सोमवार, 29 नवंबर 2010

आदिवासी अस्मिता की चुनौतियां

    आदिवासी समस्या राष्ट्रीय समस्या है। भारत की राजनीति में आदिवासियों को दरकिनार करके कोई राजनीतिक दल नहीं रह सकता। एक जमाना था आदिवासी हाशिए पर थे लेकिन आज केन्द्र में हैं। आदिवासियों की राजनीति के केन्द्र में आने के पीछे प्रधान कारण है आदिवासी क्षेत्रों में कारपोरेट घरानों का प्रवेश और आदिवासियों में बढ़ती जागरूकता। आदिवासियों के प्रति वामपंथी दलों का रूख कांग्रेस और भाजपा के रुख से बुनियादी तौर पर भिन्न है। वामपंथी दलों ने आदिवासियों को कभी भी आदिवासी बनाए रखने, वे जैसे हैं वैसा बनाए रखने की कोशिश नहीं की है। वामपंथी दलों ने आदिवासियों को साम्राज्यवादी विचारकों द्वारा दी गयी घृणित पहचान से मुक्त किया है। उन्हें मनुष्य के रूप में प्रतिष्ठा दी है। यह कार्य उनके मानवाधिकारों की रक्षा करते हुए किया है। आदिवासियों को वे सभी सुविधा और सुरक्षा मिले जो देश के बाकी नागरिकों को मिलती हैं। आदिवासियों का समूचा सांस्कृतिक तानाबाना और जीवनशैली वे जैसा चाहें रखें,राज्य की उसमें किसी भी किस्म के हस्तक्षेप की भूमिका नहीं होगी,इस प्रक्रिया में भारत के संविधान में संभावित रूप में जितना भी संभव है उसे आदवासियों तक पहुँचाने में वामपंथियों की बड़ी भूमिका रही है। आदिवासियों को आतंकी या हथियारबंद करके उनके लिए लोकतांत्रिक स्पेस तैयार नहीं किया जा सकता। लोकतांत्रिक स्पेस तैयार करने के लिए आदिवासियों के बीच लोकतांत्रिक संस्थाओं और लोकतांत्रिक कानूनों क पालन और प्रचार-प्रसार पर जोर देना होगा। आदिवासियों के लिए लोकतंत्र में जगह तब ही मिलेगी जब उन्होंने लोकतांत्रिक ढ़ंग से लोकतान्त्रिक समस्याओं पर गोलबंद किया है। लोकतंत्र की बृहत्तर प्रक्रिया का उन्हें हिस्सा बनाया जाए। आदिवासियों के लिए बंदूक की नोंक पर लाई गई राजनीति आपराधिक कर्म को बढ़ावा देगी। उन्हें अपराधी बनायेगी। साम्राज्यवादी विचारकों के आदिवासियों को अपराधी की कोटि में रखा। इन दिनों आदिवासियों को तरह-तरह के बहानों से मिलिटेंट बनाने,जुझारू बनाने,हथियारबंद करने,पृथकतावादी बनाने,सर्वतंत्र-स्वतंत्र बनाने के जितने भी प्रयास उत्तर-पूर्व के राज्यों से लेकर छत्तीसगढ़-लालगढ़ तक चल रहे हैं ,वे सभी आदिवासियों को अपराधकर्म में ठेल रहे हैं। अंतर यह है कि उसके ऊपर राजनीति का मुखौटा लगा हुआ है। आदिवासी को मनुष्य बनाने की बजाय मिलिटेंट बनाना सामाजिक-राजनीतिक अपराध है।
 
हमें इस सवाल पर विचार करना चाहिए कि आदिवासी इलाकों में ही उग्रवाद क्यों पनपा है ? कांग्रेस के नेताओं और भारत सरकार के गृहमंत्री पी.चिदम्बरम के पास उग्रवाद की समस्या का एक ही समाधान है वह है आदिवासी इलाकों में विकास और पुलिस कार्रवाई। इसी एक्शन प्लान पर ही सारा मीडिया और कारपोरेट जोर दे रहा है।  इस एक्शन प्लान को आदिवासी समस्या के लिए रामबाण दवा कहा जा रहा है। केन्द्र सरकार ने इस दिशा में कदम उठाते हुए कुछ घोषणाएं भी की हैं। लेकिन यह प्लान बुनियादी तौर पर अयथार्थपरक है। इस प्लान में आदिवासियों का उनकी जमीन से उच्छेद रोकना, उनके क्षेत्र के संसाधनों का स्वामित्व,विस्थापन और उनके पीढ़ियों के जमीन के स्वामित्व की बहाली की योजना या कार्यक्रम गायब है। मनमोहन-चिदम्बरम् बाबू जिस तरह का लिकास करना चाहते हैं उसमें आदिवासियों का विस्थापन अनिवार्य है। समस्या यहां पर है कि क्या केन्द्र सरकार विकास का मॉडल बदलना चाहती है ? जी नहीं, केन्द्र सरकार विकास का नव्य-उदार मॉडल जारी रखना चाहती है। आदिवासियों की उनकी जमीन से बेदखली जारी रखना चाहती है, ऐसे में आदिवासियों के सड़कें,स्कूल-कॉलेज,रोजगार के सपने देकर शांत नहीं किया जा सकता। विकास के मनमोहन मॉडल में वस्थापन अनिवार्य और अपरिहार्य है। ऐसी अवस्था में आदिवासियों के बीच में विकास और पुलिस एक्शन का प्लॉन पिटेगा। आदिवासियों का प्रतिवाद बढ़ेगा। दूसरी बात यह कि विस्थापन का विकल्प मुआवजा नहीं है। मुआवजा ज्यादा हो या कम इससे भी आदिवासियों का गुस्सा शांत होने वाला नहीं है। इस प्रसंग में सबसे बुनियादी परिवर्तन यह करना होगा कि आदिवासियों के इलाकों पर उनका ही स्वामित्व रहे। क्रेन्द्र या राज्य सरकार का आदिवासियों की जमीन और जंगल पर स्वामित्व संवैधानिक तौर पर खत्म करना होगा।
    आदिवासियों के सामने इस समय दो तरह की चुनौतियां हैं, पहली चुनौती है आदिवासियों के प्रति उपेक्षा और विस्थापन से रक्षा करने की और उसके विकल्प के रूप में परंपरागत संस्थाओं और आदिवासी एकजुटता को बनाए रखने की। दूसरी चुनौती है नयी परिवर्तित परिस्थितियों के अनुकूल बदलने और लदनुरूप अपने संस्कारों,आदतों और कानूनों में बदलाव लाने की। आदिवासियों पर कोई भी परिवर्तन यदि बाहर से थोपा जाएगा तो वे प्ररोध करेंगे। आदिवासियों का प्रतिरोध स्वाभाविक है। वे किसी भी चीज को स्वयं लागू करना चाहते हैं। यदि केन्द्र सरकार उनके ऊपर विकास को थोपने की कोशिश करेगी तो उसमें अंततः असफलता ही हाथ लगेगी। आदिवासी अस्मिता की धुरी है स्व-संस्कृति प्रेम, आत्मनिर्णय और आत्म-सम्मान में विश्वास। 




