मंगलवार, 6 अक्टूबर 2009

चीन की साठवीं बरसी पर वि‍शेष - समाजवाद नहीं सदभावना समाज है चीन में

चीनी समाज में जिस तरह के परिवर्तन आए हैं उन्हें पश्चिम और चीन के संगम का नाम दिया जा सकता है। पश्चिम के नाम पर आप चीनी जनता में कुछ भी बेच सकते हैं। पश्चिम के मिथ के प्रति आकर्षण और उसके पीछे पागल जैसी दीवानगी ने आज चीनी चेहरे पर पश्चिमी मुस्कान पैदा कर दी है। पश्चिमी चीजों की जबर्दस्त भूख है। मजेदार बात यह है चीनी लोगों को पश्चिमी माल अच्छे लगते हैं किंतु पश्चिमी विचार जैसे लोकतंत्र,मानवाधिकार, अभिव्यक्ति की आजादी, पर्यावरण जागरूकता आदि पसंद नहीं हैं। इस तरह चीन के माल का संसार पश्चिमी है,चेहरे और समाज की रौनक पश्चिमी है किंतु विचारों की दुनिया चीनी है। कम्युनिस्ट पार्टी की है। यह भी कह सकते हैं चीन का शरीर पश्चिमी है किंतु दिमाग कम्युनिस्ट है।
दिल पश्चिमी है किंतु विश्वास चीनी हैं। आत्मा और शरीर ,मन और जीवन के बीच, पश्चिम और कम्युनिस्ट के बीच में , किया गया श्रम विभाजन इस बात को दरशाता है कि पश्चिमी भोग व्यवस्था हो किंतु जरूरी नहीं है कि जनतंत्र भी हो। जरूरी नहीं है कि उपभोक्तावाद हो किंतु राजनीतिक तौर पर लोकतंत्र भी हो। उपभोक्तावाद राजनीति में अधिनायकवाद को पुष्ट करता है। अ-राजनीतिकरण को बढ़ावा देता है। यही वह बिंदु है जहां पर चीन की कम्युनिस्ट विचारधारा पश्चिमी उपभोक्तावाद के साँचे में एकदम फिट बैठती है। उपभोक्तावाद और अधिनायकवाद एक दूसरे के बंधु हैं। इनमें बैर नहीं है।
चीन के शासकतंत्र का मानना हैकि वे एक ऐसा समाज बनाने की कोशिश कर रहे हैं जो न तो उपभोक्तावादी समाज है और न सूचना समाज है और न परवर्ती पूंजीवादी समाज है। इस समाज को चीन के शासकों ने '' हारमोनियस समाज'' यानी 'सद्भावना समाज' की संज्ञा दी है। सन् 2004 में कम्युनिस्ट पार्टी की 16वीं केन्द्रीय कमेटी के चौथे विशेषाधिवेशन में 'सद्भावना समाज' का नाम राष्ट्रपति हू जिनताओ ने दिया। यही मॉडल चीनी समाज के विकास की धुरी है। यही मॉडल सामाजिक और घरेलू नीतियों के विकास की धुरी है। 'सदभावना समाज' में चीन की कम्युनिस्ट पार्टी ने लोकतंत्र,बौध्दिक और सर्जना के क्षेत्र में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की धारणाओं को शामिल किया है। हू जिनताओ द्वारा प्रतिपादित 'सदभावना समाज' में निम्नलिखित चीजें शामिल हैं-
1. टिकाऊ,तेज और संयुक्त आर्थिक विकास.
2. ''समाजवादी लोकतंत्र'' का विकास
3. कानून का शासन
4.विचारधारात्मक और एथिकल विकास पर जोर
5. सामाजिक न्याय और समानता को बनाए रखना
6. '' बेहतरीन सामाजिक प्रबंधन व्यवस्था'' का निर्माण जिससे जनता के आन्तरिक अन्तर्विरोधों का प्रबंधन किया जा सके।
7. पर्यावरण संरक्षण
'सद्भावना समाज' की मुश्किल यह है कि इसका चीन के सामयिक यथार्थ से कोई संबंध नहीं है। 'सद्भावना समाज' के लिए जरूरी है कि चीनी राष्ट्रवाद का अंत हो। लोकतंत्र की स्थापना हो। चीन की कम्युनिस्ट पार्टी की चालक शक्ति राष्ट्रवाद है। चीनी राष्ट्रवाद के आधार पर ही विदेशी ताकतों खासकर अमरीका और जापान के प्रति गुस्सा अभिव्यक्ति होता रहा है। हाल ही में 1 मई 2008 को फ्रांसीसी मालों के बहिष्कार का अभियान चलाया गया और जिन दुकानों पर फ्रांसीसी सामान बिक रहा था उनके बाहर जमकर प्रदर्शन हुए हैं। चीनी समाज की दूसरी बड़ी बाधा है पुराने पारिवारिक ढ़ांचे का बने रहना।
परिवार का एक मूल्य के रूप में बरकरार रहना ,बच्चों की जिम्मेदारी के भावबोध का बचे रहना,किसी भी तर्क के साथ मौजूदा विकास की गति के साथ मेल नहीं खाता। त्रासद स्थिति यह है कि मजदूर शहरों में रहते हैं। उनके पास परिवार को रखने की न्यूनतम जगह तक नहीं है। मजदूरों को अपने परिवारीजनों को खासकर बुजुर्गों को गांव में ही रखना होता है। यानी परिवार की ग्राम्य संरचनाओं का बचे रहना और उसे सरकारी संरक्षण और नीति के आधार पर बचाए रखना एब्नार्मल है। आज चीन में सामाजिक'आर्थिक विकास जिस गति से हो रहा है उसमें पुराने किस्म का राष्ट्र,राष्ट्रवाद और परिवार किसी भी तरह फिट नहीं बैठता। सद्भाव समाज की बुनियादी समस्या है नागरिक समाज का अभाव। चीन में नागरिक जिंदगी का विकसित न होना पाना। आमतौर पर चीनी लोग अपने परिवार के बाहर के लोगों की मदद नहीं करते। अन्य के बारे में नहीं सोचते। माओ युग में मनुष्य के प्रति जिस गहरी अनास्था के बीज बोए गए थे वे अभी समाज में मनुष्य के अमानवीय बर्बर व्यवहार के रूप में फलफूल रहे हैं। मनुष्य के प्रति गहरी अनास्था,जनता के प्रति विश्वास के अभाव के कारण सबसे बड़ी कुर्बानी हुई है मानवीय सहानुभूति और परोपकार की।
चीन में इन दिनों एक विलक्षण चीज देखने में आ रही है चीनी लोग अपने देशी चीनी भाई की बजाय विदेशी पर ज्यादा विश्वास करने लगे हैं। गलत नीतियों के कारण सामाजिक जीवन में बंधुत्व और एकता का मूल्य बुरी तरह क्षतिग्रस्त हुआ है। बंधुत्व और एकता ये दो पुराने कन्फयूशियस मूल्य हैं। कनफयूशियस के यहां मनुष्य के ऊपर भी अगाध आस्था थी। मानवीय मूल्यों पर कनफयूशियस दर्शन मानवीय मूल्यों पर जोर देता है। माओ युग में कपनफयूशियस दर्शन को जड़ से उखाड़ फेंक देने के चक्कर में मनुष्य की धारणा को ही नष्ट कर दिया गया।
चीन में विगत पांच सालों में 'कारपोरेट सोशल रेस्पॉसविलटी' की धारणा पर जोर दिया जा रहा है। इसके अलावा अनेक चैरिटी ग्रुप भी उभरकर आए हैं। खासकर चीन में मानसिक और शारीरिक तौर पर अपाहिज और आवारा बच्चों का बड़ा समूह है उनकी देखभाल की व्यवस्था की जरूरत है। एक अनुमान के अनुसार चीन में इस समय दस लाख से भी ज्यादा चैरीटेबिल संगठन कार्यरत हैं।
चीन के आंतरिक संसार में झांककर देखें तो बड़ी ही भयानक तस्वीर निकलकर सामने आती है। चीन में कहीं पर भी शांति नहीं है। जनसंख्या का विस्फोट समूचे समाज को अशांत किए है। समूचा समाज जनसंख्या के शोर में गुम है। ज्यादातर चीनी युवा क्विज टाइप शिक्षा व्यवस्था में बड़े हो रहे हैं। उनमें तोतारंटत की भावना प्रबल रूप में घर कर गयी है। पाठ रटना और परीक्षा देना यही दो मुख्य लक्ष्य हैं। युवाओं के पास आत्माभिव्यंजना के लिए बहुत ही कम समय होता है। पाठयक्रम और परीक्षा का ढांचा कुछ इस तरह बनाया गया है कि विद्याार्थियों के पास बहुत कम खाली समय होता है। खाली समय में युवा लोग कम्प्यूटर पर व्यस्त रहते हैं, गेम खेलते हैं अथवा टीवी देखते हैं अथवा एमपी 3 प्लेयर सुनते हैं। ये चीजें एकदम लत की तरह फैल गयी हैं। युवा लोग पूरी तरह कम्प्यूटर की लत के शिकार हैं और वर्चुअल विज्ञानवाद की पकड़ में जा चुके हैं। उनकी आंतरिक मानवीय संवेदनशीलता पूरी तरह नष्ट हो चुकी है। सरकार भी वर्चुअल विज्ञानवाद को बढ़ावा दे रही है।
लाउ नी केउंग ' ने '' हारमोनियस सोसायटी विल इम्पेक्ट दि वर्ल्ड ''में लिखा है कि 'सदभावना समाज' की अवधारणा आधिभौतिक आयाम को अपने अंदर समेटे हुए है। '' व्यक्ति का आतंरिक सदभाव अंतत: मानव जाति और प्रकृति के बीच सद्भाव को पैदा करता है। 'सदभाव समाज' की अवधारणा में कनफयूशियस,बुध्द और ताओ के विचारों के अंश भी चले आए हैं। खासकर कनफयूशियस दर्शन की नैतिकता,संस्कृति और आध्यात्मिकता चली आई है। माओ और कम्युनिस्ट पार्टी के रास्ते पर चलने के कारण चीनी समाज में एक-दूसरे के प्रति सहानुभूति और संवेदनात्मकता पूरी तरह खत्म हो गयी। नैतिकता और अध्यात्मिकता का समूचा तंत्र नष्ट हो गया जिसका दुष्परिणाम निकला कि अब न मनुष्यों में आपसी सद्भाव और संवेदना बची है और न प्रकृति और पशुओं के प्रति सद्भाव और संवेदना बची है।
व्यक्ति और व्यक्ति के बीच में जबर्दस्त अलगाव माओ युग में पैदा हुआ और अब इस अलगाव ने अन्य क्षेत्रों में अपने पैर पसार दिए हैं। अब प्रकृति के साथ मनुष्य का पूरी तरह अलगाव व्यक्त हो रहा है। समूचा प्राकृतिक वातावरण नष्ट हो गया है। माओ के जमाने में ज्यादा से ज्यादा सामाजिक नियंत्रण हासिल करने के लिए लोग एक-दूसरे के खिलाफ पार्टी और प्रशासन तंत्र का इस्तेमाल करते थे। एक-दूसरे के खिलाफ संघर्ष का आलम इस हद तक पहुँच गया कि अपने परिवारीजनों के खिलाफ ही पार्टी तंत्र का इस्तेमाल करने लगे थे। सब कुछ पार्टी दफतरों से संचालित होता था। पार्टी ही महान थी, माओ महान थे बाकी सब अर्थहीन था। माओ और पार्टी के विचार ने चीनी समाज को गहरे सामाजिक अलगाव,संवेदनहीनता और पराएपन में डुबो दिया। सामाजिक जीवन का अलगाव कालान्तर में प्रकृति, इतिहास, धर्म, परंपरा, माता- पिता,बूढे और स्त्री के प्रति अलगाव में तब्दील हो गया।
आश्चर्य की बात है अलगाव समाजवादी फिनोमिना नहीं है। यह तो पूंजीवादी फिनोमिना है। किंतु चीन और सोवियत संघ के अनुभव बताते हैं कि समाजवाद में भी अलगाव को व्यापक रूप में देखा जा सकता है। चीन में माओ युग में अलगाव था सामूहिकता के साथ। सवाल उठता है सामूहिक उत्पादन और सामूहिक निर्माण में लगे लोग कैसे बेगानेपन के शिकार हो सकते हैं ? कैसे एक-दूसरे के प्रति संवेदनाहीन हो सकते हैं ? सवाल यह है कि यह कैसी कम्युनिस्ट सामूहिकता है जिसमें सामाजिक संवेदनाओं का अभाव है। व्यक्ति का व्यक्ति के प्रति प्रेम और स्नेह का अभाव है।

