शनिवार, 12 जून 2010

स्टार न्यूज और दीपक चौरसिया की शनि सेवा




          (शनि ग्रह का असली स्वरूप )

     ‘स्टार न्यूज’ वाले अंधाधुंध अंधविश्वास का प्रचार कर रहे हैं। अंधविश्वास के प्रचार का ताजा नमूना है दीपक चौरसिया के द्वारा 11जून 2010 को पेश किया गया कार्यक्रम। इस कार्यक्रम का शीर्षक था ‘शनि के नाम पर दुकानदारी’। इस कार्यक्रम में ज्योतिषी, तर्कशास्त्री,वैज्ञानिक सबको बुलाया गया,सतह पर यही लग सकता है कि ‘स्टार न्यूज’ वाले संतुलन से काम ले रहे हैं। लेकिन समस्त प्रस्तुति का झुकाव शनि और अंधविश्वास की ओर था।
    (शनि की नकली इमेज)    
      सवाल किया जाना चाहिए क्या अंधविश्वास और विज्ञान के मानने वालों को समान आधार पर रखा जा सकता है ? क्या अंधविश्वास और विज्ञान को संतुलन के नाम पर समान आधार पर रखना सही होगा ? क्या इस तरह के कार्यक्रम अंधविश्वास की मार्केटिंग करते हैं ? क्या यह शनि के बहाने ‘स्टार न्यूज’ की दुकानदारी है ? क्या इस कार्यक्रम में शनि के बारे में तथ्यपूर्ण और वैज्ञानिक जानकारियों का प्रसारण हुआ ? क्या इस तरह के कार्यक्रम अंधविश्वास को बढ़ावा देते हैं ? आदि सवालों पर हमें गंभीरता के साथ विचार करना चाहिए।
   (अंतरिक्षयान कासिनी द्वारा भेजी शनि की प्रामाणिक इमेज, क्या किसी ज्योतिषी ने आज तक किसी ग्रह को देखा है ? ) 
    ‘स्टार न्यूज’ के इस कार्यक्रम में एंकर दीपक चौरसिया अतार्किक सवाल कर रहे थे। एंकर जब अतार्किक सवाल करता है तो वह कुतर्क को बढ़ावा देता है। बक-बक को बढ़ावा देता है। सही सवाल करने पर सही जबाब खोज सकते हैं। दीपक चौरसिया का प्रधान सवाल था ‘शनि के नाम पर दुकानदारी हो रही है या नहीं’,कार्यक्रम में भाग लेने वाले प्रत्येक व्यक्ति से यह सवाल पूछा गया जाहिरा तौर पर जबाब होगा ‘हां’, अगला सवाल था  शनि से ड़रना चाहिए या नहीं ? उत्तर था ‘नहीं’। पहले सवाल के जबाब में वक्ताओं शनि के नाम पर दुकानदारी का विरोध किया। दूसरे सवाल के जबाब में कहा शनि से नहीं डरना चाहिए।
            कायदे से देखें तो इन दोनों सवालों में ‘स्टार न्यूज’ वालों की शनि भक्ति और आस्था छिपी है। ये दोनों सवाल यह मानकर चल रहे हैं शनि है, रहेगा और शनि को मानो। सिर्फ शनि के धंधेबाजों से बचो, शनि से डरो मत ,शनि को मानो। पूरे कार्यक्रम में दीपक चौरसिया एकबार भी यह नहीं कहते कि शनि पूजा मत करो,शनि को मत मानो, शनि अंधविश्वास है, उनकी चिंता शनि के नाम पर हो रही दुकानदारी और भय को लेकर थी। एंकर द्वारा शनि की स्वीकृति अंधविश्वास का प्रचार है।
     ‘स्टार न्यूज’ ने कार्यक्रम के आरंभ में शनि की पूजा के विजुअल दिखाए गए । पूजा के विजुअल प्रेरक और फुसलाने का काम करते हैं।मोबलाईजेशन करते हैं। ये विजुअल शनि अमावास्या के पहले वाली रात को प्राइम टाइम में दिखाए गए हैं। इस कार्यक्रम में मौजूद ज्योतिषियों ने ज्योतिष के बारे में,शनि के बारे में जो कुछ भी कहा उसे अंधविश्वास की कोटि में ही रखा जाएगा।
     मजेदार बात यह हैकि ज्योतिषियों को अपनी पूरी बात कहने का अवसर दिया गया और वैज्ञानिकों को आधे-अधूरे ढ़ंग से बोलने दिया गया और कम समय दिया गया। एक वैज्ञानिक जब शनि के बारे में वैज्ञानिक तथ्य रखने की कोशिश कर रहा था तो उसे बीच में ही रोक दिया गया।
     समूचे कार्यक्रम में एंकर की दिलचस्पी शनि के बारे में वैज्ञानिक जानकारियों को सामने लाने में नहीं थी। बल्कि वह तो सिर्फ यह जानना चाहता था कि शनि के नाम पर जो दुकानदारी चल रही है ,उसके बारे में वैज्ञानिकों की क्या राय है ? वे कम से कम शब्दों में राय दें।
     एंकर कोशिश करता रहा कि वैज्ञानिक विस्तार के साथ न बोल पाएं। एक वैज्ञानिक ने कहा शनि का समाज पर कोई प्रभाव नहीं होता,दूसरे ने कहा शनि पूजा के नाम पर भय पैदा किया जा रहा है,अंधविश्वास फैलाया जा रहा है। तीसरे वैज्ञानिक ने कहा शनिपूजा अपराध है। बालशोषण है। शनि के नाम पर बच्चों से भिक्षावृत्ति कराई जा रही है। यह अपराध है।
      इस बहस का सबसे मजेदार पहलू था एक ज्योतिषी द्वारा शनि ग्रह पर अपनी किताब को दिखाना, इस किताब के कवर पेज पर जो चित्र था उसके बारे में ज्योतिषी-लेखक ने कहा यह शनि का चित्र है,इसका तुरंत वैज्ञानिकों ने प्रतिवाद किया और कहा यह शनि ग्रह का फोटो नहीं है। ज्योतिषी एक क्षण के लिए बहस में उलझा लेकिन वैज्ञानिकों के खंडन के सामने उसके चेहरे की हवाईयां उड़ने लगीं।
    असल बात यह कि ज्योतिषी यह तक नहीं जानता था कि शनि ग्रह देखने में कैसा है ? शनि को इमेज मात्र से नहीं पहचानने वाले ज्योतिषी को शनि का कितना ज्ञान होगा आप स्वयं कल्पना कर सकते हैं ? इसके विपरीत पैनल में मौजूद वैज्ञानिकों को अपनी पूरी बात कहने का मौका ही नहीं दिया गया। दीपक यौरसिया का सवाल था शनि से डरना चाहिए या नहीं ? एक ही जबाब था नहीं। सवाल डरने का नहीं है।
   सवाल यह है कि शनि को विज्ञान के नजरिए से देखें या अंधविश्वास के नजरिए से देखें ? विज्ञान के नजरिए से शनि एक ग्रह है,उसकी अपनी एक कक्षा है। स्वायत्त संसार है। वैज्ञानिकों के द्वारा सैंकडों सालों के अनुसंधान के बाद शनि के बारे में मनुष्य जाति की जानकारी में जबर्दस्त इजाफा हुआ है। इसके लाखों चित्र हमारे पास हैं। शनि में क्या हो रहा है उसके बारे में उपग्रह यान के द्वारा बहुत ही मूल्यवान और नई जानकारी हम तक पहुँची है।
     इसके विपरीत ज्योतिषियों ने विगत दो -डेढ़ हजार साल पहले शनि के बारे में ज्योतिष ग्रंथों में जो अनुमान लगाए थे वे अभी तक वहीं पर ही अटके हुए हैं।
       कार्यक्रम में शनि के बारे में नई जानकारियों को सामने लाने में एकर की कोई दिलचस्पी नहीं थी। वह बार-बार ज्योतिषियों से काल्पनिक बातें सुनवाता रहा। ज्योतिषियों को इस सवाल का जबाब देना चाहिए कि उनके पास शनि के बारे में क्या नई प्रामाणिक जानकारियां हैं ?
     मैंने ज्योतिषशास्त्र का औपचारिक तौर पर नियमित विद्यार्थी के रूप में संस्कृत के माध्यम से 13 साल प्रथमा से आचार्य तक अध्ययन किया है और ज्योतिषशास्त्र के तकरीबन सभी स्कूलों के गणित-फलित सिद्धान्तकारों को भारत के श्रेष्ठतम ज्योतिष प्रोफेसरों के जरिए पढ़ा है। मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि सैंकड़ों सालों से ग्रहों के बारे में ज्योतिष में कोई नयी रिसर्च नहीं हुई है।
     ज्योतिषियों की ग्रहों के नाम पर अवैज्ञानिक बातों के प्रचार में रूचि रही है लेकिन रिसर्च में उनकी कोई दिलचस्पी नहीं रही है। जब सैंकड़ों सालों से फलित ज्योतिष से लेकर सिद्धान्त ज्योतिष के पंड़ितों ने ग्रहों को लेकर कोई अनुसंधान ही नहीं किया तो क्या यह ज्योतिषशास्त्र की  असफलता और अवैज्ञानिकता का प्रमाण नहीं है ? हम जानना चाहेंगे कि जो ज्योतिषी ग्रहों के सामाजिक प्रभाव के बारे में तरह-तरह के दावे करते रहते हैं वे किसी भी ग्रह के बारे में किसी भी ज्योतिषाचार्य द्वारा मात्र विगत सौ सालों में की गई किसी नई रिसर्च का नाम बताएं ? क्या किसी ज्योतिषी ने कभी किसी ग्रह को देखा है ? ज्योतिष की किस पुरानी किताब में ग्रहों का आंखों देखा  वर्णन लिखा है ? सवाल उठता है जब ग्रह को देखा ही नहीं,जाना ही नहीं,तो उसके सामाजिक प्रभाव के बारे में दावे के साथ कैसे कहा जा सकता है। 

