शनिवार, 5 मार्च 2011

चे ग्वेरा की मौत पर फिदेल कास्त्रो-2-


    मैं आपसे कह रहा था कि हम इस निर्णय पर पहुंच चुके हैं। हम अपने निष्कर्ष पर किन्हीं एकांगी तथ्यों, एकांगी शब्दों या एकांगी फोटोग्राफों के माध्यम से नहीं पहुंचे हैं। फोटोग्राफ कृत्रिम हो सकते हैं। लेकिन इन फोटोग्राफों को सरकार ने नहीं जारी किया है। ये चित्र बोलेविया में मौजूद पत्रकारों ने लिए हैं। उस जगह से ये चित्र लिए गए हैं, जहां शरीर रखा गया था। इसलिए इन फोटोग्राफों के कृत्रिम होने का सवाल ही नहीं उठता। यह मानना ठीक नहीं कि ये फोटोग्राफ झूठे हैं।
इसके अलावा भी कई अन्य मान्यताएं हैं, जैसे यह दरशाया गया शरीर मोम का पुतला हो सकता है, यह कहना अत्यधिक असंभाव्य है, और ऐसा करना संभव भी नहीं है।
इन सभी तथ्यों पर एक-एक करके गौर किया गया है, और सभी तथ्यों को स्वतंत्र रूप से पर्यवेक्षित भी किया गया है। पाया यह गया है कि व्यक्त की गई भिन्न-भिन्न संभावनाएं सर्वोच्च रूप से असंभाव्य हैं। इन सभी बातों पर, खबरों और अन्य माध्यमों से पाए गए तथ्यों की शृंखला से विद्यमान संबंधों के आधार पर जांचा गया है।
उदाहरणस्वरूप, हमने पाया कि दिखाई गई हस्तलिपि चे की हस्तलिपि है। इससे इनकार नहीं किया जा सकता है कि यह उनकी हस्तलिपि नहीं है, और मेरे खयाल से जिसका अनुकरण करना असंभाव्य है। इस सबसे अलग चे का व्यक्तित्व बहुत ही भिन्न किस्म का था, और उनकी शैली का अनुकरण करना तो बिलकुल ही असंभाव्य है। वास्तव में कहा जाए तो यह करना किसी भी व्यक्ति के लिए असंभव है। यहां तक उनके लिए भी, जो उन्हें बहुत अच्छी तरह से जानते थे, वर्षों तक साथ रहे, क्योंकि चे के हर वाक्य में उनकी 'पोजीशन' व्यक्त होती है। फिर उनके लिखने की शैली, अभिव्यक्ति का तरीका, प्रत्येक विवरण के प्रति उनकी प्रतिक्रिया, और भी ढेरों चीजें, और अंतत: उनके चारित्रिक गुणों की शृंखला, जो कि उनके हस्तलेख से नहीं, बल्कि लिखे गए मसौदे, शैली और प्रतिक्रिया से परिलक्षित होता है। इस सबकी अनुकृति करना तो अत्यधिक असंभाव्य है।
स्वाभाविक रूप से मात्र डायरी एक लड़ाके की मृत्यु को प्रमाणित करने के लिए पर्याप्त नहीं है। डायरी राह चलते खो सकती है, झोले से गिर सकती है या हो सकता है कि कहीं सुरक्षित रखने के लिए छोड़ी गई हो। यद्यपि यह डायरी 7 अक्टूबर तक की ही है, यानी उस अंतिम युध्द की पूर्व संध्या तक। उस युध्द की पूर्व संध्या तक, जिसके बारे में माना जाता है कि इसी युध्द में उनकी हत्या हुई। इस डायरी को चे ने अंतिम युध्द के कुछ घंटे पहले तक लिखा था। यह निर्विवाद सत्यहै। इसके अलावा यदि मान भी लिया जाए कि डायरी खो गई थी, तो यह 8 अक्टूबर के आसपास ही खोई जो युध्द का दिन था।
इसके अलावा तथ्यों की एक अन्य शृंखला भी सामने है। विश्व के विभिन्न समाचारपत्रों में इस तरह के चित्र प्रकाशित हुए हैं, जिनसे पता चलता है कि चे बोलेविया में थे। कुछ समाचारपत्रों में इस तरह के चित्रों को प्रकाशित किया गया है (फोटोग्राफ दिखाते हैं)। इसमें वे अपने साथ एक झोला लिए हुए हैं, रास्ते में उन्होंने स्वयं को सामान से लैस किया। इस सामान में एम-12 रायफल भी थी। इसके अलावा एक चित्र और है, जिसमें वह एक खच्चर पर बैठे हैं (चित्र दिखाते हैं)। और यह भी गैर प्रश्नांकित रूप से ऊर्ध्व मुद्रा का चित्र है। संभवत: चित्र में उपस्थित व्यक्ति से वह किसी विषय पर कुछ हंसी-मजाक कर रहे हैं। इसके अलावा कई अन्य चित्र भी प्राप्त हुए हैं। बहुत से चित्रों को तो शत्रुओं द्वारा 'सीज' कर दिया गया है। दूसरे शब्दों में, इस विषय में ढेरों संकेत हैं, जिनमें सामान्य तौर पर स्वीकार भी किया जाता है कि वे बोलेविया में थे।
तथ्य यह भी बताते हैं कि हालिया सप्ताहों में बोलेविया में गुरिल्लाओं की जोरदार सरगर्मी विद्यमान थीं, जिसके पीछे भारी संख्या में फौजी टुकड़ियां संघर्षरत थीं। इन टुकड़ियों में वे इकाइयां खास तौर पर शामिल थीं जिनको साम्राज्यवादियों ने गुरिल्लाओं के विरुध्द तैयार किया था। ये कुछ तथ्य हैं, जिनको चे की मृत्यु संबंधी सूचनाओं पर विचार करते समय विश्लेषित करना चाहिए।
हमारी अपनी राय में डायरी सबसे अधिक प्रमाणिक तथ्य है और वहां से प्राप्त चित्रों की प्रामाणिकता भी समान ही है। हमारे नजरिए से यह बिलकुल ही असंभाव्य है कि इन सारे तथ्यों को कृत्रिम रूप से गढ़ा गया हो या इनके साथ तकनीकी छेड़छाड़ की गई हो। सभी तथ्यों का विश्लेषण, सभी खबरें, सभी पहलू, डायरी, प्राप्त सूचनाएं, सूचनाओं (खबरों) के स्रोत और तथ्यों की एक विस्तृत शृंखला देखने के बाद हमारा निष्कर्ष है कि इन सबूतों को गढ़ना बिलकुल भी असंभाव्य है।
लेकिन थोड़ी और गहराई से छानबीन करें। बोलेवियाई सत्ता में भी कई अंतर्विराध विद्यमान हैं। कई प्रतिस्पर्ध्दी आमने-सामने हैं। ढेरों समस्याएं विद्यमान हैं। और ऐसी स्थिति में यह बिलकुल भी असंभाव्य है कि उक्त सत्ता और वहां विद्यमान विभिन्न गुटों के बीच इस झूठ पर आम सहमति या आम समझौता हो पाए। वे वैसे भी जारी की गई खबरों के माध्यम से, घटनाक्रम की जानकारी के विषय में, मारे गए गुरिल्लाओं के शवों को न प्रदर्शित करके, अब तक बहुत झूठ बोल चुके हैं। प्रतिक्रियावादी शासन तंत्र की आदत ही होती है कि वह झूठी खबरें
दे, और यह कोई बड़ी बात नहीं है। यह एक ऐसी बात है, जिस पर अब हमें विश्वास कर लेना चाहिए।
दूसरे, तकनीकी दृष्टि से (इस झूठ को गढ़ने के लिए) उन्हें जिन स्रोतों और अनुभव की आवश्यकता होती है, वह उनके पास नहीं हैं।
तीसरे, और वह बहुत ही स्वाभाविक प्रश्न है कि वह सत्ता तंत्र इस तरह की खबरों को क्यों गढ़ेगा? इस तरह की खबरों को गढ़कर उसे क्या हासिल हो जाने वाला है, जबकि दस, पंद्रह या बीस दिनों में यह सचाई सामने ही जाने वाली है?
इसके बजाए प्रतीत यह हो रहा है कि वे यह सब बहुत सावधानीपूर्वक कर रहे थे। केवल दस या बारह दिनों पूर्व ही उन्होंने इसी तरह की रिपोर्ट जारी की थी। लेकिन कुछ ही घंटों के बाद अगले दिन उन्होंने इससे तीव्रतापूर्वक इनकार किया। लेकिन यह ताजी खबर शीघ्रतापूर्वक फैल गई, और जिसे परिमार्जित करने के लिए उन लोगों ने वर्गीकृत बयान जारी किए। पहली अफवाह कई पत्रकारों की ओर से आई। इसके अलावा वे यह कोशिश कर रहे थे कि कुछ सबूतों को पाया जाए, तब वे बिना किसी डर के या गलती के आधिकारिक बयान जारी कर सकें। हमने इन सारी बातों पर गौर किया है।
हमको प्राप्त खबरों को विश्लेषित करने का कुछ अनुभव है। हम सभी रोज ढेरों 'डिस्पैचों' को पढ़ते हैं, और हमें लगभग हर सरकार की शैली और चरित्र को आकलित करने का कुछ अनुभव प्राप्त है, उन व्यक्तियों का भी जो सत्ता में हैं। इन सभी चीजों और तथ्यों ने हमें खबर की सत्यता आकलित करने में मदद दी है। वे बहुत सावधानीपूर्वक कार्य करते हुए प्रतीत होते हैं।
इसमें कोई शक नहीं कि बोलेवियाई सरकार का व्यवहार अल्पबुध्दि और मूर्खतापूर्ण है। लेकिन इस पर भी केवल जड़ बुध्दि नहीं, बल्कि वर्तमान में मौजूद सभी जगहों की सरकारों में सबसे मूर्ख सरकार ही ऐसा करने की सोच सकती है और इसे प्रमाणित करने का प्रयास करेगी। ऐसा मानना बिलकुल ही असंवेदनशीलता ही होगी।
इसमें भी कोई शक नहीं कि बोलेविया में गुरिल्ला आंदोलन एक ऐसे दौर में था, जिस पर गुरिल्लाओं का अस्तित्व निर्भर करता था। आधारभूत रूप से उनकी क्षमताओं पर और उनके संसाधनों पर भी निर्भर करता था। यह कोई ऐसा अवसर नहीं था कि जहां संकट अवश्यंभावी ही था। ऐसी स्थिति में सरकार के झूठ ने आठ, दस दिन या एक सप्ताह ले लिया, ऐसी बात भी नहीं थी।
गुरिल्ला इस अवधि मेंइस अवधि के विषय में हम जानते हैं, आधारभूत रूप से अपनी निजी शक्तियों पर निर्भर थे। और गुरिल्ला लड़ाकों ने जब इन खबरों
को सुना, तो वे हंसे। तात्पर्य यह कि ये खबरें गुरिल्लाओं पर कोई प्रभाव नहीं डाल पाईं। इसके विपरीत वही लोग प्रभावित हुए, तुरंत प्रभावित हुए। सच मायनों में तो इस तरह की सरकारों के विश्वास और प्रतिष्ठा पर ही गंभीर आंच आई।
मैंने स्वयं से ही तर्क किया कि इस तरह की खबरों को गढ़ना क्या कोई तार्किकता रखता है। मैंने यह मानने का प्रयास किया कि हो सकता है कि इस तरह की खबरों को गढ़ने के पीछे कोई उद्देश्य हो, लेकिन कोई उद्देश्य नहीं दिखलाई पड़ता है।
