रविवार, 10 मार्च 2013

असंगठित क्षेत्र के मजदूरों का दिल जीतने में जुटी ममता सरकार


     
       पश्चिम बंगाल का बजट आनेवाला है और राज्य का आर्थिक संकट गहरा हो गया है।नियमानुसार कोई राज्य अधिकतम जितना रूपया उधार ले सकता है उस सीमा तक ममता सरकार उधार ले चुकी है। आज स्थिति यह है कि राज्य को यदि किन्ही कारणों से जरूरत पड़े तो बैंक से लेकर बाजार तक कोई कर्ज नहीं मिल सकता। पिछले साल अक्टूबर2012 में राज्य सरकार के कर्मचारियों आदि की तनख्बाह –पेंशन आदि देने के लिए 45दिन के लिए 4000 हजार करोड़ का कर्ज लिया था। पिछले साल रिजर्व बैंक ने कर्ज के नियमों में दोबार ढ़ील देकर राज्य को 22,423करोड़ रूपये का कर्ज दिया। सन् 2012-13 के बजट दस्तावेज के अनुसार राज्य की कर से होने वाली अनुमानित आय 76,943करोड़ रूपये और व्यय 83,801 करोड़ रूपये आंका गया है। यानी अनुमानित बजट घाटा 6,585करोड़ रूपये का आंका गया है। लेकिन सन् 2013-14 में यह घाटा बढ़ जाने की संभावनाएं हैं। इसके अलावा राज्य पर इस साल कर्ज की रकम 2.26लाख करोड़ हो जाएगी। फलतःभारत के कर्जगीर राज्यों में उसका नाम सबसे ऊपर आ गया है। मार्च 2012 तक पश्चिम बंगाल के ऊपर 2,08,382 करोड़रूपये का कर्ज था मूलधन और ब्याज चुकाने के लिए उसे सालाना 23,199 करोड़ रूपये का भुगतान करना होगा। ममता के शासन में आने के बाद कर वसूली में सुधार आया है लेकिन राज्य सरकार की फिजूलखर्ची कम नहीं हुई है। इसके अलावा छठे वेतन आयोग का राज्य कर्मचारियों का एरियर का पैसा अभी तक नहीं मिला है। इसके कारण राज्य कर्मचारियों में क्षोभ बढ़ता जा रहा है। राज्य कर्मचारियों के ऊपर सरकार का दबाव है कि अपनी वफादारी वाम यूनियनों के प्रति खत्म करें और इंटक(तृणमूल कांग्रेस) के साथ अपने को जोड़ें। इसके अलावा राज्य सरकार 'मनरेगा' योजना को क बड़े राजनीतिक हथियार के रूप में लागू करने जा रही है। ममता की यह चिन्ता है कि किसी भी तरह राज्य कर्मचारियों और असंगठित क्षेत्र के मजदूरों का भरोसा हासिल किया जाय. यही वजह है कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी आनेवाले दिनों में असंगठित क्षेत्र के मजदूरों में अपना जनाधार बढ़ाने के लिए केन्द्र सरकार द्वारा संचालित  'मनरेगा' स्कीम को हथियार बनाने जा रही है। टीएमसी नेतृत्व का मानना है कि 'मनरेगा' योजना में दैनिक मजदूरी पानेवाले मजदूरों की दैनिक मजदूरी बढ जाती है तो वे इसे वाम के खिलाफ प्रचार में इस्तेमाल कर सकते हैं और इसी मंशा के तहत  पश्चिम बंगाल के 'मनरेगा' योजना में काम करने वाले मजदूरों की दैनिक पगार को प्रतिदिन 136रूपये से बढ़ाकर 151रूपये कर देने के प्रस्ताव को केन्द्र सरकार ने मान लिया है। 'मनरेगा' के मजदूरों की पगार में की गयी इस वृद्धि को ममता सरकार अपनी ओर से मजदूर हितैषी उपलब्धि के रूप में प्रचारित करने जा रही है। यह पगारवृद्धि एक अप्रैल 2013 से लागू होगी।
    ममता का मानना है यदि 'मनरेगा' को ठीक से लागू कर दिया जाय और असंगठित क्षेत्र के मजदूरों में इसे एक उपलब्धि के रूप में प्रचारित किया जाय तो मजदूरों के बड़े हिस्से को वाममोर्चे से विमुख किया जा सकता है। अब देखना यह है कि क्या 'मनरेगा' के मजदूरों की पगार में की गयी बढोत्तरी से ममता के वोट बैंक में कोई इजाफा होता है या नहीं ?
      उल्लेखनीय है कि वाममोर्चे के शासन के दौरान दो बार 'मनरेगा' मजदूरों की पगार बढ़ायी गयी थी लेकिन वामशासन इस स्कीम को लागू करने में असफल रहा। ममता सरकार में पंचायत और ग्रामीण विकास मंत्री सुब्रत मुखर्जी को यह दायित्व सौंपा गया है कि वे 'मनरेगा' योजना के जरिए ममता का जनाधार बढाएं। पंचायत मंत्री सुब्रत मुखर्जी ने अप्रैल2012 के बाद से 'मनरेगा' की मजदूरी बढ़ाने के लिए केन्द्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय को 9 पत्र लिखे थे ,इसके पहले केन्द्र सरकार ने 'मनरेगा' मजूरी को एक अप्रैल 2012 से 130रूपये से बढ़ाकर 136 रूपये कर दिया था जिससे ममता सरकार खुश नहीं थी ,इसके बाद से राज्य के पंचायतमंत्री ने मजदूरी बढ़ाने के लिए 9पत्र लिखे। इन पत्रों के जबाव में पिछले सप्ताह केन्द्र सरकार ने उनको सूचित किया कि पश्चिम बंगाल में 'मनरेगा' मजदूरों की मजदूरी 136रूपये से बढ़ाकर 151रूपये की जाती है। इस बढोत्तरी को राजनीतिक हलकों में कांग्रेस के खिलाफ दबाव की राजनीति के रूप में देखा जा रहा है वहीं पर राज्य कांग्रेस अध्यक्ष ने इस तरह के किसी दबाव से साफ इंकार किया है।जबकि इस मजदूरी का कृषि मजदूरों के लिए 2011 के आधार पर निर्धारित उपभोक्ता मूल्य सूचकांक और महंगाईभत्ते की दर से संबंध है। मजूरी कम से कम कितनी दी जाय यह तय है लेकिन अधिकतम की सीमा तय नहीं है। ममता शासन में 'मनरेगा' मजदूरी में 15रूपये की वृद्धि हुई है। लेकिन वामशासन के दौरान सन् जनवरी 2010 में 25 रूपये और जनवरी 2011 में 30रूपये की बढोत्तरी हुई थी।सामान्यतौर पर पश्चिम बंगाल में न्यूनतम दैनिक पगार 67 रूपये सन् 2005-06 में तय की गयी थी।
     उल्लेखनीय है कि 'मनरेगा' स्कीम में काम करने वाले मजदूरों को 9 राज्यों और 3 केन्द्रशासित क्षेत्रों में पश्चिम बंगाल से ज्यादा मजदूरी मिलती है।