सोशल नेटवर्कः सामाजिक संबंधों के अंत का वर्चुअल राग

    यह सामाजिक संबंधों के अंत का दौर है। नए किस्म के सामाजिक संसार की सृष्टि सोशल नेटवर्किंग साइट पर हो रही है। एक सर्वे में अनुमान व्यक्त किया गया है कि सन् 2014 तक इंटरनेट पर सोशल नेटवर्क का आकार कल्पना के दायरों का अतिक्रमण कर जाएगा। सोशल नेटवर्क के बढ़ने से सामाजिक समुदायों के बीच पुख्ता संबंधों की संभावनाओं को व्यक्त किया जा रहा है। यह भी कहा जा रहा है कि इससे समाज में आस्था मजबूत होगी।
    उल्लेखनीय है पूंजीवाद की विकास प्रक्रिया ने सामाजिक आस्थाओं को कमजोर किया है। उम्मीद की जा रही है कि सोशल नेटवर्क के विकास से सामाजिक आस्थाएं लौटेंगी। व्यक्तिगत समस्याओं,नौकरी,सूचना के बेरीफिकेशन,साझा हितों और वस्तुओं का उपभोग बढ़ेगा।
      ‘पेव’ सर्वे के उपरोक्त निष्कर्षों से 39 फीसदी लोग सहमत हैं, 20 फीसदी लोग असहमत हैं, और 27 फीसदी ने उपरोक्त राय को चुनौती दी है। जबकि 15 फीसदी ने कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की है। यह सर्वे 1,286 अमेरिकियों में सन् 2004 में किया गया था।
    इस सर्वे में जिस बात का अनुमान किया गया था वह सही साबित नहीं हुआ। लेकिन एक तथ्य साफ है कि 2004 से लेकर 2010 के बीच में सामाजिक आस्था में गिरावट आयी है। आर्थिक मंदी ने अमेरिकी अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ दी है। मंदी का पूर्वानुमान लगाने में इंटरनेट और कारपोरेट मीडिया असफल रहा है। आज अमेरिका में बेकारी चरमोत्कर्ष पर है।
     सोशल नेटवर्क के बृहत्तर संगठन हैं। किंतु इनमें से ज्यादातर के संबंध हल्के और चलताऊ मूल्यों पर टिके हैं। सोशल नेटवर्क के लोगों के संबंधों में विश्वास का अभाव है। सोशल नेटवर्क में ज्यादातर लोगों का इकसार विचारों के लोगों के  बीच संबंध है। ये ऐसे लोगों के समूह हैं जो सहमत हैं। इनमें न्यूनतम असहमति है। ये लोग आपस में ज्यादा से ज्यादा रेडीकल विचारों का आदान-प्रदान करते हैं लेकिन एक-दूसरे पर कम से कम विश्वास करते हैं।
      दूसरी बड़ी समस्या यह है कि सोशल नेटवर्क के सदस्यों की सूचनाओं की सहज पुष्टि संभव नहीं है। सोशल नेटवर्क का लक्ष्य लोगों में आपसी विश्वास पैदा करने से ज्यादा माल या वस्तु के प्रति विश्वास पैदा करना है। व्यापारिक विश्वास और संचार पैदा करना इसका प्रधान लक्ष्य है। सोशल नेटवर्क के द्वारा बने संपर्क और संबंधों का सीमित महत्व है,लेकिन इसे व्यक्तिगत संबंधों का विकल्प नहीं बनाया जा सकता।
    सोशल नेटवर्क का विस्तार हो रहा है इसका यह अर्थ नहीं  है कि सामाजिक संबंधों में आस्था पैदा हो रही है। इंटरनेट पर सभी सूचनाएं विश्वास के लायक नहीं होतीं। नेट पर जितनी वैध सूचनाएं हैं उससे ज्यादा अवैध सूचनाएं हैं। जितने भरोसे के लोग हैं उससे ज्यादा भरोसा लूटने वाले लोग हैं। नेट पर जितना व्यक्तिगत सच है उससे कहीं ज्यादा झूठ फैला हुआ है।
     आज समाज में आम लोगों के पास सामाजिक संबंध बनाने के अनेक चैनल हैं,सोशल नेटवर्क उनमें सबसे कमजोर और अविश्वसनीय चैनल है। एक सीमा के बाद सोशल नेटवर्क की कोई उपयोगिता नहीं है। संपर्क और संबंध के जितने ज्यादा स्रोत होंगे उतने ही संशय और संदेह की संभावनाएं भी होंगी। नेट के विभिन्न ऱूप सामाजिक शिरकत की बजाय सामाजिक पलायन को बढ़ावा दे रहे हैं। आप किसी भी व्यक्ति का नेट के माध्यम से आसानी से विश्वास तोड़ सकते हैं। यहां शिरकत वही कर रहे हैं जो एकमत हैं।
    इंटरनेट के द्वारा बहुत दूर रहने वाले व्यक्ति के साथ संपर्क रख सकते हैं। तत्काल अपनी बात संप्रेषित कर सकते हैं। अब तक का इंटरनेट अनुभव बताता है कि यह संपर्क का सबसे प्रभावी माध्यम है। इससे हमें ज्ञान संचार के अनेक नए स्रोत भी हाथ लगे हैं।   
     इंटरनेट से संपर्क बनाने के लिए समय और धैर्य ये दो चीजें होनी चाहिए। नेट के संबंधों को बनाए रखने के लिए इफ़रात में समय खर्च करना पड़ता है। सोशल नेटवर्क से सतही संबंध बनता है। यह नकली संबंध है। वास्तव जीवन में जिन व्यक्तियों से जीवंत संबंध हैं उनसे सोशल नेटवर्क से जरिए संवाद फलदायी हो सकता है। ऐसे लोगों के संबंधों को सोशल नेटवर्क और भी प्रगाढ़ बनाता है।
   सोशल नेटवर्क के सभी सदस्य गुणी नहीं होते। अनेक अवगुणी सदस्य भी हैं,शैतान भी हैं। सोशल नेटवर्क के सभी दोस्त मूल्यवान नहीं होते। इस सबके बावजूद सोशल नेटवर्क का दायरा तेजी से फैल रहा है। इसमें विविध किस्म के लोग आ रहे हैं। इससे परंपरागत संप्रेषण और सामाजिक बंधनों की सीमाएं टूट रही हैं। इससे यूजर और भी आलसी बनेगा। सामाजिक शिरकत  घटेगी। हम ज्यादा से ज्यादा घर में बैठे रहेंगे। स्थानीय समाज और संस्कृति से बेगानापन बढ़ेगा।
   सोशल नेटवर्क वैसे ही है जैसे घर में टेलीफोन। जिस तरह फोन की सीमा है उसी तरह नेटवर्क की भी सीमा है। चाहे वह कितना ही बड़ा हो इसकी भी सीमा है। मानवीय अनुभव में विश्वास धीरे धीरे आता है। उसी तरह आस्था का हमारी सहजजात अनुभूतियों से गहरा संबंध है। अनुभव की कसौटी पर जब कोई सूचना खरी उतरती है तब ही विश्वास होता है।
            सोशल नेटवर्क की एक समस्या यह भी है कि इसके अधिकांश सदस्य एक-दूसरे से भूठ बोलते रहते हैं। वे एक ऐसी संस्कृति का हिस्सा हैं जिसे साइबर संस्कृति कहते हैं। साइबर संस्कृति में असत्य की वैसे ही गुंजाइश है जैसे जीवन में। यह काल्पनिक संस्कृति है,इसका वास्तव जगत से कम संबंध है। इसका आधार है वर्चुअल या डिजिटल तकनीक। इस तकनीक का सांस्कृतिक आधार है सत्याभास। इसका परिणाम है ईमानदारी का लोप। वक्ता के एथॉस का लोप।
      यह भी संभव है कि असत्य ढ़ंकने के लिए बड़बोलेपन से काम लिया जाए। सत्य को छद्म रूप और छद्म नाम से पेश किया जाए। यह भी संभव है कोई यूजर सत्य ही बोलना चाहे और वास्तव नाम के साथ बोलना चाहे। इस तरह के अन्तर्विरोध के बावजूद सोशल नेटवर्क का विस्तार ही होगा। यह भी संभव है जागरूक लोगों के बीच सोशल नेटवर्क सघन विचारधारात्मक एकता और भाईचारे का प्रभावी माध्यम हो जाए। 
  कुछ लोगों का मानना है कि ‘सोशल नेटवर्क’ के बहाने ‘सामाजिक संबंधों’ को अपदस्थ किया जा रहा है। ‘नेटवर्क’ में ‘संबंध’ को अपदस्थ करने या उसका विकल्प तैयार करने की क्षमता नहीं है। ‘नेटवर्क’ सिर्फ कनेक्शन है। बेज़ान संपर्क सूत्र है। यहां से ही इसकी शक्ति,सीमा और संभावनाओं के द्वार खुलते हैं। बेज़ान संपर्क सूत्र के जरिए बनने वाले संबंध में प्राणों का संचार करना संभव नहीं है।  
      जिन लोगों के बीच किसी भी किस्म का पहले से सामाजिक संबंध है उनके लिए तो सोशल नेटवर्क एक अतिरिक्त संपर्क सूत्र हो सकता है। लेकिन जो सीधे सोशल नेटवर्क के जरिए जुड़ रहे हैं,मित्र बन रहे हैं, उनकी दोस्ती वायवीय और काल्पनिक ही होगी। ऐसे संबंध वर्चुअल ही होंगे, इन्हें वास्तव संबंध समझने की भूल नहीं करनी चाहिए। इस तरह के संबंध में परिवर्तन की क्षमता नहीं है। यह सच है कि सोशल नेटवर्क में हजारों -लाखों लोगों के साथ संपर्क किया जा सकता है,लेकिन एक व्यक्ति कम से कम लोगों से संपर्क करता है। यह वैसे ही है जैसे 400 से ज्यादा टीवी चैनल टीवी में दिखते हैं। लेकिन व्यक्ति 400 चैनल नहीं देखता वह चंद चैनल ही देखता है।
     सोशल नेटवर्क के डाटा की सुरक्षा और प्राइवेसी को लेकर खूब हंगामा हो रहा है। कई बार डाटा चोरी की खबरें भी आई हैं। व्यक्तिगज जीवन की सूचनाओं के अपहरण की भी खबरें आई हैं। इनकी चोरी का सीधा घातक असर भी होता है। पहचान से जुड़ी सूचनाओं की चोरी गंभीर क्षति पैदा करती है।
   सोशल नेटवर्क का भविष्य में विकास होगा लेकिन विश्वास में विकास नहीं होगा इसके विपरीत विश्वास घटेगा। इंटरनेट पर सूचना प्राप्ति के स्रोत बढ़ जाएंगे। किंतु विश्वासयोग्य सूचना स्रोत नहीं बढ़ेंगे। इसी तरह नेटवर्क बढ़ेगा लेकिन भरोसे के सपर्क उस अनुपात में नहीं बढ़ पाएंगे। इंटरनेट उन लोगों को अपनी ओर आकर्षित करने में असमर्थ है जिनके बीच पहले से ही विश्वसनीय संबंध हैं। जो एक-दूसरे पर भरोसा करते हैं उन्हें इंटरनेट आकर्षित नहीं कर पाया है। खासकर वाचिक सभ्यता ,व्यक्तिगत संबंधों और पुरानी नातेदारी-रिश्तेदारी वाले समाजों में सोशल नेटवर्क की अपील ज्यादा नहीं होगी।
    एक अन्य पहलू है जिस पर ध्यान देने की जरूरत है। सोशल नेटवर्क पर बढ़ती भीड़ में एक-दूसरे पर विश्वास का जमना संभव नहीं है। यह भी़ड़ जितना बढ़ेगी निजी विश्वास उतना ही कम होगा। विश्वास कम लोगों में होता है,भीड़ पर विश्वास कोई नहीं करता,भीड़ में सच कोई नहीं बोलता. भीड़ की कोई पहचान नहीं होती। भीड़ में पहचान गुम हो जाती है। हजारों की सदस्यता वाले सोशल नेटवर्क में निजी पहचान बचाए रखना संभव नहीं है ,वहां प्राइवेसी को भी बचाना संभव नहीं है। सोशल नेटवर्क मूलतः भीड़ है। भीड़ का निजी विवेक नहीं होता। भीड़ अधिकारहीन होती है। भीड़ में भेड़चाल होती है।  
  सोशल नेटवर्क यूजर के भूगोल को बदल देता है। किंतु भूगोल के आकार को नहीं बदल सकता। किसी भी संबंध को बनने में समय लगता है। इंटरनेट पर रीयल टाइम में संबंध बनने से किसी सामाजिक संबंध को बनाने में खर्च होने वाला समय कम नहीं किया जा सकता। इंटरनेट पर जितनी सूचनाएं उपलब्ध हैं उससे ज्यादा डिस-इन्फॉर्मेशन या कु-सूचनाएं उपलब्ध हैं। इसके अलावा सूचनाओं का अतिरिक्त बोझा स्वयं में एक समस्या है।
       इंटरनेट के आने के साथ सूचना ही नहीं आ रही हैं बल्कि अफवाह, असत्य, भड़काने वाली बातें,बेबकूफियां भी आ रही हैं, इससे इंटरनेट और सोशल नेटवर्क पर अविश्वास बढ़ेगा। इंटरनेट के चाटरूम में चलने वाली बातचीत में भी किसी भी किस्म का नियमन नहीं है अतः वहां जो सुझाव दिए जा रहे हैं वे वास्तव हैं,वैध हैं, इसके बारे में छानबीन करना संभव नहीं है। नेट पर विभिन्न रूपों में होने वाली बातचीत को वाचिक पहलवानी कहना समीचीन होगा। बातों के शेर कभी हकीकत में शेर नहीं होते।
   ‘पेव’ के 2004 के सर्वे से यह भी पता चला है कि सन् 2014 तक राजनीतिक और धार्मिक कट्टरपंथियों की इंटरनेट पर तादाद में तेजी से बढ़ोतरी होगी। प्रतिक्रियावादी और कट्टरपंथी ग्रुपों के व्यक्तिगत नेटवर्क भी खूब तेजी से सामने आएंगे। ये वे लोग हैं जो खुलेआम हिंसाचार और अविवेकपूर्ण बातों की हिमायत करते हैं। हिंसा और प्रतिगामी विचार उनके बीच में एकता का मूलाधार है।
   सन् 2004 का सर्वे यह भी रेखांकित करता है कि आम लोगों में राजनीतिक विवाद बढ़ेंगे। राजनीतिक-सामाजिक मुद्दों पर ध्रुवीकरण तेज होगा। विचारों के ध्रुवीकृत संसार में अर्थपूर्ण बहस करना संभव नहीं है। किसी भी मसले पर अर्थपूर्ण आम सहमति बनाना संभव नहीं होगा।  
                        

















