बुधवार, 21 जनवरी 2015

टीवी डिबेट:लोकतंत्र में टीवी संपन्न और सूचना विपन्न



राजनीति के लिए टीवी युग कलियुग है। जो टीवी में गया वह वहीं का होकर रह गया। टीवी में दाखिल होना जितना मुश्किल है उससे जान बचाकर निकलना उससे भी ज्यादा मुश्किल है। सामान्य दर्शक ,टीवी ज्ञान का भूखा होता है। यह वह दर्शक है जो ज्ञान और सूचना से वंचित है और टीवी के जरिए अपने दिमाग़ के स्तर को "ऊँचा "उठाना चाहता है। समाचार टीवी चैनल यह भ्रम पैदा करते हैं कि वे सूचना संपन्न बनाते हैं ,टीवी दर्शक सूचना संपन्न नागरिक है, वे सच के रखवाले हैं! 
    भारत में टीवी ने लोकतंत्र को ताक़तवर बनाया है लेकिन लोकतांत्रिक मनुष्य को न्यूज़ कंगाल बनाया है। टीवी के टॉकशो हों या धर्म शो हों या इवेंट शो हों वे मन को संतोष देने का , तुरंता प्रचार का काम करते हैं। टीवी शो वस्तुत: "सेल-सेल"की रणनीति की साझा परिणति है। आमतौर पर नेतागण टीवी का इमेज निर्माण के लिए इस्तेमाल करते हैं लेकिन टीवी टॉकशो इमेज नहीं बनाते बल्कि इमेज बिगाड़ते हैं, यही वजह है टीवी टॉकशो में दलीय प्रतिनिधि के तौर पर वे नेता या प्रवक्ता बैठे रहते हैं जिनका कोई जनाधार नहीं है, मसलन् जिनकी संगठन में फ़ोटो से ज्यादा हैसियत नहीं है। ये लोग बुनियादी तौर पर दलीय डमी नेता हैं। जो पिटते और पीटते हैं। लेकिन इनकी वास्तविक हैसियत " सेल- सेल" के बैनर से जैसी होती है।  टीवी बहसों में आमतौर पर रीयल दलीयनेता ग़ायब रहता है। क्योंकि वह रीयल है और वह यदि टॉक शो में पिट गया तो बस जनता के हाथों उसके धुने जाने का भी चांस है।
              कल से टीवी पर बहस हो रही है केजरीवाल और किरनबेदी एक ही मंच पर आएँ बहस करें, कांग्रेस के अजय माकन भी साथ में आने को तैयार हैं। क्या इस तरह की बहस लोकतंत्र के लिए शुभ होगी ?रेटिंग और राजनीतिक गर्मी पैदा करने के लिहाज़ से ऐसी बहस उपयोगी होती है। इसकी मुश्किल यही है कि इसमें वक़्ता का अहंकार बहुत जल्दी नष्ट होता है। इस तरह का कम्युनिकेशन  अशिक्षितों की तुलना में शिक्षित मध्यवर्ग को जल्दी अपील करता है। दुविधाग्रस्त और तटस्थ शिक्षित मतदाताओं को इस तरह की बहस तेज़ी से नेता विशेष के प्रति आकृष्ट करने में सफल रहती है। 
      दिलचस्प बात यह है कि टीवी पर बहस हो रही है लेकिन रीयल मसलों पर नहीं । रीयल मसलों पर बहस करने में न तो टीवीएंकर की और न नेताओं की दिलचस्पी है। बहस में गैर- जरुरी सवाल वर्चस्व बनाए हुए हैं। मसलन् ,भाजपा में बग़ावत, किरनबेदी को क्यों लाया गया, केजरीवाल ने बनिया क्यों कहा?,इसे टिकट मिला और उसका टिकट कटा, इस नेता ने दल बदला, वह नेता छोड़कर गया, इसका रोड शो या उसका रोड शो। यह सच है कि इस तरह की ख़बरों का समाचार मूल्य है लेकिन चुनाव के असली मुद्दों पर भी तो  बातें हों ! 
     मसलन् , दिल्ली में विगत एक साल में क़ानून - व्यवस्था के हालात क्या थे ? , कितने कारख़ाने खुले या बंद हुए ? कितने नए रोज़गारों का जन्म हुआ ? बिजली उत्पादन और सप्लाई में सुधार आया कि गिरावट आई ?दिल्ली के विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में कितनी नई नियुक्तियाँ हुईं और दाख़िले में कितनी नई सीटें बढी ? दिल्ली में सड़कों की दशा क्या है और कितनी नई सड़कें बनीं ? नए स्वास्थ्य केन्द्र, स्कूल, कॉलेज कितने खुले ? प्रत्येक क्षेत्र के विधायक के विधायक फंड  की क्या स्थिति है ? कहाँ और किन क्षेत्रों में विधायक निधि से धन खर्च किया गया ?महंगाई की अवस्था क्या ? दिल्ली पुलिस में नई भर्तियाँ कितनी हुईं ? दिल्ली के पर्यावरण में गिरावट आई या सुधार हुआ ? बिजली और पानी का बिल तो बहस में है लेकिन विगत एक साल की तथ्यपूर्ण सूचनाएँ और आंकडे कहाँ हैं? उन पर बहस होनी चाहिए। दिल्ली की अदालतों की दशा पर बहस हो, उनके इंफ़्रास्ट्रक्चर की समस्याओं पर बहस हो तब ही दिल्ली का असली चेहरा सामने आएगा। 
           दिल्ली राजधानी है और सारे बडे चैनलों का गढ़ है लेकिन दिल्ली की जनता सबसे ज्यादा सूचना विपन्न है। यह स्थिति कैसे बदले इस दिशा में कौन से कदम जरुरी हैं ? क्या मीडिया घरानों की पेडन्यूज और राजनीतिक विज्ञापनों को लेकर कोई नीति  है? 
      हम दिल्ली में रहते हैं , नेताओं और मीडिया से घिरे रहते हैं, सचेतनता के विभ्रम में रहते हैं लेकिन न्यूनतम सत्य भी नहीं जानते ऐसे मे हम सोचें हम सूचना विपन्न क्यों हैं ? सूचना विपन्नता टीवी सम्पन्नता से दूर नहीं होगी, सूचना संपन्न हम तब बनेंगे जब परंपरागत कम्युनिकेशन पुख़्ता बनाएँगे। परंपरागत कम्युनिकेशन बंद करके हम कभी भी सूचना संपन्न नहीं बन सकते। हम सोचें कि कैसे बिना विज्ञापन के आम लोग लाखों की संख्या में किसी तिथि विशेष पर गंगा स्नान करने चले जाते हैं? करोड़ों लोग कुंभ में चले जाते हैं! लेकिन मतदान केन्द्रों तक हम इतने व्यापक प्रचार के बावजूद कुंभ मेले जैसी लामबंदी नहीं कर पाते ! 
कहने का आशय यह है कि परंपरागत कम्युनिकेशन जितना ज्यादा होगा लोकतंत्र उतना ही सूचना संपन्न होगा। अमेरिका में देखें वहाँ मीडिया कम्युनिकेशन ख़ूब है, राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार टीवी बहसें करते हैं लेकिन आम जनता में आधी आबादी वोट डालने तक नहीं जाती । आमलोगों को विभिन्न मसलों पर कोई जानकारी नहीं होती। समग्रता मे देखें तो पाएँगे कि मीडिया कम्युनिकेशन तब ही प्रभावशाली होता है जब परंपरागत कम्युनिकेशन पुख़्ता हो। परंपरागत कम्युनिकेशन के अभाव में मीडिया कम्युनिकेशन प्रभावहीन होता है। 