रविवार, 28 नवंबर 2010

उत्तर मार्क्सवाद के दौर में क्रांति का मार्ग

उत्तर आधुनिकतावाद दौर में क्रांति पर सबसे तेज हमले हुए हैं। इन हमलों के आंतरिक और बाह्य दोनों ही किस्म के रूप रहे हैं। इनकी मीमांसा करने का यहां अवकाश नहीं है। उस पर आगे कभी बात करेंगे। हम कायदे से क्रांति की आवधारणा पर नए सिरे से विचार करें। क्योंकि उत्तर आधुनिकता के दौर पर क्रांति की अवधारणा के खिलाफ जितना लिखा गया है उतना अन्य किसी अवधारणा के बारे में नहीं लिखा गया है। क्रांति संबंधी बहस का बृहत्तर रूप में गहरा संबंध सिद्धांत और व्यवहार की एकता के साथ है। इस प्रसंग में पहली बात यह कि क्रांति का वास्तव अर्थ इन दिनों विकृत हुआ है। उसका अवमूल्यन हुआ है। क्रांति का अर्थ परिवर्तन मान लिया गया है और प्रत्येक परिवर्तन को क्रांति कहने का रिवाज चल निकला है। क्रांति के अर्थ का यह विकृतिकरण है। क्रांति का अर्थ है बुनियादी या आमूल-चूल परिवर्तन।

     क्रांति पर बहस करते हुए आमतौर पर कुछ इमेजों,कुछ आख्यानों, कुछ देशों ,कुछ खास क्षण विशेष आदि का जिक्र किया जाता है और यह क्रांति का भ्रष्टीकरण करने में मदद करता है। क्रांति पर बात करने के लिए उसे साम्यवादी और साम्यवादविरोधी विचारकों और प्रचार सामग्री के द्वारा निर्मित इमेजों से बाहर आकर देखने की जरूरत है।
      क्रांति अनंत क्षण में नहीं बल्कि समकालिक क्षण में घटित होती है। इसमें प्रत्येक चीज एक-दूसरे जुड़ी होती है। क्रांति का मतलब राजतंत्र या समाजतंत्र का ‘सुधार’ या ‘अल्प सुधार’ नहीं है क्रांति का मतलब किसी काल्पनिक मानसिक जगत में परिवर्तन से नहीं है। बल्कि इसका संबंध आमूल-चूल परिवर्तन से है। ये परिवर्तन एक-दूसरे से अभिन्न रूप से जुड़े हैं।
    क्रांति कोई बनी-बनायी परंपरा का निर्माण नहीं है। बल्कि मूलभूत परिवर्तनों का पुनरान्वेषण है। क्रांति कोई तयशुदा तर्कसंघर्ष नहीं है । इसी प्रसंग में प्रसिद्ध मार्क्सवादी फ्रेडरिक जेम्सन ने लिखा है  ‘‘सामाजिक क्रांति अनंत समय का एक क्षण मात्र नहीं है। प्रत्युत समकालिक तंत्र में परिवर्तन की आवश्यकता की पुष्टि है, जिसमें हर चीज एक साथ है और एक दूसरे से अंतर्संबधित है। इस प्रकार का तंत्र संपूर्ण तंत्रगत परिवर्तन की मांग करता है, न कि अल्प 'सुधार', जिसे निंदात्मक अर्थ में 'मनोराज्य विषयक' कहा जाता है, जो भ्रामक है, व्यवहार्य नहीं। अभिप्राय यह है कि यह तंत्र वर्तमान सामाजिक व्यवस्था के स्थान पर एक रैडिकल सामाजिक विकल्प की विचारधारात्मक दृष्टि की मांग करता है, ऐसा कुछ जिसे वर्तमान तर्कमूलक संघर्ष के अंतर्गत दिया हुआ या विरासत में मिला नहीं माना जाए, बल्कि जो पुनरान्वेषण की मांग करे। धार्मिक रूढ़िवाद (चाहे वह इसलामी, ईसाई, या हिंदू रूढ़िवाद हो) जो उपभोक्तावाद या 'अमरीकी जीवन शैली' का रैडिकल विकल्प देने का दावा करता है, तभी महत्वपूर्ण अस्तित्व प्राप्त करता है जब पारंपरिक वाम विकल्प खासकर मार्क्सवाद और साम्यवाद की महान क्रांतिकारी परंपराएं अचानक अनुपलब्ध प्रतीत होने लगती हैं।’’
   आज क्रांति का महत्वपूर्ण एजेण्डा राष्ट्रीय संप्रभुता की रक्षा करना।  क्रांति एक प्रक्रिया है और समकालिक परवर्ती पूंजीवादी तंत्र का अवसान भी है। लेकिन इसका प्रस्थान बिंदु राष्ट्रीय सप्रभुता की रक्षा के सवालों से आरंभ होता है। परवर्ती पूंजीवाद के जमाने में राष्ट्रीय संप्रभुता ही दांव पर लगी है। किसी भी देश को स्वतंत्र रूप से अपनी नीतियां बनाने और विकास करने का हक नहीं है। क्रांतिकारी ताकतों का यह विश्व एजेण्डा है।
  क्रातिकारी ताकतों का आंतरिक एजेण्डा है हाशिए के लोगों को उनकी जनवादी मांगों के इर्दगिर्द एकजुट करना। समाज में प्रत्येक व्यक्ति को संघर्ष की अवस्था में इस या उसके साथ खड़े होने,प्रतिबद्ध होने के लिए तैयार करना। परवर्ती पूंजीवाद ने गैर प्रतिबद्धता की हवा चला दी है,इस हवा को जनवादी प्रतिबद्धता के आधार पर ही चुनौती दी जा सकती है। आम लोगों को जनवादी विचारों के प्रति प्रतिबद्ध बनाना,हाशिए के लोगों की जनवादी मांगों के आधार पर एकजुट करना, उनके संगठनों और संघर्षों को आयोजित करना वास्तव अर्थों में क्रांति के मार्ग पर ही चलना है।



