शुक्रवार, 2 मई 2014

उत्तर आधुनिकता का पुनर्पाठ


फ़्रेडरिक जेम्सन ने कहा 'उत्तर आधुनिकता परवर्ती पूँजीवाद का सांस्कृतिक तर्क है।' यानी यह न बुरा है और न अच्छा है बल्कि यह तो एक अवस्था है जिसमें सबको रहना है और इसे लेकर सबको राय ज़ाहिर करनी है ।
भारत और यूरोप में उत्तर आधुनिक परिस्थितियों में बुनियादी अंतर है । यूरोप में उत्तर आधुनिकता आई है सत्तर के बाद के वर्षों में वहाँ पर द्वितीय विश्व युद्ध के बाद यूरोप के निर्माण की प्रक्रिया शिखर पर थी जापान के निर्माण का काम ख़त्म हो चुका था । पूँजीवादी विकास शिखर पर था । मुद्रा स्थिर थी ।बाज़ार सामानों से भरे पड़े थे। अमेरिका वियतनाम में करारी हार के कगार पर था । अमेरिकी समाज में ज़बर्दस्त आंदोलन थे । महँगाई थी। विकास एक जगह जाकर ठहर गया था । क़र्ज़ बढ़ रहे थे । डेविडहर्वे के शब्दों में कहें तो पूँजी को डी रेगुलेट किया गया , सार्वजनिक क्षेत्र के संस्थानों का निजीकरण किया गया। मुद्रा का अवमूल्यन हुआ। मज़दूरों के हकों पर हमले बढे।
इसके विपरीत भारत की स्थिति थी। यहाँ पर बैंकों का राष्ट्रीयकरण हुआ। पाक से १९७१ में हम युद्ध जीते । शानदार रेल हड़ताल हुई। बड़े पैमाने पर १९७४-७५ में आंदोलन हुए। आपातकाल आया।इंदिरा हारी । इंदिरा की वापसी हुई । लेकिन १९९०-९१ तक आते आते देश गहरे संकट में फँस गया और मनमोहन अर्थशास्त्र का जन्म हुआ। बेकारी और महँगाई के साथ सरकारी ख़ज़ाने में बहुत कम मुद्रा थी।
आपातकाल में उपग्रह छोड़ा गया । राजीवयुग में कम्प्यूटर क्रांति हुई । टीवी का विकास हुआ। सन् १९८० के बाद धीरे धीरे कुछ ऐसा घटा जिसको देखकर लगता था कि लोग इतिहास से बदला लेने पर आमादा हैं । मसलन् ओबीसी आरक्षण, राममंदिर आंदोलन, असम और पंजाब के आंदोलन आदि की एक ही धुन थी कि इतिहास में जो ग़लतियाँ की गयी हैं उनको दुरुस्त करना है । दलितसाहित्य और स्त्री साहित्य में भी इसे लेकर बग़ावत दिखाई दी। वे भी साहित्य में इतिहास के ख़िलाफ़ थे। इतिहास को नहीं मानते थे।
पहले रेगुलेशन पर ज़ोर था ,अब डी रेगुलेशन पर ज़ोर था । पहले लाइसेंस राज था अब लाइसेंस राज का खात्मा कर दिया गया। हर क्षेत्र में डीरेगूलेशन को लागू किया गया ।काम के घंटे बढ़ा दिए गए। पूरे सिस्टम का कम्प्यूटरीकरण आरंभ हुआ । प्रिंटयुग से कम्प्यूटर युग में आ गए। बाज़ार से माॅल के दौर में आ गए। महिलाओं ,अल्पसंख्यकों , किसानों ,मज़दूरों और आदिवासियों पर हमले तेज़ हुए। जातीय घृणा में इज़ाफ़ा हुआ। कल्याणकारी राज्य का चरित्र बदलने का प्रयास किया गया।
बहुराष्ट्रीय कंपनियों का कारोबार अंधाधुँध गति से बढ़ा। विश्व व्यापार संगठन के ढाँचे और नियमों से हमने अपने को बाँध लिया और देश में सभी क्षेत्रों में डीरेगूलेशन या विनिमयन को लागू कर दिया। सार्वजनिक संपदा और संसाधनों की खुली लूट हुई और उसे औने-पौने दामों पर निजी क्षेत्र को सौंप दिया गया । एक तरह से सार्वजनिक संपदा और कृषिभूमि के ख़िलाफ़ कारपोरेट युद्ध की घोषणा थी।
समूचे देश में नव-धनाढ्यों की आँधी आ गयी। देखते ही देखते हर शहर में करोड़पति पैदा हो गए । मध्यवर्ग के लोग करोड़पति हो गए। यह नए क़िस्म के फ्लेगजिबिल , फ़्री फ्लोटिंक और सामंजस्यवादी नए क़िस्म के यथार्थ का आगमन था।
मसलन पहले कार वाला अमीर था और अमीर से हम नफरत करते थे ,लेकिन नई वास्तविकता यह है कि हर मध्यवर्गीय व्यक्ति के पास कार है और कार अब अमीरी का प्रतीक नहीं रह गयी है। कलर टीवी अमीरों की चीज़ थी लेकिन अब नहीं है। फ़ोन बड़े लोगों के यहाँ हुआ करता था ,आज सबके हाथ में है।
हर स्तर पर सर्जनात्मक क्रांति हुई है। विज्ञापन से लेकर पुस्तक प्रकाशन तक सर्जनात्मक सौंदर्य की वर्षा हो रही है। नए क़िस्म की ग्लोबल अस्मिता ने पैर फैला दिए हैं। पहले पूँजी का सौंदर्य पर प्रभाव सीमित क्षेत्र तक था । लेकिन नई स्थितियों में पूँजी के वैभव ने आम जीवन पर असर डालना आरंभ कर दिया है । सब्सीडी पर हमले हो रहे हैं।
ग्लोबल स्तर पर चीन का पूँजीवादी बाज़ार के रुप में उदय बहुत बड़ी परिघटना है । इसने बहस के समूचे आधार को ही बदल दिया है । मज़ेदार बात यह है कि हमारा हिंदी का लेखक अभी भी नक्सलबाडी आंदोलन में फँसा है या शीतयुद्ध के मानकों में उलझा पड़ा है।
नए युग की ख़ूबी है तकनीक हमारे संचार ,राजनीति, संस्कृति आदि का निर्धारण कर रही है। समाजवाद का विघटन और कम्युनिस्ट पार्टियों के जनाधार में ज़बर्दस्त गिरावट ने मेहनतकश जनता को असहाय अवस्था में छोड़ दिया है।
महाख्यान का अंत हुआ है। बाज़ार में भयानक प्रतिस्पर्धा जन्म ले चुकी है और इससे राजनीति भी प्रभावित हुई है । अमेरिकी वर्चस्व में गिरावट आई है। चीन का महाशक्ति के रुप में उदय हुआ है । नई परिस्थितियों में राज्य के पास पूँजी निवेश को नियंत्रित करने का अधिकार नहीं रहा। राज्य जब निवेश को नियंत्रित नहीं कर सकता तो वह सूचना को भी नियंत्रित नहीं कर सकता ।
किसी एक नरेटिव पर लोगों की नज़र नहीं टिकी है बल्कि लोग अलग अलग क़िस्म के नरेटिव में ध्यान लगाए हैं । यही महाख्यान के अंत का अर्थ है ।
नव्य आर्थिक उदारीकरण के दौर में व्यक्ति के निजी हितों को तरजीह दी गयी। सामाजिक हित के सवालों को पीछे छोड़ दिया गया।
फ़्रेडरिक जेम्सन ने उत्तर आधुनिकता को परवर्ती पूँजीवाद का सांस्कृतिक तर्क कहा । लेकिन इसे नव्य आर्थिक उदारीतरण की विचारधारा भी कह सकते हैं। यह कोई आकाश से टपकी धारणा नहीं है बल्कि ऐतिहासिक तौर पर विकसित हुई अवधारणा है ।
बाज़ार से लेकर व्यक्ति तक मेकओवर का ग्लोबल रुप देखने में आ रहा है । इस पर सोचने की ज़रुरत है।
हिंदी में " उत्तर आधुनिकतावाद "नाम सुनकर ही समीक्षक भड़क जाते हैं । मैं तो स्वयं यह ग़ुस्सा अनेकबार देख चुका हूँ। नाम सुनकर राय बनाना और फिर उलटी सीधी राय बनाना यह हिंदी में आम बात है और दुर्भाग्यजनक बात यह है कि यह काम समीक्षकों ने किया है।
समस्या नामकरण की नहीं है समस्या बदले हुए यथार्थ को समझने और उसकी सही समझ बनाने से जुड़ी है। हिंदी समीक्षा अभी शैशव काल में है। यहाँ किसी भी अवधारणा पर कोई गंभीर लेखन नहीं हो रहा । ठोस धारणाओं के निर्माण और विमर्श का काम नहीं हो रहा। जो काम हुआ है वह हमें अवधारणाओं की सही समझ नहीं देता।
मसलन हमने आलोचना में आधुनिकतावाद , रैनेसां, औद्योगिकीकरण , प्रगतिशील साहित्य ,लोकतंत्र, भारत विभाजन ,भूमंडलीकरण आदि को लेकर कोई गंभीर अवधारणात्मक विवेचन का काम नहीं किया है । हमारे यहाँ तात्कालिक या सांगठनिक या मित्रतावश या उत्सवधर्मी आलोचना है इसमें वस्तुगतता का भयानक अभाव है।
साहित्य समीक्षा के अनेक मार्ग हैं । किसी को रैनेसां का मार्ग पसंद है ।किसी को भक्ति आंदोलन का मार्ग पसंद है ।किसी को १९१७ की अक्टूबर क्रांति से प्रभावित मार्ग पसंद है।किसी को प्रतिवाद का नक्सलबाडी मार्ग पसंद है ।कोई आधुनिकता तो कोई दलितसाहित्य या स्त्री साहित्य के मार्ग से गुज़रना चाहता है। किसी को विवेकवादी परंपरा का मार्ग पसंद है किसी को राष्ट्रवादी परंपरा का मार्ग पसंद है।
यानी साहित्य समीक्षा में हम एक नहीं अनेक मार्गों से यात्रा करते हैं । कोई अस्मिता के मार्ग से समीक्षा की यात्रा कर रहा है तो कोई समुदाय या वर्ग के मार्ग से साहित्य समीक्षा के मार्ग पर चल पडा है । इन सभी मार्गों में अंतर्क्रियाएं हैं जिनकी हमें अनदेखी नहीं करनी चाहिए।
साहित्य की आलोचना के जिस मार्ग से भी यात्रा करें सवाल यह है कि जाना कहाँ है ? किस तरह के साहित्य के ज़रिए जाना चाहते हैं और अंततः क्या करना चाहते हैं ?
साहित्य समीक्षा में रमण करते समय अंतर्क्रियाएं और प्रक्रिया महत्वपूर्ण हैं । यदि अंतर्क्रियाओं और प्रक्रिया की उपेक्षा करेंगे तो यह संभव है कि समीक्षा अविवेकवाद के टीले पर खड़ी मिली ।
मसलन दलित साहित्य या स्त्री साहित्य पर बातें करते समय अन्य साहित्य रुपों और विचारधाराओं के साथ चल रही अंतर्क्रियाओं और प्रक्रिया की अनदेखी न करें। वरना स्त्रीसाहित्य के नाम पर समीक्षा में अविवेकवाद पैदा होगा और इससे स्त्रीसाहित्य का स्वाभाविक विकास और साहित्यबोध बाधित होगा । इससे साहित्यिक अधिनायकवाद पैदा होगा ।
उत्तर आधुनिक नज़रिए से देखें तो पाएँगे कि हम सब असंपूर्ण साहित्य परंपरा में जी रहे हैं। किसी मार्ग विशेष के ज़रिए साहित्य का समग्र नज़रिया बनाना कठिन हो गया है ।
साहित्य में दृष्टियों की अंतर्क्रियाओं को हमें सिद्धांतत: मानना पड़ेगा और अंतर्विषयवर्ती पद्धति से काम लेना होगा।प्रधान और गौण के वर्गीकरण के बाहर निकलकर बहुलतावादी नज़रिए से देखना पड़ेगा ।