सोमवार, 19 जनवरी 2015

माकपा बुद्धिजीवियों का संकट


   
       माकपा के साथ जुड़े बुद्धिजीवियों की सार्वजनिक मीडिया में निष्क्रियता हम सबके गले नहीं उतर रही है। आज माकपा जिस तरह हाशिए से बाहर चली गयी है उसे लेकर सार्वजनिक तौर पर ये बुद्धिजीवी चुप क्यों हैं ? सामाजिक- राजनीतिक सवालों पर इनका हस्तक्षेप कहीं नजर क्यों नहीं आता ? आज स्थिति यह है कि हम सबके बीच में फेसबुक, वेबसाइट, ब्लॉगिंग से लेकर टीवी जैसे ताक़तवर माध्यम हैं । इसके अलावा दैनिक समाचारपत्र और पत्रिकाएँ भी हैं। लेकिन कहीं पर भी माकपा के बुद्धिजीवी सक्रिय नहीं हैं। एक जमाना था उनकी व्यापक हिस्सेदारी होती थी लेकिन विगत दस सालों में उनकी सार्वजनिक कम्युनिकेशन में हिस्सेदारी घटी है। इस गिरावट के कारणों की पहचान करने की ज़रुरत है । यह सच है कि माकपा के पास बेहतरीन नज़रिए वाले बुद्धिजीवियों का बड़ा हिस्सा है लेकिन इन दिनों वे सब शांत हैं। इनके शांत रहने से लोकतंत्र और वाम ताक़तों को नुक़सान पहुँचा है। 
     माकपा बुद्धिजीवियों में बहुत कम लोग हैं जो मीडिया - सोशलमीडिया में सक्रिय हैं। इनकी निष्क्रियता का बड़ा कारण है नए यथार्थ को सही गति के साथ पकड़ने में असमर्थता। नया यथार्थ परंपरागत कम्युनिस्ट कम्युनिकेशन के उपकरणों से कम्युनिकेट करने नहीं देता। वह संप्रेषण का संकट पैदा करता है। नया यथार्थ नए क़िस्म के मीडियम में कम्युनिकेशन और नए क़िस्म के कम्युनिकेशन संस्कारों की माँग करता है। माकपा बुद्धिजीवियों के अ-कम्युनिकेशन की बुनियादी जड़ यही है । इन बुद्धिजीवियों का पुराना संस्कार और आदतें इस क़दर दिमाग़ को कैद किए हुए है कि नया सच देखकर भी ये लोग अनदेखा करते हैं। नया सच है लिबरल बनो , लिबरल लिखो और लिबरल मीडियम में रचो-बसो। 
      संचारक्रांति पूर्व की अवस्था में माकपा बुद्धिजीवी सक्रिय था और प्रभावशाली था क्योंकि उसके परंपरागत गैर-लिबरल सोच के लिए मीडिया के ढाँचे में जगह थी लेकिन संचार क्रांति के नए कम्युनिकेशन ढाँचे में वह एकदम मिसफ़िट है। संचार क्रांति का नया ढाँचा कम्युनिकेशन के नए संस्कार और एटीट्यूट की माँग करता है। स्थिति यह है कि पहले पार्टी संगठन की अनेक बातें छिपाकर काम करना संभव था लेकिन अब यह संभव नहीं है। नंदीग्राम - सिंगूर की घटना ने पुराने कम्युनिकेशन तंत्र और उसके प्रयोग करनेवाले नेताओं को पूरी तरह उघाड़कर रख दिया। माकपा की पश्चिम बंगाल में स्थानीय स्तर पर चल रही अ-लोकतांत्रिक हरकतों को राष्ट्रीय क्षितिज पर एक ही झटके में ले जाकर रख दिया , पूरा केन्द्रीय नेतृत्व सिर्फ देखता और राज्य पार्टी नेतृत्व की आम जनता के हाथों जमकर धुलाई हुई, पार्टी पर भयानक हमले हुए और हज़ारों कामरेडों को जानोमाल से हाथ धोना पडा लेकिन इस तबाही के खिलाफ माकपा के बुद्धिजीवी आम जनता में अपना नजरिया रखने में असफल रहे, यहाँ तक कि जनवादी लेखक संघ में सक्रिय माकपा सदस्यों ने इस दिशा में कोई ठोस मीडिया लेखन नहीं किया , सिर्फ इलाहाबाद में जलेसं के राष्ट्रीय सम्मेलन में खाना पूर्ति के तौर पर प्रस्ताव पारित कर दिया गया।पश्चिम बंगाल की स्थिति पर नयापथ से लेकर जनसत्ता तक, फेसबुक से लेकर माकपा संचालित वेबसाइट तक माकपा बौद्धिकों की आवाज कहीं पर भी नजर नहीं आ रही। 
          माकपा बौद्धिकों की सबसे चुनौती है तयशुदा दायरे में सोचना, तयशुदा मित्रों में बोलना- लिखना,यानी वे लोग तयशुदा मार्ग के बाहर निकलकर खुले मंचों पर बहस ही नहीं करते। वे डरते हैं कहीं समस्या न हो जाए। माकपा के हमदर्द के नाते हमारी यह अपील है कि माकपा के बौद्धिकजन पार्टी के बंद दायरे के बाहर निकलकर सामाजिक- राजनीतिक सवालों पर खुलकर बहस करें और लिबरल आचरण करें। 
     भारत जैसे देश में मार्क्सवादी क़तारों को लोकतांत्रिक शिरकत और उदारतावाद के आधार पर ही व्यापक रुप से पुख़्ता बनाया जा सकता है। उदारतावाद का मार्ग अपनाने से पार्टीलाइन समृद्ध होगी। अनेक मसले हैं जिन पर पार्टी नहीं सोचती लेकिन माकपा के बौद्धिकजन तो सोच सकते हैं। मसलन् , पार्टी की अभिव्यक्ति की आज़ादी के सवाल पर दुविधाएँ हो सकती हैं लेकिन लेखक- बुद्धिजीवियों को दुविधाओं के परे निकलकर बोलना चाहिए। हमारे अनेक हिन्दी लेखक हैं जिनका नाम है,वे फेसबुक में भी हैं ,लेकिन पेरिस हिंसाचार पर वे लिखने से भागते रहे हैं। मैं नाम नहीं लिखना चाहता, क्योंकि यह समस्या व्यक्तियों की नहीं है बल्कि उस पूरी मनोदशा की है जिसमें माकपा बौद्धिकजन कैद हैं। माकपा बौद्धिकजन जितनी जल्दी पुरानी कम्युनिकेशन मानसिकता से बाहर निकल आएँगे देश के लिए यह उतना ही लाभप्रद होगा। 
                 मार्क्सवादी बौद्धिकजन चुप क्यों हैं इसका दूसरा बड़ा कारण है उनकी सार्वजनिक माध्यमों के प्रति अछूतदृष्टि। मसलन्, फेसबुक को वे समय की बर्बादी , लंपटता, और तर्कशास्त्र का अंत मानते हैं। इंटरनेट और सोशलमीडिया के बारे में डरे- सहमे से आते हैं और देखकर चले जाते हैं। हम माकपा के मित्रों से कहना चाहते हैं सोशलमीडिया देखने की नहीं कम्युनिकेट करने की जगह है। विचरण या निगरानी या जासूसी का नहीं वैचारिक खेल का खुला मंच है। यहाँ आप अपने विचारों की प्रस्तुति में वह कौशल पैदा करें जिससे वह अन्य का दिल जीत सके। कुछ नहीं तो अन्य को आप अपने विचारों को पढ़ने केलिए प्रेरित करने का भाषिक कौशल पैदा करें। 
       माकपा बुद्धिजीवी अब तक बंद माध्यमों और इकतरफ़ा कम्युनिकेशन में जीते रहे हैं, अपनी कहते रहे हैं। संचार क्रांति ने इकतरफ़ा कम्युनिकेशन और उपदेशपरक कम्युनिकेशन को हमेशा के लिए ख़त्म कर दिया है। यही वजह है कि माकपा बौद्धिकजन इनदिनों अलगाव और अनजानेपन को सोशलमीडिया में महसूस करते हैं। उनकी फेसबुक वॉल पर कोई कम्युनिकेशन नहीं होता, वे अपनी कहते हैं या शेयर करते हैं, वे कहीं बहस नहीं करते और न अपनी वॉल पर कोई बहस चलाते हैं। इस तरह की स्थिति उनको और भी अप्रासंगिक बना रही है।
    सोशलमीडिया वस्तुत: सार्वजनिक बहुआयामी कम्युनिकेशन है। यहाँ वही सफल है जो लिबरल है और अन्य के विचारों को शेयर करने के लिए जिसके पास जगह है। माकपा के बौद्धिकजन अब तक अन्य के ऊपर अपने विचार थोपते रहे हैं, लेकिन सोशलमीडिया में जो विचार थोपता है उसको कोई नहीं पढ़ता।अन्य को पढ़ो और पढ़ाओ । वे तो परिचित में रमण करते रहते थे और अपने विचारों को अपने अनुकूल विचारों के लोगों में ही रखकर विचारों की जंग लड़ते थे लेकिन अब अपरिचितों में कम्युनिकेट करने की चुनौती है और यह ज्यादा मुश्किल काम है। अपरिचित का दिल मार्क्सवाद से नहीं उदारतावादी कम्युनिकेशन के जरिए ही जीता जा सकता है। बेहतर है माकपा बौद्धिकजन मान जाएँ और अपने को बदल लें। वरना जल्द ही लेखन की मौत पर प्रस्ताव लिखना पड़ेगा ! 
                

