मंगलवार, 10 मई 2016

धर्म और कार्ल मार्क्स


                अनेक लोग हैं जो कार्ल मार्क्स के धर्म संबंधी विचारों को विकृत रूप में व्याख्यायित करते हैं। वे मार्क्स की धर्म संबंधी मान्यताओं को गलत देखते हैं फिर सभी मार्क्सवादियों पर हमला आंरंभ कर देते हैं। सवाल यह है क्या मार्क्स की धर्म संबंधी मान्यताओं से धर्म की कोई सही समझ बनती है ?क्या दुनिया में मार्क्सवादी धर्म के बारे में एक ही तरह सोचते हैं ॽ
कार्ल मार्क्स ने अपनी धर्म संबंधी मान्यताओं का विकास हेगेल की न्याय संबंधी मान्यताओं के मूल्यांकन के क्रम में किया था। मार्क्स ने लिखा ,´धार्मिक व्यथा, एक साथ वास्तविक व्यथा की अभिव्यक्ति तथा वास्तविक व्यथा का प्रतिवाद दोनों है। धर्म उत्पीड़ित प्राणी की आह है, एक हृदयहीन संसार का हृदय है, ठीक उसी तरह जैसे वह भावविहीन परिस्थितियों की भावना है। वह जनता के लिए अफीम है। जनता के प्रातिभासिक सुख के रूप में धर्म के उन्मूलन का अर्थ है उसके वास्तविक सुख की माँग करना।मौजूदा हालात के संबंध में भ्रमों का परित्याग करने की माँग उन हालात के परित्याग की माँग करती है जिनके लिए भ्रम जरूरी बन जाते हैं। अतः ,धर्म की आलोचना भ्रूण रूप में आँसुओं की घाटी, धर्म जिसका प्रभामंडल है, की आलोचना है।´ यानी धर्म के अंत की शर्त है वास्तविक सुखों की सृष्टि,जब तक वास्तविक सुख पैदा नहीं कर पाते तब तक धर्म रहेगा,आम लोगों के दुख रहेंगे और आंसू भी रहेंगे।मार्क्स ने धर्म को ´उत्पीड़ित प्राणी की आह’ के रूप में देखा। धर्म के अंत का अर्थ है मनुष्य के दुखों का अंत। इस अर्थ में धर्म और दुख का गहरा संबंध है।

मार्क्स ने धर्म के बारे में लिखा है, "अधार्मिक आलोचना का आधार हैः मनुष्य धर्म की रचना करता है, धर्म मनुष्य की रचना नहीं करता है।धर्म मनुष्य की स्व-चेतनता और स्व-प्रतिष्ठा है,ऐसे मनुष्य की जो अभी तक अपने आपको जान नहीं पाया है, या फिर फिर से भटक गया है।लेकिन मनुष्य जिसने इस संसार से बाहर पड़ाव डाल रखा हो,कोई अमूर्त प्राणी नहीं है। मनुष्य तो मनुष्य का संसार,राज्य और समाज है।"

मार्क्स ने धर्म के बारे में लिखा- ´धर्म, संसार का सामान्य सिद्धान्त है,वह इसका सर्वज्ञान गुटका है,इसकी लोकप्रचलित तर्कपद्धति है,इसका आध्यात्मिक कीर्ति शिखर है,इसकी उमंग है,इसकी नैतिक स्वीकृति है,इसका भव्य अभिनंदन है,यह संतोष और औचित्य स्थापना का सार्वभौमिक स्रोत है।यह मानवीय सारतत्व की विलक्षण अनुभूति है, यद्यपि इसके मानवीय सारतत्व में सच्ची वास्तविकता निहित नहीं है। अतः धर्म के विरूद्ध संघर्ष का मतलब है, उस संसार के विरूद्ध किया जाने वाला परोक्ष संघर्ष,धर्म जिसकी आध्यात्मिक सुरभि है।´ यानी धर्म को समग्रता में देखना चाहिए,उसे अंशों में नहीं देखना चाहिए, इसलिए मार्क्स ने धर्म को ´सर्वज्ञान गुटका ´कहा है।धर्म मात्र पूजा या ईश्वर नहीं है,बल्कि उसका एक तर्कशास्त्र है,संस्कार हैं,´यह मानवीय सारतत्व की विलक्षण अनुभूति है´, धर्म के खिलाफ लड़ने का अर्थ है उसके द्वारा रचे संसार के खिलाफ संघर्ष करना।अनेक धर्म विरोधी लोग अपनी संतई चमकाने के लिए धर्म के अंश विशेष की आलोचना करते हैं,लेकिन धर्मरचित समग्र संसार की आलोचना से कन्नी काटते हैं।इस प्रसंग में प्रेमचन्द उल्लेखनीय हैं,उन्होंने लिखा है,´ इस अनीति भरे संसार में धर्म-अधर्म का विचार गलत है, आत्मघात है और जुआ खेल कर या दूसरों के लोभ और आसक्ति से फायदा उठा कर संपत्ति खड़ी करना उतना ही बुरा या अच्छा है जितना कानूनी दाँव-पेंच से।´ भारत के देवभक्तों को प्रेमचंद के इस कथन पर गौर करना चाहिए। पढ़ें, ´देवता हमेशा रहेंगे और हमेशा रहे हैं। उन्हें अब भी संसार धर्म और नीति पर चलता हुआ नजर आता है। वे अपने जीवन की आहुति दे कर संसार से विदा हो जाते हैं। लेकिन उन्हें देवता क्यों कहो? कायर कहो, स्वार्थी कहो, आत्मसेवी कहो। देवता वह है जो न्याय की रक्षा करे और उसके लिए प्राण दे दे। अगर वह जान कर अनजान बनता है तो धर्म से फिरता है, अगर उसकी आँखों में यह कुव्यवस्था खटकती ही नहीं तो वह अंधा भी है और मूर्ख भी, देवता किसी तरह नहीं। और यहाँ देवता बनने की जरूरत भी नहीं। देवताओं ने ही भाग्य और ईश्वर और भक्ति की मिथ्याएँ फैला कर इस अनीति को अमर बनाया है। मनुष्य ने अब तक इसका अंत कर दिया होता या समाज का ही अंत कर दिया होता जो इस दशा में जिंदा रहने से कहीं अच्छा होता। नहीं, मनुष्यों में मनुष्य बनना पड़ेगा। दरिंदों के बीच में उनसे लड़ने के लिए हथियार बाँधना पड़ेगा। उनके पंजों का शिकार बनना देवतापन नहीं, जड़ता है। आज जो इतने ताल्लुकेदार और राजे हैं वह अपने पूर्वजों की लूट का ही आनंद तो उठा रहे हैं। और क्या उन्होंने वह जायदाद बेच कर पागलपन नहीं किया? पितरों को पिंडा देने के लिए गया जा कर पिंडा देना और यहाँ आ कर हजारों रुपए खर्च करना क्या जरूरी था? और रातों को मित्रों के साथ मुजरे सुनना, और नाटक-मंडली खोल कर हजारों रुपए उसमें डुबाना अनिवार्य था? वह अवश्य पागलपन था। उन्हें क्यों अपने बाल-बच्चों की चिंता नहीं हुई? अगर उन्हें मुफ्त की संपत्ति मिली और उन्होंने उड़ाया तो उनके लड़के क्यों न मुफ्त की संपत्ति भोगें? अगर वह जवानी की उमंगों को नहीं रोक सके तो उनके लड़के क्यों तपस्या करें?"

