शुक्रवार, 20 नवंबर 2015

नवजागरण नहीं वैकल्पिकधारा के नायक हैं राधामोहन गोकुलजी


             राधामोहन गोकुलजी के बारे में पढ़ते समय यह महसूस हुआ कि वे नवजागरण के नहीं वैकल्पिक विचारधारा के नायक हैं,पता नहीं क्यों हिंदी के अनेक आलोचक उनको नवजागरण से जोड़ते हैं,जबकि नवजागरण तो बुर्जुआजी की विचारधारा का उत्थान है,यह बुर्जुआजी को नायक बनाने का प्रकल्प है,इसके विपरीत राधामोहन गोकुलजी के लेखन से यह तथ्य साफतौर पर निकलता है कि वे बुर्जुआजी को अपना नायक नहीं मानते,वे बुर्जुआ विचारधारा को अपनी स्वाभाविक विचारधारा नहीं मानते,इसके बावजूद हिंदी के आलोचकों ने उनको नवजागरण के साथ जोड़कर पेश किया है जो कि विचारधारा की दृष्टि से सही नहीं है। असल में हिंदी में एक गलत परंपरा चली आ रही है वह परंपरा है हर बेहतर विचार,लेखक,आंदोलन को येन-केन-प्रकारेण नवजागरण से जोड़ने की। यह नवजागरण के सरलीकरण के गर्भ से निकली समझ है। नवजागरण का प्रकल्प बुर्जुआ प्रकल्प है,यह मजदूरवर्ग का प्रकल्प नहीं है।जो लेखक विचारधारात्मक दृष्टि से बुर्जुआजी के नजरिए से भिन्न क्रांतिकारी नजरिया रखते हैं उन्हें नवजागरण के परिप्रेक्ष्य के साथ जोड़कर नहीं देखना चाहिए। समग्रता में देखें तो राधामोहन गोकुलजी के विचारों की यात्रा बुर्जुआ –सुधारवादी विचारों से गुजरती हुई समाजवादी दिशा ग्रहण करती है और वे बुर्जुआ विचारधारा का बहुत गहरा आलोचनात्मक विकल्प निर्मित करते हैं। यही विचारधारात्मक दिशा उनको आस्तिक से नास्तिक,कांग्रेसी से क्रांतिकारी तक बना देती है।

राधामोहन गोकुलजी का जन्म 15दिसंबर 1865 में इलाहाबाद के पास भदरी में हुआ,इनके पूर्वज जयपुर राज्य के खेतड़ी के रहने वाले थे। इनके पिता गोकुलचंद थे इनके चार संतान थीं इनमें गोकुलजी सबसे बड़े थे। कर्मेदु शिशिर ने लिखा है, “ उन दिनों भदरी के जो राजा थे,वे अत्यंत उदार और भोले-भाले इन्सान थे। उनकी रियासत के लोग अपनेपन से उन्हें ‘बौरह महाराज’ कहा करते थे।गोपालगंज में भी उनकी नवाबी थी।उससे चार मील दूर बौद्ध भिक्षुओं का आवास विहार भी उनकी तहसील में था।बाद में यह तहसील उठकर कुंडा चली आई। राधामोहनजी की प्रारंभिक शिक्षा इसी विहार में हुई थी। दो-तीन महिने में ही वर्णमाला और गणित की जानकारी कर वे स्कूल जाने लगे।’ यहीं पर उन्होंने फारसी और बही-खाता संबंधी ज्ञान प्राप्त किया।मात्र 13साल की उम्र में ही उनका विवाह हो गया,बाद में उन्होंने आगरा के सेन्ट जॉन्स कॉलेजिएट स्कूल में दाखिला लेकर अंग्रेजी की पढ़ाई की। कुछ साल बाद उनकी पत्नी का सन् 1883 में निधन हो गया। कालांतर में वे इलाहाबाद में बालकृष्ण भट्ट के संपर्क में आते हैं,कांग्रेस से जुड़ते हैं,हिन्दी-प्रदीप में लिखते हैं।यहीं पर उनकी पंडित मदनमोहन मालवीय से मुलाकात होती है। बाद में कानपुर आते हैं वहां पर प्रतापनारायण मिश्र के संपर्क में आते हैं,ब्राह्मण पत्र के मैनेजर के रुप में 1890-91 में काम करते हैं।