उत्तर आधुनिक अवस्था और समाज को जानने के लिए नई संवेदना और नई चेतना की ज़रुरत है। यह ऐसा समाज है जिसमें लोग तमाशा देखते हैं ,हस्तक्षेप नहीं करते।अराजक राजनीतिक आंदोलन पैदा हो जाते हैं ।
समूचे समाज में पूँजीवाद का बोलबाला है। साहित्य में नई प्रवृत्तियाँ जन्म लिया है। आधुनिकतावादी रुपों के प्रति असंतोष व्यापक तौर पर व्यक्त हो रहा है। रुढिबद्धता, बोरियत और नक़ली आशाओं का संचार में वर्चस्व है। स्थानीय स्तर पर पश्चिमी संस्कृति के प्रति ग़ुस्सा कम और प्रेम ज़्यादा है। मीडिया से लेकर स्थापत्य तक और संस्कृति से लेकर प्रफाॅर्मिंग आर्ट तक बड़े मूलगामी परिवर्तन हुए हैं।

लोकतंत्र और लोकतांत्रिक संरचनाओं के विकास के साथ तीव्रगामी भूमंडलीय कम्युनिकेशन नेटवर्क का विकास हुआ है ।
आधुनिककाल आने के साथ जो कलारुप विकसित होते हैं वे पुराने कलारुपों को रुपान्तरण के लिए मजबूर करते हैं। कम्युनिकेशन की तकनीक की संगति में भाषा ,कला और साहित्य रुपों का तेज़ी से विकास होता है । सामान्यतौर पर हमने कम्युनिकेशन तकनीक एवं कलाओं के अंतस्संबंध की अनदेखी की है। लेकिन उत्तर आधुनिक अवस्था हमें साहित्य और कम्युनिकेशन तकनीक के अंतस्संबंध पर विचार के लिए मजबूर करती है।
रेल,दूरसंचार ,प्रेस , रेडियो और फ़िल्म के आने के साथ कला एवं साहित्यरुपों में किस तरह के बदलाव आए हमने कभी गंभीरता से उनका विश्लेषण नहीं किया ।
कम्युनिकेशन तकनीक के नए रुपों ने कला और साहित्य में स्टाइल या शैलियों की बाढ़ पैदा की है । स्टाइल में जितने प्रयोग इस दौर में हुए हैं उतने पहले कभी नहीं हुए।
आधुनिककाल में नए प्रयोगों की आधार स्थली है उपन्यास विधा। कम्युनिकेशन तकनीक और आम संचार के रिश्ते में बुनियादी बदलाव आया है ।
आधुनिकता के साथ आमलोगों में "औचक "भाव से चीज़ों को देखने की प्रवृत्ति बढ़ी है।
हर क्षेत्र में "नए" की माँग बढ़ी है । "नए" के पदबंध का हर क्षेत्र में उपयोग बढ़ा है ।
ल्योतार के अनुसार उत्तर आधुनिकतावाद का मतलब यथार्थवाद का अंत नहीं है। बल्कि इसका मतलब है कि लेखक को समुदाय के रुप में देखें और समुदाय के रुप में स्वीकृति प्रदान की जाय अथवा उसे बीमार मानकर उसका उपचार किया जाय। हमारे बीच ऐसे अनेक लेखक हैं जिनके पास आधुनिकतावाद या प्रगतिवाद की कोई विरासत नहीं बची है। इसके कारण वे आधुनिकतावाद या प्रगतिवाद की परंपरा या दायरों का अतिक्रमण गए हैं। लेखक के वैचारिक अतिक्रमण को कभी गंभीरता से विश्लेषित नहीं किया गया। इसके कारण न तो कभी लेखक की मदद कर पाए और नहीं समझ ही पाए ,उलटे उसके प्रति संदेह बढ़ा । उस पर हमले किए।
विगत चालीस सालों में यथार्थ के नाम पर जो बहसें चलीं उससे सामयिक यथार्थ को समझने में मदद कम मिली। दूसरी ओर बुर्जुआजी की इतिहास में प्रतिष्ठा बढ़ती चली गयी ।यथार्थवाद के बहाने या यथार्थ रुपान्तरण के बहाने सिस्टम के जो चित्र पेश किए गए उनसे यथार्थ कम और कृत्रिम यथार्थ ज़्यादा सामने आया ।
नए तकनीकी जगत ने इतिहास के हरक्षण को मूल्यवान बना दिया है। एक फ़ोटो के हज़ार फ़ोटो ,हर क्षण के फ़ोटो ,आदि की प्रक्रिया ने इतिहास में हर अनुभव और संवेदना को सुरक्षित करने और दर्ज करने की संभावनाएँ पैदा की हैं। अब भाषा के हर रुप और सभी क़िस्म के वाक्यों के संरक्षण की संभावनाएं पैदा हो गयी हैं। इस क्रम में कम्युनिकेशन की नयी संहिता या कोड भी पैदा हुआ है । आप यदि इस कोड को खोलना जानते हैं तो यथार्थ समझ पाएँगे।
इधर के दौर में "यथार्थ" और "अस्मिता"पर केन्द्रित ख़ूब लिखा गया है । लेकिन यह युग इनके लिए पाठकों या दर्शकों की गारंटी नहीं देता । अब साहित्य में " सौंदर्य क्या है ? पर बात नहीं हो रही बल्कि "कला में क्या कहा जा रहा है " इस पर बातें हो रही हैं। फलतः यथार्थ के सवालों की जमकर उपेक्षा हो रही है और अकादमिक माँग-पूर्ति या उपयोगितावादी या नारेबाज़ी का साहित्य ख़ूब लिखा जा रहा है ।
आम जनता में समस्याओं को लेकर बेचैनी है लेकिन वह रेडीमेड समाधान चाहती है। जनता के अनुभवों में अवसाद ने बड़ी जगह घेर ली है। जनता चाहती है कि सरल ढंग से कहा जाए।इस बीच में जनता की जीवनशैली बदली है और उपभोग की डिक्टेटरशिप ने हमारे जीवन में आधिपत्य स्थापित कर लिया है । मनोरंजन की धारणा बदली है और "ख़ाली समय " की धारणा लोकप्रिय हुई है । "यथार्थ की नब्ज़" से लेखक की पकड़ से छूट गयी है जिसे वह संकीर्ण क़िस्म के ऐतिहासिक विवरण और ब्यौरों के ज़रिए भर रहा है । इसका परिणाम यह निकला है कि वह जो लिख रहा है उसमें सामयिक यथार्थ की कहीं से गंध नहीं मिलती फलत: उसका पाठक और समाज से अलगाव भी बढ़ा है । यह नीत्शे के शब्दों में एक तरह का निहिलिज्म है।
उत्तर आधुनिक दशा हो या आधुनिकता हो वहाँ पर दर्द और आनंद का द्वंद्वात्मक संबंध और अंतर्क्रियाएं साफ़ नज़र आती हैं। आनंद के जितने भी विषय हैं वे व्यक्ति के निजीदर्द से ही पैदा हुए हैं।
उत्तर आधुनिक लेखन में ऐसा बहुत सा लेखन आ रहा है जिसमें समीक्षकों के अनुसार सौंदर्य नहीं है। ऐसा भी लेखन आ रहा है जो "रुपरहित रुप" से गढ़ा हुआ है।
नया फिनोमिना है रुपरहित ,संवेदनारहित प्रस्तुतियों पर ज़ोर और वर्तमान के प्रति अंधप्रेम।
उत्तर आधुनिक अवस्था के कारण लेखक नियमरहित लेखन पर ज़ोर दे रहे हैं। यह वह दौर है जब चीज़ें घट जाने के बाद नियम बनते हैं। हमने क्या किया उसके बाद नियम बनते हैं ।
लेखन में शब्द इवेंट की तरह आ रहे हैं ।ये वे इवेंट हैं जो लेखक के ज़ेहन में बहुत देर से आए हैं। या यों कहें जिनको बहुत देर से साहित्य में व्यंजित होने का मौक़ा मिला है ।
उत्तर आधुनिक लेखन हमेशा बिडम्बनाओं के गर्भ से ख़ासकर भविष्य की बिडम्बनाओं के गर्भ से पैदा होता है ।
ल्योतार का मानना है हमारा काम यथार्थ सप्लाई करना नहीं है। बल्कि ऐसी कल्पनाओं की सृष्टि करना है जो पहले कभी लेखक के मन में नहीं आईं। या कभी पेश नहीं की गयीं । इस प्रसंग में हम दलित और स्त्री साहित्य देख सकते हैं।
उत्तर आधुनिक भाषाखेल को समझें ,इस खेल की ख़ूबी है कि यह रुपान्तरणकारी है। नया नारा है "सीमाएँ तोड़ो अंतराल भरो", लोग विभिन्न रुपों में सीमाएँ तोड़ रहे हैं । यह नारा आलोचना से लेकर विधा तक सबकी सीमाएँ तोड़ी जा रही हैं। साहित्य और सामाजिक यथार्थ के जटिल संबंधों की ओर ध्यान गया है। इन दिनों साहित्य के पाठकों पर वैचारिक या राजनीतिक प्रभाव की व्यापक चर्चा हो रही है ।
परंपरागत समीक्षा ने श्रेष्ठ और बाज़ारू साहित्य का अंतर किया था लेकिन उत्तर आधुनिकों ने इस विभाजन को नहीं माना। "डिफरेंस" और " हाइब्रीडिटी" पर ज़ोर दिया गया। विधाओं में मिश्रण से लेकर पापुलरकल्चर तक के प्रयोगों पर ज़ोर दिया ।
ल्योतार ने लिखा उत्तर आधुनिकतावाद का अर्थ है स्थानीय परिस्थितियों को सीमित संदर्भ में देखा जाय। इसमें व्यक्ति के स्तरों को खोजा जाय ।
बौद्रिलार्द के अनुसार यह युग इमेज और सूचना के उत्पादन का युग है । पहले भौतिक वस्तुओं के उत्पादन पर ज़ोर था । उत्तर आधुनिकता में स्थानीयअवस्था पर ज़ोर है और सार्वभौम का निषेध है।
उत्तर आधुनिक अवस्था में अस्मिता की राजनीति केन्द्र में आ गयी है। रीतिवादी ढंग से इसके रुपों की सृष्टि हुई है। अस्मिता पर बहस कम और सृजन पर ज़ोर ज़्यादा है। अस्मिता के लेखक ठहरकर संवाद नहीं करना चाहते , वे उसके मसलों पर बहस करने की बजाय मनवाने पर ज़ोर ज़्यादा दे रहे हैं। यानी अस्मिता है और मानो। जो नहीं मानता उसको अछूतभाव से देखा जा रहा है। इसने अस्मिता की राजनीति का आतंक पैदा किया है । वस्तुगत तौर पर देखें तो अस्मिता की राजनीति का अस्मिता से ही पंगा है। अस्मिता की उपयोगिता के सवाल बड़े सवाल हो गए हैं ।
संवादहीन अस्मिता विमर्श वस्तुत:अस्मिता का रीतिवाद है। यह अस्मिता के प्रति आलोचनात्मक नज़रिए से वाद-विवाद-संवाद का निषेध करता है। इसकी अस्मिता के जड़ इतिहास में दिलचस्पी है । अस्मिता के गतिशील और रुपान्तरित पक्षों में कोई दिलचस्पी नहीं है। दलित और स्त्री आत्मकथाओं पर चल रही बहसों में हम इसे साफ़तौर पर देख सकते हैं।

साहित्य में सार्वभौम भाषा या साहित्यांदोलन की भाषा के प्रयोग की परंपरा रही है। लेकिन उत्तर आधुनिक लेखकों ने सार्वभौम भाषा का निषेध किया है । इसके विकल्प के तौर पर "निजी (प्राइवेट)भाषा", "निजी शैली" या "निजी मैनरिज्म" पर ज़ोर दिया । सामाजिक जीवन के चित्र सार्वभौम भाषा में पेश करने की बजाय निजी भाषा में पेश किए हैं। आज बड़े पैमाने पर दलित साहित्य या स्त्री साहित्य में जिस भाषा का प्रयोग हो रहा है वह "निजी भाषा" है। विलक्षण बात यह है कि पेशेवर लोगों में यह भाषा आ गयी है । आज लेखक इस तरह से लिख रहा है गोया वह किसी अन्य द्वीप का बाशिंदा हो। वह ऐसी भाषा बोल रहा है जो उसे सबसे भिन्न बनाती है। यह वह भाषा है जिसे विविधता के नाम पर पढ़ें और भूलें।
"निजी भाषा" का आर्थिक निजीकरण की प्रक्रिया से गहरा संबंध है । इसके अलावा "मृतभाषा" के जमकर प्रयोग हो रहे हैं। ख़ासकर नेताओं के भाषणों में यह भाषा ख़ूब इस्तेमाल की जा रही है।
"मृतभाषा" की शुरुआत आपातकाल के साथ होती है। सन् 1977 के बाद यह परवान चढ़ती है और राममंदिर आंदोलन, आरक्षण आंदोलन ,पृथकतावादी आंदोलन और आतंकी आंदोलन में यह मांसल बनती है और सोनिया,माया,मुलायम ,अन्ना हज़ारे आदि इसके नायक हैं। यह भाषणकला से बेहतरीन गद्यभाषा की विदाई की सूचना भी है।
उत्तर आधुनिक अवस्था के आने के साथ "व्यक्तिवाद" और "व्यक्ति" का एक विषय के रुप में साहित्य में अंत हो जाता है । ख़ासकर विगत 40 सालों में आई आत्मकथाओं में इसे आसानी से देखा जा सकता है। दलित और स्त्री की आत्मकथाओं में "व्यक्ति" के तौर पर कम और समूह या समुदाय के सदस्य के रुप पर ज़्यादा ज़ोर है।
आधुनिकता के दौर में व्यक्ति और व्यक्तिवाद एक महत्वपूर्ण फिनोमिना के तौर पर पैदा होता है वहीं पर " मैं" और "निजी अस्मिता" की अभिव्यक्ति पर भी ज़ोर था । उत्तर आधुनिकता के आते ही पुराने व्यक्तिवाद और व्यक्ति का अंत हो जाता है ।