न्याय-अन्याय के सवाल आज भी प्रासंगिक हैं इस पर प्रेमचंद ने लिखा, ´कहाँ है न्याय? कहाँ है? एक गरीब आदमी किसी खेत से बालें नोच कर खा लेता है, कानून उसे सजा देता है। दूसरा अमीर आदमी दिन-दहाड़े दूसरों को लूटता है और उसे पदवी मिलती है, सम्मान मिलता है। कुछ आदमी तरह-तरह के हथियार बाँध कर आते हैं और निरीह, दुर्बल मजदूरों पर आतंक जमा कर अपना गुलाम बना लेते हैं। लगान और टैक्स और महसूल और कितने ही नामों से उसे लूटना शुरू करते हैं, और आप लंबा-लंबा वेतन उड़ाते हैं, शिकार खेलते हैं, नाचते हैं, रंग-रेलियाँ मनाते हैं। यही है ईश्वर का रचा हुआ संसार? यही न्याय है?"

कथाकार प्रेमचंद ने कुछ सवाल उठाए हैं हम उन भी विचार करें,´संसार की कुव्यवस्था क्यों हैं? कर्म और संस्कार का आश्रय ले कर वह कहीं न पहुँच पाते थे। सर्वात्मवाद से भी उनकी गुत्थी न सुलझती थी। अगर सारा विश्व एकात्म है तो फिर यह भेद क्यों है? क्यों एक आदमी जिंदगी-भर बड़ी-से-बड़ी मेहनत करके भी भूखों मरता है, और दूसरा आदमी हाथ-पाँव न हिलाने पर भी फूलों की सेज पर सोता है। यह सर्वात्म है या घोर अनात्म? बुद्धि जवाब देती – यहाँ सभी स्वाधीन हैं, सभी को अपनी शक्ति और साधना के हिसाब से उन्नति करने का अवसर है मगर शंका पूछती – सबको समान अवसर कहाँ है? बाजार लगा हुआ है। जो चाहे वहाँ से अपनी इच्छा की चीज खरीद सकता है। मगर खरीदेगा तो वही जिसके पास पैसे हैं। और जब सबके पास पैसे नहीं हैं तो सबका बराबर का अधिकार कैसे माना जाए?´

नागरिकों को धर्म मानने और न मानने की आजादी है, ये दोनों संविधान सम्मत हैं। सवाल यह है कि धर्म न मानने वालों से इतनी नाराजगी क्यों ? समाज में ऐसे लोग हमेशा रहे हैं जो धर्म को नहीं मानते,ईश्वर को नहीं मानते और समाज उनको सम्मान की नजर से देखता रहा है। हमारे समाज में धर्मविरोधी को कभी दण्डित नहीं किया गया। दण्ड देने का चलन अंग्रेजों के आने साथ आया है। धर्म का आधुनिकयुग में सबसे बड़ा संरक्षक साम्राज्यवाद है,कारपोरेट घराने हैं। किसान-मजदूर धर्म को नहीं मानते,क्योंकि उनके पास धार्मिक कर्मकांड के लिए समय ही नहीं होता। अधिकांश औरतें भी धर्म के कांडों में शामिल नहीं होतीं। धर्म समाज में प्रतीकात्मक भूमिका निभाता है।धर्म अमीरों का वैचारिक रक्षा कवच है।

मार्क्सवाद को नापसंद करने वालों में एक वर्ग है जो कल्पना और अज्ञानता के आधार पर नापसंद करता है,दूसरे वे हैं जो विचारधारा के आधार पर नापसंद करते हैं, तीसरा वर्ग उन लोगों का है जो व्यक्तिगत कारणों से नापसंद करते हैं।मार्क्सवाद विज्ञान है,विश्वदृष्टिकोण है। यह पसंद-नापसंद से परे मुक्तिमार्ग है।भारत की सामाजिक अवस्था को हम जीतना गहराईसे जानेंगे उतनी ही गहराई में जाकर वाम संगठनों के संघर्षों की प्रासंगिकता,मार्क्सवाद की आवश्यकता को भी महसूस करेंगे।मार्क्सवाद कोई किताबी ज्ञान नहीं है,यह सामाजिक मुक्ति का विज्ञान है।जो लोग कूपमंडूक,अकर्मण्य और संकीर्ण हैं उनमें मार्क्सवाद विरोधी रूझान तेजी से पनपते हैं।विज्ञानसम्मतचेतना का जहां सामान्य वातावरण है वहां मार्क्सवाद विरोधी भावनाएं कम दिखती हैं। यह भी कह सकते हैं नॉनसेंस और मार्क्सवाद विरोध जुड़वां भाई हैं।मध्यवर्ग-निम्नमध्यवर्ग में कूपमंडूकता से लड़ने शक्ति नहीं होती जिसके कारण वह ज्यादा अंधविश्वासी-ईश्वरभक्त होता है। इसके अलावा चाटुकारिता,पुश्तैनी भ्रष्टाचार ,चरित्रहीनता और दीनता भी होती है,जिसके कारण वे सत्ता और शासकवर्गों पर आश्रित होते हैं।सवाल यह है कि मध्यवर्ग की कूपमंडूकता कैसे खत्म हो ?हमारे अनेक फेसबुक दोस्त हैं जो मार्क्सवाद का नाम सुनकर भड़कते हैं। कुछ हैं जिनकी भारतीयता ,हिन्दुत्व आदि जाग पड़ते हैं।कुछ हैं जो बिना सोचे ही लिख देते हैं,इन सभी से एक सवाल है समाज में किसका वर्चस्व हो ? किसान-मजदूर का या पूंजीपतिवर्ग ?अथवा किसी का भी वर्चस्व न हो ? तो कैसे ?

