बुधवार, 10 फ़रवरी 2010

वायवीय है हिन्दी फिल्मी संगीत


फिल्मी संगीत की यह विशेषता है कि इसके आस्वादन की जब आदत हो जाती है तब अभिरुचि एवं व्यक्तित्व में कोई भी महत्वपूर्ण परिवर्तन सहज नहीं रह जाता। इसका प्रधान कारण है व्यक्ति के अंदर 'मेनीपुलेशन' के प्रति अनुकूल परिवेश का तैयार होना, यह 'व्यक्तित्व' की अवस्था न होकर, दासत्व की अवस्था है। 'दासत्व' में मेनीपुलेशन तेजी से प्रभावी होता है जबकि 'व्यक्तित्व' की अवस्था में मेनीपुलेशन की संभावनाएं क्षीण हो जाती हैं।
औद्योगिकीकरण के कारण शहरी जीवन का नियमन और आत्मसातीकरण के रवैय्ये के विकास के कारण मनुष्य अब जन-मस्तिष्क के आश्रित होता है। इस अवस्था का जनमाध्यमों के द्वारा विस्तार दिया जाता है।

जनमाध्यमों के द्वारा उन सब चीजों को विस्तार दिया जाता है जो 'देखी' और 'सुनी' जा सकती हों। ऐसे रूप को निर्मित किया जाता है जो समग्र को हजम करने पर मजबूर करें। अब व्यक्ति के पास कोई विकल्प नहीं रह जाता, किसी भी चीज के बारे में निर्णय करने की क्षमता से वह वंचित हो जाता है, अब उसके पास स्वतंत्रता नहीं होती, भरोसे योग्य अभिरुचियां नहीं होतीं, बौध्दिक स्वास्थ्य के लिए कौन सी सामग्री का सेवन करें इसकी जानकारी नहीं होती और न ही उसके पास आपत्ति ही होती है।
 
ऐसी परिस्थितियों में लोकवादी संस्कृति माल के माध्यम से जनता की अभिरुचियों को नष्ट करने की कोशिश करती है, अभिरुचियों का वैशिष्टय खत्म करके इकसार अभिरुचियों को निर्मित करती है, साथ ही, निज के बारे में सोचने में अक्षम बना देती है, वह व्यक्ति को अनुरूपता के अनुकूल प्रेरित करती है।

इसी बृहत्तर परिप्रेक्ष्य में लोकप्रिय गीत-संगीत अपनी भूमिका अदा करता है। सकारात्मक के बजाय नकारात्मक सिध्दांतों का तेजी से प्रसार करता है। चंद विषयों को ही उठाता है, अन्य की उपेक्षा करता है। ऐसा करके वह लोगों को संतुष्ट नहीं करता अपितु उनका दोहन करता है।

अब समस्या यह हो जाती है कि दोहन से लड़ें या सांस्कृतिक स्वास्थ्य लाभ करें ? या फिर कोई और रास्ता अपनाएं? पूंजीवादी प्रतिस्पर्धा और प्रविधि के विकास के गर्भ से जो लोकतांत्रिाक प्रक्रिया नि:सृत होती है उसको सही दिशा में कैसे ले जाया जाए इस पर विचार करें। इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए फिल्म संगीत एवं गीत कहां तक मददगार हो सकते हैं, यह विचारणीय प्रश्न है।

हिंदी फिल्मी गीतों का इतिहास 'आलम आरा' (1927) फिल्म से शुरू होता है। यह पहली बोलती फिल्म थी। आरंभ की फिल्मों के फिल्मी गीतों में उदासी और दिल का दर्द छाया हुआ था। ये नायक-नायिका के प्रेम पर लिखे गीत हैं। ये लयात्मक और पदात्मक गीत हैं। जबकि आज के पॉप संगीत की धुनों के लिए लिखे जा रहे गीतों में खंडित गद्य है, गीतात्मकता का अभाव है। पुराने गीत भावप्रधान थे, संगीत उनका अनुगामी था। गीतकार गीत लिखते समय देशी वाद्ययंत्राों को ध्यान में रखता था। यह एक तरह से

फिल्मी संगीत साधना का दौर था। किंतु नए इलैक्ट्रोनिक वाद्ययंत्रों और 'सिंथेसाइजर' के आगमन ने 'संगीत साधना' और संगीतकार की समग्र भूमिका को बदल दिया। अब संगीत सृजन की नहीं, संयोजन की चीज बन गया। संगीतकार सर्जक के बजाय संयोजक हो गया। अब सृजन के बजाय निर्मिति पर बल दिया जाने लगा। अब संगीत साधना के बजाय बाजार का माल बन गया। इस प्रक्रिया ने संगीतकार, संगीत, संगीतवाद्य और गीत सबका संहार किया।


आरंभिक दौर के फिल्मी संगीत में 'रियाज' पर जोर था, आजकल 'नकल' या 'पैरोडी' पर जोर है। यह ऐसा संगीत है जो खिचड़ी संगीत है। इसकी न तो परंपरा है और न भविष्य। यह अल्पायु संगीत है। इसी अर्थ में यह उत्तर-आधुनिक संगीत है। परिश्रम, पहचान, मौलिकता से रहित खंडित पद्य को उभारना इसका लक्ष्य है और
वैविध्यपूर्ण, विसंदर्भीकृत संगीत रूपों का सम्मिश्रण इसकी विशेषता है।

फिल्मी संगीत में जिस तरह 'पैरोडी' का वर्चस्व है, गीत में भी 'पैरोडी' का वर्चस्व है। पुनरावृत्ति और उत्तेजना इसकी विशेषता है। गायक को गायकी, लय और तानों की आज जरूरत नहीं है। फिल्मी संगीत के क्षेत्र में धीमी, व्यक्तिगत संवाद बनानेवाली धुनों का अब लोप हो चुका है।

जीवन की गति के साथ आरंभिक दौर में संगीत का रोमानियत भरा जो रिश्ता था वह अब खत्म हो चुका है। रोमानी शैली की जगह उत्तेजनात्मक शैली ने ले ली है। धुन की जगह बेसुरेपन और बेतालेपन ने ले ली है। यह संगीत एवं गीत की जीवन से विदाई की बेला है। अब नकल ही असल और असल ही नकल है।

असली गायक की जगह अब नकली गायक का वर्चस्व है। नए फिल्मी गीत का अपने मूल संदर्भ, फिल्म के संदर्भ, संगीत संदर्भ से कोई संबंध नहीं है। अब कथा, मार्मिक प्रसंग, नृत्य-संगीत के दृश्य फिल्मों से विदाई ले चुके हैं।