शुक्रवार, 11 जून 2010

शमशेरबहादुर सिंह की जन्मशती पर विशेष- अनकहे सत्य का कवि शमशेर -विजया सिंह

     कला विशेषकर कविता की कला कलाकार को, कवि को नितांत व्यक्तिगत, निजी मानवीय स्थितियों और संवेगों से परिचित कराती है। फिर भी कविता एकालाप नहीं अत्यंत अंतरंग किन्तु सक्रिय संवाद है। शमशेर का निजी उन्हें एकाकी नहीं बनाता। कविता के निजी पलों में कवि के साथ सम्पूर्ण संसार भी श्वांस लेने लगता है और इसी से हरियाती है शमशेर की कविताई। उनके पास कवि की ऑंखें, शिल्प का विवेक, मनुष्य होने की प्रतिबद्धता तथा रचनाकार के स्पष्ट सिद्धांत भी हैं-'एक अच्छे कवि के लिए यह ज़रूरी है कि वह अपने देश की और भाषा की काव्य परम्परा से अच्छी तरह परिचित हो और इस परम्परा में आनेवाले श्रेष्ठ कवियों का उसने बार-बार और अध्ययन किया हो।'(शमशेर: कुछ और गद्य रचनाएँ)
      आश्चर्य नहीं कि शमशेर के मौलिक कवित्व ने 'अपने स्वंय के शिल्प' का निर्माण किया है। उनकी कविताई व्यक्तित्व विकास से जुड़ी हुई है उनकी कविता में भाव, शिल्प, भाषा, बौद्धिकता का अनुपम संयोग है, जीवन के सुलझे-अनसुलझे, कहे-अनकहे पहलुओं से कोई परहेज नहीं। वहां सारा का सारा आवश्यक है, चुपचाप ही सही, ज़रूरी है। शमशेर के शिल्प की विशेषता को बारीकी से रेखांकित करते हैं मुक्तिबोध ने लिखा -'अपने स्वयं के शिल्प का विकास केवल वही कवि कर सकता है, जिसके पास अपने निज का कोई मौलिक विशेष हो, जो यह चाहता हो कि उसकी अभिव्यक्ति उसी के मनस्तत्वों के आकार की, उन्हीं मनस्तत्वों के रंग की, उन्हीं के स्पर्श और गंध की हों।'(शमशेर: मेरी दृश्टि में)
       शमशेर ने 'दूसरा सप्तक' की कविताएँ, 'उदिता', 'कुछ कविताएँ', 'कुछ और कविताएँ', 'चुका भी नहीं हूँ मैं','इतने पास अपने','काल तुझसे होड़ है मेरी' जैसे काव्य-संग्रहों की रचना की। इनके काव्य के प्रथम चरण में एक ओर छायावाद का प्रभाव और दूसरी ओर छायावाद से हटकर नए भाव, विषयों और शिल्प के निर्माण की कोशिश दिखाई देती है। आगे वामपंथ में पूरी आस्था के साथ उन्होंने सृजनकर्म के प्रति गहरे सरोकारों को व्यक्त किया। इसके बाद के चरण में शमशेर की काव्य कला का सर्वोत्तम रूप दिखता है जहाँ उनकी गहरी दृष्टि, समृद्ध भाव-बोध, प्रखर संवेदनशीलता, शिल्प एवं भाषा सौंदर्य स्वत: आकर्शित कर लेते है। इसी काल में लिखी कविता 'अमन का राग' बकौल मुक्तिबोध 'क्लासिकल ऊँचाई' की कविता है-
    'सब संस्कृतियाँ मेरे सरगम में विभोर हैं
     क्योंकि मैं हृदय की सच्ची सुख-शांति का राग हूँ।
     बहुत आदिम, बहुत अभिनव।'
       शमशेर की सबसे बड़ी खूबी उनकी ग्रहण शक्ति है जो सभी प्रभावों, प्रक्रियाओं को हजम कर उसे पुनर्सृजित कर अभिनव रूप में कविता के माध्यम से सामने लाती है। उनकी कविताई में छायावादी काव्य-परम्परा की झलक है तो उर्दू शायरी, हिंदी, उर्दू, अंग्रेजी साहित्य का गंभीर अध्ययन, समकालीन भाषा के साथ ही साथ यूरोपीय परम्परा का ज्ञान भी परिलक्षित होता है। उन्होंने अपने कई पसंदीदा रचनाकारों से भी प्रभाव ग्रहण किया जिनमें कबीर, शेक्सपीयर, मीर, गालिब, नज़ीर, फ़ानी, इकबाल, निराला का नाम प्रमुख है। निराला को महत्वपूर्ण मानने के कारणों को रेखांकित करते हुए शमशेर कहते हैं-'एक बड़े कवि में जिस गुण को मैं महत्व देता हूँ वह है एक आंतरिक फोर्स, एक तरह का फोर्स, ऊर्जा, जो कि निराला में है, फोर्स। और एक सेल्फ कानफीडेन्स जो उनकी कविता में बोलता है।'
       शमशेर सन् 1945 में कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य बने। उनकी कविताओं में मार्क्सवादी आग्रहों को लेकर कई अटकलें भी लगाई जाती रहीं हैं। जबकि सचाई यह है कि किसी भी वाद से परे शमशेर मानव-जीवन सत्यों, सुख-दुख, सौंदर्य, प्रेम से जुड़े कवि हैं और निरन्तर कष्टसाध्य सर्जन उनका कर्म है। उनकी कविताई 'ह्यूमैनाइजिंग इफेक्ट' (मुक्तिबोध) से भरपूर है। डॉ. विजयदेव नारायण साही भी शमशेर को किसी विचारधारा के प्रचारात्मक प्रभाव से इतर मानते हैं-'आरंभ में जिसे शमशेर मार्क्सवाद कहते थे उसके लिए दस वर्ष बाद कुछ अधिक ढीली शब्दावली 'समाज सत्य' या उससे भी अधिक ढीली शब्दावली 'समाज सत्य का मर्म', 'इतिहास की धड़कन' आदि का प्रयोग करते है। शायद यह हाशिए की लिखावट को कुछ और सूक्ष्म या धुँधला बनाने की कोशिश है। वस्तुत: शमशेर ने मार्क्सवादी दर्शन को पूर्णत: आत्मसात कर लिया था इसीलिए उनमें अपने को मार्क्सवादी कहलाने का प्रचारात्मक आग्रह नहीं पाया जाता।' यही कारण है कि शमशेर की कविता मूल्यों, जनपक्षधरता तथा संघर्ष की बातें करती है-
       'एक - जनता का
           दु:ख : एक।
        हवा में उड़ती पताकाएँ
            अनेक।
            दैन्य दानव। क्रूर स्थिति।
            कंगाल बुद्धि : मजूर घर-भर।
            एक जनता का - अमर वर
            एक का स्वर
            -अन्यथा स्वातंत्र्य-इति।       (बात बोलेगी)
         शमशेर कवि होने के साथ- साथ सिद्धहस्त चित्रकार भी हैं। मुक्तिबोध के शब्दों में 'शमशेर की मूल मनोवृत्ति एक इम्प्रेषनिस्टिक चित्रकार की है।' उनकी कविताई कवित्व और चित्रकारी का सम्मिलित रूप है। कवि की टेकनीक चित्रकार ने न केवल समृद्ध की है बल्कि उसे प्रखर, बारीक और सर्वसमावेशी भी बनाया है। शमशेर दुगुनी शक्ति से जीवन के वास्तविक भाव प्रसंगों का काव्यात्मक चित्र प्रस्तुत करते है। भावों को प्रकृति से युक्त कर सचित्र ऐंद्रिक रूप में साकार करना कविता के आस्वाद को बढ़ाता है-   
       'घिर गया है समय का रथ कहीं
       लालिमा में मँढ़ गया है राग।
       भावना की तुंग लहरें
       पंथ अपना, अन्त अपना जान
       रोलती है मुक्ति के उदगार।'   (घिर गया है समय का रथ)
    शमशेर की कविताएँ यथार्थ के धरातल पर मनोभावों के तारों से बुनी गई है जिनकी मनोवैज्ञानिकता उन्हें कहीं अधिक गहन, संश्लिष्ट बना देती है। कई बार दुरूह भी। उनकी कविताएँ सहज कथन मात्र न होकर तीव्र प्रतिक्रियाएँ हैं। जीने, सोचने और लड़ने को मजबूर करती हुई।
     प्रकृति के विविध शेड्स, बिम्ब, चित्र शमशेर के काव्य में प्रमुखता से लक्षित किए जा सकते है। भोर, शाम, पर्वत, बारिश, बादल कई बार कवि की 'इम्प्रेषनिस्ट कला' में घुलकर महत्वपूर्ण बिंदुओं पर मुखर तो अन्य पर धुंधले आकारों में सामने आते है। कहीं वाचाल प्रकृति है तो कहीं मूक किन्तु सजीव प्रकृति ऑंखों के सामने तैरने लगती है। पाठकों की संवेदनाओं को ललचाती, उद्दीप्त करती हुई।
          'जो कि सिकुड़ा हुआ बैठा था, वो पत्थर
           सजग-सा होकर पसरने लगा
           आप से आप।'
      छायावादी कवियों से इतर शमशेर प्रेम में शरीर के आकर्षण को नैतिकता के बाड़ों से मुक्त कर सहर्ष स्वीकारते है। यह प्रेम का कुंठित और अमर्यादित रूप नहीं है बल्कि मनुष्य की कामुक वृत्तियों की निर्द्वन्द, सुन्दर, आवश्यक अभिव्यक्ति है। प्रिय के सौंदर्य और प्रेम में डूबा कवि अपराधबोध और झूठी नैतिकता का बोझ नहीं उठाता। वायवीय फंतासियों से अलग मन और शरीर की इच्छा, कामना व तृप्ति की बात करता है। यहाँ गौरतलब है कि शमशेर तथाकथित पुंसवादी मानसिकता से ग्रस्त होकर सतही चित्रण नहीं करते वरन् प्रेम की दृष्टि से सौंदर्य की छवि अंकित करते है। वे कहीं भी निरंकुश नहीं होते वरन् स्वत: निर्मित सेंसर के साथ सक्रिय होते है। कहते हुए भी एक अनकहापन, गोपन रखने या मूक हो जाने की प्रवृत्ति वस्तुत: कवि की सचेत दृष्टि है जो भाव, अनुभूतियों को उनके सम्पूर्ण आरोहों-अवरोहों के साथ स्पेस देती है, जहाँ केवल प्रेम महत्वपूर्ण रह जाता है। इस प्रकार देखा जाए तो नई कविता को छायावादी काव्य परम्परा का नवीन विकास माना जा सकता है-
               'ऐसा लगता है जैसे
              तुम चारों तरफ़ से मुझसे लिपटी हुई हो
              मैं तुम्हारे व्यक्तित्व के मुख में
              आनंद का स्थायी ग्रास...हूँ
              मूक।'                           (तुमने मुझे)
       शमशेर की कविता अकेले व्यक्ति की प्रणय कविता है। प्रेम में वे स्वयं को एकाकी बनाते है, स्वाधीन और उन्नत भी। वास्तविकता यही है कि प्रेम दो सामाजिक अस्तित्वों के मिलन का निजी कार्यव्यापार है जिसे करते हुए हम स्वतंत्र ,ताकतवर  और बेहतर होते जाते हैं। यह शमशेर की अपनी ताकत है। संक्षिप्त, कभी रहस्यपूर्ण, कभी आधी-अधूरी पंक्तियों में कवि पूर्ण प्रेम कर रहा होता है। प्रेम को महसूसने और थामने की कोमलता कवि में है। प्रेम के हल्के मीठे दर्द से कवि मन अनजान नहीं। किसी गंभीर वैचारिक तर्कणा व समझ के परे प्रेम अधिक मनुष्य होते जाने की सार्थकता है-
                   'ठंड भी एक मुस्कराहट लिए हुए है
                      जो कि मेरी दोस्त है।
               कबूतरों ने एक ग़ज़ल गुनगुनायी...
                       मैं समझ न सका,रदीफ़-काफ़िये क्या थे,
               इतना खफ़ीफ, इतना हलका, इतना मीठा
                       उनका दर्द था।'       
                                      (टूटी हुई,बिखरी हुई)
          रघुवीर सहाय के मतानुसार 'शमशेर ने व्यक्ति की अपूर्णता की बेचैनी और पूर्ण होने की बेचैनी को एक ही व्यक्ति में समो दिया है। इससे अधिक गहरी, गाढ़ी, अंधेर शांति और हो ही नहीं सकती। साधारण लोग इसी को प्रेम की पीड़ा कहते है। परन्तु यह एक नया इंसान पैदा होने की पीड़ा है।' (टूटी हुई,बिखरी हुई: एक प्रतिक्रिया)
          शमशेर के कवित्व का आलम यह है कि गद्य की अन्य विधाओं, कहानी, डायरी, रेखाचित्र(स्कैच) सभी, में उनकी कविताई की झलक मिलती है। ''मेरी कुछ कवितानुमा कहानियाँ हैं-लेकिन देखने की बात यह है कि अनेक विधाओं में काम करने वाला आदमी मुख्यत: किस विधा में सक्षम है।''(कुछ और गद्य रचनाएँ- शमशेर)। उदाहरणस्वरूप 'एक बिल्कुल पर्सनल एसे', 'सुभद्राकुमारी चौहान: एक अध्ययन', 'एक आधुनिक विदेशी विद्वान का मौलिक काव्य संग्रह', 'कवि कर्म: प्रतिभा और अभिव्यक्ति' जैसे निबंधों, 'प्लाट का मोर्चा', 'तिराहा', 'द क्रीसेन्ट लॉज' कहानियों, स्कैच 'मालिष: जाड़ों की एक सुबह', 'कुल्हाड़ियाँ', 'रात पानी बड़ा बरसा' के साथ डायरी में भी उनकी काव्य कला और चित्रकला को सहज ही देखा जा सकता है। डायरी की प्रस्तुत पंक्तियों में भी यह दृष्टव्य है-'नभ की सीपी जो रात्रि की कालिमा में पड़ी थी, धीरे-धीरे उशा की कोमल लहरों में घुलती और पसरती चली गई।'
          कवि की चेतना ऐंद्रिक रूपों गंध, रूप, स्पर्ष, रस में नए इमेज का निर्माण करती है। नए रचनात्मक अर्थों के साथ शमशेर की काव्य-भाषा एक खास तरह के अनुशासन में गतिशील होती है। शब्दों के द्वारा कवि भावों, अनुभूतियों को सचेत रूप में क्रियेट करते है। कई बार शब्द कविता से अलग थलग भी दिखाई देते है और कविता की अनेकार्थता में वृद्धि करते है। वरिष्ठ कवि कुंवर नारायण शमशेर की कविताओं को एक विशेष अर्थ में 'शब्द रचनाएँ' भी कहते है 'मानो शब्द भाषा के नियमों से बँधे नहीं उसमें खुले से पड़े है।'(शमशेर बहादुर सिंह: इतने पास अपने)
          शमशेर पाठकों और आलोचकों की आलोचना के केन्द्र में भी रहे। उनके काव्य को अस्पष्ट, दुरूह कहा गया तो कभी अत्यधिक शिल्प भार से बोझिल। कभी-कभी कवि और चित्रकार का क्षेत्र भी आपस में उलझता दिखता है या कविता में बढ़ते मूकभाव से पाठक परेशान होता है। इस संदर्भ में कहा जा सकता है कि शमशेर का काव्य भावों, अनुभूतियों, मनोवेगों, संबंधों की यथार्थ अभिव्यक्ति करता है। ये सभी मूलरूप में जटिल मानवीय सच्चाईयाँ है, जिनका सरलीकरण पाठको के लिए सुविधापूर्ण भले हो लेकिन काव्याभिव्यक्ति के सौंदर्य को घटाने वाला होगा। जबरन सरलीकरण की प्रक्रिया हानिकारक भी हो सकती है। दूसरी बात, शमशेर प्रसंग विशेष, परिस्थिति विशेष के अनुसार विशिष्ट इमेज निर्मित करते है जो सामान्य रूढ़िबद्ध, मशीनी पाठकों व आलोचकों से थोड़ी उदारता की भी अपेक्षा रखता है। जड़ समझ और यांत्रिक पठन द्वारा चेतन-अवचेतन के बहुरेखीय पाठ को समझना मुश्किल है। शमशेर का काव्य धीरे-धीरे ही सही पाठक की समझ, सौंदर्यबोध को परम्परागत यांत्रिकता से मुक्त कर सक्रिय बनाता है।
          ऐसा भी होता है कि रचना के दौरान कवि इतना आत्मगत और केंद्रित हो जाता है कि उसके मनस्तत्वों का संप्रेषण समान रूपाकारों में नहीं हो पाता। मुक्तिबोध इसका कारण शमशेर के दोहरे व्यक्तित्व को मानते है-'मेरा ख्याल है कि शमशेर शब्द-संकेत को रंग-संकेत का स्थानापन्न मान बैठते हैं। कवि को चित्रकार का स्थानापन्न बना देने से, और उस स्थापन्न कवि के सम्मुख कार्यक्षेत्र विस्तृत कर देने से, शमशेर की रचनात्मक प्रतिभा ने बहुत बार घोटाला कर दिया है...'
          शमशेर के काव्य में संकोच की झलक भी है। कहते-कहते रुक जाना, बिखरे-बिखरे शब्द समूह, अधूरी पंक्तियाँ, टूटे इमेज बताते है कि कवि का विश्वास अनवरत कहते जाने में नहीं है। यहाँ कवि में सामान्य स्त्रियों का गुण भी दिखता है जो चुप होकर सबसे ज्यादा मुखर होती हैं। 'उनके लिए कहे के बजाय अनकहे में अधिक कविता है।'(अशोक वाजपेयी)    
 ( लेखिका- विजया सिंह,रिसर्च स्कॉलर,हिन्दी विभाग,कलकत्ता वि.वि. कोलकाता )         
 
