मंगलवार, 25 जून 2013

फेसबुक विचार वैतरणीः नव्य उदारीकरण के दुष्परिणाम



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डिजिटल क्रांति ने सीडी-डिस्क-कैसेट आदि के क्षेत्र में जो तबाही मचायी है उसके परिणाम आने लगे हैं। वीडियोकॉन समूह के प्लैनेट एम की बिक्री में गिरावट आई है और राजस्व में उसकी हिस्सेदारी कुछ साल पहले के 40 फीसदी से घटकर बमुश्किल एक चौथाई रह गई है। अगले साल तक यह घटकर 10 फीसदी रह जाएगी। रहेजा समूह के क्रॉसवर्ड के साथ भी यही किस्सा है। उसके राजस्व में संगीत की हिस्सेदारी बमुश्किल दो फीसदी रह गई है।(बिजनेस स्टैंडर्ड)
यानी नव्य उदार संगीत अब बेसुरा हो गया है।
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डिजिटल क्रांति ने सीडी और कैसेट उद्योग को बर्बाद कर दिया है। एचएमवी-ईएमआई रिकॉर्ड लेबल के स्वामी संजीव गोयनका के आरपीजी समूह ने अपने संगीत क्षेत्र के खुदरा कारोबार को बंद कर दिया है।
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उलटे विकास मॉडल का आलम यह है कि शहरों में पैदल चलने वालों के लिए फुटपाथ नहीं बचे हैं। सवाल यह है कि हमारे विकास मॉडल में फुटपाथ क्यों नहीं आते ?
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पिछले दो साल के दौरान भारत में बेरोजगारी 10.2 फीसदी की दर से बढ़ी है। 1 जनवरी 2012 को देश में बेरोजगारों की संख्या 1.08 करोड़ थी जबकि जनवरी 2010 में यह आंकड़ा 98 लाख था।
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कविता या साहित्यविधाओं का जासूसी एजेंसी से संबंध नहीं होता.नजरिए का संबंध होता है।लक्ष्यों का संबंध होता है। कमलेश के लेखन को खांचे बनाकर नहीं देखना चाहिए। समग्रता में देखना चाहिए। मैं तो इतना ही समझ पाया हूँ कमलेश को खांचों में बांटकर देखा जा रहा है। समग्रता में उनके नजरिए,एक्शन ,सृजन,आचरण,जीवनशैली और विचारधारा सबको मिलाकर देखना चाहिए। महज कवि रूप में देखना उपयोगितावाद है और यह अमेरिकीजीवन दर्शन का मूलाधार है।
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खबर है कि विश्व में अमेरिकी जासूसी को नंगा करने वाला एडवर्ड स्नोवदेन हांगकांग छोड़कर मास्को चला गया है। क्या यह नए शीतयुद्ध का आरंभ है ?
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कमलेश की परायीदृष्टि का आदर्श नमूना है यह वाक्य- "भारत में सभ्यता मृत पड़ी हुई है। भारतवर्ष के पढे-लिखे अपने अज्ञान में ही इतने अभिमानी हो रहे हैं कि उन्हें अपने चारों ओर पड़ी हुई यह लाश दृष्टिगोचर नहीं हो होती। " कमलेश पर हिन्दी में जो लोग माला चढ़ा रहे हैं और उनका भारतज्ञान पर फिदा हैं उनको इन वाक्यों को पढ़ना चाहिए और इसके गंभीर निहितार्थों को समझना चाहिए। कमलेश का भारतप्रेम देखें उनको भारत में सभ्यता मृत नजर आ रही है। बलिहारी अमेरिकीदृष्टि की।यह दृष्टिकोण सांस्कृतिक साम्राज्यवाद का आदर्श नमूना है जिसमें अपनी भाषा,अपनी सभ्यता,संस्कृति आदि मृत लगती है या हेय लगती है। कहने की जरूरत नहीं है कि सीआईए का सांस्कृतिक साम्राज्यवाद से चोली-दामन का रिश्ता है।
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भारत का सबसे शिक्षित राज्य है केरल और इस राज्य में अपराध समूचे भारत में सर्वोच्च पर है। समूचे भारत में अपराधदर 196.7लोग प्रति एकलाख नागरिकों पर है,,जबकि केरल में 455.8 लोग है जो राष्ट्रीय अपराध दर से भी ऊपर है।
भारत की अपराध राजधानी है कोच्ची,वहां पर अपराधदर प्रति लाखपर 817.9है उसके बाद कोलम का स्थान है,यहां की अपराधदर है 637.3.लोग है .
क्या कारण है केरल जैसा शिक्षित,जागरूक,समाजवादीचेतना संपन्न राज्य अपराधदर में भी सबसे ऊपर चला गया ?
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स्काइप ने अमेरिकी प्रशासन की मदद करने वाला साइबर कार्यक्रम विकसित किया है जिसके तहत स्काइप पर होने वाले कम्युनिकेशन पर अमेरिकी प्रशासन जासूसी कर पाएगा।
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भारत सरकार ने अमेरिका की तर्ज पर ही बिना बताए,अदालत की परमीशन के बिना नागरिकों के फोन सुनने,ईमेल पढ़ने,एसएमएस पढ़ने आदि का पूरा सिस्टम खड़ा कर लिया है और भारत में इंटरनेट से लेकर मोबाइल तक का सारा कम्युनिकेशन सरकार की निगरानी के दायरे में रहेगा। कहां सोए हैं मानवाधिकारों के रखवाले संगठन और राजनीतिकदल ?
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हिन्दी के बुढ़ऊ धार्मिक (पूर्व फर्नाण्डीजपंथी सोशलिस्ट) लेखक कमलेश में अचानक पैदा हुई सीआईएचेतना अवचेतन के गर्भ से पैदा नहीं हुई है,यह सचेत सीआईए प्रचार अभियान का हिस्सा है। यह अकस्मात् नहीं है कि इसे रजा फाउण्डेशन की पत्रिका ने छापा है, रजा फाउण्डेशन के कर्ता हैं अशोक बाजपेयी,जो अमेरिकीपरस्त कलाकर्म के लिए हिन्दी में पहले ही यश कमा चुके हैं। भारतीय उपमहाद्वीप में हिन्दी अकेली भाषा है जहां आज भी अमेरिकाविरोधी स्वर प्रमुख है और इस चेतना को प्रभावित करने के लिए कमलेश-उदयन बाजपेयी-अशोक बाजपेयी का यह सामूहिक प्रयास है। इसतरह के हमलों का मुँहतोड़ जबाब देने की जरूरत है।
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कुलदीपजी, रामस्वरूप,वह व्यक्ति है जो भारत-चीन आदि के लिए एक साथ जासूसी करता था और रॉ के लिए जासूसी करता था, मुझे याद है वह जब दिल्ली में गिरफ्तार किया गया तो उसके घर से 1 ट्रकभर कर भारत सरकार की गोपनीय फाइलें निकली थीं और वह सरकारी कर्मचारी को एक बोतल,एक औरत और 2हजार रूपये की घूस देकर भारत सरकार के किसी भी मंत्रालय के गोपनीय दस्तावेज सीआईए और चीन आदि देशों को मुहैय्या कराता था और यही रामस्वरूप दिल्ली में केजीवी के खिलाफ पोस्टरबाजी संगठित करता था और सीआईए के प्रचार अभिियान संगठित करता था। मैंने अपने जेएनयू एसएफआई अध्यक्ष के नाते कई पर्चे उस जमाने में इस व्यक्ति के नाम जारी किए थे।
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कमलेश का लेखन चंडूखाने की चिन्ताओं की देन है वहां तथ्य और सत्य ढ़ूंढ़ना सही नहीं होगा।आपने सही जगह रेखांकित किया है। इससे भी बड़ी बात यह है कि इस पत्रिका के संपादकको संपादकीय विवेक नहीं है ,उसने तथ्यों की जांच किए बिना इस तरह की सूचनाएं प्रकाशित करके लघु पत्रिकाओं की परंपरा को कलंकित किया है। लगता है अशोक बाजपेयी के मालगोदाम में सिर्फ भूसा ही भरा है।
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अमेरिका में रहने के दुख-4-

