शनिवार, 16 फ़रवरी 2013

हिन्दी साहित्य के जुगनूओं की बोगस दुनिया



हिन्दी लेखकों पर दलितलेखकों ने बहुत सही जगह आलोचनात्मक हमला किया है और इसके कारण हिन्दी के आलोचक दलितलेखकों से घबडाए हुए बात करते हैं। प्रार्थनाशैली में बात करते हैं,झूठी प्रशंसाभाव करते हैं। इस आलोचना का सामाजिक परिणाम यह निकला कि हिन्दी के एक नामी कथाकार को 60साल बाद पता चला कि वह आरक्षित जाति में आता है। अब समझ जाइए इस शर्मनाक चालाकी को कि ये 60साल तक साहित्य की मलाई खाते रहे। जबकि साहित्य को कोटि को ही दलित लेखक नहीं मानते। वे कहते हैं यह वर्णवादी कोटि है। वे दलितसाहित्य की नई कोटि की हिमायत करते हैं। अब सवर्णलेखक अपने पूर्वजों में दलितजाति खोज रहे हैं और बेशर्मी से कह रहे हैं मेरे पूर्वज दलित थे। असल में साहित्य की यह नई बीमारी है। वर्ण बीमारी।
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हिन्दी में लेखक-प्रोफेसर आए दिन गरीबीभरा अतीत, सत्ता के दबाब, ह्रासमेंट, विक्टमाइजेशन आदि के आए दिन किस्से सुनाते हैं और सहानुभूति जुगाड़ करने की कोशिश करते हैं। ये साहित्य के थोथे किस्से हैं। थोथे किस्सों से लेखक- प्रोफेसर समझ में नहीं आता।
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यह दौर अमीरों पर भी तबाही लेकर आया है किंगफिशर और सहारा के मालिकों पर जिस तरह कानून की गाज गिरी है उसने कारपोरेट ईमानदारी को नंगा कर दिया है।
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हिन्दी में जो लोग कहते हैं साहित्य की गोष्ठियां और धड़ेबंदी महान बनाती है वे जरा रामविलास शर्मा से सीखें कि किस तरह साहित्य साधना महान बनाती है. हिन्दी के ज्ञानी गुणी और पुरस्कार प्राप्त लेखक शोहरत के नशे में इस कदर डूबे हैं कि वे रामविलास शर्मा की पूजा करना जानते हैं लेकिन उनसे कोई बात सीखना नहीं चाहते। यह बीमारी बड़े लेखक -आलोचक से लेकर नए लेखकों तक फैली हुई है।
जो लेखक अपनी भाषा के साहित्यकार की मूल्यवान बातों को ग्रहण नहीं करते वे जल्द ही अंतर्ध्यान हो जाते हैं। वे साहित्य में जुगनू की तरह हैं।
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हिन्दी में चुगद किस्म के लेखकों की भीड़ पैदा हो गयी है,इनमें कुछ नामी लेखक भी हैं , अकादमी पुरस्कार प्राप्त हैं , ये लोग अहर्निश आत्मप्रशंसा में लीन रहते हैं, आत्मप्रशंसा कोसाहित्य का चुगद भाव कह सकते हैं।ये लोग कम से कम लिखते हैं, हेकड़ी,शोहरत और दौलत के शुरूर में डूबे रहते हैं। इन लेखकों को मंन्नू भंडारी,मृदुलागर्ग,मैत्रेयी पुष्पा जैसी लेखिकाओं से अभी बहुत कुछ सीखने की जरूरत है। इन लेखिकाओं ने बिना किसी अंहकार, हेकड़ी, चमचागिरी के किस तरह हिन्दी साहित्य को श्रेष्ठतम रचनाएं दी हैं। खासकर मैत्रेयी पुष्पा ने तो कमाल किया है उसने बहुत कम समय में अनेक श्रेष्ठ उपन्यास दिए हैं।
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जब पाठक लेखक के सामने हां -हां करता रहता है और लेखक की महानता का जयगान करता रहता है तो इस तरह के पाठक को हिन्दी का लेखक सुधीपाठक - जागरूकपाठक कहता है।