सोमवार, 5 अक्टूबर 2009

भारत का कारपोरेट लोकतंत्र में रूपान्‍तरण

हरि‍याणा वि‍धानसभा चुनावों में वि‍भि‍न्‍न दलों के द्वारा जि‍स तरह के प्रत्‍याशी खड़े कि‍ए गए हैं उससे एक चीज साफ है कि‍ अब लोकतंत्र गरीबों का खेल नहीं है। लोकतंत्र में वही प्रत्‍याशी खड़ा हो सकता है जो धनी हो अथवा धनी दल का उम्‍मीदवार हो। यह लोकतंत्र के कारपोरेट लोकतंत्र में रूपान्‍तरि‍त होने की प्रक्रि‍या का संकेत है। जो लोग यह भ्रम पाले हैं कि‍ देश में 'आम आदमी' का लोकतंत्र है उन्‍हें अब कम से कम इस भ्रम से बाहर आ जाना चाहि‍ए। लोकतंत्र में हि‍स्‍सेदारी के लि‍ए जि‍स तरह कोई शर्त नहीं है वैसे ही उम्‍मीदवार के बारे में भी कोई शर्त नहीं है। कोई भी नागरि‍क उम्‍मीदवार हो सकता है, वह अमीर हो या गरीब हो। अमीर जब लोकतंत्र को चलाएंगे तो शासन कैसा होगा ? प्रशासन का अनुभव कैसा होगा ? लोकतांत्रि‍क हि‍स्‍सेदारी की शक्‍ल क्‍या होगी ? लोकतांत्रि‍क संरचनाओं का भवि‍ष्‍य क्‍या होगा ? इत्‍यादि‍ सवालों पर भारतीय परि‍प्रेक्ष्‍य में गंभीरता से वि‍चार करने की जरूरत है।
हरि‍याणा वि‍धानसभा के लि‍ए वि‍भि‍न्‍न दलों के द्वारा जो प्रत्‍याशी खड़े कि‍ए गए हैं उनमें सबसे ज्‍यादातर करोड़पति‍ कांग्रेस ने खड़े कि‍ए हैं। 'आम आदमी' का नारा लगाने वाली कांग्रेस ने 90 सदस्‍यीय वि‍धानसभा के लि‍ए 70 करोड़पति‍ खड़े कि‍ए हैं। दूसरी ओर कांग्रेस के वि‍रोध में खड़े दलों ने भी करोड़पति‍ प्रत्‍याशि‍यों को खड़ा कि‍या है। 'नेशनल इलेक्‍शन वाच' नामक संस्‍था ,इसके देश में तकरीबन 1200 स्‍वयंसेवी संगठन सदस्‍य हैं, के द्वारा जारी आंकड़े बताते हैं कि‍ मुख्‍य राजनीति‍क दलों ने आधे से ज्‍यादा सीटों पर करोड़पति‍ प्रत्‍याशी खड़े कि‍ए हैं। इनके पास एक करोड से ज्‍यादा की संपत्‍ति‍ है। चुनाव आयोग में उम्‍मीदवारी का पर्चा दाखि‍ल करने वाले उम्‍मीदवारों में से 489 उम्‍मीदवार करोडपति‍ हैं। जि‍न दलों ने करोडपति‍ उम्‍मीदवार खड़े कि‍ए हैं वे हैं कांग्रेस,भाजपा, बसपा, राष्‍ट्रीय लोकदल,समाजवादी पार्टी। कांग्रेस ने 90 में से 72 करोड़पति‍ उम्‍मीदवार खड़े कि‍ए हैं। आंकडे बताते हैं कि‍ कांग्रेस उम्‍मीदवारों की औसत संपत्‍ति‍ है 5.59 करोड रूपये, भारतीय राष्‍ट्रीय लोकदल के उम्‍मीदवारों की औसत संपत्‍ति‍ है 3.42 करोड,हरि‍याणा जनहि‍त पार्टी 3.03 करोड़, भाजपा 2.23 करोड़, बसपा 2.08 करोड रूपये। कांग्रेस ने 80 प्रति‍शत करोड़पति‍ उम्‍मीदवार खड़े कि‍ए हैं।
वि‍गत वि‍धानसभा के 42 सदस्‍य दोबारा चुनाव लड रहे हैं। इनकी संपत्‍ति‍ में वि‍गत पांच सालों में औसतन 388 फीसदी की बढोत्‍तरी हुई है। औसतन 4.8 करोड रूपये की संपत्‍ति‍ अर्जित की है। एक उम्‍मीदवार ने तो वि‍गत पांच सालों में 5,500 प्रति‍शत संपत्‍ति‍ पैदा की है।
तकरीबन 50 करोडपति‍ उम्‍मीदवार ऐसे हैं जि‍नके पास करोडों की संपत्‍ति‍ है लेकि‍न इन्‍कम टैक्‍स का 'पेन' नम्‍बर तक नहीं है। जबकि‍ सभी बडे वि‍त्‍तीय लेन-देन के लि‍ए 'पेन' कार्ड नम्‍बर का होना कानूनन जरूरी है। कांग्रेस ने 72,राष्‍ट्रीय लोकदल 56,भाजपा 41,बसपा 29 और हरि‍याणा जनहि‍त पार्टी ने 44 करोडपति‍ उम्‍मीदवारों को खड़ा कि‍या है। उल्‍लेखनीय है वि‍गत वि‍धानसभा चुनाव में कुल उम्‍मीदवारों में मात्र 19 प्रति‍शत करोडपति‍ उम्‍मीदवार थे,जबकि‍ इसबार 50 फीसद करोडपति‍ उम्‍मीदवार चुनाव लड रहे हैं। इस बार के चुनाव में फरीदाबाद जि‍ले में 45,गुडगांव 37 और हि‍सार जि‍ले में 37 उम्‍मीदवार चुनाव लड़ रहे हैं। हरि‍याणा में 28 उम्‍मीदवारों पर आपराधि‍क मुकदमे चल रहे हैं। जबकि‍ महाराष्‍ट्र में आपराधि‍क पृष्‍ठभूमि‍ के 132 उम्‍मीदवार चुनाव लड रहे हैं। कहने का तात्‍पर्य यह है कि‍ महाराष्‍ट्र में आपराधि‍क पृष्‍ठभूमि‍ के ज्‍यादा उम्‍मीदवार चुनाव लड रहे हैं जबकि‍ हरि‍याणा में करोडपति‍ ज्‍यादा संख्‍या में चुनाव लड रहे हैं। हरि‍याणा में 52.22 प्रति‍शत करोडपति‍,महाराष्‍ट्र में 37.50 प्रति‍शत, अरूणाचल प्रदेश में 28.33 प्रति‍शत करोडपति‍ उम्‍मीदवार चुनाव लड रहे हैं। दूसरी ओर अरूणाचल प्रदेश में एक भी महि‍ला उम्‍मीदवार चुनाव मैदान में नहीं है,जबकि‍ महाराष्‍ट्र में 4 प्रति‍शत,हरि‍याणा में मात्र 12प्रति‍शत औरतें चुनाव मैदान में हैं। इससे यह भी पता चलता है कि‍ हमारे मीडि‍या प्रचार अभि‍यान का कम से कम राजनीति‍क दलों के ऊपर एकदम राजनीति‍क असर नहीं होता। मीडि‍या का जब राजनीति‍क दलों पर असर नहीं होता तो आम जनता पर कि‍तना असर होता होगा, इसका आसानी से अनुमान लगाया जा सकता है। समग्रता में देखें तो मीडि‍या के द्वारा अमीर व्‍यक्‍ति‍ को हमेशा आदर्श पुरूष के रूप में पेश कि‍या जातस है, अपराधी का महि‍मामंडन कि‍या जातस है और औरतों को दोयमदर्जे के नागरि‍क के रूप में रूपायि‍त कि‍या जाता है,ऐसी स्‍थि‍ति‍ में अमीर,अपराधी और पुरूष को चुनावी जंग के मैदान से बेदखल करना संभव ही नहीं है।