अमेरिका में हैं और सत्तासुख चाहते हैं तो ईसाइ फंडामेंटलिज्म और अन्य किस्म के फंडामेंटलिज्म के साथ याराना रखना होगा। खासकर अमेरिका स्थित ईसाइ फंडामेंटलिस्टों के सामने नतमस्तक करके रहना होगा।
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अमेरिका में रहने के दुख-3-

अमेरिकी सिस्टम के नेता हैं तो गरीबों का भाषण में जिक्र न आए,चुनाव में बोल सकते हैं लेकिन बाद में गरीब का नाम लेना भी गुनाह है।मजदूरवर्ग पदबंध तो एकदम प्रतिबंधित है।
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अमेरिका में रहने के दुख-2-

यदि अमेरिका के राष्ट्रपति हैं तो देश को एक बड़ा युद्ध सौगात में देकर जाएं जिससे हथियार बनाने वाली कंपनियां खुश रहें और आपके दल का ख्याल रखें। युद्ध नहीं तो राष्ट्रपति पद नहीं।
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अमेरिका में रहने के दुख-1-

यदि आप मुसलमान हैं और आपका नाम मुस्लिम परंपरा से आता है तो तय है अमेरिकी पुलिस-जासूसी एजेंसियां आप पर 24 घंटे निगरानी रखेंगी।
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अमेरिकी मिथ-6-

अमेरिका के बारे में यह मिथ है कि वह स्वतंत्र नागरिकों का देश है। सच यह है कि अमेरिका के नागरिकजीवन पर सरकारी एजेंसियों की कड़ी नजरदारी है और निजी कम्युनिकेशन में हस्तक्षेप भी है।
अमेरिकी मिथ-5-

यह मिथ है कि अमेरिका तो सुखियों-धनियों और स्वस्थ लोगों का देश है। सच यह है कि अमेरिका में बड़ी तादाद में गरीब हैं,मुसीबत के मारे हुए लोग हैं और बड़ी संख्या में बीमारलोग भी हैं।
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अमेरिकी मिथ-4-

अमेरिका के बारे में मिथ है कि वहां पर औरतें बड़ी भली होती हैं। सच यह है कि वहां पर औरतों में पुरूषों के ऊपर हमला करने,ब्लिच आंखों में फेंककर हमला करने की प्रवृत्ति बढ़ गयी है।
अमेरिकी मिथ-3-

अमेरिका के बारे मे मिथ है कि वहां चोर.उचक्के,मस्तान ,मवाली टाइप लोग नहीं होते। सच यह है कि वहां हर शहर में अपराधियों के संगठित गिरोह सक्रिय हैं।
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अमेरिकी मिथ-2-

अमेरिका के बारे में मिथ है कि अमेरिका में स्त्रीपीड़क नहीं हैं.सच इसके विपरीत है स्त्रियों के प्रति उत्पीड़न के मामले में अमेरिका अनेक देशों में अग्रणी है।
अमेरिकी मिथ-1-

अमेरिका के बारे में मिथ है कि वहां सबकुछ शांत और सभ्यता के वातावरण में चल रहा है। यह भी मिथ है कि अमेरिकी लोग बड़े भले,शरीफ और सहिष्णु,मिलनसार होते हैं। यह सच है कि अमेरिका में शरीफ,शांत,सहिष्णुओं की संख्या तेजी से घटी है और अब वे अल्पसंख्यक हैं।
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फेसबुक के बिना कितना कष्ट होता है,कोई रहीम से पूछे-

बिन देखें कल नाहिन, यह अखियान ।
पल-पल कटत कलप सों, अहो सुजान ॥
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फेसबुक मित्रता का फंडा-

रहिमन ओछे नरन सों, बैर भलो न प्रीति ।
काटे चाटे स्वान के, दुहूं भांति विपरीति ॥
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फेसबुक पर पूर्वाग्रह या मन की गांठें रखकर बातें न करें,गांठें स्पष्ट कम्युनिकेशन बाधित करती हैं-

रहिमन खोजे ऊख में, जहां रसनि की खानि ।
जहां गांठ तहं रस नहीं, यही प्रीति में हानि ॥
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नए आधुनिक समाज में चिंता एक बड़ी समस्या है,इस पर रहीम को पढ़ें-

रहिमन कठिन चितान ते, चिंता को चित चेत ।
चिता दहति निर्जीव को, चिंता जीव समेत ॥
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फेसबुक और चैटिंग में जो लोग दुख बांटते हैं उनके लिए रहीम का पद-

रहिमन निज मन की विथा, मन ही राखो गोय ।
सुनि अठिलै है लोग सब, बांटि न लैहे कोय ॥
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रहिमन प्रिति सराहिए, मिले होत रंग दून ।
ज्यों जरदी हरदी तजै, तजै सफेदी चून ॥ रहीम।।
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टेंशन फ्री रहने नुस्खा-

चाह गई चिंता मिटी, मनुआ बेपरवाह।

जिनको कछु न चाहिए, वे साहन के साह।।
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समय लाभ सम लाभ नहिं, समय चूक सम चूक।

चतुरन चित रहिमन लगी, समय चूक की हूक।।रहीम।।
दीन सबन को लखत है, दीनहिं लखै न कोय।

जो रहीम दीनहिं लखै, दीनबंधु सम होय।।रहीम।।
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भरोसो जाहि दूसरो सो करो ।। तुलसीदास।।
सुनि ऊधौ मोहिं नैकू न बिसरत वै ब्रजवासी लोग ।।सूरदास।।

-फेसबुक-ईमेल-एसएमएस से खुश होने वालों के लिए सूरदास का यह पद जरूर पढ़ना चाहिए-

ऊधौ कहा करैं लै पाती ।
जौ लौं मदनगुपाल न देखैं, बिरह जरावत छाती ॥
निमिष निमिष मोहि बिरसत नाहीं, सरद जुहाई राती ।
पीर हमारी जानत नाहीं, तुम हौ स्याम सँघाती ॥
यह पाती लै जाहु मधुपुरी, जहँ वै बसैं सुजाती ।
मन जु हमारे उहाँ लै गए, काम कठिन सर घाती ॥
सूरदास प्रभु कहा चहत हैं, कोटिक बात सुहाती ।
एक बेर मुख बहुरि दिखावहु, रहैं चरन रज-राती ॥
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कमलेश की मुश्किल है वे अंग्रेजी में बौद्धिक होना चाहते हैं,लेकिन वे ठीक से इस भाषा में न तो सोच पाते हैं और न लिख ही पाते हैं। उनको यदि मातृभाषा से प्रेम है तो हिन्दी में लिखें और फिर अपने लिखे को पढ़ें कि वे कैसे दिखते हैं,कम से कम एक लेखक का अशिष्ट भाषा का इस्तेमाल करना असभ्य माना जाता है। कमलेश ने झूठ का लबादा अपने ऊपर डाला हुआ है फलतः वे झूठ के अलावा और कुछ नहीं देख पा रहे हैं।सीआईए की वैचारिकसेवा इस तरह के लोग ज्यादा मुस्तैदी से करते हैं जो झूठ का लबादा ओढे रहते हैं।
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हिंसा की संस्कृति का जनक अमेरिका- 4-

इराक में तथाकथित मानवीय हस्तक्षेप करने के पहले मीडिया में यह प्रौपेगैण्डा किया गया कि इराक के पास जनसंहारक अस्त्र हैं,रासायनिक अस्त्र हैं और जल्द हमला न किया गया तो इराक अमेरिकी शहरों पर हमले कर देगा। बाद में अमेरिकी सेना के इराक में जाने पर कहीं पर भी जनसंहारक अस्त्र नहीं मिले।इससे मीडिया के झूठ पर से पर्दा उठा।
इसबार सीरिया के संदर्भ में यही कहा जा रहा है असद की सत्ता रासायनिक हथियारों का इस्तेमाल कर रही है ।इस बहाने अमेरिका हस्तक्षेप करने का बहाना बना रहा है।
असद सरकार के खिलाफ विपक्ष को सैन्यमदद अमेरिका और नाटो देश मदद तुरंत बंद करें।उनका इस तरह का काम सीरिया की संप्रभुता पर हमला है.इससे सीरिया में जन-धन आदि की व्यापक क्षति हुई है।
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हिंसा की संस्कृति का जनक अमेरिका- 3-