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कोलकाता से दिल्ली,दिल्ली से मद्रास तक हिन्दी के जो लेखक सनसनाते चमचों के साथ मस्ती लेते नजर आते हैं और यह दावा करते हैं वे बेहद जनप्रिय हैं। वे एक सामान्य तथ्य की उपेक्षा करते हैं.वह यह कि हिन्दी के अधिकांश लेखकों से हिन्दीभाषी लड़कियां मिल नहीं पातीं या मिलना तक नहीं चाहतीं।
मसलन् आपको लेखक के इर्दगिर्द 3-4चार चमचे मिल जाएंगे, लेकिन चमचागिरी करते लड़की नजर नहीं आएगी।
कहने का अर्थ है कि लेखक को चमचाकल्चर को साहित्यसंस्कृति समझने की भूल नहीं करनी चाहिए।
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आप यात्री की तरह कोलकाता को देखेंगे तो आपको यह शहर कभी समझ में नहीं आएगा।आज के दिन यही लगेगा कि यह शहर सरस्वती पूजा में डूबा है ,लेकिन यथार्थ एकदम विलोम है और भयावह है।
देश में बलात्कार के मामलों में यह राज्य विगत आठ सालों में टॉप पर है। अभी कुछदिन पहले ही एक शिक्षित परिवार के लोगों ने अपनी वृद्धा माँ को पीट-पीट कर अधमरा कर दिया और बाद में उसकी मौत हो गया। मुहल्ले के लोगों के दबाब में पूरे परिवार,जिसमें उस औरत का पति,बेटा,बहू आदि को गिरफ्तार करना पड़ा। पता चला वृद्धा को विगत दो सालों से अहर्निश यातनाएं दी जा रही थीं। इस तरह की औरतों को यातना की घटनाएं यहां आम हो गयी हैं। इसके बावजूद आप यदि सरस्वती पूजा के रस में निमग्न हैं तो रहें लेकिन इससे स्त्री के सम्मान और सुख का पता नहीं चलता। कोलकाता आज स्त्री के लिए सबसे त्रासद शहर में तब्दील हो चुका है। यदि आपके पास साहित्यिक नजरिया है तो आपको औरत की बदहाल अवस्था नजर क्यों नहीं आती ?
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हिन्दी आलोचक का ईंधन है ईर्ष्या ! ये बेचारे नहीं जानते इससे निजी ब्लडप्रेशर हाइ रहता है।
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हरिशंकर परसाई ने लिखा है - "श्रद्धेय, बड़े बौड़म लगते हैं। "
ये पंक्तियां हमारे उन तमाम लेखकों को अपने सीने पर लगानी चाहिए जो नगरी-नगरी श्रद्धालु खोजते फिर रहे हैं।
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हरिशंकर परसाई ने लिखा है -" देश में जो मौसम चल रहा है उसमें श्रद्धा की टांग टूट चुकी है। " क्या हिन्दीलेखक गण सुन रहे हैं ?
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हिन्दी में महानता का ढ़ोंग वे ज्यादा कर रहे हैं जो आत्ममुग्ध हैं और आत्मप्रशंसा में लीन हैं। ये लोग पढ़ते कम हैं हांकते ज्यादा हैं। भक्ति ( चाटुकारिता) करने वालों को ज्ञानी मानते हैं।
सवाल यह है कि यदि इस तरह के लोग ज्ञानी हैं तो लिखकर आम पाठकों को अपने ज्ञान से लाभान्वित क्यों नहीं करते ? ज्ञान पेट में रखने की चीज नहीं है अन्य को बताने की चीज है।
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हरिशंकर परसाई ने विकलांग श्रद्धा का दौर निबंध में लिखा है- "यह चरण छूने का मौसम नहीं ,लात मारने का मौसम है।मारो एक लात और क्रांतिकारी बन जाओ।"
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मंगलवार, 12 फ़रवरी 2013