दिलचस्प बात यह है कि विपत्तियों ने राधामोहनजी का सारी जिंदगी पीछा नहीं छोड़ा। उनके एकमात्र पुत्र का 16वर्ष की आयु में निधन हो गया। अपने जीवन के कष्टों से जूझते हुए वे देश के विभिन्न शहरों में रहे,इस क्रम में कलकत्ते में भी आकर रहे। इसके पहले आगरा में रहे। कलकत्ते में आकर उन्होंने ट्यूशन आदि के जरिए आजीविका के लिए कमाना आरंभ किया,यहीं पर वे मतमालामंडल से जुड़े,बंग-भंग आंदोलन से जुड़े,उस समय के क्रांतिकारियों से मिले,उस जमाने के प्रसिद्ध क्रांतिकारी आशुतोष लाहिड़ी से उनके सघन रिश्तों की बात कर्मेन्दु शिशिर ने लिखी है। क्रांतिकारियों से जुड़ने के कारण वे सब तरह के कामों में क्रांतिकारियों की मदद किया करते थे। यहीं से उनका भारत के क्रांतिकारियों के साथ जो संपर्क बना वह मरते दम तक बना रहा।

राधामोहनजी का मानना है , ‘ जहां शारीरिक हानि पहुँचाने के लिए अनेक नशेबाजी और दुराचार के अड्डे होते हैं,वहां मनुष्य को मानसिक हानि पहुँचाने और निकम्मा बनाने के लिए धार्मिक अड्डे-गिरजे,मंदिर और मस्जिदें भी हैं। यह सब काम काबू याफ्ता शासन और शासक मंडल के हित के लिए दलालों अर्थात् पुरोहितों द्वारा,सरकार की छत्रछाया में बसनेवाले गरीबों को लूटनेवाले अमीरों की मदद से हुआ करते हैं। मूर्ख ग्रामीणों के दिमाग में जहां एकबार कोई बेवकूफी घर कर गई,फिर मुश्किल से निकलती है।इन बेचारों में ज्ञान नहीं ,विवेक नहीं,समझ नहीं,विद्या नहीं,खाने को अन्न और पहनने को वस्त्र तक इनके पास नहीं। जो चाहे इन्हें पंडित,मौलवी,पादरी बनकर ठग सकता है,धोके में डाल सकता है और अपनी अर्थ-सिद्धि का साधन बना सकता है।’ इस प्रसंग में यही कहना है कि गोकुलजी के जमाने में धर्म की बीमारी गरीबों में ही नहीं थी मध्यवर्ग में भी थी,इन दिनों हमारे देश में मध्यवर्ग से लेकर गाँव के गरीबों तक यह बीमारी पैर पसार चुकी है। गोकुलजी इसे ठगी का जाल ही मानते हैं।उन्होंने लिखा है, ‘ ईश्वर कोई चीज नहीं है,सिवा इसके कि ग़रीबों को ठगने के लिए ठगी का जाल है।यह जाल जितनी जल्दी तोड़ दिया जाए उतना ही अच्छा । ’



राधामोहन गोकुलजी और ईश्वर का बहिष्कार

         हमारे समाज में ईश्वर आज भी कल्पनाविलासियों –परजीवियों के लिए सबसे बड़ी ताकत है। समाज के व्यापकतम तबके में ईश्वर के प्रति गहरी आस्था और विश्वास को देख सकते हैं।मैं भी बार-बार ईश्वर को देखने मंदिरों में जाता हूँ,ईश्वर की कभी-कभी पूजा भी करता हूँ,मैं नहीं जानता मैं ऐसा क्यों करता हूँ,यह सच है कि ईश्वर नहीं है,इसके बावजूद ईश्वर ने हजारों सालों में समाज में हर आदमी के अंदर अपने लिए संस्कार, आदत, धर्म,मूल्य आदि के बहाने स्थान बनाया है। मुझे भी बचपन से यही सिखाया और बताया गया कि भगवान है और उसे मानो,कोई तकलीफ हो तो उससे कहो,वह मदद करेगा, लेकिन संयोग कहें या दुर्योग भगवान अभी तक नहीं मिला,बहुत पूजा-उपासना की,लेकिन नहीं मिला,बहुत मंदिरों में प्रणाम किया,साल में दो बार दुर्गाष्टमी पूजा ,होली-दीपावली आदि पर भगवान की पूजा करता रहा हूँ लेकिन नहीं मिला और स्थिति इस कदर त्रस्त करने वाली है कि अच्छे गुरुओं से मिलकर भी भगवान नहीं मिला,किसी भी रुप में भगवान का न मिलना अपने आपमें प्रमाण है कि भगवान नहीं है।

