रविवार, 26 जून 2016

मोदी का भयाक्रांत लोकतंत्र

                मोदी के सत्तारूढ होने के बाद "लोकतंत्र" का "भयाक्रांत लोकतंत्र " में रूपान्तरण करने की कोशिशें हो रही हैं।इस खतरे को गंभीरता से लेने की जरूरत है।मोदीजी चाहते हैं लोकतंत्र,लेकिन साथ में यह भी चाहते हैं कि लोग भयभीत होकर रहें।हमें "भयाक्रांत लोकतंत्र" के समूचे तानेबाने को तोड़ना होगा और "वास्तव लोकतंत्र" स्थापित करने की दिशा में बढ़ना होगा।

सच यह है दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल अकेले इस पहलू की ओर विभिन्न बयानों के जरिए ध्यान खींच रहे हैं लेकिन विपक्ष उसे गंभीरता से नहीं ले रहा है।"भयाक्रांत लोकतंत्र " बहुत ही भयानक अवस्था है इसकी परिकल्पना संविधान में भी नहीं है,यह फासीवाद की हरकतों और लक्षणों से भिन्न है।

मोदीजी का "भयाक्रांत लोकतंत्र" वस्तुतःसत्ता को दलीय आधार पर देखता है। सत्ता को दल के आधार पर देखना,संसद में बहुमत के आधार पर देखना,उसके आधार पर सत्ता , संसाधनों और नीतियों का डंडे के बल पर अमल कराना मुख्य विशेषता है।आम जनता के आधार पर सत्ता को न देखना,इसकी मुख्य विशेषता है। जबकि सत्ता का आधार है आम जनता,लेकिन मोदीजी के सत्ता में आने के बाद से सत्ता का समूचा खेल बदल गया है। वे रीयल लोकतंत्र के मानकों,मूल्यों और मान्यताओं पर निरंतर हमले कर रहे हैं। वे आम जनता के जीवन में मच रही तबाही की अनदेखी कर रहे हैं और बार बार अपनी निजी उपलब्धियां गिना रहे हैं,मीडिया का व्यापक तौर पर इसके लिए इस्तेमाल कर रहे हैं।मीडिया में वे खबरें एकसिरे से नदारत हैं जो आम जनता के कष्टों से जुड़ी हों।सारा मीडिया "भयाक्रांत लोकतंत्र " की चपेट में है।वे कोई भी मसला उठाते हैं तो उन्मादी ढ़ंग से उठाते हैं।मसलन् ,देश योग करे यह भी उन्मादी ढ़ंग से संप्रेषित करते हैं।

लोकतंत्र में उन्माद कैंसर है।"भयाक्रांत लोकतंत्र" का उन्मादी प्रचार सबसे प्रभावशाली हथियार है।मोदीजी के राष्ट्रीय क्षितिज पर आने के बाद कोई भी नीति सामान्य रूप में लागू नहीं हुई है।वहीं दूसरी ओर आम जनता के पहले से अर्जित हकों,कार्यक्रमों आदि पर सुनियोजित हमले हो रहे हैं और उनको बंद किया जा रहा है। "भयाक्रांत लोकतंत्र" का मुख्य लक्ष्य हैं गरीब,आदिवासी,किसान और शिक्षित समाज,अपने अब तक के नीतिगत आदेशों के जरिए इन वर्गों को आतंकित करने में वे व्यस्त हैं।



मोदीजी के "भयाक्रांत लोकतंत्र" की राजनीति व्यक्तिकेन्द्रित है।मोदीजी ने पंडित नेहरू ,सोनिया आदि व्यक्तियों के खिलाफ घृणा प्रचार करते हुए अपना राजनीतिक स्पेस बनाया और समूचे प्रचार और सत्ता तंत्र को मोदीकेन्द्रित बनाकर रख दिया है।इस मॉडल में पक्ष-विपक्ष और प्रचार में व्यक्ति ही मुख्य है।मसलन्,पटेल मुख्य हैं,उनकी राजनीति गौण है।यह निकृष्ट किस्म का व्यक्तिवाद है जो व्यक्ति को उसकी राजनीति से अलग रखकर देखता है।यह नेताकेन्द्रित राजनीति का सबसे घटिया मॉडल है।इस मॉडल में नेता ही महान है और नेता ही अधम है।भयाक्रांत लोकतंत्र अपने लिए जन समर्थन जुटाने के लिए आमतौर पर अविवेकवादी औजारों का प्रयोग करता है।