जानकार लोग कह रहे हैं कि सीरिया में अलकायदा को अमेरिका की ओर से रासायनिक हथियार और अन्य सैन्य सामग्री इफरात में मुहैय्या करायी जा रही है। इससे मध्यपूर्व और दूसरे देशों में अलकायदा की शक्ति और संहारक क्षमता का विकास होगा।भारत उनके निशाने पर आ चुका है लेकिन मनमोहन सरकार को इस मामले में सख्त नजरिया अपनाना चाहिए।वरना भारत के अफगानिस्तान हितों को बड़ा नुकसान उठाना पड़ सकता है।
अलकायदा और तालिबान के साथ पाकस्थित आतंकियों का याराना जगजाहिर है,इसके बाबजूद मनमोहन सरकार ने सीरिया के गृहयुद्ध में अमेरिकी भूमिका की अभी तक जिस तरह अवहेलना की है और हमारे देश का विपक्ष (खासकर वामदल)भी शांत है वह हम सबके लिए चिन्ता की बात है।
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हिंसा की संस्कृति का जनक अमेरिका- 2-

सन् 2003 में बुश प्रशासन ने इराक के खिलाफ युद्ध की घोषणा की तो 10साल बाद ओबामा ने सीरिया में विपक्ष को सैन्य मदद की घोषणा करके बुश प्रशासन की युद्धवादी नीति को दोहराया है। सीरिया के गृहयुद्ध में अब तक 80हजार से ज्यादा निरपराध नागरिक मारे गए हैं। एक तरह से समूचे देश को शरणार्थी बना दिया गया है,सीरिया के पड़ोसी देशों में लाखों सीरियाई शरणार्थी की तरह अमानवीय स्थितियों में जी रहे हैं। इस सबके बावजूद अमेरिका की मनमोहन सरकार खुलकर आलोचना नहीं कर रही,इससे हमारे देश की मध्यपूर्व के देशों में साख गिर रही है।
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हिंसा की संस्कृति का जनक अमेरिका- 1-

अमेरिकी प्रशासन ने हाल ही में सीरिया में विपक्ष को हथियारों और अन्य रूप में मदद करने का फैसला किया है और इससे एकबार फिर से पुष्टि हुई है कि अमेरिका हिंसा का उत्पादक देश है।
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अमेरिका की सारी दुनिया में चल रही जासूसी की हरकतों का पिटारा जिस तरह खुला है उसे लेकर कम से कम भारत के इंटरनेट लेखकों,फेसबुक यूजरों और नागरिकों को मिलकर मोर्चा बनाकर सरकार पर दबाब डालना चाहिए। मनमोहन सरकार ने अमेरिकी नजरदारी को जिस तरह ठंड़े बस्ते के हवाले किया है वह हम सबकी कायरता की निशानी है।
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बुधवार, 5 जून 2013

शीतयुद्धोत्तर परिप्रेक्ष्य की तलाश और मार्क्सवादी रूढ़ियां


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फेसबुक पर हिन्दीलेखकों में लेखकीय ध्रुवीकरण शीतयुद्धीय राजनीति के फ्रेमवर्क से बंधा है। कायदे से शीतयुद्धीय राजनीति और सीआईए- -सोवियत कम्युनिज्म के दायरे से बाहर निकलकर चीजों को देखने की जरूरत है। खासकर मार्क्सवादी और प्रगतिशील लेखकों को अपना नजरिया बदलना पड़ेगा। मार्क्सवादी परिप्रेक्ष्य शीतयुद्धीय राजनीति के पक्ष-विपक्ष मे बांधता है।
नए जमाने की मांग है लोकतंत्र और दुर्भाग्य की बात है कि सीआईए या अमेरिकी साम्राज्यवाद या समाजवाद दोनों ही लोकतंत्र की सत्ता-महत्ता और स्वायत्तता को स्वीकार नहीं करते। मंगलेश डबराल,वीरेन्द्रयादव, अशोक पाण्डेय आदि ने मेरी पोस्ट पर अशोक पाण्डेय की फेसबुक वॉल पर जो बहस चलायी है उसमें भागलेने वाले सुधीजन शीतयुद्ध की राजनीति के दायरे के बाहर निकलकर नहीं सोच पाए हैं।
चार्ली चैप्लिन,ब्रेख्त आदि सभी नामी प्रगतिशील लेखकों के नजरिए की मुश्किलें वही हैं जो शीतयुद्धीय राजनीति की हैं। वे भी उसके दायरे के बाहर नहीं देख पाते। प्रगतिशीलों का शीतयुद्धीय राजनीति को समाजवाद के नजरिए से देखना मार्क्सवादी रूढ़िवाद है। मार्क्सवादी रूढ़िवाद हमें लोकतांत्रिक नजरिए से सोचने में बाधाएं पैदा करता है।
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शीतयुद्धोत्तर परिप्रेक्ष्य की तलाश और मार्क्सवादी रूढ़ियां-1-