हम मंदिर इसलिए जाते हैं क्योंकि हमारे स्वार्थ जुड़े हैं,आर्थिक –सामाजिक –राजनीतिक लाभ जुड़े हैं,हम पूजा इसलिए करते हैं कि हमारी आदत है पूजा करना। लेकिन मैं निजी तौर पर ईश्वर में कोई विश्वास नहीं करता। विश्वास नहीं करता फिर भी पूजा करता हूँ,भगवान सामने पड़ जाए तो नमस्कार करता हूँ,यह हजारों साल का अभ्यास है जो सहज ही जाने वाला नहीं है,इसके लिए गहरे आत्मसंघर्ष की जरुरत होती है ,वह मध्यवर्ग केहमारे जैसे लोगों में कम ही होता है।

धर्म और ईश्वर के प्रति तिरस्कार की भावना की बजाय धार्मिक मान्यताओं,भावनाओं और विश्वासों के प्रति वैज्ञानिक विमर्श या संवाद पैदा करने की जरुरत है,भगवान तब कमजोर होता है जब आप संवाद-विवाद और शास्त्रार्थ करते हैं। लेकिन भगवान को ज्योंही पूजा और आस्था की चीज बनाते हैं तो वह मजबूत बनता है। भगवान की सामाजिक सत्ता कमजोर हो और सामाजिक जीवन में वैज्ञानिकचेतना आए,चीजों,वस्तुओं और घटनाओं को वैज्ञानिक ढ़ंग से देखने का नजरिया विकसित हो यह आज के युग की जरुरत है।

राधामोहन गोकुलजी इस अर्थ में महत्वपूर्ण हैं कि वे हिंदी में पहले विचारक-क्रांतिकारी और स्वाधीनता सेनानी हैं जो ईश्वर की सत्ता को सीधे चुनौती देते हैं। उनका प्रसिद्ध निबंध है, “ईश्वर का बहिष्कार”, (माधुरी,नवंबर1925 से फरवरी1926 तक) , इस निबंध में उन्होंने लिखा, “ ईश्वर एक ऐसा कल्पित पदार्थ है,जिसे कभी किसी ने अपनी ज्ञानेन्द्रियोंसे प्रत्यक्ष नहीं किया इसलिए कि उसका सर्वथा अभाव है।ईश्वर कोई ऐसी चीज़ है ही नहीं। जिस पदार्थ का अत्यंत अभाव है,उसका अस्तित्व कभी हो ही नहीं सकता।”

गोकुलजी ने यह भी लिखा, “ ईश्वर के माननेवाले उसे सर्वशक्तिमान,न्यायकारी,दयालु,सर्वव्यापी इत्यादि सभी गुणों से विभूषित करते हैं।यह लोग यह नहीं सोचते कि शक्तिमान् कहने से यह एक गुण ‘शक्ति’ का दूसरी चीज में आरोप करते हैं तो दूसरी चीज कोई वस्तु होनी चाहिए और ईश्वर कोई वस्तु नहीं है।”

गोकुलजी ने प्रसिद्ध फ्रांसीसी विद्वान् वाल्टेयर के नजरिए की तीखी आलोचना करते हुए जो कुछ कहा है वह काफी मूल्यवान है। वाल्टेयर का मानना है , “यदि ईश्वर न भी हो तो भी हमें एक ईश्वर का आविष्कार करना जरुरी है,क्योंकि जनता को धर्म की जरुरत है।” गोकुलजी ने लिखा, “ हमें इस पंडित की बात पर हंसी आती है।पहले तो उपर्युक्त वाक्य पढ़ने से प्रकट होता है कि वाल्टेयर को स्वयं ईश्वर नामक किसी पदार्थ की सत्ता का पूर्ण विश्वास न था,इसीलिए वह मूर्ख जनता को धोखे में डालने की नीयत से एक ईश्वर की कल्पना करने के फेर में पड़ा।दूसरे उसने ईश्वर के लिए Himकर्मवाचक;एकवचन पुल्लिंग,प्रथम पुरुष का प्रयोग करके उसे मर्द करार दिया। इससे प्रकट है कि वह इस अजीब जानवर को मनुष्य मानता है और मनुष्य मानने से उसकी सर्वशक्तिमत्ता,सर्वव्यापकता आदि की सारी बातें धूल में मिल जाती हैं।यही बात हिन्दू-मुसलमानों के खुदा की भी है।तीसरे जनता को एक धर्म दरकार है इसलिए खुदा का आविष्कार करना जरुरी है,यह भी बड़ी मजेदार बात है। जनता ने कभी खुदा नहीं मांगा; ‘वाल्टेयर’ और उसी तरह सोचनेवाले भद्रपुरुषों ने खाहमखाह एक खुदा गढ़कर जनता को अगणित बेहूदगियों का शिकार बना डाला।” आगे लिखा “ खुदा की ही कल्पना ने इंजील,कुरान,पुराण को रक्तरंजित इतिहास का भांडागार बनाया और घृणित कथाओं और भावों से मनुष्य जाति का सर्वनाश किया है।”