       
        

गुरुवार, 10 जून 2010

पश्चिम बंगाल में माकपा की पराजय के कारणों की तलाश में

( यह लेख 2004 में दो किश्तों में दैनिक हिन्दुस्तान में छपा था, उस समय मैं माकपा का सदस्य था। माकपा के  अनेक नेता इस लेख पर नाराज हो गए। कुछ बड़े नेताओ ने तो पोलिट ब्यूरो तक लिखित शिकायत की। यह लेख पश्चिम बंगाल में वामपंथ की असफलताओं पर रोशनी ड़ालता है, काश ,उस समय इस लेख पर माकपा के नेताओं ने ध्यान दिया होता तो आज इतनी शर्मनाक पराजय का सामना नहीं करना पड़ता )

            सांस्कृतिक क्षय एक सामाजिक प्रक्रिया है।यह जनतांत्रिक परिवेश और आलोचनात्मक विवेक के अभाव में शुरू होता है। यह तब शुरू होती है जब समाज अपने बारे में आलोचनात्मक ढ़ंग से सोचना बंद कर देता है। समाज के स्पंदन को बौध्दिक जगत महसूस करना बंद कर देता है।सब समय अतीत में जीता है।अतीतबोध में डूबा रहता है। पश्‍चि‍म बंगाल में इन दिनों ऐसा ही घट रहा है।बौद्धिकों,संस्कृतिकर्मियों, लेखकों,समाजविज्ञानियों आदि ने आलोचनात्मक विवेक को राजनीति और अतीतगौरव के मातहत कर दिया है।
        एक जमाने में पश्‍चि‍म बंगाल को देश की सांस्कृतिक मशाल कहा जाता था। किंतु आज सांस्कृतिक क्षय की अवस्था है। संस्कृति को राजनीति ने हड़प लिया है।सब कुछ राजनीतिक है। राजनीति के अलावा सब बेकार है।आज सत्ता ,राजनीति और अतीतबोध का जिस तरह का दबाव सांस्कृतिक प्रक्रियाओं पर है वैसा इतिहास में पहले कभी नहीं देखा गया। कहने के लिए सतह पर सब कुछ सांस्कृतिक नजर आता है। मुख्यमंत्री से लेकर सरकारी बस के ड्राइवर तक सबके गले से साहित्य की प्रशंसा के स्वर सुने जा सकते हैं।किंतु सच्चाई यह है कि विगत पचास वर्षों में बंगला भाषा का क्षय हुआ है।बांग्ला के पठन-पाठन, अध्ययन,अध्यापन, लेखन, साक्षरता आदि में गिरावट आई है। कुछ अर्सा पहले जब पश्‍चि‍म बंगाल सरकार ने बंगला भाषा में सरकारी कामकाज को तरजीह देने का फैसला लिया तो पता चला कि ज्यादातर क्लर्क बांग्‍ला लिखना नहीं जानते। जो चालीस साल के युवा हैं उनमें से अधिकांश को बंगला बोलने,पढ़ने का अभ्यास है किंतु लिखने में मुश्‍कि‍लों का सामना करना पड़ता है।यह बांग्‍ला भाषा के क्षय का संकेत है।
      एक जमाना था जब रैनेसां के दौर में बंगाल के बड़े-बड़े वैज्ञानिक,समाजविज्ञानी आदि अपने विचारों को बांग्‍ला में लिखना पसंद करते थे। कितु आज गिनती के पांच वैज्ञानिक और समाजविज्ञानी नहीं हैं जो बांग्‍ला में अपने को व्यक्त करने की क्षमता रखते हों। बांग्‍ला आज बौध्दिक विमर्ष की भाषा नहीं रह गई है। बंगाल के विश्‍वविद्यालय अजायबघर नजर आते हैं।यह रैनेसां के महाख्यान के अंत की सूचना है। स्थिति की भयावहता को सिर्फ एक तथ्य से समझ सकते हैं कि ईश्‍वरचंद्र विद्यासागर का जिस गांव में जन्म हुआ था वह गांव अभी तक पूर्ण साक्षर नहीं बन पाया है।
      पश्‍चि‍म बंगाल के भूमिसुधार कार्यक्रम के बारे में मिथ बना हुआ है। उसे पश्‍चि‍म बंगाल सरकार अपनी सबसे बेहतरीन उपलब्धि मानती है। किंतु सच्चाई का एक अन्य पहलु भी है। प्रसिद्ध कृषि‍ अर्थशास्त्री और पश्‍चि‍म बंगाल योजना बोर्ड के सदस्य अजित नारायन बसु ने हाल ही में वामपंथी मोर्चे के सदस्य दल आर.एस.पी.के मुखपत्र गणवार्ता में रहस्योद्धाटन किया है कि भूमि सुधार से गांव के गरीबों के सशक्तिकरण में कोई मदद नहीं मिली है।
          बसु के अनुसार पश्‍चि‍म बंगाल के 53. 38 फीसदी ग्रामीण परिवारों के पास कुल कृषि‍ योग्य जमीन में से मात्र 3.29 फीसदी कृषि‍ योग्य जमीन है।यह राष्‍ट्रीय औसत से काफी नीचे है।राष्‍ट्रीय स्तर पर 58. 28 फीसदी परिवारों के पास 5. 97 फीसदी कृषि‍योग्य जमीन है।इसी तरह पश्‍चि‍म बंगाल के 13. 24 फीसदी समृद्ध ग्रामीण परिवारों के पास 58. 56 फीसदी कृषि‍योग्य जमीन है।बसु ने रेखांकित किया है पश्‍चि‍म बंगाल में 1992 और 2001 में कृषि‍ मजदूरों को तयशुदा सरकारी मजूरी की तुलना में क्रमश: 12.3 और 21.5 फीसदी कम न्यूनतम मजूरी मिलती है। सरकार के अनुसार न्यूनतम मजूरी का यह आंकड़ा 7,052 करोड़ रूपये बैठता है। बसु का मानना है मौजूदा परिस्थितियों में वाममोर्चा सरकार यदि चाहे तो कृषि‍योग्य उपलब्ध जमीन में से 143. 69 एकड़ जमीन को 68 लाख किसान परिवारों में बांट सकती है।यदि ऐसा हो जाता है तो इससे समस्त गरीब ग्रामीण परिवारों को गरीबी की रेखा से ऊपर ले जाने में मदद मिलेगी।
         बसु का मानना है वामपंथी दलों के लाख दावों के बावजूद गांव के गरीबों की स्थिति में कोई बुनियादी परिवर्तन नहीं आया है। ज्यादातर वामपंथी दलों के संगठनों में गरीब ग्रामीण मजदूरों की बजाय मध्यवर्गीय किसानों का वर्चस्व है।ये लोग सामाजिक परिवर्तन के पक्ष में नहीं है।बल्कि यथास्थिति बनाए रखना चाहते हैं।
उन्नीसवीं शताब्दी और बीसवीं शताब्दी के छठे और सातवें दशक तक कोलकाता में जब हिन्दीभाषी बहुत में कम मात्रा में रहते थे। तब साहित्य में कोलकाता के हिन्दीभाषी बुध्दिजीवियों का बोलवाला था। कितु इसके बाद से पतनगाथा शुरू हुई है। खासकर नेहरू युग के समापन के साथ कोलकाता के सांस्कृतिक क्षय की प्रक्रिया ने बल पकड़ा है। वामपंथ विभाजित हुआ। अर्द्धफासी दौर और आपातकाल में राजनीति में हिंसाचार पैदा हुआ। नक्सलपंथी, माकपाई,भाकपाई और कांग्रेसियों ने एक -दूसरे पर खूनी हमले किए। सन् 1961-62 से पश्‍चि‍‍म बंगाल में राजनीतिक घृणा और हिंसा का जो माहौल तैयार हुआ उसने आलोचनात्मक परिवेश और स्वस्थ सांस्कृतिक विकास की समस्त संभावनाओं को खत्म कर दिया। यह पश्‍चि‍म बंगाल के सांस्कृतिक पतन का प्रस्थान बिन्दु है। इसके बाद से राजनीतिक वफादारी का तत्व इस कदर हावी हुआ है कि आज राजनीतिक वफादारों का समाज में बोलवाला है।
       पहले राजनीति में प्रतिबद्धता की मांग की जाती थी। बाद में वफादारी की मांग की जाने लगी।राजनीतिक वफादारी का जनतांत्रि‍कबोध से कोई लेना-देना नहीं है। राजनीतिक वफादारी के दौर में राजनीतिक संघर्ष उग्र हुए हैं। राजनीतिक हिंसा में मरनेवालों की तादाद चौंकानेवाली है।सन् 1977 के बाद से विभिन्न दलों के खूनी संघर्षों में तकरीबन पचास हजार से ज्‍यादा लोग मारे जा चुके हैं।इसमें अकेले माकपा के 20हजार से ज्यादा कार्यकर्त्‍ता और समर्थक मारे गए हैं।ये समस्त खूनी लड़ाईयां जनतंत्र की रक्षा के नाम पर लड़ी गईं।
राजनीतिक वफादारी जनतांत्रिक परिवेश को नष्‍ट कर देती है। अन्य के स्वर को कुचल देती है।
बंगाल में कहने को जनतंत्र है।चुनी हुई सरकार है।पंचायती व्यवस्था है।किंतु इस समूची प्रक्रिया का संपादन वफादारी के पैमाने से हो रहा है।जनतांत्रिक मूल्यों के प्रसार से इसमें कम मदद मिली है।आज जनतंत्र पर वफादार भारी पड़ रहे हैं। जनतांत्रिक परिवेश और आलोचनात्मक विवेक की मांग है कि जनतंत्र को वफादारी के दायरे से बाहर निकाला जाए।
          वफादारी, सामंती मूल्य है।इसका जनतंत्र से कोई संबंध नहीं है।बल्कि वैरभाव है।वफादारी में नागरिक के अधिकारों के प्रति घष्णाभाव भरा है।वफादारों का बढ़ता हुआ वर्चस्व नागरिक समाज,नागरिक चेतना और नागरिक परिवेष को नष्‍ट कर रहा है। आज बंगाल में राजनीतिक वफादारी के आधार पर जगह-जगह गुण्डों के गिरोह सक्रिय हैं।इनके किस्से समूचे बंगाल में लोककथा के रूप में जनप्रिय हैं। बड़े पैमाने पर शि‍क्षितों में इस सबको लेकर असंतोष है। दूसरी ओर बंगाली जाति के श्रेष्‍ठत्व और अतीतप्रेम के प्रेतों को जगाया जा रहा है।इससे वैचारिक तौर पर प्रतिगामी परिवेश की सृष्‍टि‍ हो रही है।
           पश्‍चि‍म बंगाल के संदर्भ में सबसे मुख्य विचारणीय सवाल यह भी है कि आखिरकार ऐसा क्या हुआ कि बंगाल से हिन्दी का हरभरा बगीचा गायब हो गया।बंगाल में आधुनिक हिन्दी प्रेस की शुरूआत हुई।देश में सबसे पहले विश्‍वविद्यालय स्तर पर हिन्दी की पढ़ाई शुरू हुई। हिन्दी के मूर्धन्य लेखकों का बंगाल गढ़ था।किंतु आजादी के बाद यह गढ़ ढह गया।इसका प्रधान कारण है हिन्दी के अध्ययन-अध्यापन और अनुसंधान के स्तरीय ढ़ांचे ,शि‍क्षकों और बौध्दिकों का कोलकाता में अभाव। ऐसी स्थिति में कोलकाता का हिन्दी केन्द्र नष्‍ट हो गया।
           उल्लेखनीय है कि आधुनिक काल में शि‍क्षा सबसे बड़ा क्षेत्र है जिसके जरिए नए बौद्धिक केन्द्र की परंपरा जन्म लेती है। हिन्दी के स्तरहीन पठन-पाठन के कारण महानगर होने के बावजूद कोलकाता को हिन्दी के केन्द्र के रूप में बचाकर नहीं रखा जा सका।जिन लोगों ने आधुनिक काल के आरंभ में हिन्दी के विकास में कोलकाता को अपना कर्म क्षेत्र बनाया था उनमें से ज्यादातर लेखक-पत्रकार गैर-हिन्दीभाषी थे। जो हिन्दी लेखक कोलकाता से अपना संबंध जोड़ रहे थे वे कोलकाता के नहीं थे।उनका कोलकाता के हिन्दी के शैक्षणिक माहौल से कोई लेना-देना नहीं था।