फेसबुक पर हिन्दीलेखकों में लेखकीय ध्रुवीकरण शीतयुद्धीय राजनीति के फ्रेमवर्क से बंधा है। कायदे से शीतयुद्धीय राजनीति और सीआईए- -सोवियत कम्युनिज्म के दायरे से बाहर निकलकर चीजों को देखने की जरूरत है। खासकर मार्क्सवादी और प्रगतिशील लेखकों को अपना नजरिया बदलना पड़ेगा। मार्क्सवादी परिप्रेक्ष्य शीतयुद्धीय राजनीति के पक्ष-विपक्ष मे बांधता है।
नए जमाने की मांग है लोकतंत्र और दुर्भाग्य की बात है कि सीआईए या अमेरिकी साम्राज्यवाद या समाजवाद दोनों ही लोकतंत्र की सत्ता-महत्ता और स्वायत्तता को स्वीकार नहीं करते। मंगलेश डबराल,वीरेन्द्रयादव, अशोक पाण्डेय आदि ने मेरी पोस्ट पर अशोक पाण्डेय की फेसबुक वॉल पर जो बहस चलायी है उसमें भागलेने वाले सुधीजन शीतयुद्ध की राजनीति के दायरे के बाहर निकलकर नहीं सोच पाए हैं।
चार्ली चैप्लिन,ब्रेख्त आदि सभी नामी प्रगतिशील लेखकों के नजरिए की मुश्किलें वही हैं जो शीतयुद्धीय राजनीति की हैं। वे भी उसके दायरे के बाहर नहीं देख पाते। प्रगतिशीलों का शीतयुद्धीय राजनीति को समाजवाद के नजरिए से देखना मार्क्सवादी रूढ़िवाद है। मार्क्सवादी रूढ़िवाद हमें लोकतांत्रिक नजरिए से सोचने में बाधाएं पैदा करता है।
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तीसरी मार्क्सवादी रूढ़ि है -मार्क्सवादी कल्पनाशीलता। भारत में विभिन्न रंगत के मार्क्सवादियों में एक विलक्षण साम्य है वे रहते पूंजीवाद में हैं,अधिकार पूंजीवाद के चाहते हैं,पूंजीवादी संरचनाओं के दुरूस्तीकरण के लिए संघर्ष करते हैं, लेकिन चाहते हैं समाजवाद ।
हिन्दी के प्रगतिशील लेखकों-आलोचकों ने कभी गंभीरता के साथ "कल्याणकारी पूंजीवादी राज्य और साहित्य" के अन्तस्संबंध पर विचार नहीं किया ।वे पूंजीवाद के सरलीकरणों और अमेरिकी बहानेबाजी के जरिए अपने दायित्व से भागते रहे हैं।
भारतीय समाज के निर्माण में कल्याणकारी पूंजीवादी राज्य की प्रधान भूमिका रही है। इसे सोवियत समाजवादी नजरिए या अमेरिकी नजरिए से नहीं समझा जा सकता। इसे समाजवाद के आग्रह के नजरिए से भी नहीं समझा जा सकता।
समाजवाद का आग्रह लोकतंत्र की शक्ति को समझने में बाधा पैदा करता है। भारत का वर्तमान लोकतंत्र से निर्धारित हो रहा है और भविष्य में भी लोकतंत्र से जल्दी मुक्ति मिलने वाली नहीं है। समाजवाद यहां के लिए कल्पनाशीलता है। लोकतंत्र को हमें लोकतंत्र के नजरिए से देखना होगा। समाजवाद के नजरिए से लोकतंत्र को देखना मार्क्सवादी कल्पनाशीलता है ।
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मार्क्सवादी रूढ़िवाद की चौथी रूढ़ि है लोकतंत्र को हिकारत की नजर से देखना। हिन्दी के प्रगतिशील  लेखकों में बड़ा हिस्सा है जो समाजवाद के आख्यान और गुणों को जानता है लेकिन भारत में लोकतंत्र में लेखकीय और नागरिक अधिकारों की चेतना से शून्य है।
    मसलन्, हिन्दीलेखकों में  लेखक के अधिकारों को लेकर कोई गुस्सा नहीं है। मसलन्, हमने यह कभी नहीं सुना कि नामवर सिंह या अन्य किसी लेखक ने राजकमल के मालिक से लेखकों की रॉयल्टी समय पर देने के लिए कभी संघर्ष किया हो।
     मैं निजी तौर पर दर्जनों लेखकों को जानता हूँ जिनको प्रकाशक रॉयल्टी नहीं देता और लेखकसंघ चुप तमाशा देखते रहते हैं।
      भारत के लेखक के लिए उसके अधिकारों की चेतना समाजवादी चेतना से ज्यादा महत्वपूर्ण है। लेखक के अधिकारों की चेतना लोकतंत्र के प्रति प्रेम और आस्था पैदा करके ही पैदा की जा सकती है। लोकतंत्र में हिकारत से देखना लोकतंत्र का निषेध है।
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हिन्दी लेखकों में मार्क्सवादीदंभ बहुत बड़ी समस्या है । मार्क्सवादीदंभ भाव रहने वाले लेखक बेहतर न लिखकर भी अपने लेखकीय श्रेष्ठत्व का दावा करते हैं।
इसके कवच के तौर पर वे मार्क्सवाद को पहले सर्वश्रेष्ठ घोषित करते हैं ,बाद में मार्क्सवादियों और फिर अपने को सर्वश्रेष्ठ घोषित करते हैं। ये लेखक भूल गए हैं कि मार्क्सवाद का जन्म श्रेष्ठता के सिद्धांत और संस्कार के प्रतिवाद में हुआ था।
मार्क्सवाद ,मार्क्सवादी और निज को श्रेष्ठ मानने का विचार अवैज्ञानिक है। मार्क्सवाद ने कभी श्रेष्ठता का दावा नहीं किया। स्वयं मार्क्स ने श्रेष्ठ होने का दावा नहीं किया।
एक अच्छा मार्क्सवादी दंभी नहीं संवेदनशील होता है,विनयी होता है,अन्य को सम्मान देता है।
दंभी की भाषा हेटभाषा होती है, रूप में भी और अंतर्वस्तु में भी। एक अच्छा मार्क्सवादी वह है जिसके पास अन्य के विचारों और विचारधारा के लिए जगह है। अन्य हैं इसलिए मार्क्सवाद उनसे भिन्न और वैज्ञानिक है।
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मार्क्सवादी लेखकों की इस दौर में सबसे बड़ी असफलता है कि वे शीतयुद्ध में साहित्य के अवमूल्यन को नहीं रोक पाए। साहित्य के जो मानक रचे गए उनमें इजाफा नहीं कर पाए।साहित्य के नए पैराडाइम को पकड़ नहीं पाए। फलतःआज वे हाशिए के बाहर चले गए हैं। लंबे समय से हिन्दी में मार्क्सवादी आलोचना की कोई किताब बाजार में नजर नहीं आई और हिन्दी के मार्क्सवादी आलोचकों ने समीक्षा का कोई नया मानक नहीं बनाया।
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शीतयुद्ध और उसके बाद के दौर में जातीय विध्वंस का ग्लोबल चक्र चला है। पूर्व समाजवादी समाजों से लेकर कांगो-सोमालिया-इराक अफगानिस्तान आदि तक इसका दायरा फैला हुआ है। एक जमाने में समाजवादी समाज में जातीय समस्या के समाधान का हिन्दी में खूब गुणगान किया गया लेकिन जब सोवियत संघ का विघटन हुआ तो इस जातीय विघटन पर हिन्दी में अधिकांश मार्क्सवादी चुप रहे। यहां तक कि भारत की कम्युनिस्ट पार्टियां और माओवादी-नक्सल भी चुप रहे। यह चुप्पी अचानक नहीं है बल्कि शीतयुद्धोत्तर यथार्थ को वैज्ञानिक ढ़ंग से न देख पाने का फल है।
शीतयुद्धोत्तर यथार्थ पहले की तुलना में ज्यादा जटिल और संश्लिष्ट है। नए यथार्थ और नई राजनीतिक समस्याओं के खिलाफ मोर्चा लेते हुए आप स्वयंसेवी संगठनों और व्यक्तियों के समूहों को देख सकते हैं लेकिन मार्क्सवादी दलों-संगठनों को कहीं पर भी नहीं देखेंगे।

मसलन् यूनियन कारबाइड के खिलाफ विगत 25 सालों में कौन संघर्ष कर रहा है ?मोदी के दंगों के खिलाफ कौन केस लड़ रहा है ?आदि अनेक समस्याएं हैं जहां पर छोटे स्वयंसेवी संगठन संघर्ष कर रहे हैं ,कम्युनिस्टदल सोए हैं।

मंगलवार, 4 जून 2013

केजीबी और साहित्य



केजीबी सोवियत संघ की खुफिया एजेंसी है,यह लंबे समय तक समाजवादी सोवियत संघ का ,आज अंग है रूस का। इस संस्था ने कला-साहित्य का कोई आंदोलन प्रमोट नहीं किया लेकिन साहित्य-कला के क्षेत्र में सोवियत संघ में काफी बड़ी संख्या में लेखकों को उत्पीडित किया। इनमें बड़े नाम हैं सोल्जेनित्सिन , सखारोव आदि।
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सोवियत संघ ने समाजवाद का जो मॉडल चुना यह वह मॉडल नहीं है जिसकी कल्पना मार्क्स-एंगेल्स ने की थी। समाजवादी सोवियत संघ में मानवाधिकारों को लेकर कोई समझ ही नहीं थी। खासकर व्यक्तिगत स्वतंत्रता,अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता आदि के लिए संविधान से लेकर सामाजिक संरचनाओं में कोई जगह नहीं दी गयी।फलतः विभिन्न किस्म की विचारधाराओं के माननेवाले लेखन और लेखकों के लिए भी कोई जगह नहीं थी। इसके विपरीत भारत में लोकतंत्र है और सभी नागरिकों को मानवाधिकारों की संविधान प्रदत्त गारंटी है। यहां पर कम्युनिस्टलेखक, विरोधी विचारधारा की आलोचना का संवैधानिक हक रखते हैं। इसके बाबजूद वे सोवियतसंघ आदि देशों के लेखकों के अभिव्यक्ति की आजादी के दर्द को महसूस करने में असमर्थ रहे।
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कार्ल मार्क्स -एंगेल्स के विचारों में क्रांतिकारी भावबोध इसलिए विकसित हुआ क्योंकि वे पूंजीवाद की उदार परंपराओं में विकसित हुए और क्रांतिकारी परंपराओं की खोज में सफल रहे । उन्हें उदार पूंजीवादी माहौल मिला। यदि सोवियत संघ में मार्क्स-एंगेल्स होते तो उनके साथ वही होता जो प्लेखानोव के साथ हुआ। प्लेखानोव को रूसी मार्क्सवाद का जनक माना जाता है।
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माइकेल एंजेलो ने एक बार स्वयं अपने विषय में कहा था " मेरा उपदेश ज्ञानी होने का दावा करने वाले अनेक अज्ञानियों को जन्म देगा।" इस पर प्लेखानोव ने कहा दुर्भाग्यवश यह भविष्यवाणी पूरी हो गयी है। आजकल मार्क्स का ज्ञान ऐसे अनेक अज्ञानियों को जन्म दे रहा है,जो ज्ञानी होने का दावा करते हैं।स्पष्ट रूप से इसमें मार्क्स का कोई कसूर नहीं है,बल्कि कसूर उन लोगों का है जो उनके नाम पर मूर्खता की बातें कर रहे हैं।ऐसी मूर्खताओं से बचने के लिए हमें भौतिकवाद की प्रणाली के महत्व को समझना आवश्यक है।
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सोवियत संघ के पतन में जिन कारकों ने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की उनमें KGB की भूमिका प्रधान कारक है। अर्सा पहले इकोनॉमिक एंड पॉलिटिकल वीकली ने सोवियत संघ के पतन पर एक विशेषांक निकाला था उसमें केजीबी के पूर्वप्रधान ने यह बात रेखांकित की थी। इसके अलावा केजीबी का काम था सोवियत नागरिकों की इलैक्ट्रोनिक नजरदारी करना और आंतरिक प्रतिवाद का दमन करना। इसके कारण घर-घर में जासूस पैदा हो गए,बाप अपने बेटे पर, बीबी अपने पति पर केजीबी के लिए जासूसी कर रहे थे। यह सीधे नागरिकों के जीवन को नरक बनाने के प्रयास थे जो अंत में सोवियत संघ के विघटन और समाजवाद के पतन तक ले गए।