लालगढ़-बीनपुर में माओवादी जबरि‍या धन वसूली

लालगढ़ का पुलि‍सि‍या मीडि‍या ट्रॉयल जारी है। कोलकाता से प्रकाशि‍त ‘दि‍ टेलीग्राफ’(5 अक्‍टूबर 2009) ने पुलि‍स के हवाले से खबर दी है कि‍ छत्रधर महतो के नेतृत्‍व वाली ‘पुलि‍स दमन वि‍रोधी कमेटी’ लालगढ-बीनपुर इलाके के लोगों से जबरि‍या मासि‍क चंदा वसूल करती थी। वि‍भि‍न्‍न केटेगरी के लोगों से अलग अलग राशि‍ वसूल की जाती थी। वि‍भि‍न्‍न मदों में मासि‍क धन वसूली का काम वि‍भि‍न्‍न लोगों के जि‍म्‍मे था। कुल मि‍लाकर इलाके से 80 लाख रूपये वसूल कि‍ए जाते थे।
सूची इस प्रकार है-
1. सरकारी सहायता प्राप्‍त 16 हाईस्‍कूल शि‍क्षकों से मासि‍क – 15 लाख रूपये
2. दस डाकघरों के कर्मचारि‍यों से मासि‍क – 5 लाख रूपये
3. इलाके के दस बैंकों के कर्मचारि‍यों से मासि‍क – 5 लाख रूपये
4. वनवि‍भाग में कार्यरत दो अफसरों से मासि‍क – 2 लाख रूपये
5. दस पंचायत समि‍ति‍ के दफ्तरों में कार्यरत कर्मचारि‍यों से मासि‍क- 2 लाख रूपये
6. 78 शि‍शु शि‍क्षा केन्‍द्रों से मासि‍क – 50 हजार रूपये
7. 6 माध्‍यमि‍क शि‍क्षा केन्‍द्रों से मासि‍क – 20 हजार रूपये
8. 5 सार्वजनि‍क स्‍वास्‍थ्‍य केन्‍द्रों सेमासि‍क – 25 हजार रूपये
9. दूरसंचार एक्‍सचेंज में कार्यरत कर्मचारि‍यों से मासि‍क – 20 हजार रूपये
10. 10 इंटीग्रेटेड बाल वि‍कास योजना केन्‍द्रों में कार्यरत 300 कर्मचारि‍यों से मासि‍क – 40
हजार रूपये फि‍रौती के रूप में वसूल कि‍ए जाते हैं।
पुलि‍स को ये सारे तथ्‍य ‘पुलि‍स दमन वि‍रोधी कमेटी’ के कोषाध्‍यक्ष की गि‍रफ्तारी के बाद जांच के दौरान पता लगे हैं। यह धन वसूली का धंधा लालगढ और बीनपुर इलाके में वि‍गत दस महीनों से चल रहा है। पुलि‍स उन खातों का भी पता लगाने में लगी है जहां यह पैसा जमा होता था। अखबार ने लि‍खा है कि‍ पुलि‍स ने मासि‍क जबरि‍या धन वसूली के जो आंकडे दि‍ए हैं वे पूरी तरह बैंक खातों के आधार पर ही तैयार करके दि‍ए हैं। पुलि‍स का यदि‍ यह दावा सही है तो इसकी समस्‍त जानकारी सबसे पहले अदालत को दी जानी चाहि‍ए। वाम वि‍रोधी अखबार को इस जानकारी को जारी करना क्‍या महज प्रचार अभि‍यान तो नहीं है ? जि‍न खातों के आधार पर यह जानकारी दी गई उन खातों के ब्‍यौरे भी प्रेस में आते और अन्‍य स्रोतों से उसकी पुष्‍टि‍ होती तब ही यह वि‍श्‍वसनीय होता। इसके बावजूद सबसे बड़ी समस्‍या यह है कि‍ लालगढ-बीनपुर इलाके का कोई पीडि‍त व्‍यक्‍ति‍ जब तक ‘पुलि‍स दमन वि‍रोधी कमेटी’ के खि‍लाफ जबरि‍या धन वसूली की शि‍कायत नहीं करता तब तक पुलि‍स जबरि‍या धन वसूली के सवाल पर कानून की नजरों में कुछ भी नहीं कर सकती । क्‍या पुलि‍स के पास जबरि‍या धन वसूली की शि‍कायतें हैं ? शि‍कायतें और चश्‍मदीद गवाह होने पर ‘पुलि‍स दमन वि‍रोधी कमेटी’ के लोगों को घेरा जा सकता है।

