शुक्रवार, 6 मई 2016

मोदी-ईरानी निराश न हों! डिग्रियां ही डिग्रियां!


         जब देश में प्रधानमंत्री और मानव संसाधन मंत्री की डिग्रियां फेक हों तो सोचो इनके निशाने पर सबसे पहले कौन होगा ॽ जाहिरा तौर पर शिक्षा क्षेत्र होगा।विश्वविद्यालय होंगे,दिल्ली विश्वविद्यालय होगा।हमारे सीपीआईएम के शिक्षकनेता खासतौर पर सुन लें कि उनकी यह पहली जिम्मेदारी बनती थी कि वे नरेन्द्र मोदी और स्मृति ईरानी की फेक डिग्री के मामले को उठाते और इन दोनों नेताओं को बेनकाब करते।लेकिन उन्होंने यह काम नहीं किया।जबकि शिक्षक संघ में उनका नेतृत्व है। हम नहीं मानते कि इस मामले में माकपा के नेताओं ने अनजाने चूक की है,बल्कि यह माकपा के शिक्षक नेताओं में बढ़ रही अ-राजनीतिक मनोदशा का परिणाम है।सोचने वाली बात यह भी है कांग्रेस का दमदार नेतृत्व है डीयू में लेकिन उसने भी यह काम नहीं किया,क्योंकि उनको भी मोदीजी से लेन-देन की राजनीति करनी है।

आम आदमी पार्टी को इस बात का श्रेय दिया जाना चाहिए कि उसने पीएम नरेन्द्र मोदी और मानव संसाधन मंत्री स्मृति ईरानी की फेक डिग्रियों के मसले को राष्ट्रीय प्रश्न बना दिया।ताज्जुब की बात यह है कांग्रेस और माकपा दोनों ने संसद में इन दोनों नेताओं की फेक डिग्री के मसले को आजतक पुरजोर ढ़ंग से नहीं उठाया,एक भी दिन संसद ठप्प नहीं की। इस मसले की इन दोनों दलों द्वारा उपेक्षा अनजाने में नहीं हुई है।बल्कि सुनियोजित समझ का परिणाम है।

संसद में इन दोनों नेताओं पर दबाव डाला जाए कि ये दोनों नेता अपनी वैध डिग्रियां संसद के पटल पर पेश करें,जिससे उनकी वैधता की जांच करायी जा सके।लेकिन सत्ता और विपक्ष में इस मामले में नूरा कुश्ती चल रही है।पूरा विपक्ष मोदीजी और ईरानीजी को घेर सकता था लेकिन घेर नहीं रहा।क्यों नहीं घेर रहा ॽ क्यों अकेले आम आदमी पार्टी और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने यह फ्रंट संभाला हुआ है ॽ क्या विपक्ष की इस मामले में कोई जिम्मेदारी है या नहीं ॽ

ईरानीजी और मोदीजी की फेक डिग्रियों के प्रसंग में मुझे 1970 के दशक की दिल्ली की दीवारें याद आ रही हैं,उस समय इन दीवारों पर पोस्टर लगे रहते थे-हाईस्कूल फेल निराश न हों,सीधे बी.ए. करें।इसी तरह-बी.ए.फेल निराश न हों सीधे एम.ए. करें।सचदेवा इंस्टीट्यूट के इस तरह पोस्टरों से दिल्ली भरी रहती थी। इन पोस्टरों का मुख्य शीर्षक हुआ करता था,´निराश न हों´,हमें लगता यही है इन दोनों नेताओं ने इस तरह के पोस्टरों से प्रभावित होकर अपनी डिग्री की अभिलाषा को पूरा किया होगा !!

इस तरह के इंस्टीट्यूट उस जमाने में हजारों निराश युवक-युवतियों के लिए आशा की किरण बनकर सामने आए थे।लाखों निराश युवाओं के इनके जरिए घर बसे,डिग्री पाने की अभिलाषा पूरी हुई। वरना यह कैसे संभव है कि आम आदमी पार्टी चीख-चीखकर कह रही है पीएम की डिग्रियां फेक हैं लेकिन पीएम जबाव नहीं दे रहे,ईरानी जबाव नहीं दे रहीं।