सोमवार, 3 जून 2013

फेसबुक मित्रों का हिप्पोक्रेटिक चरित्र

                 
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फेसबुक यूजर नई समस्याओं के समाधान रामायण,महाभारत, हनुमान चालीसा ,शिवचालीसा आदि में क्यों खोजता हैं ? अतीत के बोझ को त्यागे बिना आधुनिक नहीं बन सकते फेसबुक यूजर.
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फेसबुक यूजर अपनी वर्तमान इमेज के एक अंशमात्र को अभिव्यक्त करता है। वह अपना अतीत छिपाता है। सच बोलने से कतराता है ,फलतःजो मित्रता बनती है वह खोखली होती है। यह माउस मित्रता है या मूषक मित्रता है।
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फेसबुक में एनीमि यानी शत्रु की केटेगरी नहीं है, फलतः यही लगता है कि यह मीडियम शत्रुरहित है लेकिन अजातशत्रु युधिष्ठिर का हश्र हम देख चुके हैं उनका कोई शत्रु नहीं था लेकिन घर में 100 कौरव शत्रु निकले, क्या आप शत्रुओं से घिरे हैं ?
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फेसबुक में लाइक है ,डिसलाइक नहीं है। मित्रता के लिए मित्र की कठोर बात को भूलने की जरूरत होती है ,संभवतः इसी कारण डिसलाइक का विकल्प नहीं है।
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फेसबुक पर नकली उदारता के जरिए मित्रगण मित्रता का दावा करते हैं। इस मित्रता में कोई सामाजिक बंधन और जिम्मेदारी नहीं है।
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फेसबुक पर नकली उदारता का प्रदर्शन अंततः हिप्पोक्रेसी है। इस परिप्रेक्ष्य में देखें तो नकली उदारता की बाढ़ का प्रत्येक वॉल पर सहज ही प्रदर्शन देख सकते हैं। नकली उदारता को बुद्धिमत्तापूर्ण अभिव्यक्ति समझनेकी भूल न करें।
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फेसबुक पर हिप्पोक्रेसी वही करते हैं जो आमजीवन में भी हिप्पोक्रेट हैं। हिप्पोक्रेट बड़े महत्वाकांक्षी होते हैं। लेकिन फेसबुक तो महत्वाकांक्षाओं का अन्त है।
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कलात्मक अभिव्यक्ति के लिए हिप्पोक्रेसी का निषेध हर स्तर पर किया जाना चाहिए। जो कलात्मक अभिव्यक्ति में अक्षम हैं वे ही नकली अस्मिता का इस्तेमाल करते हैं। हमें इस सवाल पर विचार करना चाहिए कि फेसबुक आने के बाद हिप्पोक्रेसी बढ़ी है या घटी है ? जो लोग सामने मिलने पर अच्छे से बात नहीं करते वे फेसबुक पर भद्रभाव से बातें करते हैं, यह नकली कम्युनिकेशन का आदर्श प्रमाण है।
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फेसबुक में जो नकली नाम से सक्रिय है वे मूलतःवे लोग हैं जिनका स्वयं के प्रति कोई श्रद्धा और सम्मान नहीं है। नकली लोग और नकली नाम अंततः हिप्पोक्रेसी का वातावरण बनाते हैं और यह कु-कम्युनिकेशन की कोटि में आता है।
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फेसबुक में नकली नामों का जमघट है यह फेसबुक यूजर की हिप्पोक्रेसी है और हिप्पोक्रेट समाज नहीं बदल सकते।
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हिप्पोक्रेसी के कारण शब्द और अर्थ व्यक्ति के विचार और कर्म के बीच फांक नजर आती है। इस दरार को फेसबुक ने और भी चौड़ा किया है।
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फेसबुक यूजर को कलाकार-लेखक की कोटि में नहीं रख सकते। इसका प्रधान कारण है लेखक-कलाकार को कम्युनिकेशन में अंततःसफलता मिलती है लेकिन फेसबुक में कम्युनिकेशन के कु-कम्युनिकेशन में रूपान्तरित होने का खतरा हमेशा बना रहता है।पता नहीं आपकी लिखी पंक्तियां किसे कष्ट दे रही हो ? या कौन गलत ढ़ंग से पढ़ रहा हो ?
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फेसबुक पर हिप्पोक्रेसी खूब दिखती है। हिप्पोक्रेसी के कारण ही मित्रगण कुछ भी वायदा करते हैं, क्योंकि वायदा करने में कोई क्षति नहीं है।
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नया कम्युनिकेशन युग मनुष्य की संप्रेषण क्षमताओं का विस्तार है। साथ ही कम्युनिकेशन तकनीकी मनुष्य की संवेदनशीलता का विस्तार है।
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इंटरनेट कम्युनिकेशन के विभिन्न रूपों के आने के साथ ही प्राइवेसी का नया पैराडाइम सामने आया है।
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फेसबुक में सवारी कोई नहीं सब ड्राइवर हैं।
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फेसबुक वस्तुतः ऑटोमेशन युग का कम्युनिकेशन है इसमें जब भी आप कम्युनिकेट करेंगे अपने आप कम्युनिकेट करना होगा। आप क्या हैं और किस तरह कम्युनिकेट करना चाहते हैं यह निजी तौर पर खोज करनी पड़ेगी।