इस समूची प्रक्रिया पर माध्यम विशेषज्ञ सुधीश पचौरी का मूल्यांकन गौरतलब है। उनका कहना है : 'अब नायक है, सिर्फ लड़-लड़कर थका हुआ खलनायक है, जो पुराना सभ्य नहीं रह गया, दरअसल रस और कण के सारे नियम खत्म किए जा चुके हैं जिनमें बंधकर एक परिपाक होता था, गाने उसके लिए न केवल सामग्री की तरह थे, अपितु राहत पहुंचाने के नुस्खे भी थे। किंतु अब नायक को न कोठे पर जाने की जरूरत है, न गांव छोड़कर रोने-कलपने की, न परिवार के टूटने की चिंता है और न बच्चा पालने की। गीत स्थितियां, पॉप संगीत स्पर्धाओं (जैसे कर्ज, डिस्को डांसर) में सीमित है या फिर लघु-लघु हो उठे प्रेम प्रसंगों में जो सेक्स प्रसंग अधिक रह गए हैं, प्रेम की जगह सेक्स ने जब से ली, तब से गीत विदा हुए कहे जा सकते हैं, अब नायक-नायिका सिर्फ शरीर हैं, उनके मन नहीं है, आत्मा नहीं है तो आत्मिक आनंद की जरूरत क्यों होने लगी।'
... 'अब गीत मन को संबोधित नहीं होते बल्कि अर्द्ध संभोगाशय को उभारते हैं।'
... 'नया बेहद पापुलर है तो इसलिए क्योंकि वह भड़काऊ है, हिंसक है और विस्फोटक है, थका देनेवाला है और नए युवा के भीतर सहज लब्ध सुख संग्रह और उत्तेजना,सामग्री संचय का जो नया सांस्कृतिक मूल्य मौजूद है उससे नई धुनें, नए गाने, नया गायक मेल खाता है ... जो नया है वह धुन नहीं है, वह गीत नहीं है, वह अधिक-से-
अधिक इंद्रियों पर हिंसा करनेवाला व्यवस्थित शोर है, जो एक दिन हमारे मन के कोमल संस्कार के कोमल भावजगत को नष्ट कर हमें सिर्फ ऐंद्रिक-प्राणी बनाने पर तुला है।'

पचौरी के शब्दों में, 'एशियाई समाजों में संगीत जीवन की संगति में रहा है, नया संगीत विसंगति से खेलता है, संगीत पैदा नहीं करता, आप उसे आसानी से गा नहीं सकते, गुनगुना नहीं सकते। जो गीत गुनगुनाए नहीं जा सकते, वे गीत अमर नहीं हो सकते ... दरअसल नई फिल्मों को गीतकार नहीं फाइटमास्टर चाहिए।'

इस सबके बावजूद हिंदी फिल्म और संगीत इतना लोकप्रिय क्यों है? सत्यजित राय के शब्दों में इसका प्रधान कारण है, 'सार्वभौम हाव-भाव, सार्वभौम संवेदनाएं, किसी खास समाज के साथ पहचान का अभाव, कृत्रिम और वायवीय समाज का रूपायन। इन्हीं कारणों से हिंदी सिनेमा लोकप्रिय है।'
सत्यजित राय ने हिंदी फिल्मी गीतों की लोकप्रियता के एक अन्य पहलू पर भी प्रकाश डाला है। उनका मानना है कि 'भारतीय समाज में पश्चिमी समाजों की तरह मनोरंजन के साधनों का जबर्दस्त अभाव है। परिणामत: सिनेमा के नृत्य एवं गायन के अभाव की पूर्ति न करें तो अन्य किसी माध्यम से इसकी पूर्ति संभव नहीं है।'
सत्यजित इस धारणा को अस्वीकार करते हैं कि 'भारतीय समाज गीतों से ज्यादा प्यार करता है।' उनका मानना है कि 'अच्छे गीत को महान कविता नहीं होना चाहिए। क्योंकि उसका अपना संगीत होता है, उसे गीत के रूप में ढालना मुश्किल होता है।'

फिल्मी संगीत का नया पैराडाइम


 संगीत और समाज का द्वंद्वात्मक संबंध होता है। यह रिश्ता प्रभुत्व की शक्तियों और आम जनता के अंतर्विरोधों को व्यक्त करता है। प्रभुत्वशाली तबकों और वंचितों के बीच के अंतर्विरोधों का इस संबंध के विकास पर गहरा प्रभाव देखा जाता है। सामाजिक विकास की शक्तियों को किस तह नियंत्रित किया जाए ? वंचितों में दासत्वबोध और हारे हुए की भावना को कैसे निर्मित जाए ? सांस्कृतिक रूप में किस परिकल्पना के अनुकूल ढाला जाए, यही केंद्रीय चिंता लोकप्रिय संगीत में सक्रिय रहती है।
लोकप्रिय संगीत मूलत: बुर्जुआ संगीत है। आभिजात्य संगीत है। इसमें हमें फिल्मी संगीत, भक्ति संगीत, गैर-फिल्मी संगीत और पाश्चात्य संगीत ये चार तरह के संगीत
रूप मिलते हैं। संगीत के रूप जटिल और विलक्षण होते हैं। उनके बारे में सरलता का दृष्टिकोण असुविधा पैदा करता है। अंर्स्ट फिशर के शब्दों में कहें तो 'समस्त कलाओं में संगीत सबसे ज्यादा अमूर्त और रूपात्मक कला है।' संगीत पर विचार करते समय उसके रूप और किस तरह की सामाजिक अंतर्वस्तु से इसका अंतस्संबंध है, इसका विश्लेषण करना चाहिए। संगीत को संगीत के रूप में देखना रूपपरक दृष्टिकोण की ओर ले जाता है वहीं संगीत और उसकी सामाजिक अंतर्वस्तु के साथ जोड़कर देखने से संगीत के जटिल रूपों को उद्धाटित करने में मदद मिलती है।
हेगेल के शब्दों में सोचें तो 'संगीत की अंतर्वस्तु का अर्थ वही नहीं होता, जो हम दृश्यकलाओं या कविता की बात करते समझते हैं। इसमें जिस चीज का अभाव होता है, वह यही वस्तुपरक बाह्य वस्तु है, चाहे हम इसे कोई वास्तविक प्रपंच मानें, अबौध्दिक विचारों और बिंबों की वस्तुपरकता मानें।'
संगीत की अंतर्वस्तु वह अनुभव है जो व्यक्तिगत (संगीतकार का) होने के साथ-साथ सामाजिक भी होता है। वह संगीतकार के संदर्भ से जुड़ा होता है। संगीत की भूमिका समष्टिगत भावनाओं को उभारने की रही है। इसमें रचनाकार स्वचालित साहचर्यों का इस्तेमाल करता है।
लोकप्रिय फिल्मी संगीत मूलत: शहरी अर्द्धशिक्षित जनता के लोकप्रिय दृष्टिकोण को व्यक्त करता है। यह पेशेवर संगीतकारों की देन है। इसी तरह फिल्मी गीत भी पेशेवर गीतकारों की देन है। ये दोनों ही पेशेवर तबके मूलत: उच्चवर्गों पर निर्भर हैं। ये दोनों अभिजन की जन-कला के अंग हैं। यह जनता के लिए निर्मित कलारूप है। इसकी इकसार संगीतबोध पैदा करने में, माल के रूप में संगीत का बाजार तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका होती है।