आम आदमी पार्टी ने इन दोनों नेताओं की डिग्रियों के बारे में सही ढ़ंग से खोज की है और सारे तथ्य जुटाए हैं और राजनीतिक पहल करके हमला बोला है।इस समय आम आदमी पार्टी के हाथ में इन दोनों नेताओं की गर्दन है।हम भी देखें सच्चाई कब तक सामने आती है। पीएम मोदी और ईरानीजी ने लगातार विभिन्न स्तरों पर अपनी डिग्रियों को लेकर सफेद झूठ बोला है।यदि उनके दावे में जान होती तो ये दोनों नेता अपनी डिग्री को संसद के पटल पर रख देते और सारी बहस खत्म हो जाती।लेकिन पीएम की एमए डिग्री के बारे में गुजरात वि.वि. के उपकुलपति बोले जो कि स्वयं में समस्या खड़ी करके चले गए,उनके बयान में साफ था कि पीएम मोदी की एम.ए.डिग्री ऊपर के दवाब में आनन-फानन में तैयार की गयी है।वरना सभी सूचनाएं एक साथ सामने रखी जानी चाहिए।



हम मांग करते हैं पीएम मोदी और मानव संसाधन मंत्री ईरानीजी अपनी सारी डिग्रियां संसद के पटल पर रखें जिससे सच्चाई सामने आ सके।यदि इन्होंने झूठ बोला है तो इनको पद छोड़ना चाहिए।मोदी सरकार को इस्तीफा देना चाहिए।मुखिया के नाते राजनीतिक तौरपर वे जिम्मेदार हैं और झूठ बोलने के लिए उन्हें दण्डस्वरूप सरकार से इस्तीफा देना चाहिए।

सोनिया विरोधी उन्माद और आरएसएस का खेल

          आरएसएस-पीएम मोदी एंड कंपनी मिलकर कांग्रेस-सोनिया गांधी-राहुल गांधी आदि के खिलाफ सुनियोजित ढ़ंग से झूठा प्रचार अभियान चलाए हुए हैं।आरएसएस की रणनीति यह है कि नियमित सोनिया गांधी के खिलाफ समाचार,स्कैंडल आदि मीडिया से लेकर संसद तक उछाले जाएं,इस काम में वे पेशेवर प्रचारकों,साइबर प्रचारकों , मीडिया संवाददाताओं और स्तंभलेखकों की मदद ले रहे हैं।इस पूरी षडयंत्रकारी योजना का लक्ष्य है देश की बुनियादी समस्याओं सूखा,कृषि संकट,पानी संकट,स्वास्थ्य,महंगाई,शिक्षा के आदि के बुनियादी सवालों से आम जनता को विमुख करना। इस काम के लिए सरकारी धन का तो दुरूपयोग हो ही रहा है साथ ही कारपोरेट फंड भी इस काम में इस्तेमाल हो रहा है।
संघ संचालित पत्रकार-नेता-चैनल इस तरह पेश आ रहे हैं गोया वे कोई महान चीज खोजकर लाए हैं।इस समूची प्रक्रिया मे सत्य का अनुसंधान करने की मानसिकता का मीडिया से लोप हो गया है।कोई भी संघी नेता कुछ भी बोल देता है और मीडिया उसे बिना किसी छानबीन के सीधे प्रकाशित कर देता है।वहीं आम जनता में इस तरह के कु-लेखन और कु-समाचारों को अनालोचनात्मक ढ़ंग से हजम करने की प्रवृत्ति को बल मिला है,पाठकों के एक बड़े वर्ग ने विवेक,तर्क और प्रमाण के आधार पर सोचना और देखना बंद कर दिया है,अब जो मीडिया में दिख रहा है वही प्रमाण है,इस मनोदशा ने समूचे मीडिया परिदृश्य को सोनिया विरोधी कु-खबरों से भर दिया है।
दिलचस्प बात यह है कि मीडिया में सोनिया गांधी के खिलाफ कु-खबरें भरी पड़ी हैं,संघी उछल-उछलकर हंगामे कर रहे हैं लेकिन किसी भी खबर का अनुसरण करके सोनिया गांधी के खिलाफ कोई भी कार्रवाई करने से मोदी सरकार भागती रही है। इस तरह निराधार खबरों,तथ्यहीन बातों और मीडिया प्रेशर के आधार पर सोनिया गांधी विरोधी उन्माद निर्मित किया जा रहा है।इस तरह के षडयंत्रकारी लेखन और प्रचार का जमकर विरोध किया जाना चाहिए। इस तरह के प्रचार का मूल लक्ष्य है लोकतंत्र को नष्ट करना,आम जनता के मन को अफवाह और तथ्यहीन खबरों से भरकर उन्मादी भीड़ के रूप में आरएसएस की मुहिम में इस्तेमाल करना।