मंगलवार, 21 जून 2016

योग - संयोग और शासन

मैं योग दिवस के पक्ष में हूँ !!मैं बाबा रामदेव आदि के भी पक्ष में हूँ! क्योंकि इन लोगों ने योग को मासकल्चर का अंग बना दिया, कल तक योग ,कल्चर का अंग था। मैं बाबा रामदेव और मोदीजी से बहुत ख़ुश हूँ कि उन्होंने योग को ग्लोबल ब्राण्ड बना दिया। पूँजीवादी विरेचन का हिस्सा बना दिया।

योग करने के कई फ़ायदे हैं जिनको योगीजन टीवी पर बता रहे हैं।लेकिन सबसे बडा फ़ायदा है कि वह अब सरकारी फ़ैशन, सरकारी जनसंपर्क और सरकारी जुगाड़ का अंग बन गया है। योग आसन था लेकिन अब योग शासन है।पहले योग स्वैच्छिक था कल अनिवार्य होगा!केन्द्र सरकार से लेकर तमाम देशी -विदेशी सरकारों तक योग अब शासन का अंग है ,यूएनओ कोई जनसंगठन नहीं है वह सत्ताओं का संगठन है। योग को ११७ देशों का समर्थन है योग अब आसन नहीं शासन की क्रिया है!

माकपावालो बंगाल लाइन भ्रष्ट लाइन

       माकपा का संकट कम होने का नाम नहीं ले रहा।समूची पोलिट ब्यूरो और केन्द्रीय कमेटी भ्रष्ट बंगाल माकपा यूनिट को बचाने में लगी है।जिस बंगाल लाइन को लेकर हंगामा मचा है उसके लिए मेनीपुलेशन और इस्तेमाल का आधार तो विगत सीसी और पीबी ने ही तैयार किया था।संध्याभाषा में बंगाल में मोर्चा बनाने का जो आह्वान किया गया उसके ही गर्भ से बंगाल लाइन निकली है।मीडिया की मानें तो इसके निर्माता हैं बुद्धदेव भट्टाचार्य,सूर्यकांत मिश्रा,गौतमदेव,मोहम्मद सलीम।इन चार नेताओं ने गंभीरता के साथ बंगाल लाइन को लागू किया,इसके अलावा इसे लागू करने में पश्चिम बंगाल के सभी पोलिट ब्यूरो और केन्द्रीय समिति सदस्य अग्रणी भूमिका निभाते रहे हैं। कम्युनिस्ट पार्टी के इतिहास में यह विरल घटना है कि पार्टी ने किसी दल के साथ समझौता किया या मोर्चा बनाया या सीटों पर समझौता किया लेकिन उसके बारे में पोलिट ब्यूरो,केन्द्रीय कमेटी और राज्य कमेटी किसी ने भी आधिकारिक तौर पर कोई लिखित बयान जारी नहीं किया,हमने इस संदर्भ में फेसबुक पर लिखा भी था। लिखिततौर पर बयान जारी न करके दलीय समझौता करके चुनाव लड़ना स्वयं में अनैतिक ,नीतिहीन और भ्रष्ट आचरण है।

सवाल यह है बंगाल लाइन आई कहां से और क्यों आई ॽ बंगाल लाइन का स्रोत है पार्टी का भ्रष्टतंत्र।मैंने करीब से इस भ्रष्टतंत्र को देखा है ।माकपा में भ्रष्ट दलतंत्र का जन्म ज्योति बाबू के शासनकाल में ही हुआ।इसकी उस जमाने में विनयकृष्ण चौधुरी और नृपेन चक्रवर्ती जैसे धाकड़ नेताओं ने जमकर आलोचना की,अफसोस की बात है कि उनकी आलोचना की ओर किसी ने द्यान नहीं दिया और पार्टी ने सामूहिकतौर पर अनुशासनभंग करने के नाम पर इन दोनों नेताओं को आम जनता में अपमानित किया और अनुशासनात्मक कार्रवाई की गयी।