वर्ग और अस्मिता ये दो बड़े आधार हैं सामाजिक गोलबंदी के।अस्मिता का आधार मनुष्य और उसकी मुक्ति को बनाया जाए तो समस्याएं कम हो सकती हैं। सामाजिक मुक्ति के अनेक विकल्प हैं. उनमें एक मार्क्सवाद भी है।लेकिन मुक्ति का एकमात्र विकल्प मार्क्सवाद नहीं है।मात्र वर्गसंघर्ष और वर्ग के आधार पर सामाजिक एकता संभव नहीं है

जिस तरह भक्ति साहित्य को प्रेम के बिना नहीं सकते वैसे ही लोकतंत्र को धर्म को त्यागे बिना नहीं समझ सकते। धर्म तो लोकतंत्र में महाबाधा है। लोकतंत्र का कुर्बानी के बिना विकास नहीं होता और बाबा रामदेव टाइप लोग बगैर कुर्बानी के लोकतंत्र के चैम्पियन बन जाते हैं। यह संभव नहीं है।

भारत में अनेक लोग हैं जो 'भगवान की खोज' और 'भगवान निर्माण' के काम में लगे हैं। लेनिन के शब्दों में यह देवत्व पूजा की शव-कामुकता है।हेगेल ने कहा था, ´जीवन अन्तर्विरोधों से आगे बढ़ता है।जीवन्त अन्तर्विरोध ,जैसाकि प्रथम दृष्टि में दिखाई पड़ते हैं,कहीं अधिक महत्वपूर्ण,विविध एवं गहन होते हैं।´

लेनिन का मानना है ,´काम और संघर्ष किए बगैर पुस्तिकाओं से प्राप्त कम्युनिस्ट ज्ञान बेकार है ,क्योंकि यह सिद्धान्त और व्यवहार के पुराने अलगाव को जारी रखेगा तथा पूंजीवादी समाज का अत्यधिक घातक लक्षण उस दरार को बनाए रखने में मदद देता है।´लेनिन का मानना था- ''आप कम्युनिस्ट तभी हो सकते हैं जब आप मानवजाति द्वारा निर्मित सम्पूर्ण ज्ञान के खजाने से सम्पन्न हों।"मार्क्स-एगेल्स का मानना था- आदर्श की कसौटी आर्थिक वास्तविकता होती है।

मार्क्स-एंगेल्स ने इसी आदर्श को सामने रखकर अपना व्यवहारिक कार्य किया । यही वजह है कि उन्होंने पूंजीपतियों की सेवा करने की बजाय उत्पादक शक्तियों की आत्मचेतना को विकसित करने का काम किया।मार्क्स-एंगेल्स का एक साझा आदर्श था- आवश्यकता को स्वतंत्रता के अधीन बनाने,अंधी आर्थिक शक्तियों को मानव बुद्धि के अधीन बनाने का आदर्श।





सोमवार, 9 मई 2016

मुरारी बापू और बाबा रामदेव का मीडियागेम

           मुरारीबापू और बाबा रामदेव में बुनियादी अंतर है। मुरारीबापू कथा कहते हैं।कथा के बहाने व्यापार नहीं करते। वे जो कथा कहते हैं उसका पारिश्रमिक लेते हैं।अपनी रचनाओं को बेचते हैं,यह उनका एक परंपरागत बुद्धिजीवी के नाते सही काम है।लेकिन बाबा रामदेव तो योग के बहाने उद्योग चला रहे हैं.योग को राजनीतिक प्रचार का मंच और माध्यम के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं। संतई में राजनीतिक घालमेल यानी साम्प्रदायिक विचारधारा का प्रचार- प्रसार कर रहे हैं।जबकि मुरारी बापू सीधे परंपरागत पाठ और जीवनमूल्यों की बातों तक सीमित रखते हैं।

सामान्यतौर पर हमारे बौद्धिक जगत का भारतीय ज्ञान और आख्यान परंपरा से कम संबंध है और उनको वह कम जानता है। मुरारीबापू जैसे संतों का महत्व यह नहीं है कि उनके पास कितना बड़ा एम्पायर है,कितनी दौलत है,कितने राजनेता उनकी चरणवंदना करते हैं। ये चीजें गौण महत्व की हैं। काम की बात है आज के आम आदमी के लिए सटीक संदेश।मुरारीबापू ने एक कथा में महात्मा बुद्ध के हवाले से कहा - "कभी किसी के प्रभाव में नहीं जीना, अपने प्रभाव में जीना.सत्य जहाँ से मिले ले लो, पर किसी से प्रभावित नहीं होना."

मुरारीबापू की कथा में अनेक ऐसी बातें आती हैं जो समानतावादी और विवेकपूर्ण विमर्श को बढ़ावा देती हैं। कायदे से मुरारीबापू को मासकल्चर के अंग के रूप में पढ़ें,वे मासकल्चर के अंग के रूप में भारतीय पाठ बना रहे हैं। मुरारीबापू का मानना है विवेक चार प्रकार से मिलता है:

१) एक मांगने से मिलता है. फ़िर वो कृपा करे तो.

२) मंथन से मिलता है. खुद के चिंतन से.

३) सत्संग करने से.

४) हमारा गुरु बिन बोले हमें विवेक प्रदान करता है.

मुझे मुरारीबापू की निम्नलिखित तीन बातें पसंद हैं- वे कहते हैं-

हमारे देश में तीन वस्तु आदमी को आदर के साथ मिलनी चाहिये :

- आगम/ शिक्षण: सबको शिक्षा मिलनी चाहिये.

- उसको अन्न मिलना चाहिये; कोई आदमी भूखा नहीं रहना चाहिये, बच्चे तो खासतौर पर.

- आदमी को आदर के साथ आरोग्य प्राप्त होना चाहिये.