गुरुवार, 5 मई 2016

मेरा बचपन – दूध का कर्ज

      लेव तोलस्तोय के अनुसार जीवन के प्रत्येक चरण में कुछ निश्चित विशेषताएं होती हैं,जो केवल उस चरण में पायी जाती हैं।जैसे बचपन में भावानाओं की हार्दिकता और निष्ठा की प्रधानता रहती है;किशोरावस्था में शंका,आत्म-निष्ठा, अनुभवहीनता और गर्व का प्रभुत्व रहता है;युवावस्था में " भावनाओं की सुंदरता " की भूमिका उल्लेखनीय होती है और इसके साथ ही अहंकार और अपनी शक्ति तथा क्षमताओं में विश्वास के अभाव का भी इस अवधि में विकास होता है;कच्ची उम्र में भावनाओं का और अधिक विकास होता है-गर्व और अहंकार का स्थान आत्म-प्रतिष्ठा ले लेती है।लेकिन इसके साथ ही इस उम्र में नौजवान आदमी जीवन में अपने उद्देश्य के बारे में सोचना शुरू करता है।
बचपन में मैं कैसा था और किस मुसीबत में फंसा था उसके बारे में मेरी माँ और दादी के द्वारा बाद में बताया गया किस्सा मेरी स्मृति में है।मेरा जिस समय जन्म हुआ उस समय मेरी माँ की उम्र संभवत13-14 साल रही होगी।वह देखने में सुंदर थी और सुनियोजित ढ़ंग से काम करने में निपुण थी,वह गूंगी-बहरी थी।लेकिन एकदम निडर और साहसी थी।वह जिस परिवार में जन्मी थी वह परिवार मथुरा के चौबों में सबसे शिक्षित परिवारों में गिना जाता था।उसको इस बात का गर्व था कि वह शिक्षित परिवार में जन्मी और बड़ी हुई।उस जमाने में यह मथुरा के अभिजन परिवारों में गिना जाता था।इस परिवार की सामाजिक प्रतिष्ठा थी,मेरे ननिहाल की मथुरा में वह सामाजिक प्रतिष्ठा आज भी वैसी ही है।जिस तरह नानाजी और उनके परिवार को समाज में प्रतिष्ठा मिली,वह सिलसिला आज भी जारी है।मां को यह भी संतोष था कि उसकी जिस व्यक्ति से शादी हुई है वह पढ़ा लिखा है,संस्कृत पढ़ता है और पंडित है।इस चीज ने माँ के मन को विलक्षण गर्व से भर दिया था और वह अपने को कभी गूंगी-बहरी होने के कारण कभी कुंठा में नहीं रही।मैंने अपनी माँ को कभी अवसाद में नहीं देखा।तमाम किस्म की परेशानियां,कष्ट, बीमारियां,आर्थिक अभाव परिवार में आए लेकिन माँ की जीवन्तता देखने लायक होती थी।दुख में हँसने की कला मैंने उससे ही सीखी,जो आज भी मेरी सबसे बड़ी संपत्ति है। मैं पढ़ पाया इसमें मेरे माता-पिता की बड़ी भूमिका है लेकिन इनमें भी मेरी दादी और माँ की निर्णायक भूमिका रही।मेरी दादी गजब की दुस्साहसी,सुंदर और बेहद करीने से जीने वाली महिला थी।मथुरा जैसे शहर में वह अपने घर की मुखिया थी और उसने अकेले अपने बल पर पूरे परिवार को पाल पोसकर पैरों पर खड़ा किया था।सुबह उठने और अपना काम करने की आदत मुझे विरासत में दादी से मिली।मैं दादी का राजदार था,वह सुबह मंदिर में चढोत्तरी में आने वाले पैसे गिनवाती थी, उसके लिए वह मुझे आए दिन सुबह 3-4बजे के बीच जगा देती थी।घर में कहने को अनेक लोग थे भरा-पूरा संयुक्त परिवार था,लेकिन दादी का विश्वास मेरे ऊपर ही था।मैं सुबह उठकर मंदिर में आने वाले पैसे गिनता,जाड़ों में सन्नाटे के समय दादी के साथ 4बजे करीब मंदिर जाता और फिर लौटकर घर में आकर पैसे गिनता।दादी की अलमारी को देखने का एकमात्र सौभाग्य मुझे मिला था।दादी ने कभी अपने बेटों-बहुओं और नातियों को अपनी अलमारी में झाँकने तक नहीं दिया,जबकि मुझे वह अलमारी की चाभी तक दे देती थी। दादी अनपढ़ थी,चीजें ज्यादा याद नहीं रख पाती थी,12बच्चों को जन्म दिया ,इनमें 11लड़के थे और एक लड़की थी इनमें से 9बच्चे मर गए और तीन बचे,ये थे मेरे पिता,ताऊ और बुआ। दादी की चर्चा विस्तार से कभी बाद में करूंगा,लेकिन एक वाकया बताना बेहद जरूरी है। मेरे जन्म के कुछ महिने बाद ही किसी बात पर मेरे माता-पिता में कहा-सुनी हो गयी.माँ मुझे गुस्से में दादी के पास फेंककर नानी के यहां चली गयी और लौटकर नहीं आई।दादी के सामने गंभीर समस्या थी कि मुझे भूख लगेगी तो दूध कैसे पिलाया जाए,दादी बाजार का दूध पिलाने के पक्ष में नहीं थी।मेरे जन्म के साथ ही मेरी बुआ के बेटी पैदा हुई थी, दादी ने तुरंत उसकी मदद ली और मुझे समय पर बुआ का दूध मिलने लगा।बुआ जब अपने घर चली जाती तो उस समय मैं भूखा न रहूँ इसके लिए दादी ने पड़ोस में रह रहे एक चतुर्वेदी परिवार की महिला से मदद ली क्योंकि उसके भी एक लड़का मेरे जन्म के आसपास हुआ था,इस तरह दादी ने बड़े कौशल के साथ दो औरतों का दूध पिलाने के लिए जुगाड़ कर लिया और मेरा बचपन चैन से गुजरने लगा,इस बीच में मेरे पिता को दादी ने समझ-बुझाकर माँ से माफी मांगने के लिए नानीघर भेजा और फिर वापस माँ लोटकर घर आई।लेकिन इस दौरान संयोगवश मैं तीन माताओं के दूध का ऋणी हो गया,मेरी बुआ और वह पडोसन मुझको जब भी देखते तो खुशी से गद्गद हो जातीं और गर्व से कहतीं कि तुमको हमने दूध पिलाकर बड़ा किया है,मैं जब भी मौका मिलता इन दोनों से जमकर खूब बातें करता था,क्योंकि ये दोनों मुझे बहुत प्यार करती थीं।मेरी मां सारी जिन्दगी इन दोनों के एहसान को मानती रही और बार-बार कहती कि ये दोनों न होतीं तो तुम बिना दूध के मर जाते।