34साल तक शासन के बाद माकपा में यह भावना और आदत गहरे जड़ जमा चुकी है कि वे तो सरकार के लिए बने हैं और उनको हर हालत में सरकार में ही होना चाहिए। यहां तक कि पार्टी मेम्बरों में भी यही भावना बनी कि वे सरकार के लिए बने हैं।यही वह प्रस्थान बिंदु है जहां से माकपा मेम्बरों का चरित्र गठन हुआ।संयोग से ममता ने 2011 में वाम मोर्चे को हराकर विधानसभा कब्जे में कर ली,यह स्थिति माकपा के सदस्य झेलने को तैयार नहीं थे,देखते ही देखते रातों-रात बगैर किसी विवाद के हजारों माकपा सदस्यों और हमदर्दों ने ममता का दामन धाम लिया,ममता का दामन थामने का यह सिलसिला अभी भी जारी है।इसका प्रधान कारण है माकपा का विचारधाराहीन पार्टी में रूपान्तरण,34साल के शासन के दौरान माकपा ने सचेत रूप से कम्युनिस्ट विचारधारा का त्याग किया और सत्ता की विचारधारा को अपने सदस्यों में प्रचारित किया,इसके कारण माकपा एक कम्युनिस्ट दल की बजाय सत्ताधारी दल के रूप में परिवर्तित हो गयी,यह स्थिति लगातार बद-बदतर अवस्था की ओर ले गयी।माकपा यह भूल गयी कि वह कम्युनिस्ट दल है,संघर्ष के लिए बनी पार्टी है,उसने सचेत रूप से सत्ता के संस्थान के रूप में यहां पर अपना विकास किया और यही वह बृहत्तर प्रक्रिया है जिसने माकपा को नीतिहीन दल के रूप में परिणत करके रख दिया।नंदीग्राम आंदोलन के समय और उसके पहले भी मैंने निजी तौर पर इस पहलू पर बहुत लिखा था जिसके कारण मेरी तीखी आलोचना हुई और माकपाईयों ने मेरा बड़े पैमाने पर अपमान किया,सामाजिक बहिष्कार किया और सारी प्रशासनिक मशीनरी का दुरूपयोग मेरे खिलाफ किया।



मैं निजी तौर पर मार्क्सवाद को पसंद करता हूं जिसके कारण मुझे वाम अच्छा लगता है लेकिन इसका कतई मतलब नहीं है कि मैं माकपा के बारे में अपनी दो-टूक राय व्यक्त न करूँ,मैंने जबभी उचित समझा जमकर माकपा की खुली आलोचना की और उसकी कीमत भी दी,दुखद बात यह है कि माकपा जैसे सुंदर दल को लीडरशिप ने सचेत रूप से नष्ट किया है।आज स्थिति यह है कि बंगाल में माकपा की कोई साख नहीं है।ममता के महान भ्रष्टाचार,हिंसाचार आदि के बावजूद आम जनता माकपा पर विश्वास नहीं करती।कायदे से बंगाल लाइन के नाम पर जो घोटाला हुआ है उसके लिए पश्चिम बंगाल की पूरी पार्टी को भंग किया जाना चाहिए और निचले स्तर से लेकर राज्य स्तर तक नए सिरे से पार्टी का निर्माण किया जाना चाहिए।