       आधुनिक काल में जिन राज्यों में हिन्दी के स्तरीय अध्ययन-अध्यापन की व्यवस्था थी, वे ही षहर हिन्दी के केन्द्र के रूप में उभर कर सामने आए। उन सब स्थानों पर हिन्दी के बुद्धिजीवियों की परंपरा का निर्माण हुआ। कोलकाता में व्यापक पुस्तकालय नेटवर्क होने के बावजूद हिन्दी साहित्य के विकास में कोलकाता विश्‍वविद्यालय से एक भी उल्लेखनीय रिसर्च का सामने न आना,इस तथ्य का संकेत है कि कलकत्ता विश्‍वविद्यालय का हिन्दी के उत्थान में प्रचारात्मक अवदान जरूर है।शोधपरक अवदान नहीं रहा। इसके विपरीत अन्य वि‍षयों के विभागों में ऐसी स्थिति नहीं रही है। विज्ञान,समाजविज्ञान,बंगला साहित्य, भाषाविज्ञान आदि के क्षेत्र में कलकत्ता विश्‍वविद्यालय अग्रणी है।
      कोलकाता के हिन्दीभाषि‍यों के पास पूंजी है। किंतु संस्कृति नहीं है।मेहनत-मजदूरी करके जीने का हुनर है।किंतु पहचान नहीं है।आज कोलकाता में हिन्दीभाषी बहुसंख्यक हैं,बंगाली अल्पसंख्यक हैं।किंतु हिन्दीभाषि‍यों की राजनीतिक पहचान और आवाज कहीं पर भी सुनाई नहीं देती।मजदूर संगठनों में ज्यादातर श्रमिक हिन्दीभाषी हैं किंतु नेतृत्‍व बंगालियों के पास है। उद्योगों में पूंजी हिन्दीभाषी पूंजीपतियों की लगी है,किंतु राजनीतिक वर्चस्व बंगालियों का है।हिन्दीभाषी पूंजी और समाज का जिस तरह का व्यक्तित्वहीन स्वरूप कोलकाता में उभरकर आया है। वैसा अन्यत्र दिखाई नहीं देता।
     बंगाल में सबसे पहले हिन्दी भागी।बाद में हिन्दीभाषी लोगों की पूंजी भागी। बंगाल में हिन्दी की संस्कृति पहले आई।हिन्दीभाषी लोगों की पूंजी बाद में आई।आजादी के बाद तेजी से परिदृश्‍य बदला और हिन्दी के केन्द्र के रूप में कोलकाता खत्म हुआ।बाद में हिन्दीभाषी उद्योगपतियों ने अपने कारोबार को समेटना शुरू किया।आज कोई नया प्रकल्प हिन्दीभाषी पूंजीपति बंगाल में लगाना नहीं चाहता।
     अघोषि‍त तौर पर बंगाल में भूमिपुत्रों का बोलवाला है।'अन्य' की आवाज को कोई भी तवज्जह नहीं देता।अंदर ही अंदर हिन्दीभाषि‍यों के प्रति घृष्णा का प्रचार चल रहा है।इसकी अनुगूंज कभी किसी बड़े नेता के भाषण में सुनाई देती है तो कभी बंगाली अखबारों में बंगाल के रैनेसांपंथी लेखकों में दिखाई देती है।ये लोग हिन्दीभाषि‍यों के बारे में तकरीबन उसी भाषा में बोलते हैं जिस भाषा में मुंबई में शि‍वसेना वाले बोलते हैं।
रैनेसांपंथी बुध्दिजीवियों के हिन्दीविरोधी जहर से भरे लेख आए दिन बंगला के दैनिक अखबारों में प्रकाशि‍त होते रहते हैं।इन लेखों में हिन्दी साम्राज्यवाद का रोना रहता है।एक जमाना था जब हिन्दी के उत्थान के लिए बंगला के बुध्दिजीवी आगे आए थे।किंतु आज बंगला के चर्चित लेखकों,संस्कृतिकर्मियों में एक अच्छा खासा तबका पैदा हो गया है जो हिन्दी विरोधी उन्माद से ग्रस्‍त है।
    लेनिन की प्रसिध्द उक्ति है कि अगर किसी समाज विकास के स्तर को देखना हो तो उस समाज में स्त्रियों की कैसी अवस्था है ?इसे देखना चाहिए।स्त्रियों की सामाजिक-सांस्कृतिक दशा के आधार पर पश्‍चि‍म बंगाल को सारे देश के संदर्भ में रखकर देखें तो बड़ी भयानक तस्वीर उभरकर सामने आती है।इसके आधारभूत विश्‍लेषण के लिए 'नेशनल फेमिली हेल्थ सर्वे -2' के आंकड़ों पर गौर कर लेना समीचीन होगा।ये आंकड़े पश्‍चि‍म बंगाल के बारे में प्रचलित बहुत सारे मिथों को खंडित करते हैं।खासकर महिला सशक्तिकरण के समस्त दावों का खण्डन करते हैं।
      पश्‍चि‍म बंगाल में राजनीतिक चेतना का स्तर अन्य राज्यों की तुलना में काफी ऊँचा है।वामपंथी आंदोलन काफी मजबूत है।महिला आंदोलन सबसे ताकतवर है। इसके बावजूद महिला सशक्तिकरण के संदर्भ में देश के अन्य राज्यों से काफी पीछे है।'नेशनल फेमिली हेल्थ सर्वे-2' के अनुसार महिला सशक्तिकरण के पैमाने के लिहाज से पश्‍चि‍म बंगाल सबसे नीचे के राज्यों में आता है।
       मसलन् जब महिलाओं से उनकी व्यक्तिगत स्वास्थ्य देखभाल के बारे में सवाल किया गया तो पाया कि बंगाल में मात्र 16.7 फीसदी महिलाएं ही अपने स्वास्थ्य की देखभाल के बारे में निजी तौर पर निर्णय ले पाती हैं। बंगाल के नीचे सिर्फ राजस्थान,उडीसा और नागालैण्ड का स्थान है।बाकी राज्यों का बंगाल के ऊपर स्थान है।जब यह सवाल पूछा गया कि महिलाएं अपने स्वास्थ्य की देखभाल के बारे में पति या किसी अन्य के साथ मिलकर निर्णय लेती है।इस संदर्भ में भी बंगाल की महिलाएं काफी पीछे हैं।ज्वेलरी वगैरह खरीदने का फैसला महिलाएं निजी तौर पर कितनी फीसदी संख्या में लेती हैं तो इसके जबाव में पता चला कि निजी तौर पर मात्र 15.9 फीसदी महिलाएं गहने वगैरह खरीदने का फैसला लेती हैं। जबकि निजी तौर पर गहने वगैरह खरीदने का फैसला लेने के मामले में बंगाल से आगे त्रिपुरा,केरल,गोवा और तमिलनाडु हैं। इसी तरह अपनी कमाई को खर्च करने के मामले में बंगाल की औरतों की स्थिति सारे देश में काफी नीचे है। मात्र 51.7फीसदी महिलाएं ही अपनी कमाई को अपनी इच्छा से खर्च कर पाती हैं। जबकि बंगाल से ऊपर देश के आठ राज्य आते हैं।ये हैं-दिल्ली, हरियाणा,हिमाचल प्रदेष,जम्मू-कष्मीर,पंजाब, मणिपुर,सिक्किम, गोवा ।इनके अलावा बाकी राज्य बंगाल से पीछे हैं।
        महिला सशक्तिकरण के संदर्भ में जब महिलाओं से यह सवाल पूछा गया कि क्या उन्हें बाजार जाने के लिए किसी से अनुमति लेनी होती है ? इस सवाल के जबाव में पता चला कि मात्र 17.8 फीसदी महिलाओं ने कहा कि उन्हें बाजार जाने के लिए किसी से अनुमति नहीं लेनी होती। जबकि इस मामले में बंगाल से ऊपर 21 राज्य हैं। पश्‍चि‍म बंगाल की मात्र 14.1 फीसदी महिलाओं ने कहा कि उन्हें अपनी मित्र या नाते-रिश्‍तेदार के यहां जाने लिए किसी से अनुमति नहीं लेनी होती। इस सवाल के संदर्भ में पष्चिम बंगाल से ऊपर बीस राज्य हैं। इन दोंनों सवालों पर सिर्फ जम्मू-कष्मीर और उत्तर प्रदेश का स्थान बंगाल के बाद है।यानी देश में नीचे से तीसरा। आने-जाने की सीमित स्वतंत्रता के सवाल पर तमिलनाडु ,गोवा,मिजोरम और गुजरात का सबसे ऊपर स्थान है। इन राज्यों में आधे से ज्यादा औरतों को आने-जाने के मामले में किसी से अनुमति नहीं लेनी होती। जबकि आने-जाने के मामले में सबसे खराब स्थिति जम्मू-कश्‍मीर, असम, उत्तरप्रदेश,नागालैण्ड,पश्‍चि‍म बंगाल, उडीसा, राजस्थान,और आंध्र की है। इन राज्यों में बीस फीसदी अथवा इससे भी कम संख्या में औरतों को आने-जाने के लिए अनुमति नहीं लेनी होती है।
           सर्वे में बताया गया है कि ज्यादातर औरतें लिंगीय भेदभाव को मानती हैं।साथ ही पुरूष की तुलना में स्त्री को दोयमदर्जे का नागरिक मानती हैं।वे यह भी मानती हैं कि पुरूष को ही औरत की जिन्दगी को नियमित करने,उसके व्यवहार को सुनिश्‍चि‍त करने का हक है।इसके लिए यदि वह ताकत का इस्तेमाल करे,पत्नी को मारे तो भी जायज है। मसलन् पति अपनी पत्नी के चरित्र के बारे में संदेह करे।उस पर अविश्‍वास करे। पत्नी के घर वाले इच्छित माल या गहना या अन्य वस्तु दहेज में न दे पाएं। यदि पत्नी अपने सास-ससुर के प्रति अश्रध्दा दिखाए।वगैर बताए घर के बाहर जाए।यदि वह बच्चों या घर की उपेक्षा करे।यदि वह सही ढ़ंग से खाना न पकाए इत्यादि कारणों से अथवा इनमें से किसी एक कारण से यदि पति अपनी पत्नी को मारता है तो औरतें उसे वैध मानती हैं।
            पूरे देश में 15से 49 साल की शादीशुदा औरतों में 57 फीसदी पति द्वारा पत्नी की उपरोक्त कारणों में से किसी एक कारण से पिटाई को जायज मानती हैं। विभिन्न राज्यों में इसका अनुपात अलग-अलग है। मसलन् 20 से 25 फीसदी के बीच में जो राज्य आते हैं वे हैं-दिल्ली,पंजाब, पश्‍चि‍म बंगाल और हिमाचल प्रदेश।
जबकि पति द्वारा पत्नी की पिटाई को जायज ठहराने वाली 70 फीसदी औरतों वाले नौ राज्य हैं इनमें आंध्र,तमिलनाडु और महाराष्‍ट्र शामिल हैं। लिंगीय भेदभाव का सबसे अच्छा उदाहरण है शि‍क्षा।छह साल और उससे ऊपर के लड़के-लड़कियों को साक्षर बनाने के मामले में 'नेशनल फेमिली हेल्थ सर्वे-2' के आंकड़े बताते हैं कि पश्‍चि‍म बंगाल में मात्र 57.5 फीसदी लड़कियों को साक्षर बनाया जा सका है।जबकि इस उम्र की लड़कियों को साक्षर बनाने के मामले में पश्‍चि‍म बंगाल से काफी ऊपर दिल्ली, हिमाचलप्रदेश,पंजाब, असम,मणि‍पुर, मेघालय,मिजोरम, नागालैण्ड, सिक्किम, त्रिपुरा, गोवा,महाराष्‍ट्र, तमिलनाडु और केरल हैं। यानी पश्‍चि‍म बंगाल का देश में सोलहवां स्थान है।