डायरी में दर्ज विवरण, डायरी में दर्ज भूस्थिति, फोटोग्राफ जो वहां की सरकार द्वारा उपलब्ध कराए गए थे, इन सभी के आधार पर हम यह निष्कर्ष निकालने में सक्षम हो पाए कि प्राप्त खबरें सच हैं।
तार्किक रूप से यह किसी भी मनुष्य की स्वाभाविक प्रकृति होती है कि वह जिस व्यक्ति से गहराई से प्रेम करता है या उससे लगाव महसूस करता है, उसके विषय में बुरी खबरों को स्वीकार नहीं कर पाता है। सर्वोच्च स्तर पर यह हमारे साथ पहली बार हो रहा है। लोगों के मस्तिष्क में, विश्व के सारे क्रांतिकारियों के मस्तिष्क में भी, यही प्रवृत्ति विद्यमान है कि इस तरह की आने वाली खबरों को अस्वीकृत कर दे।
इसके अलावा सरकार की निम्नतम विश्वसनीयता, प्रतिष्ठा की अत्यधिक कमी ने खबरों की सत्यता के विषय में संदेह उत्पन्न किया। भावुकता की सर्वोच्चता ने भी इन खबरों को अस्वीकृत करने में योगदान दिया।
यह बोलेवियाई सरकार इतनी अविश्वसनीय है कि यांकी साम्राज्यवादियों के साथ इसकी सभी सहयोगी सरकारों ने खबरों के आने के बाद कहा कि वे इन खबरों के बारे में आश्वस्त नहीं हैं या वे इन पर विश्वास नहीं कर पा रही हैं, कहकर एक सावधानी भरा रुख अख्तियार किया। और बाद में स्वाभाविक रूप से उन लोगों ने भिन्न-भिन्न दृष्टिकोणों को अपनाना शुरू किया, वह भी तब जब उनके हाथ में इस तरह के कुछ सबूत आए जिससे वे खबरों की सत्यता के बारे में सुनिश्चित हो सकें। लेकिन ध्यान देने की बात है कि जब तक उनके हाथ सबूत नहीं आए, तब तक उन्होंने न तो बोलेविया से आने वाली खबरों पर विश्वास ही किया, न ही इस विषय में उन्होंने कुछ कहा ही।
लेकिन विवाद और संशय तो अभी भी विद्यमान हैखास तौर परइसका रिश्ता मृत्यु की तथ्यात्मकता से नहीं, बल्कि इस बात पर है कि उनकी मृत्यु कैसे हुई, उनकी मृत्यु के साथ जुड़ा घटनाक्रम क्या है।
हममें से जो लोग अर्नेस्टो चे ग्वेरा को अच्छी तरह से जानते हैं, और जानते हैं
कि मैंने अर्नेस्टो चे ग्वेरा के बारे में भूतकाल का इस्तेमाल क्यों नहीं किया, इसलिए क्योंकि उसके साथ भूतकाल का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। वह बहुत अनुभवी, चरित्रवान और धैर्यवान व्यक्ति थे। यद्यपि यह कल्पना करना बहुत ही कठिन है कि उनके जैसे कद, प्रतिष्ठा वाले व्यक्ति को गुरिल्लाओं के दल और सैन्य टुकड़ी के बीच संघर्ष में मार दिया जाए। यह जितना असंभव दिखता है उतना ही अतार्किक भी है। इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं है। हम लोग जितना उन्हें जानते हैं, उतने ही परिचय में वह असाधारण साहस के धनी साबित हुए थे। कितना भी बड़ा खतरा सामने हो, उसका साहस के साथ मुकाबला करने के लिए उध्दत, किसी भी कठिनाई या खतरनाक स्थिति में बड़े से बड़ा खतरनाक या कठिनतम कार्य करने के लिए उध्दत। हमारे संघर्ष के दौरान उन्होंने अपने इन गुणों को बखूबी प्रदर्शित किया था। इसी तरह की शौर्यता के साथ उन्होंने सिएरा मस्चेरा और लास विलास में कार्य किया था।
कई बार तो उनकी सुरक्षा के लिए हमें कई तरह के कदम उठाने पड़ते थे। एक से अधिक बार ऐसा हुआ कि वह जो कार्रवाई करना चाहते थे, उनकी सुरक्षा के कारणों से हम यह कार्रवाई से असहमत होते थे। लेकिन बाद में उनकी संघर्ष क्षमता की तारीफ करनी पड़ती थी। क्रांति के दौरान उन्होंने ऐसे ही अनेक साहसिक कारनामों को अंजाम दिया था, और ये सारे मिशन गहरे रणनीतिक महत्व के थे। लेकिन इन सारी स्थितियों में हमारा पहला उद्देश्य यही होता था कि जहां क्षति होने की संभावना हो, या जो मिशन कम रणनीतिक महत्व के हों, हम उन्हें वहां खतरा उठाने से रोकें। यही वे थोड़े-बहुत क्षण हैं, जिनके बीच उनको एक हमलावर दस्ते का कमांडर बनाया गया और नेतृत्व सौंपा गया। लास विल्लास प्रांत को कब्जे में लेने के जैसा असंभाव्य कार्य उन्होंने असाधारण शौर्य के साथ किया। जो उनको जानते हैं, वे जानते हैं कि उन्होंने कितने असाधारण शौर्य के कार्यों को अंजाम दिया।
हमें कहना चाहिए कि हम उनकी ऊर्जा से सदैव चिंतित रहते थे, और अपनी इसी इच्छाशक्ति और संकल्प से वे मृत्यु के क्षणों को भी पीछे धकेलने में सक्षम रहे। कोई भी इस बात पर निश्चिंत नहीं हो सकता कि उन्होंने सावधानी के अल्पतम उपायों को भी स्वीकार किया हो। कई बार तो वे खोजी दल (स्काउटिंग पार्टिज) के मुखिया के तौर पर भी आगे बढ़ गए।
वहीं दूसरी ओर, वे अपने हाथ में लिए गए मिशन की महत्ता के विषय में भी अत्यधिकसर्वोच्च स्तर पर सावधान रहते थे। इसी कारण यह संभव था कि वे जिस मिशन को अपने हाथों में लेते थे, उसे पूरा ही करते थे। यह मानीयता का ऐसा गुण है जिसके समानांतर शायद ही कोई उदाहरण हो।
हम उन्हें किसी अग्रदूत की जगह या किसी अन्य रूप के बजाए, एक निर्माता के रूप में देखना चाहते हैं, लोगों की महान विजयों के निर्माता के रूप में। परिस्थितियों के प्रति प्रतिक्रिया के कारण दुर्भाग्यवश ऐसे मिजाज, व्यक्तित्व और चरित्र के व्यक्ति को लोग विजयों के निर्माता के बजाए अग्रदूत बनाना ज्यादा पसंद करते हैं। वैसे अग्रदूत स्वभावत: विजयों का निर्माता भी होता है, विजयों का महान निर्माता!
चे इस सबसे बहुत अधिक व्यग्र होंगे। उनके प्रति अत्यधिक लगाव रखने वाले हम सभी व्यक्तियों के लिए यह समझना बहुत कठिन है कि स्वयं से त्यागपत्र देकर वे एक अग्रदूत बने। यह एक ऐसा उदाहरण है जिसकी हम सब पर अमिट छाप है, और बेहिचक यह एक बहुत महान उदाहरण है। उनके जैसे एक चरित्र, एक मस्तिष्क और पूर्ण मानवीय व्यक्तित्व के भौतिक रूप से नष्ट (मृत्यु) होने से कोई भी व्यक्ति दु:खी होगा। लेकिन जैसा मैंने पहले कहा कि किसी को इस बात पर विस्मय नहीं होना चाहिए कि उस गुरिल्ला संघर्ष में शहीद होने वालों में सबसे पहले वही होंगे। यह अपने आप में एक चमत्कार की भांति भले ही प्रतीत हो, लेकिन यदि सचाई में इसके विपरीत कुछ भी हुआ होता तो वह जरूर विस्मयजनक होता। उन्होंने अनेक बार खतरों का सामना किया। कई बार उन परिस्थितियों में भी जब संघर्ष में बिलकुल गणितीय नियम लागू होते हैं। यह ऐसा कुछ नहीं था, जिसके बारे में हम सोचते हों कि ऐसा कभी नहीं होगा। हमने इन सभी स्थितियों का सामान्य रूप से परीक्षण किया है।
इसलिए इस अवसर की पृष्ठभूमि क्या है, संघर्ष की कारक परिस्थितियां क्या थीं, जिनमें शत्रुओं को भारी पैमाने पर एकीकृत होने का अवसर मिला, और वे उनके (चे के) विरुध्द भारी संख्या में फौजों को तैनात कर सकें?
उदाहरण के लिए यहां, हमारे पास कुछ तथ्य हैं, जो इस स्थिति की पृष्ठभूमि की व्याख्या करने में कुछ मदद कर सकते हैं। हम उन प्रश्नों का कोई श्रेणीबध्द जवाब नहीं दे सकते हैं कि कब किसके द्वारा दी गई सूचना पर निर्णय कर सकते हैं कि हम कौन सी सूचनाओं को एकत्र करने, चयन करने और उनका परीक्षण करने में सक्षम हुए। सही मायनों में यह प्राप्त खबरों और डिस्पैचों के समुद्र से चयन करना था, और हम उसमें सफल हुए। उदाहरण के लिए 27 अक्टूबर का डिस्पैच यही है :
एक उच्च स्तरीय सैन्य सूत्र ने आज इस बात की पुष्टि की कि बोलेवियाई सेना पूर्णरूप से सहमत है कि उसने अर्जेंटीना-क्यूबाई क्रांतिकारी 'चे' ग्वेरा को यहां से 128 किलोमाटर दूर एक जंगल में घेर लिया है।
स्रोत ने इस विषय में और अधिक विवरण देने से इनकार कर दिया। लेकिन उन्होंने आज शाम एसोशिएट प्रेस के सामने यह रहस्योद्धाटन किया था कि पिछले कुछ दिनों से घने जंगलों में फौजें एक घातक और महत्वपूर्ण संघर्ष में मुब्लता हैं।
जबकि जंगल में अभियान चलाने में सक्षम यंत्रों से लैस दूसरी 800 टुकड़ियां भी इसी अभियान के लिए सांताक्रूज शहर से आगे बढ़ गई हैं।
इसी शहर में रीगिस डेब्रेए पर मुकदमा चलाया गया था, अब यह शहर सेना की चौथी बटालियन का मुख्यालय है, वहीं सांताक्रूज अब आठवीं बटालियन का मुख्यालय है।
सैन्य टुकड़ियों का एक दस्ता कामेरी से बुधवार को गया था, और एक दस्ते ने इस जगह को पिछली रात को छोड़ा। एक अन्य टुकड़ी इस दोपहर को रवाना होने वाली है।
विश्वसनीय सैन्य सूत्रों के मुताबिक ग्वेरा की खोज में 1,500 से ज्यादा की टुकड़ियां भाग ले रही हैं।
(क्रमशः)