रविवार, 19 जून 2016

न्याय की गुलामी

         विचारों की दरिद्रता कहें या फिर गुलामी कहें न्यायपालिका की प्रशंसा करते थकते नहीं हैं,सच यह है न्याय प्रक्रिया एकदम भ्रष्ट और उत्पीड़नकारी है,इ सके बावजूद न्यायपालिका की प्रशंसा बढती ही जा रही है।यही है हमारे समाज का संकट ।वह सच को देखने,और सच बोलने से डरता है।
हम सब जानते हैं अदालतों में हर ईंट घूस खाती है लेकिन कभी. कोई पकडा नहीं गया।वकील बेहिसाब पैसे लेते हैं लेकिन कोई नियमन नहीं है।अदने से अहलकार से लेकर पेशकार तक सब पैसे लेते हैं,बिना पैसे लिए कोई काम नहीं करता,इसके बावजूद कभी कोई बोलता नहीं है,सिस्टम चलाने वालों से लेकर जजों तक सबको मालूम है कि पेमेंट की दर क्या है,जब न्यायपालिका भ्रष्ट होगी तो देश भी भ्रष्ट होगा,न्याय दुर्लभ होगा।न्याय कभी समय पर नहीं होगा।जिस देश में न्याय समय पर न हो,जल्दी फैसले न हों तो उस देश का अपराधीकरण तो होगा ही।

पेशेवर लोगों में कभी वकील और जजों को भी आलोचनात्मक नजरिए से देख लिया करो।वकील और जज के पेशे में दिन प्रतिदिन स्वस्थ मूल्यों की गिरावट आई है,जगह जगह राजनीतिक गिरोह बनाकर वकील काम कर रहे हैं। हर दल का वकीलों में नेटवर्क है।जब वकील नेटवर्क का अंत बनेंगे तो न्यायपालिका अपाहिज होगी।इसी तरह संवैधानिक मूल्य,मान्यताएं सबसे ज्यादा दैनंदिन आचरण से नष्ट होते हैं,इस मामले में भी अधिकांश वकीलों का आचरण ईमानदारी भरा नहीं है।इसमें सबसे करप्ट रूप है वकील की फीस का पेमेंट।इसका कोई मानक नहीं है,अकल्पनीय मनमानी है इस मामले में।


दूसरी ओर जजों के फैसले असभ्यों के तर्कों या फासिस्ट मीडिया के तर्कों के सहारे जब लिखे जाने लगे हैं। न्याय को सभ्यता का अंग होना चाहिए लेकिन कई न्यायाधीशों पर इन दिनों पापुलिज्म का दबाव बहुत है।हाल में कई इस तरह के फैसले आए हैं जिनमें भारत के फासिस्टों और नरसंहार करने वालों के तर्कों को आधार बनाकर जजमेंट आए हैं।इस तरह के लक्षणों को गुजरात से लेकर जेएनयू तक के मामलों में आए अनेक फैसलों में देखे जा सकते हैं।