रविवार, 18 जनवरी 2015

दिल्ली विधानसभा चुनावः तीन दिशाएं क्रेजी,लेजी और भोगी

               
      दिल्ली के विधानसभा चुनाव में आम जनता के सामने तीन रास्ते हैं क्रेजी (आम आदमी पार्टी),लेजी(कांग्रेस) और भोगी (भाजपा) । अरविंद केजरीवाल ने आम जनता को क्रेजी बनाया है यही उसका लोकतंत्र में सबसे बड़ा योगदान है। वह इस अर्थ में मूल्यवान है कि उसने ईमानदारी को फिर से मूल्यवान बनाया है। आमलोग ईमानदार की इज्जत करने लगे हैं,जबकि केजरीवाल के राजनीति में आने के पहले ईमानदारी को राजनीति में सबसे बोगस प्रवृत्ति के रुप में देखा जाता था। कांग्रेस की नीतियों का यह सबसे बुरा साइड इफेक्ट था। लोकतंत्र में ईमानदार नेता की आवाज हो,जनता उस पर विश्वास करे और आम जनता में ईमानदारी के प्रति कुर्बानी का जज्बा हो,यह प्रवृत्ति नए सिरे पैदा करने में केजरीवाल ने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है।

केजरीवाल की पहचान अराजकतावादी के रुप में नहीं एक ईमानदार नेता के रुप में होनी चाहिए। उसने ईमानदारी को आम जनता का नए सिरे से मूल्य और आदत बनाने का काम किया, ईमानदारी उसकी सबसे बड़ी ताकत है।केजरीवाल की ईमानदार मुहिम ने लोकतंत्र के सभी रंगत के दलों पर गहरा असर छोड़ा है। सारे दल किसी न किसी रुप में उसकी इस उपलब्धि और जनप्रभाव से ईर्ष्या करते हैं। साथ ही उसके खिलाफ किसी भी दल का साहस नहीं है कि बेईमान नेता पेश करे। इससे केजरीवाल ने जो राजनीतिक परिदृश्य बनाया है वह लोकतंत्र के लिए शुभ कहा जा सकता है। इसकी तुलना में नरेन्द्र मोदी और राहुल गांधी मूल्यहीन नेता नजर आते हैं।

