई चर्चा नहीं होती ! केजरीवाल कोई अजूबा काम नहीं कर रहा वह सामान्यतौर पर हवाई जहाज़ से गया है और वह भी हो सकता है किसी संगठन या संस्था की टिकट पर गया हो या हो सकता है अपनी टिकट से ही गया हो, व्यक्ति के नाते केजरीवाल को हक़ है कि वह जो मन में आए टिकट ख़रीदे और यात्रा करे , इसमें ग़लत क्या है? अनैतिक क्या ? केजरीवाल का दल टिकट दे या वह निजी तौर पर ख़रीदे इसमें कोई भी चीज अनैतिक नहीं है । केजरीवाल का शानदार रिकॉर्ड रहा है वह भूखा नंगा नागरिक नहीं है। उसकी पत्नी कमाती है, वह चोरी के धन से न तो राजनीति कर रहा है और न हवाईयात्रा कर रहा है फिर परेशान क्यों है मीडिया-भाजपा-फेसबुक उन्मादी लोग ? केजरीवाल की हवाईयात्रा टिकट पर सवाल खड़े करना उस मानसिकता का द्योतक है जिसे फासिस्ट मानसिकता कहते हैं! फासिस्टों को व्यक्ति के नागरिक अधिकारों के इस्तेमाल से सबसे पहले परेशानी होती है। केजरीवाल की पूरी कार्यप्रणाली पारदर्शी है और यही हमारे साइबर फासिस्ट संत-शरीफ़ों के लिए मुसीबत की  जड़ है। 
        केजरीवाल पर बात करने के पहले हमें भारत में संविधान प्रदत्त नागरिक हकों के प्रति दिलो-दिमाग़ साफ़ करके रखना होगा। दिमाग़ में फासिस्ट विचारधारा या अ-लोकतांत्रिक भाव रखकर केजरीवाल समझ में नहीं आएगा । केजरीवाल यदि संविधान विरोधी काम करे उसे नंगा करो,केजरीवाल यदि नागरिक हकों पर हमला करे उसकी मरम्मत करो,केजरीवाल यदि नागरिक हकों और लोकतंत्र के विकास के पक्ष में जब खड़ा हो तो उसकी प्रशंसा करो, हिमायत करो।  

भारतीय राजनीति में 'श्वान भावबोध '