गोकुलजी असल में महात्मा मिकाइल बेकुनिन के प्रशंसक थे जो मानता था “यदि खुदा सचमुच होता है तो भी उसे धक्का देकर निकाल देना जरुरी होता।सच है धर्म और ईश्वर ऐसी ही बुरी कल्पना है। इनसे संसार का जब तक पीछा न छूटेगा,तब तक उसका कल्याण न होगा।”








मंगलवार, 17 नवंबर 2015

स्वतंत्रता और विवेकवाद के नायक स्वामी विरजानंद सरस्वती


          स्वामी विरजानंद सरस्वती का भारत के स्वाधीनता संग्राम में बहुत ही महत्वपूर्ण योगदान रहा है। खासकर19वीं सदी में हिन्दीभाषी क्षेत्र में जिनलोगों ने आम जनता में विवेकवाद की मशाल जलाए रखी उनमें स्वामीजी प्रमुख हैं। स्वामीजी की सबसे बड़ी विशेषता थी कि वे अवतारवाद और मूर्तिपूजा में विश्वास नहीं करते थे। वे दशनामी संन्यासी थे और उनका शंकराचार्य द्वारा स्थापित संन्यासी सम्प्रदाय से संबंध था। उनके गुरु पूर्णानंद भी शंकर के मतावलम्बी थे। वे वेदान्त के प्रगतिशील अग्रदूतों में गिने जाते हैं।

सन्1857 के स्वाधीनता संग्राम में स्वामी विरजानंद सरस्वती की महत्वपूर्ण भूमिका थी,मथुरा –हरिद्वार और आसपास के इलाकों की पंचायतों के जरिए स्थानीय लोगों को अंग्रेजों के खिलाफ गोलबन्द करने में उनकी केन्द्रीय भूमिका थी। दिलचस्प बात यह है कि स्वामी विरजानंद के गुरु पूर्णानंद,उनके गुरु स्वामी ओमानंद भी 1857 के संग्राम में शरीक हुए। असल में स्वामी ओमानंद और स्वामी पूर्णानंद ने 1857 के संग्राम में भाग लेने का ब्लूप्रिंट तैयार किया और स्वामी विरजानंद ने उसे लागू किया। दिलचस्प बात यह है कि 1857 में स्वामी ओमानंद 160 साल के थे और स्वामी पूर्णानंद 110साल के थे और स्वामी विरजानंद उस समय लगभग 79वर्ष के थे।यह वह दौर था जब मथुरा और उसके आसपास के इलाकों में जबर्दस्त वैचारिक संघर्ष चल रहा था जिसका मथुरा और हिन्दीभाषी क्षेत्र की विवेकवादी परंपरा के निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान है। मसलन्, सन्1845 के आसपास मौलवी इस्माइल ने “रद्दे हनूद”( हिंदूमत का खंडन) किताब लिखी,चौबे बद्रीदास ने “रद्दे मुसलमान”(मुस्लिम मत का खंडन) लिखी।सन्1856 में अब्दुल्ला ने “तोहद-तुल हिंद” (भारत की सौगात)लिखी।इस किताब में हिंदू देवी-देवताओं की आलोचना की गयी है।इंद्रमणि ने इसके उत्तर में “तोहफुलइस्लाम” (इस्लाम का उपहार) लिखी।इस धारा से भिन्न विरजानंद सरस्वती की परंपरा थी जिसमें हिन्दुओं-मुसलमानों की एकता पर जोर दिया गया था।