असली बात यह है कि समाज में एक बड़ा तबका है जो ईमानदार है लेकिन इन तबके की राजनीतिक भूमिका खत्म हो गयी थी। राजनीति में ईमानदारी बोगस कब और कैसे हुई इस पर हमें गंभीरता से सोचना चाहिए। यह कैसे हुआ कि समाज में ईमानदार हैं लेकिन ईमानदारी बोगस हो गयी, कौन हैं इसके लिए जिम्मेदार ? इसी अर्थ में केजरीवाल महत्वपूर्ण नेता है कि उसने ईमानदारी के प्रति क्रेजी भाव पैदा किया। केजरीवाल इसलिए भी मूल्यवान है कि उसने नेताओं को कथनी-करनी में साम्य रखने पर जोर दिया और इस चीज को परीक्षण का आधार बना दिया कि नेता बोलता क्या है और करता क्या है ? आज सभी दल परेशान हैं और कथनी-करनी में साम्य खोज रहे हैं।

केजरीवाल का एक अन्य मूल्यवान पक्ष है दैनंदिन जनसमस्याओं को केन्द्रीय मुद्दा बनाना और उनके समाधान की दिशा में अनवरत सक्रिय रहना। बिजली,पानी के सवाल पर वोट मांगना और इन सवालों को सचमुच में विवाद के विषय बनाना,जनता को जागरुक बनाना और गोलबंद करना,यह बड़ी उपबल्धि है। दिल्ली में सभी दलों ने इन दोनों सवालों को लेकर आम जनता को जागरुक बनाने का काम बंद कर दिया था, आम जनता के जेहन में ये दोनों मुद्दे थे ,नेतागण आते थे ,आश्वासन देते थे और चले जाते थे, इसके आगे कोई राजनीतिक गतिविधि नहीं होती थी, केजरीवाल ने इन दोनों मुद्दों को ज्वलंत मुद्दे बनाकर सभी राजनीतिकदलों की नींद हराम कर दी है,वह इससे एकदम आगे गया है उसने आम जनता को गोलबंद करके इस पर जिस तरह की जागरुकता और राजनीतिक सक्रियता पैदा की है वह विरल घटना है। कम से कम दिल्ली में उसने इन दो मसलों को टाइमबम बना दिया है। कोई भी सरकार आए उसे इस टाइमबम को डिफ्यूज करना ही होगा।वरना भविष्य खराब है।

आम जनता से वोट मांगना और चुनाव जीतना अलग बात है और आम जनता को उसकी समस्याओं को लेकर जागरुक बनाना और राजनीतिक तौर पर गोलबंद करना एकदम भिन्न चीज है। इससे लोकतंत्र मजबूत बनता है।

केजरीवाल आज सारे देश में भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम का निर्विवाद नायक है। यह नायकत्व उसने संघर्षों के जरिए हासिल किया है। सत्ता से मुठभेड़ें करते हुए हासिल किया है। भ्रष्ट अफसर और नेता उसके नाम से थर्राते हैं। यह खूबी आज न तो मोदी में है न शीला दीक्षित में है और न अजय माकन में है। नाम से ही भ्रष्ट अफसर थर्राएं यह चीज आम जनता के लिए चैन देने वाली है। इसलिए केजरीवाल बेहतर विकल्प है।

यह सच है कांग्रेस ने 15साल में दिल्ली के इंफ्रास्ट्रक्चर का कायाकल्प किया है लेकिन इसकी बहुत बड़ी कीमत दिल्ली को चुकानी पड़ी है। दिल्ली का सामाजिक इंफ्रास्ट्रक्चर पूरी तरह टूट गया है। दिल्ली में मूल्यहानि,पर्यावरणहानि,धनहानि,अधिकारहानि और सामाजिक असुरक्षा आम बात हो गयी है और कांग्रेस ने आलसियों की तरह यह सब देखा है। उसके अंदर इन सबसे लड़ने की कोई बेचैनी नहीं बची है।



दूसरी ओर नरेन्द्र मोदी के मैदान में आने के बाद भाजपा बेहूदे तर्कों के आधार पर चुनाव लड़ रही है। दिल्ली में सबसे भ्रष्ट नगरनिगम प्रशासन देने का वे भारतकेसरी खिताब जीत चुके हैं। उनका तर्क है चूंकि मोदी केन्द्र में जीते हैं अतः उनको दिल्ली में भी जिताओ। यह भोगी का राग है। दिल्ली में भाजपा ने विगत 15 सालों में राजनीतिक –सामाजिक क्षय में सक्रिय भूमिका अदा की है। वह कांग्रेस के लूटतंत्र का अंग बनकर काम करती रही है। उसने लोकतंत्र के स्वस्थ मूल्यों को खोखला बनाया है। लोकतंत्र को हर स्तर पर धोखा दिया है और सिर्फ लोकतंत्र के भोगियों के मन में अपील पैदा की है। मोदी का सबसे बड़ा योगदान है कि उसने लोकतंत्र को भोगियों का तंत्र बनाया है। लोकतंत्र के उपभोग की भावना पैदा की है।मोदी के सारे एक्शन भोगी के एक्शन है। लोकतंत्र में भोगी होना वस्तुतः कैंसर है।लोकतंत्र बचता तब है जब इसमें भोग और आलस्य से लड़ने वाले जज्बाती और कुर्बानी के जज्बे वाले मूल्य पैदा किए जाएं, मोदी के मूल्य भोगी के मूल्य हैं। लोकतंत्र का भोगी अकर्मण्य होता है वह संचित पूंजी खाता है। मोदी अकर्मण्य भोगी नेता है ,जिसका लक्ष्य है लोकतंत्र की एफडी (फिक्स डिपोजिट) खाना। इस परिप्रेक्ष्य में आम आदमी पार्टी एकमात्र विकल्प है जिसको कायदे से वोट दिया जाना चाहिए।