         पश्‍चि‍म बंगाल से नीचे सिर्फ राजस्थान,मध्यप्रदेश,उत्तर प्रदेश,बिहार, उडीसा, अरुणाचल प्रदेश,गुजरात,आंध्र और कर्नाटक का स्थान है। इसी तरह बीस वर्ष और उससे ज्यादा उम्र की कम से कम हाईस्कूल पास लड़कियों की पश्‍चि‍म बंगाल में संख्या मात्र 12 फीसदी है। जबकि पश्‍चि‍म बंगाल से इस वर्ग में 18 राज्य ऊपर हैं। ये हैं-दिल्ली,हरियाणा, हिमाचल प्रदेश,जम्मू- कश्‍मीर, पंजाब, असम,मणिपुर, मेघालय, मिजोरम,  नागालैण्ड, सिक्किम,त्रिपुरा,गोवा, गुजरात, महाराष्‍ट्र, कर्नाटक,तमिलनाडु और केरल। जबकि पश्‍चि‍म बंगाल से जो राज्य नीचे हैं वे हैं-राजस्थान,मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार,उडीसा, और अरुणाचल प्रदेश।
       भारत में ज्यादातर औरतें निरक्षर हैं अथवा उनके पास सीमित षिक्षा है।ऐसी स्थिति में जनमाध्यम जैसे अनौपचारिक रूपों की भूमिका बढ़ जाती है। जनमाध्यमों के द्वारा औरतें बाह्य जगत को देख पाती हैं। बाह्य जगत के बारे में उनकी जानकारी में इजाफा होता है।यह सच है कि जनमाध्यमों का मूलत: मनोरंजन माध्यम के रूप में इस्तेमाल होता है। किंतु यह भी सच है कि जनमाध्यमों का शैक्षणिक मूल्य भी है।इस दृष्‍टि‍ से जनमाध्यमों को देखने, सुनने के स्तर को देखकर भी महिला सशक्तिकरण की दशा का अंदाजा लगाया जा सकता है।
       सप्ताह में कम से कम एकबार जिन औरतों को टेलीविजन देखने का मौका मिलता है ऐसी औरतों की पश्‍चि‍म बंगाल में संख्या 40.8 फीसदी है।जबकि सप्ताह में कम से कम एकबार रेडियो सुनने वाली औरतों की संख्या 41.6 फीसदी है। सप्ताह में कम से कम एकबार सिनेमाूहाल में जाकर फिल्म देखनेवाली औरतों की संख्या मात्र 9.7 फीसदी है। उल्लेखनीय है कि प्रथम 'नेशनल फेमिली हेल्थ सर्वे' के समय सिनेमाहॉल में जाकर फिल्म देखने वाली औरतों की संख्या 16 फीसदी थी। यानी इसमें सात फीसदी की गिरावट आई है।
उसी तरह रेडियो सुनने वालों की संख्या 48.3 फीसदी थी। यानी इसमें भी सात फीसदी की गिरावट आई है। वहीं      
       दूसरी ओर टीवी देखनेवाली औरतों की संख्या में पहले सर्वे की तुलना में सात फीसदी की वृद्धि‍ हुई है।अन्य राज्यों की तुलना में इस मामले में भी पश्‍चि‍म बंगाल काफी पीछे है।
         दूसरे सर्वे में औरतों के साप्ताहिक टेलीविजन देखने के मामले में 19 राज्य पश्‍चि‍म बंगाल से आगे हैं।ये हैं-दिल्ली,हरियाणा,हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्‍मीर, पंजाब, मध्यप्रदेश, अरुणाचल प्रदेश,मणिपुर ,मिजोरम, नागालैण्ड, सिक्किम,त्रिपुरा,गोवा,गुजरात,महाराष्‍ट्र,आंध्र,कर्नाटक,केरल और तमिलनाडु। जबकि पश्‍चि‍म बंगाल से जो राज्य पीछे हैं वे हैं-राजस्थान, उत्तर प्रदेश,बिहार,उडीसा,असम,मेघालय।
        इसी तरह रेडियो सुनने के मामले में दिल्ली,हिमाचल प्रदेश,जम्मू-कश्‍मीर,मणिपुर,मिजोरम,सिक्किम, गोवा, कर्नाटक,केरल और तमिलनाडु का स्थान पश्‍चि‍म बंगाल से ऊपर है।बाकी राज्य पश्‍चि‍म बंगाल से नीचे हैं।
           इसी तरह सप्ताह में कम से कम एकबार सिनेमा हॉल में जाकर फिल्म देखने वाली औरतों की तादाद के मामले में पश्‍चि‍म बंगाल से आठ राज्य ऊपर हैं।ये हैं-दिल्ली,अरुणाचल प्रदेश,मणिपुर, सिक्किम,आंध्र, कर्नाटक,केरल और तमिलनाडु। बाकी राज्यों का स्थान पश्‍चि‍म बंगाल से नीचे है।
         पश्‍चि‍म बंगाल में 60.8 फीसदी औरतें कम से कम एक जनमाध्यम के संपर्क में जरूर हैं।जबकि इस संदर्भ में 18 राज्य पष्चिम बंगाल से ऊपर हैं। यानी सारे देश में पश्‍चि‍म बंगाल का इस मामले में 19वां स्थान है।
महिला सशक्तिकरण में आर्थिक आत्मनिर्भरता का प्रमुख स्थान है।नौकरी करके महिलाओं को आत्मनिर्भरता का अहसास जल्दी होता है। पश्‍चि‍म बंगाल में नौकरी के क्षेत्र में महिलाओं की संख्या 28.5 फीसदी है।जबकि इससे ज्यादा तादाद में औरतें जम्मू-कष्मीर,राजस्थान,मध्यप्रदेश,उडीसा,अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर,मेघालय, मिजोरम, नागालैण्ड, गोवा, गुजरात, महाराष्‍ट्र,आंध्र,कर्नाटक और तमिलनाडु में नौकरी करती हैं।बाकी राज्यों में पश्‍चि‍म बंगाल से कम तादाद में औरतें नौकरी करती हैं। पेशेवर ,तकनीकी अथवा प्रबंधकीय नौकरियों मे पश्‍चि‍म बंगाल में मात्र 1.5 फीसदी औरतें नौकरी में हैं। पष्चिम बंगाल से ऊपर 21 राज्यों का स्थान है।
पश्‍चि‍म बंगाल में महिलाओं पर अत्याचार की घटनाओं में तेजी से इजाफा हुआ है। पश्‍चि‍म बंगाल में ऐसी औरतों की संख्या बहुत कम है जो 15से लेकर 49 साल की आयु के बीच कभी न कभी एकाधिक बार अपने पति से पिटी न हो। इस मामले में 11राज्यों से पश्‍चि‍म बंगाल आगे है। पश्‍चि‍म बंगाल में 15 वर्ष की आयु से लेकर 49 वर्ष तक की हिंसाचार की शि‍कार शादीसुदा महिलाओं की संख्या 17.6 फीसदी थी।जबकि दिल्ली,हरियाणा,हिमाचल प्रदेश,पंजाब,राजस्थान,असम सिक्किम,त्रिपुरा,गुजरात,और केरल में पश्‍चि‍म बंगाल से कम औरतें हिंसाचार की शि‍कार हुई हैं। बाकी राज्यों में पश्‍चि‍म बंगाल से ज्यादा औरतें हिंसाचार की शि‍कार होती रही हैं।
विगत एक वर्ष (2004) में पश्‍चि‍म बंगाल में 8.7 फीसदी औरतें हिंसा की शि‍कार हुईं। जबकि तेरह राज्यों का आंकड़ा बंगाल से नीचे है। पश्‍चि‍म बंगाल से कम हिंसा जिन राज्यों में दर्ज की गई वे हैं- दिल्ली,हरियाणा,हिमाचल प्रदेष,पंजाब,राजस्थान, असम, मणिपुर,सिक्किम, त्रिपुरा,गोवा,गुजरात,महाराष्‍ट्र और केरल। हाल ही में जिन औरतों की शादी हुई है,उनके प्रति हिंसाचार के मामले में पश्‍चि‍म बंगाल का रिकॉर्ड काफी खराब है।हाल ही में संपन्न शादीशुदा औरतों के प्रति हिंसाचार की शि‍कार औरतों की पश्‍चि‍म बंगाल में तादाद 15.2 फीसदी है।इस मामले में भी पष्चिम बंगाल से कम हिंसा दिल्ली,हरियाणा,हिमाचल प्रदेश, जम्मू- कश्‍मीर,पंजाब,राजस्थान,असम,मणिपुर,मेघालय, मिजोरम, नागालैण्ड,सिक्किम,त्रिपुरा,गोवा,गुजरात और केरल में दर्ज की गई है। बाकी राज्यों में पश्‍चि‍म बंगाल से ज्यादा तादाद में औरतों को शादी के तत्काल बाद ही हिंसाचार का शि‍कार होना पड़ा है।
'नेशनल फेमिली हेल्थ सर्वे -2' के अनुसार महिला सशक्तिकरण के जो मानक तय किए गए हैं उनमें पहला मानक था-परिवार के कामकाज में औरतों की फैसलों में शि‍रकत,बाजार आदि स्वतंत्र रूप से जाने की आजादी,पति द्वारा पत्नी को किसी न किसी कारण मारने के कम से कम एक कारण के आधार पर हिंसाचार का समर्थन,लड़का या लड़की को शि‍क्षा में तरजीह दिए जाने का सवाल,जनमाध्यम देखने,सुनने आदि का समय,इन सभी मानकों के आधार पर पश्‍चि‍म बंगाल का देश में 16वां स्थान है।
दूसरा मानक था-छह साल एवं उससे ज्यादा उम्र की महिलाओं में साक्षरता की दर,नियमित टेलीविजन देखने,रेडियो सुनने,फिल्म देखने आदि की दर,महिलाओं में नौकरी की दर। इस मानक के आधार पर पश्‍चि‍म बंगाल का सारे देश में बीसवां स्थान है। महिला सशक्तिकरण तीसरा मानक है-शादी की उम्र,महिला एकल परिवार,संयुक्त परिवार में रहती है,पति-पत्नी की उम्र में कितना अंतर है,शि‍क्षा और उम्र में समानता है या अंतर है इत्यादि। इन मानकों के आधार पर पश्‍चि‍म बंगाल का समूचे देश में सोलहवां स्थान है । समग्रता में महिला सशक्तिकरण के मानकों के आधार पर देश में पश्‍चि‍म बंगाल अठारहवें स्थान पर आता है।
महिलाओं के सशक्तिकरण के मामले में ही पष्चिम बंगाल पिछड़ा हुआ नहीं है अपितु शि‍क्षा और स्वास्थ्य के सामान्य स्तर,सुविधाओं आदि के मामले में भी बहुत पिछड़ा हुआ है।सर्जनात्मक साहित्य के क्षेत्र में हिन्दी,मराठी,तेलुगू आदि का सामयिक साहित्य जिन ऊँचाईयों पर है उसकी तुलना में बंगला साहित्य काफी पीछे है।
इन दिनों बंगला में श्रेष्‍ठ साहित्य नहीं लिखा जा रहा।औसत दर्जे का साहित्य लिखा जा रहा है।बंगला में अन्य भाषाओं का अनुवाद साहित्य बहुत कम मात्रा में आ रहा है।इसका प्रधान कारण है बंगाली लेखकों और प्रकाशकों की यह मान्यता कि बंगला का साहित्य तो सबसे विकसित साहित्य है,उसे अन्य भाषा के साहित्य को जानने की जरूरत नहीं है।
बंगला का सिनेमा उद्योग आज सबसे बुरी अवस्था में है।इक्का-दुक्का बंगला फिल्मों के अलावा बंगला में अच्छी फिल्में नहीं बन रहीं।ज्यादातर सिनेमाघरों में हिन्दी फिल्में चलती हैं।बंगला चैनलों में पुरानी बंगला फिल्में दिखाई जा रही हैं।शायद ही कभी कोई नई बंगला फिल्म चैनलों में दिखाई गई हो।
      कहने का तात्पर्य यह है कि बंगला का जो महाख्यान रैनेसां ने रचा था वह खत्म हो चुका है।सांस्कृतिक श्रेश्ठत्व के गौरवपूर्ण अतीत का जो महाख्यान औद्योगिक क्राति के कंधों पर सवार होकर आया था।वह निरूद्योगीकरण के कंधों पर सवार होकर विदा हो चुका है।