भाषा में समय भी होता है। इसमें सामाजिक समय , मानवीय समय, अतीत ,भविष्य और स्मृति भी समाहित होती है। इसमें निजी अस्मिता भी होती है। ये सब समय के साथ बदलते रहते हैं। भाषा में समय की अनुभूतियाँ भी होती हैं । वाक्य स्थिर नहीं होते। वे "समय" के साथ
चलते हैं। इसलिए भाषा और समय को एक साथ रखकर देखना चाहिए ।
नई उत्तर आधुनिक भाषा में एक पहलू उन्मादी भाषिक अनुभव का भी है। यह ऐसी भाषा है जो लेखक के भौतिक आधार से पूरी तरह कटी है। निजी अस्मिता को नहीं जानती। "मैं" को नहीं जानती। वह लेखन को 'अन्य' के लेखन से जोड़कर नहीं देखती। उसके साथ अंतर्क्रिया नहीं करती। यह संवृत्ति दलित और स्त्री लेखन में है।
जबकि पुराने मध्यकालीन स्त्री और दलितलेखन में यह नहीं है। यह उत्तर आधुनिक लेखक समय पर सवारी करने की कोशिश में है जो कि असंभव कार्य है। वह ऐसे यथार्थ को रच रहा है जिसमें आनंद नहीं है। बल्कि आनंद का विलोम ज़्यादा व्यक्त हुआ है । 