शनिवार, 27 नवंबर 2010

वी एस नायपॉल प्रसंगःफंडामेंटलिज्म के प्रतिवाद में

   वी एस नायपाल बड़े लेखक हैं । उन्हें बुकर पुरस्कार और नोबुल पुरस्कार भी मिल चुका है। उनके विचार अनेक धर्मनिरपेक्ष विचारकों और लेखकों को पसंद नहीं हैं। मैं भी उनके अनेक विचारों से असहमत हूँ। लेकिन हाल ही में यूरोपीय लेखक संसद से उनको बाहर कर दिए जाने के फैसले को स्वीकार नहीं कर पा रहा हूँ।यह सीधे लेकक की स्वतंत्रता का हनन है।  उल्लेखनीय है यूरोपीय लेखक संसद का लाजा अधिवेशन तुर्की की राजधानी इस्ताम्बुल में चल रहा है। संसद के आयोजकों ने नायपाल को उदघाटन के लिए बुलाया था। लेकिन स्थानीय तुर्की लेखकों और धार्मिक प्रेस ने नायपाल के बुलाए जाने का विरोध किया और कहा कि उनकी मौजूदगी इस्लाम का अपमान है।
    सारी दुनिया जानती है नॉयपाल के इस्लाम के बारे में  क्या विचार हैं। वे इस्लाम की जितनी तीखी आलोचना करते हैं उतनी गहराई के साथ भारत के हिन्दुत्ववादियों और भाजपा के प्रेमी भी हैं। नॉयपाल उन चंद लेखकों में हैं जिन्होंने बाबरी मसजिद गिराए जाने का स्वागत किया था। तुर्की के धार्मिक प्रेस ने नॉयपाल को बुलाए जाने के खिलाफ विगत कई दिनों से हंगामा खड़ा किया हुआ है। उसके दबाब में आकर ही आयोजकों को उन्हें आने के लिए मना करना पड़ा।
   इस प्रसंग में कई सवाल उठते हैं पहला सवाल यह है कि क्या लेखक को अपने धर्म संबंधी विचार रखने का हक है ? क्या धर्म संबंधी विचारों के आधार पर या राजनीतिक विचारधारा विशेष के विचारों को मानने के कारण हमें लेखक का बहिष्कार करना चाहिए ? क्या साहित्य में धर्ममीमांसा संभव है ? आदि सवालों पर हमें गंभीरता के साथ सोचना चाहिए। लोकतंत्र में यह संभव है कि लेखक धर्म को न माने,धर्म की आलोचना करे। नास्तिक हो। लेकिन लोकतंत्र का रखवाला हो। लोकतंत्र का सारा दारोमदार वैचारिक मतभेद और सामाजिक भिन्नता पर टिका है।
    यूरोपीय लेखक संसद ने नॉयपाल के कार्यक्रम को रद्द करके लोकतंत्र की मर्यादा नष्ट की है। लोकतंत्र में अन्य की भी जगह है। इसी तरह साहित्यकार को धर्म संबंधी स्वतंत्र विचार रखने का मानवाधिकार है,इसके आधार पर उसका बहिष्कार करना या उसे अपमानित करना ठीक नहीं है। यह फंडामेंटलिज्म है।
     दुर्भाग्य की बात यह है कि यह घटना यूरोप में घटी है। इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि इस्लामिक फंडामेंटलिज्म का किस तरह लोकतंत्र पर दबाब बढ़ रहा है। जाहिर है जब इस्लामिक फंडामेंटलिज्म के सामने लोकतंत्र के सिपहसालार सिर झुकाएंगे तो अन्य किस्म के फंडामेंटलिस्टों जैसे ईसाई फंडामेंटलिस्ट,हिन्दू फंडामेंटलिस्ट आदि के भी हौंसले बुलंद होंगे। वे भी लेखक या नेता की अभिव्यक्ति की आजादी पर हमले बोलेंगे, बहिष्कार करेंगे। शारीरिक हमले करेंगे।
नॉयपाल की एवज में ब्रिटिश उपन्यासकार हरी कुंजरू को उदघाटन भाषण देने के लिए बुलाया गया और उन्होंने यूरोपीय लेखक संसद और तुर्की के फंडामेंटलिस्टों की अपने उदघाटन में जमकर आलोचना की और कहा कि नॉयपाल को आने से रोकना गलत है। उनकी अनुपस्थिति दुख की बात है। साथ ही उन्होंने कहा कि तुर्की के कानून से बदनाम धारा 301 को निकाल देना चाहिए। कुंजरू ने कहा कि नॉयपाल यहां होते तो हमारी साख बढ़ती,प्रामाणिकता भी बढ़ती। यह दुख की बात है कि आप किसी को इसलिए नहीं आने देगे क्योंकि उसके विचार आपको आक्रामक लगते हैं। इसके अलावा कुंजरू ने विस्तार के साथ तुर्की के अंदर अभिव्यक्ति की आजादी के हनन के अनेक प्रसंग भी उठाए और कहा कि अभिव्यक्ति की आजादी के मामले में तुर्की क रिकॉर्ड खराब है। द गार्दियन ने लिखा है  ‘‘The writer also attacked Turkey's record on free speech, citing the cases brought against novelist Orhan Pamuk and editor Hrant Dink under article 301 of the country's penal code, which makes it illegal to insult Turkey, Turkish ethnicity or Turkish government institutions.
Kunzru told the assembled authors: "Pamuk faced trial for giving the following statement to a Swiss magazine: 'Thirty thousand Kurds have been killed here and a million Armenians. And almost nobody dares mention that. So I do.'" He added: "Dink, one of Turkey's most prominent Armenian voices was convicted under article 301 then murdered by a young nationalist, who was subsequently photographed in a police station surrounded by smiling officers, against the backdrop of the national flag. There are many other examples in Turkey of the weapons of offence and insult being used to silence dissent. Turkey is obviously not alone in this, but since we are here, it is important that we acknowledge it."
    बुनियादी समस्या यह है कि दुनिया के विभिन्न देशों में धार्मिक फंडामेंटलिस्ट ,पृथकतावादी ,साम्प्रदायिक आदि लोकतंत्र विरोधी संगठनों के द्वारा लेखकीय स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की आजादी पर आए दिन हमले बढ़ रहे हैं। इसके लिए ये संगठन बेसिर-पैर के बहानों को आधार बना रहे हैं। हमें लोकतंत्र के विकास और समृद्धि के लिए अभिव्यक्ति,विचार और लेखन की स्वतंत्रता पर बढ़ते हमलों के खिलाफ एकजुट होकर आवाज बुलंद करनी चाहिए। वरना लोकतंत्र विरोधी ताकतें लोकतंत्र को निगल जाएंगी।