स्वामी विरजानंद सरस्वती की बचपन में शीतला के कारण एक ऑख चली गयी,लड़कपन में उनके माता-पिता न रहे। उनकी भौजाई उन्हें बहुत सताती थीं।आखिरकार तंग आकर वे घर (कर्तारपुर,पंजाब)से हरिद्वार की ओर चले गए।उस समय वे मात्र बारह वर्ष के थे। यहीं पर उन्होंने संस्कृत व्याकरण का असाधारण ज्ञान प्राप्त किया। उनके शिष्यों में अन्यतम हैं दयानंद सरस्वती। स्वामी दयानंद सरस्वती ने अपने पूना प्रवचन के दौरान अपने गुरु के बारे में कहा था कि “ वे दोनों आँखों से अँधे थे और उन्हें वेदशूल का रोग था।” .. “ उनकी वेद शास्त्रादि ग्रंथों में रुचि थी” , “भागवतादि पुराणों का वे तिरस्कार करते थे”, कल्पना करें मथुरा में रहकर भागवत का तिरस्कार करना कितना बड़ा जोखिम था।

सन् 1856 में मथुरा के पास जंगल में पंचायत हुई। उसमें मीर मुश्ताक मिरासी नाम के सज्जन उपस्थित थे। उन्होंने उर्दू में उस पंचायत का हाल लिखा है और उसमें विरजानंद के भाषण का सारांश दिया है।यह एक तथ्य है कि 1857 के संग्राम की तैयारी में अन्य लोगों के अलावा साधु-संतों-फकीरों की भी महत्वपूर्ण भूमिका थी। मीर मुश्ताक ने लिखा है, “ जब महात्मा विरजानंद को पालकी में बिठा कर लाया गया उस वक्त हिंदू-मुसलमान फ़कीरों ने उनकी खुशी में शंख,घड़नावल,नागफणी,निकाडा,तुरही,नरसिंघे बजाए थे और खुदापरस्ती और वतनपरस्ती के गीत गाए थे।यह नावीना साधु गैर-इल्म के समझने की ताकत रखता था और खुदा का जलवे-जुलाल इसकी ज़बान से ज़ाहिर होता था।मैंने भी अपनी रुह के तक़ाजे के मुताबिक़ 5फूल इनके सामने पेश किए और उनकी कदमबोसी की और खुदा से दुआ माँगी कि खुदा,ऐसी नेक रुहों को ख़लक़त की भलाई के लिए हमेशा पैदा कीजिए।” यह पंचायत चार दिन चली। एक दिन आदम से लेकर हजरत मोहम्मद तक “सवाने अमरी” सुनाई गई। एक दिन राम,कृष्ण,बुद्ध,महावीर आदि पर भाषण हुए।और एक दिन स्वामी विरजानंद और साईं मियाँ महमूदन शाह के व्याख्यान हुए। इस सभा में नाना साहब,अजीमुल्ला और बहादुर शाह के पुत्र एक पुत्र भी मौजूद थे। स्वामी विरजानंद सरस्वती ने इस सभा में जो कुछ कहा उसका सारांश मीर मुश्ताक़ मिरासी ने पेश किया है। यह भाषण एक ऐतिहासिक दस्तावेज है।