रविवार, 4 अक्टूबर 2009

हरीश भादानी की अंति‍मयात्रा : स्‍वतंत्रचेता मुक्‍तपुरूष का महाप्रयाण

जनकवि‍ हरीश भादानी जी को 3 अक्‍टूबर 2009 को बीकानेर में हजारों लोगों ने अश्रुपूरि‍त नयनों से अंति‍म वि‍दाई दी। उनकी अंति‍म वि‍दाई के मौके पर राजस्‍थान के मुख्‍यमंत्री अशोक गहलौत श्रद्धांजलि‍ देने जयपुर से सीधे बीकानेर पहुँचे। हरीश जी की अंति‍म इच्‍छा थी कि‍ उनका अंति‍म संस्‍कार न करके मेडीकल कॉलेज को देह दान कर दि‍या जाए। उनकी इसी इच्‍छा के अनुरूप उनका देहदान बीकानेर मेडीकल कॉलेज को कि‍या गया। यहां पर दो बडे हि‍न्‍दी दैनि‍कों की अंति‍म यात्रा की रि‍पोर्ट पेश करना चाहता हँ। यह रि‍पोर्ट एक महत्‍वपूर्ण पक्ष की ओर ध्‍यान खींचती हैं कि‍ हिंदी में हरीशजी वि‍रल वि‍भूति‍ थे, उन्‍होंने सभी वर्गों और जाति‍यों के लोगों में अपनी साख कायम की थी और पूरा राजस्‍थान उन्‍हें प्‍यार करता था। उनकी शवयात्रा में जि‍स तरह हजारों लोगों का सैलाव उमड़ा वह स्‍वयं में इस बात का प्रतीक है कि‍ वे सचमुच में जनगायक और स्‍वतंत्रचेता, मुक्‍त पुरूष थे। स्‍वतंत्रचेता ,मुक्‍तपुरूष होने के नाते ही उन्‍हें आरएसएस से लेकर सीपीएम,कांग्रेस से लेकर समाजवादी वि‍चारधारा के लोग समान रूप से प्‍यार करते थै। इसके अलावा बड़े पैमाने पर जनसाधारण की उनकी शवयात्रा में उपस्‍थि‍ति‍ को देखकर रवीन्‍द्रनाथ टैगोर की अंति‍म यात्रा का दृश्‍य याद आ रहा था ,रवीन्‍द्रनाथ की मौत पर जि‍स तरह का जनसैलाव कलकत्‍ते में उमड़ा था ठीक वैसा ही जनसैलाव बीकानेर की सड़कों पर 3 अक्‍टूबर 2009 को दि‍खाई दि‍या।
राजस्‍थान पत्रि‍का ने लि‍खा-

”बीकानेर। रोटी नाम सत है, खाये सो मुकत है, मैंने नही कल ने बुलाया है जैसे सैंकडों गीतों के जरिए जागृति की अलख जगाने वाले जन कवि हरीश भादाणी की देह उनकी इच्छा के मुताबिक आज सरदार पटेल मेडिकल कॉलेज प्रशासन को सौंप दी गई। उनका शुक्रवार तडके निधन हो गया था।

भादाणी के पार्थिव शरीर को शहर के छबीली घाटी स्थित उनकी पुत्री कविता व्यास के निवास पर दर्शनार्थ रखा गया था, जहां सैंकडों लोगों ने पहुंच कर पुष्पांजलि अर्पित की। उनकी पुत्री एवं पूर्व सांसद सरला माहेश्वरी के कोलकाता से आज सुबह यहां पहुंचने के बाद उनके पार्थिव शरीर को फूलों से सजी खुली जीप में रख कर देहदान के लिए मेडिकल कॉलेज ले जाया गया।

जन कवि भादाणी की अंतिम यात्रा में भाजपा विधायक गोपाल कृष्ण जोशी, भाजपा के शहर अध्यक्ष नन्दकिशोर सोलंकी सहित साहित्यकार, पत्रकार तथा सभी वर्ग के लोग शामिल थे। शहर के प्रमुख मार्गो से होते हुए देहदान यात्रा जैसे ही सरदार पटेल मेडिकल कॉलेज पहुंची डॉक्टरों ने पंक्तिवद्ध होकर पुष्पांजलि अर्पित की।

भादाणी 76 वर्ष के थे और पिछले कुछ समय से बीमार चल रहे थे। अपनी वसीयत में भादाणी ने देहदान की इच्छा जताई थी। उनके एक पुत्र और तीन पुत्रियां हैं। बिहारी सम्मान, मीरा पुरस्कार सहित अन्य पुरस्कारों से सम्मानित भादाणी आमजन की भाषा में जनता की समस्याओं और विदु्रपताओं पर कविता लेखन लिए प्रख्यात रहे।”
दैनि‍क भास्‍कर ने लि‍खा-

” बीकानेर. जनकवि हरीश भादानी के निधन से संपूर्ण साहित्य जगत को गहरा आघात पहुंचा है। साहित्य से जुड़े व्यक्तियों, राजनीतिज्ञों, समाजसेवियों ने भादानी के निधन पर दुख प्रकट करते उन्हें श्रद्धासुमन अर्पित किए हैं।
जनवादी लेखक संघ के पदाधिकारियों ने भादानी के निधन पर गहरा दुख प्रकट किया है। जिला सचिव नरेन्द्र कुमार शर्मा ने कहा कि एक कवि, गीतकार, लेखक, संपादक, जन साक्षरता, आंदोलनकर्ता के रूप में भादानी के जीवन संघर्ष का विवरण देना सूरज को दीपक दिखाने के समान है।
अजित फाउंडेशन में आयोजित शोकसभा में लक्ष्मीदेवी व्यास ने कहा कि भादाणी के रूप में संपूर्ण भारतवर्ष में साहित्य का अमूल्य रत्न खो दिया है। संस्था अध्यक्ष विजयशंकर व्यास ने जयपुर कार्यालय से दूरभाष पर भादानी के निधन पर शोक जताया। भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्‍सवादी) ने भादानी के निधन को साहित्य जगत के लिए अपूरणीय क्षति बताया है।
देहात भाजपा के अध्यक्ष जालमसिंह भाटी, खींवसिंह भाटी, मीडिया प्रभारी सुनिल बांठिया ने कहा कि भादानी ने अपनी कविताओं को राष्ट्रीयस्तर पर लोकप्रियता दिलाकर बीकानेर का नाम रोशन किया था। भारतीय राष्ट्रीय ट्रांसपोर्ट कर्मचारी फैडरेशन (इंटक) के सचिव हेमन्त किराड़ू, राजस्थान ऑटोचालक यूनियन के अहमद कोहरी, संपतसिह राजपुरोहित, अब्दुल गफूर छोटू व बीकानेर कार जीप टैक्सी यूनियन (इंटक) के मदन पंवार ने भादानी के निधन पर शोक जताया है।
पूर्व पार्षद सरताज हुसैन ने कहा कि भादानी बीकानेर के साहित्यिक जगत के एक अध्याय थे। ब्राrाण अंतरराष्ट्रीय संगठन (युवा) राजस्थान प्रदेश के प्रदेशाध्यक्ष योगेन्द्र कुमार दाधीच ने भादानी के निवास स्थान पर जाकर उनकी पार्थिव देह पर पुष्प अर्पित कर श्रद्धासुमन अर्पित किए। श्री पुष्टिकर पुरोहित भादानी पंचायत ट्रस्ट के अध्यक्ष रमेश कुमार भादानी, शिवशंकर भादानी, गोपालदास भादानी, लालचंद भादानी, गोपाल भादानी, शांतिलाल भादानी, रमेश गहलोत, कमल रंगा ने जनकवि हरीश भदानी को पुष्पांजलि अर्पित की।

पूर्व न्यास अध्यक्ष सोमचंद सिंघवी ने शोक प्रकट करते हुए कहा कि भादानी के निधन से साहित्य जगत को अपूरणीय क्षति हुई है। राजस्थानी साहित्यकार शिवराज छंगाणी ने शोक व्यक्त करते कहा कि वे समर्पित सृजक एवं अत्यंत भावुक-संवेदनशील इंसान थे। राजस्थानी भाषा एवं साहित्य के उन्नयन में उनका अनुपम योगदान रहा।”