शनिवार, 17 जनवरी 2015

सेंसरबोर्ड का संकट और मोदी सरकार


  नरेन्द्र मोदी को " स्वायत्तता " पदबंध से नफरत है ! उनको "लोकतांत्रिक कार्यप्रणाली" से एलर्जी है। उनको हर प्रतिवादी " कांग्रेसी" या " माओवादी" या "देशद्रोही" नजर आता है । सवाल यह है क्या संसदीय बहुमत अधिनायकवादी बना देता है? भारत का अनुभव बताता है कि बहुमतवाले नेता की मनोदशा यदि सामंती हो तो वह अधिनायकवादी रुपरंग में जल्दी आ जाता है।मोदी सरकार की कार्यप्रणाली और सेंसरबोर्ड के संकट को इसी नज़रिए से देखने की ज़रुरत है। 
    
सेंसरबोर्ड के नौ सदस्यों ने कल सूचना और प्रसारण मंत्रालय के पास अपना इस्तीफ़ा भेज दिया , इसके पहले सेंसरबोर्ड की अध्यक्षा लीला सेम्सन इस्तीफ़ा दे चुकी हैं। मीडिया और भाजपा ने तुरंत ही इन इस्तीफ़ों को कांग्रेसी साज़िश कहकर ख़ारिज कर दिया। सच्चाई यह है यूपीए सरकार के ज़माने से ही सेंसरबोर्ड के सदस्य इस संगठन का कार्यप्रणाली से असंतुष्ट होकर कई पत्र लिख चुके थे और पूर्ण स्वायत्तता दिए जाने की माँग कर रहे थे। लेकिन सूचना प्रसारण मंत्रालय ने कोई प्रभावी कदम नहीं उठाया ।
      मोदी सरकार आने के बाद सेंसरबोर्ड के सदस्य उम्मीद लगाए बैठे थे नई सरकार के आने से मंत्रालय के नज़रिए में बदलाव आएगा।लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। सेंसरबोर्ड को पिछली सरकार के ज़माने में अनपढ़, जाहिल और सिनेमानिरक्षर लोगों से भर दिया गया था और इसकी ओर लीला सेम्सन ने कई पत्र लिखकर मंत्रालय का ध्यान खींचा। नई सरकार आने के बाद स्थितियाँ और भी भयानक हो गयीं , बोर्ड की मीटिंग बुलाना ही मुश्किल हो गया।
  मोदी सरकार ने बोर्ड के 17 मेम्बरों का कार्यकाल नए बोर्ड की नियुक्ति तक बढा दिया , लेकिन काम करने की अनुमति का माहौल ख़त्म कर दिया ,बोर्ड की मीटिंग के लिए अनुमति देने से मना कर दिया, अध्यक्षा को न्यूनतम काम करने के लिए फ़ंड मुहैय्या कराने से मना कर दिया।
    विगत सरकार से मोदी सरकार का अंतर यह है कि बोर्ड की अध्यक्षा का मंत्रालय से विवाद पहले भी चल रहा था और वे अपना काम करने के लिए स्वतंत्र थीं, मीडिया की ख़बरों से यही लगता है कि मोदी सरकार आने के बाद सूचना प्रसारण मंत्रालय से पुराना विवाद तो बरक़रार रहा साथ में काम करने के मार्ग रोड़े डाल दिए गए । मूल विवाद सेंसरबोर्ड को पूर्ण स्वायत्तता देने से जुडा है। बोर्ड की मीटिंग को मंत्रालय की अनुमति और फ़ंड के बिना बुलाना ही संभव नहीं था । यहीं से मोदी सरकार का हस्तक्षेप आरंभ होता है। मोदी सरकार ने फ़ंड ही रोक दिए। यही वह बिंदु है जहाँ से सदर और नौ सदस्यों के इस्तीफ़े आए हैं।
      मोदी सरकार की कार्यशैली का अब तक का प्रधान लक्षण रहा है कि कोई स्वायत्त नहीं है। पीएम ऑफ़िस या मंत्रालय की ओर से जो कहा जाए वह काम करो। यदि कहा जा रहा है कि कोई काम मत करो तो मुँह बंद करके चुप रहो वरना कांग्रेस एजेंट कहकर अपमानित क्या जाएगा। यही हाल योजना आयोग का हुआ है ,वही दुर्दशा सेंसरबोर्ड की हुई है। 
         सेंसरबोर्ड के सदर ने यह भी कहा है कि मंत्रालय ने MSGफिल्म को पास कराने के लिए दबाव डाला है तो उस पर अविश्वास का कोई कारण नहीं लगता, कारण यह है कि सेंसरबोर्ड से पास हुए बिना ही जिस तरह आननफानन में इस फिल्म को दिखाने की अनुमति ट्रिब्यूनल दी है उससे लीला सेम्सन के आरोप की पुष्टि होती है। 
         मोदी सरकार को सारे विवाद को समाप्त करके सबसे पहले MSGफिल्म का प्रसारण रोकना चाहिए । साथ ही सेंसरबोर्ड को तुरंत पूर्ण स्वायत्तता देकर पुनर्गठित करना चाहिए। 

किरनबेदी का भगवा स्वप्नलोक



दिल्ली विधानसभा चुनाव में किरनबेदी क्या करेंगी यह वे नहीं मोदी तय करेंगे ! इसलिए मोदी के परिप्रेक्ष्य में किरन बेदी को देखा जाय तो बेहतर होगा। मोदी बुनियादी तौर पर लोकतंत्र का विलोम है । वे लोकतंत्र की नकारात्मक प्रवृत्तियों के पुंज पुरुष हैं। 