फेसबुक और पुस्तकमेला



कोलकाता पुस्तकमेला में साहित्यिक पत्रिकाओं का सबसे बड़ा पंडाल होता है और उसमें अनेक लेखक अपनी पत्रिकाएं लिए बैठे रहते हैं। कुछ मेले में बिक्री करते भी नजर आते हैं। साहित्यिक पत्रिकाओं के स्टॉल देखने लायक होते हैं। जिस पुस्तकमेले में साहित्यिक पत्रिकाओं का वैभव दिखता है वहां पर साहित्यप्रेम की जड़ें गहरी होती हैं।
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कोलकाता बुकफेयर में देश के बड़े लेखक और विचारक जितनी बड़ी तादाद में भाग लेते हैं और तरह -तरह के विषयों पर भाषण देते हैं वह अपने आप में विलक्षण अनुभव है यह अन्यत्र दुर्लभ है। इस मेले का आयोजन राज्य सरकार की मदद से प्रकाशक गिल्ड करता है।
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कोलकाता पुस्तकमेला में रविवार-शनिवार को इतनी भीड़ होती है कि आपको लोगों से सटकर चलना-निकलना होता है। औसतन 7-8लाख आते हैं। 15दिन तक चलने वाले मेले में कुल मिलाकर 35-40लाख लोग आएंगे।
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मुंबई में दौलत है और लाखों शिक्षितजन हैं। दिल्ली में पैसा है,शोहरत है,सत्ताकेन्द्र हैं,मध्यवर्गीय लेखकों की हेकड़ी है ,लेकिन बुकफेयर में भीड़ नहीं है। कोलकाता में न सत्ता है,न शोहरत है, न पैसा है,किताबें ही किताबें हैं और लाखों की भीड़ है। किताबों के खरीददार हैं। मुंबई,दिल्ली,मद्रास आदि किसी भी शहर में बुकफेयर में लोग सपरिवार बुकफेयर नहीं जाते लेकिन कोलकाता में सपरिवार बुकफेयर जाने का रिवाज है।
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जयपुर साहित्य मेले को टीवीवालों ने जिस तरह से प्रायोजित कवरेज के जरिए उछाला और साहित्य के नाम पर नॉनसेंस का प्रचार किया,जयपुर मेले की जनता की शिरकत को जिस तरह सनसनीखेज ढ़ंग से पेश किया उसे देखकर यही आभास मिलता है टीवीवालों ने साहित्यमेले देखे नहीं हैं।
कोलकाता पुस्तकमेला वास्तव अर्थ में पुस्तकमेला है। यहां सालाना मेले में 20करोड़ का कारोबार होता है और इसमें बहुत बड़ा हिस्सा निजी खरीद का है। इस मेले में किसी भी किस्म का कारपोरेट प्रायोजन नहीं है। यहां कोई पांचसितारा लॉन,हॉल और पण्डाल नहीं है,कोई टीवी पर सनसनीखेज कवरेज नहीं है लेकिन स्थानीयस्तर पर आम जनता की शिरकत मन को मुग्ध कर लेती है।
कोलकाता बुकफेयर में बड़ी तादाद में बूढ़े मर्द और औरतों को देख पाएंगे। ये वे लोग हैं जो बुद्धिजीवी हैं या पढ़ने के शौकीन हैं। जयपुर -दिल्ली बुकफेयर या साहित्यमेले में बूढ़े नहीं दिखते। किताबें हैं लेकिन बूढ़े नहीं हैं,यह चिन्ता की बात है। पुरानी किताब और पुराना पाठक समाज की शक्ति हैं।
हर मध्यवर्गीय बंगाली के घर में बच्चे को बुकफेयर के लिए अलग से पैसे हर साल दिए जाते हैं। बुकफेयर उनके सालाना-दैनन्दिन बजट का वैसे ही हिस्सा है जैसे वे अन्य चीजों पर खर्च करते हैं। काश ,बाकी महानगरों के शिक्षितलोग कुछ कोलकातावासी बंगालियों से यह सीख पाते !
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कोलकाता बुकफेयर का सबसे दुखदपक्ष है हिन्दीभाषियों की कम से कम शिरकत। यह शहर मारवाडियों से भरा पड़ा है। इनलोगों की सैंकड़ों संस्थाएं हैं। भारतीय भाषा परिषद जैसी शक्तिशाली संस्था है लेकिन इस संस्था का कोलकाता बुकफेयर में एक स्टॉल तक नहीं है। हिन्दी की पत्रिकाएं कहीं पर भी नजर नहीं आतीं। गिनती की तीन-चार हिन्दी किताबों की दुकान हैं। हिन्दीक्षेत्र के प्रकाशक यहां आते नहीं,कोलकाता में रहने वाले हिन्दीभाषी बुकफेयर जाते नहीं।जबकि कोलकाता में 50 लाख से ज्यादा हिन्दीभाषी लोग रहते हैं। कोलकाता के बाजार पर इनका एकाधिकार है। सारा बिजनेस नियंत्रित करते हैं।