फेसबुक वॉल को तो कम से कम खुला रहने दो कॉमरेड !

यार इतनी कंजूसी क्यों करते हो,फेसबुक पर क्लिक करने में कंजूसी करोगे तो फिर तुम कभी अभिव्यक्ति के मामले में उदार नहीं बन सकते।ठीक है हम तुम्हारे दल में नहीं हैं,लेकिन पहले तो थे,यह भी सही है कि हम तुम पर भी लिखते हैं,तुम्हारे दल पर भी लिखते हैं,तुमनेे बेइंतहा तकलीफें दी हैं,हमारे खिलाफ तुम्हारे दल के लोगों ने जहरीला प्रचार किया,इसके बावजूद हमने तुमसे हलो बंद नहीं की,तुमसे प्यार करना बंद नहीं किया।तुम इस कदर कमीनापन क्यों करते हो जिससे तुम्हारे दल को क्षति पहुँचे,कमीनेपन का मतलब कम्युनिस्ट होना नहीं है।कृतघ्न व्यक्ति कभी कम्युनिस्ट आंदोलन का भला नहीं कर सकता।तुम यह तो बताओ तुमने कृतघ्नता कहां से सीखी,कम से कम हमने नहीं सिखाया तुमको।कुछ क्षण रूककर सोचो कि कम्युनिस्टों को कैसे उदार बनाएं,किस तरह उनमें कृतज्ञताबोध पैदा करें।उसकी पहली सीढ़ी है कि तुम फेसबुक पर रहते हो तो प्रगतिशीलों के फेसबुक पोस्ट को लाइक करना सीखो, हमेशा दलीय गिरोह में कैद मत रखो अपने को, यह दौर दलीय गिरोहबंदी का नहीं है।यही सब नरक फैलाना है तो फेसबुक एकाउंट बंद करके शांति से बैठो।