फेसबुक ,डिजिटल मानवाधिकार और नार्सिज्म



मैकलुहान के शब्दों में कहें तो मनुष्य तो मशीनजगत का सेक्स ऑर्गन है। डिजिटल मानवाधिकार इससे आगे जाता है और गहराई में ले जाकर मानवीय शिरकत को बढ़ावा देता है। हिन्दी के जो साहित्यकार फेसबुक पर हंगामा मचाए हुए हैं वे गंभीरता से सोचें कि सैंकड़ों की तादाद में जो लाइक आ रहे हैं वे कम्युनिकेशन को गहरा बना रहे या उथला ?
कम्युनिकेशन गहरा बने इसके लिए जरूरी है डिजिटल रूढ़िवाद से बचें। डिजिटल रूढ़िवाद मशीन प्रेम पैदा करता है,तकनीक की खपत बढ़ाता है । लेकिन कम्युनिकेशन में गहराई नहीं पैदा करता। डिजिटलरूढ़िवाद की मुश्किल है कि उसके कान नहीं हैं। वह इकतरफा बोलता रहता है,वह सिर्फ अपनी कही बातें ही सुनता है अन्य की नहीं सुनता। मसलन्, मैंने यह कहा,मैंने यह किया,मैं ऐसा हूँ,मैं यहां हूँ,मैं यह कर रहा हूँ,वह कर रहा हूँ आदि।
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हिन्दी के फेसबुकरूढ़िवादी जब फोटो के जरिए अभिव्यक्ति का जश्न मनाते हैं तो वे भूल जाते हैं कि वे वैचारिक तौर पर क्या कर रहे हैं। फेसबुक या किसी भी डिजिटल मीडियम का गहरा संबंध मानवीय क्रियाकलापों और संचार से है। फेसबुक पर लाइक या फोटो लगाने के बहाने हम अपने भाव-भंगिमाओं और गतिविधियों का बतर्ज मैकलहान मशीनीकरण करते हैं,इस क्रम में पेश की गयी हर चीज अपना विलोम बनाती है। हमें मैकलुहान की यह बात याद रखनी चाहिए-
All media work us over completely. They are so persuasive in their personal, political, economic, aesthetic, psychological, moral, ethical, and social consequences that they leave no part of us untouched, unaffected, unaltered. The medium is the massage. Any understanding of social and cultural change is impossible without a knowledge of the way media work as environments .
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हिन्दी के बौद्धिकों में एक बड़ा वर्ग है जो अभी मानवाधिकारचेतना को महत्वहीन मानता है। उनमें संयोग से उन लेखकों की संख्या भी अच्छी खासी है जो साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त हैं। नया दौर डिजिटल ह्यूमनिज्म का है। वे लोग जो मानवाधिकारों न समझे वे डिजिटल मानवाधिकार को समझेंगे इसमें संदेह है। मेरा इशारा उन लेखकों की ओर है जो हिन्दी में है और फेसबुक पर आएदिन फोटोबाजी करते रहते हैं। लेकिन मानवाधिकारों के प्रति कभी नहीं बोलते। डिजिटल मानवाधिकार विलासिता के लिए नहीं है। फेसबुक पर सिर्फ फोटो लगाना,आत्मगान करना विलासिता है,हिन्दी में इसे फेसबुक रूढ़िवाद कहते हैं।
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मार्शल मैकलुहान ने लिखा है हम ऐसे युग में हैं जहां व्यापार ही हमारी संस्कृति है । यह वह युग है जहां संस्कृति ही हमारा व्यापार है।
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फेकबुक कम्युनिकेशन के दौर में सामाजिक-सांस्कृतिक त्रासदियां सबसे ज्यादा घट रही हैं लेकिन हिन्दी फेसबुक में यह सब नदारत है। अति-कनेक्टविटी वालों का यथार्थजीवन से अलगाव है। दूरसंचार कम्युनिकेशन पर बढ़ती निर्भरता ने सामाजिक जीवन के अर्थपूर्ण संपर्क को तोड़ दिया है। इसके कारण टाइम और स्पेस का शासन भी खत्म हो गया है। अब हम बिना जाने तत्क्षण राय देने लगे हैं,लाइक करने लगे हैं।अनजान लोगों की लाइकलाइन पगलाती रहती है।
अनजान का लाइक अब पैमाना है लोकप्रियता का। अब लाइक करने वाला भी लेखक बन गया है ,उसे लेखक के बराबर दर्जा मिल गया है। फलतःलेखक और लाइककर्ता दोनों मित्र हो गए हैं। अब हम लेखक के आन्तरिक और निजी विवरणों में ज्यादा रूचि लेने लगे हैं।
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फेसबुक टाइमलाइन की खूबी है कि यूनीफॉर्म,कंटीनुअस और कनेक्टेड है। कथाकार उदयप्रकाश जैसे नार्सिस्ट लोग (फेसबुक पर लिखी उनकी पोस्टों के संदर्भ में) इस तत्व की जानते हुए अनदेखी करते रहे हैं।
एक सम्मानित लेखक के द्वारा किया गया नार्सिज्म बहुत खतरनाक होता है इसे हम हिटलर के प्रसंग में अनेक लेखकों में देख चुके हैं।
नार्सिज्म यानी आत्ममुग्धता और अहर्निश असत्य का प्रचार। हिन्दी लेखकों को इससे बचना चाहिए। फेसबुक पर इस बात को लिखना इसलिए जरूरी लगा कि क्योंकि फेसबुक पर यह नार्सिज्म खूब चल रहा है। किसी के भी बारे में अनाप-शनाप लिखने की बाढ़ आई हुई है। इसमें एक पहलू वह भी जिसमें व्यक्ति अपने बारे खूब काल्पनिक बातें लिखता है। इस तरह की काल्पनिक और बेसिपैर की बातें लिखना नार्सिज्म का वैचारिक धर्म है।
मसलन् किसी के फोटो का दुरूपयोग,विकृतिकरण,कैरीकेचर,पर्सनल हमला करना,किसी को गलत उद्धृत करना, विषयान्तर करके निजी जीवन पर हमला करना, किसी के नाम से असत्य बोलना आदि फेसबुक पर नार्सिज्म की सामान्य प्रवृत्तियां हैं और इसमें हमारे नामी और सुधीजन बाजी मारे हुए हैं। नार्सिज्म वैचारिक एड्स है।
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फेसबुक टाइमलाइन में आप मानवीय जीवन के अनंतरूपों को देख सकते हैं। यहां पर विभिन्न किस्म की घटनाओं जैसे निजी अनुभव,निजी राय,जन्मदिन,मृत्यु दिवस,शादी,ब्याह, तलाक, दलीय नीतियां आदि को देख सकते हैं।
फेसबुक में अर्थवान और अर्थहीन दोनों ही किस्म की चीजें देखते हैं। फेसबुक एक तरह से तयशुदा संभावित समय और स्थान है जहां पर कम्युनिकेट कर सकते हैं।यहां वातावरण अदृश्य है।इसकी संरचनाएं और बुनियादी नियम पर्वेसिव हैं।सतह पर यह सहज कम्युनिकेशन का मीडियम है। लेकिन यह सीधे व्यक्ति के अन्तर्मन और धमनियों या नसों को प्रभावित करता है। हमारे हिन्दी नार्सिस्ट इस बुनियादी तथ्य को नहीं समझते और अंट-शंट लिखते रहते हैं। अंटशंट लेखन,आत्मश्लाघा, आत्मप्रशंसा कम्युनिकेशन में पर्वर्जन है।नार्सिज्म है।
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फेसबुक संवाद का माध्यम है,संवाद के आरंभ होने का अर्थ है प्रौपेगैण्डा का अंत। फेसबुक पर किसी भी विचारधारात्मक सवाल पर विचार विमर्श कम्युनिकेशन में रूपान्तरित हो जाता है। वह प्रौपेगैण्डा नहीं रहता।
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हिन्दी का एक बड़ा लेखक फेसबुक पर नार्सिज्म के प्रचारक के रूप में काम कर रहा है,उसके वॉल पर जाएं तो आपको भारत के कम और निजी फोटो ज्यादा नजर आएंगे।बिजनेस स्टैंडर्ड के अनुसार  विगत 12सालों में भारत में महिलाओं की संख्या में गिरावट आई है औरत आत्मनिर्भर होने की बजाय घरों में कैद हुई हैं लेकिन हिन्दी लेखकों को यह स्त्रीयथार्थ नजर ही नहीं आता।  12वीं पंचवर्षीय योजना के दौरान कृषि क्षेत्र के रोजगार में 1.4 करोड़ की कमी आई। पांच साल की इस अवधि में कुल रोजगार महज 30 लाख ही बढ़े।वर्ष 2004-05 से 2009-10 के दौरान विनिर्माण क्षेत्र में 50 लाख रोजगार गंवाए गए।
हिन्दी के लेखकों को पंचवर्षीय योजनाएं कभी ध्यान नहीं खींचतीं,वे पुरस्कार,किताब मार्केटिंग ,सरकारीपद,नेता की चमचागिरी,हिन्दी प्रोफेसर बन पाने और न बन पाने या प्रोफेसर से समीक्षा लिखवाने में ही सारी शक्ति खर्च करते हैं।