       राजनीति में मनुष्य बनना दुर्लभ है ,पशुवत आचरण करना आसान है!  कल प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जब संसद में घृणा भाषण शिरोमणि साध्वी मंत्री की हिमायत में बोल रहे थे तो विलक्षण आयरनी व्यक्त कर रहे थे, इस आयरनी को 'श्वान ' भावबोध कहते हैं! इस भावबोध की खूबी है कि जो कुत्ता जिस गली-मुहल्ले या इलाक़े में रहता है वह वहीं रहे ,अन्य के इलाक़े में आए न जाए! यदि कोई कुत्ता इलाक़ा अतिक्रमण करता है तो दूसरे इलाक़े के कुत्ते हल्ला करने लगते हैं !तब तक भोंकते हैं जब तक वह वापस अपने इलाक़े में न चला जाय! संघ-मोदी और भारतीय राजनेताओं की कमोबेश दशा 'श्वान भावबोध' वाली है! जो हिन्दुत्ववादी है वह अपनी सीमा में रहे! जो धर्मनिरपेक्ष है वह अपने दायरे में रहे! जो समाजवादी और साम्यवादी है वह अपने इलाक़े में रहे! यदि अपने इलाक़े से निकलकर जाने की कोशिश की तो बस ख़ैर नहीं! 
         श्वान भावबोध की दूसरी विशेषता है ग़ुलामी ! कुत्ते एक-दूसरे पर भोंकते हैं और गरमाते रहते हैं! लेकिन ग़ुलाम भाव बरक़रार रखते हैं! भारतीय राजनेताओं की भी यही दशा है ,वे बड़ी पूँजी की पशुवत ग़ुलामी कर रहे हैं और आपस में भोंक रहे हैं! बड़ी पूँजी की ग़ुलामी से मुक्ति का नेताओं और दलों के पास कोई विकल्प नहीं है। आयरनी यह है कि प्रत्येक दल श्वान भावबोध में आकंठ डूबा है और अपने को भोंक भोंककर बेहतरीन कुत्ता होने का दावा कर रहा है! 
           श्वान भावबोध ही है जो संघ- मोदी को हिन्दुत्व के फ्रेम से बाहर नहीं निकलने दे रहा !इन दिनों संघ-मोदी ख़ूब कोशिश में हैं कि वे अपने दफ़्तरों और जलसों में धर्मनिरपेक्ष नेताओं की इमेजों का इस्तेमाल करें, संसद चलने दें! मोदी ,संसद में हेकड़ी में नहीं ,भेड़ जैसी आवाज़ में मिमियाते बोल रहे हैं ! आयरनी देखिए जिस घृणाभाषा ने मोदी को प्रधानमंत्री बनाया उसी घृणा भाषा के लिए मोदी साध्वी को डाँट रहे हैं! साध्वी माफ़ी माँग रही हैं! मोदी अनुरोध कर रहे हैं सांसदो छोड़ दो! वे माफ़ी माँग चुकी हैं! नई मंत्री हैं! ग़रीब हैं!
     मोदी-नायडू के कहने का अर्थ है ग़रीब को घृणा का प्रचार करने का जन्मसिद्ध अधिकार है! देखो मुझे मैं आज यहाँ तक जो पहुँचा हूँ वह घृणाभाषा के प्रयोग के कारण ही पहुँचा हूँ ! तुम लोग भी यदि प्रधानमंत्री बनना चाहते हो तो मेरे फ़ार्मूलों पर चलो मौज ही मौज करोगे! घृणा और राजनीतिक मौज का यह संगम सिर्फ़ श्वान भावबोध में ही संभव है!
       श्वान भावबोध ने समाज, संसद से लेकर टीवी टॉक शो तक अपने पैर पसार लिए हैं! यह संभव है कि श्वान भावबोध पढ़कर किसी भी नेता की भावनाएँ आहत हों लेकिन हमारा मक़सद किसी को आहत करना नहीं है! मोदी पीएम हैं, साध्वीजी मंत्री हैं, अन्य लोग भी सम्माननीय पदों पर हैं हम उनका सम्मान करते हैं, लेकिन श्वान भावबोध से मुक्त होकर ये लोग राजनीति करें तो शायद राजनीति को पशुता से मनुष्यता की ओर ठेलने में मदद मिले! 