स्वामी विरजानंद सरस्वती ने कहा, “ आज़ादी जन्नत है और गुलामी दोज़ख है।अपने मुल्क की हुकूमत ग़ैरमुल्क की हुकूमत के मुकाबले में हज़ार दर्जे बेहतर है। दूसरों की गुलामी हमेशा बेइज्जती और बेशरमी का बायस है।हमें किसी कौम से और किसी मुल्क से कोई नफ़रत नहीं है। हम तो ख़लके –खुदा बहबूदे के लिए खुदा से रोज़ दुआ माँगते हैं मगर हुकमराह कौम ख़ासकर फिरंगी जिस मुल्क में हकुमत करते हैं उस मुल्क के बाशिंदों के साथ इन्सानियत का बरताव नहीं करते और कितनी ही अच्छाई की तारीफ करें मगर उस मुल्क के बाशिंदों के साथ मवेशियों से गिरा हुआ बरताव करते हैं। खुदा की खलकत में सब इन्सान भाई-भाई हैं मगर ग़ैर-मुल्की हुकमराह क़ौम इन्हें भाई न समझ कर गुलाम समझती है। किसी भी मज़हब की किताब में ऐसा हुक्म नहीं है कि अश् रफुल्मख़लूकात के साथ दग़ा की जावे और अल्लाह के हुक्म के खिलाफवरजी की जावे। इस वास्ते मातहत लोगों का न कोई ईमान है न कोई शान है। फिरंगियों में बहुत-सी अच्छी बात है मगर सियासी मसले में आकर वह अपने कौल-फेल को न समझकर फौरन बदल जाते हैं और अच्छाई और नेक सलाह को फौरन ठुकरा देते हैं। इस(की) असिल वजूहात यह है कि हमारे मुल्क को वह अपना वतन नहीं समझते हैं। हमारे मुल्क का बच्चा-बच्चा उनकी ख़ैरख़वाही का दम भरे फिर भी अपने वतन के कुत्ते को इन्सानों से अच्छा समझते हैं। यह सब कर्मा (?) का बायस है, इन्हें अपने ही वतन से मोहब्बत है,इसलिए मैं सब बाशिंदगान हिंद से इलतजा करता हूँ कि जितना वह अपने मज़हब से मुहब्बत करते हैं उतना ही इस मुल्क के हर इन्सान का फ़र्ज़ है कि वह वतनपरस्त बने और मुल्क के हर बाशिंदे को भाई-भाई जैसी मोहब्बत करे,तब तुम्हारे दिलों के अंदर वतनपरस्ती आ जाएगी,तो इस मुल्क की गुलामी यहाँ से खुद-ब-खुद जुदा हो जाएगी।हिंद के रहने वाले सब आपस में हिंदी भाई हैं और बहादुरशाह हमारा शाहंशाह है।” यह समूचा प्रसंग विश्लेषित करते हुए रामविलास शर्मा ने लिखा है कि इस “भाषण में कहीं पर भी अँग्रेजों को काफिर या म्लेच्छ कहकर उनके विरुद्ध मज़हबी जोश उभारने का प्रयत्न नहीं है।एशियाइयों और खासकर ‘हिंदुस्तान’ के ‘काले’ आदमियों के प्रति अँग्रेज जब-तब नस्लपंथी घृणा प्रकट करते रहते थे,उसकी प्रतिक्रियास्वरुप गोरों के प्रति घृणा का भाव नहीं है।सारी बातें विदेशियों की दासता से मुक्त करने की भावना से प्रेरित हैं।परोक्ष रुप से वक्ता के मन में विश्वबंधुत्व और सर्वमानवता के हित के भाव विद्यमान हैं।”








नया जमाना ब्लॉग के कुछ तथ्य


मैंने जब “नया जमाना” ब्लॉग पर लिखना शुरु किया तो जानता नहीं था कौन पढ़ेगा, यह भी लगता था कि परिचित ही पढ़ेंगे,लेकिन धीरे धीरे भ्रम टूटता गया। नया गूगल प्रदत्त आंकड़ा है कि “नया जमाना” ब्लॉग के प्रति माह अमेरिका में 7320पन्ने पढ़े जाते हैं,भारत में 1381,दक्षिण कोरिया में 310,रुस में 112,जर्मनी में 14,आस्ट्रेलिया में 12,फ्रांस में 9,थाईलैंड और वेनेजुएला में प्रति माह 7-7 पन्ने पढ़े जाते हैं।

अब तक कुल मिलाकर भारत में 174633 पन्ने पढ़े गए हैं। अमेरिका में 63661 पन्ने, रुस में 4930, संयुक्त अरब अमीरात में 1780, जर्मनी में 1625,दक्षिण कोरिया में 1222, यूक्रेन में 1167, फ्रांस में 1048,आस्ट्रेलिया में 830,स्पेन में 785 पन्ने पढ़े गए हैं।

सबसे ज्यादा पढ़े गए लेख हैं, 1.“ कामशास्त्र की भारतीय परंपरा में सेक्स” यह लेख 6528 बार पढ़ा गया है,2. “नारायण सुर्वे की मराठी कविता” को 6119बार पढ़ा गया है, 3. “इंटरनेट के 40 साल..संचार क्रांति से भारत कोसों दूर ” लेख को 4775 बार पढ़ा गया ,4. “कामसूत्र में कामुकता के खेल” लेख को 4486 बार पढ़ा गया है,5.“उत्तर आधुनिकता में फैशन से अनजाने और फैशन में डूबे लोग” लेख को 1883 बार पढ़ा गया ,6.“सेक्स के प्रति ‘कामसूत्र’ का नजरिया” 1883 बार पढ़ा गया,6. “सऊदी अरब की औरतों का नारकीय जीवन” 1438बार पढ़ा गया,8. “कामुकता का जनोत्सव है बाबा रामदेव फिनोमिना” यह लेख 1149 बार पढ़ा गया, 9. “जेएनयू में हिन्दी-उर्दू के दिग्गजों का महामिलन” यह लेख 1059 बार पढ़ा गया,10. “पोर्नोग्राफी में ‘Fuck Me’का नारा ‘Hate Me’ का जनक है” लेख 1005 बार पढ़ा गया है। कभी समय मिले तो आप भी नया जमाना ब्लाग पर जाएं।