मोक्ष के लिए मरना जरूरी नहीं है, बल्कि पूंजीवाद को खत्म करने से सीधे मोक्ष मिलता है।

भगवान को मानने की नहीं जानने की जरूरत है।

मुरारी बापू ने बाबा कयामुद्दीन द्वारा 325 वर्ष पूर्व भारतीय वेदांत और कुरान का समन्वय करते हुए लिखी गई पुस्तक 'नूर-ए-रोशन' का लोकार्पण करते हुए कहा देश में लोकसभा, राज्यसभा और विधानसभा की तर्ज पर एक 'सद्भावना सभा' भी होनी चाहिए। जहाँ देश के बुद्धिजीवी, संत और विद्वान बैठकर देश की समस्याओं पर चिंतन कर सकें।

मुरारी बापू ने कुँअर बाराबँकी के शेर में अपनी बात यों कही-

न हारा है इश्क़ न दुनिया थकी है,

दिया जल रहा है और हवा चल रही है।

वो जहाँ भी रहेगा रोशनी फैलाएगा,

चिरागों का कोई मकाँ नहीं होता।

तसबी छोड़दी मैने इस खयाल से,

गिनकर नाम क्या लेना, वो तो बेहिसाब देता है।



मुरारी बापू ने भी अपने उद्बोधन में एक घटना सुनाते हुए कहा बरसों पहले जब मैं ऋषिकेश में अकेला रहता था और प्रतिदिन यज्ञ करता था तो यज्ञ समाप्त होने के बाद देर रात एक बजे गंगा नदी पार कर एक सूफी फकीर यज्ञ की वेदी पर आता था। ये सिलसिला सात दिन तक चलता रहा। एक दिन मैने उससे पूछा कि तुम इतनी रात को यज्ञ की वेदी के पास आकर क्यों बैठते हो, तो उसने कहा, मैं एक मुसलमान फकीर हूँ और कहीं मेरी वजह से हिन्दू लोग नाराज नहीं हो जाए इसलिए रात के अंधेरे में आकर इस पवित्र अग्नि के पास आकर बैठता हूँ। मुरारी बापू ने कहा कि इसके बाद हम दोनों देर रात को अकेले ही चुपचाप यज्ञ की वेदी पर बैठे रहते थे, कभी हमने कोई बात नहीं की, मगर ऐसा लगता है कि उस सूफी फकीर ने मुझ पर अपनी सारी करुणा बरसा दी और मैं आज तक उसमें भीगा हुआ हूँ।



इसके विपरी बाबा रामदेव का मानना है देश को गुरू,साधक,योगी,योद्धा चाहिए। सवाल यह है क्या सच में हमें ये लोग चाहिए या नागरिकचेतना सम्पन्न नागरिक चाहिए ?

बाबा रामदेव के दकियानूसी विचारों से क्या देश का विकास होगा ? बाबा का मानना है 'अतीत का गर्व हमारे दिल में हिलोरें ले रहा है।' सवाल यह है आधुनिक समाज का निर्माण क्या अतीत की हिलोरों पर संभव है या विज्ञानसम्मतचेतना के प्रचार से संभव है ?

भारत स्वाभिमान के नाम पर जिस तरह का दकियानूसी शास्त्र प्रचारित किया जा रहा है,उसका नमूना है बाबा रामदेव और उनके प्रौपेगैंडा प्रचारक । वे संस्कार चैनल पर कह रहे हैं न्याय पाने के लिए पुरानी किताबों का अनुकरण करो न्याय मिल जाएगा। इसके लिए वह दयानन्द सरस्वती की किताबों,मनुसंहिता आदि का नाम भी ले रहे हैं। क्या इन किताबों से आधुनिक न्याय संभव है ?

जो पोगापंथ और जातिप्रथा के समर्थक हैं वे पहले आयुर्विज्ञान और विज्ञान का विरोध करते थे वे ही लोग हैं जो आज भी समाज में विज्ञान और विज्ञानसम्मतचेतना के प्रचार-प्रसार का विरोध कर रहे हैं। वे आयुर्विज्ञान के साथ अध्यात्म को जोड़ रहे हैं।फासिस्ट राजनीतिक एजेण्डे को प्रवचनों-कसरतों के बहाने जोड़ रहे हैं। इन संतों-वैद्यों-बाबाओं को सहज ही धार्मिक और लाइफ स्टाइल टीवी चैनलों पर देखा जा सकता है। ये निंदा के नहीं उपेक्षा के पात्र हैं।इन संतों में एक हैं बाबा रामदेव।

भारत में आयुर्विज्ञान ने चिकित्सा के क्षेत्र में जादू-टोने,झाड़-फूंक आधारित चिकित्सा पद्धति से हटकर तर्काश्रित चिकित्सा पद्धति को जन्म दिया। यानी दैव-व्यपाश्रय भेषज के स्थान पर युक्ति -व्यपाश्रय भेषज को प्रतिष्ठित किया। इससे पोंगापंडित,कठमुल्ले,रूढ़िवादी सभी नाराज हो गए। पुरोहित वर्ग के लिए यह चुनौती सांकेतिक थी लेकिन थी महत्वपूर्ण। क्या आज के बाबा लोग आयुर्विज्ञान का विज्ञान के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं ?क्या वे जादू-टोने,झाड़-फूंक को चुनौती दे पा रहे हैं ?