फेसबुक पर सक्रिय कम्युनिस्टों से अनुरोध है कि अपनी वॉल को कम्युनिस्ट वॉल न बनाएं,वरना कोई नहीं पढ़ेगा।खुलकर लिखो,कम्युनिस्ट और गैर-कम्युनिस्ट विषयों पर लिखो।सिर्फ पार्टी का प्रचार करने के लिए यदि फेसबुक पर आते हो तो बहुत ही सीमित लक्ष्य लेकर जी रहे हो,उसके लिए फेसबुक पर आने की जरूरत नहीं है,हर समय तुम पार्टी के मेम्बर नहीं हो,यह कैसा मनुष्य बनाया है जो पार्टी के बिना न हंसता है,न बोलता है।

जेएनयूएसयू संघर्ष करो हम तुम्हारे साथ हैं



English version of APPEAL by JNU alumnus to Honourable President of India and JNU visitor- to save JNU and lives of fasting JNU students , including JNUSU President Kanhaiya Kumar - follows shortly.

Hindi version of the appeal prepared by former JNUSU President Jagadishwar Chaturvedi is given here afresh after deleting the earlier post to avoid any confusion .

Group members requested to endorse it at the earliest and not later than 4 pm ( IST) on Saturday , May 7 , 2016 when JNU alumnus in or around Delhi and even beyond are to assemble @ Freedom Square, JNU Admin block to express solidarity with the agitating students and persuade them to end their fast and deploy other tactics , including legal ones .


APPEAL IN HINDI

मान्यवर,
हम जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र आपसे अनुरोध करते हैं कि विश्वविद्यालय प्रांगण में चल रहे छात्रों के आंदोलन में हस्तक्षेप करके कैंपस में शांति बहाल करने में मदद करें।उल्लेखनीय है कैंपस में छात्रसंघ के बैनरतले अनेक छात्र और छात्रसंघ पदाथिकारी विगत आठ दिनों से आमरण अनशन पर बैठे हैं।इन सभी छात्रों की शारीरिक अवस्था चिंताजनक है।छात्रों की मांग है कि 9फरवरी2016 की घटना के संदर्भ में विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा गठित उच्चस्तरीय जांच समिति की रिपोर्ट के आधार पर की गयी अनुशासनात्मक कार्रवाई को तुरंत रद्द किया जाय।यह जांच कमेटी जब गठित की गयी थी तब ही छात्रों ने इसके निर्माण पर अनेक आपत्तियां प्रकट की थीं,इन आपत्तियों को प्रशासन ने एकसिरे से अस्वीकार किया और इकतरफा जांच कमेटी का गठन करके उस घटना की जांचकी।उल्लेखनीय है कि जेएनयू शिक्षक संघ ने भी जांच समिति को अस्वीकार किया था।वहीं दूसरी ओर छात्रों के खिलाफ पुलिस कार्रवाई भी गयी।जिससे संबंधित मुकदमा अदालत में विचाराधीन है।हम विनम्रतापूर्वक कहना चाहते हैं कि 9फरवरी2016 की घटना में न तो हिस्सा लिया और न इसे आयोजित किया था।जेएनयूछात्रसंघ का इस घटना से कोई लेना-देना नहीं है। जिन छात्रों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की गयी है वह राजनीति से प्रेरित है।अतःहम मांग करते हैं कि जेएनयू प्रशासन तुरंत छात्रों के खिलाफ की गयी अनुशासनात्मक कार्रवाई को वापस ले और कैंपस में शांति बहाल करे।( चन्द्रप्रकाश झा की वॉल से साभा