लोकप्रिय संगीत अत्याधुनिक माध्यम तकनीकी से निर्मित संगीत है। प्रविधि एवं प्रौद्योगिकी प्रगति से इसका गहरा संबंध है। यह संगीत की लोकतांत्रिक प्रक्रिया का स्रोत है। यह ऐसा कलारूप है जिसमें रचनाकार का प्रत्यक्ष स्पर्श महसूस नहीं होता। प्रत्यक्ष स्पर्श का यहां लोप हो जाता है। ध्यान रहे,  तकनीकी विकास का इतिहास जाने बगैर कला के इतिहास को समझना मुश्किल है। तकनीकी प्रक्रियाएं हमेशा से कलात्मक विचारों का अंतर्ग्रंथित हिस्सा ही हैं।

तकनीकी प्रगति सिर्फ आर्थिक रूप से ही लाभप्रद नहीं होती अपितु वह जनता के दैनिक जीवन, अभिरुचियों और मूल्यों का अंग रही है। अत: सामाजिक विकास के लिए तकनीकी विकास अनिवार्य शर्त है। तकनीकी विकास सामाजिक सांस्कृतिक विकास का उपकरण बने इसके लिए तकनीकी पर मास्टरी होना बेहद जरूरी है। जन-कला (मास आर्ट) के नियम कठोर, सुनिश्चित एवं अननुमेय होते हैं। लोकप्रिय संगीत-गीत पर भी यह बात लागू होती है। लोकप्रिय गीत और संगीत का निर्माता फॉर्मूलाबध्द सृजन करता है। उसके लिए जो लोकप्रिय है वह प्रासंगिक है। अगर कोई फॉर्मूला पिट चुका है तो वह कोई दूसरा फॉर्मूला खोज लेता है।

औद्योगिक जन-उत्पादन की यह विशेषता है कि उसका उत्पादक मानकीकृत और अंतर-विनिमय के तत्वों को एक जगह इकट्ठा करके वस्तु का निर्माण करता है। इसमें कम श्रम लगता है। यही स्थिति लोकप्रिय संगीत-गीत की भी है। तैयारशुदा हिस्सों या तत्वों का कम श्रम और लागत से संयोजन करके गीत या संगीत का निर्माण किया जाता है।

लोकप्रिय संगीत में फॉर्मूले से भी ज्यादा महत्वपूर्ण होती है फॉर्मूले की पुनरावृत्ति की प्रभावशाली प्रस्तुति। पुनरावृत्ति के कारण संगीत का प्रभामंडल खंडित होता है। संगीत लोकतांत्रिाक, सहज, बोधगम्य और स्टीरियोटाइप हो जाता है। इसी क्रम में संगीत का विसंदर्भीकरण भी हो जाता है। पुनरावृत्ति के बार-बार अनुभव से गुजरने के कारण ही हमें विसंदर्भीकरण अब परेशान नहीं करता। धीरे-धीरे संदर्भरहित चिंतन के हम आदी हो जाते हैं और चीजों को अनैतिहासिक ढंग से देखने और सोचने के आदी हो जाते हैं। लोकप्रिय संगीत इस प्रक्रिया में तेजी से फैलता है, व्यवसाय करता है, अतिरिक्त मांग पैदा करता है और उन्माद की हद तक श्रोताओं में लगाव पैदा करता है।

अतिरिक्त मांग का संबंध संगीत की नई तर्ज के साथ है। अतिरिक्त मांग जितनी ज्यादा और तीव्रता के साथ पैदा होगी उतनी ही गति के साथ नई तर्ज एवं धुन निर्मित की जाती है। इस प्रक्रिया में पुनरावृत्ति का तत्व बना रहता है। नई तर्ज के कारण ही पुनरावृत्तिा के द्वारा सृजित इकसार प्रभाव को तोड़ने में मदद मिलती है। इसका यह कतई अर्थ नहीं है कि सिनेमा संगीत गतिशील होता है। इसके विपरीत अगतिशीलता और निर्वैयक्तिक कारीगरी यहां हावी रहती है। बौध्दिक रूप से यह जड़ एवं स्वतंत्रतारहित होता है। यह तयशुदा परिवेश के साथ संवाद करता है। इसी अर्थ में इसमें शिक्षित
करने की क्षमता नहीं है। व्यक्तित्व रूपांतरण करने में सफल नहीं होता।