अरविन्द केजरीवाल फिनोमिना

अरविन्द केजरीवाल फिनोमिना

25 April 2014 at 21:21
अरविंद केजरीवाल दिल्ली के मुख्यमंत्री बने फिर इस्तीफा दिया। फिलहाल वे बनारस से लोकसभा चुनाव लड़ रहे हैं। भारतीय राजनीति के संदर्भ में कई मायनों में यह विलक्षण फिनोमिना है । केजरीवाल ने लंबे समय से परंपरागत राजनीति से भिन्न सामाजिक सरोकारों की वैकल्पिक राजनीति की है। 'सूचना प्राप्ति अधिकार' से लेकर 'जन-लोकपाल बिल' तक विभिन्न मसलों पर आम जनता के विभिन्न तबकों में गंभीर राजनीतिक और वैचारिक प्रचार अभियान चलाया है। उन्होंने आम लोगों को जाग्रत ,संगठित और संघर्ष के लिए प्रेरित करने का काम निस्वार्थ भाव से किया है। यही काम उनकी राजनीतिक पूंजी भी है । 
    केजरीवाल फिनोमिना इसलिए महत्वपूर्ण है कि उसने स्वयंसेवी संगठनों की संसदीय राजनीति में भाग न लेने की प्रतिज्ञा को तोड़ा है। इस समय देश में तकरीबन 40हजार के करीब स्वयंसेवी सामाजिक संगठन हैं जो विभिन्न मसलों पर आम जनता में विभिन्न सामाजिक स्तरों पर काम कर रहे हैं। इन संगठनों की यह साझा राजनीतिक प्रतिबद्धता रही है कि संसदीय चुनावी राजनीति से दूर रहो, राजनीतिक दबाब समूह के रुप में काम करो और जनता को जाग्रत करो,शिक्षित करो और उसके बुनियादी मसलों पर संघर्ष करो । इन संगठनों की सांगठनिक क्षमता सीमित है,लेकिन संगठनों की संख्या असंख्य है और इनका राजनीतिक दबाब किसी भी बड़े राजनीतिक दल से ज्यादा रहा है ।
    केजरीवाल फिनोमिना को समझने के लिए एनजीओ राजनीति में विगत 25सालों में आए उभार और  विकास को जानना जरुरी है । केजरीवाल फिनोमिना के निर्माण में एनजीओ राजनीति की बहुत बड़ी भूमिका है। एनजीओ संगठनों की राजनीति मूलतःमानवाधिकारों की रक्षा और नागरिकसमाज के निर्माण की राजनीति है । मानवाधिकारों की चेतना के विकास और स्वीकृति दिलाने में एनजीओ संगठनों की केन्द्रीय भूमिका रही है ।
एनजीओ राजनीति का लक्ष्य संसद-विधानसभा या पंचायतें नहीं रही हैं । अधिकांश सक्रिय एनजीओ संगठनों की सामाजिक सक्रियता के प्रमुख विषय  हैं - आम लोगों की जिंदगी में विकास,नए आर्थिक विकास,खेती,बाँध,नहर,प्रकृति,साम्प्रदायिकता ,शिक्षा, साक्षरता,  सूचना प्राप्ति अधिकार,भ्रष्टाचार आदि मसलों की क्या भूमिका है और उनको क्या करना चाहिए । राजनीतिक दलों की कार्यप्रणाली से भिन्न ये संगठन कमोबेश जनता की शिरकत और उनके द्वारा ही फैसले लेने पर जोर देते रहे हैं ।इसने आम नागरिकों में दलीय राजनीतिक संगठनों से भिन्न किस्म का माहौल पैदा किया है ।
      केजरीवाल का राजनीति में आना या आम आदमी पार्टी का जन्म कोई आकस्मिक घटना नहीं है । यह चंद व्यक्तियों की राजनीतिक महत्वाकांक्षा की भी अभिव्यक्ति नहीं है। यह कारपोरेट षडयंत्र की दुरभिसंधि का परिणाम भी नहीं है।  आम आदमी पार्टी का उदय असल में स्वयंसेवी संगठनों की जनशिरकत की राजनीतिक प्रक्रिया का स्वाभाविक परिणाम है । जन-लोकपाल बिल का आंदोलन नहीं भी हुआ होता तो एकदिन इस प्रक्रिया के गर्भ से आम आदमी पार्टी जैसे किसी राजनीतिक दल का उदय होता । जन लोकपाल बिल के आंदोलन ने स्वयंसेवी संगठनों और जनशिरकत की राजनीतिक प्रक्रिया को सघन और तेज बनाया।
केजरीवाल फिनोमिना और आम आदमी पार्टी विचारधाराहीन नहीं है। यह फिनोमिना परंपरागत अर्थ में विचारधारा को नहीं मानता । यह समस्याकेन्द्रित मानवाधिकार परिप्रेक्ष्यों की अभिव्यक्ति है।  परंपरागत राजनीतिक दलों का आम जनता की समस्याओं के प्रति विचारधारा केन्द्रित नजरिया रहा है। मसलन् वे विचारधारा के आधार पर जनता को गोलबंद करते हैं और फिर उसे समस्या के साथ जोड़ने की कोशिश करते हैं। जमता उनके यहां दर्शकीय भूमिका अदा करती है। उनके यहां दर्शक और दाता का भाव है। जनता दर्शक है ,और राजनीतिकदल दाता हैं । जनता अनुयायी और वे नेता हैं।
    नेता जैसे बताए जनता वैसे करे। जनता की राय तब ही ली जाएगी जब नेता कहे या दल कहे। जनता की वही बात नेता या दल मानेगा जो अनुकूल हो । वे ही मसले उठाए जाएंगे जो दल या नेता बताए। उसी परिप्रेक्ष्य में लड़ाई लड़ी जाएगी जो दल या नेता ने तय कर दिया है। इसी फ्रेमवर्क में परंपरागत राजनीतिक दल निचले स्तर पर काम करते रहे हैं । इसके कारण जनता और दल या नेता के बीच में असमान संबंध बना है। इकतरफा कम्युनिकेशन हुआ है। बेमेल और स्वार्थी भ्रष्ट रिश्ता बना है। इस रिश्ते में ईमानदारी,जनशिरकत,मानवाधिकारों की चेतना,लोकतांत्रिक मानवीय व्यवहार और आचरण की कोई जगह नहीं रही। इस प्रक्रिया के कारण 20वीं सदी के उत्तरार्ध में निर्मित लोकतंत्र की सभी बुनियादें नष्ट हो गयीं। यह लोकतंत्र का सर्वसत्तावादी मार्ग है।
   लोकतंत्र के सर्वसत्तावादी मार्ग पर चलने के कारण हमारे संविधान में चित्रित सपने का अंत हो गया । संविधान,लोकतंत्र,धर्मनिरपेक्षता,समाजवाद मखौल,हास्य-व्यंग्य की विषयवस्तु में तब्दील हो गया । हमारे यहां  राजनीतिक सर्वसत्तावाद को धर्मनिरपेक्षता बनाम साम्प्रदायिकता, राष्ट्रीय एकता बनाम सामाजिक विभाजन, वामपंथी बनाम दक्षिणपंथी,प्रगतिशील बनाम प्रतिक्रियावादी ,धर्मनिरपेक्षता बनाम छद्म धर्म निरपेक्षता, एक परिवार का शासन बनाम कांग्रेसविरोध,संघ बनाम कांग्रेस,लोहिया बनाम नेहरु आदि विभिन्न केटटेगरी में वर्गीकृत किया और पैंसठ सालों से इन्हीं ध्रुवीकरणों में बाँधकर राजनीति का मूल्यांकन करते रहे । राजनीतिक सर्वसत्तावाद को हमने कभी निशाना नहीं बनाया। इस मामले में वामदलों से लेकर दक्षिणपंथी भाजपा तक सभी दल लोकतंत्र के नाम पर सर्वसत्तावाद का ही किसी न किसी रुप में अनुकरण करते रहे हैं ।
लोकतंत्र के आवरण में पल्लवित सर्वसत्तावाद ने लोकतंत्र की अपूरणीय क्षति की है। मसलन् कांग्रेस को यही सर्वसत्तावाद आपातकाल तक ले गया। भाजपा को2002 के गुजरात जनसंहार,अकालीदल को आतंकवाद-पृथकतावाद,शिवसेना को साम्प्रदायिकता,द्रमुकदलों को अंध क्षेत्रीयतावाद,वामदलों को निरुद्योगीकरण और पार्टीतंत्र की सत्ता-महत्ता तक ले गया । आमतौर पर लोकतंत्र पर बातें करते  समय हमने स्वतंत्र और स्वतःस्फूर्त जनशिरकत की सभी संभावनाओं को खत्म करके नियोजित लोकतंत्र में अपने राजनीतिक तंत्र का रुपान्तरण कर दिया । कमोबेश यह प्रक्रिया सभी दलों में घटित हुई ।
   केजरीवाल फिनोमिना राजनीतिक सर्वसत्तावाद को एकसिरे से खारिज करता है । जो लोग आम आदमी पार्टी को विचारधाराहीन होने का लेबिल लगा रहे हैं वे नहीं जानते कि राजनीति के जितने भी प्रचलित दलीय रुप हैं वे स्वयं में समस्याग्रस्त हैं। उनके पास अपनी सीमाओं से निकलने का कोई मार्ग नहीं है। मसलन्, भाजपा हो वामदल हों किसी के पास जनशिरकत को सुनिश्चित करने वाली न तो धारणा है और न सांगठनिक संरचनाएं ही है ।
   केजरीवाल फिनोमिना नियोजित जनता, पैसा देकर,दादागिरी या दबाब के जरिए जुटायी गयी जनता से भिन्न स्वतःस्फूर्त्त शिरकत करने वाली जनता की धारणाओं के आधार पर पैदा हुआ राजनीतिक फिनोमिना है । जिस गति से आम आदमी पार्टी से आमलोग सदस्यता ले रहे हैं वह अपने आप में विलक्षण  फिनोमिना है । किसी भी लोकतांत्रिक देश में किसी दल के साथ इतनी बड़ी तादाद में और इतने कम समय में आम लोगों ने दलीय मेम्बरशिप नहीं ली है । आम आदमी को जोड़ने की रणनीतियों को आम आदमी पार्टी सुगम और सर्वसुलह बनाया है । बिना किसी मध्यस्थ के आप सीधे सदस्यता ले सकते हैं ।अब दल है और जनता है। इन दोनों के बीच नेता नामक तत्व का लोप हो गया है । मसलन् आप फोन करें,एसएमएस करें.ऑनलाइन भरे और सदस्यता मिल जाएगी। सदस्यता लेने का यह तरीका प्रत्यक्षतः नेता की विदाई का आख्यान कह रहा है । पहले किसी भी दल का सदस्य होने के लिए नेता या कार्यकर्ता को पकड़ना पड़ता था और वही मेम्बरशिप दिलाता था लेकिन आम आदमी पार्टी ने इस समूचीप्रक्रिया को पारदर्शी और जनसुलभ बनाकर सर्वसत्तावादी राजनीति की बुनियाद में मट्ठा डाल दिया है ।
     सर्वसत्तावादी राजनीति की नींव सदस्य बनाने के नियम से बुनियादी तौर पर जुड़ी है । परंपरागत दलों में सदस्य बनने के लिए नेता या कार्यकर्ता से मिलना जरुरी था, यही नेता जनता और दल के बीच मध्यस्थ या सेतु होता है। यह राजनीति का सबसे भ्रष्ट तत्व है और यही सर्वसत्तावादी राजनीति की धुरी है । यहीं से दलाल पैदा हुआ है। कोई भी काम कराना हो तो इसी मीडिलमैन को पकड़ना होता है । मंत्री,सांसद,विधायक औदि तब कार्य करते हैं जब कोई मिडिलमैन आपके साथ हो। विगत 65 सालों में इसी मिडिलमैन ने विभिन्न स्तरों पर दलाल की भूमिका अदा की और आज यह हर दल में सबसे ज्यादा ताकतवर है। मसलन् सोनिया गांधी या नरेन्द्र मोदी से ज्यादा ताकतवर इनके मिडिलमैन हैं । आम आदमी पार्टी ने अपनी पार्टी सदस्यता को सरल-सुगम और सर्वसुलभ कराकर नेता की विदाई करके सदस्यता को जनशिरकत के पैराडाइम में ले जाकर खड़ा कर दिया है । यह सर्वसत्तावादी राजनीति के अंत की घोषणा भी है । 
   केजरीवाल फिनोमिना ने आम जनता की उम्मीदों को नए शिखर दिखाए हैं। आम आदमी बहुत उम्मीदें कर रहा है। उम्मीदें जगाना नई बातनहीं है, हर आंदोलन या नए राजनीतिक नारे के साथ जनता में उम्मीदें जगती रही हैं। लेकिन केजरीवाल से उम्मीदें अलग किस्म की आशाएं लेकर आई हैं और नए राजनीतिक संबंध को लेकर आई हैं । परंपरागत राजनीतिकदलों की जीत के साथ यह उम्मीद रहती थी  हमने वोट दे दिया अब तुम काम करो, हम पाच साल बाद देखेंगे। पांच साल बाद मूल्यांकन करेगे। मतदाता यह मानकर चलता है कि हमने वोट दिया और हमारा काम खत्म और अब नेता की जिम्मेदारी है वह अपना वायदा निभाए। इस इकतरफा संबंध को आम आदमी पार्टी ने उलट दिया है ।
    आम आदमी पार्टी बार-बार हर बड़े मसले पर जनता में जाने,जनता की राय लेने, सबकुछ जनता के बीच में साफगोई के साथ पेश करने पर जोर दे रही है । वे जो भी फैसला लेते हैं टीवी लाइव कवरेज के जरिए आम जनता में सीधे सम्प्रेषित करते हैं । इंटरनेट पर सभी फैसलों की जानकारी देते हैं । जनशिरकत को महत्व देते हुए सत्ता में जाने का फैसला दिल्ली के मुहल्लों में सभाएं करके किया। 
       विगत तीन दशकों में देश के विभिन्न हिस्सों में स्वयंसेवी संगठनों का जिस तरह नेटवर्क उभरकर सामने आया है और उसने मीडिया और समाज में विभिन्न समयों पर जो नए किस्म के लोकतांत्रिक राजनीतिकबोध और मानवाधिकारकेन्द्रित राजनीतिक प्रक्रिया को जन्म दिया है उससे स्थानीय स्तर पर मीडिया भी प्रभावित होता रहा है । उल्लेखनीय है कि मीडिया में स्थानीय स्तर पर स्वयंसेवी संगठनों के संघर्षों का कवरेज बराबर आता रहा है। यहां तक कि अनेकबार इस कवरेज ने राष्ट्रीय मीडिया में भी प्रमुखता के साथ स्थान बनाया है ।
      केजरीवाल फिनोमिना पर विचार करते समय हमें भारत के बदलते सार्वजनिक माहौल (पब्लिक स्फेयर) पर गंभीरता से विचार करना चाहिए । विगत30सालों में टेलीविजन और इंटरनेट ने आम आदमी के संपर्क,संबंध और संप्रेषण के तौर-तरीकों ने नए किस्म के जीवन संबंधों और जीवनशैली को जन्म दिया है । टेलीविजन और इंटरनेट जहां पर भी पहुँच रहे हैं वहां पर पुराने नजरिए में बदलाव आना शुरु हुआ है । दुनिया को देखने और समझने का संस्कार बदला है । इससे राजनीतिकदलों और जनता के संबंधों में बदलाव आया है। सार्वजनिक बहस के मुद्दे अब वे हैं जिनको मीडिया (टीवी-इंटरनेट) प्रमुखता से पेश करता है।
     प्रेसयुग से इलैक्ट्रोनिक युग में दाखिल होने के साथ भारत ने तेजी से साइबर युग में प्रवेश किया। टेलीविजन क्रांति के चंद वर्षों बाद ही कम्प्यूटर क्रांति और बाद में साइबरक्रांति में आम जनता दाखिल हो गयी । इसने परंपरागत राजनीति और उसके जनता से जुड़ने, संवाद करने और जनता को गोलबंद करने के पुराने तरीकों को एक ही झटके में बदल दिया ।राजनीति और सामाजिक सत्य के बीच में तनाव को सघन बना दिया ।
    टेलीविजन युग आने के पहले तक राजनीति और सामाजिक सत्य में परंपरागत अनुकरणवादी संबंध होता था ।यह संबंध स्वाभाविक राजनीतिक प्रक्रियाओं से निर्देशित होता था। लेकिन टेलीविजन आने के बाद से राजनीति और सामाजिक सत्य का संबंध गुणात्मक तौर पर बदल गया ।
     पहले राजनीतिक दल सामाजिक  सत्य को अनुभवों और अनुमानों के आधार पर पेश करते थे। टेलीविजन आने के राजनीतिविज्ञान के नियमों का प्रयोग बढ़ा। धीरे धीरे हम चुनावी भविष्यवाणियों के दौर में दाखिल होते हैं। जनमतसंग्रह के दौर में दाखिल होते हैं। चुनाव पूर्व जनमत सर्वेक्षण और चुनाव के बाद जनमत संग्रह की प्रक्रिया में दाखिल होते हैं । इसने राजनीति को अनुमानों से परे ले जाकर राजनीतिविज्ञान के ठोस चिंतन और नए किस्म के सोच-विचार के तंत्र के साथ जोड़ा। वहीं दूसरी ओर स्वयंसेवी संगठनों ने जमीनी स्तर पर तथ्यसंग्रह करके राय बनाने की पद्धति का ईमानदारी से पालन किया और उनको बेहतर सामाजिक-राजनीतिक परिणाम मिले । पहलीबार राजनीतिविज्ञान को लोकतंत्र की सेवा में लगाया गया। परंपरागत दलों ने राजनीति का इस्तेमाल किया है राजनीतितविज्ञान का नहीं । स्वयंसेवी संगठनों और जनमत सर्वेक्षण करने वालों ने राजनीतिविज्ञान और लोकतंत्र के बीच में नए रिश्ते का आरंभ किया। इससे लोकतंत्र और राजनीति दोनों को समझने में बहुत बड़ी मदद मिली है । राजनीति के सत्य को विज्ञान के जरिए जानना और फिर राजनीति में  परिवर्तन की ओर ध्यान गया ।
      परंपरागत तरीके से राजनीति करने वाले दलों का जनता के साथ अन्तर्विरोध बढ़ा। परंपरगत दल समझ ही नहीं पा रहे हैं कि जनता के सत्य को कैसे जानें और उसमें निहित समस्याओं के समाधान कैसे करें । इसका दुष्परिणाम यह निकला कि परंपरागत राजनीतिकदल लगातार अपनी साख खोते चले गए । वे राजनीति तो कर रहे थे लेकिन राजनीतिविज्ञान को जाने और माने बिना । राजनीतिकदल यदि राजनीतिविज्ञान की मदद से देश को समझने की कोशिश करते तो देश और दलों की प्रकृति ही कुछ और होती । मसलन् राजनीतिक दलों ने कभी भी किसी भी समस्या के वैज्ञानिक कारणों को जानने और उसके अनुसार समाधान खोजने का काम नहीं किया। बार-बार समस्या आने के बाद  तदर्थ समाधान खोजे गए और यह मान लिया गया कि अब समस्या को बेहतर ढ़ंग से हल कर लिया जाएगा। लेकिन समस्या इससे और जटिल बनी है। मसलन् बलात्कार के खिलाफ हुए निर्भयाकांड विरोधी आंदोलन को ही लें इस आंदोलन के दबाब में जो कानूनी बदलाव किए गए हैं वे समस्या की विकरालता और व्यापकता को बुनियादी तौर पर देख  ही नहीं पाते। बलात्कार की घटना को रोकने के लिए कानूनी बदलाव एक सीमित कदम है असल में हमें बलात्कार की जडों को नष्ट करने  बारे में सोचने की जरुरत है । बलात्कार की जड़ों को राजनीतिविज्ञान की मदद के बिना समझना मुश्किल है।
      हमारी अब तक की राजनीतिक प्रक्रिया और दलीय राजनीति आम जनता को लोकतंत्र और लोकतांत्रिक मूल्यों की सत्ता-महत्ता का बोध पैदा कराने में असफल रही है।राजनीतिकदल आम जीवन का लोकतांत्रिकीकरण करने में असफल रहे हैं । आम जीवन के लोकतांत्रिकीकरण के अभाव के कारण ही हमें तमाम सामाजिक-राजनीतिक समस्याओं से आज मुठभेड़ करनी पड़ रही है । हमारे देश में लोकतंत्र को आए 65साल हो गए लेकिन आज भी हम आम नागरिक को लोकतांत्रिक अधिकार क्या होते हैं ? वे क्यों जरुरी हैं ?लोकतांत्रिक मूल्य क्या हैं और उनको समृद्ध करना क्यों जरुरी है ,यह समझा नहीं पाए हैं ।
    हमारे देश में लोकतंत्र है लेकिन जनता में लोकतांत्रिकबोध,लोकतांत्रिक मूल्य और लोकतांत्रिक व्यवहार एकसिरे से गायब है । यह अजीब आयरनी है कि देश को बचाने के काम को लोकतंत्र बचाने के लक्ष्य से पृथक करके देखने वालों की संख्या बहुत है । देश की एकता और अखंड़ता किसी मनोभाव विशेष या देशज उन्माद पर निर्भर नहीं करती । हमने देश और लोकतंत्र की अन्तर्ग्रथित समझ का कभी प्रचार प्रसार ही नहीं किया । हमेशा यही संदेश दिया है कि देश का मतलब दल विशेष या परिवार विशेष या नेताविशेष या धर्म विशेष का शासन है । भारत का मतलब न तो कांग्रेस है,नहीं हिन्दुओं का देश है और नहीं राजनीतिक दल विशेष का देश है ।
     लोकतंत्र में नागरिक महत्वपूर्ण होता है। नागरिक अधिकार महत्वपूर्ण होते हैं।नागरिक अधिकारों का संरक्षण और पल्लवन करने वाली संस्थाएं महत्वपूर्ण होती हैं । नागरिक मान-मर्यादाएं और नागरिक संस्कार महत्वपूर्ण होते हैं। हमारा समूचा समाज अभी तक जातिगत और धार्मिक संस्कारों के दायरों में बंद है,हमने आम आदमी को कभी इन बंद दरवाजों की कैद से बाहर निकालकर जानने –समझने की कोशिश नहीं की । हमने उसमें कभी नागरिकबोध पैदा नहीं किया। केजरीवाल फिनोमिना का महत्वपूर्ण प्रस्थान बिंदु यही है। वह व्यक्ति को जाति और धर्म की पहचान की कैद से एक ही झटके में मुक्त करके नए पैराडाइम में ले जाने में सफल हुआ है ।
    केजरीवाल फिनोमिना  ने राजनीतिकदलों की अनुमान पर आधारित राजनीति और विभिन्न समस्याओं पर अनुमान आधारित बयानबाजी से आगे निकलकर तथ्यपूर्ण बयानबाजी और शोधपरक बयानबाजी को महत्ता दी, राजनीतिक दलों को राजनीतिविज्ञान के अनुसार प्रत्येक विषय पर अनुसंधान करने,किसी भी समस्या को उठाने के पहले  उस पर रिसर्च करने का तरीका पेश करके राजनीति के व्यवहार को राजनीति के विज्ञान से जोड़ा है । मसलन्, जनता की समस्या विशेष को उठाने के पहले उसकी जड़ों तक तहकीकात करना और उस समस्या पर उठाए गए सभी कदमों को विभिन्न पहलुओं से समझने का काम किया है। यह पद्धति जनलोकपाल बिल पर बहस के दौरान बहुत ही सटीक ढ़ंग से सामने आई है।
      केजरीवाल फिनोमिना ने उन तमाम स्वयंसेवी संगठनों को संसदीय जनतंत्र में शिरकत करने और संसदीय मंचों पर अपनी जगह बनाने की संभावनाओं को खोला है। आज विभिन्न स्वयंसेवी संगठनों के कार्यकर्त्ता आम आदमी पार्टी में बड़ी संख्या में शामिल हो रहे हैं और वे लोग भी शामिल हो रहे हैं जो पहले किसी न किसी राजनीतिक दल में थे लेकिन अपने को कुंठित और निराश महसूस कर रहे थे और सामाजिक हस्तक्षेप के लिए छटपटा रहे थे । इससे सामाजिक तौर पर राजनीति को लेकर निराशा का वातावरण टूटा है । राजनीति में शिरकत बढ़ी है। वे तमाम ईमानदार लोग जो एक समय राजनीति को लेकर निराश थे,अपने को हस्तक्षेप करने में असमर्थ महसूस कर रहे थे वे तेजी से आम आदमी पार्टी में शामिल हो रहे हैं और यही वे लोग भी हैं जो आम आदमी पार्टी के गठन के पहले जनलोकपाल बिल पर चल रहे अन्ना आंदोलन में शिरकत कर रहे थे ।
   केजरीवाल फिनोमिना इसलिए महत्वपूर्ण है कि उसने 'अ-राजनीति¬' की राजनीति के बहाने उन तमाम लाखों-करोड़ों लोगों को अपनी ओर आकर्षित किया जो राजनीति को बुरा समझते थे । इसके साथ पापुलिज्म के सभी रुपों और पापुलिज्म के खेल में शामिल सभी रंगत के लोगों के साथ अपने संपर्क-संबंधों को खुला भी रखा । मसलन् , कश्मीर के सवाल पर जनमत संग्रह की मांग करना भी सही है और राष्ट्रीय एकता की बात कहना भी सही है । यह मिला-जुला नजरिया आम आदमी पार्टी के एक वरिष्ठ सहयोगी का है । वे नागरिक अधिकारों की रक्षा के तहत इस नजरिए का प्रचार करते रहे हैं । राष्ट्रीय एकता के नाम पर वे देश के देशभक्तों को भी सम्बोधित कर रहे हैं और जनमत संग्रह के नाम पर कश्मीरी पृथकतावादियो को भी सम्बोधित कर रहे हैं । उसी तरह आम आदमी पार्टी के समर्थक अनेक नेता हैं जो सिंगूर-नंदीग्राम के सवाल पर वामदलों का विरोध करते रहे हैं जिससे वे पश्चिम बंगाल में चल रहे पापुलिज्म को भी भुना रहे हैं  और पश्चिम बंगाल के बाहर धर्मनिरपेक्षता के नाम पर वामदलों के साथ भी संगति बनाए रखते हैं । यही हाल माओवादी संगठनों को लेकर है। मूल बात यह है कि आम आदमी पार्टी में शामिल नेतागण पापुलिज्म को किसी भी कीमत पर छोड़ने को तैयार नहीं हैं। पापुलिज्म के साथ जुड़े रहने का एक नमूना निर्भयाकांड पर दिल्ली में चला बलात्कार विरोधी जनादोलन है। इस आंदोलन को राजनीतिक तौर पर आम आदमी पार्टी के नेताओं ने पूरी तरह भुनाया ।
      दिलचस्प बात यह है कि निर्भयाकांड आंदोलन जब चल रहा था तो उनसे जुड़े लोग लोग जो इंडिया अगेंस्ट करप्शन,जन लोकपाल बिल आंदोलन आदि नामों से विभिन्न संगठनों में काम कर रहे थे। उन लोगों ने निर्भयाकांड के बाद जब आम आदमी पार्टी बनायी तो उसके बाद दिल्ली में विगत सवा साल में बलात्कार की घटनाओं में बेशुमार वृद्धि हुई है लेकिन उन्होंने कोई जुलूस तक नहीं निकाला,कोई आंदोलन नहीं किया,यहां तक कि किसी बलात्कार पीड़ित महिला को जाकर सांत्वना देने या उसके संबंध में बयान तक जारी नहीं किया। दिल्ली और उसके बाहर सभी किस्म के आंदोलनों से जुड़ना और पापुलिज्म की पिच को बनाए रखना यही उनका लक्ष्य रहा है । अफजल गुरु को फांसी दिए जाने के सवाल पर उन तमाम लोगों ने आपत्ति की थी जो इन दिनों आम आदमी पार्टी में जाने का प्रयास कर रहे हैं । यही हाल हरियाणा की बदनाम खाप पंचायत को लेकर है । 
     समस्या यह है कि आम आदमी पार्टी में ऐसे लोग आ रहे हैं जिनके विभिन्न राष्ट्रीय या क्षेत्रीय सवालों पर अलग-अलग नजरिए रहे हैं और वे तेजी से आम आदमी पार्टी में शामिल हो रहे हैं। ऐसे लोगों के आम आदमी पार्टी में शामिल होने के पहले के नजरिए और शामिल होने के बाद के नजरिए में अंतर करना होगा ,समस्या यह है कि विभिन्न मसलों पर आम आदमी पार्टी का नीतिगत रुख अभी साफ होना बाकी है। होसकता है आम आदमी पार्टी के सुसंगत नजरिए के आने के बाद विभिन्न मतावलम्बी लोग अपने को आम आदमी पार्टी के नजरिए में बांध लें,यदि वे अपने स्वतंत्र दृष्टिकोण पर कायम रहते हैं तो आम आदमी पार्टी को भविश्य में बिखरने से कोई नहीं बचा सकता । आम आदमी पार्टी को समझना होगा कि स्वयंसेवी संगठन और राजनीतिक दल की कार्यप्रणाली और राजनीतिक जिम्मेदारी में अंतर है।
स्वयंसेवी संगठनों में एक बड़ा हिस्सा है जिसकी भारत के संविधान और संसद में कोई आस्था नहीं है। वे संविधान को नहीं मानते । फलतः वे दलीय राजनीति का विरोध करते हैं । स्वयंसेवी संगठन होने के नाते वे लोकतांत्रिक संरचनाओं में जबावदेही से मुक्त हैं । वे देश की नीतियों के बंधनों से मुक्त हैं,वे प्रशासनिक आदेशों से बंधे नहीं हैं ।
      आम आदमी पार्टी बन जाने के बाद केजरीवाल राजनीतिकदल की भूमिका से बंधने के लिए बाध्य हैं। वे उन नीतियों को मानने को बाध्य हैं जो संसद द्वारा स्वीकृत हैं। वे उन कन्वेंशनों और परंपराओं को मानने को बाध्य हैं जो एक राजनीतिकदल पर लागू होती हैं,वे उन नियमों को मानने को मजबूर हैं जो मुख्यमंत्री पर लागू होते हैं ।
    एनजीओ  स्वयंसेवक के पास अनंत स्वतंत्रता होती है,लोकतांत्रिक संस्थानों के प्रति उसकी कोई जिम्मेदारी नहीं होती,वे अपने संगठन और अपने विचार के सर्वतंत्र स्वतंत्र नेता होते हैं। लेकिन मुख्यमंत्री और राजनीतिक दलों के लिए स्वतंत्रता की लक्ष्मण रेखा खिंची हुई है और केजरीवाल को उसी लक्ष्मणरेखा में रहकर काम करना होगा ।
    समग्रता में देखें तो हर हालत में पापुलिज्म के साथ जुड़ना और अपने जनाधार का विस्तार करना यही आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ताओं की आम आदमी पार्टी के गठन के पहले रणनीति रही है और यह रणनीति आज उनको मदद कर रही है विभिन्न रंगत के लोग तेजी से आम आदमी पार्टी की सदस्यता ले रहे हैं ।अनेक लोग ऐसे भी हैं जो बिना जाने-बिना सोचे भी सदस्यता ले रहे हैं ।
   केजरीवाल फिनोमिना की सबसे बड़ी खूबी है कि उसने जनता के प्रासंगिक सवालों को केन्द्र में रखा है और एकाग्रभाव से उसको बार-बार मीडिया और इंटरनेट के जरिए प्रचारित किया है । इसके कारण उनके बारे में यह राय भी बनी है कि 'बात तो ठीक कह रहा है केजरीवाल'। 
'बात तो ठीक कह रहा है केजरीवाल' मुहावरा आमलोगों में चल निकला है। कस्बों और देहात में आमलोग कुछ इसी तरह मुहावरे में केजरीवाल फिनोमिना पर चुटकियां लेते नजर आ रहे हैं । केजरीवाल फिनोमिना का आम जनता का मुहावरा बन जाना और 'आम आदमी' नाम पर विगत कई सालों में कांग्रेस के प्रचार अभियान को अपनी प्रचारकला में शामिल करके इस्तेमाल कर लेना,एकदम विरल घटना है। 'आम आदमी का हाथ ,कांग्रेस के साथ' का नारा कांग्रेस की सबसे ताकतवर कैम्पेन का हिस्सा रहा है सन् 2009 के चुनाव के समय और धीरे धीरे कांग्रेस इस नारे को भूल गयी और आम आदमी पार्टी ने इस कैम्पेन पर अप्रत्यक्षतौर पर वैचारिक हमला करके इस नाम (आम आदमी) के साथ जुड़ी जनप्रियता को सीधे अपने पक्ष में करलिया । मीडिया और आम जनता में प्रचार में यदि उन पदबंधों का इस्तेमाल किया जाए जिन पर विज्ञापनबाजी हो चुकी है और मीडिया का पर्याप्त कवरेज आता रहा है तो पदबंध की जनप्रियता का बहुत जल्द लाभ उठाया जा सकता है । केजरीवाल एंड कंपनी ने यही किया है। उन्होंने 'आम आदमी ' की जनप्रियता को देखकर ही अपने दल का नाम आम आदमी पार्टी रखा। 