गुरुवार, 7 मार्च 2013

हूगो चावेज और फेसबुक




वेनेजुएला के राष्ट्रपति हूगो चावेज नहीं रहे। वे लंबे समय से कैंसर से जूझ रहे थे।चावेज ने अपने कामों से वेनेजुएला और लैटिन अमेरिकी देशों पर जबर्दस्त असर पैदा किया था,फिदेल के बाद वे इस क्षेत्र के सबसे जनप्रियनेता भी थे और सारी दुनिया में अमेरिकी साम्राज्यवाद के खिलाफ संघर्ष के सबसे बड़े प्रतीक भी थे.क्रांतिकारी चावेज को हमारी विनम्र श्रद्धांजलि।
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वेनेजुएला के क्रांतिकारी नेता चावेज की विशेषता थी कि वे प्रति सप्ताह 40 घंटे से ज्यादा टीवी -रेडियो से सीधे अपने देश की जनता के साथ संवाद करते थे। वे लिखी स्क्रिप्ट देखकर भाषण नहीं देते थे और न उनके लिए कोई स्क्रिप्ट लिखी गयी। स्वतःस्फूर्त बोलना,सोचना और आम जनता की इलैक्ट्रोनिकी माध्यमों के जरिए लाइव प्रसारण के माध्यम से समस्याओं पर खुलकर विचार विमर्श करना उनकी आदत थी.अपने देश की जनता से वे किस हद तक जुड़े थे यह इस बात से समझ में आएगा कि उन्होंने अपने देश की जनता के साथ जो वायदे किए उनको काफी हद तक पूरा किया। क्रांति को पार्टी के ऑफिस से निकालकर आम जनता का औजार बनाया और क्रांतिकारी विचारों के पारदर्शी और अबाधित बहस-मुबाहिसे की अपने देश में स्वस्थ परंपरा डाली। चावेज ने समाजवाद,क्रांति और लोकतंत्र के बीच में नए किस्म के पारदर्शी सामाजिक-राजनीतिक दर्शन और विश्वदृष्टिकोण को जन्म दिया।
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चावेज का वेनेजुएला में बड़ा योगदान यह है कि वे देश में साइबर क्रांति के जनक भी बने। एक जमाने में स्वयॆ ट्विटर पर ट्विट भी किया करते थे बाद में उनको किंही कारणों से अपना एकाउंट बंद करना पड़ा। वेनेजुएला की आम जनता में साइबर संसार के प्रति व्यापक आकर्षण है, 86 प्रतिशत इंटरनेट यूजरों के फेसबुक एकाउंट हैं। Tendencias Digitales नामक पत्रिका ने वेनेजुएला के सन् 2008 के आंकड़े जारी किए हैं इनके अनुसार वेनेजुएला में फेसबुक में 1,200 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। वेनेजुएला में पांच लाख से ज्यादा ब्लेकबेरी फोन हैं। यह समूचे बाजार का 7 प्रतिशत हिस्सा है। यह लैटिन अमेरिका की तुलना में ढ़ाई प्रतिशत ज्यादा है।
जबकि ट्विटर में अभी 4 प्रतिशत लोग वेनेजुएला से हैं। वेनेजुएला के विपक्षी टीवी चैनल ग्लोबविजन के अनुसार विश्व के 20 सबसे ज्यादा प्रभावशाली ट्विटरएकाउंट वेनेजुएला के हैं। ये न्यूयार्क टाइम्स और सीएनएन जैसे महारथियों के साथ तेज प्रतिस्पर्धा में हैं। अकेले ग्लोबविजन के दो लाख अनुयायी हैं। ये आपस में भी संवाद करते हैं।
उल्लेखनीय है चावेज के खिलाफ कारपोरेट घरानों के नायक और संगठकर्ता की भूमिका टीवी चैनल निभाते रहे हैं। स्वयं चावेज ने सबसे जनप्रिय टीवी चैनल और 34 रेडियो स्टेशनों को देश के कानूनों का उल्लंघन करने के कारण बंद कर दिया। साथ ही ‘‘कम्युनिकेशन गुरिल्लाओं’’ की एक फौज गठित की है जो साइबर से लेकर मीडिया और स्कूलों तक चावेज और क्रांति का प्रचार करते रहते हैं।
वेनेजुएला की 28 मिलियन आबादी में अभी 90 लाख इंटरनेट यूजर हैं। सरकार की योजना है कि सोशल नेटवर्किंग साइट को देश की नीतियों पर बहस के लिए शामिल किया जाए ,साधारण जनता को नीतियों के सवालों पर सक्रिय किया जाए।
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चावेज ने वेनेजुएला में विश्व के शानदार लोकतांत्रिक चुनाव की मिसाल कायम की थी और जीत हासिल की थी। अमेरिका पूर्व राष्ट्रपति जिमी कॉर्टर ने कहा कि मैंने अपने जीवन में दुनिया में 92 चुनावों की निगरानी की है और उनको संपन्न किया है लेकिन चावेज का चुनाव दुनिया का बेहतरीन लोकतांत्रिक चुनाव था। क्रांतिकारी लोग चुनावों के जरिए जनता का दिल कैसे जीतें और आम जनता में विचारों का युद्ध कैसे लड़ें इसके जो मानक चावेज ने बनाए हैं उनसे हमसब बहुत कुछ सीख सकते हैं।
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लैटिन अमेरिकी देशों में क्रांतिकारियों के एकवर्ग में सत्ता में आने के बाद फिर से अपने ही कुनबे के लोगों का दमन करने का रिवाज रहा है लेकिन वेनेजुएला में अपने 14साल के शासन में चावेज अपने से भिन्न मत रखने वाले सैनिकों और पार्टी नेताओं का कभी दमन नहीं किया। दमनरहित 14शासन और साइबर क्रांति के जरिए प्रचार,संवाद और जनता को गोलबंद करने का काम किया। क्रांति को दमनरहित बनाया।
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हूगो चावेज ने ऐसे दौर में अपने देश में अमेरिकी तेल कंपनियों का राष्ट्रीयकरण किया जिस समय सारी दुनिया में अमेरिकी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के सामने दुनिया की अधिकांश सरकारें नतमस्तक हो गयी थीं और सारी दुनिया में सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों का निजीकरण हो रहा था। चावेज ने तेल को क्रांति के संरक्षण के लक्ष्य के साथ नत्थी किया और उन तमाम देशों की मदद की जो समाजवाद के लिए जंग कर रहे थे।
उल्लेखनीय है मध्यपूर्व के तेलधनी देश सऊदीअरब ने तेल को प्रतिक्रियावाद-फंडामेंटलिज्म और अमेरिकी साम्राज्यवाद के विस्तार का औजार बनाया तो चावेज ने तेल के बहाने ही अमेरिकी विस्तारवाद को पंक्चर किया और गरीबों की जिन्दगी की रक्षा के साथ तेल को जोड़ा।
वेनेजुएला में सबसे ज्यादा स्कॉच ह्विस्की पी जाती है लेकिन चावेज शराब नहीं पीते थे। सादगीपूर्ण जीवनशैली,गरीब जनता से सीधे संवाद और संपर्क उनकी सबसे बड़ी शक्ति थी।
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जो लोग कहते हैं कि बुर्जुआ मीडिया ईमानदार और निरपेक्ष होता है उनको चावेज के मरने के बाद अमेरिकी बहुराष्ट्रीय मीडिया में चावेजविरोधी घृणा प्रचार को देखना चाहिए।
चावेज की मौत के बाद उनके बारे में अफवाहें फैलाने और उनका चरित्रहनन करना कारपोरेट मीडिया की निरपेक्ष छवि पर कभी न मिटनेवाला काला धब्बा है।
अमेरिकी मीडिया की केन्द्रीय विशेषता है समाजवाद को कलंकित करो, चावेज और वेनेजुएला में सत्तारूढ़ सरकार को षडयंत्रकारी और जनविरोधी घोषित करो।
वेनेजुएला और चावेज पर नेट पर पढ़ते समय कम्युनिस्ट विरोध और चरित्रहनन को माइनस करके पढ़ा जाए तो बेहतर समझ बन सकती है।
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चावेज की विशेषता है कि उसने क्रांतिकारियों को जंगलों में गुरिल्ला जिंदगी जीने और जंगल-जंगल भटकने की बजाय आम जनता और खासकर सत्ता के सामाजिक संतुलन को बदलने का नया पाठ निर्मित किया। गुरिल्ला रणनीति का क्रांतिकारी आंदोलन से अंत किया।
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एक जमाना था सीआईए और उसके खरीदे हुए भाड़े के सैनिक लैटिन अमेरिका में दनदनाते हुए प्रतिक्रांतिकारी हमले किया करते थे,लेकिन चावेज के सत्ता में आने के बाद भाड़े के सैनिकों और सीआईए के हमलों का लैटिन अमेरिकी जनता ने जमकर एकजुट प्रतिवाद किया ,इस काम में चावेज क्रांतिकारियों के प्रेरणास्रोत बने रहे।
चावेज ने दूसरा बड़ा काम यह किया कि मीडिया में अहर्ऩिश मौजूदगी के जरिए भाड़े के क्रांतिविरोधी पत्रकारों-विद्वानों-सैनिक अफसरों आदि के प्रचार को असरहीन बना दिया।
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रविवार, 3 मार्च 2013