मंगलवार, 9 फ़रवरी 2010

देशभक्ति चड्ढ़ी-बनियान का विज्ञापन नहीं है - सुधा सिंह



हिन्दी फिल्मों के बादशाह शाहरूख खान की नई फिल्म 'माई नेम इज़ खान' 12 फरवरी को प्रदर्शित होने जा रही है। शाहरूख का कसूर है कि उन्होंने अपप सरदेसाई ने पड़ोसी देश के साथ सौहार्द्रपूर्ण संबंध की बात कही है। उन पर आरोप है कि वे पाकिस्तान समर्थक हैं। देशद्रोही हैं। तथाकथित राष्ट्रवादी और अन्य हिन्दुत्ववादी संगठन उन से माफी मांगने को कह रहे हैं। शाहरूख खान का कहना है कि उन्होंने कोई ग़लती नहीं की, फिर माफी किस बात की। वे भारतीयता के बारे में पैसोनेट हैं। वे कहते हैं कि मेरी देशभक्ति पर सवाल उठे तो क्या इसे मुझे समझाना पड़ेगा। मैं बंबई में रहता हूँ। मुम्बईकर हूँ। 20 साल से रह रहा हूँ। यह एक आजाद मुल्क है और प्रत्येक भारतीय को हक़ है जब तक वह अपने टैक्स देता है और कोई आपराधिक कर्म नहीं करता तब तक वह निर्बाध रूप से अपना काम कर सके। मैंने मुम्बई से सब कुछ कमाया है। मेरा मुम्बई पर जितना हक़ है उससे ज्यादा मुम्बई का मुझ पर हक़ है। यह मेरी अस्मिता का प्रश्न है कि मैं पहले भारतीय हू¡बाद में मुम्बईकर। हिन्दी सिनेमा व्यावसायिक सिनेमा है। हमको सबसे बड़ा डर है कि हमारे काम के बाद लोग हंस कर आनंद लें, हमारे काम के कारण लोगों को नुकसान पहुँचे यह हमारा उदेश्य नहीं। मेरी पिक्चर देखने जा रहे व्यक्ति को या उसके परिवार को एक भी पत्थर लग जाए यह कोई भी कलाकार नहीं चाहेगा। जब अपने परिवार के लोगों को मैं फिल्म देखने से सुरक्षा कारणों से मना करता हू¡ तो दूसरे लोगों को कैसे कह सकता हूँ कि वे मेरी फिल्म देखने जाएं।
 शाहरूख की भारतीय जनता से जो अपील है वह हमारे भारतीय कहलाने पर शर्म पैदा कर रही है। एक आजाद मुल्क में शाहरूख खान के साथ जो व्यवहार हो रहा है वह किसी भी तरह से नस्ली हमले से कम नहीं है। फासीवाद का यह हमला हिन्दी फिल्मों पर नया नहीं है। यह सबको मालूम है कि हिन्दी फिल्मों के निर्माताओं और कलाकारों को कई तरह के दबावों में काम करना पड़ता है।
 सी एन एन आई बी एन के राजदीप सरदेसाई चाहते हैं कि शाहरूख हर इस तरह के फासीवादी हमले पर बोलें। टैक्सी ड्राइवरों के मुद्दे पर भी उन्हें बोलना चाहिए यानि कि फिल्म अभिनेता के साथ साथ एक्टिविस्ट की भूमिका भी निभानी चाहिए। शाहरूख एक अभिनेता हैं। अभिनेता से नेतागिरी की मांग करना कहाँ तक जाएज है। एक व्यक्ति अपने पेशे में ईमानदार रहे, लगन और मेहनत के साथ काम करे, इच्छा नहीं है तो एक्टिविस्ट न बने, यह गलत कैसे है ? शाहरूख ने अपनी बात साफगोई के साथ रखी कि मैं रियल लाईफ हीरो बनने की कोशिश नहीं करता फिल्मों में बन जाउ¡ यही बहुत है। अब शायद मुझे चड्ढी, बनियान और अन्य चीजों की तरह ही अपनी देशभक्ति का भी प्रचार करना पड़ेगा और इस तरह के अन्य हमलों का विरोध करना पड़ेगा।
  शिवसेना के लोगों ने मुम्बई के मुलुण्ड में भारी तोड़फोड़ किया है। इस फिल्म की अग्रिम टिकटों की बिक्री के समय यह सारी घटना घटी। अपने पहले के बयानों से पलटते हुए'सामना' में लेख छपा जिसमें कहा गया कि शिवसैनिक अब शाहरूख की फिल्म का विरोध नहीं करेंगे। लेकिन जब 8फरवरी को फिल्म की अग्रिम टिकटें बिकनी शुरू हुईं तो शिवसैनिकों ने हंगामा और तोड़फोड़ शुरू किया। आज 9फरवरी की सुबह खबरों में दिखाया गया कि करण जौहर पुलिस सुरक्षा के लिए पुलिस के आला अधिकारियों से मिलने गए। उसके दो घण्टे बाद ही शिवसैनिकों की गतिविधियों की खबरें चैनलों की प्रमुख ख़बर बन गई।
 फिल्म 'माई नेम इज़ खान' के बारे में अभी जो कुछ सामने आया है उससे इतना जाहिर है कि इस फिल्म में सत्ता और प्रशासन के एथनिक सप्रेशन के खिलाफ एक लाईन ली गई है। फासीवादी, नस्लवादी , राष्ट्रवादी पहचानों के ऊपर प्रेम और भाईचारे को , मानवीय रिश्तों को महत्वपूर्ण बताया गया है। भला यह किसी भी फासीवादी दल को कैसे बर्दाश्त हो सकता है। 'माई नेम इज़ खान' की जगह इस फिल्म का कोई और नाम शायद एशिया के संदर्भ में नस्लवादी पहचान की पेचीदगियों को इतनी बारीक़ी के साथ नहीं उभार सकता था। समूची पश्चिमी दुनिया के लिए अदर बना हुआ एशियाई समाज जिसकी ताकत से पश्चिम डरता है और जिसे वह कमज़ोर करना चाहता है अपने को इस नाम से आईडेन्टिफाई करता है। विशेष संदर्भ में फासीवादी ताक़तों के लिए भी यह नाम आसानी से हजम होनेवाला नहीं है। संयोग से फिल्म में काम करनेवाला हीरो भी एक खान ही है। 
 शाहरूख का लंदन में दिया गया बयान कि उन्होंने कोई गलती नहीं की तो क्यों और किससे माफी मांगें करोड़ों भारतीय जनता के दिलों के ज्यादा करीब था। लेकिन यह कोई फिल्म नहीं जिंदगी है ! इसमें 'फिर भी दिल है हिन्दुस्तानी'की तरह जनता निर्दोष को बचाने के लिए हजारों की संख्या में बाहर नहीं निकल जाती है। निकले भी कैसे एक तो वह हिन्दुस्तानी है दूसरे शाहरूख की नियत पर भी संदेह है कहीं वे फिल्म के प्रचार के लिए तो ये सब नहीं कर रहे ? राजदीप सरदेसाई के सवाल के जवाब में शाहरूख ने तकलीफ और व्यंग्य के साथ कहा कि हा¡ प्रचार तो बहुत मिल गया, बहुत नाम कमा लिया। शाहरूख की पिछली फिल्मों के रिर्काड देखें तो साफ है कि बिना किसी विवाद के भी उनकी फिल्मों ने भारत की विदेशों की जनता के दिलों पर राज किया है। उनकी किसी फिल्म की सफलता के लिए विवाद आयोजित करवाना जरूरी तो कतई नहीं।
 शाहरूख की खूबी है कि वे बहुत आत्मीय और निजी होकर बड़ी बात कह जाते हैं और सोचने पर मजबूर करते हैं। मीडिया ने इधर कुछ दिनों से लगातार उनकी गतिविधियों की रिपोर्टिंग की है। उनके लंदन में फिल्म के प्रमोशन से लेकर उनके बच्चों के गेम शो में तक में मीडिया उनके साथ रही है। अपने बच्चों की जीत पर टिप्पणी करते हुए शाहरूख कहते हैं कि उनके बच्चे उनसे ज्यादा निडर हैं। उन्होंने उनसे कहा कि पापा आप इंडिया आ जाओ सब ठीक है हम सबको हरा देंगे। इन बच्चों को मराठी भी आती है और वे एक 'हिन्दू' मा¡ और'मुसलमान' पिता की संतान हैं। शाहरूख़ का डर निराधार नहीं है कि उनके बच्चे कहीं बाप बनकर उनकी तरह डरने न लगें। वे चाहते हैं देश के सभी बच्चे , सभी नागरिक निर्भय होकर अपनी आजादी को जी सकें। क्या गलत चाहते हैं शाहरूख़। फासीवाद की यह मनोवैज्ञानिक लड़ाई क्या शाहरूख़ हार गए ?भय ही तो पैदा करता है फासीवाद। शाहरूख़ देश के हर नागरिक को निर्भय बनाना चाहते हैं। शाहरूख़ हार नहीं सकते अगर वे वैचारिक समझौता नहीं करते जैसाकि वे अभी टी वी पर कह रहे हैं। व्यक्तियों से मिलना, उनसे संपर्क रखना अलग बात है और इस तरह के फासीवादी हमलों से डरकर वैचारिक रूप में सहमत होना अलग। मैं नहीं जानती गौरी कितनी शर्मिंदा होंगी डरे हुए शाहरूख़ को देखकर। अभी -अभी खबर आ रही है कि घाटकोपर में भी शिवसेना के हमले शुरू हो गए हैं।
 बाल ठाकरे अपनी थोकशाही के जरिए शाहरूख को अपने झण्डे तले ले लेना चाहते हैं। शिवसेना जो इस समय इतना हुंकार भर रही है उसका मकसद शाहरूख के साथ अपनी ट्यूनिंग पैदा करना है। दूसरी ओर यही शिवसेना आई पी एल के मसले पर गुलगपाड़ा मचा के शरद पवार के साथ भी अपने संबंधों को अपनी तरफ झुका कर रखना चाहती है। शाहरूख और आई पी एल दोनों पर शिवसेना की हुंकार हाल ही के विधानसभा चुनावों में शिवसेना की जबर्दस्त पराजय से ध्यान हटाने के लिए और सस्ती लोकप्रियता के जरिए अपने कैडरों को चंगा करने की कोशिश के अलावा और कुछ नहीं है। शाहरूख की फिल्म चले या न चले, आई पी एल हो या न हो, आई पी एल में ऑस्ट्रेलिया के खिलाड़ी खेलें या न खेलें, कोलकाता नाईट राइडर में पाकिस्तान के खिलाड़ी खेलें या न खेलें इन सबसे शिवसेना को कोई लेना - देना नहीं है। शिवसेना का मूल उदेश्य है महाराष्ट्र में अपनी खोई हुई जमीन को हासिल करना। 