जेएनयू के छात्र आंदोलन के समर्थन में राष्ट्रपति के नाम अपील

Text of the appeal authored by a former President of the JNUSU , Jagadishwar Chaturvedi , that was passed unopposed by the JNU oldies after more than 50-hours debate , discussions , deliberations , consent after dissent the world over in the larger interest of JNU and democracy in India . Dear Mr President Sir
We the Alumni of JNU, request you to kindly intervene in the ongoing student agitation on the campus and help restore normalcy.
The health of several office-bearers and other members of JNUSU, on an indefinite hunger strike under the banner of JNUSU over the last eight days, is causing serious concern.
The students have been demanding that the ‘disciplinary action’ suggested by the “High Level Enquiry Committee” set up by the University Administration be revoked forthwith.
At the very inception of the committee the students had raised several objections to the setting up of the committee and had said that it was totally unacceptable. It is worth noting that the JNUTA had also rejected the enquiry committee.
The administration rejected the objections and conducted a one sided probe. Police action was also been initiated against the students and the matter is sub-judice.
The action initiated against the students and office bearers of JNUSU is politically motivated. We therefore demand that the JNU administration immediately withdraw the proposed disciplinary action and restore normalcy on Campus
मान्यवर,
हम जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र आपसे अनुरोध करते हैं कि विश्वविद्यालय प्रांगण में चल रहे छात्रों के आंदोलन में हस्तक्षेप करके कैंपस में शांति बहाल करने में मदद करें।उल्लेखनीय है कैंपस में छात्रसंघ के बैनरतले अनेक छात्र और छात्रसंघ पदाथिकारी विगत आठ दिनों से आमरण अनशन पर बैठे हैं।इन सभी छात्रों की शारीरिक अवस्था चिंताजनक है।छात्रों की मांग है कि विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा गठित उच्चस्तरीय जांच समिति की रिपोर्ट के आधार पर की गयी अनुशासनात्मक कार्रवाई को तुरंत रद्द किया जाय।यह जांच कमेटी जब गठित की गयी थी तब ही छात्रों ने इसके निर्माण पर अनेक आपत्तियां प्रकट की थीं,इन आपत्तियों को प्रशासन ने एकसिरे से अस्वीकार किया और इकतरफा जांच कमेटी का गठन करके उस घटना की जांचकी।उल्लेखनीय है कि जेएनयू शिक्षक संघ ने भी जांच समिति को अस्वीकार किया था।वहीं दूसरी ओर छात्रों के खिलाफ पुलिस कार्रवाई भी गयी।जिससे संबंधित मुकदमा अदालत में विचाराधीन है।हम विनम्रतापूर्वक कहना चाहते हैं कि जिन छात्रों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की गयी है वह राजनीति से प्रेरित है।अतःहम मांग करते हैं कि जेएनयू प्रशासन तुरंत छात्रों के खिलाफ की गयी अनुशासनात्मक कार्रवाई को वापस ले और कैंपस में शांति बहाल करे।( चन्द्रप्रकाश झा की वॉल से साभार

रविवार, 8 मई 2016

मेरा बचपन- माँ के दुख और हम

         माँ के सुख से ज्यादा मूल्यवान हैं माँ के दुख।मैंने अपनी आँखों से उन दुखों को देखा है,दुखों में उसे तिल-तिलकर गलते हुए देखा है।वे क्षण मेरे जीवन के सबसे मूल्यवान क्षण हैं,दुखों में जितना सीखा उतना सुखो में नहीं सीख पाया।रिश्तेदार-सगे -संबंधी-मित्र आदि की पहचान दुख में ही हुई। दुख में किसी को पास नहीं पाया।यह बात आज से पचास पहले जितनी सच थी उतनी ही आज भी सच है।दुख जब आते हैं तो चारों ओर से आते हैं।कोई मदद करने वाला नहीं होता।सारे सामाजिक संबंध बेकार नजर आते हैं।दुख जीवन के अनिच्छित कर्मों में से एक है,दुखों को कभी भूलना नहीं चाहिए।कष्टमय जीवन को जो लोग भूल जाते हैं वे अपने हृदय के द्वार मानवीय संवेदनाओं के लिए बंद कर देते हैं।
मैं जब पैदा हुआ तो माँ की उम्र 13-14 साल रही होगी।उसके लिए बच्चा पैदा करना चमत्कार से कम न था।सुंदर पुत्र संतान को जन्म देकर वह खुश थी,लेकिन भविष्य को लेकर चिंतित और सतर्क । उसके लिए मातृत्व आनंद की चीज थी। वह मातृत्व से नफरत नहीं करती थी और नहीं बोझ समझती थी। उसके लिए मातृत्व स्वतंत्रता की अभिव्यक्ति जैसा था।
उसके लिए यह विलक्षण स्थिति थी ,एक तरफ मातृत्व का अहं और आनंद, दूसरी ओर अहंकाररहित गौरवानुभूति। मातृत्व को वह सृजन के रूप में देखती थी।दाई की मदद से मेरा जन्म घर में ही हुआ।इस प्रसंग में मुझे हेगेल के शब्द याद आते हैं,हेगेल ने लिखा है, ´सन्तान का जन्म माता-पिता की मृत्यु भी है।बालक अपने स्रोत से पृथक होकर ही अस्त्विमान् होता है।उसके पृथकत्व में माँ मृत्यु की छाया देखती है।´ संभवतःयही वजह रही होगी कि मेरी माँ ने मुझे अपने से कभी दूर नहीं रखा।वह जितनी बेहतर चीजें जानती थीं उनकी कल्पना में रहती थी,उसे अनेक किस्म के हुनर आते थे,जिनको लेकर वह व्यस्त रहती थी।वह कभी उदासीनता या अवसाद में नहीं रहती थी,हमेशा कोई न कोई काम अपने लिए खोज लेती थी।उसकी इसी व्यस्तता ने उसे आत्मनिर्भर और स्वतंत्रता प्रिय बना दिया था।
अमूमन बच्चा माँ पर आश्रित होता है लेकिन मेरे मामले में थोड़ा उलटा था चीजों को जानने के मामले में माँ मुझ पर आश्रित थी,मैं उसे जब तक नहीं बताता वह जान नहीं पाती थी और तुरंत जानना उसकी विशेषता थी,तुरंत जानना और तुरंत जबाव देना।याद नहीं है उसने मुझे कभी पीटा हो,वह नाराज होती थी लेकिन पिटाई नहीं करती थी,जबकि पिता के हाथों दसियों बार पिटा हूँ।उसे समाज को लेकर गुस्सा नहीं था लेकिन असहमतियां थीं,जिनको वह बार-बार व्यक्त करती थी।वह पिता के आचरण से बहुत नाराज रहती थी,उसे असंतोष था कि पिता उसकी बात नहीं मानते बल्कि अपनी माँ की बातें मानते हैं।