गुरुवार, 4 दिसंबर 2014

नव्य उदार आर्थिकयुगीन युवा की सच्चाईयां

   
भूमंडलीकरण की केन्द्रीय विशेषता है आत्ममुग्धता ,आत्महनन और आत्म-व्यस्तता ।  सन् 1990-91 के बाद से युवाओं में यह प्रवृत्ति तेजी से पैदा हुई है। इसने उसे सामाजिक सरोकारों से काटा है। पहले यह प्रवृति उच्चवर्ग में थी लेकिन भूमंडलीकरण के बाद से इस प्रवृत्ति ने निचले वर्गों में पैर पसारने आरंभ कर दिए।
     आत्ममुग्ध भाव की विशेषता है आप स्वयं को जानने की कोशिश नहीं करते। वे तमाम क्षमताएं त्याग देते हैं जिसके जरिए आत्म को जानने में मदद मिले। आत्म या खुद को न जानने के कारण व्यक्ति के अंदर अन्य को जानने की इच्छा भी खत्म हो जाती है।फलतः ये युवा अन्य की मदद नहीं कर पाते। वे निजी जीवन में व्यस्त रहते हैं। निज से परे कोई संसार है जिसे जानना चाहिए उसको ये युवा सम्बोधित ही नहीं करते। यह ऐसा युवा है जो अपने अलावा किसी में दिलचस्पी नहीं ले जाता। ज्योंही अन्य की बातें आरंभ होती हैं यह सुनना बंद कर देता है, रुचि लेना बंद कर देता है।
     नए युवा देखने में आकर्षक,नए भाव-भंगिमा वाले हैं वे देखने में सुंदर लगते हैं। आरंभ में ये अन्य को जल्दी प्रभावित भी कर लेते हैं लेकिन ज्योंही अन्य की बातें आरंभ होती हैं ये अपने को समेटना आरंभ कर देते हैं। इन युवाओं में एक बड़ा अंश है जो अपने चारों ओर की दुनिया से एकदम बेखबर है।
    अमेरिका में इस तरह के युवा की एक नागरिकता परीक्षा ली गयी। अमेरिका में अक्टूबर 2009 से अगस्त 2013 के दौरान ली गयी नागरिकता परीक्षा में 30लाख से ज्यादा आप्रवासी युवाओं ने हिस्सा लिया।  इस परीक्षा को 92प्रतिशत युवाओं ने पास किया। इन उत्तीर्ण युवाओं में 29फीसदी को अमेरिका के उपराष्ट्रपति का नाम तक नहीं मालूम था। 43फीसदी नागरिक अधिकारों को परिभाषित करने में असमर्थ रहे,40 फीसदी नहीं जानते थे कि अमेरिका ने द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जापान और जर्मनी से युद्ध किया था। 73 फीसदी नहीं जानते थे कि शीतयुद्ध के दौरान साम्यवाद ही मुख्य समस्या थी। 67 प्रतिशत नहीं जानते थे कि वे जिस आर्थिक व्यवस्था में रहते हैं उसे पूंजीवाद कहते हैं।
एक अन्य सर्वे में पता चला कि चार में से एक अमेरिकन को संविधान प्रदत्त पांच स्वाधीनताओं का ज्ञान नहीं था। वे एक से अधिक स्वाधीनता का नाम नहीं जानते थे। जिन लोगों में सर्वे किया गया उनमें से आधे से अधिक लोग  सिम्पसन कार्टून फैमिलीके दो चरित्रों के नाम तक नहीं जानते थे। इन सर्वेक्षणों पर विशेषज्ञों ने कहा कि बच्चों की इस दशा के लिए पब्लिक स्कूल सिस्टम जिम्मेदार है। क्योंकि वे ठीक से बच्चों को इतिहास,भूगोल और नागरिकशास्त्र नहीं पढ़ाते। इन लोगों ने यह भी आरोप लगाया कि इंटरनेट ने ऐसी पीढ़ी पैदा की है जो आत्मलीन,एडिक्ट,चंचलमन और अचेत है। यह भी देखा गया  अनेक लोग अमेरिका में निजी स्वार्थ को देखकर वोट देते हैं न कि देश के स्वार्थ को देखते हैं। अमेरिका के पतन का बड़ा कारण है कि अनेक अमेरिकन देश के बारे में नहीं सोचते ,सिर्फ अपने बारे में सोचते हैं।  एक अन्य विशेषज्ञ ने कहा कि जब युवा हमारे संविधान को ही नहीं जानते तो उसकी रक्षा में या संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए वे खड़े कैसे होंगे ?  