फेसबुक पर भी नामधारी लेखक देश की गंभीर समस्याओं पर बहस नहीं चलाते बल्कि नार्सिज्म का प्रचार कर रहे हैं। वे फेसबुक पर नार्सिज्म के नायक हैं और कहानी में यथार्थवादी -जादुई यथार्थवादी हैं । अब कल्पना कीजिए कि नार्सिज्म की सेवा करके फेसबुक पर ये नामधारी लेखक किस विचारधारा की सेवा कर रहे हैं? फेसबुक पर हिन्दीलेखकों और पाठकों में आत्मप्रशंसा और आत्ममुग्धता कम हो और देश की समस्याओं पर ज्यादा बातें हों तब ही फेसबुक को एक सार्थक मीडियम बना सकते हैं।
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भारत का मीडिया इस अर्थ में अ-मानवीय है कि वह रीजन,रेशनेलिटी और जीवन के सारवान सवालों को बुनियादी तौर पर नहीं उठाता। वह मनुष्य और पशु में भेद नहीं जानता। वह विश्वसनीय ज्ञान और सूचना का स्रोत अभी तक नहीं बन पाया है। वहां बार-बार नियंत्रण के विभिन्न रूपों का अभ्यास किया जाता है। वहां मोटे तौर पर विज्ञापनदाता,राजनीतिज्ञ और चोंचलबाजों की गणित और नियंत्रण का ख्याल रखा जाता है। अप्रत्यक्षतौर पर वे राज्य-कारपोरेट घरानों के भोंपू की तरह काम करते हैं। मानवीय और गैर-मानवीय जीवनशैली के पहलुओं में अंतर करने की तमीज अभी तक पैदा नहीं कर पाए हैं।
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भारत का मीडिया इस अर्थ में अ-मानवीय है कि वह रीजन,रेशनेलिटी और जीवन के सारवान सवालों को बुनियादी तौर पर नहीं उठाता। वह मनुष्य और पशु में भेद नहीं जानता। वह विश्वसनीय ज्ञान और सूचना का स्रोत अभी तक नहीं बन पाया है। वहां बार-बार नियंत्रण के विभिन्न रूपों का अभ्यास किया जाता है। वहां मोटे तौर पर विज्ञापनदाता,राजनीतिज्ञ और चोंचलबाजों की गणित और नियंत्रण का ख्याल रखा जाता है। अप्रत्यक्षतौर वे राज्य-कारपोरेट घरानों के भोंपू की तरह काम करते हैं। मानवीय और गैर-मानवीय जीवनशैली के पहलुओं में अंतर करने तमीज अभी तक पैदा नहीं कर पाए हैं।
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भारत और यूरोप के मीडिया में एक अंतर है। यूरोप में मानवोत्तर दौर की ओर मीडिया प्रयाण कर रहा है ,वहां सारवान मानवीय मसले उठाए जा रहे हैं।मानवीय त्रासदी और मानवाधिकारों के सवालों पर ध्यान दिया जा रहा है। भारत में इसके उलट अमानवीय ,बोगस,मृत विषयों को व्यापक कवरेज दिया जा रहा है।
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माओवादी हिंसा प्रभावित इलाके हमारे देश में कल्याणकारी पूंजीवादी राज्य की असफलता के ध्रुवतारे हैं। इनइलाकों में माओवादियों-सरकार और कारपोरेट घरानों के द्वारा सार्वजनिक संपदा की इस -उस तरह खुली लूट हो रही है। जमकर हिंसाचार हो रहा है। एक तरह से ये इलाके कत्लघर बने हुए हैं।
सार्वजनिक संपदा की लूट को तमाशबीन की तरह देखना मध्यवर्ग की प्रवृत्ति रही है।वे इवेंट में मजा लेते हैं।फलतः मीडिया इस इलाके की घटनाओं को इवेंट बनाकर पेश करता रहा है।
आयरनी यह है कि माओवादीनेता आदिवासी संपदा संरक्षण के नाम पर अन्य किसी भी दल को वहां घुसने नहीं देते। अन्यदलों के नेताओं को इन इलाकों में जाने की फुर्सत नहीं है। यहां तककि मुख्यमंत्री को भी समय नहीं मिलता कि वो इन इलाकों में जाए और जनता की सुने। दलविहीन,संसाधन-सुविधाविहीन और तंत्रविहीन समाज के रूप में ये इलाके लूट और कत्ल के केन्द्र बन गए हैं। सैंकडों टीवी चैनलों और इंटरनेट क्रांति के बाबजूद इन इलाकों का निरंतर जमीनी कवरेज अभी अदृश्य बना हुआ है।
मुझे याद है विनायकसेन की रिहाई के समय एकमात्र कईदिन तक मीडिया ने प्रधान कवरेज दिया था। उसके बाद माओवादी हिंसा प्रभावित इलाकों का कवरेज हाशिए का कवरेज रहा है।
मीडिया की या जिम्मेदारी है कि वह सारवान और सारहीन खबर में अंतर को बार बार सामने लाए। माओवादी हिंसा से अनेक मौत,अनेक मसले,नीतियां,प्रशासन और राजनीतिकदलों का संबंध है और सबसे बड़ा संबंध आदिवासियों की जिन्दगी का है। उनके जीवन पर केन्द्रित होकर अहर्निश कवरेज जब तक नहीं आएगा केन्द्र-राज्य सरकारों के ऊपर दबाब पैदा नहीं होगा। सवाल यह है कि क्या मीडियावाले आदिवासी इलाकों में जाने को तैयार हैं ? क्या उनके पास जमीनी हकीकत को बताने वाले संवाददाता हैं ?जागो बंधु जागो।
राजनीतिकदलों, मीडिया और बुद्धिजीवियों में एक प्रवृत्ति नजर आई है कि वे छत्तीसगढ़ में माओवादियों और पुलिसबलों के हिंसाचार पर जमकर कईदिनों तक न तो बहस करते हैं और न उसे प्रधान एजेण्डा बनाकर रखते हैं। एक तरह से देखें तो दामिनीरेपकांड के बराबर भी कभी प्रधान एजेण्डा इस इलाके के हिंसाचार को नहीं बनाया गया। मैनस्ट्रीम राष्ट्रीय मीडिया जब तक इस हिंसाचार को प्रमुख एजेण्डा नहीं बनाता तब तक समस्या की ओर ध्यान नहीं जाने वाला। अभी भी क्रिकेटसट्टाकांड महान खबर है। बदलो मित्रो ,बदलो। छत्तीसगढ़ के सरकारी-माओवादी हिंसाचार को प्रधान एजेण्डा बनाओ।
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छत्तीसगढ़ में माओवादियों द्वारा कांग्रेसीनेताओं पर किया गया हमला लोकतंत्र पर हमला है। यह बात सोनिया गांधी ने सही कही है। लेकिन भाजपा ने इसे युद्ध की घोषणा कहा है। लगता है भाजपावाले युद्ध की परिभाषा भी नहीं जानते। युद्ध कहकर उन्माद पैदा किया जा सकता है लेकिन जनता का दिल नहीं जीता जा सकता। भाजपा आज तक बस्तर आदि इलाकों में आम जनता का दिल क्यों नहीं जीत पायी ,जबकि उनके पास पूर्ण बहुमत है।
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केन्द्रीय मंत्री जयराम रमेश का मानना है कि माओवादी आतंकवादी हैं। यदि ऐसा है तो कम से कम आतंकियों का समर्थन करने वाली बेवसाइट सरकार बंद करे। उन लोगों पर पाबंदी लगाए जो माओवादियों का समर्थन करते हैं।
मेरी नजर में माओवादी आतंक फैला रहे हैं ,हत्याएं कर रहे हैं,अन्य समाजविरोधी गतिविधियां कर रहे हैं,लेकिन आतंकी कहना सही नही नहीं है।
माओवादियों को यदि केन्द्र का एकमंत्री आतंकवादी मानता है तो केन्द्र सरकार को उनको आतंकवादी संगठन की केटेगरी में वर्गीकृत करके प्रतिबन्धित संगठन घोषित कर देना चाहिए।
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टीवी चैनलों ने माओवादी हिंसा में मारे गए लोगों के अंतिम संस्कार का लाइव प्रसारण क्यों नहीं किया ? क्या आपलोगों ने किसी चैनल पर अंतिम संस्कार का लाइव प्रसारण देखा ?
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माओवादियों और आतंकियों को कम करके आंकने और उनके द्वारा पैदा किए गए खतरे की अनदेखी करने का दुष्परिणाम है कि छत्तीसगढ़ में कांग्रेस का समूचा प्रमुख नेतृत्व माओवादियों के हाथों मारा गया। आतंकवादियों के प्रति तदर्थभावबोध मौत के मुँह में ले जा सकता है।
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भारतीय मीडिया में कु-सूचना तेजी से चलती है ,उनके लिए सत्य और तथ्य प्रासंगिक नहीं रह गए हैं।
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शीतयुद्ध ,सीआईए और साहित्य