भूखा किसान,नीतीश की जीत और मीडियाखेल

     बिहार में नीतीश बाबू विधानसभा चुनाव जीत गए लेकिन किसान पर कोई कृपादृष्टि किए बगैर। लालू यादव ने इसे एनडीए की रहस्यमय जीत कहा है। एनडीए ने अपने प्रचार में मीडिया फ्लो को ध्यान में रखकर मध्यवर्गीय एजेण्डे को केन्द्र में रखा था। सवाल उठता है एनडीए और खासकर नीतीश कुमार जैसे पुराने समाजवादियों को बिहार में चुनाव लड़ते हुए किसानों की समस्याएं नजर क्यों नहीं आईं ? मीडिया के तथाकथित कवरेज से बिहार का किसान क्यों गायब था ? बिहार के विभिन्न जिलों से आने वाले किसी भी टॉक शो में किसान को प्रधान एजेण्डा क्यों नहीं बनाया गया ? इसके कारण क्या हैं ? क्या बिहार के विकास का कोई भी नक्शा किसान को दरकिनार करके बनाया जा सकता है ? जी नहीं। लेकिन मीडिया में एनडीए के चतुर खिलाडियों ने यही ज्ञान बांटा है बिहार तरक्की पर है और एनडीए उसके कारण ही जीता है। यह प्रचार है इसका वास्तविकता से कोई संबंध नहीं है।
    जरा बड़ी तस्वीर पर नजर ड़ालें तो चीजें साफ दिखने लगेंगी। टेलीविजन विज्ञापनों में खाना खाता किसान नजर नहीं आता। आमतौर पर मध्यवर्ग के बच्चे,औरतें और पुरूष खाना खाते या पेय पदार्थ पीते नजर आते हैं। चॉकलेट खाते नजर आते हैं। मैगी खाते नजर आते हैं। मध्यवर्गीय सुंदर रसोई नजर आती है। होटल के कुक नजर आते हैं। मध्यवर्गीय औरतें खाना बनाने की विधियां बताती नजर आती हैं लेकिन किसान औरतों का चूल्हा और खाना बनाने की विधियां नजर नहीं आती।  
   टेलीविजन या मीडिया में किसान की कभी-कभार आत्महत्या की खबर आती है। स्वाभाविक खबरें नहीं आतीं। किसान को हमने भूख के साथ जीना सिखा दिया है और मीडिया भी इस काम में सक्रिय भूमिका अदा कर रहा है। महान किसान नेता सहजानंद सरस्वती ने लिखा है ‘‘अमीर और जमींदार लोग, कानून की पाबन्दी और उस पर अमल कराने वाले लोग और जो लोग कानून बनाते हैं उनसे,  सभी से यदि कहा जाए कि भूखे रहकर यह काम कीजिए तो धीरे से सलाम करके चट हट जाएँगे। साफ कहेंगे कि बाबा,   यह काम हमसे न होगा। लीजिए हमारा इस्तीफा। नहीं-नहीं, भूखे रहना तो दूर रहे। जरा चाय न मिले, एक समय नाश्ता और जलपान न मिले तो भी उनके माथे में चक्कर आता है और बीमार पड़ जाते हैं। फलत: उनकी सारी ऐंठ और सारा कारोबार ही रुक जाता है।’’
      किसान की स्थिति इससे थोड़ा भिन्न है। उसकी भूख,उसकी सामाजिक-आर्थिक जरूरतें, उसकी राजनीतिक इच्छाएं आदि को मीडिया कभी व्यक्त नहीं करता। मीडिया कवरेज से लेकर राजनीतिक हंगामे तक कहीं पर भी बिहार का किसान और उसकी समस्याएं चर्चा के केन्द्र में नहीं थीं। विकास का तथाकथित एजेण्डा बुर्जुआ एजेण्डा है। किसान एजेण्डा नहीं है। प्रकारान्तर से बिजली,पानी,सड़क और कानून व्यवस्था के सवाल चर्चा के केन्द्र में थे। ये विश्व बैंक और विश्व की नामी वित्तीय संस्थाओं का सुझाया एजेण्डा है। इसमें भी दो कामों की ओर बिहार की नीतीश सरकार ने ध्यान दिया था। वह है सड़क निर्माण और कानून व्यवस्था । कानून व्यवस्था में आए सुधार का बहुत गहरा संबंध माफिया गिरोहों को सड़क निर्माण के धंधे में खपा देने के साथ है। माफिया गिरोहों में सत्ता की लूट का विभाजन बड़े ही कौशल के साथ किया गया है और तथाकथित सड़क निर्माण और ऐसे ही कार्यों में बाहुबलियों को स्थानांतरित कर दिया गया है। सरकारी खजाने की विभिन्न मदों में हुई लूट में हिस्सेदारी दे दी गयी है। इसका परिणाम यह निकला कि आम जनजीवन में कानूनभंजन की घटनाओं का ग्राफ तेजी से गिर गया। बाकी वोटों के प्रबंधन में सामाजिक समीकरण के गणित को लगा दिया गया।
    किसान को भूखा रखकर आई यह जीत कितनी बिहार के लिए भविष्य में कितनी सार्थक होगी यह तो भविष्य ही बताएगा। लेकिन एक बात तय है कि किसान की भूख को अभी बिहार में प्रमुख एजेण्डा बनना है। सहजानंद सरस्वती के शब्दों में कहें ‘‘लेकिन वही लोग उम्मीद करते हैं कि भूखों रहकर और दिन-रात खप-मर के किसान लगान और टैक्स चुकता करे सलामी और नजराना दे और सुन्दर-सुन्दर पदार्थ उन्हें भोग लगाने को मुहय्या करे ? किसान उनसे पूछता क्यों नहीं कि 'खुदरा फजीहत, दीगरे रा नसीहत?' आप लोग स्वयं तो जरा सी नाश्ते में देर बर्दाश्त नहीं कर सकते और घी-दूध के बिना काम ही नहीं कर सकते। तो फिर हमीं से वैसी आशा क्यों करते हैं ? हम भूखों रहके सब-कुछ गैरों के लिए उपजावें ऐसा क्यों सोचते हैं ? क्या आपका शरीर एवं दिल दिमाग खून मांस वगैरह से बना है और हमारा पत्थर और मिट्टी से कि हमारा काम यों ही चल जाएगा ? हमारे साथ आप भी भूखों रह के काम कीजिए। तब तो पता चलेगा कि लेक्चर और हुक्म देना कितना आसान है और भूख कितनी बुरी है। ऊँट को तभी पता चलेगा कि जितना आसान बलबलाना है, उतना पहाड़ पर चढ़ना नहीं है।’’
       सहजानंद सरस्वती ने लिखा है किसान का काम है कि वह कानूनी ढिंढोरा पीटने वालों से और उसका खून चूसने वालों से सीधा कह दे कि बिना कोयला-पानी के निर्जीव और लोहे का बना इंजिन भी काम नहीं करता और आगे नहीं बढ़ता, चाहे ड्राइवर मर जाए। यदि घोड़े को दाना और घास न दें और पानी न पिलाएँ। मगर पीठ पर सवार होकर कोड़े मारकर ही उसे चलाना और दौड़ाना चाहें तो यह असम्भव है। वह तो सिर्फ आगे बढ़ने से इन्कार ही नहीं करता, किन्तु अगले पाँवों को उठाकर खड़ा हो जाता और अपना शरीर बुरी तरह झकझोर के सवार को नीचे गिरा देता है। तब सवार को अक्ल आती है। फलस्वरूप चाहे घोड़े को और कोड़े भले ही लगें। मगर सवार की हड्डियाँ तो चूर हो ही जाती हैं। हम भी अब यही करेंगे यदि हमें दिक किया गया। हम तो पहले खाएँ-पिएँगे। पीछे और कुछ करेंगे।
बिहार में चूंकि नव्य उदार आर्थिक नीतियों को लागू किया जा रहा है तो जमीन-मकान-जायदाद के धंधे में उछाल आएगा। इससे स्थानीय  बाहुबलियों का वर्चस्व मजबूत होगा। नई सरकार तेजी से सेज प्रकल्पों की ओर भी बढ़ेगी इस सबसे प्राकृतिक असंतुलन और बढ़ेगा। अवरूद्ध विकास के कारण पहले से ही बिहार प्राकृतिक असंतुलन को झेल रहा है। प्राकृतिक तबाही झेल रहा है। आश्चर्य की बात है बिहार के सैंकड़ों लड़के पूरे देश में एनजीओ कर रहे हैं लेकिन बिहार के प्राकृतिक विनाश पर उनका ध्यान ही नहीं जाता।
      सहजानंद सरस्वती के शब्दों में बिहार के सामने तीन बड़ी समस्याएं हैं वे हैं हवा,   पानी और खाना। हवा बिना एक क्षण भी जिन्दा रहना गैर-मुमकिन है। इसलिए प्रकृति ने उसे सब जगह इफरात से बनाया है। बिना विशेष यत्न के ही वह सर्वत्र सुलभ है। सो भी जितनी चाहें उतनी। इस कदर सुलभ और ज्यादा है कि हम उसे यों ही गन्दा और खराब बनाते रहते हैं, बिना कारण के ही और प्रकृति को उसे शुद्ध बनाने के लिए न जाने कितने उपाय करने पड़ते हैं। मगर इतने से रंज हो के उसने हमारी जरूरत-भर हवा नहीं दी है और न जरूरत में कमी ही की है। जो जितना ही जरूरी है वह यदि उतना ही सुलभ और पर्याप्त हो, तभी काम चल सकता है। यही नियम इस बात से सिद्ध होता है।

   हवा के बाद स्थान है पानी का। यह हवा जितना जरूरी है नहीं। मगर भोजन से तो कहीं ज्यादा जरूरी है। पानी पीके कुछ दिन जिन्दा रह सकते हैं बिना खाये भी। इसीलिए पुराने लोगों ने पानी का नाम जीवन भी रखा है। यह पानी भी हवा जैसा सुलभ, सर्वत्र प्राप्य न होने पर भी जरूरत के लिए मिल ही जाता हैं। जहाँ ऊपर नहीं है वहाँ थोड़ी सी जमीन खोदने पर जितना चाहे पा सकते हैं। यों तो नदियाँ,   तालाब, झरने और मेघ उसे पहुँचाते ही रहते हैं। सहारा के रेगिस्तान और बीकानेर के तालुकामय मरुस्थली में भी ऊँटों और जंगली लोगों के लिए प्रकृति ने ऐसा सुन्दर प्रबन्ध कर दिया है कि आश्चर्यचकित होना पड़ता है। जहाँ पानी का पता नहीं। मेघ भी शायद ही कभी भूल-चूक से थोड़ा कभी बरस जाए। दिन-रात लू चलती रहती है। वहीं पर जमीन के थोड़ा ही नीचे मनों वजन के तरबूजे (मतीरे) होते हैं जो बारह महीने पाए जाते हैं। उनमें खाना और पानी दोनों हैं। वह इतने मीठे होते हैं कि कहिए मत। उनकी खेती कोई नहीं करता जमीन के भीतर ही उनकी लताएँ फैलती और फलती हैं। वहाँ के निवासियों के लिए यह प्रकृति का खास (special-arrengement) है।