हरीश भादानी की अंति‍म यात्रा के बारे में दैनि‍क भास्‍कर ने लि‍खा

'' बीकानेर. शहर की जिन गलियों से वे कभी पैदल ही कंधे पर झोला डाले निकलते दिखाई देते थे, उन्हीं गलियों में आज हजारों लोग उनके साथ थे। फर्क सिर्फ यह था कि आज कोई उन्हें ‘रोटी नाम सत् है, खाये वो मुगत है..’ सुनाने के लिए नहीं कह रहा था बल्कि सभी इस गीत को गा रहे थे।
चिरनिंद्रा में लीन जननायक-जनकवि हरीश भादानी को यह जगाने का यत्न था या भावभीनी विदाई का उपक्रम लेकिन रुंधे कंठों के बाद भी जोशीला स्वर बार-बार यह अहसास करवा रहा था कि हरीश भादानी अमर रहेंगे। अमरता को वरण कर चुके हरीश भादानी की महाप्रयाण यात्रा शनिवार को छबीली घाटी से प्रारंभ हुई तो गलियों के मुहाने भर गए। सड़क पर तिल रखने की जगह नहीं रही और चौक-चौराहे पुष्पों से भर उठे। लोग श्रद्धावनत थे।खड़े रहे तपती धूप में अपने प्रिय कवि के अंतिम दर्शन के लिए जिसने कई बार नंगे पांव चलकर इस शहर को जगाया। आज शहर के साहित्यकार, बुद्धिजीवी, सामाजिक कार्यकर्ता, कर्मचारी नेता, पत्रकार सभी उनके पीछे-पीछे चल रहे थे, उनकी छोड़ी हुई विरासत को सहेजे रखने की संकल्पना के साथ। महाप्रयाण यात्रा पर चले हरीशजी को विदा करने साथ आईं उनकी पत्नी जमुनादेवी हों या वाहन की आगे वाली सीट पर बैठी उनकी बेटी पूर्व सांसद सरला माहेश्वरी। दोनों बिल्कुल शांत थीं। जैसे उन्हें अहसास था कि बिलखती हुई पुष्पा खड़गावत और कविता व्यास को उन्हें ही संभालना है। इसी तरह खुद को जज्ब किए रहे डॉ.नंदकिशोर आचार्य, नंद भारद्वाज, भवानीशंकर व्यास ‘विनोद’, यू.सी.कोचर आदि जो जानते थे उनकी एक सिसकी भी यहां आंसुओं का सैलाब खड़ा कर सकती है। डॉ.नंदकिशोर आचार्य को देख पत्रकार अभयप्रकाश भटनागर खुद पर काबू नहीं रख सके लेकिन आचार्य ने उन्हें संभाला।
सरल विशारद बार-बार अपनी रुलाई को यह कहकर रोकने की कोशिश करते रहे कि मैं बिल्कुल भी नहीं टूटा हूं। उनसे मिलने वाला हर व्यक्ति सच को जानता था लेकिन उनकी हां में हां मिला रहा था।
रांगेय राघव की पुत्री और सीमंतनी यहां अनुवादक पूर्वायागिक कुशवाह को लेकर यहां पहुंची लेकिन उनके शब्द भी जवाब दे चुके थे। नाटककार निर्मोही व्यास अस्वस्थ होने के बावजूद पहुंचे लेकिन उनके चेहरे पर अपने दोस्त को खोने की पीड़ा साफ नजर आ रही थी। साहित्यकार लक्ष्मीनारायण रंगा बिल्कुल संयत दिख रहे थे लेकिन उनके मन में मचा हाहाकार भी चेहरे पर झलक रहा था।
ऐसा ही हाल महबूब अली, शुभू पटवा, मनोहर चावला, श्रीलाल मोहता, हरदर्शन सहगल, श्रीलाल जोशी, मालचंद तिवाड़ी, दीपचंद सांखला, कमल रंगा कामरेड वाई.के.शर्मा योगी, प्रसन्न कुमार, रामेश्वर शर्मा, राजेंद्र जोशी का था, सब चुप थे लेकिन असहनीय दर्द के साथ। वातावरण में लगातार गूंजता रहा ‘जब तक सूरज-चांद रहेगा, भादानीजी का नाम रहेगा।’
यात्रा के दौरान उनके लिए लाल-सलाम का उद्घोष होता रहा तो कविताएं गूंजती रही। छबीली घाटी से गुजरों की मस्जिद, जेल रोड, कोटगेट, महात्मागांधी मार्ग, मॉडर्न मार्केट से आंबेडकर सर्किल होते हुए हरीश भादानी की महाप्रयाण यात्रा सरदार पटेल मेडिकल कॉलेज पहुंची जहां उनके देहदान का संकल्प पूरा हुआ। कॉलेज के प्राचार्य डॉ.आर.बी.पंवार, पीबीएम अस्पताल के अधीक्षक डॉ.विनोद बिहाणी सहित समूचा स्टाफ, स्टूडेंट्स भादानी को पुष्पांजलि अर्पित करने गेट पर ही मौजूद थे।
माकपा की राज्यशाखा की ओर से भादानी की पार्थिव देह पर पुष्पचक्र अर्पित करने के साथ ही माकपा का झंडा चढ़ाया गया। इन्होंने भी दी श्रद्धांजलि : नगर निगम के महापौर मकसूद अहमद, बीकानेर पश्चिम विधानसभा क्षेत्र के विधायक डॉ.गोपाल जोशी, भाजपा शहर अध्यक्ष नंदकिशोर सोलंकी, भाजपा प्रदेश कार्यसमिति सदस्य सत्यप्रकाश आचार्य, नगर परिषद के पूर्व सभापति चतुभरुज व्यास, राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादमी के कार्यवाहक अध्यक्ष डॉ.महेंद्र खड़गावत, सचिव पृथ्वीराज रतनू आदि ने भी श्रद्धांजलि अर्पित की।
और म्यूजियम का हिस्सा बन जाएंगे भादानी
मेडिकल कॉलेज के एनाटॉमी म्यूजियम में हर ओर बड़े-बड़े मर्तबानों में भरे रसायनों के बीच मानव शरीर के अलग-अलग हिस्से प्रदर्शित हैं। शरीर संरचना के प्रायोगिक प्रशिक्षण के बाद इन्हें मर्तबानों में सुरक्षित रखा गया है। देहदानी हरीश भादानी के अंग भी इन मर्तबानों में नजर आएंगे। मेडिकल कॉलेज को स्वैच्छिक देहदान के रूप में यह पांचवां शरीर मिला है।
धनपालसिंह माथुर ने बीकानेर में इस महादान की शुरुआत की। कुछ दिन पहले ही हनुमानगढ़ में वृद्धाश्रम चलाने वाले जट्टूराम ग्रोवर की देहदान यात्रा भी इस कॉलेज पहुंची है। मेडिकल कॉलेज के एनाटॉमी विभाग के प्रोफेसर डा.बी.एल.मेहता के मुताबिक, पिछले कुछ सालों में ही देहदान के प्रति लोग प्रेरित हुए हैं। दो साल पहले बीकानेर के स्टूडेंट्स को पढ़ाने के लिए जयपुर से मृत शरीर मंगवाए गए थे।
फिलहाल कॉलेज के पास 13 पार्थिव मानव शरीर मौजद हैं। एक वर्ष में प्रशिक्षण के लिए चार शरीर चाहिए। ऐसे में भादानी की पार्थिव देह तीन साल तक रसायनों में सुरक्षित रहेगी और इसके बाद ही इस पर प्रशिक्षण शुरू होगा। इन्हें सुरक्षित रखने के लिए एमबोल्मिंग की गई है। गुरुत्वाकर्षण के आधार पर फिमोरल आर्टरी करने के साथ ही फ्रीजर और रसायनयुक्त जलकुंड में शव को रखा जाएगा। ऐसे में एक देह के दान से सालों तक स्टूडेंट्स अध्ययन और रिसर्च कर सकेंगे।''