चुनावी पापुलिज्म की आम बजट से विदाई


       

      एक जमाना था केन्द्रीय बजट के आने के पहले आमलोगों में उत्सुकता होती थी ,आम आदमी मन लगाकर रेडियो –टीवी पर सुनता-देखता  था कि केन्द्र सरकार के आमबजट में नया क्या आनेवाला है ?  लेकिन इनदिनों बजट को लेकर जिज्ञासा एकसिरे से खत्म हो गयी है।मीडिया का भी वित्तमंत्री पर कोई दबाब नजर नहीं आया।  
     आमबजट को लेकर सांसदों से लेकर आम आदमी तक बढ़ते बेगानेपन ने एक नए किस्म के आर्थिक अज्ञान को बढ़ावा दिया है। कायदे से संचारक्रांति के दौर में बजट की सूचनाओं का विवेचन ज्यादा से ज्यादा होना चाहिए लेकिन हो उलटा रहा है। आम बजट आज सबसे ज्यादा रहस्यमय दस्तावेज है और इस रहस्य को कारपोरेट मीडिया ने जमकर बढ़ावा दिया है।
वित्तमंत्री पी.चिदम्बरम् ने जब पिछले सप्ताह सन् 2013-14 का आमबजट पेश किया तो उन्होंने पहला अच्छा काम यह किया है कि बजट को चुनावी राजनीति से पृथक् कर दिया है। पहले बजट में चुनावी प्रलोभन हुआ करते थे लेकिन इसबार के बजट में कोई आर्थिक प्रलोभन नहीं हैं।
यह मनमोहन सरकार का आखिरी बजट है। बजट को चुनावी राजनीति से अलग करने का अर्थ है देश की अर्थव्यवस्था को पापुलिज्म से अलग करना। इससे यह भी संकेत मिलता है कि आगामी चुनाव में कॉग्रेस कोई पापुलिज्म का नारा और योजनाएं उछालने नहीं जा रही है ।इसका एक अन्य आयाम यह भी है मीडिया प्रौपेगैण्डा के जरिए मौजूदा विकास योजनाओं की उपलब्धियों को आने वाले समय में खूब उछाला जाएगा।
   सन् 2013-14 के आमबजट की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि इससे मंदी से लड़ने में कोई बड़ी मदद नहीं मिलेगी। इसका प्रधान कारण यह है कि केन्द्र सरकार के पास बजटघाटा कम करने के वैज्ञानिक विकल्पों का अभाव है। बजटघाटा 5,20,925 करोड़ रूपये का है।  जबकि लक्ष्य था 5,73,630करोड़ रूपये। यानी केन्द्र सरकार सारी कोशिशों के बावजूज बजटघाटा कम करने का लक्ष्य हासिल नहीं कर पायी है। मनमोहन सरकार के बजटघाटे के लक्ष्य को हासिल न कर पाने के पीछे प्रधान कारण है अमीरों को दी गई आर्थिक सुविधाएं। जबकि केन्द्र सरकार ने आम आदमी को मिलने वाली सब्सीडी में कटौती की है। पिछले साल के बजट की तुलना में इस साल 4फीसदी की कटौती की गयी है।
  सन् 2013-14 के आम बजट में चमड़े से बनी चीजें और सिलेसिलाए कपड़े सस्ते होने की संभावना है वहीं दो हजार से ज्यादा की कीमत के मोबाइल फोन महंगे हो जाएंगे। इसके अलावा वातानुकूलित रेस्टोरैंट में खाना महंगा होगा।
  एक करोड़ रूपये से ज्यादा आमदनी वाले 42,800 लोगों पर 10 फीसदी अधिभार लगाने की घोषणा की है जो इस इन धनियों के लिए कोई खास मायने नहीं रखता। इससे इसवर्ग के लोगों में कम आमदनी दिखाने की प्रवृत्ति बढ़ सकती है। महिलाओं के विकास के लिए महिला बैंक खोलने का बजट में प्रस्ताव पेश किया गया और इसके लिए आरंभिक पूँजी के तौर पर एक हजार करोड़ रूपये आवंटित किए गए हैं। इस बैंक की परिकल्पना आंध्र में राज्य सरकार द्वारा संचालित श्रीनिधि बैंक से ली गयी है। महिला बैंक को रिजर्व बैंक के दिशा निर्देशों से मुक्त रखा गया है ,इस बैंक को सार्वजनिक क्षेत्र में खोला जाएगा और इसके लिए अलग से कानून भी बनाया जाएगा।
    इसी तरह छोटे शहरों में अपना पहला मकान खरीदने का सपना देख रहे लोगों को वित्त मंत्री ने ब्याज पर छूट का तोहफा दिया है। वित्त मंत्री ने कहा कि 40 लाख रुपये मूल्य तक के मकान खरीदने वालों को ब्याज पर मिलेगी अतिरिक्त 1 लाख रुपये की छूट मिलेगी। सरकार की शर्त के मुताबिक 25 लाख रुपये के आवास ऋण पर पहली बार घर खरीदने वालों को ही कर छूट मिलेगी। इसके अलावा यह प्रावधान बेहद छोटी अवधि के लिए किया गया है और अप्रैल 2013 से मार्च 2014 तक मकान खरीदने वालों को ही यह छूट प्राप्त होगी। 2 से 5 लाख के स्लैब में आने वालों को अब 2,000 रुपये का टैक्स क्रेडिट मिलेगा।
     आमआदमी का उपभोगखर्चा विगत 3सालों से 8फीसदी चला आ रहा है उसमें इस साल मात्र 4फीसदी इजाफा हुआ है। लेकिन इससे महंगाई पर अंकुश लगाने में सफलता नहीं मिली है। पिछले साल की तुलना में सब्सीडी कम हुई है। खाद्य सब्सीडी का मनमोहन सरकार खूब हल्ला मचाती रही है लेकिन इसबार के बजट में खाद्य सब्सीडी में पिछले साल की तुलना में पांच हजारकरोड़ रूपयों की कटौती की गयी है। जबकि वित्तमंत्री ने फूड़ सब्सीडी के लिए 10हजार करोड़ रूपये अतिरिक्त देने की बात कही है। लेकिन वास्तव अर्थ में फूड़सब्सीडी में पिछले साल की तुलना में इस साल 5हजार करोड़ रूपये की कटौती की गयी है। साथ ही पिछले साल की तुलना में इस साल तेल और पेट्रोलियम पदार्थों की सब्सीडी में तीस हजार करोड़ रूपये की कटौती की गयी है। संशोधित आंकड़े ज्यादा ही होंगे।
    मनरेगा योजना के मद में पिछले साल की तुलना में कोई बढोत्तरी नहीं हुई है। जबकि गांवों से लेकर शहरों तक बेकारी में इजाफा हुआ और आर्थिकमंदी चरम पर है।ऐसी दशा में मनरेगा के लिए अतिरिक्त राशि आवंटित करने की जरूरत थी। दूसरी ओर सार्वजनिक क्षेत्र की पचास हजार करोड़ रूपये की संपदा के विनियमन का प्रस्ताव रखा गया है। यानी मनरेगा आदि के लिए धन केन्द्र सरकार सार्वजनिक संपत्ति को निजी हाथों में बेचकर जुगाड़ करेगी।
   इस साल के बजट में पिछले साल की तुलना में शिक्षामद में आवंटित राशि में भी गिरावट आई है। स्वास्थ्य और चिकित्सा के मद में जरूरत से बहुत कम धनराशि आवंटित की गयी है। इसी तरह सकल घरेलू उत्पाद की तुलना में ग्रामीण विकास के लिए आवंटित राशि कम रखी गयी। आदिवासियों के विकास के चिदम्बरम ने जो धनराशि आवंटित की है वह संवैधानिक नियमों के अनुसार आवंटित धनराशि से कम है। इससाल आदिवासियों के लिए 20900 करोड़ रूपये आवंटित किए गए हैं जो संवैधानिक नियमों के अनुसार तयशुदा आनुपातिक आवंटन से कम है।यही दशा अनुसूचित जाति के लिए आवंटित राशि की है वहां पर भी संवैधानिक नियमों का उल्लंघन करते हुए 50फीसदी कम राशि (47000 हजार करोड़) आवंटित की गयी है।