सन् 2014 के लोकसभा चुनाव के बारे में मीडिया कवरेज के चरित्र की उपेक्षा करके कोई बात नहीं हो सकती। न्यूज टेलीविजन चैनलों ने विगत 5 सालों में खबरें कम राष्ट्रीय उन्माद ज्यादा पैदा किया है । मेनीपुलेशन को महामीडियम और संप्रेषक बनाया है। अब हम देखते हैं और दौडते हैं , सोचते नहीं हैं । टीवी का महा मंत्र है मध्यवर्ग को हाँको। अविवेक को महिमामंडित करो। शार्टकट को मूल्यवान बनाओ। ये सभी डिजिटल स्क्रीन मेनीपुलेशन के आधारसूत्र हैं । इनको हम टीवी और इंटरनेट कवरेज के रुपों जैसे अन्ना का हठ,बाबा रामदेव का योग,मोदी का महामोह और अब आप पार्टी  के ' लोकतंत्र मुक्तियज्ञ' में देख सकते हैं । हाँको का अहर्निश पुरश्चरण और इन सबके पीछे मध्यवर्ग को हाँककर ले जाने की परिणतियों पर गंभीरता सोचने की जरुरत है।
     भारत का लोकतंत्र, मध्यवर्गीय शार्टकट और नीतिहीनता की देन नहीं है। यह लंबे संघर्ष और गंभीर नीति विमर्शों के गर्भ से पैदा हुआ है। जो लोग शार्टकट में समाधान तलाश रहे हैं वे जान लें शार्टकट  में किसी समस्या का समाधान संभव नहीं है। जो कहता है कि मैं एक्शन करुँगा मुझे सत्ता दो,उससे ठहरकर बातें करो, नीतियों के बारे में पूछो और तसल्ली से सोचो फिर राय बनाओ। तसल्ली के साथ सोचे बिना लोकतंत्र समृद्ध नहीं होता । शार्टकट मध्यवर्गीय रुमानी राजनीतिक रास्ता हमेशा सामाजिक-राजनीतिक विभाजन और हिंसा की ओर ले जाता है । इसके अनेक उदाहरण विगत 65 सालों में देखे गए हैं।  
     मध्यवर्ग की अनालोचनात्मक और शार्टकट में सबकुछ पाने की मनोदशा का टीवी चैनलों ने बड़ी बारीकी से दोहन किया है । अन्ना के पीछे मध्यवर्ग क्यों था ? क्योंकि वह शार्टकट में परिणाम चाहता था।मोदी पर बलिहारी क्यों है ?क्योंकि शार्टकट में बिना सोचे समझे एक्शन का नायक लग रहा है। "आप " पार्टी या केजरीवाल क्यों मुग्ध कर रहा है ?क्योंकि जल्दी से भ्रष्टाचार खत्म कर देनेवाली जादुई झाडू उसके पास है !
     टीवी एंकरों से लेकर समाचार संपादकों तक यह विभ्रम फैला हुआ है कि जल्दी-जल्दी सामाजिक परिवर्तन कर रहे हैं । दो मिनट में 100 या 50 या 25 खबरें देने वाले समाचार मूल्य निर्माता कैसे हो सकते हैं ? जिनके पास समाचार के लिए स्पेस नहीं है वे हमें सिखा रहे हैं कि जीवन के हल स्पीड न्यूज की तरह खोजो , नेता की हेडलाइन देखो और उसके पीछे चलो!
      टेलीविजन ने नीतिविहीन शब्दवीर नेताओं को महिमामंडित किया है और यह बेहद खतरनाक पक्ष है। अन्ना,मोदी,बाबा रामदेव,केजरीवाल सबकीशब्दवीरता के नए नए बाइटस दिखाकर मध्यवर्ग की विवेकहीन मनोदशा का जमकर दोहन किया जा रहा है । जो लोग यह मानते हैं कि मध्यवर्ग के अधिकांश लोग पढे-लिखे होते हैं ,अक्लमंद होते हैं। उनसे मैं असहमत हूँ।
     मध्यवर्ग कितना अक्लमंद है यह देखना हो तो इसवर्ग की बिना सोचे-समझे विकास कर रही समूची युवापीढ़ी को देखो,यह देखने के लिए कहीं दूर जाने की जरुरत नहीं है अपने आसपास के किसी भी कॉलेज-विश्वविद्यालय में जाकर देखो कि हमारा युवा किस रुप में निर्मित हो रहा है ।
    युवाओं और मध्यवर्ग के प्रति  रोमैंटिक और अनालोचनात्मक भावबोध छोड़कर हमें गंभीरता से इस मसले पर हस्तक्षेप करने की जरुरत है ।शार्टकट मानसिकता और टेलीविजन उन्माद के बीच बन रहे मध्यवर्गीय सोच के तानेबाने को छिन्न-भिन्न करने की जरुरत है । मध्यवर्ग या टेलीविजन जो कह रहा है उसकी अंतर्वस्तु की गंभीरता के साथ समीक्षा करने की जरुरत है।
   टीवी चैनलों ने नीतिविहीनता को महान बनाया है। शोर या टीवी हंगामे को लोकतांत्रिक राजनीति का नाम दिया है । टीवी के टॉक शो या नेता की आमसभा -प्रेस कॉफ्रेस के   लाइव कवरेज से राजनीतिक दलों या नेताओं की प्रासंगिकता तय होने लगेगी तो हम बहुत गंभीर संकट में फंसने जा रहे हैं । अन्ना,मोदी और अब केजरीवाल के बारे में नीतिविहीन ढ़ंग से जिस तरह महिमामंडन चल रहा है वह लोकतंत्र के लिए शुभलक्षण नहीं है।
        नव्य आर्थिक उदारवाद ने ऐसा मध्यवर्ग निर्मित किया है जो किसी गंभीर आलोचनात्मक नीतिगत मंथन में शामिल नहीं होना चाहता वह तो बस चटपट एक्शन चाहता है । जो एक्शन करे ,वह महान है । लोकतंत्र का नायक बनने लायक है। यह मनोदशा लोकतंत्र का नहीं अविवेक और सर्वसत्तावाद का आधार तैयार कर रही है।
     सर्वसत्तावाद की नई रणनीति है विवेक से दूर रहो, नीतियों पर बहस मत करो।वोट दो,एक्शन देखो। क्या कहा जा रहा है ,उस पर सोचो मत। विश्वास करो।जो डिजिटल स्क्रीन पर दिखे वही सत्य है। जो डिजिटल स्क्रीन पर न दिखे ,वह असत्य है।   यानी अब विवेक ,नीति,कुर्बानी,भाईचारा आदि महत्वपूर्ण नहीं हैं डिजिटल स्क्रीन महत्वपूर्ण है ,इसलिए डिजिटल स्क्रीन पर ज्यादा से ज्यादा दिखने की भेड़चाल आरंभ हो गयी है। जिसनेता को जितना ज्यादा दिखाया जा रहा है ,समझो वही नेता महान है ,वही काम का है, वही लोकतंत्र का नायक है। यानी मध्यवर्ग के विवेक को टीवी या इंटरनेट स्क्रीन ने अपहृत कर लिया है और यही वह बिंदु है जहां पर सतर्क नीतिगत वाद-विवाद-संवाद को लोकतंत्र की विभिन्न दृष्टियों की कसौटी पर परखा जाना चाहिए।