    तीसरा नम्बर भोजन का आता है। रोशनी, मकान, कपड़े आदि के बिना भी हम जिन्दा रह सकते हैं। मगर भोजन के बिना कितने दिन टिक सकते हैं। जैसे-तैसे मर-जी के कुछ ही दिन के बाद जीना असम्भव है यदि खाना न मिले। इसीलिए सहारा और राजपूताने में जहाँ पेड़ नहीं हैं, प्रकृति का खास इन्तजाम खाने-पीने के बारे में बताया है। यह भी तो देखिए कि जब किसान या दूसरा आदमी नन्हा-सा बच्चा था और माता के पेट से अभी-अभी बाहर आया था, तो उसके खाने-पीने का प्रबन्‍ध पहले से ही था। माता के स्तनों में इतना मीठा दूध बिना कोशिश के ही मौजूद था कि खाने और पीने दोनों ही,  का काम करता था। पशुओं के लिए भी यही बात है। बच्चे कमा नहीं सकते और न हाथ-पाँव चला सकते हैं। इसलिए भगवान या प्रकृति ने खुद पहले से सुन्दर इन्तजाम कर दिया। जंगलों और पहाड़ों और सारी जमीन पर घास-पात और फल-फूल की, जड़ और मूल की इतनी बहुतायत है कि सभी पशु-पक्षी खा-पी सकते हैं। यहाँ तक कि किसान जब निरा बच्चा है तब तक वह अमृत जैसा माँ का दूध पीने को पाता है।

     मगर सयाना होने पर ? हाथ-पाँव चलाने और दिन-रात एड़ी-चोटी का पसीना एक करने पर ? उसका पेट नहीं भरता और भूखों मरता है। क्या यह बात समझ में आने की है ? लोग कहते हैं कबीर ने उल्टी बातें बहुत कही हैं, जैसे 'नैया बीच नदिया डूबी जाए' मगर क्या यह नैया बीच नदिया का डूबना नहीं है ? वर्तमान सामाजिक व्यवस्था ने अमन और कानून ने जो यह भूखों मरने की व्यवस्था कमाने वालों के लिए,  किसानों के लिए,  बना रखी है और जिसका समर्थन सारी शक्ति लगा कर किया जाता है, क्या वह प्रकृति को पसन्द है ? प्रकृति ने तो हवा, पानी, दूध आदि प्रचुर मात्रा में प्रस्तुत करके बता दिया है कि भोजन जैसी जरूरी चीज जरूरत-भर पाने का हर किसान को नैतिक अधिकार है, कुदरती हक है। मगर अभागा किसान समझे तब न ?