रविवार, 24 फ़रवरी 2013

आर्थिकमंदी में फंसी मनमोहन सरकार की मुश्किलें



      राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने संसद का बजटसत्र आरंभ होने पर अपना जो अभिभाषण पढ़ा है वह नई उम्मीदों की बात करता है। भारतीय राजनीति की बिडम्बना है कि राष्ट्रपति के भाषण को हमारे नेता-सांसद और अन्य जागरूक लोग ध्यान से नहीं पढ़ते। असल में राष्ट्रपति का अभिभाषण तो मनमोहन सरकार की नीतियों का आधिकारिक बयान है इस बयान में कई नए सवालों और संभावनाओं को पेश किया गया है। इस भाषण में आगामी लोकसभा चुनाव का पापुलिज्म झलक मार रहा है। आने वाले 2014 के लोकसभा चुनाव में यूपीए सरकार और खासकर कांग्रेस किस-किस क्षेत्र के मतदाताओं की ओर नजर गढ़ाए है और किनकी ओर भविष्य में देख रही है इसकी झलक देखी जा सकती है। यह भी सच है कि मनमोहन सरकार अकल्पनीय भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरी होने के बावजूद कई मामलों में कुछ मूल्यवान काम कर बैठी है। विपक्ष की सारी रणनीति इस पर टिकी है कि किसी तरह मनमोहन सरकार को अपनी उपलब्धियां प्रचारित न करने दिया और उस पर दनादन हमले जारी रहें।
    प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की आर्थिक नीतियों का पहला विश्वव्यापी असर यह हुआ है कि आज विकसित पूंजीवादी मुल्कों के राज्याध्यक्ष हमारे देश में पूंजीनिवेश का अनुरोध करने आ रहे हैं। वे चाहते हैं कि भारत के पूंजीपति उनके देश में जाकर निवेश करें और वहां के लोगों को रोजगार दें।
    एक जमाना था कि भारत का प्रधानमंत्री विदेश जाता था और विकसित देशों से अपील करता था कि आपलोग भारत आएं और पूंजी निवेश करें।लेकिन इन दिनों उलटा हो रहा है। अमेरिका,फ्रांस,ब्रिटेन,जर्मनी आदि विकसित देशों से लेकर तीसरी दुनिया के देशों खासकर अफ्रीकी देशों के राष्ट्राध्यक्ष भारत से मदद मांग रहे हैं । यह बहुत बड़ा परिवर्तन है। पंडित नेहरू के शासनकाल  में विदेशनीति में सब हमारी ओर टकटकी लगाए देखते थे आज उद्योग-धंधों के लिए भारत से मदद मांग रहे हैं।इससे भारत की आर्थिक शक्ति का अंदाजा लगता है। यही वो परिदृश्य है जिसको ध्यान में रखकर राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने  कहा 'एक महत्वाकांक्षी भारत का उदय हो रहा है, एक ऐसा भारत जहां अधिक अवसर, अधिक विकल्प, बेहतर आधारभूत संरचना तथा अधिक संरक्षा एवं सुरक्षा होगी। हमारे युवा जो हमारी सबसे बड़ी राष्ट्रीय धरोहर हैं, आत्मविश्वास और साहस से परिपूर्ण हैं। मुझे इसमें कोई संदेह नहीं कि इनका जोश, इनकी ऊर्जा और इनका उद्यम भारत को नई ऊंचाइयों तक ले जाएगा।'
   सपनों को देखना और उनको साकार करना भी एक राजनीतिक उपलब्धि है। मसलन् अल्पसंख्यकों की उन्नति के सवाल को ही लें और मनमोहन सरकार के रिकॉर्ड को देखें कि तथ्य और सत्य क्या है ? यह सच है कि कांग्रेस के शासनकाल में अल्पसंख्यक सबसे ज्यादा अभाव में रहे हैं और सामाजिक विकास की दौड़ में एकदम पिछड़ गए थे जिसकी ओर सच्चर कमीशन ने ध्यान खींचा था। लेकिन इस रिपोर्ट के आने के बाद अल्पसंख्यकों के विकास के लिए केन्द्र सरकार ने जो 15सूत्री कार्यक्रम सारे देश में लागू किया उसके अभीप्सित परिणाम सामने आने लगे हैं। बड़े पैमाने पर अल्पसंख्यकों के बच्चे पढ़ने जाने लगे हैं और उनमें नई उम्मीदें जगी हैं।