शनिवार, 31 अगस्त 2013

भाषाओं के अंत का आख्यान

भारत के नीति निर्धारकों ने राष्ट्र-राज्य की धारणा के तहत जातीयभाषा पर जोर देकर लोकल भाषाओं के साथ असमान व्यवहार को बढावा दिया और उसके भयावह परिणाम सामने आ रहे हैं। विगत 50 सालों में भारत में 250 भाषाएं गायब हो गयी हैं। इन दिनों प.बंगाल में 10भाषाएं अंत के करीब हैं।
सन् 1961 की जनगणना में 1,652भाषाएं दर्ज हैं लेकिन1971 की जनगणना में मात्र 108भाषाएं हैं। भाषाओं की संख्या में इतनी बड़ी कमी का कारण है जनगणना के नियमों में बदलाव। सरकार ने भाषाओं की सूची में उन्हीं भाषाओं को शामिल किया जिनके बोलने वालों की संख्या 10हजार से ज्यादा थी। आज हम नहीं जानते कि 10हजार से कम लोगों में बोली जाने वाली भाषा की क्या अवस्था है। कायदे से यह बंदिश हटा देनी चाहिए। हमें भाषा और बोलियों का विस्तृत हिसाब रखना चाहिए। भारत में 780भाषाएं 66किस्म की स्क्रिप्ट में लिखी जाती हैं। सारे देश में भारत की सभी भाषाओं के पठन-पाठन की व्यवस्था के लिए व्यापक कदम उठाने की जरूरत है।

मनमोहन नीतियों का उल्टा खेल

भारत की अर्थव्यवस्था में अनेक समस्याएं हैं, विश्वमंदी का असर है, औद्योगिक उत्पादन कम हुआ है, भ्रष्टाचार चरम पर है,रूपया लुढ़क रहा है।बेकारी और मंहगाई है, इसके बाबजूद हालात बहुत खराब नहीं हैं। बैंकों में पर्याप्त पैसा है। सरकारी कर्मचारियों को नियमित पगार मिल रही है। संकट के बाबजूद साढ़े चार फीसदी विकास दर बनी हुई है। निवेश का माहौल भी है। कोई बैंक दिवालिया नहीं हुई है। 
जीवन की गति और विकास की गति में द्वंद्व और तनाव है लेकिन विकास धीमी गति से जारी है। इस स्थिति का श्रेय नेहरूयुगीन नीतियों के द्वारा निर्मित ठोस आर्थिक आधार को जाता है। मनमोहन सिंह के अनेक प्रयासों के बाबजूद बैंकिंग प्रणाली से लेकर अन्य क्षेत्रों में नियमों की विदाई नहीं की गयी और इसमें मजदूरों-किसानों के संगठनों खासकर वामदलों और कांग्रेस के अंदर सक्रिय नेहरूपंथियों की भी भूमिका रही है।
नव्य उदारवादियों की मांग थी कि अर्थव्यवस्था की सारी खिड़कियां खोल दो।यह मांग वामदलों ने कभी नहीं मानी और कहा था सारी खिड़कियां मत खोलो वरना ग्लोबल हवा में वह जाओगे वैसे भी जितनी खिड़कियां खोल रहे हो उससे भी प्रदूषित हवा ही आएगी और अब यह धारणा सही साबित हुई है।
कल मनमोहन सिंह संसद में मैन्यूफैक्चरिंग पर जोर दे रहे थे, ये ही साहब विगत बीस सालों से सेवाक्षेत्र पर जोर दे रहे थे। कल मनमोहन सिंह सादगी और कम खर्चे की बात कर रहे थे बीस सालों से खूब खर्च करो,बचत कम और खर्चे ज्यादा करो ,का नीतियों के तहत सुझाव दे रहे थे।
उपभोक्तावाद को बेलगाम हवा देने में मनमोहन सिंह की अक्षम्य भूमिका रही है। उनकी नीतियों ने सादगी को समाज में घृणा की चीज बना दिया है। अमीरी और शानोशौकत को आदर्श जीवन शैली बना दिया है। इसका ही दुष्परिणाम है कि आज मनमोहन सिंह कह रहे हैं सोना मत खरीदो। कांग्रेस को मनमोहन सिंह की नीतियों का उपभोक्तावादी और उपभोगवादी पैराडाइम बदलने के प्रयास करने चाहिए। मनमोहन सिंह और आनंद शर्मा ने विपक्ष और न्यायालयों को विकास का शत्रु या बाधक कहा है। असल में अवरूद्ध विकास तो मनमोहन सिंह की नीतियों में ही है। इनलोगों ने उत्पादक शक्तियों और बुनियादी उद्योगों के निर्माण पर कम जोर दिया और सेवाक्षेत्र पर ज्यादा जोर दिया। असंतुलित परिणाम सामने हैं। मनमोहन सिंह से पूछा जाए कि उनके विगत 9साल के शासन में केन्द्र सरकार ने कितने बड़े बुनियादी क्षेत्र में उद्योग स्थापित किए और जिन कारपोरेट घरानों के वे छूट और सहायता देते रहे हैं उनके द्वारा कितने बड़े उद्योग स्थापित किए गए ? मनमोहन सिंह से सवाल है कि उन्होंने क्या भिलाई जैसा कोई कारखाना स्थापित किया ? क्या दूरसंचार जैसा महान नेटवर्क स्थापित किया ? जी नहीं उल्टे दूरसंचार को निजीक्षेत्र को सौंप दिया ,मनमोहन सरकार को संचित पूंजी को खाने वाली सरकार कहा जा सकता है।

शनिवार, 20 जुलाई 2013

नरेन्द्र मोदी के चुनावी विभ्रम


भाजपा और नरेन्द्र मोदी का आनेवाले चुनाव में संभावित वैचारिक नारा "ताकतवर-भारत" का होगा। मोदी के प्रचार अभियान के प्रधान मुद्दे होंगे पड़ोसियों से दबकर मत रहो ।उनसे अकड़ से पेश आओ। अल्पसंख्यकों पर बहुसंख्यकों का समानता के नाम पर दबाब बनाए रखो। उन्हें मैनस्ट्रीम से बाहर रखो।
मोदी और भाजपानेताओं के भाषणों का मूल मुद्दा मनमोहन सरकार की करप्टशासन प्रणाली और अनेकों घोटाला गाथाएं रहेंगी।
मोदी के प्रचार का लक्ष्य है धर्मनिरपेक्ष सामाजिक बहुलतावाद को "भारत पहले "पदबंध के जरिए बहस से गायब करो। युवाओं की बात करने के बहाने,मध्यवर्गीय युवाओं को अपील करो। खेतीहरयुवाओं-अल्पसंख्यकयुवाओं पर ध्यान न दो। मजदूरों-किसानों के मूल सवालों से आम चुनाव में जनता का ध्यान हटाओ। नव्य-उदार नीतियों के जनविरोधी चरित्र पर से ध्यान हटाने के लिए "आदर्श गुजरात विकास " पर जोर दो। गुजरात विकास के कारपोरेट चरित्र का महिमामंडन करो और देश को उसका अनुगमन करने का संदेश दो।
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नरेन्द्र मोदी जिस संघ परिवार से आते हैं उसकी खूबी है कि गुरू गोलवल्कर जो लिख गए हैं उन विचारों में अब तक कोई बुनियादी बदलाव नहीं आया है। मोदी गुरूजी के कथनों से ही प्रेरित होकर अपना रेहटोरिक सुनाते रहते हैं ।
मोदी से सवाल किया जाना चाहिए कि क्या वे संघ की विचारधारा या गोलवल्कर के विचारों को भाजपा के राजनीतिक घोषणापत्र का हिस्सा बनाकर गुजरात सरकार या भावी केन्द्र सरकार में लागू कर सकते हैं ?
मोदी या संघीनेताओं के चरित्र का यह दुरंगापन है कि वे भाषण देते हैं संघ के विचारों के अनुकूल ,और सरकार में आचरण करते हैं एकदम भिन्न।

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नरेन्द्र मोदी जबाब दें- 1-

नरेन्द्र मोदी और उनकी मीडियाटीम से सवाल किया जाना चाहिए कि मोदी का गुरू गोलवल्कर के मुसलमान और ईसाइयों से संबंधित विचारों से सहमति है क्या ? नीचे गोलवल्कर का उद्धरण दे रहे हैं ,नरेन्द्र मोदी क्या इससे सहमत हैं ?