   लोकतंत्र की नकारात्मक प्रवृत्तियाँ हैं दल-बदल , अनाप-शनाप ख़र्चा करना, नियमों और क़ानूनों को न मानना, अपराधीकरण को संरक्षण देना, हर क़िस्म की स्वायत्तता का निषेध करना,सिस्टम को अंदर से तोड़ना। संयोग से इन सभी प्रवृत्तियों का संगम नरेन्द्र मोदी की कार्यशैली में देखने को मिलता है । केन्द्र सरकार में ऐसे लोग मंत्री पद की शोभा बढा रहे हैं जिनके ऊपर विभिन्न क़िस्म के आपराधिक मामले चल रहे हैं, सजाएं बोली जा चुकी हैं। देश में इस तरह के मंत्रियों की कल्पना किसी ने नहीं की थी। इसी तरह निर्लज्जता के साथ बैंकों के काम में पीएम आफिस सीधे हस्तक्षेप कर रहा है। भाजपा और मोदी के दबाव के चलते मीडिया का एक बड़ा हिस्सा पंगु बना दिया गया है ! मनमाने ढंग से योजना आयोग को ख़त्म किया गया है, योजना बनाना बंद कर दिया है।सेंसरबोर्ड और दूसरी स्वायत्त संस्थाओं को तोड़ा जा रहा है। तमाम क़िस्म के अपराधी और माफ़िया गिरोहों को केन्द्र का खुला समर्थन है। स्वयं मोदी माफ़िया किंग दाऊद इब्राहीम के भाई के साथ पब्लिक मीटिंग कर चुके हैं। खुलेआम अदानी-अम्बानी के विमानों का चुनाव में इस्तेमाल कर चुके हैं। 
     मोदी के आने के बाद विभिन्न तरीक़ों से दल-बदल को बढ़ावा दिया गया है और विभिन्न दलों के नेताओं को भाजपा में लाने की कोशिश की जा रही है। भाजपा के इतिहास में सबसे ज्यादा दलबदलू नेता मोदीयुग में ही भाजपा में दाखिल हुए हैं ।केन्द्र के सभी मंत्रालयों की स्वायत्तता ख़त्म करके सभी मंत्रालयों को नीतिगत फ़ैसलों के मामले में पीएम कार्यालय के मातहत कर दिया गया है। करप्शन के सवाल पर बोलना प्रतिबंधित है। यही वो परिप्रेक्ष्य है जिसमें किरनबेदी ने मुख्यमंत्री पद की डील के तहत भाजपा की सदस्यता ली है। 
           किरनबेदी ने नवभारत टाइम्स को दिए पहले साक्षात्कार में भ्रष्टाचार के मसले को अपने प्रमुख पाँच भावी कार्यों में शामिल न करके यह साफ़ कर दिया है कि वे भविष्य में भ्रष्टाचार के सवाल पर संघर्ष नहीं करेंगी। उनके पाँच लक्ष्यों में बिजली,महँगाई , पानी,बेकारी और शिक्षा की समस्याएँ भी नहीं आतीं, यहाँ तक कि दिल्ली की जनता की झुग्गी झोंपड़ी की समस्याएँ भी उनके निशाने पर नहीं हैं। 
       किरनबेदी ने कहा है -
"अगर मैं सीएम बनती हूं तो 5 पी पर काम करूंगी। पहला पी यानी पीपल, इसमें पैरंट्स अपने बच्चों को अच्छी नैतिक बातें सिखाएं, स्कूल बच्चों को अच्छी शिक्षा दे सकें। दूसरा पी यानी पॉलिटिक्स, अगर अच्छे नेता होंगे तो लोगों को अच्छा प्रशासन और कानून मिल सकेगा। नेताओं का काम ही नीति, नियम और रेगुलेशन बनाने का है। तीसरा पी यानी पुलिस, दिल्ली पुलिस अच्छा काम कर रही है लेकिन उसमें सुधार की जरूरत है। अगर दिल्ली में 1 लाख पुलिस वाले हैं तो उसके आधे सिविल डिफेंस वाले लोग भी जुड़े होने चाहिए। सिविल डिफेंस को सीधे मुख्यमंत्री कार्यालय के तहत लाया जाएगा। अभी सब बिखरा है उसे एक मुट्ठी में बांधा जाएगा। एक मुट्ठी में पुलिस तो दूसरी मुट्ठी में सिविल डिफेंस होगी।"

"चौथी पी यानी प्रोसिक्यूशन, इसमें लोगों को शीघ्र न्याय मिल सके इसके लिए फास्ट ट्रायल होगा। पांचवां पी प्रिजन होगा। जेलों में सुधार के कार्यक्रम चलाए जाएंगे। जेलों में रेप के आरोपी बढ़ते जा रहे हैं। उनमें सुधार लाने के लिए जरूरी है कि इस तरह के सुधार के कार्यक्रम जेल में चलाए जाएं ताकि वे फिर से अपराध की दुनिया में ना जाएं।"
       कहने का आशय यह है कि किरनबेदी के निशाने पर अब वे काम हैं जो इन दिनों दिल्ली की बृहत्तर आम जनता के मसले नहीं हैं ये तो सिस्टम के मसले हैं । इसका अर्थ यह भी है कि भाजपा खुले तौर पर कह रही है कि वह दिल्ली में सरकार में आती है तो बिजली, पानी, महँगाई, बेकारी, गंदगी, शिक्षा आदि जन समस्याएँ उसकी प्राथमिकता में नहीं होंगी। 
               किरनबेदी जो कह रही हैं वह मोदी की भी राय है क्योंकि वे मोदी से आशीर्वाद लेकर आई हैं और उनके ही इशारों पर सब कुछ कह रही हैं। किरनबेदी की भाषा और बयान अब भाजपा और मोदी के बयान माने जाएँगे। वे साफ़गोई के साथ कह रही हैं कि भाजपा वे अपना अतीत सुधारने आई हैं। यानी वे अतीत को लेकर जिस कष्ट में रही हैं उससे मुक्त होना चाहती हैं । अतीत से मुक्ति के लिए एक धाकड अफ़सर को संघ से बेहतर कोई आश्रम कहीं और मिल भी नहीं सकता! 
         