जेएनयू में आमरण अनशन खत्म करो

जेएनयू में चल रहे छात्र आंदोलन के समर्थन में आज पूर्व छात्रनेता और छात्र जेएनयू में एकत्रित हो रहे हैं। मैं अपनी निजी परेशानियों के कारण इस मौक़े पर शामिल नहीं हो पा रहा हूँ, लेकिन मेरा इस आंदोलन को पूरा समर्थन है।
जेएनयू में संघर्ष और क़ुर्बानियों की शानदार परंपरा रही है, मौजूदा छात्रसंघ नेतृत्व ने इस परंपरा को बरक़रार रखा है। यह हम सबके लिए गर्व की चीज़ है।
आज आठवें दिन जब भूख हड़ताल चल रही है तो कन्हैया और दूसरे छात्रों की हालत लगातार बिगड़ रही है।हम सबके लिए इन आंदोलनकारी छात्रों की ज़िंदगी बेहद महत्वपूर्ण है, हमारे लिए जेएनयू की संघर्षशील परंपरा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। हमें यह चीज़ समझनी चाहिए कि यह मसला जल्द हल होने वाला नहीं है,इसलिए छात्रों की ज़िंदगी, स्वास्थ्य, कैरियर और संघर्ष में संतुलन बनाते हुए संघर्ष के रूपों का चयन करना होगा।इसके लिए ज़रूरी है कि हम दीर्घकालीन संघर्ष की रणनीति बनाएँ। इसके पहले कदम के तौर पर अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल को तुरंत ख़त्म किया जाए और संघर्ष के नए विकल्पों का इस्तेमाल करेँ।भूख हड़ताल को ख़त्म करने का मतलब संघर्ष से भागना नहीं है।हमने पहले भी भूख हड़तालें की हैं और उनको बीच में छोड़ा भी है। हमारे लिए छात्रों का न्यूनतम नुक़सान करके संघर्ष जारी रखना महत्वपूर्ण है। हम चाहते हैं कि यह भूख हड़ताल तुरंत ख़त्म की जाए और भूख हड़तालियों को तुरंत मेडीकल मदद प्रदान की जाए। हमें भूख हड़ताल को संघर्ष का अंतिम अस्त्र मानने की मनोदशा से बाहर निकलना होगा।

मंगलवार, 3 मई 2016

अनपढ़ ईरानी की शैतानियों के प्रतिवाद में


             मोदी सरकार में मंत्री स्मृति ईरानी ने भगतसिंह आदि क्रांतिकारियों को ´आतंकवादी´कहने के लिए विपन चन्द्रा आदि की किताब पर पाबंदी लगा दी,कमाल है,ईरानीजी आप शिक्षामंत्री हैं लेकिन आपको नहीं मालूम कि चन्द्रशेखर आजाद अपने को क्या कहते थे! पंडित जवाहरलाल नेहरू ने जब पहलीबार चन्द्रशेखर आजाद से मुलाकात की थी तो उसका वर्णन उन्होंने अपनी आत्मकथा में किया है,कम से कम उसी को आपने पढ़ लिया होता तो भगतसिंह संबंधी आतंकवादी-क्रांतिकारी ´गुत्थी सुलझ गयी होती,लेकिन अब तो ईरानीजी ने भगतसिंह को आतंकवादी लिखने के कारण विपन चन्द्रा आदि इतिहासकारों की किताब पर ही पाबंदी लगा दी है,तो अगला कदम उन किताबों की ओर बढ़ना चाहिए,जिनमें इन क्रांतिकारियों को आतंकवादी लिखा गया है ! ताकत है तो उन सभी किताबों पर पाबंदी जारी करके दिखाओ जिनमें आतंकवादी के रूप में क्रांतिकारियों का जिक्र है !

पंडित जवाहरलाल नेहरू की आत्मकथा ´मेरी कहानी´ को ही लेते हैं। याद कीजिए जब लाला लाजपतराय पर अंग्रेजों की लाठियां पड़ी थीं और उसके कुछ दिन बाद उनकी मृत्यु हो गयी ।ईरानीजी जानती हैं किसी हिन्दुत्ववादी का इस घटना पर खून नहीं खोला,दिलचस्प बात यह है कि लालाजी पर पड़ी लाठियों से भगतसिंह आदि क्रांतिकारियों का खून खोला ।जबकि उनके लालाजी से विचार नहीं मिलते थे।ईरानीजी आप कल्पना कीजिए कि किसी हिन्दुत्ववादी का उस समय खून क्यों नहीं खौला ॽभगतसिंह औप उनके साथियो ने लालाजी पर हमला करने वाले अंग्रेज शासन से बदला लेने का फैसला किया और उसके कारण भगतसिंह और उनके साथियों को सारे देश में बड़ी प्रसिद्धि मिली।इस वाकया का पंडित नेहरू ने बहुत सुंदर ढ़ंग से वर्णन किया है।