शुक्रवार, 26 नवंबर 2010

भारतीय विद्रोह-कार्ल मार्क्स

                       विद्रोही सिपाहियों द्वारा भारत में किए गए अनाचार सचमुच भयानक, वीभत्स और अवर्णनीय हैं। ऐसे अनाचारों को आदमी केवल विप्लवकारी युध्दों में, जातियों, नस्लों और, सबसे अधिक, धर्म-युध्दों में देखने का खयाल मन में ला सकता है। एक शब्द में, ये वैसे ही अनाचार हैं जैसे वेंदियनों ने 'नीले सैनिकों' पर किए थे और जिनकी इंगलैंड के भद्र लोग उस वक्त तारीफ किया करते थे; वैसे ही जैसे कि स्पेन के छापेमारों ने अधर्मी फ्रांसीसियों पर, सर्बियनों ने जर्मन और हंगरी के अपने पड़ोसियों पर, क्रोट लोगों ने वियना के विद्रोहियों पर, कावेनाक के चलते-फिरते गार्डों अथवा बोनापार्ट के दिसंबरवादियों ने सर्वहारा फ्रांस के बेटे-बेटियों पर किए थे। सिपाहियों का व्यवहार चाहे जितना भी कलंकपूर्ण क्यों न रहा हो, पर अपने तीखे अंदाज में, वह उस व्यवहार का ही प्रतिफल है जो न केवल अपने पूर्वी साम्राज्य की नींव डालने के युग में, बल्कि अपने लंबे जमे शासन के पिछले दस वर्षों के दौरान में भी इंगलैंड ने भारत में किया है। उस शासन की विशेषता बताने के लिए इतना ही कहना काफी है कि यंत्रणा उसकी वित्तीय नीति का एक आवश्यक अंग थी।* मानव इतिहास में प्रतिशोध नाम की भी कोई चीज होती हैं; और ऐतिहासिक प्रतिशोध का यह नियम है कि उसका अस्त्र त्रस्त होने वाला नहीं, वरन स्वयं त्रास देने वाला ही बनाता है। फ्रांसीसी राजतंत्र पर पहला वार किसानों ने नहीं, अभिजात कुलों ने किया था।
भारतीय विद्रोह का आरंभ अंग्रेजों द्वारा पीड़ित, अपमानित और नंगी बना दी गई रैयत ने नहीं किया, बल्कि उनके द्वारा खिलाए-पिलाए, वस्त्र पहनाए, दुलराए, मोटे किए और बिगाड़े गए सिपाहियों ने ही किया है। सिपाहियों के दुराचारों की तुलना के लिए हमें मध्य युगों की ओर जाने की जरूरत नहीं है, जैसा कि लंदन के कुछ अखबार झूठ-मूठ कहने की कोशिश करते हैं; उसके लिए हमें वर्तमान इंगलैंड के इतिहास से भी दूर जाने की आवश्यकता नहीं है। हमें केवल इस बात की जरूरत है कि प्रथम चीनी युध्द का, जो मानो कल की ही घटना है, अध्ययन कर लें। अंगरेज सिपाहियों ने तब केवल मजे के लिए अत्यंत घिनौने काम किए थे; उनकी भावनाएं तब न तो धार्मिक पागलपन से प्रेरित हुई थीं, न वे किसी अहंकारी और विजेता जाति के प्रति घृणा से भरकर उभर पड़ी थीं, और न वे किसी वीर शत्रु के कठिन प्रतिरोध के कारण ही भड़क उठी थीं। स्त्रियों पर बलात्कार करना, बच्चों को शलाखें भोंक देना, पूरे-पूरे गांवों को भून देनाये सब उनके खेल थे। इनका वर्णन मंदारिनों (चीनी अधिकारियों) ने नहीं, बल्कि स्वयं ब्रिटिश अफसरों ने किया है।
इस दु:खद संकट काल में भी यह सोच लेना भयानक भूल होगी कि सारी क्रूरता सिपाहियों की ही तरफ से हुई है और मानवीय दया-करुणा का सारा दूध अंगरेजों की तरफ से बहा है। ब्रिटिश अफसरों के पत्र कपटपूर्ण द्वेष से भरे हुए हैं। पेशावर से एक अफसर ने उस 10वीं अनियंत्रित घुड़सवार सेना के निरस्त्रीकरण का वर्णन लिखा है, जिसने आज्ञा दिए जाने के बावजूद, 55वीं भारतीय पैदल सेना पर आक्रमण नहीं किया था। यह इस बात पर बेहद खुशी प्रकट करता है कि न केवल वे निहत्थे कर दिए गए थे, बल्कि उनके कोट और बूट भी छीन लिए गए थे, और उनमें से हर आदमी को 12 पेंस देकर पैदल नदी के किनारे ले जाया गया था, और वहां नावों में बैठाकर सिंधु नदी से उन्हें नीचे की तरफ भेज दिया गया था, जहां कि, आह्लाद से भरकर लेखक आशा करता है, उनमें से हर माई का लाल तेज भंवरों में डूब जाएगा। एक और लेखक हमें बताता है कि पेशावर के कुछ निवासियों ने एक शादी के अवसर पर पटाखे छुटा कर (जो एक राष्ट्रीय रिवाज है) रात में घबराहट पैदा कर दी थी; तो अगली सुबह उन लोगों को बांध दिया गया था और 'इतने कोड़े लगाए गए थे कि आसानी से वे उन्हें नहीं भूलेंगे।' पिंडी से खबर मिली कि तीन देशी राजा साजिश कर रहे थे। सर जॉन लॉरेंस ने एक संदेश भेजा जिसमें आज्ञा दी गई कि एक जासूस उस मंत्रणा की खोज-खबर लाए। जासूस की रिपोर्ट के आधार पर, सर जॉन ने एक दूसरा संदेश भेजा, 'उन्हें फांसी दे दो।' राजाओं को फांसी दे दी गई। इलाहाबाद से सिविल सर्विस का एक अफसर लिखता है : 'हमारे हाथ में जिंदगी और मौत की ताकत है, और हम तुम्हें यकीन दिलाते हैं कि उसका इस्तेमाल करने में हम कोताही नहीं करते!' वहीं से एक दूसरा अफसर लिखता है : 'कोई दिन नहीं जाता जब हम उनमें से (न लड़ने वाले लोगों में से) 10-15 को लटका न देते हों!' एक बहुत प्रसन्न अफसर लिखता है : 'होम्स, एक 'बढिया' आदमी की तरह, उनमें से 20-20 को एक साथ फांसी पर लटका रहा है।' एक दूसरा, बड़ी संख्या में हिंदुस्तानियों को झटपट फांसी देने की बात का जिक्र करते हुए कहता है : 'तब हमारा खेल शुरू हुआ।' एक तीसरा : 'घोड़ों पर बैठे-बैठे ही हम अपने फौजी फैसले सुना देते हैं, और जो भी काला आदमी हमें मिलता है, उसे या तो लटका देते हैं, या गोली मार देते हैं।' बनारस से हमें सूचना मिली है कि तीस जमींदारों को केवल इसलिए फांसी दे दी गई है कि उन पर स्वयं अपने देशवासियों के साथ सहानुभूति रखने का संदेह किया जाता था; और इसी संदेह में पूरे गांव के गांव जला दिए गए हैं। बनारस से एक अफसर, जिसका पत्र लंदन टाइम्स में छपा है, लिखता है : 'हिंदुस्तानियों से सामना होने पर यूरोपियन सैनिक शैतान की तरह पेश आते हैं।और यह भी नहीं भूलना चाहिए कि अंग्रेजों की क्रूरताएं सैनिक पराक्रम के कार्यों के रूप में बयान की जाती हैं; उन्हें सीधे-सादे ढंग से, तेजी से, उनके घृणित ब्योरों पर अधिक प्रकाश डाले बिना बताया जाता है; लेकिन हिंदुस्तानियों के अनाचारों को, यद्यपि वे खुद सदमा पहुंचाने वाले हैं, जान-बूझकर और भी बढ़ा-चढ़ा कर बयान किया जाता है। उदाहरण के लिए, दिल्ली और मेरठ में किए गए अनाचारों की परिस्थितियों के उस विस्तृत वर्णन को, जो सबसे पहले टाइम्स में छपा था और बाद में लंदन के दूसरे अखबारों में भी निकला थाकिसने भेजा था? बंगलौर, मैसूर में रहने वाले एक कायर पादरी नेजो एक सीध में देखा जाए तो घटना-स्थल से 1,000 मील से भी अधिक दूर था। दिल्ली के वास्तविक विवरण बताते हैं कि एक अंगरेज पादरी की कल्पना हिंद के किसी बलवाई की कल्पना की उड़ानों से भी अधिक भयानक अत्याचारों को गढ़ सकती है। निस्संदेह, नाकों, छातियों, आदि का काटना, अर्थात, एक शब्द में, सिपाहियों द्वारा किए जाने वाले अंग-भंग के वीभत्स कार्य यूरोपीय भावना को बहुत भीषण मालूम होते हैं। 'मैंचेस्टर शांति समाज' के एक मंत्री द्वारा कैंटन के घरों पर फेंके गए जलते गोलों, अथवा किसी फ्रांसीसी मार्शल द्वारा गुफा में बंद अरबों के जिंदा भून दिए जाने, या किसी कूढ़ मगज फौजी अदालत द्वारा 'नौ दुम की बिल्ली' नाम के कोड़े से अंगरेज सिपाहियों की जीते जी चमड़ी उधेड़ दिए जाने, या ब्रिटेन के जेल-सदृश उपनिवेशों में प्रयोग में लाए जाने वाले ऐसे ही किसी अन्य मनुष्य-उध्दारक यंत्र के इस्तेमाल की तुलना में भी सिपाहियों के ये कार्य उन्हें कहीं अधिक भीषण लगते हैं। किसी भी अन्य वस्तु की तरह क्रूरता का अपना फैशन होता है, जो काल और देश के अनुसार बदलता रहता है। प्रवीण विद्वान सीजर स्पष्ट बताता है कि किस प्रकार उसने सहस्रों गॉल सैनिकों के दाहिने हाथ काट लेने की आज्ञा दी थी। इस कर्म में नेपोलियन को भी लज्जा आती। अपनी फ्रंच रेजीमेंटों को, जिन पर प्रजातंत्रवादी होने का संदेह किया जाता था, वह सांटों डोमिन्गो भेजना अधिक पसंद करता था, जिससे कि वे प्लेग की चपेट में और काली जातियों के हाथ में पड़कर वहां मर जाएं। सिपाहियों द्वारा किए गए वीभत्स अंग-भंग हमें ईसाई बाईजैंटियन साम्राज्य की करतूतों, सम्राट चार्ल्स पंचम के फौजदारी कानून के फतवों, अथवा राजद्रोह के अपराध के लिए अंगरेजों द्वारा दी जाने वाली उन सजाओं की याद दिलाते हैं, जिनका जज ब्लैकस्टोन की लेखनी से किया गया वर्णन अब भी उपलब्ध है। हिंदुओं कोजिन्हें उनके धर्म ने आत्म-यंत्रणा की कला में विशेष पटु बना दिया हैअपनी नस्ल और धर्म के शत्रुओं पर ढाए गए ये अत्याचार सर्वथा स्वाभाविक लगते हैं; और, उन अंगरेजों को तोजो कुछ ही वर्ष पहले तक जगन्नाथ के रथ उत्सव से कर उगाहते थे और क्रूरता के एक धर्म की रक्तरंजित विधियों की सुरक्षा और सहायता करते थेवे इससे भी अधिक स्वाभाविक मालूम होने चाहिए।
'बेहूदा खबीस टाइम्सकौवेट इसे इसी नाम से पुकारा करता थाका बौखलाहट भरा प्रलाप, मोजार्ट के किसी गीतिनाटय के एक क्रुध्द पात्र जैसा उसका अभिनय और फिर प्रतिशोध के आक्रोश से अपनी खोपड़ी के सारे बालों का नोच डालनायह सब एकदम मूर्खतापूर्ण लगता यदि इस दुखांत नाटक की करुणा के अंदर से भी उसके प्रहसन की चालाकियां साफ-साफ न झलकती होतीं। मोजार्ट के गीतिनाटय का कु्रध्द पात्र इसी तरह पहले शत्रु को फांसी देने, फिर भूनने, फिर काटने, फिर कबाब बनाने, और फिर जीते जी उसकी खाल उधेड़ने के विचार को अत्यंत मधुर संगीत के द्वारा व्यक्त करता है। लंदन टाइम्स अपना पार्ट अदा करने में आवश्यकता से अधिक अतिरंजना से काम लेता हैऔर ऐसा वह केवल भय के कारण नहीं करता। प्रहसन के लिए वह एक ऐसा विषय बताता है जिसे मोलियर तक की नजरें न देख सकी थींवह प्रतिशोध के मुखौटा नाटय की रचना करता है। वह जो चाहता है वह केवल यह है कि सरकार का खजाना बढ़ जाए और सरकार के चेहरे पर नकाब पड़ा रहे। दिल्ली चूंकि महज हवा के झोंकों के सामने भरभरा कर उस तरह नहीं गिर पड़ी है जिस तरह जैरिको की दीवारें गिर पड़ी थीं, इसलिए जान बुल के लिए जरूरी है कि उसके कानों में प्रतिशोध की कर्णभेदी आवाजें गूंजती रहें और उनकी वजह से वह यह भूल जाए कि जो बुराई हुई है और उसने जो इतना विराट रूप ग्रहण कर लिया है, उसकी सारी जिम्मेदारी स्वयं उसकी अपनी सरकार पर ही है।
(26 सितंबर 1857 के न्यूयार्क डेली ट्रिब्यून, अंक 5119, में प्रकाशित) 