मुफ़्तख़ोर आतंकी जुनून

          श्रीनगर के पुराने शहर यानी डाउनटाउन इलाक़े में आज भी विलक्षण पुराने क़िस्म की रमणीयता नज़र आती है। छोटी गलियाँ, छोटे पुराने घर,सामान्य और सरल क़िस्म के लोग, पुराने क़िस्म की दुकानें, पुरानी तहज़ीब इसके समूचे परिवेश में फैली हुई है।एक ख़ास क़िस्म की अनौपचारिकता और मधुरभाव यहाँ की तहज़ीब में सहज ही महसूस कर सकते हो।
पुराने शहर का बाज़ार जब बंद हो जाता है तब गलियों का सौंदर्य नज़र आता है। लेकिन जब बाज़ार खुला होता है तो लोगों से भरा, माल से भरा लगता है। मैं जब फ़ोटो खींच रहा था तो एक बुज़ुर्ग ने कहा हमारी ग़ुरबत यानी ग़रीबी को मत दिखाना। यह वह इलाक़ा है जिसने १९८९ के बाद तक़रीबन २० साल तक चैन नहीं देखा। कब और किस तरह इस शांत इलाक़े में अशांति चली आई यह अपने आपमें सबसे जटिल सवाल है। लोग अभी भी चुप हैं और सही उत्तर खोज रहे हैं।
यहाँ के लोग आज भी वह सुबह याद करते हैं तो भय से काँपने लगते हैं। पुराने शहर का कोई घर नहीं होगा जिसमें पुलिस-बीएसएफ़ या सेना कभी घुसी न हो, कोई घर नहीं है जिसकी अंदर की साँकल -कुंडी -चटखनी लात मार -मारकर सैन्यबलों ने तोड़ी न हो,एक समय तो लोगों ने अंदर से घर बंद करना ही बंद कर दिया । त्रासद पहलू यह था कि इस इलाक़े में एक तरफ़ पाकिस्तान की ओर से अबाध हथियार और पैसा आ रहा था तो दूसरी ओर से भारतीय सेना नव्य आतंकियों से जूझ रही थी। मैं नव्य आतंकी इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि ये वे नौजवान थे जो आरंभ में जानते तक नहीं थे कि वे क्या करने जा रहे हैं। एक वाक़या है जिसे समझकर आप स्थिति का अंदाज़ा लगा सकते हैं।
एक दिन अचानक पुराने शहर में सुबह पाँच बजे क़रीब अत्याधुनिक हथियारों से भरा एक ट्रक मुहल्ले के बीच में आकर खड़ा हो गया और उसमें सवार चंद नौजवानों ने आसपास के लोगों से कहा कि जिसे जो हथियार चाहिए वह मुफ़्त में घर ले जाएँ। देखते ही देखते चारों ओर से युवाओं की भीड़ आई और हर घर में बंदूक़ , पिस्तौल, एके ४७ आदि पहुँच गए। देखते ही देखते पुराने शहर में सड़कों और पार्क में युवाओंमें अपने अपने हथियार चमकाने दिखाने की होड़ लग गयी और यही वह प्रस्थान बिंदु है जहाँ से पुराने शहर के अधिकांश युवा अनजाने पाक से भेजे हथियारों की गिरफ़्त में आ गए। जो युवा मुफ़्त हथियार घर ले आए वे जानते ही नहीं थे कि जो मुसीबत वे अपने घर लेकर आए हैं वह उनको किस नर्क तक ले जाएगी। चंद दिनों में ही युवाओं को पुराने शहर में अत्याधुनिक हथियारों से सड़कों पर हवाई फ़ायर करते देखा गया इस समूचे उपक्रम में कब किसने युवाओं के मन में भारत से मुक्त होकर अलग कश्मीर बनाने की बात बिठा दी इसे कोई नहीं जानता।
जिन युवाओं ने मुफ़्त हथियार लिए वे न तो राजनीति जानते थे और नहीं हथियार चलाना जानते थे, वे सब शहरी युवा थे,मुफ़्त के हथियारों के पीछे सक्रिय राजनीति से एकदम अनभिज्ञ थे। आज उन युवाओं में से सैंकड़ों परिपक्व हो गए हैं। वे पिछले दो दशक की पीड़ाओं को आज तक भूल नहीं पाए हैं। वे आज भी आज़ादी का मतलब समझ नहीं पाए हैं। उनके लिए "भारत से आज़ादी का "नारा चंद दिग्रभ्रमित युवाओं द्वारा पाकजनित जुनून में दिया गया नारा था। वे जिस समय मुफ़्त में हथियार लाए तो सतह पर यह मुफ़्त का माल लग रहा था और उसने सामान्य युवा के लोभी मन को अपनी ओर खींच लिया, लेकिन यह विवेक और राजनीति नज़रिए के आधार पर लिया गया फ़ैसला नहीं था।यह बात पुराने शहर का हर शहरी मानता है।