अल्पसंख्यक समुदायों का शैक्षिक सशक्तीकरण सुनिश्चित करने के लिए तीन छात्रवृत्ति स्कीमों का कार्यान्वयन किया गया है  और प्रत्येक स्कीम में 30 प्रतिशत निधि छात्राओं के लिए निर्धारित की गई है। वर्ष 2012-13 में 31 दिसंबर तक 55 लाख से अधिक विद्यार्थियों को छात्रवृत्ति के रूप में लगभग  880 करोड़ रूपये की राशि का वितरण किया जा चुका है। अल्पसंख्यक समुदायों के विद्यार्थियों को उच्च शिक्षा के लिए प्रोत्साहित करने के लिए मौलाना आजाद राष्ट्रीय छात्रवृत्ति योजना के तहत 66 करोड़ की राशि दे दी गई है। 15 सूत्री कार्यक्रम के तहत वर्ष 2012-13 के दौरान दिनांक 30.09.2012 तक राष्ट्रीय स्तर पर अल्पसंख्यकों को ` 1,71,960 करोड़ प्राथमिकता क्षेत्र ऋण दिया गया, जो कि कुल प्राथमिकता क्षेत्र ऋण के 15 प्रतिशत से अधिक है।
इसी तरह अनुसूचित जाति के कक्षा IX और X में पढ़ने वाले छात्रों के लिए केन्द्र प्रायोजित छात्रवृत्ति योजना शुरू की गई है, जिससे लगभग 40 लाख छात्रों को लाभ पहुँचा है।  
 ग्रामीण वोटरों का दिल जीतने के लिए राजीव गांधी ग्रामीण विद्युतीकरण योजना के तहत एक लाख से अधिक ऐसे गांवों में बिजली पहुंचाई गई, जहां अभी तक बिजली नहीं थी, लगभग 2,85,000 गांवों को सघन रूप से बिजली दी गई है और गरीबी रेखा से नीचे के 2 करोड़ से अधिक परिवारों को नि:शुल्क बिजली कनेक्शन दिए गए हैं।
राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी के अभिभाषण का सबसे कमजोर हिस्सा अर्थव्यवस्था को लेकर था। मनमोहन सरकार के पास अर्थव्यवस्था को चंगा करने का कोई प्रभावी फार्मूला लागू करने में विगत 4सालों में सफलता नहीं मिली है।  चालू वित्त वर्ष की प्रथम छमाही में सकल घरेलू उत्पाद की वास्तविक वृद्धि दर 5.4 प्रतिशत रही। यह पिछले दशक के लगभग 8 प्रतिशत वार्षिक विकास औसत दर से काफी कम है। यह सच है कि मंदी से निकलने का कोई फार्मूला किसी के पास नहीं है लेकिन मनमोहन सरकार को अपनी प्राथमिकताएं बदलनी होंगी। वर्चुअल और मैन्यूफैक्चरिंग अर्थव्यवस्था को प्राथमिकता देने की बजाय औद्योगिक उत्पादन बढ़ने और नए उद्योग खोलने पर जोर देना होगा। कायदे से देश के विभिन्न इलाकों में प्राथमिकता के अनुसार बड़ी क्षमता वाले उद्योग खोले जाने चाहिए। सिर्फ मैन्यूफैक्चरिंग के जरिए मंदी और आर्थिक संकट से नहीं निकला जा सकता। साथ ही उन नीतियों को भी बदलने की जरूरत है जिनके कारण नए रोजगार पैदा करने में बाधाएं आ रही हैं। आज स्थिति बदतर है राजकोषीय घाटा सकल घरेलू उत्पाद के 5.3 प्रतिशत के बराबर हो गया है। इसका अर्थ यह है कि मनमोहन सरकार ने कमाई कम की है,निवेश भी कम किया है और खर्चे ज्यादा किए हैं। रोजगारोन्मुख उद्योग –धंधों को सर्वोच्च प्राथमिकता दिए बिना मंदी के संकट से निकलना संभव नहीं है । साथ ही कृषिक्षेत्र में व्याप्त अराजकता की समस्याओं पर भी मनमोहन सरकार को ध्यान देना होगा। किसानों की सब्सीड़ी में कटौती बंद की जानी चाहिए। कृषिक्षेत्र को और भी शक्तिशाली बनाने की जरूरत है इसके लिए उनकी सब्सीड़ी में इजाफा किया जाना चाहिए। किसानों की सब्सीड़ी ऐसे समय में काटी जा रही है जब वे उत्पादन बढ़ा रहे हैं। कृषिक्षेत्र में  11वीं योजना में कृषि एवं संबद्ध क्षेत्रों में विकास दर, 10वीं योजना के 2.4 प्रतिशत की तुलना में 3.7 प्रतिशत रही। इसके अलावा मनमोहन सरकार को संगठित और असंगठित क्षेत्र के मजदूरों की समस्याओं की अनदेखी नहीं करनी चाहिए। हाल ही में 2दिवसीय राष्ट्रीय हड़ताल के संदेश को केन्द्र सरकार को गंभीरता से लेना होगा और मजदूरों से संबंधित मांगों और कानूनों को सख्ती से लागू करने की दिशा में प्रयास करने होंगे वरना सन्  2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस का गणित गड़बड़ा सकता है।