शुक्रवार, 4 मार्च 2011

न्यू मीडिया के रूप में फेसबुक की चुनौतियां


    हिन्दी फेसबुक पर बड़े पैमाने पर युवालोग लिख रहे हैं। इनमें सुंदर साहित्य,अनुवाद,विमर्श आदि आ रहा है। इसमें आक्रामक और पैना लेखन भी आ रहा है। साथ ही फेसबुक पर बड़े पैमाने पर बेबकूफियां भी हो रही हैं।     
    फेसबुक एक गंभीर मीडियम है इसका समाज की बेहतरी के लिए,ज्ञान के आदान-प्रदान और सांस्कृतिक-राजनीतिकचेतना के निर्माण के लिए इस्तेमाल करना चाहिए। अभी हिन्दी का एक हिस्सा फेसबुक पर अपने सांस्कृतिक पिछड़ेपन की अभिव्यक्ति में लगा है। वे निजी भावों की अभिव्यक्ति से ज्यादा इस मीडियम की भूमिका को नहीं देख पा रहे हैं। एक पंक्ति के लेखन को वे गद्यलेखन के विकास की धुरी मानने के मुगालते में हैं।
    फेसबुक में कुछ भी लिखने की आजादी है ,इसका कुछ बतखोर लाभ ले रहे हैं,यह वैसे ही है जैसे अखबार और पत्रिकाओं का गॉसिप लिखने वाले आनंद लेते हैं। इससे अभिव्यक्ति की शक्ति का विकास नहीं होता। बतखोरी और गॉसिप से मीडियम ताकतवर नहीं बनता। मीडियम ताकतवर तब बनता है जब उस पर आधुनिक विचारों का प्रचार-प्रसार हो।खबरें लिखी जाएं। सामाजिक-राजनीतिक आंदोलनों और समस्याओं के साथ मीडियम जुड़े। हिन्दी में फेसबुक अभी हल्के-फुल्के विचारों और भावों की अभिव्यक्ति के साथ जुड़ा है। कुछ लोगों का मानना है कि यह पासटाइम मीडियम है। वे इसी रूप में उसका इस्तेमाल भी करते हैं। फेसबुक एक सीमा तक ही पासटाइम मीडियम है । लेकिन यह सामाजिक परिवर्तन का भी वाहक बन सकता है।  
    फेसबुक बेहद शक्तिशाली मीडियम है इसकी समग्र शक्ति का इस्तेमाल किया जाना चाहिए। किसी भी मीडिया की शक्ति का आधुनिकयुग में तब ही विकास हुआ है जब उसका राजनीतिक क्षेत्र में इस्तेमाल हुआ है। हिन्दी में ब्लॉगिंग से लेकर फेसबुक तक राजनीतिक विषयों पर कम लिखा जा रहा है। ध्यान  रहे प्रेस ने जब राजनीति की ओर रूख किया था तब ही उसे पहचान मिली थी। यही बात ब्लॉगिंग और फेसबुक पर भी लागू होती है। जो लोग सिर्फ साहित्य,संस्कृति के सवालों पर लिख रहे हैं या सिर्फ कविता,कहानी आदि सर्जनात्मक साहित्य लिख रहे हैं उनकी सुंदर भूमिका है। लेकिन इस माध्यम को अपनी पहचान तब ही मिलेगी जब हिन्दी के श्रेष्ठ ब्लॉगर और फेसबुक लेखक गंभीरता के साथ देश के आर्थिक-राजनीतिक सवालों पर लिखें, किसी न किसी जनांदोलन के साथ जोड़कर लिखें ।खोजी खबरें दें। हिन्दी में अभी जितने भी बड़े ब्लॉगर हैं उनमें से अधिकांश देश ,राज्य और अपने शहर के राजनीतिक हालात पर लिखने से कन्नी काट रहे हैं या उनको राजनीति पर लिखना पसंद नहीं है।
   फेसबुक रीयलटाइम मीडियम होने के कारण विकासमूलक और आंदोलनकारी या वैचारिक क्रांति में बड़ी भूमिका निभा सकता है। समस्या है फेसबुक का पेट भरने की। देखना होगा फेसबुक के मित्र- यूजर किन चीजों से पेट भर रहे हैं। खासकर हिन्दी के फेसबुक मित्र किस तरह की चीजों और विषयों के संचार के लिए इस माध्यम का इस्तेमाल कर रहे हैं ? अभी एक बड़ा हिस्सा गली-चौराहों की पुरानी बातचीत की शैली और अनौपचारिकता को यहां ले आया है। इससे जहां एक ओर पुरानी निजता या प्राइवेसी खत्म हुई है। वहीं दूसरी ओर वर्चुअल संचार में इजाफा हुआ है।
     हमें फेसबुक को शक्तिशाली मीडियम बनाना है तो देश की राजनीति से जोडना होगा। राजनीति से जुडने के बाद ही फेसबुक को हिन्दी में अपनी निजी पहचान मिलेगी और फेसबुक की बतखोरी,गॉसिप और बाजाऱू संस्कृति से आगे जाकर क्या भूमिकाएं हो सकती हैं उनका भी रास्ता खुलेगा।
    ब्लॉगिंग,फेसबुक आदि को प्रभावी बनाने के लिए इन माध्यमों का राजनीति से जुड़ना बेहद जरूरी है। कोई भी मीडिया टिप्पणियों, प्रशंसा,निजी मन की बातें,निजी जीवन की दैनंदिन डायरी, पत्रलेखन से बड़ा नहीं बना, इनसे मीडिया को पहचान नहीं मिलती।
आधुनिककाल की धुरी है राजनीति । आधुनिक साहित्य तब आया जब उसने राजनीति से संबंध जोड़ा। प्रेस को पहचान तब मिली जब उसने राजनीति से संबंध जोड़ा। कोई भी माध्यम हो या जनमाध्यम हो,संचार हो या जनसंचार हो, साहित्य हो या कलाएं हों वे अपनी आधुनिक पहचान राजनीति से जुड़ने के बाद ही बना पाई हैं। फेसबुक आदि के यूजरों को राजनीति से जुड़ना होगा। इसके बिना यह सामाजिक परिवर्तन का मीडियम नहीं बन सकता।