शुक्रवार, 17 जून 2016

आलोचना की समस्याएँ -



हिन्दी में रचनाएँ हैं, रचनाकार भी हैं।लेकिन कोई बहस नहीं है।एक ज़माना था हमारे पास नामवर सिंह ,रामविलास शर्मा थे, लेकिन आज आलोचक नहीं है। आज के लेखक के पास जीवन के व्यापक अनुभव हैं और उन पर वह जमकर लिख रहा है।वह अपनी अनुभूतियों से इस तरह चिपका हुआ है कि वह निजी अनुभूतियों के परे कुछ भी देख नहीं पा रहा। इस पूरे परिदृश्य में यह सवाल उठा है कि क्या साहित्य के लिए अनुभूतियों का होना ही ज़रूरी है ? क्या दुख या उत्पीड़न के अनुभवों के आधार पर ही महान रचना बन सकती ? ग़ौर से सोचें नामवरजी ने भी दुख देखा है, ग़रीबी भी देखी है, लेकिन क्या ग़रीबी और दुख की अनुभूति या उसे देखने मात्र से बेहतरीन साहित्य रचा जा सकता है ? कहने का आशय यह कि लिखने के लिए अनुभूति के अलावा भी चीज़ें चाहिए। अनुभूतियों अलावा सबसे बड़ी चीज़ है विचारधारा , लेकिन लेखक के पास जब तक एक सुसंगत वैचारिक दृष्टि न हो वह चीज़ों को देख ही नहीं सकता।दूसरी चीज़ चाहिए अकादमिक अनुशासन।अनुभूति, वैचारिकदष्टि और अकादमिक अनुशासन इन तीनों चीज़ों के सहमेल से साहित्य का सर्जनात्मक फलक बनता है।
अभी जितने बडे पैमाने पर लेखन आ रहा है वैसा लेखन प्रवाह पहले कभी नहीं देखा गया, इस प्रवाह में बहुत कुछ "लेखन के लिए लेखन"की तर्ज़ पर लिखा हुआ है।

आलोचना के अनुपलब्ध क्षेत्र-

भारत में चार बडे पैराडाइम शिफ़्ट हुए हैं, पहला है लोकतंत्र का उदय,दूसरा,भारत विभाजन,तीसरा है आपातकाल और चौथा है इंटरनेट -डिजिटल क्रांति । सवाल यह है कि हिन्दी साहित्य और आलोचना इन चारों पैराडाइम को कैसे अभिव्यंजित करती है ।
पहले हिंसा थी इन दिनों डिजिटल हिंसा है।पहले कम्युनिकेशन था आज नेट कम्युनिकेशन है।अहिंसा का व्यापक चित्रण है लेकिन मानवतावाद ग़ायब है। पहले अभिव्यक्ति थी अब कोलाहल है।अब चुप रहनेवालों की निंदा ख़ूब होती है। पहले किताब आती थी अब किताब का इवेंट्स होता है। किताब पर बातें कम और इवेंट्स पर बातें ज़्यादा होती हैं।इन दिनों हिंसा पर टीवी या नेट पर आलोचना ज़्यादा दिखती है नीचे ज़मीनी स्तर पर आलोचना नज़र नहीं आती।यह एक तरह से हाइपर वायरलेंस है।उसी तरह स्त्री भी हाइपर सैक्सुअलिटी में रूपान्तरित हो गयी है। अब हम स्त्री के नहीं हाइपर स्त्री के रूपों और विमर्शों में उलझे हैं।फलत: रीयल औरत और रीयल हिंसा को लेकर यथार्थजीवन में चुप्पी साधे हैं। इसी तरह आजाद भारत में दंगे कभी आलोचना का मूल विषय नहीं बन पाए।साम्प्रदायिकता के वैचारिक स्वरूप पर तो लिखा गया लेकिन दंगा पीड़ितों पर कुछ भी नहीं लिखा गया।दंगाई संगठनों की सांगठनिक और वैचारिक सारणियों को हमने कभी खोला तक नहीं। भारत विभाजन हमारे समाज का सबसे भयानक पहलू है लेकिन आलोचना उस पर चुप है, यह चुप्पी क्यों? इस सवाल को बहसयोग्य क्यों नहीं माना गया ? इससे भी भयानक पहलू है दोनों विश्वयुद्ध का समीक्षा से ग़ायब रहना, अकाल का मुख्य एजेंडा न बन पाना ।