उसका स्वभाव शासन करने का नहीं था बल्कि वह शिरकत करने में विश्वास करती थी,कोई उसके ऊपर शासन करे यह वह कभी मानने को तैयार नहीं होती थी।शिरकत वाले स्वभाव के कारण वह अपनी माँ और नानी की प्रतिदिन घरेलू कामों में समय निकालकर मदद करने उनके घर जाती थी,उसको जब मन होता था घर से निकल पड़ती थी,उसे बंदिशें एकदम पसंद नहीं थीं,पिता और दादी उसके इस स्वभाव को जानते थे और उसे आने-जाने में कभी बाधा नहीं देते थे।वह शिरकत वाले स्वभाव के कारण घर में हर काम में दादी की मदद करती थी, वहनियमित सिनेमा देखती थी, पिता हर सप्ताह उसे सिनेमा दिखाने ले जाते थे। जबकि ताईजी की स्थिति एकदम विपरीत थी,वे कभी घर के काम में शिरकत नहीं करती थीं।उसकी शिरकत वाली भावना का सबसे आनंददायी रूप वह होता था जब मैं छत पर पतंग उडाता था और वह छत पर आकर बैठी रहती और सिलाई करते हुए देखती रहती ,उसे हमेशा मेरी चिन्ता रहती कि कहीं बन्दर मुझे काट न लें। वह बंदरों से मुझे बचाने के लिए छत पर डंडा लिए बैठी रहती।तकरीबन यही दशा मेरी भी थी गर्मियों में आलू के पापड़ आदि बनाने में मैं उसकी मदद करता,घंटों छत पर बैठा रहता जिससे पापड़ आदि की बंदरों से रक्षा कर सकूँ। कहने के लिए और भी बच्चे थे घर में लेकिन उसकी विशेष कृपा मेरे ऊपर थी,वह छत पर काम करेगी और मैं बंदरों पर नजर रखूँगा।जैसाकि सब जानते हैं मथुरा में बंदरों की संख्या बहुत है और वे बहुत परेशान करते हैं,नुकसान पहुँचाते हैं,काट लेते हैं।तेज गर्मियों में वह पापड़ आदि बनाने का छत पर काम करती थी और मैं भरी दोपहरी उसको कम्पनी देता था।
वह देखने में बहुत सुंदर थी,सारा शरीर सुंदर गठा हुआ था।हाथों की अंगुलियां कलात्मक थीं। अच्छी बात यह थी बच्चे उसके लिए बंधन या बोझ नहीं थे,वह उनमें आनंद लेती थी और अपना मूल्यवान समय उन पर खर्च करती थी।उसका साहचर्य हम सबमें ऊर्जा भरता था।दिलचस्प बात यह थी कि वह मुझसे कोई भी चीज छिपाती नहीं थी,प्रेम,गुस्सा,आनंद हर चीज मेरे साथ शेयर करती थी,अनेक चीजों की मेरे पास जानकारी होती थी,पिता को पता ही नहीं होता था,पिता पूछते थे तब मैं बताता था।शरीर,सेक्स,कला,सिनेमा,समाचार सब कुछपर उसकी नजर थी और इनसे जुड़ी चीजों पर वह बातें करती रहती थी।उसकी जिज्ञासाएं अनंत थीं,सबसे दुर्लभ चीज यह थी कि वह कभी थकती नहीं थी,उसके शरीर ने जब धोखा दे दिया तब ही वह बैठी,वरना वह कभी खाली नहीं बैठती,उसके पास हमेशा काम रहते।




मेरा बचपनः माँ के आँसू और आनंद


           वह रो रही थी और अभिव्यक्त कर रही थी।उसके पास भाषा नहीं थी,सिर्फ आँसू थे।पता नहीं कब और कैसे आँसू निकलते-निकलते बंद हो गए और वह उठी और घर के कामों में जुट गयी।आँसू और श्रम यही उसकी दिनचर्या थी।पता नहीं उसे आँसू में राहत मिलती थी या घरेलू श्रम में शांति मिलती थी,यह बात मैं कभी जान नहीं पाया,जब भी जानने की कोशिश की वह हमेशा टालती रही।वह बोलती नहीं थी,लेकिन इशारों में सब कुछ कहती थी,बार-बार पूछने पर हमेशा टाल देती थी,उसको किस बात का दुख है या फिर किन चीजों से उसे तकलीफ होती है,वह सब बताने की वह जरूरत महसूस नहीं करती थी, मैं हमेशा उसके साथ रहता था ,वह मेरे जरिए सारी बातें समझती थी,हर बात,हर समस्या वह सामने रखती,हर चीज जानना चाहती,उसकी अनंत जिज्ञासाएं थीं,शर्त एक ही थी कि मैं हमेशा उसकी आँखों के सामने रहूँ।कहने को हम पाँच भाई-बहन थे,लेकिन वह मेरे ऊपर कुछ ज्यादा मेहरबान थी।वह मेरा ख्याल सबसे ज्यादा रखती थी,उसे अच्छा लगता था कि मैं खूब पढूँ,मैं जब पढ़ता था तो वो हमेशा मेरे पास मौजूद रहती,संयुक्त परिवार था,हलचल रहती थी घर में,वह मेरे लिए एकांत बनाती थी, जिससे मुझे कोई परेशान न करे,मेरा पढ़ने से ध्यान न बंटाए।