"The non-Hindu people of Hindustan must either adopt Hindu culture and languages, must learn and respect and hold in reverence the Hindu religion, must entertain no idea but of those of glorification of the Hindu race and culture... in a word they must cease to be foreigners; Or may stay in the country, wholly subordinated to the Hindu nation, claiming nothing, deserving no privileges, far less any preferential treatment— not even citizens' rights"

— M. S. Golwalkar

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नरेन्द्र मोदी जबाव दें- 2-

मोदी का बड़ा जोर है कि इनको एसआईटी ने निर्दोष माना है,जबकि किसी अदालत ने उनको निर्दोष नहीं माना है। सवाल यह है कि जमशेदपुर दंगों में संघ की भूमिका के लिए मोदी क्या संघ की निंदा करेंगे ?

"After giving careful and serious consideration to all the materials that are on record,the Commission is of the view that the RSS with its extensive organisation in jamshedpur and which had close links with the Bharatiya Janata Party and the Bharatiya Mazdoor Sangh had a positive hand in creating a climate which was most propitious for the outbreak of communal disturbances. In the first instance, the speech of Shri Deoras (delivered just five days before the Ram Navami festival) tended to encourage the Hindu extremists to be unyielding in their demands regarding Road No. 14. Secondly, his speech amounted to communal propaganda. Thirdly, the shakhas and the camps that were held during the divisional conference presented a militant atmosphere to the Hindu public. In the circumstances, the commission cannot but hold the RSS responsible for creating a climate for the disturbances that took place on the 11th of April, 1979"

— Jitendra Narayan in a report on Jamshedpur riots of 1979
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मोदी से सवाल है कि वे हिटलर के बारे में क्या सोचते हैं , वे क्या गुरू गोलवल्कर के विचारों से सहमत हैं। मोदी जानते हैं कि भारत में हिटलर को घृणा की नजर से देखा जाता है। भारत हिन्दूराष्ट्र नहीं है। दूसरी बात यह कि नस्लवादी मानसिकता पर गर्व नहीं किया जा सकता।नस्लवाद आधुनिकयुग का धीमाजहर है,वैसे ही हिन्दुत्व भी धीमाजहर है। गुरू गोलवल्कर का मानना था-
"To keep up the purity of the Race and its culture, Germany shocked the world by her purging the country of the semitic Races — the Jews. Race pride at its highest has been manifested here. Germany has also shown how well nigh impossible it is for Races and cultures, having differences going to the root, to be assimilated into one united whole, a good lesson for us in Hindusthan to learn and profit by.
Ever since that evil day, when Moslems first landed in Hindustan, right up to the present moment, the Hindu Nation has been gallantly fighting on to take on these despoilers. The Race Spirit has been awakening."
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कल (18जुलाई 2013)अन्ना हजारे का बयान कुछ था लेकिन आज दूसरा बयान आया है। अन्ना ने कहा है मोदी धर्मनिरपेक्ष नहीं है। पढ़ें- NEW DELHI: Calling BJP communal, activist Anna Hazare on Friday said he never described Narendra Modi as secular.

"He (Modi) belongs to a party that sympathizes with only one community, and is against other communities. It is also known that it is totally against one particular community," Hazare told reporters.

"Modi represents what BJP stands for. From their statements, it appears to be communal. I don't want to talk about an individual person, because it is a matter of his political party. BJP has nominated Narendra Modi as chairman of its campaign committee," he said.

Hazare said a non-communal person, who can provide better governance, should come to power after the elections.

He said that he was misquoted by a section of media which said he viewed Modi as not being communal.

"This is wrong. Journalists asked me whether I consider Narendra Modi communal or not. I immediately said I don't have any proof against him, so I can't say anything on it. But some newspaper wrote that Anna Hazare said Modi is not communal ... This does not mean that he is secular or non-secular."
(टाइम्स ऑफ इण्डिया से साभार)
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नरेन्द्र मोदी की राजनीतिक पैंतरेबाजी में शालीन राजनीतिक एजेण्डा कभी नहीं रहा। इसबार राष्ट्रीय क्षितिज पर आकर उन्होंने बेबकूफी-विमर्श का जो दायरा बनाया है उसकी कायदे से कांग्रेस और अन्यदलों को उपेक्षा करनी चाहिए। मोदी बोलें तो उनको बोलने दें । मोदी असल में पब्लिक रिलेशन के एजेण्डा सेटिंग पैटर्न पर चल रहे हैं।इस चक्र में फंसने के बाद न तो खबरें रहेंगी।और न राजनीतिक कार्यक्रम पर ही बातें होंगी। मोदी के जनसंपर्कचक्र का अर्थ है सिर्फ प्रौपेगैण्डा और सिर्फ प्रौपेगैण्डा। मोदी न तो खबर है और न इवेंट है,वह तो प्रौपेगैंडा है और प्रौपेगैण्डा खबर नहीं होती है।
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नेताओं में बेबकूफी दूसरा शो विपक्ष की ओर से चल रहा है,मुलायम को अफसोस है ,कल हो सकता है राजनाथ सिंह भी गुजरात पर अफसोस जाहिर कर बैठें।मोदी तो तय है गुजरात दंगों के लिए माफी मांगेंगे। समस्या यह है कि किस समय मांगें ? इसबार का चुनाव नेताओं से सबकुछ कराएगा। अफसोस-दुख-निंदा करने वाले नेताओं से पूछा जाना चाहिए कि अरे भाई आपने जब घटना घटी थी तब अफसोस -दुख जाहिर क्यों नहीं किया ?
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भारत में मूर्खता का अंधड़ चल रहा है। सबसे बड़ा हिन्दू कौन ? इवेंट प्रतियोगिता का नियोजित शो चल रहा है। छोटे बच्चों की तरह नेतागण तुतला -तुतलाकर कह रहे हैं मैं बड़ा हिन्दू -मैं बड़ा हिन्दू। कोई चोटी दिखा रहा है ,कोई जनेऊ,कोई शंकराचार्य,कोई राम को तो कोई किसी और को। 21वीं सदी की यह सबसे बड़ी बेबकूफी है।
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भाजपा ने उत्तराखंड की प्राकृतिक आपदा के लिए मदद के सवाल को आगामी लोकसभा चुनाव के साथ जोड़ दिया है। सस्ती राजनीति का संसार में यह दुर्लभ उदाहरण है।
भाजपा-कांग्रेस आदि दल अपनी रैलियों में पैसे खर्च करके लोग लाते हैं।फोकट में इन दलों की रैली में कोई नहीं आता। भाजपा जैसी समर्थ पार्टी के लिए पांच लाख का चंदा जुटाना आसान बात है,मौटे तौर पर इससे कई गुना ज्यादा पैसा तो हैदराबादरैली में आने वाले लोगों की परिवहन व्यवस्था और खाने-पीने पर खर्च हो जाएगा।
भाजपा का कहना है हैदराबाद में मोदी की मीटिंग में शामिल हो और पांच रूपया दो । यह पैसा उत्तराखंड के प्राकृतिक आपदा पीड़ितों को दिया जाएगा।
नरेन्द्र मोदी और भाजपा को यदि उत्तराखंड आपदा पीड़ितों की इतनी ही चिन्ता है तो वे इस तरह का सस्ता हथकंडा अपनाकर मदद क्यों कर रहे हैं ? यह अपमान है आपदा पीड़ितों का।
जो मदद करते हैं वे ढोल नहीं बजाते। पीड़ा में मदद की ढोल,मीटिंग के नाम पर जलसा करना ,आपदा में मारे गए लोगों के प्रति संवेदनहीनता है। मदद के नाम पर लोग जुटाना और उनसे वोट की अपील करना,घटिया राजनीति है।
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हमारा प्रस्ताव है देश में चारों ओर जिस राज्य के मजदूर ज्यादा काम करते हों ,उस राज्य के पैदाइशी नागरिक को प्रधानमंत्री पद सौंपना चाहिए। क्योंकि असली समाज संचालक वे ही हैं।
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कांग्रेस - भाजपा के नेताओं से मीडिया और जनता यह सवाल बार-बार पूछे कि धर्मनिरपेक्ष प्रशासनिकतंत्र के निर्माण के लिए इन दोनों दलों क्या किया ? यदि इन दोनों दलों ने कुछ किया होता तो बाबरी मस्जिद का विध्वंस न होता। भारत की धर्मनिरपेक्ष राजनीति की दावेदार इनदोनों पार्टियों के धर्मनिरपेक्ष चरित्र पर बाबरी मस्जिद विध्वंस बदनुमा दाग है।
मंदिर तोड़ना, गुरूद्वारे जलाना,मस्जिद गिराना धर्मनिरपेक्ष राजनीति का काम नहीं है। लेकिन अफसोस यह है कि भारत में यह सब होता रहा है। किसने मस्जिद गिरायी, किसने गुरूद्वारे लाए और किसने मंदिरों पर हमले किए इसके बारे में देश के तमाम जागरूक लोग जानते हैं.हम यहां नाम नहीं लेना चाहते।
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आज टीवी चैनलों पर खूब आनंद आया । कांग्रेस और भाजपा के प्रवक्ता मुर्गे की तरह लड़ रहे हैं। इन दोनों ही पुण्यात्मा दलों में होड़ मची है भारतीय राजनीति के सबसे बड़े पुण्यात्मा होने की। इस होड़ में इन दलों के नेताओं ने झूठ और बेशर्मी की सभी हदें तोड़ दी हैं। अरे भाईयो गुजरात हमारा है वह भाजपा-कांग्रेस का नहीं है। गुजरात यदि शिक्षा में पीछे रह गया तो यह भी भारत की कमी है ।इसे सिर्फ मोदी के खाते नहीं डाल सकते।
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चुनाव आएं और मुसलमान याद न आएं हो नहीं सकता। मोदी भी याद कर रहे हैं और मोदी विरोधी भी मुसलमानों को याद कर रहे हैं। यानी मुसलमानों के बिना ये दल जी नहीं सकते। मुसलमानों का मैनस्ट्रीम से अलगाव खत्म करने का सही तरीका उनको याद करना मात्र नहीं है। मुसलमान अपने हैं तो इनदलों को मुसलमानों के साथ सामाजिक-सांस्कृतिक रिश्ते बनाने पर जोर देना चाहिए। दंगे से ज्यादा जरूरी है मुसलमानों के साथ खान-पान , वोट पाने से ज्यादा महत्वपूर्ण है शादी-ब्याह के संबंध बनाना। उर्दू को पढ़ना -पढ़ाना,उसे मात्र मुसलमानों की भाषा न रहने देना। बाकी वैषम्य अपने आप समझने में सहायता मिलने लगेगी।
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नरेन्द्र मोदी को संघ परिवार ने मैदान में उतारकर सारे देश में मनमोहन सरकार की जनविरोधी नीतियों पर से बहस को खिसकाकर मोदी के व्यक्तित्व विवेचन और क्षमता के प्रचार में लगा दिया है।
देश मनमोहन सिंह की नीतियों से तबाह है ,मोदी पर संघ परिवार बहस चलाकर बहुराष्ट्रीय निगमों और कारपोरेट घरानों की लूटलीला पर परदा डालने का काम कर रहा है।
आज मोदी का राष्ट्रवाद समस्या नहीं है,समस्या यह है कि भाजपा के पास मनमोहन सिंह की आर्थिक नीतियों का कोई विकल्प है तो अब तक मोदी ने उन नीतियों को पेश क्यों नहीं किया ?