चे ग्वेरा की मौत पर फिदेल कास्त्रो -1-


                       (महान क्रांतिकारी चे ग्वेरा)
बोलेविया में चे की मृत्यु को लेकर आ रही परस्पर अंतर्विरोधी खबरों और सूचनाओं के बीच फिदेल ने 15 अक्टूबर 1967 को क्यूबाई टेलीविजन पर यह भाषण दिया।
आप सभी ने अंदाजा लगा लिया होगा कि (मेरे) इस संबोधन का कारण क्या है। इसका कारण 9 अक्टूबर से बोलेविया से आ रही खबरें हैं। पिछले कुछ दिनों में ये खबरें समाचारपत्रों में प्रकाशित भी हुई हैं।मैं अपनी बात कुछ इस तरह से शुरू करूंगा कि अर्नेस्टो चे ग्वेरा की मृत्यु के संबंध में आ रही खबरों से हम इत्तफाक रखते हैं। यह पीड़ादायक है, लेकिन सच है। वैसे पहले भी कई अवसरों पर इस तरह की खबरें आती रही हैं, लेकिन इस बार यह देखना आसान है कि ये खबर पूर्वोक्त की भांति नहीं हैं।
9 अक्टूबर को तार सेवाओं द्वारा उनकी मृत्यु संबंधी खबरें आईं। इन भेजे गए संदेशों की प्रकृति और घटनाक्रम तथ्यों की सचाई बयान कर रहे थे। लेकिन तब भी कुछ भी निश्चित तौर पर नहीं कहा जा सकता था। ये खबरें 10 अक्टूबर को भी आती रहीं, लेकिन इन खबरों में भी ढेरों अंतर्विरोध विद्यमान थे। उदाहरण के लिए, कामरेड अर्नेस्टो चे ग्वेरा के बाएं हाथ पर एक घाव का निशान था, लेकिन किसी भी खबर में इस बात का जिक्र तक नहीं किया गया। इसके अलावा भी याद करें तो कामरेड अर्नेस्टो चे ग्वेरा के गले और हाथ पर भी एक घाव था, यह घाव एक युध्द में गोली लगने से हुआ था। और एक बार दुर्घटनावश उनके चेहरे पर भी एक जख्म हुआ था। लेकिन अब तक प्राप्त किसी भी विवरण में इन तथ्यों का जिक्र तक नहीं है। इस तरह के अंतर्विरोधों को देखते हुए बोलेविया से आ रही खबरों पर अविश्वास करने की सामान्य धारणा विद्यमान थी। इसलिए 10 अक्टूबर की दोपहर तक हममें से हर किसी ने खबरों की सत्यता पर गहरा संदेह ही व्यक्त किया था।
इसके बाद कुछ अन्य तथ्य सामने आने शुरू हुए, जैसे कि उनके चित्र। उनका पहला चित्र 10 अक्टूबर की रात को प्राप्त हुआ। लेकिन उसमें और कामरेड ग्वेरा के बीच कोई गहरी साम्यता नहीं प्रतीत होती थी। इसी कारण जब लोगों ने इसे पहलीबार देखा, तो यह मानने से इनकार कर दिया कि यह चित्र (फोटो) कामरेड अर्नेस्टो चे ग्वेरा का है।
हमारी प्रत्याशा यह थी कि यदि यह झूठी खबर फैलाने की कोशिश है और इसमें कोई गलती है तो फोटो में जो आकृति होगी, वह भिन्न किस्म की होगी। इससे हमारा सरोकार इस कारण था क्योंकि इस फोटो के साथ कुछ सादृश्यताएं भी प्रतीत ही रही थीं। इसी कारण न तो हम यह मान पा रहे थे कि उक्त फोटो चे का है, न ही इस बात से इनकार ही कर पा रहे थे कि वह फोटो चे का नहीं है।
वह फोटोग्राफ यह (एक फोटोग्राफ दिखाते हुए) है। लेकिन मुझे नहीं लगता कि यह टी.वी. कैमरों द्वारा स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा होगा, इसके अलावा वह फोटो भी बहुत साफ नहीं है। शायद कुछ ही घंटों के बाद, हमें एक दूसरा फोटोग्राफ प्राप्त हुआ। इस फोटोग्राफ में चेहरा बहुत स्पष्टता से दिखाई दे रहा है। वैसे यह फोटो भी बहुत काला है, लेकिन एक ही झलक में आप इसे पहचान सकते हैं....हममें से अधिकतर ने जब इसे देखा, तब हमने सोचा कि खबर सही हो सकती है। या कि यह पहला अवसर था, जब हम सहमत हो पा रहे थे कि आने वाली खबरें सच हैं। वह फोटो यह है (एक फोटो दिखाते हैं)।इसके बाद एक तीसरा फोटो भी प्राप्त हुआ। इसमें एक स्टेचर पर उनका शरीर स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा था। वैसे यह भी एक ऐसा फोटो था जिसे बहुत निश्चयात्मक नहीं माना जा सकता था। यह भी एक धुंधला फोटो ही था (फोटो दिखाते हुए)।
इसके अगले दिन कई अन्य फोटो प्राप्त हुए। इनमें से एक बहुत स्पष्ट था। वह फोटो यह था (फोटो दिखाते हुए)। यह इतना अधिक साफ है कि यदि इसे समाचारपत्रों में प्रकाशित किया जाए तो और भी अधिक स्पष्टता से नजर आएगा।
मुझे यह बताना चाहिए कि यह हमारे द्वारा फोटोग्राफों को सबूत के तौर स्वीकार करने जैसी बात नहीं है। बल्कि यह फोटोग्राफ एक घटनाक्रम का बयान कर रहे हैं जो कि मेरी राय मेंइसकी (खबर की) सत्यता को बयान कर रहे हैं। इन घटनाक्रमों की मैं आगे व्याख्या करूंगा।
पिछले दिनों में, बाहर से आने वाले समाचारपत्रों में नियमित रूप से अधिक से अधिक फोटोग्राफ देखने को मिले हैं। उनमें से एक यह भी है (फोटो दिखाते हुए)। इसे टेलीविजन पर साफ तौर पर देखना संभव नहीं है, क्योंकि यह समाचारपत्रों से लिए गए हैं। और स्वाभाविक रूप से कई सारे विवरण पहले ही खो चुके हैं।
इन चित्रों के साथ, भारी मात्रा में दूसरी सूचनाएं भी प्राप्त हुई हैं। स्वाभाविक रूप से हमारी कोशिश यही थी कि सभी तथ्यों को क्रमबध्द ढंग से एकत्र किया
जाए, और तब किसी निर्णय पर पहुंचा जाए। वह निर्णय, जो हमारी राय में अंतिम निष्कर्ष तक पहुंचाए। यानी खबरों के मूल्यांकन में कहीं कोई संदेह न रह जाए। इसी उद्देश्य के लिए सभी सबूतों को, सभी फोटोग्राफों कोउन सभी को जो सीधे प्राप्त हुए या विदेशी समाचारपत्रों में प्रकाशित हुए। बाद में इन सबका बहुत सावधानीपूर्वक अध्ययन किया गया।
कुछ ही दिनों बाद हमें (चे की बोलेवियन) डायरी का पहला फोटोग्राफ प्राप्त हुआ। डायरी के बारे में कहा गया कि उसे 'सीज' कर दिया गया है। यहां उस डायरी के भी कुछ चित्र हैं (फोटो दिखाते हैं), ये दोनों ही चित्र उसी समय के हैं।
इस समय चे के परिवार का प्रश्न भी सामने था। उनके पिता, उनके भाईमैं अर्जेंटीना में विद्यमान उनके परिवार के बारे में जिक्र कर रहा हूं। खबरों के मुताबिक वे लोग बोलविया जाने की तैयारी कर रहे हैं। हमने तार्किक ढंग से सोचा कि उन लोगों को वास्तविकता देखने का अवसर मिलेगा। और इस तरह हमने उनकी राय का इंतजार किया। यह यात्रा हुई और इसी के साथ घटनाओं की एक लंबी शृंखला घटी। इसमें से कई घटनाओं से तो आप परिचित हैं। उन लोगों ने चे के परिवार को यह अवसर भी नहीं दिया कि वे चे के शरीर को देख पाएं।
हमने इससे पहले इतनी नाजुक स्थिति का कभी नहीं सामना किया था। ढेरों अनजान घटनाक्रमों के बीच, चे के अर्जेंटीना रिश्तेदारों की जानकारी के बिना चे के शरीर को दफना दिया गया, और उसके तुरंत बाद उस शरीर को जला भी दिया गया। इस तरह की घटनाओं के बीच कोई भी रिश्तेदार यही सोचेगा कि खबरें (मृत्यु संबंधी) एकदम झूठी हैं। यह बहुत अधिक स्वाभाविक और तार्किक है। वहीं दूसरी ओर हमारी ओर, हम अब बिलकुल निश्चित थे कि प्राप्त हुई खबरें सच हैं। लेकिन हम नहीं चाहते थे कि उनके रिश्तेदारों या मित्रों के बजाए हम पहले अपनी राय व्यक्त करें। हम यह सीखने में सक्षम हैं। इसके अलावा उनके पिता और अन्य रिश्तेदारों को अभी तक यही विश्वास है कि खबरें बिलकुल झूठी ही हैं।
यदि यह कोई साधारण वैयक्तिक मामला मात्र होता, तब हम बिना किसी प्रश्न के आग्रही रूप में इस विषय के ऊपर नहीं सोचते, न ही हमें इस बात की ही आवश्यकता होती कि हम खबरों से जुड़े अंतर्विरोधों के बारे में सार्वजनिक रूप से चर्चा ही करें। लेकिन तथ्य यह है कि यह प्रश्न पूरे विश्व के लिए सार्वजनिक महत्व का है। इसके अलावा यह एक ऐसा प्रश्न है जो हम लोगों को गहराई से प्रभावित करता है। इन्हीं कारणों से हमने पाया कि इस विषय पर सार्वजनिक रूप से अपनी राय प्रकट करना हमारा कर्तव्य है।
इसके अलावा हमने पाया कि यदि कुछ भी दृष्टिगत संशय भी है तो भी हमारा दायित्व होगा कि हम अपने संशयों को व्यक्त करें। यदि हम यह सोचते हैं कि खबरें झूठी हैं, तब भी हमारा दायित्व होगा कि हम कहें कि खबरें झूठी हैं। और यदि हमारा आकलन होता है कि खबरें सच्ची हैं, तब भी ढेरों प्रश्न विद्यमान हैं।
सबसे पहले यह कह देना जरूरी है कि यह सब हमारे लिए कितना अधिक पीड़ाजनक है कि हमें एक एकतंत्रीय, प्रतिक्रियावादी, निरंकुश और अपने ही लोगों का दमन करने वाली साम्राज्यवाद की सहयोगी सरकार से आई खबरों के आधार पर अपनी राय व्यक्त करनी पड़ रही है। फिर भी हम स्वयं को ऐसी स्थिति में पाते हैं कि खबर की सत्यता की पुष्टि कर सकें और उसे सच मान सकें। मेरे खयाल से इस तरह की स्थिति किसी भी क्रांतिकारी के लिए हमेशा पीड़ादायक होती है।
पहले हमें इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि खबरों के विषय में संशय उत्पन्न करके किसको लाभ होता है। घटनाक्रमों से असावधान होकर यदि हम यह मानते भी हों कि इस विषय में संशय रहने से कुछ लाभ भी होता हो, तब भी हमें सच कहने से अलग नहीं किया जा सकता। तथ्यों के मामले में हम इस तरह की किसी कार्रवाई का समर्थन नहीं करते, जो मात्र फायदे पर आधारित हो। मैंने आपके समक्ष यह सब एक अवधारणास्वरूप ही कहा है।
हालांकि अगर संशय को बरकरार रखा जाए तो यह अपेक्षाकृत फायदेमंद हो सकता है। लेकिन क्रांति कभी भी इस तरह के झूठ का सहारा नहीं लेती है। सच का भय और झूठ की सहअपराधिता एक ऐसा हथियार है, जिसका हम कभी सहारा नहीं ले सकते हैं। हम ऐसा किसी भी परिस्थिति में नहीं कर सकते हैं। हमारे सच बोलने के प्रति विश्वास करने की स्थिति में ऐसा करना न केवल दूसरे स्थानों के क्रांतिकारियों के साथ, बल्कि हमारे अपने लोगों के उस विश्वास के साथ अपराध होगा। वे सदैव विश्वास कर सकते हैं कि हम कभी झूठ नहीं बोलेंगे और जब एक सच सार्वजनिक रूप से कहा जाएगा, उसे हमेशा ही सार्वजनिक रूप से कहा जाएगा।
जैसा कि आप लोगों ने खबरों में पढ़ा कि कई क्रांतिकारी इस बात का इंतजार कर रहे हैं कि सरकार और पार्टी बताए कि सच क्या है और झूठ क्या है। इसलिए इस तरह के घटनाक्रम में हमने माना कि यह हमारी जिम्मेदारी है कि हम अपनी राय सार्वजनिक रूप से व्यक्त करें। इसके अलावा, जैसा कि मैं पहले ही कह चुका हूं, इस मामले में एक चीज बहुत ही संवेदनशील है, वह है कमांडर चे ग्वेरा के अर्जेंटीना में विद्यमान संबंधियों द्वारा व्यक्त की गई राय। हमें आशा है कि वे समझ पाएंगे कि कितना अधिक पीड़ाग्रस्त होकर यह सब कहा जा रहा है। यह कोई शिष्टाचार की कमी नहीं है, बल्कि स्वीकारने की क्षमता का अभाव है। यह सब कहने का उद्देश्य उनकी ओर ही है।(क्रमशः)