कोपेनहेगन में मनुष्य का भविष्य दांव पर लगा था - अरुण माहेश्वरी

धरती की जलवायु पर कोपेनहेगन सम्मेलन (7–18 दिसंबर ’09) खत्म होगया। सम्मेलन के अंदर और बाहर, सभी जगह बेहिसाब उत्तेजना रही। उत्तेजना के मूल में यह चिंता थी कि इस पृथ्वी ग्रह को बचाने का आखिरी मौका है। अब न चेता गया तो पृथ्वी और उसपर मनुष्य मात्र के अस्तित्व पर खतरा है।

इसके बावजूद, अमेरिका, चीन, भारत, ब्राजील, जर्मनी, फ्रांस आदि आज की दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण माने जाने वाले देशों के राष्ट्राध्यक्ष घंटों सर खपाते रह गये, लेकिन जिसे सख्ती के साथ सारी दुनिया पर लागू किया जा सके, ऐसी वैद्यानिक बाध्यता वाला कोई नतीजा सामने नही आया। 

निष्कर्ष के तौर पर जिस समझौते की घोषणा की गयी, वह पर्यावरण को बचाने के बारे में एक सामान्य प्रकार की प्रतिबद्धता के अलावा और कुछ नहीं था। धरती के तापमान को और 2 डिग्री सेंटीग्रेट से ज्यादा नहीं बढ़ने दिया जाना चाहिए, धनी देश अपने ग्रीनहाउस गैस के उत्सर्जन में कटौती करेंगे, विकासशील देश अपने उत्सर्जन पर नियंत्रण करेंगे और गरीब देशों को मौसम में परिवर्तन से निपटने के लिये आर्थिक सहायता दी जायेगी – इस तरह की कुछ सामान्य प्रतिश्रुतियों के अलावा वन–संरक्षण और ग्रीन तकनीक के महत्व की बातें इस समझौते में कही गयी है।

 जो लोग इस सम्मेलन को पूरी तरह से विफल बताते हैं, उनके मंतव्य पर ‘टाईम’ पत्रिका का कहना है कि यह कोरा ‘सरलीकरण’ है। उसके टिप्पणीकार के अनुसार विवादों का होना ही इस सम्मेलन का होना है। कोपेनहेगन में समझौते पर पहुंचने के लिये किया गया संघर्ष ही यह बताता है कि मौसम संबंधी नीति अब जाकर परिपक्व हुई है। 