एक ही शहर में रहने वाले मध्यवर्गीय बंगाली परिवारों और हिन्दीभाषी मध्यवर्गीय परिवारों में बुकफेयर को लेकर अंतर साफ देख सकते हैं। बंगाली बुकफेयर जाता है हिन्दीभाषी नहीं जाता। हिन्दीभाषियों की कमाने-खाने और सोने की आदत ने बुककल्चर को यहां के हिन्दीभाषियों में विकसित नहीं होने दिया।
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कोलकाता बुकफेयर का कोलकाता के हिन्दी लेखकों,हिन्दी के कॉलेज-विश्वविद्यालय शिक्षकों आदि पर न्यूनतम असर है। इनमें से अधिकांश लोग किताबें नहीं खरीदते और किताबें नहीं पढ़ते। वे हिन्दी में हांकते बहुत हैं। कोलकाता के हिन्दी के तथाकथित लेखक -शिक्षक आपको किताब खरीदने के लिए प्रेरित नहीं करेंगे। यदि आप किताब खरीद रहे हैं या किताब पर बात करना चाहते हैं तो हतोत्साहित जरूर करेंगे।
मसलन् आपने काशीनाथ सिंह की कोई किताब खरीदी और पूछा कि यह किताब कैसी है तो हिन्दी शिक्षक कहेगा अरे यार ,यह क्या है, मेरी तो कल ही काशीजी से एक घंटा बात हुई थी। पाठक भौंचक्का रह जाता है कि कमाल के लोग हैं ये ,मेरे किताब खरीदने और इनके 1घंटा काशीनाथ से बात करने के बीच में क्या रिश्ता है ?
कहने का आशय यह कि कोलकाता के हिन्दी के शिक्षकों-लेखकों ने किताब पढ़ने-पढ़ाने और लेखक पर बात करने की संस्कृति को विकसित ही नहीं किया। इसके विपरीत बंगाली शिक्षक-लेखक यह सब नहीं कहता।
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कोलकाता बुकफेयर ज्ञानसमुद्र है। यहां सनसनी नहीं बिकती। यहां किताबें बिकती हैं। जयपुरमेले पर जो संपादक और मीडिया महर्षि वाह-वाह और आह-आह कर रहे थे वे सोचें कि कोलकाता बुकफेयर में सलमान रूशदी को रोका गया ,मीडिया में खबर बनी और बात खत्म हो गयी। साहित्य में सनसनी नहीं होती।
यहां रोज लेखक एक से बढ़कर एक बेहतर बातें कहते हैं लोग सुनते हैं,मीडिया में रिपोर्ट होती हैं,लेकिन वे सनसनी नहीं बन पातीं। अमर्त्यसेन से लेकर गायत्री चक्रवर्ती स्पीवाक तक विश्वविख्यात लेखक आए ,अपनी बात कही और चले गए।असल में साहित्य एक कम्युनिकेशन है। वह कलह, सनसनी, पुलिस,थाना,मुकदमा नहीं है। जयपुरमेले ने साहित्य को साहित्य नहीं रहने दिया ,उसने साहित्य की मान-मर्यादा भ्रष्ट की है।
कुछ तो कोलकाता बुकफेयर से सीख सकते हैं मीडियावाले !!
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हिन्दी में जो लोग कहते हैं नवजागरण हो गया या हुआ था वे सही नहीं कहते। पुस्तक संस्कृति विकसित किए बिना नवजागरण नहीं होता। हिन्दी में सबकुछ है लेकिन पुस्तक संस्कृति नहीं है।
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हिन्दी लेखक दिल्ली में लाला की दुकान की शोभा बढ़ाते हैं ,किताबें नहीं खरीदते । यहां कोलकाता में बुकफेयर में लेखक मिलेगा लेकिन लाला की दुकान पर शोभा बढ़ाते नहीं ,बल्कि किताबें खरीदते हुए मिलेगा,पाठकों से बात करते मिलेगा,पाठकों को आशीर्वाद देते मिलेगा।
एकबार बुकफेयर में मैं महाश्वेता देवी से बातें कर रहा था देखा एक लड़की आई और उसने पैर छुए और उसकी माँ ने कहा आप लेखिका हैं,इसे आशीर्वाद दीजिए, इसकी हाल ही में शादी हुई है,यह आपका आशीर्वाद लेने बुकफेयर आई है।