मंगलवार, 13 जनवरी 2015

आधुनिक मनुष्य की तलाश में


 
मुसलमान होना वैसे ही समस्यामूलक है जिस तरह हिन्दू होना। हमारे समाज की यही सबसे बड़ी समस्या भी है कि आदमी का धर्म ,जन्म से मृत्यु तक, यहाँ तक कि मौत के बाद भी पीछा नहीं छोड़ता।मुसलमानों के बारे में सारी दुनिया बहस कर रही है और ख़ासकर मुसलमान समुदाय से जो लोग आतंकी संगठनों में चले गए हैं उनके कारण मुसलमानों के प्रति घृणित प्रचार अभियान चरम पर चल रहा है। फेसबुक पर तो संघियों ने नंगई के सारे मानक तोड़ दिए हैं। संघियों की इस्लामविरोधी पोस्ट मुसलमानों में देशप्रेम पैदा नहीं करती। दुर्भाग्य यह है कि संघियों में शिक्षित ही हैं जो सबसे ज्यादा मुसलमानों के बारे में फैलाए जा रहे ज़हरीले प्रचार से प्रभावित हैं और उस तरह का प्रचार कर रहे हैं। 
        साम्प्रदायिकता हो या नस्लवाद या आतंकवाद इनका किसी धर्म से कोई संबंध नहीं है। विभिन्न रंगत के अपराधी तत्व अपने स्वार्थ के लिए इस तरह के समाजविरोधी हिंसाचार में सक्रिय हैं। आतंकवाद या नस्ली हिंसा या साम्प्रदायिक हिंसा वस्तुत: अपराध है , यह धर्म की सेवा नहीं है यह अपराधियों की सेवा है। अपराध को समुदाय या जाति या सम्प्रदाय या धर्म से जोड़कर देखने का नजरिया हमें ब्रिटिश साम्राज्यवाद से विरासत में मिला है। इन दिनों वे ही संगठन यह काम कर रहे हैं जो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तौर पर साम्राज्यवाद की सेवा में लगे हैं। 
             मैं निरंतर हिन्दुत्ववादी संगठनों और उनकी राजनीति की आलोचना करता रहा हूँ, हम चाहते हैं कि संघ के साथ चलने वाले लोग साम्प्रदायिक नजरिया त्यागकर लोकतांत्रिक नज़रिए का राजनीति से लेकर धर्म तक पालन करें। इसी तरह हम यह भी चाहते हैं कि मुसलमान समुदाय अपने बंद दरवाज़े खोले। भारत के संविधान के आलोक में अपने को नागरिक के रुप में परिभाषित करे और शरीयत या अन्य गैर- संवैधानिक मूल्यों को त्यागने की प्रक्रिया को तेज़ करे। 
      कोई व्यक्ति जन्म से धार्मिक पैदा नहीं होता बल्कि धार्मिक पहचान तो उसे परिवार के कारण मिलती है, धार्मिक आचरण के कारण मिलती है। लोकतांत्रिक देश के निर्माण के लिए हमें धार्मिक आचरणों और संस्कारों की बजाय लोकतांत्रिक संस्कारों और नज़रिए के विकास पर ज़ोर देना चाहिए। हमारे समाज की नियामक शक्ति और संस्थान तो हमारा संविधान है, कोई धार्मिक किताब हमारे जीवन को नियमित नहीं कर सकती । हम जीवन, राजनीति, संस्कृति, न्याय आदि के बारे में संविधान के जरिए संरक्षण और दिशा -निर्देश पाते रहे हैं। ऐसे में हम संविधान के अनुसार अपनी पहचान को निर्मित करने का काम क्यों नहीं करते ? हम नागरिक की पहचान अर्जित करने की कोशिश क्यों नहीं करते ? हमें एक अच्छे धार्मिक प्राणी की नहीं अच्छे नागरिक की ज़रुरत है। हमें ऐसे नागरिक की ज़रुरत है जो नागरिकचेतना से लैस हो। धर्म के लिए नहीं नागरिक अधिकारों के लिए मर मिटने का जिसके अंदर जज़्बा हो। संविधान की रक्षा और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए जो कोई भी क़ुर्बानी देने को तैयार हो। 
        फेसबुक पर युवाओं से लेकर प्रौढ़ शिक्षितों तक हम जब धर्म -धर्म, हिन्दू - हिन्दू, मुसलमान -मुसलमान की गुहार लगाती पोस्ट देखते हैं तो यही लगता है भारत में अभी संविधानचेतना और नागरिकचेतना पैदा नहीं हुई है ! तकलीफ़ तब और भी बढ जाती है जब राजनीति करने वाले लोग नागरिक की बजाय जाति, धर्म आदि पहचान के रुपों का इस्तेमाल करते हैं और हम सब पढे लिखे लोग उनकी जय-जयकार करते हैं। शिक्षित फेसबुकिए मित्रों का "हम हिन्दू हम हिन्दू" , "वे मुस्लिम वे मुस्लिम ",की फेसबुक हुंकार यही संदेश देती है कि हमारे मित्रों की चेतना ,पराए संगठनों की विचारधारा के यहाँ गिरवी पड़ी हुई है। नागरिकचेतना के लिए जरुरी है कि व्यक्ति की चेतना अन्य के पास गिरवी न हो।यह मानसिक ग़ुलामी है जो विभिन्न रुपों में हमारे अंदर जड़ें जमाए हुए है। 
     आधुनिक होने की पहली शर्त है संविधान के आलोक में स्वयं को देखना और स्वयं के विवेक को संविधान के अनुरूप रुपान्तरित करना । हमारे समाज में, फेसबुक में और मीडिया में संविधान के आयामों पर न्यूनतम बहस नहीं दिखती इसके विपरीत संविधान विरोधी सवालों और नज़रिए पर सबसे ज्यादा बहसें चलती रहती हैं। सबसे पहले हम बहसों के पैराडाइम को बदलें। बहसों को संविधान की परंपरा में लाएँ और गैर-संवैधानिक दृष्टियों से मीडिया और समाज से अपदस्थ करें। 
         आधुनिक होने की दूसरी शर्त है आधुनिक आचरण करना। आचरण का हमारे नज़रिए से संबंध है हम व्यक्ति को नागरिक के रुप में देखें और नागरिक के रुप  में उसकी संप्रभु सत्ता को परिभाषित करें , नागरिक के रुप में ही उससे सामाजिक संबंध बनाएँ और विकसित करें। 
             आधुनिक होने की तीसरी शर्त है असहमति और मित्रता। हम जिनके बीच में रहते हैं उनके विचारों का सम्मान करें, असहमत होते हुए भी बेहतरीन मित्र बनें। असहमति के साथ घृणा का कोई संबंध नहीं है। असहमति के साथ हिंसा का कोई संबंध नहीं है।  मनुष्य होने की पहली पहचान मित्र होने में है। जो मित्र नहीं बन सकता वह मनुष्य नहीं बन सकता। जो मित्र है वह मनुष्य है । 
              आधुनिक होने की चौथी शर्त है समानता को दैनंदिन आचरण और सामाजिक मूल्य में रुपान्तरित करना। घर से लेकर बाहर तक सभी के साथ समानता के नज़रिए के आधार पर आचरण करना । सभी क़िस्म के सामाजिक भेदों से सचेत रुप से लड़ना ।
            आधुनिक होने की पाँचवी शर्त है कायिक और वाचिक हिंसा का हर स्तर पर परित्याग और विरोध। हिंसा तो आधुनिक का नहीं अनाधुनिक का अंग है। हम जब भी कायिक या वाचिक हिंसा करते हैं तो आधुनिक आचरण नहीं करते। आधुनिक मनुष्य ने हिंसा को तर्क के जरिए  अपदस्थ किया है। हम तर्क करें , हिंसा न करें । 