मंगलवार, 1 जून 2010

फासीवाद पर विजय के 65 वर्ष- अरूण माहेश्वरी

    "मैंने द्वितीय विश्वयुद्ध में लड़ाई नहीं की थी। मैं महान देशभक्ति का युद्ध लड़ा था। सारी दुनिया जिंदा है सोवियत संघ की बदौलत।ये शब्द थे उस बूढ़े रूसी कर्नल के जो 9 मई 1995 के दिन लेनिन मुसोलियम के पिछवाड़े में स्तालिन की मूर्ति के आधार पर फूल चढ़ाने आये अनगिनत लोगों में एक  था। गार्जियनपत्रिका में जोनाथन स्टील ने अपने एक लेख सोवियत संघ के लुप्त गौरव का स्मरण करते हुए रूस के वयोवृद्ध लोगमें इसका उल्लेख  किया था।
गोर्बाचोव के पेरोस्त्राइका और येलत्सिन के सुधार के बारे में इसी कर्नल की राय थी कि साम्राज्यवादी 1941 में सोवियत संघ को खत्म करना चाहते थे। वे नहीं कर सके। बाद में उन्होंने हमारे नेताओं से ही वह काम करा लेने का रास्ता पा लिया।

65 साल पहले फासीवाद की पराजय सचमुच सभ्यता की एक भारी जीत थी; बर्बरता के अब तक के सबसे जघन्य हमले के खिलाफ मनुष्यता की जीत थी। सामूहिक हिंसा के खिलाफ सामूहिक प्रतिरोध और नागरिक अधिकारों, व्यक्ति के अधिकारों तथा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमले के खिलाफ सभ्य समाज, व्यक्ति की अस्मिता और स्वातंत्र्य की भी जीत थी। यह शुद्ध स्वार्थों पर टिके पूंजीवाद, उपनिवेशवाद और साम्राज्यवादी विस्तारवाद के खिलाफ समता पर आधारित समाजवाद और राष्ट्रों की आजादी, जनतंत्र और सार्वभौमिकता की जीत थी।

8 मई 1945 की आधी रात को 1418 दिनों तक चले अब तक के इतिहास के इस सबसे विध्वंसक और जनसंहारक युद्ध के अपराधों के बाद जब पराजित नाजी फौज के प्रतिनिधियों ने बर्लिन शहर के निकटवर्ती कस्बे करिहस्र्ट में सोवियत सेना और ब्रिटेन, अमेरिका तथा फ्रांस की मित्र शक्तियों के प्रतिनिधियों के सामने बिनाशर्त पूर्ण आत्मसमर्पण किया, तब तक इस युद्ध में 5 करोड़ के करीब लोगों की जानें जा चुकी थी। अकेले सोवियत संघ के 2 करोड़ 70 लोग मारे गये थे जो उसकी आबादी का 13.5 प्रतिशत हिस्सा था। दुनिया के 1700 शहरों और कस्बों को नाजी सेना ने धूल में मिला दिया था। कई ऐतिहासिक और सांस्कृतिक स्थलों का नामोनिशान मिट चुका था।