कोपेनहेगन में चली वार्ता इतने विवादों से भरी हुई इसलिये थी क्योंकि इसके प्रस्तावों का वास्तविक असर सिफ‍र् पर्यावरण पर नहीं, बल्कि राष्ट्रीय अर्थ– व्यवस्थाओं पर पड़ेगा। चीन और अमेरिका ने वार्ता के लिये अपने राष्ट्राध्यक्षों को भेजा और सिफ‍र् इसलिये काफी फूंक फूंक कर कदम रखे क्योंकि इसमें उन्हें कुछ खोना था।
संयुक्त राष्ट्र के तत्वावधान में पर्यावरण सम्मेलनों का सिलसिला 1972 से शुरू होगया था। कोपेनहेगन सम्मेलन 15वां सम्मेलन था। 1997 में जापान के क्योटो में तो ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन पर अंकुश लगाये जाने के बारे में दुनिया के देशों के बीच बाकायदा एक समझौता हुआ था, जिसे 2005 के फरवरी से कानूनन लागू कर दिये जाने की बात थी। उस समझौते पर दुनिया के 141 देशों ने हस्ताक्षर किये थे तथा सबने अपनी राष्ट्रीय सभाओं से उन पर मोहर भी लगवा ली थी। लेकिन अकेले अमेरिका की सीनेट ने उसे स्वीकार नहीं किया और वह पूरा समझौता अधर में लटक कर रह गया। 

क्योटो संधि के अनुसार सात वर्ष के अंदर दुनिया के विकसित देशों को ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में 1990 के स्तर से 5 प्रतिशत कटौती करनी थी। अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने उस पर हस्ताक्षर किये थे। लेकिन 2001 में अमेरिका के नये राष्ट्रपति जार्ज बुश ने इस संधि को यह कह कर ठुकरा दिया कि यह एक बेहद महंगा मामला है। परवर्ती दिनों में व्हाइट हाउस ने ग्लोबल वार्मिंग के बारे मे वैज्ञानिकों के आकलन पर ही सवाल उठाना शुरू कर दिया और कहा जाने लगा  कि यदि अमेरिका इस संधि को मान लेता है तो उससे सारी दुनिया में करोड़ों लोगों के रोजगार छिन जायेंगे।

प्रश्न जहां इस पृथ्वी और उसपर मनुष्य–मात्र के अस्तित्व से जुड़ा हुआ हो, वहां भी राष्ट्रों के खोने–पाने का स्वार्थी हिसाब किया जा रहा है, इसे देख कर बहुतों को आश्चर्य हो सकता है। लेकिन ‘वैश्विक’ चिंताओं वाले इस युग की सबसे बड़ी सचाई यही है। इससे साफ है कि जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण का सवाल सिफ‍र् प्राकृतिक विज्ञान की किसी एक शाखा और उसके विशेषज्ञों का सवाल नहीं है, जैसा कि इस बीच तैयार होगयी पेशेवर पर्यावरण विशेषज्ञों की एक बड़ी सी फौज बताना चाहती है, बल्कि उससे बहुत आगे पूरे सभ्यता विमर्श से जुड़ा हुआ एक व्यापक सामाजिक–आर्थिक सवाल है।

कोपेनहेगन में भी इस सच के अहसास की झलक दिखाई दी थी। इसका प्रमाण अखबारों की रिपोर्टों से पता चलता है कि वहां इका हुए गैर–सरकारी प्रतिनिधियों के बीच गांधीजी के प्रति बड़ा आग्रह था और सम्मेलन स्थल के बाहर ही गांधीजी की एक बड़ी सी तस्वीर भी लगी हुई थी। आज के काल में पर्यावरण के संदर्भ में गांधीजी का स्मरण अनायास नहीं है। 

यह साल गांधीजी की पुस्तक ‘हिंद स्वराज’ की शताब्दी का साल है और ‘हिंद स्वराज’ को आधुनिक सभ्यता के खिलाफ तीव्र घृणा से भरा एक जोरदार अभियोग पत्र कहा जा सकता है। इसमें मौजूदा पूंजीवादी आधुनिक सभ्यता को ‘अधर्म’, ‘शैतानी राज्य’, ‘कलियुग’, ‘नाशकारी’ और ‘नाशवान’ क्या–क्या नहीं कहा गया है। यह ऐसी सभ्यता है कि इसकी लपेट में पड़े हुए लोग अपनी ही सुलगाई आग में जल मरेंगे। इस सभ्यता के प्रतीक रेलगाड़ी, वकील और डाक्टर पर गांधीजी का आरोप था कि भारत को रेलगाडि़यों, वकीलों और डाक्टरों ने कंगाल बना दिया है।

गांधीजी ने इस सभ्यता को बुरी तरह कोसा था, 1909 के बाद से लेकर आजादी के पहले तक वे अपने उन विचारों में किसी परिवर्तन के पक्ष में नहीं थे, लेकिन इतिहास इस बात का भी गवाह है कि खुद अपनी देख–रेख में उन्होंने कांग्रेस के मंच से भारत के भावी विकास की जिन तमाम योजनाओं को अनुमोदित किया, वे रेल की पटरियों को उखाड़ फेंकने या अदालतों को खत्म कर देने और आधुनिक चिकित्सा को ठुकराने की योजनाएं नहीं थी। 

अगर गहराई से देखे तो पता चलेगा कि गांधीजी की आधुनिक वर्तमान की त्रासदियों की पहचान और उसे अधर्म बताना उनके ‘असहयोग’ की तरह ही उनका ‘नकार’ था, विकल्प नहीं। किसी भी बात को अस्वीकार करना भी उतना ही बड़ा आदर्श हो सकता है जितना किसी बात को स्वीकार करना...उपनिषदों के रचयिताओं ने ब्रा का सबसे अच्छा वर्णन ‘नेति–नेति’ कहकर ही किया है।  
असहयोग के बारे में रवीन्द्रनाथ की आपत्तियों पर बहस करते हुए गांधीजी का यही मूल जवाब था। 

उनके विपरीत रवीन्द्रनाथ का सारा बल इस बात पर था कि मनुष्य के अंत:करण का धर्म यही है कि वह परिश्रम से केवल सफलता ही नहीं बल्कि आनंद भी प्राप्त करता है। ...यदि कुछ लोग कहें, यह पत्थर का फलक हमारे दादा–परदादाओं का हथियार है, इसको यदि हम छोड़ दें तो हमारी जाति नष्ट हो जायेगी तो जिसको वे ‘जाति–रक्षा’ कहते हैं वह संभव हो भी सकती है लेकिन वे मानवता की महान परंपरा को आघात पहंुचाते हैं जो उनकी भी है। जो लोग आज भी पत्थर के फलक से संतुष्ट हैं उनको मनुष्य ने जाति से बाहर कर दिया है वे जंगलों में छिपकर जीवन व्यतीत करते हैं।
इसीलिये मसला गांधीजी के इस ‘नकार’ को सत्य मानने का नहीं है, उसकी अन्तरदृष्टि को समझने और आत्मसात करने का है। गांधीजी ने वर्तमान की त्रासदी की लाक्षणिक पहचान की और उसकी बुराइयों की निंदा में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। लेकिन इस त्रासदी की बुनियाद में पूंजीवादी उत्पादन संबंधों के जरिये सक्रिय जो लोभ–लालच काम कर रहा है, जो रवीन्द्रनाथ के संधानशील मानवीय अंत:करण को, विज्ञान भी जिसकी एक अभिव्यक्ति है, नगद–कौड़ी की सेवा में नियुक्त किये हुए है, गांधीजी उसके प्रति कभी उतने निर्मम और कठोर नहीं हो पाये।