सोमवार, 12 जनवरी 2015

पीएम मोदी की असफल ट्विटर क्रांति

        
पीएम नरेन्द्र मोदी का 'ट्विट' भी बहुत ही मनमौजी है।वे जब से प्रधानमंत्री बने हैं उनके 'ट्विट' ने देश-विदेश की समस्याओं पर बोलना बंद कर दिया है। लोकसभा चुनाव के समय उनके 'ट्विट' का जो रुप था वह रुप पीएम बनते ही बदल गया है। असल में 'ट्विट' नहीं बदला है,'ट्विट' करनेवाला बदल गया है। नरेन्द्र मोदी जब से पीएम बने हैं उनके 'ट्विट' में अधिकांश समय शोक-संदेश, शुभकामना संदेश ही आ रहे हैं।

     मोदीजी का 'ट्विट' में अब कोई भी बात कहने का मन नहीं करता।देश में बहुत कुछ ऐसा घट रहा है जो पहले उनकी 'ट्विटचिन्ता' में था लेकिन अब उनकी 'ट्विटचिन्ता' में नहीं है ? कोई पत्रकार उनसे पूछ नहीं सकता कि आखिर ऐसा क्या हुआ कि देश में बड़ी-बड़ी घटनाएं घट रही हैं लेकिन मोदी जी कभी कोई बयान नहीं देते ! कभी संसद के गेट पर प्रेस के सवालों का जबाव तक नहीं देते। संसद में नहीं बोलते,ट्विट में नहीं बोलते।

स्थिति यह है कि भारत किसानों की आत्महत्याएं जारी हैं,लेकिन मोदी का ट्विटर मौन है ! बैंक और कोयला श्रमिकों की हड़ताल हुई ट्विटर मौन रहा ! जम्मू-कश्मीर में सरकार नहीं बन पायी ट्विटर मौन है! हम जानना चाहते हैं क्या पीएम को बोलने की आजादी नहीं है ? यदि है तो पीएम बोलते क्यों नहीं ? मोदी जिस मौन को लेकर पूर्व पीएम मनमोहन सिंह को मौनीबाबा कहते थे इन दिनों स्वयं मौनीबाबा बने बैठे हैं ! यही लिखें ट्विट में –पीएम मायने मौनीबाबा !!

मोदीजी आप सिर्फ आमसभा में बोलेंगे ,नायककेन्द्रित मंचों पर बोलेंगे,यह तो काम मनमोहन सिंह भी करते थे। लेकिन आपने तो ट्विटर के जरिए संवाद का जनता से वायदा किया था लेकिन सात महिने होने को आए आपको ट्विटर पर संवाद करते नहीं देखा गया ! मजेदार बात यह है कि आपके मंत्री परिषद के सदस्य भी ट्विट करके संवाद नहीं करते। यह सब देखकर हम कैसे उम्मीद करें कि ट्विटर के अच्छे दिन आ गए हैं ?

हम सोचते हैं मोदीजी के इतनी बड़ी विशाल संख्या में ट्विटर अनुयायी हैं और उनके स्वच्छता अभियान की ट्विट पढ़ने के बाद उनमें से दस फीसदी भी अनुयायी जमीन पर सक्रिय नहीं हुए। किसी ने फेसबुक पर लिखा भी कि पीएम के मैदान में उतरने बावजूद बनारस में स्वच्छता की स्थिति बेहतर नहीं है। मैं कोलकाता में रहता हूँ यहाँ आपके अनुयायियों और ट्विटरभक्तों की संख्या भी काफी है लेकिन स्वच्छता अभियान की ट्विट का कोई असर जमीनी स्तर पर नजर नहीं आ रहा। यहां तक कि देश के मुख्यमंत्रियों पर भी कोई असर नहीं पड़ा है, देश गंदा था और गंदा है। हम समझ नहीं पा रहे हैं कि आपकी स्वच्छता ट्विट इतनी प्रभावहीन क्यों हो गयी ? जिस ट्विट ने लोगों को मतपेटियों तक पहुँचा दिया ! उन्हीं लोगों को आपकी ट्विट कूड़े के ढ़ेर तक नहीं ले जा पाए !

मैं आपकी ट्विट की असफलता से दुखी हूँ,सच मानें मैं पहला लेखक था मैंने काफी पहले पूर्व प्रधानमंत्री और उनके मंत्रीमंडल से अपील की थी नेट पर आओ, ट्विटर पर आओ,बाद में मनमोहनजी आए भी,लेकिन अन्य मंत्री भागते रहे। लेकिन जब से आप केन्द्र की राजनीति में आए और आपने ट्विटर का जमकर प्रयोग करना शुरु किया मैं खुश था कि चलो कोई पीएम आया जिसको संचार तकनीकी के इस्तेमाल की समझ है,लेकिन आपने भी मुझे निराश किया है।

मोदीजी आप जान लें ट्विटर में रहें तो धारावाहिकता रखें,निरंरतर सवाल उठाएं,बहसें चलाएं,संगी-साथियों को भी दिशा दें। उनसे भी कहें कि वे आपके बताए मसलों पर बहस करें। लेकिन यहां मैं सब कुछ उलटा देख रहा हूँ ,आप ट्विटर पर बहस नहीं चला रहे, आपकी काम की ट्विट का कोई असर ही नहीं हो रहा। यह कैसा चमत्कार है कि आपकी ट्विट असरहीन हो गयी है ! खासकर स्वच्छता अभियान वाली ट्विट तो जमीनी स्तर पर गायब है। जितने भी पायखाने बनने हैं या बन रहे हैं वे तो एक सर्कुलर से भी बनवाए जा सकते थे। मैं दुखी इस बात से भी हूँ कि भाजपा जैसा 'कर्मठ दल' एकसिरे से सड़क सफाई अभियान से नदारत है ! दिल्ली नगर निगम से लेकर बनारस की महानगरपालिका तक आपके ट्विट का कोई असर नजर नहीं आ रहा। आपसे अपील है कि कुछ करें जिससे आपके ट्विट में जान आए ! आपके ट्विट को ईश्वर वचन के रुप में जनता ग्रहण करे ! कम से कम संघ के लोग तो पहले गंभीरता से आपके अभियान से जुडें।

विशिष्ट पोस्ट

मेरा बचपन- माँ के दुख और हम

         माँ के सुख से ज्यादा मूल्यवान हैं माँ के दुख।मैंने अपनी आँखों से उन दुखों को देखा है,दुखों में उसे तिल-तिलकर गलते हुए देखा है।वे क...