युद्ध के इस इतिहास से जुड़े और भी कुछ ऐसे निंदनीय पहलू है जिन पर आज भी ध्यान दिया जाना चाहिए। ब्रिटेन के विदेश मंत्रालय के गुप्त कागजातों को आम लोगों के लिये उपलब्ध कराये जाने की कार्रवाई की रिपोर्ट पेश करते हुए 1 जनवरी 1970 का गार्जियनलिखता है,  आज सुबह ही 1939 के जिन कैबिनेट पेपर्स को प्रकाशित किया गया उनसे पता चलता है कि द्वितीय विश्व युद्ध जिस साल शुरू हुआ, उस साल शुरू ही न होता यदि ब्रिटेन की चैंबरलीन सरकार ने रूस की सलाह को मान लिया होता या उसे समझा होता कि ब्रिटेन, फ्रांस और सोवियत संघ के बीच संधि युद्ध को रोक देगी, क्योंकि हिटलर इन ताकतों के खिलाफ दो मोर्चों पर टकराने का जोखिम नहीं उठायेगा।
अमेरिकी सिनेटर हैरी ट्रुमैन ने, जो बाद में अमेरिका के उपराष्ट्रपति और राष्ट्रपति दोनों बनें, सोवियत संघ पर हिटलर के हमले के दूसरे दिन ही कहा यदि हम देखते हैं कि जर्मनी जीत रहा है तो हमें रूसियों की मदद करनी चाहिए और यदि रूस जीतता है तो हमें जर्मनों की सहायता करनी चाहिए और इस प्रकार वे एक दूसरे को जितना मार सके, मारने देना चाहिए। (द न्यूयार्क टाइम्स, 24 जून, 1941)
कहना न होगा कि दूसरे विश्वयुद्ध का इतिहास समाजवादी सोवियत संघ के खिलाफ कथित मित्र शक्तियों के षड़यंत्रों और विश्वासघात की ऐसी न जाने कितनी कथाओंअंतरकथाओं से अटा हुआ है। इस युद्ध की समाप्ति के 65 वर्ष बाद आज भी उसके इतिहास को विकृत करके सारी दुनिया को बचाने वाले पहले समाजवादी राज्य की अकल्पनीय कुर्बानियों के खिलाफ कुत्सा का उनका अभियान थमा नहीं है। इतिहास गवाह है कि सोवियत संध ने फासीवाद के उदय के काल से ही हर चरण में उसे मानवता का शत्रु माना और उसके खिलाफ दुनिया की सभी जनतंत्र और शांतिप्रिय ताकतों के संयुक्त प्रतिरोध को तैयार करने की पेशकश की थी। कम्युनिस्ट इंटरनेशनल के नेता ज्यार्जी दिमित्रोव 1935 में इस निष्कर्ष पर पहुंच गये थे कि फासीवाद सारी दुनिया में मजदूर वर्ग का प्रमुख शत्रु है और उसी समय उन्होंने फासीवादियोंनाजीवादियों से मुकाबले के लिये व्यापक आधार वाले संयुक्त मोर्चा की कार्यनीति को अपनाने का आान किया था। तभी से सोवियत संघ सहित सारी दुनिया का कम्युनिस्ट आंदोलन इसी घोषित नीति पर चल रहा था। लेकिन रूस में 1917 की समाजवादी क्रांति के बाद, 1918 से 1920 तक जो फ्रांस और ब्रिटेन इस नवजात समाजवादी राष्ट्र को घेर कर सैनिक कार्रवाई के जरिये उसे मिटा देने पर तुले हुए थे, वे ही हिटलर के उदय को समाजवाद के खिलाफ अपने एक कारगर हथियार के रूप में देख रहे थे और सोवियत संघ के संयुक्त प्रतिरोध के किसी भी प्रस्ताव को स्वीकारने के लिये तैयार नहीं थे। इतिहास में इस सचाई के सारे प्रमाण भरे हुए हैं। 
इसके बावजूद, पश्चिम की यही पूंजीवादी ताकतें तमाम संदर्भों से काट कर 1939 में सोवियत संघ और जर्मनी के बीच की अनाक्रमण संधि के हवाले से इतिहास को विकृत करते हुए यह कहने से कभी नहीं चूकती कि सोवियत संघ ने इस युद्ध के प्रारंभ में हिटलर के सहयोगी की भूमिका अदा की थी। हिटलर ने सोवियत संघ को अपने हमले का निशाना बनाया इसके लिये भी वे यह कहते हुए सोवियत संघ को ही जिम्मेदार बताते हैं कि युद्ध के प्रारंभिक (1939–1941) वर्षों में उसकी निष्पक्षताकी भूमिका ने युरोपविजयी जर्मनी को रूस की ओर रुख करने के लिये प्रेरित किया था। विश्व युद्ध के अनेक इतिहासकारों ने पूंजीवादी शिविर के इस झूठे प्रचार का बारबार जवाब दिया है, लेकिन आज भी कम्युनिज्म के भूत से आक्रांत साम्राज्यवादियों के प्रचारक अपनी इस टेक को छोड़ने के लिये तैयार नहीं है।
बहरहाल, सचाई यह है कि सोवियत संघ ने शांति को कायम रखने का प्रयास किया, युरोप में सभी फासीवादविरोधी ताकतों को एकजुट करने की हर संभव कोशिश की और फासीवाद को रोकने की जरूरत को लेकर एकएक राष्ट्र का दरवाजा खटखटाया, लेकिन पूंजीवादी देशो के नेताओं के कानों पर जू तक नहीं रेंगी। फासीवाद के खिलाफ दुनिया की सभी ताकतों के संयुक्त मोर्चे के निर्माण की सोवियत संघ की पेशकश को ठुकराते हुए पश्चिम की ताकतों की हरचंद कोशिश इस बात की थी कि कैसे भी क्यों न हो, हिटलर के उत्कट कम्युनिज्मविरोध को और भड़काते हुए उसकी सेना को सोवियत संघ के खिलाफ उतार दिया जाए।
हिटलर ने युद्ध की शुरूआत पोलैंड पर हमले से की थी और ब्रिटेन, फ्रांस सभी इसी ताक में बैठे रहे कि कब और कैसे हिटलर के दरिंदे रूस पर टूट पड़ते हैं। पोलैंड के बाद नोर्वे, हालैंड बेल्जियम, फ्रांस, डेनमार्क एकएक कर हिटलर के हमलों के सामने किसी ताश के घर की तरह चंद दिनों में ही ढह गये। बिना किसी प्रतिरोध के इन पूंजीवादी देशों की सेनाओं ने हथियार डाल दिये, हिटलर के टैंकों की गड़गड़ाहट और लड़ाकू विमानों के शोर भर से इन देशों की सेनाओं के हौसले पस्त होते देखे गये। हिटलर ने पूरे युरोप को रौंद कर, उसके तमाम सैनिक और तकनीकी संसाधनों को हथिया कर 1941 के जून महीने में सोवियत संघ को मटियामेट करने का अभियान शुरू किया था। पश्चिम के पूंजीवादी देशों के सभी नेता यह मान कर बैठे हुए थे कि जैसे हिटलर ने पलक झपकते अपने रास्ते में पड़ने वाले बाकी राष्ट्रों को रौंद डाला, उसी प्रकार सोवियत संघ पर भी उसकी सेना के सिफ‍र् कूच भर करने की देरी है, समाजवादी रूस उसके चरणो पर लोटता नजर आयेगा। हिटलर के इस भयंकर विध्वंसक अभियान के प्रति अपने आतंक के बावजूद, उन्हें इस समूचे घटनाचक्र में समाजवाद को नेस्तनाबूद कर देने के अपने वर्षों के सपने के पूरे होने की उम्मीद भी दिखाई दे रही थी, और इसी बात से वे काफी खुश भी थे, जैसा कि अमेरिकी सिनेटर ट्रुमैन के उपरोक्त कथन से जाहिर है। लेकिन रूस में हिटलर के प्रवेश के थोड़े दिनों के अंदर ही यह बात साफ होगयी कि पूंजीवादी देशों की लुजपुंज सेनाओं से मुकाबले के आदी हिटलर का अब एक बिल्कुल अलग प्रकार के, सर्वहारा राज्य के समाजवादी आदर्शों से अनुप्राणित सैनिकों और आम मेहनतकशों से बनी सेना से मुकाबला है। दुनिया में युद्धों के अब तक के इतिहास में ऐसी शायद ही दूसरी कोई नजीर मिलेगी, जिसमें लेनिनग्राद की तरह एक शहर को 900 दिनों तक घेरेबंदी में रखने, सर्दी, भूख और बमबाजी के लगातार प्रहारों बावजूद वहां के निवासियों ने हार नहीं मानी। नाजी सेना स्तालिनग्राद में घुस चुकी थी, उसके एक हिस्से पर कब्जा भी कर लिया था, इसके बावजूद सोवियत सेना ने न सिफ‍र् उसका डट कर मुकाबला ही किया, बल्कि इतिहास के इस सबसे बड़े युद्ध में उन्हें पराजित करके ठेठ बर्लिन तक धकेल दिया। स्तालिनग्राद के युद्ध के मैदान में पराजित होकर लौटते हुए नाजी सैनिकों ने वहां की दीवारों पर लिखा था कि हम बर्लिन लौट रहे हैं, तो इसके नीचे ही सोवियत सैनिकों ने लिखा, हम भी बर्लिन आ रहे हैं, और उन्होंने बर्लिन में जर्मनी के सत्ताकेंद्र राइखस्टाग पर लाल झंडा फहरा कर ही दम लिया।
कुल मिला कर सोवियत संध की जनता के इस महान देशभक्तिपूर्ण युद्ध ने सारी दुनिया के सामने समाजवादी व्यवस्था की शक्ति और श्रेष्ठता को जाहिर कर दिया। कल की तरह ही आज भी इस बात पर पूरा बल देने की जरूरत है कि द्वितीय विश्व युद्ध पूंजीवाद के संकट की एक परिणति था और फासीवाद का उदय इसी संकट का एक वर्गीय समाधान था। नाजी पार्टी के पीछे जर्मनी के बड़े औद्योगिक और वित्तीय घरानों का हाथ था, जिन्होंने जनता के जनतांत्रिक अधिकारों के हनन और कम्युनिस्टों तथा मजदूरों के संघर्षों के खात्मे के लिये इन ताकतों को हर प्रकार की सहायता दी थी।
फासीवाद पर विजय के 65 वर्ष बाद, आज जब दुनिया का नक्शा कुछ बदला हुआ नजर आता है, एक समाजवादी शिविर के उदय, उपनिवेशवाद के अंत और पूंजीवादी देशों में मेहनतकश जनता के लिये सामाजिक सुरक्षा की असंख्य उपलब्धियों के बावजूद अब उसी सोवियत संघ और पूर्वी युरोप के देशों में समाजवाद के पराभव तथा अमेरिका के एकध्रुवीय विश्व का दृश्य दिखाई देता है, ऐसे समय में इस टिप्पणी के शुरू में हमने जोनाथन स्टील के जिस लेख का उद्धरण दिया है, उसीमें उल्लेखित स्तालिन के मकबरे पर फूल चढ़ाने के लिये आये एक और व्यक्ति अलेक्संदर चुदाकोव, जो एक जानामाना वैज्ञानिक था, का यह सवाल याद आता है कि यह कुछ अजीब है, फिर भी यदि सैनिकों को यह पता होता कि 50 साल बाद उनके देश में क्या होने वाला है तो क्या वे उस बहादुरी से लड़ पाते?
इतिहास के इस व्यर्थताबोध को ही, जो किसी भी मायने में कम यथार्थ बोध नहीं है, कामू, काफ्का और सात्र्र के अस्तित्ववाद ने व्यक्त किया था और ग्रीक माइथोलोजी के चरित्र सिसिफस की कहानी को नयी अर्थवत्ता प्रदान की थी, जो पहाड़ की चोटी पर एक चान को बारबार ले जाने और बारबार उसे ऊपर से गिरते हुए देखने के लिये अभिशप्त है। जाहिर है कि जिंदगी का अर्थ विजय और व्यर्थता, दोनों ही है। जीत और हार की द्वंद्वात्मकता में ही जीवन की प्रगति का राज छिपा है।

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