प्रकृति के साथ मनुष्य के व्यवहार को मनुष्य के साथ मनुष्य के व्यवहार से अलग करके नहीं समझा जा सकता। जिस समाज में उत्पादन के साधनों से विच्छिन्न मनुष्य की श्रम शक्ति एक बिकाऊ माल होती है, प्रकृति को अपना दास मानना और उसका अधिक से अधिक पण्यीकरण भी उसी समाज की मूल प्रवृत्ति है। 

श्रम की तरह ही प्रकृति संपदा का एक प्रमुख स्रोत है। पूंजीवादी अर्थनीतिशास्त्र उसे मुफ्त की चीज नहीं मानता। और, कहना न होगा, पूरी समाज व्यवस्था प्रकृति तथा श्रम, इन दोनों की ही अबाध लूट को बदस्तूर कायम रखने के समूचे ताम–झाम के अलावा और कुछ नहीं है। ‘श्रम ही सारी संपदा का श्रोत है’ क्लासिकल अर्थशास्त्र के इस कथन को मार्क्‍स एक दुरभिसंधिमूलक कथन मानते थे। उनके शब्दों में पूंजीपति अगर झूठे ही श्रम पर अलौकिक सृजन शक्ति का आरोप करते हैं तो वे ऐसा सकारण करते हैं, क्योंकि ठीक इसी बात से कि श्रम प्रकृति पर निर्भर करता है, यह बात पैदा होती है कि जिस मनुष्य के पास अपनी श्रम–शक्ति के अलावा और कोई संपत्ति नहीं है, उसे समाज और संस्कृति की सभी अवस्थाओं में उन दूसरे मनुष्यों का दास होना पड़ेगा, जिन्होंने अपने को श्रम की भौतिक परिस्थितियों का मालिक बना लिया है।

मार्क्‍स के साम्यवादी समाज का श्रमजीवी मनुष्य एक ‘सहचर मजदूर’ है। वह प्रकृति का स्वामी नहीं, उसका साझीदार है। समाजवादी समाज का योजनाबद्ध विकास मुनाफे की किसी अंधी दौड़ पर नहीं, प्रकृति और मनुष्य के साहचर्य पर टिका होता है।

 मजदूर वर्ग की मुक्ति का आह्वान करने वाले मार्क्‍स को थामस मुंजर का यह कथन बहुत प्रिय था कि सभी प्राणियों को संपत्ति में तब्दील कर दिया गया है, जल में मछली को, हवा में पक्षी को, धरती पर पौधों को – सभी जीवित चीजों को मुक्त किया जाए।

जलवायु और पर्यावरण की तरह के प्रश्नों के टिकाऊ समाधान के लिये मानव समाज और प्रकृति के संबंधों की एक ऐसी अविभाज्य दृष्टि के विस्तार की जरूरत है। पर्यावरण की लड़ाई पूंजीवाद के खात्मे की लड़ाई से जुड़ी हुई है।

किसानों के प्रति टेलीविजन का रोमांस

               
     टेलीविजन स्वभावत: रोमैंटिक है। इसमें रोमैंटिक भावबोध जितना बिकता है यथार्थबोध उतना नहीं बिकता।कृषि पर घमासान मचा है। किंतु किसान गायब है। कृषि सब्सीडी, किसान की पामाली और भुखमरी के चित्र गायब हैं। किसानों के नाम पर मंत्रियों और आला अफसरों के चित्र दिखाए जा रहे हैं। किसी भी चैनल ने यह बताने की जरूरत महसूस नहीं की है कि आखिरकार विश्व अर्थव्यवस्था में किसान किस स्थान पर है ? हमारे देश में किसान कहां चला गया है ?स्वयं किसान अपनी बदहाली के मुद्दों पर क्या सोच रहे हैं ? 

मजेदार बात यह है कि विश्व व्यापार की कृषि संबंधी वार्ताओं में सरकारी प्रतिनिधिमंडल में किसान संगठनों को नहीं बुलाया जाता। सवाल किया जाना चाहिए  क्या पेशेवर कूटनीतिक विमर्श में किसानों की प्रतीकात्मक उपस्थिति भी जरूरी नहीं है ? फ़र्ज करो विकसित देशों ने अपने किसानों को देने वाली समस्त सब्सीडी खत्म कर दी होती तो क्या इससे किसान को बेमौत मरने से बचाया जा सकता था ?

क्या पूंजीवाद में बगैर सब्सीडी के किसान को तबाही से बचाना संभव है ? क्या उद्योग का बगैर सब्सीडी के निर्माण और विकास संभव है ?क्या यूरोप और अमेरिका के किसानों की समस्त सब्सीडी खत्म कर दी जाए तो यूरोप और अमेरिका के किसान बच पाएंगे ?दूसरी बात यह है कि क्या अमेरिका और यूरोप में किसानी का रूप वही है जो तीसरी दुनिया के देशों में है ?क्या अफ्रीकी किसान और भारतीय,चीनी,ब्राजीलियन किसान की बुनियादी समस्याएं और अमेरिकी किसानों की समस्याएं एक हैं ?क्या यूरोपीय आर्थिक समुदाय के देशों में किसानों की जिंदगी में वे समस्याएं हैं जिन्हें तीसरी दुनिया का किसान झेल रहा है।

कहने का तात्पर्य यह है कि किसानों की सब्सीडी के सवाल को बाजार,वाणिज्य और उद्योग के दृष्टिकोण से चैनलों में उठाया जा रहा है।यह कृषि का नहीं वाणिज्य का सवाल बनकर सामने आया।वाणिज्य के सवाल के रूप में पेश करने से इस सवाल के जितने समाधान सुझाए जाएंगे वे सभी व्यापार के हित में होंगे कृषि और कृषक के हित में नहीं होंगे।