नेहरू ने लिखा है ´साइमन-कमीशन हिन्दुस्तान में दौरा कर रहा था और काले झंडे लिए ´गो बैक´के नारे लगानेवाली विरोधी भीड़ हर जगह उसका स्वागत कर रही थी।कभी-कभी भीड़ और पुलिस में मामूली झगड़ा भी हो जाता था।लाहौर में बात बहुत बढ़ गई और यकायक देश-भर में गुस्से की लहर दौड़ गई। लाहौर में जो साइमन-विरोधी प्रदर्शन हुआ वह लालालाजपत राय के नेतृत्व में हुआ।जब वह सड़क के किनारे हजारों प्रदर्शनकारियों के आगे खड़े हुए थे तब एक नौजवान अंग्रेज पुलिस अफसर ने उनपर हमला किया और उनकी छाती पर डंडे बरसाए.लालाजी का तो कहना ही क्या ,भीड़ की तरफ से किसी किस्म का झगड़ा खड़ा करने की कोई कोशिश नहीं हुई थी।.....लेकिन फिरभी जिस ढ़ंग से उन पर हमला किया गया,उससे और उस हमले के बहशियाने ढ़ंग से हिन्दुस्तान के करोड़ों लोगों को धक्का लगा।उन दिनों हम पुलिस द्वारा लाठियों के मार खाने के आदी न थे।´ लालाजी की कुछ दिन बाद इस लाठीचार्ज से लगी चोटों के कारण मौत हो गई और सारे देश में गुस्से की लहर दौड़ गई।

पंडित नेहरू ने भगतसिंह आदि द्वारा इस घटना के प्रतिवाद में की गई कार्रवाई की प्रशंसा की और जो लिखा उसका तो महत्व है ही,साथ ही उनको ´आतंकवादी´कहकर सम्बोधित किया है। ईरानीजी हिम्मत है तो नेहरू की आत्मकथा पर पाबंदी लगाकर दिखाओ,हम भी देखते हैं संसद कितने दिन चलती है और आप कितने दिन ऑफिस जाती हैं !

नेहरू ने जो लिखा उसे ईरानीजी आप पढ़ें,संदर्भ है लालाजी पर पड़ी लाठियां और उसका भगतसिंह आदि के द्वारा किया गया प्रतिवाद,इस प्रतिवाद ने भगतसिंह को जनप्रिय बनाया, नेहरू ने लिखा ´इससे पहले भगतसिंह को जो लोकप्रियता मिली वह कोई हिंसात्मक या आतंकवाद का काम करने की वजह से नहीं मिली , आतंकवादी तो हिन्दुस्तान में करीब- करीब तीस बरस से रह-रहकर अपना काम कर रहे हैं, और बंगाल में आतंकवाद के शुरू के दिनों को छोड़कर और कभी किसी भी आतंकवादी को,भगतसिंह को जो लोकप्रियता हासिल हुई,उसका सौवां हिस्सा भी नहीं मिली।यह एक ऐसी जाहिर बात है,जिससे इन्कार नहीं कर सकता।इसे तो मानना पड़ेगा।´

ईरानीजी इसी क्रम में पंडित नेहरू ने बड़े मार्के की बात कही है जो आपको समझनी चाहिए। लिखा है ´मामूली तौर पर आतंकवाद से किसी देश में होने वाली क्रान्तिकारी प्रेरणा का बचपन जाहिर होता है।वह अवस्था गुजर जाती है और उसके साथ-साथ महत्वपूर्ण घटना के रूप में आतंकवाद भी गुजर जाता है; स्थानिक कारणों या व्यक्तिगत दमन के कारण कभी-कभी कुछ आतंकवादी कार्य भले ही होते रहें। बिलाशक हिन्दुस्तान की क्रान्ति का बचपन बीत चुका और इसमें कुछ शक नहीं कि उसके फलस्वरूप यहां कभी-कभी हो जानेवाली आतंकवादी घटनाएं भी धीरे-धीरे बन्द हो जाएंगी। ´

नेहरू ने साफ लिखा आतंकवाद आज तो ´महज एक तात्विक विवाद का सवाल है।´ ईरानीजी आप यह भी जान लें ,नेहरू ने लिखा है ´भगतसिंह ने अपने हिंसात्मक कार्य से लोकप्रियता प्राप्त नहीं की, बल्कि इससे प्राप्त की कि कम-से-कम उस समय लोगों को ऐसा मालूम हुआ कि उसने लालाजी की और लालाजी के रूप में राष्ट्र की इज्जत रखी है।भगतसिंह एक प्रतीक बन गया।उसके काम को लोग भूल गए,केवल प्रतीक उनके मन में रह गया।´