शनिवार, 3 अक्टूबर 2009

महाश्‍वेता देवी का हिंसा प्रेम और प्रगति‍शील-जनवादि‍यों की चुप्‍पी अपमानजनक है

आज के अखबारों में महाश्‍वेता देवी का एक बयान छपा है। जि‍समें उन्‍होंने बेशर्मी के साथ लालगढ़ कत्‍लेआम की हि‍मायत की है। महाश्‍वेता देवी ने कहा है कि‍ छत्रधर महतो को कलकत्‍ते के बुद्धि‍जीवि‍यों ने चंदा नहीं दि‍या, क्‍योंकि‍ उनके पास धन नहीं होता। उन लोगों ने तो सि‍र्फ भावनात्‍मक समर्थन दि‍या था। सवाल यह है कि‍ छत्रधर महतो जब आरंभ में पुलि‍स दमन के खि‍लाफ लड़ रहे थे तब महाश्‍वेता देवी और उनके भक्‍तों द्वारा छत्रधर महतो एंड कंपनी का समर्थन करने वाली बात कुछ समझ में आती है।उस समय पुलि‍स से गलति‍यॉं भी हुई थीं। राज्‍य सरकार को आन्‍दोलनकारि‍यों की मांग मान लेनी चाहि‍ए थी। किंतु जब से लालगढ में माओवादि‍यों के साथ मि‍लकर माकपा और पुलि‍स एजेण्‍ट के नाम पर साधारण गरीबों का कत्‍लेआम शुरू हुआ है तब महाश्‍वेता देवी और उनके समर्थक बुद्धि‍जीवि‍यों का समर्थन समझ में नहीं आता। मैं नहीं समझता कि‍ हि‍न्‍दुस्‍तान में इतनी नि‍र्लज्‍जता के साथ कि‍सी भी लेखक ने कत्‍लेआम का इस कदर समर्थन कि‍या है। उल्‍लेखनीय है इनमें से अधि‍कतर की तथाकथि‍त वामपंथी छवि‍ है जि‍सका लंबे समय तक वाममोर्चे ने लाभ उठाया था। नंदीग्राम-सिंगूर की घटना और माकपा के स्‍थानीय नेताओं के असभ्‍य और हिंसक व्‍यवहार ने इन बुद्धि‍जीवि‍यों को ममता के खेमे में ठेल दि‍या। ममता के साथ ये लोग क्‍यों हैं ,इन्‍हें क्‍या मि‍ल रहा है और वाममोर्चे के साथ क्‍यों थे और वहॉं से क्‍या क्‍या प्राप्‍त कि‍या इसका भी हि‍साब लगा लि‍या जाए तो चीजें साफ समझ में आ जाएंगी। ममता बनर्जी ने रेलवे के वि‍शेष पास उन तमाम बंगाली बुद्धि‍जीवि‍यों को जारी कि‍ए हैं जि‍न्‍होंने ममता के पक्ष में प्रचार कि‍या था। इनमें से अनेक बुद्धि‍जीवी एक जमाने में वाममोर्चे की सरकार से सस्‍ती जमीनें पॉस इलाके में ले चुके हैं, इनमें महाश्‍वेता देवी भी शामि‍ल हैं।इनमें एक दर्जन से ज्‍यादा रंगकर्मी केन्‍द्रीय मानव संसाधन मंत्रालय से समय- समय लाखों रूपये की सालाना आर्थि‍क मदद भी प्राप्‍त करते रहे हैं। ये लोग एक ही साक कांग्रेस ,तृणमूल कांग्रेस और वाम शासन से मोटी मदद प्राप्‍त करते रहे हैं। सवाल यह है कि‍ बंगाल में इन ढुलमुल व्‍यक्‍ति‍त्‍व के बुद्धि‍जीवि‍यों की पूरी फौज आखि‍र कि‍स वि‍चारधारात्‍मक मि‍ट्टी से तैयार हुई ? क्‍या इसका क्रांति‍ के महान लक्ष्‍य से कोई लेना देना है ? यह वि‍शुद्ध बौद्धि‍क अवसरवाद है। इन बुद्धि‍जीवि‍यों की सत्‍य की रक्षा में कोई दि‍लचस्‍पी नहीं है। वे सत्‍य को देखना नहीं चाहते। सत्‍य पर सुवि‍धानुसार बोलते हैं। सत्‍य के प्रति‍ तदर्थ भाव के कारण ही वे तरह तरह के नकली मुखौटे लगाकर आते हैं। इसी प्रसंग में दूसरी समस्‍या यह भी है कि‍ माकपा और वाममोर्चे के हमदर्द बुद्धि‍जीवी लालगढ में वि‍गत चार महीने से चल रहे कत्‍लेआम पर चुप क्‍यों हैं ? इन दलों के सांस्‍कृति‍क संगठन चुप क्‍यों हैं ? प्रेस में इनके कहीं पर हिंसा की नि‍न्‍दा करने वाले बयान तक नजर नहीं आते। यह चुप्‍पी टूटनी चाहि‍ए। वाम बुद्धि‍जीवि‍यों को सत्‍य को बोलना चाहि‍ए। वाम मोर्चे को लालगढ की जनता कभी क्षमा नहीं करेगी क्‍योंकि‍ उसने अपने कार्यकर्त्‍ताओं को असहाय अवस्‍था में माओवादि‍यों के हाथों कत्‍ल होने के लि‍ए छोड दि‍या है।जनवादी लेखक संघ और प्रगति‍शील लेखक संघ भी लालगढ के कत्‍लेआम पर चुप हैं ? आखि‍र ये लोग कि‍स महान वि‍पत्‍ति‍ का इंतजार कर रहे हैं? लालगढ के वि‍पदाग्रस्‍त, आतंकि‍त, उत्‍पीडि‍त लोगों के आख्‍यान कहीं से भी मीडि‍या में नहीं आ रहे। यह वाममोर्चे और खासकर माकपा की सबसे बड़ी असफलता है। हाथ पर हाथ रखकर बैठे रहने से माओवादी हिंसा बंद होने वाली नहीं है,उसका चौतरफा सत्‍यनि‍ष्‍ठ प्रति‍वाद करना चाहि‍ए।
एक अन्‍य पहलू जि‍स पर गौर करना चाहि‍ए। लालगढ़ के संदर्भ में समस्‍या इसके या उसके चंदा देने की नहीं है। पश्‍चि‍म बंगाल पुलि‍स यदि‍ मीडि‍या ट्रायल चलाएगी तो लालगढ के हत्‍यारों पर से ध्‍यान हट जाएगा। माकपा के सदस्‍यों और हमदर्दों को जि‍स तरह अकारण मौत के घाट उतारा जा रहा है उसके बारे में ज्‍यादा केन्‍द्रि‍त होकर चर्चा होनी चाहि‍ए,दूसरी बात यह कि‍ पश्‍चि‍म बंगाल की पुलि‍स यदि‍ कोई गलती करती है तो उसकी सार्वजनि‍क आलोचना होनी चाहि‍ए। लालगढ का पुलि‍स ऑपरेशन ठीक है,हमने उसका समर्थन भी कि‍या है किंतु इसके बारे में प्रचार अभि‍यान की जो पद्धति‍ पुलि‍स ने अपनायी है वह सही नहीं है। जो बुद्धि‍जीवी खुलेआम लालगढ में कत्‍लेआम का समर्थन कर रहे हैं,वे गलत रास्‍ते पर हैं। उन्‍होंने अंध कम्‍युनि‍स्‍ट वि‍रोध का मैकार्थीवादी मार्ग चुन लि‍या है उन्‍हें वि‍चारधारात्‍मक तौर पर नंगा कि‍या जाना चाहि‍ए। यह काम पुलि‍स नहीं कर सकती, बुद्धि‍जीवी ही कर सकते हैं। हमें दुख के साथ कहना पड़ रहा है कि‍ माकपा और वामदलों के पास हजारों बुद्धि‍जीवि‍यों की फौज है,ये ऐसे बुद्धि‍जीवी हैं जो वि‍चारधारा और सर्जनात्‍मक क्षमता में आज भी बेजोड़ हैं। सवाल यह है कि‍ लालगढ में चल रहे अहर्नि‍श कत्‍लेआम पर वे चुप क्‍यों हैं ? हम चाहते हैं कि‍ लालगढ में जो कत्‍लेआम माओवादी मचा रहे हैं,साथ ही देश के दूसरे इलाकों में वे जि‍स तरह का हिंसाचार कर रहे हैं उसको ज्‍यादा से ज्‍यादा लोगों तक पहुँचाया जाए,यह कार्य तथ्‍य और सत्‍य की रक्षा करते हुए होना चाहि‍ए। कि‍सी भी बुद्धि‍जीवी के लि‍ए वह दुर्भाग्‍य का दि‍न होगा कि‍ वह हिंसकों को चंदा दे। जि‍न बुद्धि‍जीवि‍यों ने लालगढ में कत्‍लेआम करने वालों को चंदा दि‍या है वे नैति‍क तौर पर हत्‍याओं के लि‍ए जि‍म्‍मेदार हैं। लेकि‍न पुलि‍स को इस प्रसंग में जि‍तने भी तथ्‍य मि‍लते हैं उन्‍हें अदालत को सबसे पहले बताना चाहि‍ए। पुलि‍स के जरि‍ए माओवादि‍यों के खि‍लाफ प्रचार अभि‍यान चलाकर पश्‍चि‍म बंगाल सरकार को न तो नैति‍क बल मि‍लेगा और नहीं राजनीति‍क लाभ ही होगा। पुलि‍सि‍या प्रचार अंतत: हत्‍यारों की मदद करता है।नंदीग्राम हिंसाचार का यही सबसे बड़ा सबक है जि‍ससे वाममोर्चे को सीखना चाहि‍ए।