   

ओम थानवी और अर्चना वर्मा ने साहित्य और सीआईए के अन्तस्संबंध की बहस को नितांत व्यक्तिगत और आत्मगत रूप से देखा है। साहित्य और सीआईए के अन्तस्संबंध को अशोक पाण्डेय या अन्य लेखक की राय मात्र के रूप में न देखकर,उसके मर्म में छिपे बड़े सवाल के रूप में वस्तुगततौर पर देखा जाता तो बेहतर होता। 
सीआईए के साथ साहित्य या कला के संबंध के सवाल को कमलेशजी ने ही पहले उठाया था तो उसकी जड़ों में जाने की जरूरत थी, न कि आत्मगत ढ़ंग से रिएक्ट करने की।
ओमथानवी,अर्चना वर्मा,अशोक पाण्डेय आदि की प्रतिक्रियाओं में निजी राय में जल्द ही मूल्य निर्णय करने का जो भाव है वह चीजों को सही परिप्रेक्ष्य में समझने नहीं देता। 
मूल्य निर्णय से आलोचना यथासंभव बचे तो आलोचना में मजा आता है। ओमथानवी,अर्चना वर्मा,अशोक पाण्डेय आदि अपने मित्र हैं और लोकतांत्रिक लोग हैं। सवाल इन लोगों की पक्षधरता का भी नहीं है। 
सवाल है सीआईए और कला के अन्तस्संबंध का। इस सवाल पर क्या स्टैंड है ओम थानवी या अर्चना वर्मा का। इस प्रसंग में मैं यहां बहस का दायरा बड़ा करने की कोशिश कर रहा हूं जिससे हिन्दी की तू-तू-मैं-मैं से आलोचना को बचाया जाए। यह सर्वमान्य तथ्य है कि सीआईए ने आधुनिककलाओं को औजार की तरह इस्तेमाल किया था और इसके अकाट्य प्रमाण मौजूद हैं। वे इंटरनेट पर भी हैं।
हिन्दी में जाने-अनजाने सीआईए पर जब भी बहस होती रही है और यह आभास भी दिया गया है कि सीआईए का काम तो जासूसी करना है ,साहित्य ,कला, संस्कृति से उसे कोई लेना-देना नहीं है।सच इसके एकदम विपरीत है।
सीआईए ने कला,साहित्य,संस्कृति के क्षेत्र में महज पुस्तकों का प्रकाशन करके समाजवाद को नंगा करनेवाली सस्ती किताबें मुहैय्या कराने का काम ही नहीं किया बल्कि इससे आगे जाकर गंभीर काम किया है जिसकी हिन्दी के अधिकांश पत्रकार,लेखक और आलोचक उपेक्षा करते रहे हैं। सीआईए ने अमूर्त एक्सप्रेनिस्ट कला आंदोलन को पैसा दिया,संगठित किया और राजनीतिक समर्थन दिया। उसने Jackson Pollock, Sam Francis, Willem de Kooning, Barnett Newman, Robert Motherwell, Mark Rothko जैसे कलाकारों का सोवियत संघ के खिलाफ इस्तेमाल किया। Frances Stonor Saunders की लिखी किताब The Cultural Cold War – The CIA and the World of Arts and Letters.इस प्रसंग में उल्लेखनीय है। इस किताब में बताया गया है कि सीआईए ने किस तरह दुनिया के अनेक देशों में कलाकारों, साहित्यकारों आदि का अपनी सांस्कृतिक नीति के प्रचार-प्रसार के लिए इस्तेमाल किया।
हिन्दीलेखक सीआईए का सवाल आते ही लेखकों का एक वर्ग सीआईए के प्रति आत्मगत नजरिए का किसी न किसी रूप में शिकार होता रहा है। ऐसे ही आत्मगतता और अधूरी समझ हाल ही अर्चना वर्मा के कथादेश में प्रकाशित लेख और आज (2-6-13)के जनसत्ता में प्रकाशित ओम थानवी के लेख में नजर आती है। सीआईए को लेकर ये दोनों लेख तदर्थवादी नजरिए को व्यक्त करते हैं।
सीआईए जैसा विशाल नियोजित संगठन चलताऊ नजरिए से समझ में नहीं आएगा। हिन्दी में संभवतः सबसे पहले मुक्तिबोध ने शीतयुद्ध की अमेरिकी राजनीति को नईकविता के प्रसंग में रेखांकित किया था और उसी दौर में रामविलास शर्मा ने भी कई लेख लिखे थे।
इसी क्रम में सुधीश पचौरी ने अपनी पीएचडी में शीतयुद्धीय राजनीति की नई कविता के दौर में क्या भूमिका रही है उसका "नई कविता का वैचारिक आधार " किताब में जिक्र किया है। इसी सिलसिले में भारतभवन और अमेरिकी फंडिंग को लेकर जनवादियों और प्रगतिशीलों में बहस हुई है और उस बहस में भी कई महत्वपूर्ण लेख एक जमाने में सुधीश पचौरी ने उत्तरगाथा आदि में लिखे थे।
यह खुला सच है कि कॉग्रेस फॉर कल्चरल फ्रीडम नामक संगठन का जन्म सीआईए के सहयोगी संगठन के रूप में हुआ था और उसके भारत में भी सदस्य थे जिसमें बाबू जयप्रकाशनारायण, अज्ञेय,रामवृक्ष बेनीपुरी आदि के नाम प्रमुख हैं।

कुछ समय पहले टीवी पर When the CIA Infiltrated Culture नामक डाकूमेंटरी देखी थी। इसे तीन साल की कड़ी मेहनत और रिसर्च के बाद इसे तैयार किया गया था। इसमें बताया गया कि किस तरह संस्कृति के क्षेत्र में मार्शलप्लान के तहत सीआईए ने कला को सब्सडाइज को किया और कलाओं के जरिए व्यक्तिगत चयन की आजादी के सवाल को प्रचारित किया गया। इस काम Farfield Foundation और the Congress for Cultural Freedom का जमकर इस्तेमाल किया गया। सन् 50 और 60 के दशक में यूरोप के पचासों संगठनों को करोड़ों डॉलर की सालाना मदद दी गयी। इसी क्रम में सीआईए ने विचारधाराहीनता की विचारधारा का प्रचार किया। वे लेखक -कलाकार जो विचारधारा का निषेध करते थे वे जाने-अनजाने इस खेमे का हिस्सा बनते चले गए। इसमें वे लेखक भी शामिल हैं जो सभी किस्म की विचारधारा का निषेध करते थे और वे भी जो मार्क्सवाद विरोधी थे,समाजवाद विरोधी थे,सोवियत संघ विरोधी थे।" नो आइडियोल़ॉजी "उनकी विचारधारा थी। हमारे ओमथानवी टाइप लोग उसी कोटि में आते हैं।

सीआईए के सांस्कृतिक मार्शल प्लान में लेखकों से यह मांग की गयी कि वे कला से राजनीति को धो-पोंछकर साफ कर दें।राजनीतिरहित कलाओं के सृजन पर जोर दिया गया>
सीआईए के अनुसार लेखक हर विषय पर लिख सकता था लेकिन सीआईए स्पांसर "फ्रीडम "के प्रति आलोचनात्मक नजरिया व्यक्त करने आजादी इन लेखकों को नहीं थी। लेखक सामुदायिकता की आलोचना करे,व्यक्तिनिष्ठता की आलोचना करे,सरकार की आलोचना करे,बाजार की शक्तियों के पक्ष में लिखे।
इसी तरह एक्सप्रेसनिज्म,अमेरिकी अवांगार्द ,संगीत समारोह,कला प्रदर्शनियों आदि पर जोर दिया गया। गुंटर ग्रास ने When the CIA Infiltrated Culture नामक वृत्तचित्र में कहा-“The ideology of the CIA was that the West had to be the most modern of the modern,”

क्या इस बयान से कमलेश जैसे लेखक कहीं प्रभावित तो नहीं हैं ?

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मेरा बचपन- माँ के दुख और हम

         माँ के सुख से ज्यादा मूल्यवान हैं माँ के दुख।मैंने अपनी आँखों से उन दुखों को देखा है,दुखों में उसे तिल-तिलकर गलते हुए देखा है।वे क...