गुरुवार, 3 मार्च 2011

साहित्य का शार्टकट और बौनी राजनीति


               (पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य)        
     तेरह फरवरी को वाम मोर्चे की पहली विशाल चुनावी सभा थी और उसी दिन सन् 1911 में फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ का जन्म भी हुआ था। वाम मोर्चे की रैली में मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य के हाथों फै़ज़ के ऊपर बनी एक पेंटिंग का लोकार्पण किया। यह मेरी नजर में फ़ैज़ के जरिए सस्ती वोट राजनीति का सबसे घटिया उदाहरण है। उल्लेखनीय है वाम मोर्च ने पश्चिम बंगाल में पूरे एक साल फ़ैज़ पर कुछ नहीं किया। यहां तक कि नवगठित पश्चिम बंग हिन्दी अकादमी के द्वारा फ़ैज़ पर प्रस्तावित कार्यक्रम के लिए सामान्य सा धन भी आवंटित नहीं किया। वे कार्यक्रम नहीं कर पाए। सारे देश में माकपा ने कोई कार्यक्रम नहीं किया। सिर्फ माकपा संचालित जनवादी लेखक संघ ने 'नयापथ' का एक शानदार अंक निकाला है। कम से कम माकपा के पश्चिम बंगाल के नेताओं को फ़ैज़ की विरासत का अपने को वारिस कहने का कोई हक नहीं है।
     अगर फ़ैज़ पश्चिम बंगाल में रहे होते तो सुभाष मुखोपाध्याय और महाश्वेता देवी की तरह माकपा के खिलाफ जनता के साथ खड़े होते। फ़ैज़ उन वामपंथी लेखकों में हैं जिन्होंने कम्युनिस्ट विचारधारा के कठमुल्लेपन और बौद्धिकता और बुद्धिजीवी विरोधी रूझानों के खिलाफ सारी दुनिया में बिगुल बजाया था। इसके लिए उन्होंने अलग से विश्व संगठन भी बनाया था। यह संगठन बुनियादी तौर पर वामदलों में बुद्धिजीवी विरोधी मानसिकता के खिलाफ प्रतिवादस्वरूप बनाया गया था। माकपा ने अपने अब तक के व्यवहार से यह साबित नहीं किया है कि उस दल के अंदर बुद्धिजीवियों को सम्मान का दर्जा हासिल है। माकपा आज तक पोलिट ब्यूरो-केन्द्रीय समिति में बुद्धिजीवियों को एक भी पद नहीं दे पायी है।
      पश्चिम बंगाल में पार्टीनेता आए दिन बुद्धिजीवियों का सरेआम उपहास उड़ाते हैं और उन्हें स्वतंत्र रूप से लिखने और बोलने नहीं देते। जो बुद्धिजीवी नौकरीपेशा हैं और माकपा से असहमत हैं उन्हें विभिन्न तरीकों से परेशान किया जाता है। जबकि फ़ैज़ ने अपनी सारी जिंदगी लेखक की अभिव्यक्ति की आजादी और राजनीतिक गरिमा के लिए कम्युनिस्ट पार्टी के अंदर,बाहर और विश्व कम्युनिस्ट आंदोलन में संघर्ष किया था।
     पश्चिम बंगाल के माकपा नेताओं को चुनाव सभा में फ़ैज़ इसलिए याद आए क्योंकि वे मुसलमान थे और माकपा के नेताओं को लगा होगा कि फ़ैज़ की पेंटिंग का विमोचन शायद मुसलमानों में पार्टी की साख दुरूस्त कर दे। लेकिन इस शार्टकट से मुसलमानों का दिल जीतना संभव नहीं है।
फ़ैज उन तमाम लेखकों के लिए प्रेरणा के स्रोत हैं जो समाज को बदलना चाहते हैं, अमेरिकी साम्राज्यवाद की सांस्कृतिक-आर्थिक गुलामी और विश्व में वर्चस्व स्थापित करने की मुहिम का विरोध करना चाहते हैं, सत्ता और राजनीतिक गुलामी से मुक्त होकर जनता की मुक्ति के प्रयासों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेना चाहते हैं। फ़ैज़ इन दिनों पश्चिम बंगाल के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं।   
    आज भारत में अनेक प्रगतिशील कवियों और लेखकों  ने भारत में सत्ता के सामने पूरी तरह समर्पण कर दिया है। मजदूरों के पक्ष में बोलना बरसों से बंद कर दिया है। देशी-विदेशी कारपोरेट घरानों की मलाई खाने और प्रतिष्ठानी कर्मकांड का अपने को हिस्सा बना लिया है। खासकर उर्दू की प्रगतिशील कविता का तो और भी बुरा हाल है। उसमें मजदूरों-किसानें की हिमायत करके रहना तो एकदम असंभव हो गया है। उर्दू के अधिकांश कवियों-साहित्यकारों ने मजलूमों के हकों के लिए जंग की बजाय सिनेमा उद्योग की जंग में सारी शक्ति लगानी बेहतर समझी है या आधुनिकतावादी चोगा पहन लिया है या फिर अमेरिकी साम्राज्यवाद के सामने पूरी तरह समर्पण कर दिया है और खुल्लम-खुल्ला अमेरिकी नजरिए से उर्दू और मुसलमानों के मसलों को देख रहे हैं। हमें थोड़ा ईमानदारी के साथ एक बार हिन्दी-उर्दू के साहित्यकारों और लेखकों के साहित्यिक कर्मकांड के बाहर जाकर फ़ैज़ की जिन्दगी के तजुर्बों की रोशनी में ,उन मानकों की रोशनी में हिन्दी-उर्दू की प्रगतिशील साहित्य परंपरा और लेखकीय कर्म पर आलोचनात्मक नजरिए से विचार करना चाहिए कि आखिरकार ऐसा क्या हुआ जिसके कारण फ़ैज़ ने सारी जिन्दगी सत्ता के जुल्मो-सितम के सामने समर्पण नहीं किया लेकिन उर्दू-हिन्दी के अधिकांश कवियों और लेखकों ने समर्पण कर दिया।
        फ़ैज़ की कविता में जिन्दगी का यथार्थ ही व्यक्त नहीं हुआ है बल्कि उन्होंने अपने कर्म और कुर्बानी से पहले अविभाजित भारत और बाद में पाकिस्तान में एक आदर्श मिसाल कायम की है। सर्वहारा के लिए सोचना,उसके लिए जीना और उसके लिए किसी भी कुर्बानी के लिए तैयार रहना यही सबसे बड़ी विशेषता थी जिसके कारण फ़ैज़ सिर्फ फ़ैज़ थे। मजदूरों की जीवनदशा पर उनसे बेहतर पंक्तियां और कोई लिख ही नहीं पाया । उन्होंने लिखा-
‘‘जब कभी बिकता है बाज़ार में मज़दूर का गोश्त
शाहराहों पे ग़रीबों का लहू बहता है
आग सी सीने में रह रह के उबलती है न पूछ
अपने दिल पर मुझे क़ाबू ही नहीं रहता है.’’
मजदूरों के अधिकारों का हनन,उनका उत्पीड़न और उन पर बढ़ रहे जुल्म ही थे जिनके कारण उनकी कविता महान कविता में तब्दील हो गयी। मजदूर की पीड़ा उन्हें बार-बार आंदोलित करती थी,बेचैन करती थी। मजदूरों के हकों का इतना बड़ा कवि भारतीय उपमहाद्वीप में दूसरा नहीं हुआ।