शनिवार, 23 फ़रवरी 2013

फांसी के उन्माद और भ्रष्टाचार में फंसी मनमोहन सरकार


        
  कमजोर का लक्षण है कि वह मीडिया उन्माद से डरता है। यह आभास दिया जा रहा है कि मनमोहन सरकार राजनीतिक तौर पर सबसे कमजोर सरकार है। वह मीडिया के दबाब में फांसी दे रहे है। मीडिया में जब भी किसी मसले को लेकर हो-हल्ला आरंभ होता है ,सरकार ऐसा आभास देती है कि वह मीडिया की सुन रही है। असल में भ्रष्टाचार के आरोपों पर केन्द्र सरकार मीडिया का सामना करने से कतराती रही उसने है और मीडिया के दबाब में हमेशा काम करती रही है। भ्रष्टाचार के मामलों में अपने विवेक से बहुत कम एक्शन लिए हैं।  
     हाल ही में विचारधीन फांसी के कैदियों की मर्सी पिटीशनों पर सरकार ने जिस तरह की सक्रियता दिखाई है वैसी सक्रियता पहले कभी नहीं दिखाई।
   उल्लेखनीय है दामिनी बलात्कार कांड के प्रतिवाद में जब जुलूस निकल रहे थे और देश में चारों ओर प्रतिवाद हो रहा था उस समय एक ही नारा सभी दिशाओं से मीडिया से गूंज रहा था बलात्कारी को फांसी दो। लगता है इस नारे को केन्द्र सरकार ने अपनी नई न्यायनीति का एक्शन प्लान बना लिया है।
     राष्ट्रपति पद संभालने के बाद प्रणव मुखर्जी की सक्रियता देखने लायक है। केन्द्र सरकार की फांसी की सजा को लागू करने की अतिसक्रियता किसी भी तर्क से स्वीकार्य नहीं है। आज के दौर में अधिकतर देशों में फांसी की सजा खत्म करने की ओर न्यायप्रणाली जा रही है। यहां तक कि दामिनी बलात्कार कांड के बाद बने वर्मा आयोग ने भी बलात्कारी को फांसी की सजा दिए जाने की सिफारिश नहीं की थी। उसने यह रेखांकित किया कि न्याय करते समय या कानून बनाते समय मीडिया के दबाब से बचना चाहिए।
कहा जा रहा है आतंकी कसाब और अफजल गुरू को फांसी दिए जाने के बाद से देश में जिस तरह का माहौल बना है उसने राष्ट्रपति को जल्दी-जल्दी फांसी के मर्सी पिटीशन सिलटाने को प्रेरित किया है। लेकिन आंकड़े इसकी पुष्टि नहीं करते।
    आंकड़े बताते हैं कि भारत में 2001 से 2011 के बीच में 1455लोगों को फांसी की सजा दी गयी और 4321लोगों की फांसी माफ करके उसे आजन्म कैद में बदला गया । इस अवधि में यूपी में 370 को फांसी दी गयी,बिहार में132,महाराष्ट्र 125, कर्नाटक 95,तमिलनाडु 95,पश्चिम बंगाल 79,दिल्ली 71,गुजरात 57,राजस्थान 38,केरल 34,उड़ीसा 33,हरियाणा31, असम 21,जम्मू-कश्मीर 20,पंजाब 19,छत्तीसगढ़ 18,उत्तराखण्ड 16,आंध्रप्रदेश 8, मेघालय 6,चंडीगढ़,दमन एवं दीउ में प्रत्येक में 4-4,हिमाचल प्रदेश3,मणिपुर 3, त्रिपुरा 2,पांडिचेरी 2 और गोवा में 1 अभियुक्त को फांसी की सजा दी गयी।
हाल ही में राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने कर्नाटक-तमिलनाडु में सक्रिय चंदन माफिया वीरप्पन के 4 साथियों की मर्सी पिटीशन खारिज कर दी है।अब जल्दी ही उनको भी फांसी देदी जाएगी। इनलोगों पर 9अप्रैल 1993 में पालार में  5पुलिसकर्मियों, 15 पुलिस मुखबिरों और 2 वनकर्मियों सहित 22 लोगों को बारूदी सुरंग के जरिए विस्फोट करके हत्या कर देने का आरोप है।इस मामले की बिडम्बना यह है कि दोषी पाए गए  4में से 2 अपराधियों को पहले अदालत ने आजन्म कैद की सजा सुनाई। बाद में 2004 में सुप्रीमकोर्ट ने चारों को फांसी की सजा सुना दी। जिन अपराधियों की मर्सी पिटीशन राट्रपति ने खारिज की है उनके परिवारीजनों को अभी तक इसकी कोई आधिकारिक जानकारी तक नहीं दी गयी है।
   इसके अलावा राष्ट्रपति ने 7 अन्य मामलों में फांसी की सजा पाए अपराधियों के मर्सी पिटीशन को खारिज करके भेज दिया है। इनसब सूचनाओं को देखकर यह आभास मिलता है कि राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने तेजी से मर्सी पिटीशन सिलटाने के काम को सर्वोच्च प्राथमिकता दी है।
    जिस तरह आतंकी अफज़ल गुरू की फांसी के खिलाफ कश्मीर में उत्तेजना है । ठीक इसी तरह की स्थिति कर्नाटक और तमिलनाडु के उन इलाकों में भी हो सकती है जो चंदन माफिया वीरप्पन के प्रभावक्षेत्र में रहे हैं।एक जमाना था चंदन माफिया वीरप्पन के प्रभाव में कर्नाटक- तमिलनाडु की 50 विधानसभा सीटें हुआ करती थीं और सभी राजनीतिक दल उससे मदद मांगते थे।
सारी दुनिया में जिस तरह मानवाधिकारों की चेतना बढ़ रही है उसी अनुपात में न्याय और दण्ड को रूपान्तरित करने की मांग भी बढ़ रही है।
    सारी दुनिया में फांसी की सजा खत्म करने के खिलाफ आवाजें उठ रही है। लेकिन भारत में अभी तक फांसी के खिलाफ आम जनता से लेकर राजनीतिकदलों तक इस मसले पर आम राय नहीं बन पायी है। इस मसले पर मानवाधिकार संगठन एकस्वर से फांसी की सजा को खत्म करने की मांग कर रहे हैं। लेकिन वोटबैंक की राजनीति इस मामले में सभी राजनीतिकदलों को एकमत राय कायम करने से रोक रही है।
राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी की फांसी पर सक्रियता का एक और कारण है हाल ही में उठा हेलीकॉप्टर घोटाला कांड।इटली के हेलीकॉप्टर सौदे को राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी के 2005 में रक्षामंत्रीकाल में मंजूरी दी थी और यह मसला इटली की अदालत में विगत 8महिनों से चल रहा है। कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व इस केस के बारे में जानता है। इस समूची प्रक्रिया में राष्ट्रपति पर आंच न आए इसके लिए ध्यान हटाने की रणनीति के तहत राष्ट्रपति की फांसी के खिलाफ मर्सी पिटीशनों पर सक्रियता बढ़ा दी गयी है। जिससे उनको बेदाग रखा जा सके। यदि हेलीकॉप्टर घोटाले में घूसखोरी के आरोप इटली की अदालत में सिद्ध होते हैं तो यह भारत के लिए बहुत  शर्मनाक होगा।     