सत्यजित राय के सपनों का अंत


            
 पश्चिम बंगाल में विलक्षण फिनोमिना देखने में आया है। यहां पर नेता एक-दूसरे की नकल में व्यस्त हैं। राजनीति में नकल सबसे बुरी छवि बनाती है। राजनेता का अनुकरणीयभाव कभी नए की सृष्टि नहीं करता। बुरी नीतियों का तबाही मचा सकता है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी जिस पार्टी (माकपा) से सबसे ज्यादा नफरत करती हैं व्यवहार में उसी पार्टी की गलत नीतियों का इन दिनों अनुसरण कर रही हैं। हाल ही में राज्य सरकार संचालित फिल्म लेबोरेटरी रूयायन को बंद किए जाने का ममता सरकार ने मन बना लिया है। रूपायन लेबोरेटरी का स्टूडियो  सॉल्टलेक सेक्टर -5 में है और इस स्टूडियो के पास अपना बहुत बड़ा फिल्मी जखीरा है। यह राज्य में फिल्म संपादन की एकमात्र लेबोरेटरी है। सॉल्टलेक में इसके पास 2.5 एकड़ जमीन है जिसमें एक एकड़ में लेबोरेटरी है और बाकी जमीन का अन्य कामों में इस्तेमाल किया जा सकता है। इस लेबोरेटरी में फिल्म संपादन की तमाम अत्याधुनिक सुविधाएं और तकनीक उपलब्ध है लेकिन पेशेवर लोग नहीं हैं।
     इनदिनों इस लैब में बंगाली फिल्मकार अपनी फिल्मों का संपादन कम करते हैं,ज्यादातर फिल्मकार फिल्म संपादन के लिए चेन्नई जाते हैं.वाममोर्चा शासन के अकुशल प्रबंधन ने इस लेबोरेटरी को कबाड़ बनाया। वामशासन की मंशा थी कि इसे निजीक्षेत्र के हवाले किया जाय।
   ममता सरकार आने के बाद बंगाली फिल्मकार उम्मीद कर रहे थे कि इस लेबोरेटरी को नए सिरे से संगठित किया जाएगा। लेकिन ममता बनर्जी ने भी वही रास्ता पकड़ा जो वाम मोर्चा सरकार ने पकड़ा। 
राज्य सरकार के सूत्रों के अनुसार ममता बनर्जी के निर्देश पर इसे बंद करने का फैसला लिया जा चुका है और इसमें काम रहे सभी 49कर्मचारियों को वीआरएस देने का फैसला ले लिया गया है।
    उल्लेखनीय है कि रूपायन इस राज्य की बेहतरीन फिल्म संपादन लेबोरेटरी है .विगत बुद्धदेव भट्टाचार्य सरकार इस लैब को जीन्यूज को औने-पौने दामों पर बेचने का फैसला लेचुकी थी .लेकिन उस समय यहां के सभी संस्कृतिकर्मियों और फिल्मी हस्तियों के जमकर प्रतिवाद किया। फलतः वाम सरकार को फैसला बदलना पड़ा और इसे बीमार उद्योग घोषित करके पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप के जरिए नए सिरे संगठित करने का फैसला लिया गया। संयोग की बात है कि जब यह फैसला लिया  गया उसके कुछ महिने बाद ममता बनर्जी की सरकार आ गई और रूयायन को नए सिरे से संगठित करने का फैसला ठंड़े बस्ते में चला गया। दो सप्ताह पहले ममता सरकार को ख्याल आया कि रूपायन लेबोरेटरी को बंद कर दिया जाय।
   रूपायन को समूचे उत्तर-पूर्वी राज्यों में श्रेष्ठतम फिल्म लेबोरेटरी माना जाता है। इसमें बंगाली ,असमिया,संथाली,उड़िया, मणिपुरी,  भोजपुरी,नागपुरी, छत्तीसगढ़ी फिल्मों के संपादन के अलावा बड़े पैमाने पर डबिंग का काम भी होता रहा है। इसके अलावा बंगलादेश की फिल्मों के संपादन के काम में इस लेबोरेटरी की बड़ी भूमिका है।
   आधिकारिक तौर पर रूपायन लेबोरेटरी पश्चिम बंगाल फिल्म विकास निगम के तहत संचालित संगठन है। पश्चिम बंगाल फिल्म विकास निगम की आय में वामशासन काल में ही गिरावट आनी शुरू हो गई थी और इस संगठन पर कर्ज का आर्थिक बोझ बढ़ गया था। नई सरकार ने इस समस्या पर विचार ही नहीं किया और सीधे  लेबोरेटरी बंद करने का फैसला ले लिया है।
  उल्लेखनीय है ममता सरकार आने के बाद संस्कृति के क्षय की जो प्रक्रिया में तेजी आई है। सत्ता ने संस्कृति के संरक्षण के काम को त्याग दिया है।  अब संस्कृति संरक्षण के नाम पर सत्ता के संसाधनों का अपव्यय हो रहा है। जो राज्य संस्कृति संरक्षण के लिए विख्यात खा आज सांस्कृतिक अपव्यय में सर्वोपरि है।  राज्य सरकार की संस्कृति के विकास और नवनिर्माण में कोई दिलचस्पी नहीं है। ममता बनर्जी संस्कृति का जितना गायन कर रही हैं उससे कई गुना ज्यादा बुनियादी क्षति कर रही हैं। वे नई नई योजनाएं घोषित कर रही हैं, शिलान्यास कर रही हैं,मेले-समारोह-उत्सव-जलसे कर रही हैं। इससे यह आभास मिलता है कि ममता की संस्कृति में गहरी दिलचस्पी है लेकिन इसके ठीक विपरीत वे सत्ता में बैठकर इस तरह के फैसले ले रही हैं जिससे पश्चिम बंगाल का सांस्कृतिक और बौद्धिकवैभव क्षतिग्रस्त हो रहा है। रूपायन के बंद करने का फैसला सत्यजित राय के सपनों का अंत है। यह लेबोरेटरी उनके सपने की उपज है।यह वही लेबोरेटरी है जिसमें सत्यजित राय की महान फिल्म पाथेर पांचाली तैयार की गयी।इस लेबोरेटरी के साथ बंगाल के अग्रणी फिल्मकारों की स्मृतियां जुड़ी हैं। यह बिडम्बना है कि एक तरफ मता सरकार राज्य में फिल्म उद्योग को चंगा करने के लिए 20करोड़ रूपये खर्च करके नई फिल्म सिटी बनाने र शाहरूख खान को ब्रॉण्ड एम्बेसडर बनाकर यश कमाना चाहती है वहीं दूसरी एर रूपायन को बंद करने जा रही है। रूपायन के साथ टॉलीबुड की यादें जुड़ी हैं। रूपायन के बंद होने का अर्थ है टॉलीवुड के एक बड़े अध्याय का अवसान।
   उल्लेखनीय है कोलकाता में प्रतिवर्ष 35-40 बंगला फिल्में रिलीज होती हैं और तकरीबन 50 करोड़ रूपये का कारोबार करती हैं। राज्य में 522 सिनेमा पर्दे हैं इनमें मात्र 52 डिजिटल पर्दे हैं।राज्य में फिल्म संस्कृति के विकास के लिए राज्य सरकार को तेजी से सिनेमाघरों के नवीनीकरण के लिए कार्ययोजना बनानी चाहिए। इसके अलावा रूपायन को बंद करने का फैसला वापस लेना चाहिए।    