सोमवार, 16 नवंबर 2015

दयानन्द सरस्वती और मूर्तिपूजा-


         दयानन्द सरस्वती की समाजसुधार आंदोलन में जो भमिका रही है वह हम सब जानते हैं लेकिन 1857,58 और 59 में तीन साल तक वे कहां रहे और क्या करते रहे ,यह हम सब कम ही जानते हैं। इस प्रसंग में स्वामी दयानन्द ने यही लिखा कि मैं “मैं इन तीन वर्षों में नर्मदा तट पर घूमता रहा।” कुछ इतिहासकार यह मानते हैं कि वे इस दौर में स्वाधीनता संग्राम के लिए आम जनता को संगठित करने का काम कर रहे थे। इस संदर्भ में वासुदेव वर्मा की लिखी किताब “ अठारह सौ सत्तावन और दयानन्द सरस्वती” महत्वपूर्ण कृति है। मूर्तिपूजा और सोमनाथ मंदिर के प्रसंग में दयानन्द सरस्वती ने “ सत्यार्थ प्रकाश” में लिखा है,एक अंश है ,पढ़ें, एक प्रश्न सोमनाथ मंदिर के बारे में था, “ देखो ! सोमनाथ जो पृथिवि पर रहता था और बड़ा चमत्कार था। क्या यह भी मिथ्या बात है ?” उत्तर ,”हाँ मिथ्या है सुनो ! नीचे-ऊपर चुंबक पाषाण लगा रखे थे।उसके आकर्षण से वह मूर्ति अधर खड़ी थी-जब ऊपर की छत टूटी तब चुंबक पाषाण पृथक होने से मूर्ति गिर पड़ी”।(सत्यार्थ प्रकाश,दिल्ली,1954,पृ.334) इसके बाद अगला प्रश्न है, “ द्वारकाजी के रणछोड़ की जिसने ‘नरसी महता’ के पास हुंड़ी भेज दी और उसका ऋण चुका दिया इत्यादि बात भी क्या झूठ है ?” उत्तर,” किसी साहूकार ने रुपये दे दिए होंगे ।किसी ने झूठा नाम उड़ा दिया होगा कि श्रीकृष्ण ने भेजे।जब संवत्1914 के वर्ष में तोपों के मारे मंदिर-मूर्तियाँ अंग्रेजों ने उड़ा दी थीं तब मूर्ति कहाँ गई थी ? प्रत्युत बाघेर लोगों ने जितनी वीरता की और लड़े;शत्रुओं को मारा परंतु मूर्ति एक मक्खी की टाँग भी न तोड़ सकी। जो श्रीकृष्ण के सदृश कोई होता तो इनके धुर्रे उड़ा देता और ये भागते फिरते।भला यह तो कहो कि जिसके रक्षक मार खाए उसके शरणागत क्यों न पीटे जाएँ।”










तीन लेखकों की हत्या पर संसद मौन क्यों है ?

     श्याम बेनेगल साहब सवाल यह है कि एवार्ड लौटाना समाधान नहीं है तो लेखक-बुद्धिजीवी क्या करें ? यहां तक कि राज्यसभा में तो कई लेखक,सिनेकर्मी आदि सदस्य हैं उन्होंने भी पहल करके राज्यसभा में 3लेखकों की हत्या की निंदा करने वाला प्रस्ताव तक पेश नहीं किया , सरकार ने कोई पहल लेखकों से बात करके समाधान निकालने के लिए नहीं की । क्यों पीएम से लेकर गृहमंत्री तक हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं?

यदि राष्ट्रपति को लगता है कि लेखकों को इनाम को सहेजकर रखना चाहिए तो वे कम से कम केन्द्र सरकार को सीधे कह सकते हैं कि लेखकों से बुलाकर बात करो और उनको सुरक्षा का भरोसा दो।

क्या लेखक -बुद्धिजीवी चुप रहें और पिटते रहें ? अफसोस यह है कि 3 लेखकों की हत्या पर न तो यूपीए सरकार जागी और न एनडीए सरकार की अब तक नींद खुली है,अफ सोस की बात यह है कि संसद ने 3लेखकों की सरेआम हत्या की निंदा करते हुए एक प्रस्ताव तक पास नहीं किया है। देश के लेखक किस तरह विश्वास करें कि उन पर हमले नहीं होंगे,अभी तक हमलावर संगठनों पर पाबंदी नहीं लगी है।