  फ़ैज़ की कविता में जाति,धर्म,साम्प्रदायिकता,राष्ट्र,राष्ट्रवाद,पार्टीलाइन आदि का अतिक्रमण दिखाई देता है । उन्होंने सचेत रूप में समूची मानवता और मानव जाति के सबसे ज्यादा वंचित वर्गों पर हो रहे जुल्मों के प्रतिवाद में अपना सारा जीवन लगा दिया।  वे मात्र उर्दू कवि नहीं थे। बल्कि मजदूरवर्ग के महाकवि थे। वे सारी जिंदगी सर्वहारावर्ग के बने रहे। वे अविभाजित भारत और बाद में पाकिस्तान सर्वहारा की जंग के महायोद्धा बने रहे। फ़ैज़ उन बड़े कवियों में हैं जिनकी चेतना ने राष्ट्र और राष्ट्रवाद का सही अर्थों में अतिक्रमण किया था और समूचे भारतीय उपमहाद्वीप के मजदूरों-किसानों और मानवाधिकारों की रक्षा के लिए कविता लिखने से लेकर जमीनी स्तर तक की वास्तव लड़ाईयों का नेतृत्व किया था।  महाकवि  फ़ैज़ का सियालकोट (पंजाब,पाकिस्तान) में 13 फरवरी 1911 को जन्म हुआ था। फ़ैज़ ने उर्दू कविता को नई बुलंदियों तक पहुँचाया। फ़ैज़ एक ही साथ इस्लाम और मार्क्सवाद के धुरंधर विद्वान थे। उनके घर वालों ने बचपन में उनको कुरान की शिक्षा दी। उर्दू-फारसी-अरबी की प्रारंभिक शिक्षा के बाद उन्होंने अंग्रेजी और अरबी में एम.ए. किया था लेकिन वे कविताएं उर्दू में करते थे। फ़ैज़ ने 1942 से 1947 तक सेना में काम किया।बाद में लियाकत अली खाँ की सरकार के तख्ता पलट करने की साजिश की जुर्म में 1951-1955 तक जेल की हवा खानी पड़ी।
  फ़ैज़ के व्यक्तित्व में जो बागीपन है उसका आधार है दुनिया की गुलामी, गरीबी, लोकतंत्र का अभाव और साम्राज्यवाद का वर्चस्वशाली चरित्र। आज हमें 1983 के एफ्रो-एशियाई लेखक संघ की रजत जयंती के मौके पर उनके द्वारा दिए गए  भाषण की याद आ रही है ,यह भाषण बहुत ही महत्वपूर्ण है। फ़ैज़ ने कहा था इस युग की दो प्रधान समस्याएं हैं उपनिवेशवाद और नस्लवाद। फ़ैज़ ने कहा , "हमारा इस बात में दृढ़ विश्वास है कि साहित्य बहुत गहराई से मानवीय नियति के साथ जुड़ा है,कि स्वतंत्रता और राष्ट्रीय सार्वभौमिकता के बिना साहित्य का विकास संभव नहीं है,कि उपनिवेशवाद और नस्लवाद का समूल नाश साहित्य को सृजनात्मकता के संपूर्ण विकास के लिए बेहद ज़रूरी है।"
    फ़ैज़ ने इन समस्याओं पर ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में रोशनी डालते हुए लिखा '' तमाम युद्धों के अंत की तरह,लड़े गए पहले महायुद्ध के बाद सामाजिक,नैतिक और साहित्यिक बूर्जुआ मान्यताओं और वर्जनाओं के टूटने और समृद्धि के एक संक्षिप्त दौर में विजेताओं के दिमाग़ में अहं का उन्माद उफनने लगा था। ख़ुदा आसमान पर था और धरती पर सब कुछ मज़े में चल रहा था। नतीजतन ज्यादातर पश्चिमी और कुछ उपनिवेशों के साहित्य ने उसे आदर्श के रूप में अपना लिया। बड़े पैमाने पर शुद्ध रूपवाद के आनंद का सम्मोहन,अहं केन्द्रित चेतना की रहस्यात्मकता से लगाव,रूमानी मिथकों और कल्पित आख्यानों के बहकावों के साथ 'कला के लिए कला' के उद्धबोधक सौंदर्यशास्त्रियों द्वारा अभिकल्पित गजदंती मीनारों का निर्माण होने लगा।"आज भी अनेक बुद्धिजीवी हैं जो परमाणु हथियारों की दौड़ के घातक परिणामों से अनभिज्ञ हैं। इस दौड़ ने सोवियत संघ के समाजवादी ढ़ांचे को तबाह किया और शांति के बारे में जो खयाल थे उन्हें नुकसान पहुँचाया । फ़ैज़ इस फिनोमिना की परिणतियों पर नजर टिकाए हुए थे।
    द्वितीय विश्वयुद्धोत्तर दौर के बारे में उन्होंने लिखा , " युद्ध के बाद का हमारा समय, विराट अंतर्विरोधों से ग्रस्त हमारा युग,विजयोल्लास और त्रासदियों से भरा युग,उत्सवों से भरा और हृदयविदारक युग,बड़े सपनों और उनसे बड़ी कुण्ठाओं का ज़माना। तीसरी दुनिया की जनता के लिए ,एशियाई ,अफ्रीकी और लातीनी अमेरिकी लोगों के लिए ,कम से कम इनकी एक बड़ी आबादी के लिए,किसी को तत्काल डिकेंस के शब्द याद आ जायेंगे-' वह बेहतरीन वक़्त था,वह बदतरीन वक़्त था।' परमाणु हथियारों की दौड़ पर लिखा- "आणविक हथियारों के जिन्न को बंद बोतल से आज़ाद करते हुए अमेरिका ने समाजवादी खेमे को भी ऐसा ही करने का आमंत्रण दे दिया। उस दिन से आज तक हमारी दुनिया की समूची सतह पर विनाश के डरावने साये की एक मोमी परत चढ़ी है और आज जितने खतरनाक तरीके से हमारे सामने झूल रही हैं .उतनी पहले कभी न थी।" राजनीति में इस जमाने को शीतयुद्ध के नाम से जानते हैं। इस जमाने में मुक्त विश्व का नारा दिया गया। मुक्त विश्व के साथ मुक्त बाजार और मुक्त सूचना प्रवाह को हथियार के रूप में इस्तेमाल किया गया। इसी के अगले चरण के रूप में नव्य उदारतावाद आया। मुक्त विश्व की धारणाओं का मीडिया से जमकर प्रचार किया गया। इसके पक्षधर हमारे बीच में अभी भी हैं और अहर्निश मुक्त विश्व और मुक्त बाजार की हिमायत करते रहते हैं। इसके बारे में फ़ैज़ ने लिखा- "स्वतंत्र विश्व के नाम पर संभवतः हमारे इतिहास के घोर अयथार्थ ढ़ोल नगाड़ों के शोर के साथ अमेरिकन शासन तंत्र ने यहां वहां ढ़ेर सारे निरंकुश राजाओं-सुल्तानों,ख़ून के प्यासे अधिनायक-तानाशाहों,बेदिमाग़ दुस्साहसी सेनापतियों और हवा-हवाई किस्म के राजनीतिज्ञों,जिस पर भी हाथ रख सकें,को सत्ता के सिंहासन पर बैठाने की कोशिशें की हैं और बैठाया भी है । यह कार्रवाई वियतनाम से बड़ी बदनामी के बाद हुई अमेरिकन विदाई के साथ कुछ वक़्त के लिए रुक सी गयी थी। फिर रोनाल्ड रीगन के ज़माने से हम अमेरिकनों और उनके नस्लवादी साथियों को यहां-वहां भौंकते शिकारी कुत्तों की तरह इन तीन महाद्वीपों में जैसे बिखरे बारूद के ढ़ेरों के आसपास देख रहे हैं।" अमेरिका द्वारा संचालित शीतयुद्ध ने संस्कृतिकर्मियों को बड़े पैमाने पर प्रभावित किया है। इस पर फ़ैज़ ने लिखा है, "नये शोषक वर्ग और निरंकुश तानाशाही के उदय और वैयक्तिक और सामाजिक मुक्ति के सपनों के ढ़ह जाने से युवापीढ़ी मोहभंग ,सनकीपन और अविश्वास की विषाक्त चपेट में आ गयी है। नतीजतन बहुत से युवा लेखक पश्चिमी विचारकों द्वारा प्रतिपादित किए जा रहे जीवित यथार्थ से रिश्ता तोड़ने,उसके मानवीय और शैक्षणिक पक्ष को अस्वीकार करने और लेखक को तमाम सामाजिक ज़िम्मेदारियों से मुक़्त होने जैसे प्रतिक्रियावादी विचारों और सिद्धान्तों के प्रति आकर्षित हो रहे हैं। इन वैचारिक मठों और गढ़ों से रूपवाद,संरचनावाद,  अभिव्यक्तिवाद और अब 'लेखक की व्यक्तिगत स्वतंत्रता' जैसे ऊपर से अत्यंत आकर्षक लगने वाले नारे की लगातार वकालत की जा रही है। इसका जाहिर उद्देश्य लेखक को अपनी सामाजिक, राजनीतिक,विचारधारात्मक प्रतिबद्धता से दूर करना है। इस सारे विभ्रम को विचारपूर्ण तरीक़ों से हटाने की जरूरत है।"