सोमवार, 11 फ़रवरी 2013

अफजल गुरु को फांसीःभाजपा की बेचैनी बढ़ी


          
शुक्रवार 8फरवरी को शाम 5बजे अफजल गुरू को सूचना दी गयी कि 9फरवरी को सुबह उसे 8 बजे फांसी दी जाएगी। शुक्रवार शाम को उसे फांसी घर के पास की बैरक में ले जाया गया , जो फांसीघर से करीब 30 कदमों की दूरी पर था। रास्ते में पड़ने वाले बैरकों से कैदियों को हटा दिया गया था, ताकि किसी को इस बात की भनक तक न लग सके।फांसी घर में अफजल का वजन तोला गया।लम्बाई नापी गयी। ताकि फंदे की रस्सी उसका वजन सह सके।  तमाम जरूरी चीजें देख लेने  के बाद अफजल को उसके बैरक में भेज दिया गया। जेल अधिकारियों ने उससे पूछा कि अगर कोई चीज़ चाहिए हो तो बता दे। इस पर अफजल ने कहा कि उसे कुरान चाहिए।फांसी के पहले उसने कुरान पढ़ी। 9फरवरी की सुबह सात बजे उसका रक्तचाप देखा गया और आठ बजे फांसी पर लटका दिया गया ।उसके तत्काल बाद टीवी चैनलों को कहा गया कि अफजल गुरू को फांसी दे दी गयी है। इसी दौरान फांसी घर के सामने ही अफजल के लिए कब्र खोद ली गई  और इस्लामिक रीति-रिवाजों के मुताबिक मौलाना की मौजूदगी में नमाज-ए-जनाजा पढ़ी गई और उसे दफन कर दिया गया।
उल्लेखनीय है अफजल गुरु का मर्सी पिटीशन 3 फरवरी को खारिज हुआ।4फरवरी को गृह मंत्रालय ने मोहर लगायी और अदालत से 9फरवरी को फांसी दिए जाने का आदेश ले लिया गया। इस समूची प्रक्रिया को गोपनीय रखा गया। यहां तक कि फांसी की तिथि को उसके परिवारीजनों से भी छिपाकर रखा गया।  उल्लेखनीय है 12 साल पहले 13 दिसंबर 2001 को देश की संसद पर सफेद एंबेसडर कार में सवार होकर आए 5 आतंकियों ने हमला किया था।  इन हमलावरों को स्थानीयस्तर पर सभी किस्म की  सुविधाएं मुहैय्या कराने का काम अफजलगुरु ने किया था। वह हमला होने के 5मिनट पहले तक आतंकियों से मोबाइल के जरिए जुड़ा था और लगातार सूचनाएं दे रहा था। उसने कभी अपने किए पर पश्चाताप नहीं किया और अदालत में अपना अपराध स्वीकार किया।
अफजल गुरु को फांसी दिए जाने के साथ ही आतंकी संगठनों में एक बड़ा संदेश गया है कि भारत उसके लिए ऐशगाह नहीं है। पकडे जाने पर मौत तय है। इस फांसी का एक अर्थ यह भी है मनमोहन सरकार अपनी प्रशासनिक सक्रियता का भी दावा कर सकती है। इससे प्रकारान्तर से भाजपा को थोड़ा विचारधारात्मक धक्का लग सकता है। कसाब और अफजलगुरु को फांसी देकर कांग्रेस ने भाजपा के उन्माद पैदा करने वाले दो आईकॉन छीन लिए हैं। लेकिन इससे मुस्लिम वोटबैंक पर कोई असर नहीं होगा।
अफजलगुरु को फांसी दिए जाने पर सरकार दावा कर रही है कि उसने न्याय प्रक्रिया का पालन किया है।सरकार एक हद तक सही कह रही है।  लेकिन कई सवाल उठ रहे हैं जिनका केन्द्र सरकार को भविष्य में जबाब देना होगा। मसलन् अफजल गुरु की मर्सी पिटीशन खारिज होने के बाद सरकार ने उसकी पत्नी को खबर क्यों नहीं दी ? फांसी दिए जाने से पहले परिवारीजनों को खबर क्यों नहीं दी ? अफजल गुरू का परिवार भारत में रहता है और वे भारत के नागरिक हैं। उसके शरीर को दफनाए जाने को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं।    
शनिवार की सुबह टीवीवाले कह रहे थे अफजल की फांसी के बारे में किसी को पता नहीं था ।लेकिन यह झूठ है,संबंधित जेल अधिकारियों,गृहमंत्रालय के उच्च अधिकारियों, जम्मू-कश्मीर  राज्य सरकार को पहले बता दिया गया कि अफजल को फांसी किस दिन और किस समय दी जाएगी।
  आतंक के मामले में सरकार को सत्ता और न्याय के वर्चस्व के आधार पर देखना चाहिए।सत्ता और न्यायपालिका ने आतंक के मुकाबले अपना वर्चस्व स्थापित किया है। अफजलगुरू की फांसी के बाद एक दार्शनिक सवाल भी उठा है फांसी देने के बाद अभियुक्त के शरीर का मालिक कौन है ?  व्यक्ति का परिवार मालिक है ? या सरकार मालिक है ? क्या फांसी के बाद आतंकी के शरीर का स्वामित्व सरकार का होगा ?  
अफजल गुरू ने आतंकी गिरोह में शामिल होकर अपने को आतंकी बनाया, लेकिन उसके एक एक्शन ने उसके पूरे परिवार,नाते,रिश्तेदारों आदि का वर्तमान और भविष्य सब कुछ नष्ट कर दिया। वह आतंकी बना और उसने अपने सभी मानवाधिकार खो दिए । साथ ही प्रकारान्तर से अपने रिश्तेदारों के भी मानवाधिकार और सामाजिकता को हमेशा के लिए कलंकित कर दिया।नष्ट कर दिया। एक आतंकी स्वयं को ही नष्ट नहीं करता अपितु पूरे कुनबे के वर्तमान और भविष्य को नष्ट कर देता है।

शनिवार, 2 फ़रवरी 2013

मुक्तिबोध और फेसबुक

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लाभ-लोभ से प्रेरित समझदारी ने मौजूदा संकट पैदा किया है। इस संकट को हम राजनीति से लेकर साहित्य तक सुरसा की तरह विराटरूप में देख रहे हैं। लाभ-लोभ से प्रेरित समझदारी के आप जितने गुलाम होते जाएंगे आप उतने टुच्चे,कमीने,भ्रष्ट और ओछे होते चले जाएंगे।

-2-

भीड़ और जुलूस में शामिल होने का अर्थ है आंतरिक व्यक्तित्व का संहार। जिन लोगों ने जुलूस को महान बनाया वे सोचें कि जुलूस महान कर्म है तो भीड़ का हमला भी महानता का डंका बजाएगा।