शनिवार, 16 फ़रवरी 2013

हिन्दी साहित्य के जुगनूओं की बोगस दुनिया



हिन्दी लेखकों पर दलितलेखकों ने बहुत सही जगह आलोचनात्मक हमला किया है और इसके कारण हिन्दी के आलोचक दलितलेखकों से घबडाए हुए बात करते हैं। प्रार्थनाशैली में बात करते हैं,झूठी प्रशंसाभाव करते हैं। इस आलोचना का सामाजिक परिणाम यह निकला कि हिन्दी के एक नामी कथाकार को 60साल बाद पता चला कि वह आरक्षित जाति में आता है। अब समझ जाइए इस शर्मनाक चालाकी को कि ये 60साल तक साहित्य की मलाई खाते रहे। जबकि साहित्य को कोटि को ही दलित लेखक नहीं मानते। वे कहते हैं यह वर्णवादी कोटि है। वे दलितसाहित्य की नई कोटि की हिमायत करते हैं। अब सवर्णलेखक अपने पूर्वजों में दलितजाति खोज रहे हैं और बेशर्मी से कह रहे हैं मेरे पूर्वज दलित थे। असल में साहित्य की यह नई बीमारी है। वर्ण बीमारी।
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हिन्दी में लेखक-प्रोफेसर आए दिन गरीबीभरा अतीत, सत्ता के दबाब, ह्रासमेंट, विक्टमाइजेशन आदि के आए दिन किस्से सुनाते हैं और सहानुभूति जुगाड़ करने की कोशिश करते हैं। ये साहित्य के थोथे किस्से हैं। थोथे किस्सों से लेखक- प्रोफेसर समझ में नहीं आता।
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यह दौर अमीरों पर भी तबाही लेकर आया है किंगफिशर और सहारा के मालिकों पर जिस तरह कानून की गाज गिरी है उसने कारपोरेट ईमानदारी को नंगा कर दिया है।
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हिन्दी में जो लोग कहते हैं साहित्य की गोष्ठियां और धड़ेबंदी महान बनाती है वे जरा रामविलास शर्मा से सीखें कि किस तरह साहित्य साधना महान बनाती है. हिन्दी के ज्ञानी गुणी और पुरस्कार प्राप्त लेखक शोहरत के नशे में इस कदर डूबे हैं कि वे रामविलास शर्मा की पूजा करना जानते हैं लेकिन उनसे कोई बात सीखना नहीं चाहते। यह बीमारी बड़े लेखक -आलोचक से लेकर नए लेखकों तक फैली हुई है।
जो लेखक अपनी भाषा के साहित्यकार की मूल्यवान बातों को ग्रहण नहीं करते वे जल्द ही अंतर्ध्यान हो जाते हैं। वे साहित्य में जुगनू की तरह हैं।
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हिन्दी में चुगद किस्म के लेखकों की भीड़ पैदा हो गयी है,इनमें कुछ नामी लेखक भी हैं , अकादमी पुरस्कार प्राप्त हैं , ये लोग अहर्निश आत्मप्रशंसा में लीन रहते हैं, आत्मप्रशंसा कोसाहित्य का चुगद भाव कह सकते हैं।ये लोग कम से कम लिखते हैं, हेकड़ी,शोहरत और दौलत के शुरूर में डूबे रहते हैं। इन लेखकों को मंन्नू भंडारी,मृदुलागर्ग,मैत्रेयी पुष्पा जैसी लेखिकाओं से अभी बहुत कुछ सीखने की जरूरत है। इन लेखिकाओं ने बिना किसी अंहकार, हेकड़ी, चमचागिरी के किस तरह हिन्दी साहित्य को श्रेष्ठतम रचनाएं दी हैं। खासकर मैत्रेयी पुष्पा ने तो कमाल किया है उसने बहुत कम समय में अनेक श्रेष्ठ उपन्यास दिए हैं।
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जब पाठक लेखक के सामने हां -हां करता रहता है और लेखक की महानता का जयगान करता रहता है तो इस तरह के पाठक को हिन्दी का लेखक सुधीपाठक - जागरूकपाठक कहता है।
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कोलकाता से दिल्ली,दिल्ली से मद्रास तक हिन्दी के जो लेखक सनसनाते चमचों के साथ मस्ती लेते नजर आते हैं और यह दावा करते हैं वे बेहद जनप्रिय हैं। वे एक सामान्य तथ्य की उपेक्षा करते हैं.वह यह कि हिन्दी के अधिकांश लेखकों से हिन्दीभाषी लड़कियां मिल नहीं पातीं या मिलना तक नहीं चाहतीं।
मसलन् आपको लेखक के इर्दगिर्द 3-4चार चमचे मिल जाएंगे, लेकिन चमचागिरी करते लड़की नजर नहीं आएगी।
कहने का अर्थ है कि लेखक को चमचाकल्चर को साहित्यसंस्कृति समझने की भूल नहीं करनी चाहिए।
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आप यात्री की तरह कोलकाता को देखेंगे तो आपको यह शहर कभी समझ में नहीं आएगा।आज के दिन यही लगेगा कि यह शहर सरस्वती पूजा में डूबा है ,लेकिन यथार्थ एकदम विलोम है और भयावह है।
देश में बलात्कार के मामलों में यह राज्य विगत आठ सालों में टॉप पर है। अभी कुछदिन पहले ही एक शिक्षित परिवार के लोगों ने अपनी वृद्धा माँ को पीट-पीट कर अधमरा कर दिया और बाद में उसकी मौत हो गया। मुहल्ले के लोगों के दबाब में पूरे परिवार,जिसमें उस औरत का पति,बेटा,बहू आदि को गिरफ्तार करना पड़ा। पता चला वृद्धा को विगत दो सालों से अहर्निश यातनाएं दी जा रही थीं। इस तरह की औरतों को यातना की घटनाएं यहां आम हो गयी हैं। इसके बावजूद आप यदि सरस्वती पूजा के रस में निमग्न हैं तो रहें लेकिन इससे स्त्री के सम्मान और सुख का पता नहीं चलता। कोलकाता आज स्त्री के लिए सबसे त्रासद शहर में तब्दील हो चुका है। यदि आपके पास साहित्यिक नजरिया है तो आपको औरत की बदहाल अवस्था नजर क्यों नहीं आती ?
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हिन्दी आलोचक का ईंधन है ईर्ष्या ! ये बेचारे नहीं जानते इससे निजी ब्लडप्रेशर हाइ रहता है।
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हरिशंकर परसाई ने लिखा है - "श्रद्धेय, बड़े बौड़म लगते हैं। "
ये पंक्तियां हमारे उन तमाम लेखकों को अपने सीने पर लगानी चाहिए जो नगरी-नगरी श्रद्धालु खोजते फिर रहे हैं।
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हरिशंकर परसाई ने लिखा है -" देश में जो मौसम चल रहा है उसमें श्रद्धा की टांग टूट चुकी है। " क्या हिन्दीलेखक गण सुन रहे हैं ?
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हिन्दी में महानता का ढ़ोंग वे ज्यादा कर रहे हैं जो आत्ममुग्ध हैं और आत्मप्रशंसा में लीन हैं। ये लोग पढ़ते कम हैं हांकते ज्यादा हैं। भक्ति ( चाटुकारिता) करने वालों को ज्ञानी मानते हैं।
सवाल यह है कि यदि इस तरह के लोग ज्ञानी हैं तो लिखकर आम पाठकों को अपने ज्ञान से लाभान्वित क्यों नहीं करते ? ज्ञान पेट में रखने की चीज नहीं है अन्य को बताने की चीज है।
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हरिशंकर परसाई ने विकलांग श्रद्धा का दौर निबंध में लिखा है- "यह चरण छूने का मौसम नहीं ,लात मारने का मौसम है।मारो एक लात और क्रांतिकारी बन जाओ।"
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मंगलवार, 12 फ़रवरी 2013