मोदी सरकार एवार्ड वापसी पर किस तरह सोचती है इसका साक्षात प्रमाण है केन्द्रीयमंत्री वी के सिंह का बयान,यह बयान लेखकों का सरेआम अपमान है। खासकर उन लेखकों का जो प्रतिवाद में एवार्ड लौटा रहे हैं,क्या इस मंत्री को कोई सरकार से हटा सकता है ,क्या इस तरह के गैर-जिम्मेदार बयान पर आपत्ति करके पीएम-राष्ट्रपति कोई बोलेगा ,जी नहीं, इस मामले में सारे स्वर-सारे रंग मिले हुए हैं,वरना एक मंत्री की बेबुनियाद आरोप लगाने की हिम्मत कैसे हुई कि वह यह कहे कि लेखकों ने पैसा लेकर असहिष्णुता की बहस छेड़ी है,मंत्री या तो प्रमाण दें या फिर लेखकों से माफी मांगे। यह विभिन्न राजनीतिक दलों और मीडिया की भी जिम्मेदारी है कि वीके सिंह को प्रमाण देने के लिए कहे या फिर माफी मांगने के लिए कहे। केन्द्रीय मंत्री का यह बयान असहिष्णुता की कोटि में ही आता है।

लेखक और राष्ट्रवाद

भारत में अनेक लोग हैं जो लेखक को सत्ता,राष्ट्र आदि से बंधा हुआ देखना चाहते हैं,लेकिन लेखक तो इनमें से कोई बंधन पसंद नहीं करता। मसलन् ,भारत जब गुलाम था तो उस समय ब्रिटिश गुलामी के खिलाफ अनेक अंग्रेज लेखकों ने अपनी सरकार के खिलाफ लिखा। इनमें बायरन का नाम भी आता है।वह भारत की ओर देख रहे थे।1757 में पलासी की लड़ाई के बाद अंग्रेज अपना शासन विस्तार करते चले गए,वे लगातार नए-नए राष्ट्रों को गुलाम बना रहे थे। अंग्रेज लेखक जानते थे कि ब्रिटिश शासन भारत मेंगुलामी स्थापित कर रहा है।
वे एक सभ्य देश का विकास समाप्त कर रहे हैं।वे भारत को सदियों पीछे ठेल रहे हैं। इसी संदर्भ में प्रसिद्ध अंग्रेजी कवि बायरन ने 1811 में ' द कर्स ऑफ मिनर्वा' नामक कविता लिखी और इस कविता में मिनरवा नाम की देवी इंगलैंडवासियों को शाप देती है। अंग्रेजों को स्वाधीनता प्राप्त हुई है लेकिन वे अपनी स्वाधीनता का दुरुपयोग कर रहे हैं,वे दूसरों को गुलाम बना रहे हैं, वे एक दिन अवश्य विद्रोह करेंगे ।इस कविता के साथ 1857 के संग्राम को याद करें तो ऐसा लगेगा कि बायरन महान भविष्यद्रष्टा हैं-1857 में जो कुछ घटित हुआ उसका पूर्वाभास 1811 की कविता में है-
Look to the East ,where Ganges' swarthy race
Shll shake your tyrant empire to its base;
Lo ! there Rebellion rears her ghastly
And glares the Nemesis of native dead;
Till Indus roll a deep purpureal flood
And claims his long arrear of northern blood,
So may ye perish ! Pallas, when she gave
Your free born rights, forbade ya to enslave
मिनरवा अंग्रेजों से कहती है - "पूरब की तरफ देखो। गंगा के किनारे ये जो काले आदमी हैं,वे तुम्हारे अत्याचारी साम्राज्य को उसकी जड़ सहित हिला देंगे।देखो, वह विद्रोह दहक रहा है। सिंधु नदी लाल रक्त की धारा जैसी बह रही है । उत्तर के निवासियों का रक्त वह मांगती रही है,वह बहुत पुरानी माँग अब पूरी हो रही है।इसी तरह तुम्हारा नाश हो।पैलास देवी ने जब तुम्हें स्वाधीन नागरिकों के अधिकार दिए थे,तब उसने निषेध किया था कि दूसरों को दास मत बनाना।" बायरन की इन पंक्तियों में अंग्रेज शासकों के प्रति तीव्र रोष व्यक्त हुआ है।

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मेरा बचपन- माँ के दुख और हम

         माँ के सुख से ज्यादा मूल्यवान हैं माँ के दुख।मैंने अपनी आँखों से उन दुखों को देखा है,दुखों में उसे तिल-तिलकर गलते हुए देखा है।वे क...