26/11 के सबकः आतंकवादी खबरों के उत्पादक थिंक टैंक

मुम्बई की 26/11 की घटना के बाद से आतंकवाद पर मीडिया में काफी चर्चा हुई है। इस चर्चा के केन्द्र में आमतौर आतंकी कसाब पर चल रहा मुकदमा सुर्खियों में रहा है। यह कवरेज कैसे आया और अतिरंजित ढ़ंग  से क्यों आया ? इस पर कभी मीडिया के लोगों का ध्यान नहीं गया। इस प्रक्रिया में आतंकियों के प्रति सतर्कता और सावधानी के सवालों पर कम ध्यान दिया गया ।

     पिछले दिनों अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा के आने के साथ यह अनुभूति पैदा करने की कोशिश की गई थी कि मुंबई में आतंकी हमला हो सकता है। लेकिन सामान्यतौर पर मुम्बई में आतंकी हमला कोई समस्या नहीं रहा है। इसी तरह अन्य महानगरों में भी आतंकवाद समस्या नहीं है।
      केन्द्र सरकार बड़े उत्सवधर्मी ढ़ंग से सतर्कता वार्ता जारी करती रहती है ,आज भी जारी की गई है। सवाल उठता है भारत के लिए क्या आतंकवाद सचमुच में एक बड़ी समस्या है ? यदि ऐसा है तो विगत एक वर्ष में सारी दुनिया में आतंकी हमले में कितने हिन्दुस्तानी मारे गए ? काश्मीर को छोड़कर देश के अन्य भागों में कितने लोग विगत एक साल में आतंकी हमले में मारे गए ?
    इसी तरह हम अमेरिकी मीडिया में आतंकवाद के खतरे के बारे में खूब हंगामा देखते हैं। लेकिन सच क्या है ? कितने अमेरिकी सारी दुनिया में आतंकी हमलों में मारे गए ? गूगल पर सर्च करने जाओगे तो इसके उत्साहजनक परिणाम नहीं मिलेंगे। अमेरिका के गृहमंत्रालय के अनुसार 2009 में सारी दुनिया में 9 अमेरिकी मारे गए। कोई भारतीय विगत एक साल में आतंकियों के हाथों नहीं मारा गया।
   भारत में आतंकवाद और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरे का भोंपू की तरह प्रचार करने वाले मीडिया,सरकारी तंत्र और रिसर्च संगठनों के बीच की सांठगांठ को इसी प्रसंग में समझना बेहतर होगा। अमेरिका स्थित पेनसिलवेनिया विश्वविद्यालय के थिंक टैंक एण्ड सिविल सोसायटी प्रोग्राम के तहत आंकड़े एकत्र किए हैं। मसलन अमेरिका में2000 थिंक टैंक संगठन हैं। भारत में 422 थिंक टैंक संगठन हैं। यानी सारी दुनिया में अमेरिका के बाद दूसरा नम्बर हमारे देश के थिंक टैंक संगठनों का है। 422 संगठनों में से 63 सुरक्षा संबंधी रिसर्च और विदेशनीति पर काम कर रहे हैं। इन्हें विश्व के बड़े शस्त्र निर्माताओं से सालाना मोटा फंड सप्लाई किया जाता है। इन संगठनों में सैन्य-पुलिस के बड़े अफसरों के साथ भू.पू.राजनयिक भी काम कर रहे हैं। ये संगठन मूलतः शस्त्र उद्योग के जनसंपर्क फोरम की तरह काम करते हैं। ये लोग फेक आतंकी खबरें बनाते हैं और फिर उन्हें मीडिया और गुप्तचर एजेंसियों के जरिए प्रचारित करते हैं। वे आदिवासी ,दलितों और अल्पसंख्यकों में विस्फोटक सामग्री का प्रचार और इस्तेमाल करते हैं, फेक धमाके कराते है,या नियोजित धमाके कराते हैं जिससे अत्याधुनिक शस्त्रों की खरीद को वैधता प्रदान की जा सके।
    हाल के दिनों में हिन्दू आतंक की अधिकांश खबरें इसी लॉबी के द्वारा तैयार करके प्रसारित करायी गयी हैं। इस समूची प्रक्रिया में पहला लाभ यह हुआ है कि आरएसएस को बदनाम करने का मौका मिला है। दूसरा लाभ यह मिला है कि इन थिंक टैंक के थिंकरों को अपने निजी हितों का विस्तार करने का अवसर मिला है। इसके बदले में  बड़े अफसरों को समृद्ध देशों में नागरिकता,मकान,बैंक में धन,उनके बच्चों को विदेशों में पढ़ाई की शानदार व्यवस्था करा दी जाती है।
      उल्लेखनीय है भारत को दुनिया का सबसे बड़ा शस्त्र खरीददार माना जाता है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार भारत ने 2000-07 के बीच में सारी दुनिया में हथियार खरीददारों में दूसरा स्थान पाया है। सारी दुनिया के सकल शस्त्रों का 7.5 फीसदी हथियार भारत ने खरीदे हैं। चीन,रूस और अमेरिका के बाद हथियारों पर खर्च करने वाला चौथे नम्बर का देश है।
    सारी दुनिया में 1,130 कंपनियां हथियार बनाने का काम करती हैं। इनमें से 90 फीसदी  अमेरिका, ब्रिटेन,रूस, चीन और फ्रांस की हैं। ये परंपरागत हथियार बनाती हैं। जबकि अफ्रीका,एशिया,लैटिन अमेरिका,मध्यपूर्व में सारी दुनिया के 51 फीसदी भारी हथियार लगे हुए हैं।
      ग्लोबल पीस इंडेक्स के अनुसार भारत का स्थान सबसे नीचे 122 वें नम्बर पर 2.422 स्कोर के साथ है। हिन्दुत्वादी ताकतों का मीडिया,नौकरशाही,शासकों आदि में जिस तरह का व्यापक प्रभाव है उसके चलते यह भी संभावना व्यक्त की जा रही है कि थिंक टैंकों के एक हिस्से के साथ हिन्दुत्ववादियों की सांठगांठ भी हो सकती है। लेकिन भारत में शस्त्र उद्योग और उसके थिंक टैंक संगठन जिस तरह की आबोहवा बनाने में लगे हैं उससे भारत में लोकतंत्र के लिए सीधे खतरा पैदा हो गया है।