शुक्रवार, 2 अक्टूबर 2009

असत्‍य का धंधा और कारपोरेट मीडि‍या

पत्रकारि‍ता के भवि‍ष्‍य को लेकर तरह-तरह के सवाल उठ रहे हैं इलैक्‍ट्रोनि‍क मीडि‍या से लेकर प्रेस तक पत्रकारों को गंभीर असुरक्षा के साए तले जीना पड़ रहा है। रि‍पोर्टिंग के स्‍तर में तेजी से गि‍रावट आयी है। पत्रकारि‍ता के बारे में सभी लोग एक ही सवाल कर रहे हैं कि‍ आखि‍रकार इसका भवि‍ष्‍य क्‍या है ? युद्ध के मोर्चे से लेकर घरेलू खबरों के मोर्चे तक खबरों में झूठ ने अपने पैर पसार दि‍ए हैं। युद्ध संबंधी असत्‍य खबरों का साक्षात् प्रतीक है इराक। इराक में आज जो कुछ घट रहा है उसमें मीडि‍या की असत्‍य खबरों की सबसे बड़ी भूमि‍का रही है। दूसरी ओर यह भी देखा जा रहा है कि‍ मीडि‍या के मुनाफों का वि‍स्‍तार हुआ है। मीडि‍या की आमदनी में इजाफे को मीडि‍या के सुखद भवि‍ष्‍य के रूप में देखें अथवा मीडि‍या में जि‍स तरह असत्‍य ने वि‍राट रूप में अपने पैर फैला दि‍ए हैं उसे मीडि‍या के भवि‍ष्‍य के रूप में देखें ?
कारपोरेट मीडि‍या के सत्‍य के प्रति‍ बढता अलगाव और असत्‍य को प्रमाण के साथ पेश करने की कला के आदर्श उदाहरण हैं, कोसोवो,इराक,पनामा पर हमले। उसी तरह हाल ही में जि‍स आर्थि‍कमंदी से हम जूझ रहे हैं इसके बारे में कभी भी मीडि‍या ने पहले से आगाह तक नहीं कि‍या। नव्‍य उदारतावाद और बैंकिंग व्‍यवस्‍था के बारे में जमकर झूठ बोला गया और यह बताया ही नहीं गया कि‍ अमरीका से लेकर जापान तक समूचे वि‍कसि‍त पूंजीवादी जगत में बैंकिंग व्‍यवस्‍था अनि‍यमि‍तता,नि‍यमहीनता और अराजकता में फंस गयी है। वि‍त्‍तीय अखबार और व्‍यापार चैनल बाजार में उछाल का नकली राग अलापते रहे और समूची दुनि‍या गंभीर मंदी में फंस गयी।
यह सवाल पूछा जाना चाहि‍ए कि‍ पत्रकारि‍ता के भवि‍ष्‍य का फैसला सत्‍य और मुनाफा में से कि‍सके आधार पर कि‍या जाए ? खासकर बैंकिंग व्‍यवस्‍था में जि‍स तरह की अराजकता सामने आई है उसने वि‍त्‍तीय पत्रकारि‍ता की पोल खोलकर रख दी है। भारत में कारपोरेट मीडि‍या ने जि‍स अंधभक्‍ति‍ के साथ नव्‍य उदारतावाद की हि‍मायत की है , गरीबों को सब्‍सीडी दि‍ए जाने का वि‍रोध कि‍या है और सेज के बहाने कि‍सानों की जमीन लि‍ए जाने का अंध समर्थन कि‍या है उससे कारपोरेट मीडि‍या की गरीब वि‍रोधी छवि‍ सामने आयी है।
कारपोरेट मीडि‍या की ही चालाकि‍यां हैं कि‍ हम व्‍यापक बजट घाटे के बावजूद यह नहीं जानते कि‍ आखि‍रकार वि‍शाल बजट घाटे का हमारे सामाजि‍क भवि‍ष्‍य पर क्‍या असर पड़ेगा। पर्यावरण से लेकर अर्थनीति‍ तक क्‍या बुरे प्रभाव हो सकते हैं इनके बारे में कारपोरेट मीडि‍या एकसि‍रे से आंखें बंद कि‍ए हुए है। रात को प्राइम टाइम खबरों में वि‍भि‍न्‍न चैनलों में पेश कि‍ए जाने वाले आधि‍कारि‍क लोग वे होते हैं जो सांसद, राजनेता, वकील,संपादक,पत्रकार,राजनयि‍क,सैन्‍य एवं पुलि‍स अधि‍कारी होते हैं। साधारण आदमी खबरों में प्रमाण के रूप में कम से कम नजर आता है। प्रामाणि‍कों में भी ज्‍यादातर हि‍न्‍दू होते हैं। इन्‍हें देखकर यह लगता ही नहीं है कि‍ भारत सांस्‍कृति‍क बहुलता वाला देश है। खबरों में गरीब को तो कभी प्रमाण के रूप में पेश ही नहीं कि‍या जाता। आम तौर पर अमीर ,अभि‍जन और हि‍न्‍दू ही खबरों के प्रमाण और व्‍याख्‍याकार होते हैं। ऐसी स्‍थि‍ति में खबरें कि‍सके हि‍तों का प्रति‍नि‍धि‍त्‍व करती हैं इसके बारे में ज्‍यादा कुछ कहने की जरूरत नहीं है।
कारपोरेट मीडि‍या बार-बार युद्ध और शांति‍ के सवाल पर फेल हुआ है,हाल ही में चीन के खि‍लाफ जि‍स तरह का उन्‍माद पैदा करने की कोशि‍श की गयी और जि‍स तरह का असत्‍य प्रचार कि‍या गया वह दरशाता है कि‍ मीडि‍या शांति‍ के नहीं युद्ध के पक्ष में है और युद्ध भड़काने के लि‍ए वह कि‍सी भी हद तक जा सकता है। जबकि‍ चीन और भारत दोनों ही देशों की सरकारों ने कि‍सी भी कि‍स्‍म की भूल-गलती होने की खबरों को एकसि‍रे से खारि‍ज कि‍या।
यही हाल कि‍सानों और मजदूरों की खबरों का भी है, इन दोनों वर्गों की खबरें प्रधान कारपोरेट मीडि‍या में से तकरीबन नदारत हैं जबकि‍ वि‍गत दो दशकों में कि‍सानों और मजदूरों की स्‍थि‍ति‍ में गि‍रावट आयी है। सि‍र्फ इन वर्गों की हिंसा की ही खबरें संक्षि‍प्‍त खबर बन पाती हैं। मुख्‍य खबर तो वह कभी बन ही नहीं पाती। इसी तरह दलि‍तों ,अछूतों अल्‍पसंख्‍यकों और गांवों की खबरें यदा-कदा ही दि‍खती हैं। आमतौर पर महानगर, अभि‍जन और मध्‍यवर्ग की खबरें ही अधि‍कांश जगह घेरे रहती हैं।
मीडि‍या में ज्‍यादा से ज्‍यादा मुनाफा कमाने की होड़ पैदा हुई है। मुनाफे का ही तरह-तरह से प्रचार कि‍या जाता है फलत: प्रासंगि‍क खबरें हाशि‍ए पर पहुँच गयी हैं। अब मुनाफा ही सर्वस्‍व है। पहले कभी खबर ही सर्वस्‍व हुआ करती थी। मजेदार बात यह है कि‍ मीडि‍या के बडे घरानों में बृहत्‍तर सामाजि‍क स्‍वार्थ के सवालों में कोई दि‍लचस्‍पी ही नहीं रह गयी है। आज कारपोरेट मीडि‍या के मालि‍क मानकर चल रहे हैं कि‍ खबर या बडी खबर ज्‍यादा मुनाफा नहीं देती।
नव्य-उदारतावाद के मौजूदा दौर में समाचार की बजाय जंक समाचार ज्यादा आ रहे हैं। ये वे समाचार हैं जो देखने में चटपटे किंतु सारहीन होते हैं। इनका सामाजिक मूल्य नहीं होता । इस तरह के समाचारों का टीवी कवरेज से लेकर प्रिंट मीडिया तक फैल जाना इस बात का संकेत है कि मौजूदा दौर समाचार का नहीं जंक समाचार का युग है। इसके अलावा जो सारवान समाचार दिखाए जा रहे हैं उनमें खास किस्म का मनमानापन झलकता है। मसलन् हमेशा आधी-अधूरी कहानी बतायी जाती है। भ्रमित करने वाली शीर्ष पंक्तियां बनायी जाती हैं। तथ्यों में सुधार चुनिंदा ढ़ंग से किया जाता है। जिस कहानी में किसी तरह का तथ्य अपुष्ट प्रमाणों को समाचार कहानी बनाकर पेश किया जा रहा है। अंतर्राष्ट्रीय खबरों में ऐसी स्टोरियों और तथ्यों से बचा जाता है जो अमेरिकी नीति‍ के लिए ठीक न हों। अथवा उनके बारे में नकारात्मक प्रभाव पैदा करने वाली हों।
आज समाचार के नाम पर सिर्फ मनोरंजन की खबर होती है,आकर्षक चेहरे की खबर होती हैं। 'चेहरा' आज टीवी खबरों में बड़ा कारक तत्व बनकर सामने आया है खासकर महिला समाचारवाचिका अथवा एंकर के रुप में सुंदर चेहरे की लड़की ज्यादा पसंद की जा रही है। स्थिति यह हो गई है कि एंकर के रुप में अमिताभ बच्चन से लेकर जॉनी लीवर तक को सहज ही देखा जा सकता है। यह आकर्षक चेहरे,सैलीब्रेटी चेहरे और सुंदरता की परेड है। इससे टीकी एंकर की परंपरा ही बदल गयी है। यही स्थिति खेलों की है। अब खेल के कार्यक्रमों में खेल संवाददाता नहीं बल्कि स्वयं खिलाडी ही अपना मूल्यांकन करते रहते हैं,खिलाड़ी खिलाडी के बारे में बताता रहता है,इससे खेल पत्रकारिता का भी चरित्र बदला है। जब खिलाडी ही व्याख्याकार हो जाएगा,जब फिल्म के बारे में निर्देशक और अभिनेता ही मूल्यांकन करने लगेंगे तो ऐसा मूल्यांकन विश्लेषण और वस्तुगतता से रहित होगा। इस तरह की प्रस्तुतियों में आत्मगत तत्व हावी रहेगा। बल्कि यह भी कह सकते हैं कि समाचारों में सुंदरता और आत्मगत भाव की परेड हो रही है।
टीवी वाचक के चेहरे हाव-भाव ज्यादा महत्वपूर्ण हो उठे हैं। साथ ही समाचार का गप्प, सनसनी और निर्मित विवादों में रुपान्तरण कर दिया गया है। इस तरह की खबरें जनता की बुध्दि पर हमला है, उसका अपमान है,ये यथार्थ जीवन के संदर्भ की उपेक्षा करती हैं, बर्नस्टीन के शब्दों में '' अच्छी पत्रकारिता जनता को चुनौती देती है,वह उसका विवेकहीन ढ़ंग से शोषण नहीं करती।'' आज स्थिति इतनी खराब हो गयी है कि सरकारी सूत्रों से हासिल सूचनाओं और ब्यौरों को बगैर किसी तहकीकात के सीधे पेश कर दिया जाता है। इस संदर्भ में विश्व विख्यात पत्रकार वॉब बुडवर्ड के शब्दों को स्मरण करना प्रासंगिक होगा। बुडवर्ड ने लिखा है कायदे से सरकारी स्रोत से निकली खबर की संवाददाता को अपनी खोज के जरिए पुष्टि करनी चाहिए। इससे जनतंत्र का विकास होता है किंतु जब संवाददाता सिर्फ सरकारी स्रोत के आधार पर ही खबर देने लगे तो इससे सर्वसत्तावादी समाज का निर्माण होता है। इस परिप्रेक्ष्य में देखें तो सामयि‍क खबरें जनतंत्र का नहीं सर्वसत्तावादी समाज का निर्माण कर रही हैं। उल्‍लेखनीय है वाटरगेट कांड से लेकर इराक युध्द तक वुडवर्ड ने बड़े पैमाने पर रहस्योद्धाटन किए हैं। वुडवर्ड कहता है हमें उस केन्द्रीय कारक की तलाश करनी चाहिए जिसके कारण सरकार उस तरह की सूचनाएं दे रही है। जनतंत्र में प्रेस दूसरा स्रोत मुहैयया कराता है। उसके आधार पर नागरिक तय कर सकते हैं कि क्या सही है। कौन सी स्टोरी सही है।