शुक्रवार, 28 नवंबर 2014

गुमशुदा 39 के कवरेज से उठे सवाल


        एबीपी न्यूज ने इराक में आईएसआई के द्वारा अपहृत किए गए 40भारतीय मजदूरों पर कल (28जून 2014) एक बेहतरीन तथ्यपरक कार्यक्रम पेश किया। साथ में अपने चैनल की राय भी दी कि कार्यक्रम में प्रस्तुत तथ्यों की खासकर 39मजदूरों की हत्या की वह पुष्टि नहीं कर सकता। इसके बावजूद हमें इस कार्यक्रम से उठे सवालों पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। यह सच है कि आम आदमी पार्टी के सांसद ने लोकसभा के पिछले सत्र में यह मसला सबसे उठाया था, उस समय किसी ने इस मसले की ओर ज्यादा ध्यान नहीं दिया,यहां तक कि विदेशमंत्री सुषमा स्वराज ने भी आश्वासन देकर सारे मसले को ठंडे बस्ते के हवाले कर दिया। लेकिन कल के टीवी कवरेज ने इस मसले को जिंदा कर दिया है। इस मसले पर विदेशमंत्रालय अभी तक बयान नहीं दे पाया है।
      स्थिति की भयावहता का अंदाजा इसी तथ्य से लगाया जा सकता है कि इन मजदूरों के अपहरण के प्रसंग का सरकार और उसका तंत्र निगरानी  कर रहा था, आतंकियों के चंगुल से भागे एक मजदूर से भी इराक स्थित दूतावास ने संपर्क किया, लेकिन इस समय वह मजदूर कहां है,कोई नहीं जानता ,साथ ही 39मजदूर किस अवस्था में हैं कोई नहीं जानता।  सरकार ने अपने बयान में भी कहा था कि उसे मालूम है कि भारतीय मजदूरों को बंदी बनाकर कहां रखा गया है। इसके बाद क्या हुआ किसी को कुछ नहीं मालूम। कल हठात 2बंगलादेशी नागरिकों के बयान सुनाकर टीवी चैनल ने सारे देश का ध्यान इस समस्या की ओर खींचा है और पत्रकारिता के लिहाज से यह स्वस्थ बात है। सरकार का पूरा तंत्र जो अब तक सोया पड़ा था हठात हरकत में आ गया है और विदेशमंत्री कह रही हैं कि तथ्यों को जानकर ही वे बयान देंगी। सवाल यह है क्या इस घटना की दैनंदिन सूचनाएं-रिपोर्टिंग मंत्री महोदया को हमारा इराक दूतावास नहीं कर रहा था ? रीयलटाइम में ट्विट करने वाले पीएम और उनके मंत्री एक भी ट्विट क्यों नहीं कर पाए ? क्या मंत्रालय के पास इतनी भी जानकारी नहीं है कि तुरंत कुछ कहा जाय ? सूचनाएं बताती हैं कि 10जून2014 को इराक के मोसुल इलाके में 40 भारतीय मजदूरों का आतंकियों ने अपहरण किया था। इनमें से एक मजदूर किसी तरह भागने में सफल रहा। यह खबर सबसे पहले भारतीय मीडिया में आई। जबकि भारतीय मीडिया में बंगलादेश के मजदूरों के अपहरण की बात एकसिरे से गायब रही है ,लेकिन एबीपी न्यूज की रिपोर्ट में यह तथ्य सामने आया है कि कुल91मजदूरों का आतंकियों ने अपहरण किया था जिनमें 51 बंगलादेशी मजदूरों को उन्होंने मुसलमान होने के कारण बाद में छोड़ दिया और 40 भारतीयों को उन्होंने झुंड से अलग करके गोलियों से भून दिया। 
     बंगलादेश के जिन दो चश्मदीद मजदूरों का टीवी कवरेज में चैनल ने इस्तेमाल किया है,उनके बयान के अलावा और किसी स्रोत से इस खबर की पुष्टि नहीं हुई है। उल्लेखनीय है कि आईएसआईएस का अब तक का रवैय्या रहा है कि वे जिनको गोलियों से भूनते हैं उनके बारे में खुद भी बयान जारी करते हैं, वीडियो जारी करते हैं,लेकिन अपहृत मजदूरों के बारे में उन्होंने कोई बयान जारी ही नहीं किया,न तो अपहरण का बयान जारी किया और न हत्या करनेवाली घटना पर बयान जारी किया। दूसरी समस्या यह है कि भारत सरकार यह कहती रही है कि वे जानते हैं इन मजदूरों को बंदी बनाकर रखा हुआ है और वे प्रयास कर रहे हैं रिहाई के। सवाल यह है कि उन प्रयासों में कोई प्रगति हुई या नहीं ? विदेशमंत्री ने विभिन्न स्तरों पर मजदूरों की रिहाई के लिए बातें की हैं लेकिन कोई परिणाम सामने नहीं आया। इसी प्रसंग में यह भी उल्लेखनीय है कई हजार भारतीयों और अपहृत नर्सों को छुड़ाने में सरकार को सफलता मिली है। लेकिन इस चक्कर में 39मजदूरों की रिहाई का मामला अभी तक अटका पड़ा है। कई स्रोतों से यह भी खबर आई थी कि आतंकियों ने 39मजदूरों की रिहाई के बदले मोटी रकम फिरौती के रुप में मांगी थी, जिसे भारत सरकार ने देने से मना कर दिया था। तीसरी मुश्किल यह है कि इराक के जिस इलाके में घटना हुई और जहां पर ले जाकर 39 मजदूरों का 'कत्ल' हुआ है,उसके बारे में इराक स्थित राजदूत या विदेश मंत्रालय या अन्य एजेन्सियों का कोई बयान अभी तक क्यों नहीं आया ? एबीपी न्यूज की खबर जब तक पुष्ट नहीं होती तब तक वह महज़ 'अघटित घटना' की खबर ही कही जाएगी। बेहतर यही होगा कि विदेश मंत्रालय विस्तार के साथ सभी तथ्यों का खुलासा करते हुए श्वेतपत्र के रुप में विस्तृत बयान जारी करे।  

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