यथार्थहीन समीक्षा -

सवाल यह है क्या अकाल, दो विश्वयुद्ध और भारत विभाजन के बिना आधुनिककाल और आधुनिक समीक्षा पर बातें करना संभव है। आलोचना का काम है अनुपब्ध को उपलब्ध कराना। लेकिन अधिकतर मामलों में आलोचना उपलब्ध को ही उपलब्ध कराती रही है। युद्ध और भारत विभाजन ने अमानवीकरण के सवालों को केन्द्र में लाकर खड़ा कर दिया लेकिन हमने अमानवीकरण पर बातें ही नहीं कीं।साहित्य और मानवीयता के अंतस्संबंधपर विचार करने की बजाय अन्य मसलों पर बहस करते रहे।अत:इसे "यथार्थहीन समीक्षा" कहना समीचीन होगा। "यथार्थहीन समीक्षा" वह है जिसमें समसामयिक सामाजिक जीवन नदारत है। यह जीवंत यथार्थ से संवाद नहीं करती।यह ऐसी आलोचना है जो पब्लिक ओपिनियन नहीं बनाती ।यह लोकतांत्रिक संस्थानों की समस्याओं को नहीं उठाती।
हिन्दी आलोचकों ने स्थिर यथार्थ पर ख़ूब लिखा है, लेकिन रूपान्तरित यथार्थ पर कम लिखा है।रूपान्तरित यथार्थ के सवालों का वर्तमान से संबंध है जबकि स्थिर यथार्थ का अतीत से संबंध है।टीवी इमेजों से प्रभावित आक्रामकता का अभिव्यक्ति के रूपों के साथ गहरा संबंध है।टीवी से प्रभावित समीक्षा और इमेज स्वभक्षक है।यह लेखक और आलोचक के स्थान को छीन रही है।
मज़ेदार बात है कि साहित्य और समीक्षा की किताबें आ रही हैं, तरह तरह के विषयोंपर प्रस्तुतियाँ आ रही हैं, लेखकों के जमघट लग रहे हैं , साहित्यमेले हो रहे हैं लेकिन हार्दिकता और संवेदनाएँ ग़ायब हैं। साहित्य की इस तरह की हृदयहीन प्रस्तुतियाँ ने व्यापक फलक को घेर लिया है।आज आलोचना और साहित्य की यह सबसे बड़ी चुनौती है कि वह वर्तमान के ज्वलंत सवालों पर बोले। वह उन विषयों पर समर्पण न करे जो मीडिया या सत्ता निर्मित हैं या फिर तात्कालिकता के दबाव में हैं। वह सवालों से भी बचे जो कुछ क्षण बाद ख़त्म हो जाते हैं। आलोचना और कला में रीयल सवाल ग़ायब हुए हैं उसके दो बडे कारण हैं, पहला, भूमण्डलीकरण और दूसरा है तकनीकी-वैज्ञानिक प्रौपेगैण्डा ।इन दोनों ने मिलकर एक ऐसे समाज का निर्माण किया है जो वास्तविकता से नहीं मिलता।इन दोनों के कारण यथार्थ की बजाय निर्मित यथार्थ सामने आया , मनुष्य ग़ायब हो गया है।

यहाँ उदाहरण के लिए निर्मल वर्मा के लिखे आलोचना निबंधों को लें, जब यह भाषण दिया गया तो देश को आजाद हुए ५० साल हो गए थे। उस मौक़े पर उन्होंने विषय चुना " मेरे लिए भारतीय होने का अर्थ " सतह पर देखने पर यह विषय सुंदर है लेकिन , निर्मल वर्मा के यहाँ भारत और भारतीयता की धारणा स्थिर और सामयिक सच से कोसों दूर है, " भारतीय" और " भारतीयता " या किसी भी अवधारणा का सामयिकता और प्रक्रियाओं से संबंध होता है ? यदि हाँ तो निर्मल वर्मा ने इस ओर ध्यान क्यों नहीं दिया ? भारतीयता या देशप्रेम या राष्ट्र राज्य आदि की धारणाएँ प्रक्रिया में ही समझी जा सकती हैं ।
(जामिया मिलिया में आज रिफ्रेशर कोर्स में दिए व्याख्यान का अंश)