-3-

जो फटेहाल है,सामान्य है, उसे मान्यता देने के लिए कोई हिन्दीवाला विद्वान तैयार नहीं है। वे रावण की दासता स्वीकार करने की नेक सलाह देते हैं। वे समझदारी को पागलपन कहते हैं। व्यवहारवादी को दुनियादार कहते हैं। यदि उनके गुट में है तो समझदार है, और अन्य के गुट में हैं या किसी गुट में नहीं हैं तो बेबकूफ है,घटिया है,बोगस है। इस तरह की मनोदशावाले हिन्दीवाले वस्तुतःनैतिक और दैहिक तौर पर मृतवत् हैं। उनके यहां नैतिकता का अर्थ सौदेबाजी और अवसरवादिता है।

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गधे को काका कहो। शैतान से समझौता करो। बड़ों की हाँ में हाँ मिलाओ ।यह बुर्जुर्गों ने सिखाया। सारी प्रगतिशीलता इस बीमारी से ग्रस्त है।

-5-

भ्रष्टाचार,अवसरवादिता और अनाचार वस्तुतःबुजुर्गों की देन हैं.यही बुनियादी कारण युवाओं की बुर्जुर्गों के प्रति कोई आस्था नहीं बची है।

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कोर्स के लिए गेसपेपर लेखन वेश्यावृत्ति है।

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हिंदी के शिक्षितों और खासकर लेखक-बुद्धिजीवियों की यह बीमारी है कि ये अपनों से ऐंठना और अपनों की उपेक्षा करना जानते हैं।वे अपनों को गले पड़ी चीज समझते हैं।

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इस दौर में धुन का पक्का होना जरूरी है,इसके बिना आप कुछ भी नया रच नहीं सकते और नहीं नया सोच सकते हैं। यह दौर मनुष्य को उसकी धुन से वंचित करके बोरा बनाने में लगा है। जो धुन हो वो करो।

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हिंदी की चरणस्पर्श संस्कृति की विशेषता है जब एकबार इसके चक्कर में फंसे तो फिर इससे बाहर कभी नहीं निकल सकते।

-10-

हिन्दीवाले की मनोदशा पर जयशंकर प्रसाद ने कामायनी में सही लिखा था-

' सब मत्त लालसा घूँट पिये '.

-11-

महिला के ये रूप बड़े खतरनाक हैं- डॉन,(अनुसूया,म.प्र. की शराब डॉन और संतोषी), महिला डकैत, अधिनायकवादी राजनेत्री।

-12-

हिन्दी के प्रोफेसरों ने आत्म-श्रेयवाद और प्रतिष्ठावाद के नाम पर सारे नियम तोड़े हैं और साहित्यिक भ्रष्टाचार फैलाया है। वह अपने सुख की आराधना को साहित्य का महाधर्म मानता है। बल्कि यह साहित्य का भ्रष्टाचार है।

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कोलकाता में बंगाली बच्चे सीधे चरण छूते हैं और लड़कियां खासतौर पर बड़े कायदे से सचमुच में चरणों को स्पर्श करके माथे से लगाती हैं।यह सारा खेल निस्वार्थ भाव से करती हैं। लेकिन हिन्दीवाला चरणस्पर्श नहीं करता घुटना स्पर्श करता है ,झुकता है लेकिन चरणों तक नहीं जाता। बड़ा चतुर है हिंदीवाला !!

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हिन्दी का प्रोफेसर चरण छुओ संस्कृति को निजी परिस्थितियों को सुधारने का वैध उपाय मानता है। इसे वह चारित्रिक संकट नहीं ,बल्कि समझदारी कहता है।

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सुबह फोन करके कई हिंदी प्रोफेसर गरिया चुके हैं। कह रहे हैं तुम बड़े बुरे हो । पेशे के कौशल का मखौल उड़ाते हो। मैंने कहा मैं जब पढ़ाता हूँ तब तक मास्टर हूँ ,बाद में नागरिक हूँ। मैं 24 घंटे प्रोफेसरभाव में नहीं रहता। वे बोले हम तो सारी जिंदगी प्रोफेसरभाव में रहते हैं। मैंने कहा आप धन्य हैं और महान हैं ! मैं तो सारी जिंदगी नागरिकभाव में रहना चाहता हूँ।

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हिंदी के प्रोफेसर में ज्ञान और कर्म के अनुष्ठान में विश्वास नहीं है। वह तिकड़मबाजी को कर्म और ज्ञान मानता है।

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मैं हिंदी का प्रोफेसर हूँ लेकिन चरण स्पर्श के अनुपम सुख से वंचित हूँ। मेरे पास सबकुछ है लेकिन नौकरी दिलाने का हुनर नहीं है। मित्र लोग कहते हैं नौकरी लेनी है तो जगदीश्वर के पास मत जाओ। यानी नौकरी दिलाने वाले शिक्षक अलग और पढ़ानेवाले अलग। मैंने दिल्ली में मित्रों से पूछा बोले हमारे यहां भी यह परंपरा है और मजबूत परंपरा है। जब दिल्ली-कलकत्ते में यह हाल है तो बनारस-प्रयाग-मुंबई में भी चरणस्पर्श की बयार जरूर बह रही होगी। काश! हिन्दीवाले के चरण न होते !!नौकरियां न होतीं !!

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हिन्दी शिक्षकों में चरणस्पर्श और चरणरज की महिमा अपरम्पार है। जो काम नियम,तर्क और ज्ञान से नहीं होता वह यहां चरणरज के स्पर्श से हो जाता है। चरणस्पर्श करो और मनवांछित फल पाओ।

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पुराने लोग कहते हैं गायदर्शन से पुण्य मिलता है लेकिन भैंस दर्शन होने पर क्या गाँठ का पुण्य भी चला जाता है ?