गुरुवार, 1 अक्टूबर 2009

छत्रधर महतो पर मीडि‍या मुकदमा

लालगढ से हाल ही में गि‍रफतार कि‍ए गए बागी नेता छत्रधर महतो फि‍लहाल पुलि‍स हि‍रासत में हैं। पश्‍चि‍म बंगाल पुलि‍स उनसे पूछताछ कर रही है। पूछताछ के नाम पर अब प्रेस में 'आधि‍कारि‍क तथ्‍य' भी आने लगे हैं। राज्‍य पुलि‍स के एक अधि‍कारी ने प्रेस को बताया कि‍ छत्रधर महतो का एक करोड़ रूपये का जीवन बीमा पॉलि‍सी है। ऐसा स्‍वयं महतो ने पुलि‍स को बताया है । इसमें सत्‍य क्‍या है यह तो जीवन बीमा नि‍गम ही बता पाएगा। इससे भी बड़ा सवाल यह है कि‍ क्‍या क्षत्रधर महतो को एक करोड़ की बीमा पॉलि‍सी कराने का हक है ? नागरि‍क के नाते छत्रधर महतो को यह हक है,इसके बावजूद मीडि‍या में यह बात कुछ इस तरह पेश की जा रही है गोया ,एक करोड़ की बीमा पॉलि‍सी का हक उसे नहीं है, उसका ऐसा करना अवैध है। दूसरा सनसनीखेज तथ्‍य पुलि‍स ने यह दि‍या है कि‍ छत्रधर महतो के पास उड़ीसा के मयूरभंज में एक मकान है। क्‍या मकान होना अपराध है ? तीसरा सनसनीखेज तथ्‍य यह दि‍या है कि‍ छत्रधर महतो के नेतृत्‍व में चलने वाली 'पुलि‍स दमन वि‍रोधी कमेटी' के लि‍ए चंदा देने वालों में 150 लोगों के नाम हैं इनमें अनेक वि‍ख्‍यात लेखकों और संस्‍कृति‍कर्मियों के नाम हैं। वस्‍तुगत तौर पर वि‍चार करें तो पुलि‍स को ये सारे तथ्‍य अदालत में रखने चाहि‍ए थे। पुलि‍स का जांच के तथ्‍यों को अदालत को बताने से पहले सीधे प्रेस को कानून की अवमानना है। इससे एक चीज जाहि‍र है कि‍ पुलि‍स की लालगढ में कत्‍ल कर रहे लोगों तक पहुँचने में कोई दि‍लचस्‍पी नहीं है उसकी सारी दि‍लचस्‍पी उन चीजों में है जि‍नका लालगढ में मारे गए नि‍र्दोष लोगों की मौत से कोई लेना देना नहीं है। छत्रधर महतो करोडपति‍ है या खाकपति‍ है इस चीज का लालगढ के कत्‍लेआम और अराजकता से कोई संबंध नहीं है। आश्‍चर्य की बात है कि‍ मीडि‍या ने भी पुलि‍स के द्वारा दी गयी सूचनाओं को मुखपृष्‍ठ पर बड़ी खबर बनाया है। यह गलत को सही और अवैध को वैध बनाने की मीडि‍या साजि‍श है। मीडि‍या की पुलि‍सि‍या गुलामी है। पुलि‍स को छत्रधर महतो के बारे में चल रही जांच-पड़ताल को इस तरह सार्वजनि‍क करने का कोई कानूनी हक नहीं है।
दूसरी ओर मीडि‍या को तथ्‍य,सत्‍य,वैध,अवैध में फर्क करना चाहि‍ए। मीडि‍या बेहूद‍गि‍यों के कारण मीडि‍या की साख खत्‍म हो चुकी है। इससे भी बड़ी बात यह है कि‍ छत्रधर महतो के नेतृत्‍व में चलने वाली 'पुलि‍स दमन वि‍रोधी कमेटी' वैध संगठन है। उसके लि‍ए चंदा लेना और देना कानूनन वैध है। अत: इस कमेटी को चंदा देने वालों का राष्‍ट्रद्रोही के रूप में प्रस्‍तुति‍करण सही नहीं है। इस संदर्भ में 'एसोसि‍एशन फॉर प्रोटेक्‍शन ऑफ डेमोक्रेटि‍क राइटस' (एपीडीआर) प्रधान सुजातो भद्र का कहना एकदम सटीक है कि‍ ''पुलि‍स के सामने दि‍या गया बयान अदालत में ग्रहण योग्‍य नहीं होता। कोई नहीं जानता कि‍ आखि‍रकार कि‍न परि‍स्‍थि‍ति‍यों में यह बयान लि‍या गया है। यह भी हो सकता है पुलि‍स चुनकर या वि‍कृत करके मीडि‍या को सूचनाएं दे रही हो। पुलि‍स आन्‍दोलन को लांछि‍त करना चाहती है।'' सुजातो भद्र ने सही कहा है कि‍ '' पीसीपीए को चंदा देना अपराध नहीं है।''

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