बुधवार, 2 मार्च 2011

ममता का नायककेन्द्रित सांस्कृतिक खेल


      रेलमंत्री ममता बनर्जी भाषायी सांस्कृतिक संकीर्णतावाद का खतरनाक खेल खेल रही हैं। यह खेल राष्ट्रीय एकता के लिए खतरनाक साबित हो सकता है। रेल को राष्ट्रीय एकीकरण का प्रतीक माना जाता है। ममता बनर्जी ने रेलमंत्री बनने के बाद से उसे बांग्ला सांस्कृतिक उन्माद और  नायककेन्द्रित सांस्कृतिक फासीवाद का औजार बना दिया है। कोई भी राजनैतिक दल ममता बनर्जी के इस हथकंड़े का प्रतिवाद नहीं कर रहा,यहां तक कि वोट की राजनीति के दबाब में वामदल भी मुँह बंद किए बैठे हैं।
       ममता बनर्जी को यदि यह लगता है रेल का देशज संस्कृति और संस्कृतिकर्मियों के साथ संबंध बनना चाहिए तो इससे राष्ट्रीय सांस्कृतिक पंगे उठ खड़े होंगे। जिस तरह ममता बनर्जी ने महज वोट पाने की सस्ती राजनीति के चक्कर में पश्चिम बंगाल में अनेक स्टेशनों का नामकरण नामी-गिरामी लोगों के नाम से किया है। यह उनके सांस्कृतिक प्रेम की नहीं बल्कि भाषायी उन्माद पैदा करने की कोशिश है।  नायककेन्द्रित सांस्कृतिक फासीवाद के फ्रेमवर्क में ही इसबार के रेलबजट में रवीन्द्रनाथ टैगोर और स्वामी विवेकानंद के नाम से नई गाडियां चलाने की घोषणा की गयी है।अनेक नायकों के नाम से रेलवे स्टेशनों के नाम भी सुझाए गए हैं। यह सीधे अंध बांग्ला क्षेत्रीयतीवाद और नायककेन्द्रित सांस्कृतिक फासीवाद है,इसे सांस्कृतिक प्रेम नहीं कहते। सांस्कृतिक प्रेम भाषायी अंधत्व से जब बंध जाता है तो सामाजिक टकराव पैदा करता है और ममता बनर्जी जाने-अनजाने यह काम कर रही हैं।यह खतरनाक खेल है। इसे बंद किया जाना चाहिए।
     रेल मंत्रालय यह निर्णय ले ही सकता है कि नामी-गिरामी सांस्कृतिक हस्तियों के नाम से रेलवे स्टेशनों के नाम रखे जाएं लेकिन यह काम सारे देश के पैमाने पर होना चाहिए और सभीभाषाओं के प्रति समान नजरिए के आधार पर होना चाहिए।रेल मंत्रालय मानक बनाए,संसद से अनुमति ले और लागू करे। लेकिन ममताबनर्जी ने देश की सभी भाषाओं के प्रति समान नजरिया अपनाने की बजाय रेल जैसी राष्ट्रीय संपदा का अपने अंध क्षेत्रीयतावादी राजनीतिक स्वार्थों के लिए इस्तेमाल करना आरंभ कर दिया है। देश में कहीं पर भी नामी सांस्कृतिक हस्तियों के नाम पर रेलवे स्टेशनों का नामकरण नहीं हुआ है। पश्चिम बंगाल में भी विगत 60 सालों में कभी नायककेन्द्रित नामकरण नहीं हुआ लेकिन ममता बनर्जी के रेलमंत्री बनने के बाद बंगाली हस्तियों के नाम से पश्चिम बंगाल में रेल स्टेशनों का नामकरण हो रहा है जो एकसिरे से गलत है।     
सब जानते हैं रेलबजट का पश्चिम बंगाल के आगामी विधानसभा चुनाव के साथ गहरा संबंध है और इस क्रम में रेलबजट में बंगाली क्षेत्रीयतावाद छाया हुआ है। ममता बनर्जी ने रेलमंत्री बनने के वाद सबसे खतरनाक काम यह किया है कि उसने रेल को नायककेन्द्रित सांस्कृतिक फासीवाद ,बांग्ला सांस्कृतिक संकीर्णतावाद और सांस्कृतिक उन्माद के उपकरण के रूप में खतरनाक ढ़ंग से इस्तेमाल किया है।
          रेल राष्ट्रीय संपत्ति है और इसका किसी भाषाविशेष के सांस्कृतिक उत्थान के लिए इस्तेमाल करना गलत है। सवाल उठता है ममता बनर्जी को भाषायी संकीर्णतावाद के प्रमोशन के लिए रेल को औजार बनाने का हक किसने दिया है ? वामदल और अन्य राजनीतिक दल  चुप क्यों हैं  ? रेल बजट में बंगाली क्षेत्रीयतावाद का आलम है कि रवीन्द्रनाथ टैगोर और विवेकानन्द के नाम से नई ट्रेनें चलायी गयी हैं।उल्लेखनीय हैं अनेक हिन्दीभाषी रेलमंत्री हुए हैं लेकिन उन्होंने कभी किसी हिन्दीभाषी बड़े लेखक के नाम से ट्रेन नहीं चलाई। और न रेलवे स्टेशनों के नाम हिन्दी के लेखकों के नाम पर रखे गए।
        ममता बनर्जी ने जिस तर्क से उत्तमकुमार के नाम से एक स्थानीय रेलवे स्टेशन का नाम रखा है क्या उसी तर्ज पर वे इलाहाबाद रेलवे स्टेशन का नाम फिल्म अभिनेता अमिताभ बच्चन के नाम से रखेंगी ? क्या यह बताने की जरूरत है कि अमिताभ का कद उत्तमकुमार से कम नहीं है,उत्तमकुमार बंगाल का महानायक है लेकिन अमिताभ समूचे देश के फिल्म उद्योग के निर्विवाद महानायक हैं। असल में ममता बनर्जी रेलवे स्टेशनों का नामकरण नायकों के नाम से करके  नायककेन्द्रित फासिस्ट सांस्कृतिकबोध का प्रचार कर रही हैं,यह राष्ट्रीय एकता और लोकतंत्र की बुनियादी स्प्रिट के खिलाफ है। नायककेन्द्रित रेल प्रकल्प सांस्कृतिक फासीवाद है। इसे किसी भी तर्क से स्वीकार नहीं किया जा सकता। यह ममता बनर्जी का साहित्य या संस्कृति प्रेम नहीं है। ममता बनर्जी किस तरह अंध सांस्कृतिक उन्माद पैदा कर रही हैं उसका एक उदाहरण ही देना काफी है।
   हिन्दी के महाकवि सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' महिषादल में जन्मे । उन्होंने अपने जीवन के मूल्यवान कई दशक पश्चिम बंगाल में गुजारे । लेकिन उनके नाम से ममता बनर्जी को पश्चिम बंगाल के किसी स्टेशन का नामकरण करने की सुध नहीं आयी। यहां तक कि उनके जन्मस्थान के पास किसी रेलवे स्टेशन का नाम भी उनके नाम पर नहीं रखा गया। निराला में रवीन्द्ननाथ की अनेक खूबियां हैं,बंगाली जाति का सांस्कृतिक सौष्ठव भी है। वे हिन्दी के वैसे ही नायक है जिस तरह बांग्ला के रवीन्द्रनाथ हैं।
       पश्चिम बंगाल की राजनीति में हिन्दीभाषियों की 30 से अधिक सीटों पर निर्णायक भूमिका है इनमें बिहार और उत्तरप्रदेश के बाशिंदों की बड़ी संख्या है।  खासकर मैथिलीवासियों ने पिछले लोकसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस को जमकर वोट दिया जिसके कारण सुदीप वंद्योपाध्याय को कोलकाता उत्तर -पूर्व की सीट जीतने में सुविधा हुई। इन मैथिली भाषियों के नायक हैं बाबा नागार्जुन और उनका इस साल जन्मशती वर्ष है।  बाबा नागार्जुन समूची हिन्दी के आदर्श महानायक हैं। रेलमंत्री ममता बनर्जी उन्हें कैसे भूल गईं ? बाबा के नाम से कोई ट्रेन आरंभ क्यों नहीं की ?क्यों रवीन्द्ननाथ के ही नाम से ट्रेन चलेगी बाबा के नाम से नहीं चलेगी ?  बाबा नागार्जुन को मैथिली और हिन्दी का नजरूल कहा जाता है। ऐसे महाकवि का यह शताब्दी वर्ष है और बाबा के नाम से ममता बनर्जी को देश के किसी भी स्टेशन का नामकरण करने या उनके नाम से ट्रेन चलाने की आज तक याद क्यों नहीं आयी? हम सवाल करना चाहते हैं रवीन्द्रनाथ टैगोर और विवेकानन्द में ऐसा क्या है जो सुब्रह्मण्यभारती ,निराला और नागार्जुन में नहीं है। असल बात यह है कि रेल की ओट में ममता बनर्जी नायककेन्द्रित सांस्कृतिक फासीवाद की राजनीति कर रही हैं इसका प्रतिवाद होना चाहिए।   