गुरुवार, 25 नवंबर 2010

बिहार के परिणाम- धुर दक्षिणपंथी विकास मॉडल का नया उभार

  बिहार विधानसभा के चुनाव परिणाम आ चुके हैं। इन परिणामों का भारत की भावी राजनीति के लिए बड़ा महत्व है। इन परिणामों ने पश्चिम बंगाल के वामनेताओं की बेचैनी बढ़ा दी है।  बिहार में नीतीशकुमार की जीत का प्रधान कारण है शांतिपूर्ण ढ़ंग से चुनावों का होना। पश्चिम बंगाल में भी यदि हिंसारहित चुनाव होते हैं तो वाम मोर्चे का आगामी विधानसभा चुनाव जीतना असंभव है। वामनेता इस बात से परेशान हैं कि हिन्दीभाषी उनके साथ नहीं हैं। यहां रहने वाले हिन्दीभाषी अमूमन बिहार और यू.पी. की राजनीति से सीधे प्रभावित होते हैं। मौजूदा रूझान वाममोर्चे के लिए खतरे की सूचना हैं।
क्योंकि बिहार में सभी रंगत के वामदलों की चुनावी एकजुटता असरहीन साबित हुई है। एक अन्य संदेश यह है कि ममता बनर्जी के कद को राहुल गांधी-सोनिया गांधी के जरिए छोटा नहीं किया जा सकता। राहुल-सोनिया का जादू खत्म हो चुका है। 
   बिहार के मुस्लिंम मतदाता केन्द्र सरकार के मुसलमानों के विकास के लिए  कई हजार करोड़ रूपयों के अनेक विकास कार्यक्रमों से एकदम प्रभावित नहीं हुए हैं। यह माना जा रहा है कि पश्चिम बंगाल में मुसलमानों के लिए नौकरियों में आरक्षण करके वाममोर्चा मुसलमानों का दिल जीतने का जो सपना देख रहा है वह शायद पूरा न हो।  मुसलमानों के लिए विशेष आर्थिक पैकेज का कोई लाभ कांग्रेस को बिहार में नहीं मिला है। मुसलमान अभी भी कांग्रेस से नाराज हैं। मुसलमान जिन कारणों से कांग्रेस से नाराज हैं वे पश्चिम बंगाल में वाममोर्चे के साथ जुड़े हैं। अतः यहां ममता के साथ मुसलमानों की सहानुभूति को वामदल तोड़ नहीं पाएंगे।
बिहार के मुस्लिम बहुल इलाकों में 49 सीटें हैं इनमें से 36 पर भाजपा-जदयू का जीतना बड़ी उपलब्धि है। इनमें ज्यादातर सीटें भाजपा को मिली हैं।अब भाजपा मुसलमानों के लिए अछूत पार्टी नहीं है। मुसलमानों में बाबरी मसजिद मसले का कोई महत्व नहीं रह गया है।
    नीतीश सरकार की नक्सलों के प्रति सहानुभूति रही है इसका उन्हें फायदा मिला है। नक्सल प्रभावित इलाकों में 56 में से सत्तारूढ़ मोर्चे को 41 सीटें मिली हैं।इसबार नक्सलों ने वहां चुनाव बहिष्कार का नारा नहीं दिया था। इसी तरह यादव बहुल 36 सीटों में से सत्तारूढ़ मोर्चे को 29सीटें मिली हैं। जबकि शहरी इलाकों की 42 सीटों में से 37 सीटें सत्तारूढ़ मोर्चा जीता है।
    ममता बनर्जी और नीतीश कुमार में कई समानताएं हैं। पहली समानता यह है कि दोनों ने वोटर के मैदान में उन लोगों को बड़ी संख्या में उतारा है जो अभी तक वोट नहीं दे पाते थे। दूसरा साम्य पिछड़ेपन के विरोध को लेकर है। ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल के पिछड़ेपन को वैसे ही मुद्दा बनाया हुआ है जैसा नीतीश ने बिहार में बनाया है। यहां भाजपा की आंतरिक सहानुभूति ममता बनर्जी के साथ है और भाजपा के पक्ष में आम जनता के बढ़ते रूझान का पश्चिम बंगाल में वामविरोधी वोटों को एकजुट करने में निश्चित असर होगा। इन सब कारणों से वामनेताओं की बेचैनी बढ़ गयी है।
बिहार के इसबार के चुनाव को नए ढ़ंग से देखें तो बेहतर निष्कर्ष निकाल सकते हैं।यह राष्ट्रीय राजनीति में भावी परिवर्तनों का संकेत है। देश की राजनीति और भी ज्यादा दक्षिणपंथी शक्ल लेगी। मनमोहन सिंह खैरात में दक्षिणपंथ को सत्ता सौंपकर जाएंगे। जैसे पहले अटलजी को कांग्रेस सौंपकर गयी थी । तीसरा मोर्चा खत्म हो गया है उसके आधार पर कोई राजनीति संभव नहीं है। वाम को अपने एजेण्डे पर नए सिरे से सोचना होगा। वाम के एजेण्डे को जनता सुन नहीं रही है। राजनीति में दक्षिणपंथी दबाब और बढ़ेंगे। नव्य उदारतावाद की गति तेज होगी।
    नीतीश कुमार की जीत को मीडिया अतिरंजित ढ़ंग से पढ़ रहा है। बिहार में अव्यवस्था और जातिवाद बने हुए हैं। अंतर यह है कि एनडीए ने जातीय समीकरण को प्रचार में छिपाया है विकास को सामने रखा है।  भारत के जातीय समीकरण को नष्ट करना किसी के वश का काम नहीं है। विकास का नारा सत्तारूढ़ मोर्चे की मीडिया प्रबंधन कला की देन है। इसका जमीनी हकीकत से कम संबंध है। लेकिन एक अच्छी बात हुई है कि बिहार में चुनाव शांतिमय रहा और विकास के नाम पर  हुआ।
     विकास के नाम पर चुनाव होना और विकास होना दो अलग-अलग चीजें हैं। नीतीश कुमार की विकासपुरूष की इमेज का बिहार की जमीनी हकीकत से कम संबंध है। यह मीडिया प्रबंधन और प्रौपेगैण्डा की देन है। एक और सवाल उठा है क्या विकास के नाम पर विचारधारा के सवालों को दरकिनार कर दिया जाए ?नीतीश का मॉडल है विचारधाराहीन विकास का। यह किसका मॉडल है ? लोहिया-जयप्रकाश नारायण ने कभी विचारधाराहीन विकास की बातें नहीं की थीं।
     विचारधाराहीन विकास का मॉडल वस्तुतः नव्य उदार आर्थिक नीतियों का मनमोहन मॉडल है। जिसे नीतीश एंड कंपनी विकास कह रहे हैं वह तो मनमोहन की लाइन है। जिसे इन दिनों सभी नव्य उदारपंथी बोल रहे हैं। नीतीश के मॉडल में मनमोहन मॉडल से भिन्न क्या है ? एक बड़ी भिन्नता है नीतीश कुमार धुर दक्षिणपंथी भाजपा के साथ मिलकर यह मॉडल लागू करने जा रहे हैं और इसमें किसानों की तबाही खूब होगी। उनकी जीत इस बात की गारंटी नहीं है कि किसान सुरक्षित रहेंगे। बिहार में जातिवाद प्रधान समस्या नहीं है। किसानों की बदहाली प्रधान समस्या है। देखना होगा बिहार में किसानों की बदहाली बढ़ती है या घटती है ? विचारधाराहीन विकास से किसान बचता नहीं है। आंध्र,महाराष्ट्र आदि इसके प्रत्यक्ष प्रमाण हैं।




                

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मेरा बचपन- माँ के दुख और हम

         माँ के सुख से ज्यादा मूल्यवान हैं माँ के दुख।मैंने अपनी आँखों से उन दुखों को देखा है,दुखों में उसे तिल-तिलकर गलते हुए देखा है।वे क...