मुझे याद है कि मैंने जब कक्षा पाँच पास की और मथुरा के माथुर चतुर्वेद संस्कृत महाविद्यालय में प्रथमा में मेरा दाखिला लिया तो माँ बहुत खुश थी,पिता ने गुरूपूर्णिमा के दिन ले जाकर दाखिला कराया,कॉलेज के सभी शिक्षकों को 1-1 किलो आम गुरूदक्षिणा में भेंट किए।उसके बाद पढ़ने का जो सिलसिला शुरू हुआ वह आज तक जारी है।मुझे माँ से बेइंतहा प्यार मिला,संभवतःअपने बचपन के मित्रों में मैं अकेला था जिसके लिए प्रथमा में ही निजी तौर पर 1969 में टेपरिकॉर्डर और रेडियो था। मेरे लिए घर में एक छोटा कमरा बनवाया गया।उसमें चारपाई,कुर्सी,टेबिल और दीवार में पत्थर की दो बड़ी अलमारियाँ बनवाई गईं।यानि कक्षा 8से मैं स्वतंत्र रूप से अपने कमरे में अलग रहा हूं,मेरी प्राइवेसी थी और उसमें कोई दखल नहीं देता था,कहने को संयुक्त परिवार था,लेकिन उसमें उसने मेरे लिए रहने,सोने,पढ़ने की स्वतंत्र व्यवस्था करा दी थी,मुझे पतंगबाजी का खूब शौक था,उसके लिए नियमित पैसे मिलते थे,कंचे या गोली खेलने की आदत थी उसके लिए भी पैसे मिलते थे,हाथ खर्च के लिए दो आने रोज मिलते थे।इस सबमें मेरी दादी उसकी मदद करती थी क्योंकि वो घरकी मुखिया थी।मेरी माँ और दादी का मानना था कि मुझमें पढ़ने-लिखने की संभावनाएं सबसे ज्यादा हैं अतःमेरा ज्यादा ख्याल रखा जाए।हमारे ताऊजी के दो लड़के थे,मेरे खुद के 4भाई-बहन थे,लेकिन इन सबके रहते हुए,मेरे लिए बचपन में ही स्वतंत्र कमरे की व्यवस्था हो गयी।यह सब कुछ संभव हुआ माँ के कारण।वह पढ़ी लिखी नहीं थी,लेकिन शिक्षा के महत्व को जानती थी।संस्कृत पाठशाला में जाने के बाद मेरा कोर्स बढ़ गया,किताबें बढ़ गयीं,इसके लिए मैंने सुबह चार बजे उठने की आदत डाली,इसमें मेरी माँ की महत्वपूर्ण भूमिका थी,वह सुबह की नल आने के समय जग जाती और मुझे भी जगा देती।जगाने का एक सिस्टम था। माँ नीचे के कमर में सोती थी,मेरे लिए कमरा ऊपर बनाया गया,उस कमरे में एक खुली खिड़की बनायी गयी जिसके जरिए एक डोरी मेरी माँ के पास रहती और मेरे कमरे में एक घंटा मंदिर से उतारकर लाकर बाँध दिया गया था उसकी आवाज सुनकर मैं जग जाता था और सुबह जगने के साथ ही एक कप चाय मेरे पास रहती थी,माँ नीचे से नजर रखती थी कि मैं जगा हूँ या सो रहा हूँ,नियम से मुझे कुर्सी पर बैठकर पढ़ना पढ़ता,चारपाई पर बैठकर पढ़ना मना था,इसमें प्रधान कारण यह था कि मेरी माँ नीचे से कुर्सी-टेबिल देख सकती थी और नजर रखती थी कि मैं कहीं सो तो नहीं गया,यदि मैं सो जाता तो वह ऊपर आकर प्यार से सिर सहलाकर जगा देती और जोर देती कि पढो।इस पढाई का एक अन्य प्रेरक तत्व था रोज सुबह दो कचौड़ी और 2जलेबी का नाश्ता या कलेवा।मुझे खास तौरपर प्रतिदिन यह नाश्ता मिलता,नाश्ते के पहले यमुना स्नान,संध्यावंदन,गायत्री मंत्र का जप,महात्रिपुरसुंदरी की पूजा।कभी-कभी पूजा छूट जाती थी जिसे मैं शाम को करता था,माँ इन सबकी निगरानी रखती कि मैं यह सब ठीक से करता हूँ या नहीं ,ठीक से न करने पर गुस्सा भी होती और इस सबमें वह यह ख्याल रखना नहीं भूलती कि मैंने समय पर खाया है कि नहीं,समय पर शरीर साफ किया है कि नहीं। उसकी निगरानी का ही सुफल है जिसने मुझे नियमित,संगठित और नियोजित ढ़ंग से पढ़ने का आदी बना दिया।

मैं जब भी लिखता हूँ मां की इमेज आँखों में रहती है।संभवतःअपने मित्रों में अकेला हूँ जिसने जमकर लिखा,खूब लिखा।यह लिखना हो ही नहीं पाता यदि मेरी गूंगी-बहरी माँ ने मेरी जिन्दगी संगठित न की होती।संगठित होकर रहने कला मैंने माँ से सीखी,जबकि लिखने और बोलने की कला पिता से सीखी।

यह सच है मैं जितना अपनी माँ पर गर्व करता हूँ वह भी अपने बच्चों पर गर्व करती थी,मैंने जब शास्त्री की परीक्षा पास की तो मेरी माँ बेइन्तहा खुश हुई।उसे खुशी इस बात से हुई कि मैं पिता से ज्यादा डिग्री पाने में सफल हो गया।वह यह चाहती थी कि मैं पिता से ज्यादा पढूँ।मैंने समझाया कि पिता शास्त्री प्रथम वर्ष तक ही पास कर पाए हैं,जबकि मैंने दोनों साल की परीक्षा पास करके शास्त्री की डिग्री हासिल की है,मैंने शास्त्री 1976 में पास किया, मैं अपने वंश में पहला स्नातक हूँ। अफसोस यह कि मेरे शास्त्री परीक्षा परिणाम आने के चारदिन बाद ही माँ की मृत्यु हो गयी।





माँ सोशलमीडिया और भाषा

        इंटरनेट का पहला सुख है आत्माभिव्यक्ति।दूसरा सुख है वर्चुअल प्रशंसा।इन दो सुखों ने सोशलमीडिया पर निजी जीवन के अनुभवों की बाढ़ पैदा कर दी है।जाहिर है आत्भिव्यक्ति की यह विश्वव्यापी सुविधा पहले कभी उपलब्ध नहीं थी।आज है तो लोग बढ़-चढ़कर माँ के साथ अपनी तस्वीरें शेयर कर रहे हैं,बहुत कम लोग हैं जो निजी अनुभव शेयर कर रहे हैं।यह सच है फोटो बहुत कुछ कहता है।लेकिन आत्माभिव्यक्ति का अभी भी सबसे ताकतवर मीडियम भाषा है।समस्या यह है कि भाषा में माँ के अनुभव कैसे व्यक्त करें ॽ अभी भी बहुतों के पास माँ के बारे में सही भाषा नहीं है।मात्र फोटो हैं।यह मूलतःआदिम अभिव्यंजना है। माँ को भाषा में लाना चाहिए।माँ जितनी भाषा में आएगी स्त्री की ताकत और स्पेस का उतना ही विकास होगा। भाषा में अभिव्यक्त करने के बाद ही मनुष्य को स्थान मिलता है,पहचान मिलती है।फोटो दें ,लेकिन फोटो को भाषा भी दें,फोटो को गद्य-पद्य से जब तक नहीं जोड़ेंगे, जीवन संघर्ष सामने नहीं आएंगे।जीवन संघर्ष के बिना मां या किसी का भी रूप निरर्थक है।माँ हमें भाषा देती है,भाषा बनाने में मदद करती है,वह जब भी मिलेगी भाषा में मिलेगी।

शनिवार, 7 मई 2016

डिग्री का मायाजाल और हनुमानभाव


     जब हमने कह दिया तुम भगवान हो तो भगवान हो ! जब हमने कह दिया तुमसे ज्यादा कोई बलिष्ठ नहीं है,तो कोई नहीं है ! हमारे यानी भक्त के कहने का मूल्य है ! तुम तो जानते ही हो भगवान को भगवान खुद भगवान ने नहीं बनाया बल्कि भक्तों ने भगवान को भगवान बनाया है!तुम जान लो श्रीराम –श्रीराम न होते यदि भक्त हनुमान न होते ! हमने देखा है भगवान के पेशाब से चिराग जलता है,हमने महसूस किया भगवान के इशारे पर सारे मीडिया की आवाज बंद हो जाती है ! सारा मीडिया भगवान –भगवान करने लगता है ! यह भगवान का ही खेल है कि आरएसएस जैसा संगठन भेड़ बन गया है! भगवान के जब इतने खेल चल रहे हों तो ऐसी अवस्था में ये क्या डिग्री दिखाओ –डिग्री दिखाओ लगा रखा है !