फेसबुक और पुस्तकमेला



कोलकाता पुस्तकमेला में साहित्यिक पत्रिकाओं का सबसे बड़ा पंडाल होता है और उसमें अनेक लेखक अपनी पत्रिकाएं लिए बैठे रहते हैं। कुछ मेले में बिक्री करते भी नजर आते हैं। साहित्यिक पत्रिकाओं के स्टॉल देखने लायक होते हैं। जिस पुस्तकमेले में साहित्यिक पत्रिकाओं का वैभव दिखता है वहां पर साहित्यप्रेम की जड़ें गहरी होती हैं।
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कोलकाता बुकफेयर में देश के बड़े लेखक और विचारक जितनी बड़ी तादाद में भाग लेते हैं और तरह -तरह के विषयों पर भाषण देते हैं वह अपने आप में विलक्षण अनुभव है यह अन्यत्र दुर्लभ है। इस मेले का आयोजन राज्य सरकार की मदद से प्रकाशक गिल्ड करता है।
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कोलकाता पुस्तकमेला में रविवार-शनिवार को इतनी भीड़ होती है कि आपको लोगों से सटकर चलना-निकलना होता है। औसतन 7-8लाख आते हैं। 15दिन तक चलने वाले मेले में कुल मिलाकर 35-40लाख लोग आएंगे।
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मुंबई में दौलत है और लाखों शिक्षितजन हैं। दिल्ली में पैसा है,शोहरत है,सत्ताकेन्द्र हैं,मध्यवर्गीय लेखकों की हेकड़ी है ,लेकिन बुकफेयर में भीड़ नहीं है। कोलकाता में न सत्ता है,न शोहरत है, न पैसा है,किताबें ही किताबें हैं और लाखों की भीड़ है। किताबों के खरीददार हैं। मुंबई,दिल्ली,मद्रास आदि किसी भी शहर में बुकफेयर में लोग सपरिवार बुकफेयर नहीं जाते लेकिन कोलकाता में सपरिवार बुकफेयर जाने का रिवाज है।
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जयपुर साहित्य मेले को टीवीवालों ने जिस तरह से प्रायोजित कवरेज के जरिए उछाला और साहित्य के नाम पर नॉनसेंस का प्रचार किया,जयपुर मेले की जनता की शिरकत को जिस तरह सनसनीखेज ढ़ंग से पेश किया उसे देखकर यही आभास मिलता है टीवीवालों ने साहित्यमेले देखे नहीं हैं।
कोलकाता पुस्तकमेला वास्तव अर्थ में पुस्तकमेला है। यहां सालाना मेले में 20करोड़ का कारोबार होता है और इसमें बहुत बड़ा हिस्सा निजी खरीद का है। इस मेले में किसी भी किस्म का कारपोरेट प्रायोजन नहीं है। यहां कोई पांचसितारा लॉन,हॉल और पण्डाल नहीं है,कोई टीवी पर सनसनीखेज कवरेज नहीं है लेकिन स्थानीयस्तर पर आम जनता की शिरकत मन को मुग्ध कर लेती है।
कोलकाता बुकफेयर में बड़ी तादाद में बूढ़े मर्द और औरतों को देख पाएंगे। ये वे लोग हैं जो बुद्धिजीवी हैं या पढ़ने के शौकीन हैं। जयपुर -दिल्ली बुकफेयर या साहित्यमेले में बूढ़े नहीं दिखते। किताबें हैं लेकिन बूढ़े नहीं हैं,यह चिन्ता की बात है। पुरानी किताब और पुराना पाठक समाज की शक्ति हैं।
हर मध्यवर्गीय बंगाली के घर में बच्चे को बुकफेयर के लिए अलग से पैसे हर साल दिए जाते हैं। बुकफेयर उनके सालाना-दैनन्दिन बजट का वैसे ही हिस्सा है जैसे वे अन्य चीजों पर खर्च करते हैं। काश ,बाकी महानगरों के शिक्षितलोग कुछ कोलकातावासी बंगालियों से यह सीख पाते !
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कोलकाता बुकफेयर का सबसे दुखदपक्ष है हिन्दीभाषियों की कम से कम शिरकत। यह शहर मारवाडियों से भरा पड़ा है। इनलोगों की सैंकड़ों संस्थाएं हैं। भारतीय भाषा परिषद जैसी शक्तिशाली संस्था है लेकिन इस संस्था का कोलकाता बुकफेयर में एक स्टॉल तक नहीं है। हिन्दी की पत्रिकाएं कहीं पर भी नजर नहीं आतीं। गिनती की तीन-चार हिन्दी किताबों की दुकान हैं। हिन्दीक्षेत्र के प्रकाशक यहां आते नहीं,कोलकाता में रहने वाले हिन्दीभाषी बुकफेयर जाते नहीं।जबकि कोलकाता में 50 लाख से ज्यादा हिन्दीभाषी लोग रहते हैं। कोलकाता के बाजार पर इनका एकाधिकार है। सारा बिजनेस नियंत्रित करते हैं।
एक ही शहर में रहने वाले मध्यवर्गीय बंगाली परिवारों और हिन्दीभाषी मध्यवर्गीय परिवारों में बुकफेयर को लेकर अंतर साफ देख सकते हैं। बंगाली बुकफेयर जाता है हिन्दीभाषी नहीं जाता। हिन्दीभाषियों की कमाने-खाने और सोने की आदत ने बुककल्चर को यहां के हिन्दीभाषियों में विकसित नहीं होने दिया।
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कोलकाता बुकफेयर का कोलकाता के हिन्दी लेखकों,हिन्दी के कॉलेज-विश्वविद्यालय शिक्षकों आदि पर न्यूनतम असर है। इनमें से अधिकांश लोग किताबें नहीं खरीदते और किताबें नहीं पढ़ते। वे हिन्दी में हांकते बहुत हैं। कोलकाता के हिन्दी के तथाकथित लेखक -शिक्षक आपको किताब खरीदने के लिए प्रेरित नहीं करेंगे। यदि आप किताब खरीद रहे हैं या किताब पर बात करना चाहते हैं तो हतोत्साहित जरूर करेंगे।
मसलन् आपने काशीनाथ सिंह की कोई किताब खरीदी और पूछा कि यह किताब कैसी है तो हिन्दी शिक्षक कहेगा अरे यार ,यह क्या है, मेरी तो कल ही काशीजी से एक घंटा बात हुई थी। पाठक भौंचक्का रह जाता है कि कमाल के लोग हैं ये ,मेरे किताब खरीदने और इनके 1घंटा काशीनाथ से बात करने के बीच में क्या रिश्ता है ?
कहने का आशय यह कि कोलकाता के हिन्दी के शिक्षकों-लेखकों ने किताब पढ़ने-पढ़ाने और लेखक पर बात करने की संस्कृति को विकसित ही नहीं किया। इसके विपरीत बंगाली शिक्षक-लेखक यह सब नहीं कहता।
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कोलकाता बुकफेयर ज्ञानसमुद्र है। यहां सनसनी नहीं बिकती। यहां किताबें बिकती हैं। जयपुरमेले पर जो संपादक और मीडिया महर्षि वाह-वाह और आह-आह कर रहे थे वे सोचें कि कोलकाता बुकफेयर में सलमान रूशदी को रोका गया ,मीडिया में खबर बनी और बात खत्म हो गयी। साहित्य में सनसनी नहीं होती।
यहां रोज लेखक एक से बढ़कर एक बेहतर बातें कहते हैं लोग सुनते हैं,मीडिया में रिपोर्ट होती हैं,लेकिन वे सनसनी नहीं बन पातीं। अमर्त्यसेन से लेकर गायत्री चक्रवर्ती स्पीवाक तक विश्वविख्यात लेखक आए ,अपनी बात कही और चले गए।असल में साहित्य एक कम्युनिकेशन है। वह कलह, सनसनी, पुलिस,थाना,मुकदमा नहीं है। जयपुरमेले ने साहित्य को साहित्य नहीं रहने दिया ,उसने साहित्य की मान-मर्यादा भ्रष्ट की है।
कुछ तो कोलकाता बुकफेयर से सीख सकते हैं मीडियावाले !!
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हिन्दी में जो लोग कहते हैं नवजागरण हो गया या हुआ था वे सही नहीं कहते। पुस्तक संस्कृति विकसित किए बिना नवजागरण नहीं होता। हिन्दी में सबकुछ है लेकिन पुस्तक संस्कृति नहीं है।
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हिन्दी लेखक दिल्ली में लाला की दुकान की शोभा बढ़ाते हैं ,किताबें नहीं खरीदते । यहां कोलकाता में बुकफेयर में लेखक मिलेगा लेकिन लाला की दुकान पर शोभा बढ़ाते नहीं ,बल्कि किताबें खरीदते हुए मिलेगा,पाठकों से बात करते मिलेगा,पाठकों को आशीर्वाद देते मिलेगा।
एकबार बुकफेयर में मैं महाश्वेता देवी से बातें कर रहा था देखा एक लड़की आई और उसने पैर छुए और उसकी माँ ने कहा आप लेखिका हैं,इसे आशीर्वाद दीजिए, इसकी हाल ही में शादी हुई है,यह आपका आशीर्वाद लेने बुकफेयर आई है।

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मेरा बचपन- माँ के दुख और हम

         माँ के सुख से ज्यादा मूल्यवान हैं माँ के दुख।मैंने अपनी आँखों से उन दुखों को देखा है,दुखों में उसे तिल-तिलकर गलते हुए देखा है।वे क...