नरेन्द्र मोदी मजमेवाजों की तरह चुनाव को नाटक बनाने में लगे हैं। वे नीतियों पर नहीं बोल रहे,थोथे बयान दे रहे हैं। थोथे बयान अंततः बहुराष्ट्रीयनिगमों को मदद करते हैं।
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नरेन्द्र मोदी के नए वैचारिक खेल-3-

मोदी ने कहा है "मैं हिंदू राष्ट्रवादी हूं। "
सवाल यह है कि वे नागरिक की अस्मिता को मानते हैं या नहीं,वे अपने को भारत का नागरिक कहना पसंद क्यों नहीं करते, असल में नागरिक की पहचान में समानता,बंधुत्व और लोकतंत्र का भाव अभिव्यंजित होता है। लेकिन हिन्दू राष्ट्रवादी की संघी अवधारणा मुसलमानों और ईसाइयों के प्रति घृणा से भरी है।
एक हिन्दूराष्ट्रवादी कभी नागरिक भावबोध से लैस नहीं हो सकता। मोदी को भारत का नेता बनना है तो हिन्दू राष्ट्रवाद को छोड़ना होगा और भारत के नागरिकबोध को मानना होगा।
हिन्दू राष्ट्रवाद या मुस्लिम राष्ट्रवाद या राष्ट्रवाद का नागरिकभावबोध और नागरिक हकों से तीखा अन्तर्विरोध है। मोदी आने वाले चुनाव में हिन्दू राष्ट्रवादी के नाते नागरिकहकों पर हमलावर हो सकते हैं ?
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नरेन्द्र मोदी के नए वैचारिक खेल-2-

गुजरात के मुख्यमंत्री और भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार ने एक झूठा बयान दिया है कि गुजरात दंगों के प्रसंग में वे निर्दोष हैं। सच है कि सुप्रीमकोर्ट ने उनको अभी क्लीन चिट नहीं दी है। यदि वे अपने को निर्दोष मानते हैं तो उनको यह बात अपने नेताओं को पहले समझानी थी कि उन्होंने 2002 से लेकर 2013 तक उनको भाजपा का प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार क्यों नहीं बनाया ? सन् 2014 में ही वे उम्मीदवार क्यों बनाए गए हैं ?
असल में उनको और संघ-परिवार को भय है कि कहीं मोदी को सुप्रीमकोर्ट दोषी करार न दे दे। यदि ऐसा होता है तो न्यायालय पर भी हमले करने में आसानी होगी।

मोदी से सवाल पूछा गया 2002 में आपने जो कुछ किया वह बिल्कुल ठीक था, तो उन्होंने कहा 'बिल्कुल। जितनी अक्ल मुझे ऊपर वाले ने दी है, जितनी अनुभव मैंने हासिल किया और उन हालात में जितनी ताकत मुझे हासिल थी, उसे देखते हुए जो कुछ मैंने किया वह बिल्कुल सही था और इसी बात की जांच एसआईटी ने की थी।'
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नरेन्द्र मोदी के नए वैचारिक खेल-1-

भाजपा नेता नरेन्द्र मोदी हिन्दुत्व के मौलिक चिंतक हैं। आज उनका एक नया रूप सामने आया है, वे गुजरात के दंगों में मारे गए लोगों को न तो मुसलमान मानते हैं और इंसान मानते हैं,वे उनको पिल्ला यानी कुत्ता मानते हैं। मारे गए लोगों की कुत्ते से तुलना करना निश्चिततौर पर संघ की विचारधारा का एकदम नया रूप है।
नवभारत टाइम्स के अनुसार "गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक इंटरव्यू में गुजरात के दंगों पर विवादास्पद बयान दिया है।जब उनसे पूछा गया कि क्या जो कुछ हुआ उसका उन्हें दुख है, तो उन्होंने कहा, 'दुख तो होता ही है। अगर कुत्ते का बच्चा भी कार के नीचे आ जाए तो भी दुख होता है।' "


दंगों में मारे गए लोगों को इंसान न मानना और उनकी पिल्ले यानी कुत्ते के बच्चे से तुलना करना स्वयं में इस बात का संकेत है कि आने वाले समय में मोदी आक्रामक हिन्दुत्व का कार्ड खेलने जा रहे हैं। यह सच है कि वे जो बोल रहे हैं,होशोहवास में बोल रहे हैं, सोचिए मोदी की कार ड्राइविंग का क्या हश्र होता यदि उनकी कार किसी ट्रेन या ट्रक की चपेट में आ जाती ? मोदी के मन में गुजरात दंगों में माए गए मुसलमानों के प्रति कोई दुख नहीं है। हम चाहते हैं मोद कार चलाएं और उसी तरह कार दौडाएं जैसे वे गुजरात में दौडा रहे हैं। ईश्वर उन्हें अगले चुनाव में वोटों की चपेट में वैसे ही ले जैसे कोई कार किसी ट्रेन की चपेट में आती है। उस दुर्घटना में मोदी बचें और भाजपारूपी कार ध्वस्त हो।

जनसत्ता के निराला पर प्रतिक्रियावादी हमले


 हाल ही में जनसत्ता अखबार में शंकरशरण का लेख छपा है जिसमें सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' को हिन्दुत्ववादी सिद्ध करने का आधारहीन प्रयास किया गया है। इस लेख में निराला को समग्रता में देखने की कोशिश ही नहीं की गयी है। साथ ही इस लेख में निरर्थक प्रगतिवाद पर हमला बोला गया है। अप्रासंगिकता को आलोचना में दीमक कहते हैं।
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जनसत्ता जैसे अखबार की प्रगतिशीलता विरोधी मुहिम जारी है और उसमें कविताओं के साथ आलोचना कम कु-समीक्षा ज्यादा लिखी जा रही है।हाल ही में शंकर शरण जैसे लेखक ने अपने लेख में निराला की प्रसिद्ध कविता तुलसीदास का गलत मूल्यांकन किया है।
असल में उसी कविता में निराला ने कविता लिखने का मकसद भी लिखा है। निराला ने लिखा है- "करना होगा यह तिमिर पार। देखना सत्य का मिहिर द्वार।"
यह कविता हिन्दुत्ववादी नजरिए को अभिव्यंजित करने वाली कविता नहीं है। बल्कि इसका लक्ष्य भिन्न है।
इस कविता का मूल लक्ष्य है सांस्कृतिक अंधकार को पार करके सत्य को पाना। साम्प्रदायिक नजरिए का सत्य के सत्य बैर है। शंकरशरण जैसे लेखक इस मूल बात को पकड़ने में असमर्थ रहे हैं। कविता किसके लिए लिखी गयी है यह बात कविता में निराला ने स्वयं लिखी है । सवाल यह है शंकरशरण यह लेख क्यों इनदिनों मोदी को महान बनाने की मुहिम के हिस्से के तौर पर इस तरह के लेख छापकर जनसत्ता अखबार जाने-अनजाने मोदी की जनसंपर्ककला का शिकार बन गया। निराला का हिन्दुत्व से कोई संबंध नहीं है। निराला विचार और कर्म दोनों में साम्प्रदायिकता विरोधी थे।
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शंकर शरण जैसे लेखक को यह भी जानना चाहिए कि साम्प्रदायिक समस्या पर निराला आखिरकार क्या सोचते थे। निराला ने लिखा है- "हिंदू और मुसलमानों की समस्या इस देश की पराधीनता की सबसे बड़ी समस्या है।"
शंकरशरण जैसे लेखकों का इस समस्या के प्रति रूख क्या है ,यह बात भी जाननी दिलचस्प है। वे निराला में से मनवांछित यथार्थ खोज रहे हैं। इस तरह के लेखन को निराला मानसिक दु्र्बलता मानते थे।
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शंकर शरण जैसे लेखकों को ध्यान में रखकर ही निराला ने लिखा था- "हमारे देश में धार्मिक कट्टरता ही प्रबल है। इसका परिणाम यह होता है कि कट्टरता का जड़त्व मस्तिष्क का विकास नहीं होने देता।अपने अनुकूल न होने पर धार्मिक तत्व झूठे जान पड़ते हैं।यह आत्मानुकूल तत्ववृत्ति बहुत बड़ी मानसिक दुर्बलता है। इसके कारण सभी रेखाओं से मन-शक्ति का विकास नहीं हो पाता। प्रहार करने वाली पशुवृत्ति बनी रहती है।मनुष्य सब देशों के साहित्य,समाज,राजनीति और धर्म का महत्व समझ नहीं पाता।प्रगति एक हद तक बंधी रहती है। "
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निराला ने लिखा था- " हिंदुओं की संकीर्णता के कारण ही मुसलमान इस देश में संकीर्ण हो रहे हैं। "

भारतीय मध्यवर्ग के वहशी रूप

              
भारत में मध्यवर्ग का तेजगति से पतन हो रहा है ।इतनी तेजगति से अन्य किसी वर्ग का पतन नहीं हुआ है। मध्यवर्ग के आदर्शनायक आईएएस -आईपीएस अफसरों में बहुत बड़ा समुदाय तैयार हुआ है जो आकंठ भ्रष्टाचार में डूबा हुआ है। ये वे लोग हैं जिनके पास सब कुछ है।सबकुछ होते हुए भी ये क्यों भ्रष्ट हो रहे हैं ?
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भारत के मध्यवर्ग ने सामाजिक-आर्थिक शक्ति अर्जित करते ही सामाजिक-राजनीतिक दायित्वों और लोकतांत्रिक लक्ष्यों से अपने को सचेत रूप से अलग किया है।
अधिकतर मध्यवर्गीय शिक्षितलोग राजनीति को बुरा मानते हैं या भ्रष्ट राजनीति की हिमायत करते हैं या अधिनायकवादी या फासिस्ट राजनीति की हिमायत करते हैं।मध्यवर्ग का इस तरह का चरित्र बताता है कि भारत में संपन्नता जिन वर्गों में पहुंची है उनमें लोकतांत्रिक मूल्य अभी तक नहीं पहुंचे हैं।
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भारत में मध्यवर्ग में सांस्कृतिक परवर्जन तेजी से बढ़ा है। दुनिया के अनेक देशों में आधुनिककाल में वैज्ञानिकचेतना और स्वस्थ लोकतांत्रिक मूल्यों का मध्यवर्ग में विकास हुआ है ,लेकिन भारत में उलटी गंगा बह रही है। 
भारत के मध्यवर्ग में इन दिनों प्रतिगामिता की आंधी चल रही है। सेक्स से लेकर धर्म तक इसे सहज ही देखा जा सकता है। मध्यवर्ग में प्रतिगामिता के कारण इस वर्ग के बहशीयाना चरित्र की आए दिन परतें खुल रही हैं। 
आश्चर्य की बात है इस वर्ग के पतनशील मूल्यों पर हम सबने हमले करने बंद कर दिए हैं। प्रतिगामिता के साथ हमसब सामंजस्य बिठाकर जीने लगे हैं। मध्यवर्गीय प्रतिगामिता अब हमारे अंदर गुस्सा पैदा नहीं करती। यह स्थिति बदलनी चाहिए।
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मध्यवर्ग की पतनशीलता के तीन बड़े क्षेत्र हैं ,एक है स्त्री उत्पीड़न-शोषण , दूसरा है खुला भ्रष्टाचार और तीसरा है तिकड़मबाजी।

मध्यवर्ग के लोगों में शिक्षितों में आज स्त्री उत्पीड़न ,हिंसाचार,यौनशोषण आदि जिस तरह सतह पर आ गया है,उसने हमें सारी दुनिया में सभ्य कहलाने लायक नहीं छोड़ा। यही हाल भ्रष्टाचार का है। तिकड़मबाजी में तो मध्यवर्ग के नायक सबसे आगे हैं। इन तीनों प्रवृत्तियों को देखकर यही लगता है कि हमारी शिक्षा व्यवस्था का मध्यवर्गीय मूल्य-संरचना पर सकारात्मक असर बहुत कम पड़ा है।

विशिष्ट पोस्ट

मेरा बचपन- माँ के दुख और हम

         माँ के सुख से ज्यादा मूल्यवान हैं माँ के दुख।मैंने अपनी आँखों से उन दुखों को देखा है,दुखों में उसे तिल-तिलकर गलते हुए देखा है।वे क...