ईरानीजी आप बहुत ही ड्रामेबाज मंत्री हैं।आपने अपने जीवन में कभी कोई राजनीतिक आंदोलन नहीं किया,कभी गंभीर किताबें नहीं पढ़ी,इसलिए किताब और जनसंघर्ष का मतलब आपको नहीं आता। क्रांतिकारियों में ये दोनों गुण होते हैं ,वे पढ़ते भी हैं और जनता के हितों के लिए लड़ते भी हैं।आपने कभी गौर किया कि भारत में कभी किसी शिक्षा मंत्री ने क्रांतिकारियों को सम्बोधित किसी भी किताब पर कभी कोई पाबंदी नहीं लगायी ,ऐसा क्यों हुआ ॽक्या आप सबसे बड़ी अक्लमंद हैं ॽया फिर आपके आरएसएस के सलाहकार सबसे बड़े अक्लमंद हैं ॽ कभी गंभीरता से सोचना आपसे पहले कभी किसी आरएसएस-जनसंघ के नेता ने क्रांतिकारियों को ´आतंकवादी क्रांतिकारी´ लिखने पर पाबंदी लगाने की न तो मांग की और न मंत्री होते हुए इस तरह की किताबों पर पाबंदी लगायी।सोचकर देखें ईरानीजी आप क्या श्यामाप्रसाद मुखर्जी,दीनदयाल उपाध्याय,अटलबिहारी बाजपेयी,मुरली मनोहर जोशी आदि से ज्यादा अक्लमंद हैं ॽ सवाल यह है इन नेताओं को, क्रांतिकारियों को ´आतंकवादी क्रांतिकारी´कहने वाली किताबों से कभी कोई परेशानी नहीं हुई,लेकिन आपको परेशानी हुई और आपने ताबड़तोड़ ढ़ंगसे तुरंत पाबंदी का आदेश जारी कर दिया।

ईरानी जी आप नहीं जानतीं कि आपने अपने जीवन का सबसे घटिया काम किया है। एक सही किताब पर पाबंदी लगाना सबसे घटिया काम है,मैं इसे देशद्रोह से भी खराब हरकत मानता हूँ। दुख इस बात का है आपने भारत के सभी कानूनों को ताक पर रखकर यह काम किया है।किसी भी किताब पर पाबंदी लगाने से पहले उसके लेखक-प्रकाशक से नोटिस देकर पूछा जाता है कि आपने ऐसा क्यों लिखा ॽयदि आप उनके उत्तर से संतुष्ट नहीं होतीं तो फिर देखतीं कि जो वैध किताब है,उस पर पाबंदी लगाने का आपको हक है या नहीं।विपन चन्द्रा की किताब वैध किताब है।आप उस पर दिल्ली विश्वविद्यालय में पाबंदी नहीं लगा सकतीं।यदि वह किताब अवैध है तो सारे देश में पाबंदी लगाकर दिखाएं और फिर देखें कि आपको कानून का कितना करारा तमाचा खाना पडेगा।आपने कानून के तमाचे से बचने के लिए मंत्री पद का दुरूपयोग किया है और दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्रों को एक बेहतरीन किताब को वैध रूप में पढ़ने से वंचित किया है।

ईरानीजी आप पढ़ती नहीं हैं और आपके अनुयायी आरएसएस के लोग भी नहीं पढ़ते, आपका प्रचार करने वाले टीवी चैनलवाले भी पढ़ते नहीं हैं।इतने अनपढ़ यदि एक साथ मिल जाएं तो हमारे जैसे लोगों के लिए मुसीबतें तो आएंगी।लेकिन बुद्धिजीवी का काम तो यही है कि वह अनपढों के द्वारा पैदा की गयी मुसीबतों से देश को छुटकारा दिलाए,देश को पढ़ाए,सत्य,तथ्य और ज्ञान का अनुभव कराए।



विशिष्ट पोस्ट

मेरा बचपन- माँ के दुख और हम

         माँ के सुख से ज्यादा मूल्यवान हैं माँ के दुख।मैंने अपनी आँखों से उन दुखों को देखा है,दुखों में उसे तिल-तिलकर गलते हुए देखा है।वे क...