शुक्रवार, 3 जून 2016

लिबरल कश्मीर से गुज़रते हुए



कश्मीर के बारे में जब भी बातें होती हैं तो मीडिया निर्मित मिथ हमेशा दिमाग़ में छाए रहते हैं। अपनी कश्मीर यात्रा के दौरान जिस कश्मीर को क़रीब से देखा है वह मीडिया निर्मित धारणाओं से एकदम मेल नहीं खाता।यह भी कह सकते हैं कश्मीर अपनी नई पहचान बना रहा है। मसलन्, कश्मीर के विभिन्न जिलोंके  इलाक़ों और मुहल्लों आदि में घूमते हुए , आम लोगों से बातें करते हुए यह एहसास पैदा हुआ कि हम कश्मीर के बारे में जो कुछ जानते हैं वह इकतरफ़ा और स्टीरियोटाइप है, इस स्टीरियोटाइप समझ को बनाने में मीडिया की बहुत बड़ी भूमिका रही है।
       इस प्रसंग में पहली धारणा मुसलमान की है। कश्मीर के मुसलमानों को कठमुल्ला और पृथकतावादी के रूप में जमकर चित्रित किया गया है जो कि एक सिरे से ग़लत है। हमने गलियों और मुहल्लों से लेकर श्रीनगर के हलचल भरे इलाक़ों में घूमकर देखा और पाया कि अधिकतर मुसलमान दिखने में वैसे नहीं हैं जैसी इमेज हमारे ज़ेहन में मीडिया ने बनायी है। ज़्यादातर कश्मीरी युवा मुसलमान फ़ैशन की ओर बढ़ रहे हैं। वे फ़ैशनेबल बालों को रखते हैं।बढ़ी हुई दाढी और टिपिकल मुस्लिम ड्रेस अब गुज़रे ज़माने की चीज़ हो गयी है,बहुत कम लोग हैं जो दाढी रखते हैं या पठान ड्रेस पहनते हैं।अधिकतर मुसलमान पैंट शर्ट , टी शर्ट आदि पश्चिमी कपड़े पहनते हैं। यह वह ड्रेस है जो आम हिन्दुस्तानी पहनता है।
यही हाल औरतों का है,अधिकांश औरतें बुर्क़ा नहीं पहनतीं। बहुत कम संख्या में मुस्लिम लड़कियाँ बुर्क़ा पहनती हैं। हाँ औरतें चुन्नी से सिर ज़रूर ढकती हैं।मजेदार बात यह है कि मुस्लिम लड़कियों में कपड़ों के फ़ैशन दिखाने का चलन बढ़ रहा है, ख़ासकर उन औरतों में यह चलन ज़्यादा है जो बुर्क़ा पहनती हैं।बुर्क़ा पहनने वाली मुस्लिम औरतें कीव पहनती हैं जिसमें काले कीव से सिर्फ़ मुँह ढका रहता है लेकिन बाक़ी शरीर के वस्रों के फ़ैशन को सभी देख सकते हैं।
      कश्मीर में विभिन्न इलाक़ों में मुस्लिम लड़कियों में प्रेम विवाह करने का रूझान बढ़ा है। श्रीनगर- पहलगाम-गुलबर्ग में मोटर साइकिल में प्रेमी युगलों को सहज ही देखा जा सकता है।देर रात गए रेस्टोरेंट में खाना खाते मुसलिम युवक- युवतियों को देखा जा सकता है। यह वह मुसलमान है जो लिबरल है। जिसकी दिलचस्पी अस्मिता की राजनीति में नहीं है बल्कि उसकी रूचि इच्छाओं में है। पहचान की राजनीति से निकलकर कश्मीरी मुसलमान इच्छाओं की राजनीति करने लगा है।उपभोग करना और शांति से रहना उसकी स्वाभाविक प्रकृति है।वह हर तरह के झगड़ों से दूर इच्छाओं और आकांक्षाओं के सवालों पर बातें कर रहा है।यह बुनियादी तौर पर लिबरल मुसलमान है और यही  आज के कश्मीर का सच है।

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मेरा बचपन- माँ के दुख और हम

         माँ के सुख से ज्यादा मूल्यवान हैं माँ के दुख।मैंने अपनी आँखों से उन दुखों को देखा है,दुखों में उसे तिल-तिलकर गलते हुए देखा है।वे क...