मंगलवार, 1 मार्च 2011

शहरीकरण और शहरी गरीबी से भागे हुए वित्तमंत्री


    विदेशी मुद्रा भंडार में 300 विलियन डॉलर हैं जो मात्र दो सप्ताह के भुगतान के लिए काफी हैं। 33 करोड़ भारतीय गरीबी की रेखा के नीचे जी रहे हैं।दुनिया के सबसे ज्यादा कुपोषित बच्चे भारत में हैं।जबकि देश की विकासदर 9 प्रतिशत है। भारत दुनिया में सबसे ज्यादा शिक्षित-अशिक्षित बेकारों का देश कहलाता है ।केन्द्र सरकार की प्रत्येक योजना भ्रष्टाचार में निमग्न है। वित्तमंत्री यह क्यों नहीं बताते कि देश में कितने शिक्षित बेकार हैं और कितने अशिक्षित बेरोजगार हैं। विगत एक साल में कितने शिक्षितों-अशिक्षितों को पक्की नौकरी मिली ? 
   इसबार बजट में भी वित्तमंत्री प्रणव मुखर्जी ने शहरी गरीबी के समाधान का कोई रास्ता नहीं बताया है। आज भी भारत के शहरों में 25 फीसदी से ज्यादा गरीब निवास करते हैं। ये लोग ज्यादातर छोटे शहरों और कस्बों में रहते हैं। नव्य उदारीकरण ने शहरीकरण का विकास नहीं किया है। प्रणव मुखर्जी जानते हैं शहरीकरण के बिना पूंजीवाद का देश में असमान विकास होगा। संक्षेप में भारत में सन् 2008 में 27 प्रतिशत आबादी शहरों में रहती थी।जबकि इण्डोनेशिया में 43 प्रतिशत,द.अफ्रीका में 58 फीसदी,ब्राजील में 82 फीसद,विकसित देशों में 75से 90 फीसदी तक आबादी शहरों में रहती है। वित्तमंत्री चीन से होड़ कर रहे हैं लेकिन शहरीकरण उनका एजेण्डा नहीं बन पाया है।सन् 1980 में चीन की शहरी आबादी 20 फीसद थी,जबकि भारत में उस समय 23 फीसदी आबादी शहरों में रहती थी। चीन ने नीति बदली और 2002 में चीन की शहरी आबादी का आंकड़ा 38 फीसदी को पार गया। जबकि भारत में शहरी आबादी का आंकड़ा 28 फीसद पर ही अटका पड़ा है। मंत्री महोदय कैसी ग्रोथ है ये ? बजट चुप क्यों है इन सवालों पर ?            




नया बजट और नए खतरे

नव्य उदारीकरण में भारत के अधिकांश बुद्धिजीवियों ने अपने को पूंजीपरस्ती से बांध लिया है। युवा इस पूंजी के नारकीय खेल से पीड़ित हैं । औरतें इसमें पिस रही हैं। किसानों और मजदूरों के जीवन में तबाही मची हुई है।  इसके बाबजूद वित्तमंत्री प्रणव मुखर्जी और उनकी भक्तमंडली दावा कर रही है कि भारत विकास कर रहा है और केन्द्र सरकार विकासकार्यों पर सबसे ज्यादा खर्च कर रही है। वास्तविकता यह है  कि वित्तमंत्री ने एक भी बड़ा कारखाना खोलने का संकेत नहीं दिया है। बेकारी कम करने का एक भी नुस्खा नहीं बताया है। सवाल उठता है कि बेकारी कम नहीं होगी तो देश में सामाजिक असुरक्षा बढ़ेगी और ऐसी अवस्था में कानून और व्यवस्था की एजेंसियों की मदद की जरूरत ज्यादा पड़ेगी और इस संदर्भ में देखें तो बजट में सुरक्षा एजेंसियों का खास ख्याल रखा गया है। देश की वास्तविकता यह है कि भारत सरकार सुरक्षा एजेंसियों और सुरक्षा बलों के साथ- रक्षामद में ज्यादा खर्च करने जा रही है। यह इस बात का सबूत है कि देश में कानून-व्यवस्था के प्रबंधन पर ज्यादा व्यय होगा। मसलन वित्तमंत्री ने राष्ट्रीय जांच एजेंसी,बाएसएफ,सीआरपीएफ आदि के लिए ज्यादा धन का आवंटन किया गया है। राष्ट्रीय जांच एजेंसी के लिए बजट से 55.68 करोड़ रूपये आवंटित किए गए हैं। यानी पिछले साल की तुलना में 16.33 करोड़ रूपये ज्यादा आवंटित किए गए हैं। इस संस्था को गैर-योजनामद से 2009-10 में 11.91 करोड़ रूपये आवंटित  किए गए थे जिसमें इस साल के लिए गैर-योजनामद से 42.06 करोड़ रूपये दिए गए हैं। इस संस्था को आतंकवाद से संबंधित घटनाओं पर काम करने,जांच करने,रोकने और केस चलाने का अधिकार दिया गया है। सीबीआई को पिछले साल की तुलना में इस साल कम फंड आवंटित किया गया है। बीएसएफ के लिए 7628.79 करोड़ रूपये आवंटित किए गए हैं।सीआरपीएफ के लिए 7827.32 करोड़ रूपये आवंटित किए गए हैं वित वर्ष की तुलना में 300 करोड़ रूपये ज्यादा है। नेशनल इंटेलीजेंस ग्रिड को 33.81 करोड़ रूपये आवंटित किए गए हैं। इस संस्था का काम है काउंटर टेररिज्म के खतरे पर निगरानी रखना,उसके डाटा की जांच-पड़ताल करना। वहीं दूसरी ओर कारपोरेट घरानों के लिए प्रत्यक्ष करों में 11,500 करोड़ रूपये के कंशेसन दिए गए हैं। इसके विपरीत साधारण जनता पर 11,300 करोड़ रूपये के नए कर लगाए गए हैं। कारपोरेट घरानों से केन्द्र सरकार ने स्वेच्छा से 2010-11 में 1,38,921 करोड़ रूपये के कर वसूल नहीं किए। इसी तरह 2009-10 में कारपोरेट घरानों से 1,18,930 करोड़ रूपये के कर वसूल नहीं किए गए थे। केन्द्र सरकार ने इस तरह कारपोरेट घरानों को पिछले तीन सालों में 4लाख करोड़ रूपये दिए हैं। इसी तरह किसानों के मद में आने वाली विभिन्न योजनाओं के लिए आवंटित धन में कटौती की गई है। केन्द्र सरकार का समग्र खर्चा 3लाख करोड़ के करीब बैठता है इसके लिए वह कर वसूली पर जोर नहीं दे रही है बल्कि विभिन्न तरीकों से कर्ज लेकर चला रही है। केन्द्र सरकार ने आम आदमी को और ज्यादा कंगाल बनाने के लिए तकरीबन 20हजार करोड़ रूपये की सब्सीडी कटौतियां इस बजट में की हैं। इसके अलावा विभिन्न वित्तीय क्षेत्रों में विदेशी पूंजी निवेश को आमंत्रण देकर मनमोहन सिंह सरकार ने एकसिरे से देश की अर्थव्यवस्था को विदेशी वित्तीय संस्थानों के रहमोकरम पर गिरवी रख दिया है।
   सैटेलाइट टीवी चैनलों के साथ प्रतिस्पर्धा में संचार माध्यमों को ,खासकर प्रसारभारती को खड़ा रखने की जरूरत है लेकिन मनमोहन सिंह सरकार अपने नव्य-उदार एजेण्डे पर आक्रामक ढ़ंग से बढ़ रही है और निजी चैनलों की मदद करते हुए उसने इसबार के बजट में प्रसारभारती के लिए आवंटित धन में कटौती कर दी है। पिछले साल की तुलना में इस साल प्रसारभारती को 300 करोड़ रूये कम आवंटित किए गए हैं। 2010-11 में 1,757.14 करोड़ रूपये दिए गए जो इस साल के बजट में घटाकर 1,484.01 करोड़ कर दिए गए हैं। इसबार के बजट की खूबी है 9प्रतिशत विकास दर ,भयानक बेकारी,मंहगाई में उछाल और देशी वित्तीय संस्थाओं में विदेशी पूंजीका अबाध प्रवेश यानी नए किस्म की आर्थिक गुलामी का आगमन।
   










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