डिग्री की जरूरत मूर्खों की पड़ती है !देवता और अक्लमंद डिग्री से नहीं पहचाने जाते ! तुम कम अक्ल हो, इसीलिए डिग्री-डिग्री चिल्ला रहे हो!भगवान तो भगवान हैं ,वे महाअक्ल हैं!वे कृपानिधान हैं! सर्वगुण सम्पन्न हैं! उनकी इच्छा के बिना एक पत्ता भी नहीं हिलता! वैंकेय्या नायडूजी आप उनसे भी महान् हैं! हमारे यहां हिन्दी साहित्य में कहावत है भक्त भगवान से बड़ा होता है ! भगवान और भक्त में भक्त ताकतवर होता है! नायडूजी आपकी भक्ति देखकर मेरा मन भक्त-भक्त हो गया है ! आपसे अंदर से ईर्ष्या भी हो रही है कि मैं आप जैसा भक्त क्यों नहीं बन पाया !

नायडूजी आपने सही कहा पीएम नरेन्द्र मोदी भगवान की देन हैं,स्वयं भगवान हैं!कमाल की खोज की है आपने ! सही कहा है किसी ने ,जो चीज भक्त को नजर आती है वह चीज भगवान में गैर-भक्तों को नजर नहीं आती ! नायडूजी आपकी जय हो!आपने हम सबकी आँखें खोल दीं! आप कितने महान् हैं कि आपने मोदी भगवान् की खोज कर ली !आप इसलिए भी महान् हैं क्योंकि आपने भगवान् को भगवान् बना दिया!

पत्थर की मूर्ति में भगवान् की जो प्राणप्रतिष्ठा करता है उसका लोग परम भक्त के रूप में प्रतिदिन स्मरण करते हैं! नायडूजी आपकी भक्ति देखकर इस समय ईश्वर के रीयल भक्त भी थर-थर काँपने लगे हैं,पश्चाताप की आग में जल रहे हैं कि अरे सामने भगवान खड़े थे,घर –घर में टीवी स्क्रीन में भगवान गीता पढ़ रहे थे,लेकिन हम अभागे उनको देख ही न पाए!नायडूजी रीयल भक्त दुखी हैं और पीड़ित भी हैं कि हमारे जैसे धर्मप्राण भारत में साक्षात भगवान पधारे और वे उनको पहचान नहीं पाए! नायडूजी आपने भारत की भक्तप्राण जनता की आँखें खोल दीं,आप धन्य हैं और हमें धिक्कार है !

नायडूजी आपकी भक्ति और दिव्यदृष्टि देखकर अरविन्द केजरीवाल पर गुस्सा आ रहा है,लगता है यह आदमी ठीक नहीं है,भक्त को नहीं पहचानता ! भगवान को नहीं पहचानता ! पता नहीं यह मोदी भगवान को छोड़कर काहे को रोज जय हनुमान –हनुमान करता रहता है !

जिस तरह हर गली में हनुमान घूमते रहते हैं वैसे ही यह भी घूमता रहता है,जिस तरह गली के छोरे किसी के पीछे पड़ जाते हैं तो झल्लाकर रख देते हैं,इसने भी गली के छोकरों की तरह मूर्खतापूर्ण सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं,कह रहा भगवान की डिग्री फेक है! पागल हो गए हो केजरीवाल ! लेकिन नहीं हमें उसकी बात पर गौर करना चाहिए।असल में केजरीवाल तो हनुमान भाव में रहता है! हनुमान भाव बेहद खतरनाक है यह रावण को मौत के मुँह तक पहुँचा चुका है,वह बहुत सारी डिग्रियों से युक्त पंडित था,लेकिन हनुमान भाव ने रावण की ,सत्ता,डिग्रियों और विद्वता को एक ही झटके में राख करके रख दिया था,सोने की लंका में आग लगा दी ।हनुमान भाव में निडरता और पूंछ बहुत महत्वपूर्ण है,लंका में आग लगाने के लिए हनुमान की निडरता और पूंछ ही महान् हैं!

हनुमान भाव के सामने महाबली ,महापंडित रावण का सारा कौशल बेकार गया! हनुमान भाव से राम भी प्रभावित थे।हनुमान भाव यानी आग लगाने वाला भाव,लंका जलाने वाला भाव!इस भाव के सामने सब कुछ नश्वर है,भगवान भी नश्वर है,विद्वान भी नश्वर है,राम की विजय में हनुमान भाव की कभी किसी ने उस तरह चर्चा नहीं की है,लेकिन आप तो जानते ही हैं हनुमान भाव महान है। हनुमान भाव का लक्ष्य है रावण का वध ! हनुमान भाव के लिए सत्य,तथ्य, तर्क-वितर्क महत्वपूर्ण नहीं है।हमने बार-बार देखा है भक्तभाव के जितने रूप हैं उनमें हनुमान भाव सबसे ताकतवर है।भगवान राम के भक्त काम नहीं आए,हनुमान भाव काम आया! तुम यादकरो हनुमान के पास क्या था ॽ सिर्फ हनुमान भाव था!हनुमान भाव यानी निडरता! केजरीवाल इसलिए सुंदर लगता है क्योंकि वह निडर है!भक्त कमजोर होता है क्योंकि वह निडर नहीं होता!तुम तो जानते हो लोकतंत्र की कुंजी उनके हाथ में है जो निडर हैं ! अब सोचो तुमको भक्त बनना है या निडर बनना है।निडर बनना है तो हनुमान भाव में जाओ,लंका में आग लगाओ !



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मेरा बचपन- माँ के दुख और हम

         माँ के सुख से ज्यादा मूल्यवान हैं माँ के दुख।मैंने अपनी आँखों से उन दुखों को देखा है,दुखों में उसे तिल-तिलकर गलते हुए देखा है।वे क...