( उपरोक्त विचारों के प्रेक मुक्तिबोध हैं) 

आशीषनंदी अभिव्यक्ति की आजादी और फेसबुक

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अभिव्यक्ति की आजादी की धारणा के जन्म लेने के बाद विचारकों ने बार-बार अभिव्यक्ति की सीमाओं को तोड़ा है ,और अभिव्यक्ति के नए दायरे पैदा किए हैं। मर्यादा को मानते तो नए दायरे नहीं पैदा होते। यह काम लेखकों-विचारकों ने पुराने सोच,विचार,मान्यता ,मूल्य और न्याय व्यवस्था आदि के बारे में निर्मम विचार संग्राम चलाकर किया है।

ग्राम्शी कहते थे युद्ध में शत्रु के कमजोर हिस्सों पर हमले करो और विचारों की जंग में शत्रु के मजबूत किले पर हमला करो। आशीषनंदी ने मजबूत किले पर हमला बोला है इसीलिए इतनी बेचैनी है।

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टीवी मीडिया पर ज्ञानीजी कह रहे हैं कि अभिव्यक्ति की आजादी के लिए हमें मर्यादा की सीमा तय करनी चाहिए। ये महान ज्ञानी लोग आईबीएन-7 में बोल रहे थे।

अरे मित्रो, अभिव्यक्ति की आजादी की सीमा तय नहीं कर सकते। अभिव्यक्ति का क्षितिज किसी सीमा में नहीं बांध सकते। अभिव्यक्ति में मर्यादा की मांग अंततः अभिव्यक्ति में कटौती और नियंत्रण की मांग है। अभिव्यक्ति को यह नैतिक आधार पर देखना होगा। अभिव्यक्ति का मसला मर्यादा या सीमा का मसला नहीं है।

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भाषण में किस तरह की भाषा होगी, यह वक्ता तय करेगा। आशीषनंदी के बयान की भाषा को लेकर ज्ञानी लोग टीवी में बैठकर सवाल कर रहे हैं कि वे ऐसे नहीं ,ऐसे बोलते तो मामला ठीक रहता। ये लोग भूल रहे हैं कि भाषा पर विवाद नहीं है, विवाद आशीषनंदी के आइडिया के कारण हुआ है। आशीषनंदी अपने विचार को वापस लेने को तैयार नहीं हैं। ऐसे में पुलिस-कचहरी आदि के बहाने ये तथाकथित हाशिए की राजनीति करने वाले लोग कानूनी आतंकवाद का सहारा ले रहे हैं ।

जजों के एक वर्ग में भी कानूनी आतंकवाद की महत्ता बनी हुई है। जज कैसे तय कर सकते हैं कि किसी वक्ता को क्या कहना चाहिए।

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दलित विचारकों का एक वर्ग यह कह रहा है कि उनके विचारों को चुनौती नहीं दी जा सकती। यह धारणा लोकतंत्रविरोधी है। लोकतंत्र में सभी किस्म के विचारों और नीतियों की निंदा-आलोचना हो सकती है। लोकतंत्र विचारों का विश्वविद्यालय है। यह एकवर्ग के विचारों का संरक्षकतंत्र नहीं है।

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गजब कुतर्क दिए जा रहे हैं कुछ लोग कह रहे हैं कि आशीषनंदी ने गलत बात की है अतः उनको जेल भेजो। इस तरह के लोग मीडिया से लेकर अदालत तक भीड़तंत्र को लोकतंत्र का सिरमौर बनाने में लगे हैं। ये भीड़तंत्र के छोटे हिटलर हैं।

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भारत साहित्य समारोहों के आयोजक विलक्षण-मजेदार और रीढ़िविहीन हैं। पिछलीबार जयपुर साहित्य महोत्सव में सलमान रूसदी बुलाए गए वे नहीं आ पाए,इसबार वे भारत आए हैं, लेकिन जयपुर में बुलाए नहीं गए.कोलकाता साहित्य महोत्सव में वे बुलाए गए लेकिन ममता के आदेश केकारण शामिल नहीं हो पाए।

मजेदार बात यह कि कलकत्ता साहित्य महोत्सव के आयोजकों ने कहा कि उन्होंने सलमान रूशदी को आमंत्रित ही नहीं किया था। इसके जबाब में रूशदी ने ट्विट किया है कि उनके पास आयोजकों के कई ईमेल हैं, निमंत्रणपत्र है, और यहां तककि आयोजकों ने उनको एयरटिकट भी भेजा था। रूशदी ने कहा कि ममता बनर्जी के दबाब के कारण उनको कोलकाता आने से रोका गया है।

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सुप्रीम कोर्ट ने आशीषनंदी के विवादास्पद बयान पर दर्ज एफआईआर के आधार पर उनको गिरफ्तार करने पर 1फरवरी 2013 को रोक लगा दी ।

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पश्चिम बंगाल में असभ्यता की लहर चल रही है।वामदलों से लेकर तृणमूल कांग्रेस तक,अधिकांश दलों के नेता सार्वजनिक सभाओं में घटिया और गंदी भाषा का जमकर उपयोग कर रहे हैं। यह पश्चिम बंगाल में मध्यवर्ग की सभ्यता के ह्रास का युग है।

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