 क्या यह विचारणीय मुद्दा नहीं है कि विश्व बहुसंख्यक कृषक आबादी की पामाली के सवाल पर बातें की जाएं ?विश्व की समस्त सरकारों पर सामूहिक तौर पर यह दबाव पैदा किया जाय कि कृषियोग्य और खाली जमीन को खेतिहर किसानों में बांट दिया जाय।अथवा गरीब किसानों के कर्जे माफ कर दिए जाएं। सब्सीडी के सवाल पर जितनी भी चर्चाएं चैनलों में आईं उनमें किसानों के वास्तव मुद्दे एकसिरे से गायब थे। विश्व में किसान जीवन का आज सामाजिक अस्तित्व दांव पर लगा  है।
    
चैनलों में किसानों की अनुपस्थिति को कृषि जीवन के आंकड़ों के जरिए भरने की कोशिश की जाती है।यानी किसान को मत देखो किसान के आंकड़ों को देखो।किसान के साक्षात् जीवन का दृश्यों से गायब होना और उसका आंकड़ा बन जाना इस युग की सबसे बड़ी त्रासदी है।सच यह है कि किसान आंकड़ा नहीं है।वह साक्षात् हाड़ - मांस का जीता-जागता मनुष्य है।हम जब किसी व्यक्ति, समुदाय अथवा वर्ग को जीवन से अपदस्थ करना चाहते हैं तो आंकड़ा बना देते हैं।मनुष्य का आंकड़े या डाटा में रूपान्तरण नए युग की सबसे भयानक त्रासदी है।

गांव में जितने लोग भूख के शिकार हैं उतने ही फीसद शहरों की झुग्गी-झोंपड़ियों में रहनेवाले भूख के शिकार हैं। आम लोगों की क्रयशक्ति घट रही है। सुनिश्चित रोजगार योजनाओं का पूरी तरह अभाव है। हम चीन से प्रतिस्पर्धा करना चाहते हैं किन्तु यह भूल जाते हैं कि चीन के किसान की तुलना में भारत के किसान से बिजली का दुगुना दाम लिया जाता है।भारत में कृषि निवेश घटा है। भुखमरी बढ़ी है।

किसानों के प्रति बैंकों का सौतेला व्यवहार रहा है। बैंक किसी भी किसान को ट्रैक्टर के लिए गांव की जमीन के टुकड़े पर कर्ज नहीं देतीं। यदि कोई बैंक कर्ज मुहैय्या कराएगी तो बदले में किसान को कम से कम तीस बीघा जमीन गिरवी रखनी होगी। इसके विपरीत शहर के किसी भी जमीन के टुकड़े पर बने प्लाट के बदले या जमीन के बदले बैंक से तुरंत कार के लिए कर्ज मिल जाता है।शहर के लोग जब भी गांव जाते हैं वे पर्यटक की तरह जाते हैं।

 किसान नेता शरद जोशी के द्वारा सुझाव दिया जा रहा है कि केन्द्र सरकार को एसेंसियल फूड कमोडिटी एक्ट को खत्म कर देना चाहिए, एफसीआई को बंद कर देना चाहिए। शरद जोशी शायद यह नहीं जानते कि आजादी के पहले एफसीआई जैसी संस्थाओं के अभाव में ब्रिटिश शासन के दौरान सबसे ज्यादा अकाल पड़े। साम्राज्यवाद के नए पैरोकार यही चाहते हैं कि ये दोनों चीजें खत्म कर दी जाएं।इससे सबसे ज्यादा नुकसान गरीबों को होगा।आज हमारे पास खाद्य का सुरक्षित भंडार है।इसके जरिए किसी भी आपात्कालीन स्थिति का सामना किया जा सकता है। अकाल और सूखे की स्थिति से समय रहते निबट सकते हैं। बड़े किसानों के पैरोकारों को किसानों की दरिद्रता से कोई मतलब नहीं है।उन्हें तो फसल चाहिए चाहे जिस कीमत पर पैदा हो। 

उल्लेखनीय है कि केन्द्र सरकार ने 1980 से सिंचाई के क्षेत्र में निवेश बंद कर दिया। इसके कारण फसल पूरी तरह अनुकूल मानसून पर टिक गई है। अनुकूल मानसून नहीं होने पर फसल तबाह हो जाती है। केन्द्र सरकार को यदि किसानों के हितों की इतनी ही चिंता है तो उसे कृषि उपजों के न्यूनतम बिक्री मूल्य की ही घोषणा करके शांत नहीं हो जाना चाहिए। बल्कि एफसीआई के जरिए कृषि उपज की बाजिव दामों पर खरीद की व्यवस्था भी करनी चाहिए। यह तर्क दिया जा रहा है कि सरकारी गोदामों में अनाज रखने की जगह नहीं है अत: सरकार नहीं खरीदेगी। इसके परिणामस्वरूप किसानों को औने-पौने दामों पर अपनी फसल को बेचने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। इससे किसानों की तबाही बढ़ी है और व्यापारियों के पौ-बारह हो गए हैं।

केन्द्र सरकार की किसान विरोधी नीतियों का दुष्परिणाम यह हुआ है कि आंध्र,महाराष्ट्र और कर्नाटक में किसानों द्वारा आत्महत्या के सबसे ज्यादा मामले प्रकाश में आए हैं। इन राज्यों में सबसे ज्यादा पूंजी निवेश हो रहा है। किसान विकसित चीजों की खेती कर रहे हैं।इन फसलों के लिए बैंकों से कर्ज नहीं मिलते।ऐसी स्थिति में किसान सूदखोरों से ज्यादा ब्याज पर कर्ज लेते हैं। जब फसल बिक नहीं पाती तो उनके पास आत्महत्या के अलावा कोई चारा नहीं बचता। क्योंकि उनकी फसल को सरकार खरीदती नहीं है।

आज यदि किसानों के प्रति सच्चे दिल से सरकार कोई काम करना चाहे तो उसके सामने कोई बाधा टिक नहीं सकती।बैंक आंकड़े बताते हैं कि बैंकों का सबसे ज्यादा बकाया पूंजीपतियों पर है न किसानों के पास। अंधेरगर्दी का आलम यह है कि उ.प्र.में किसानों से दस घंटे बिजली  सप्लाई के आधार पर बिजली के बिल भेज दिए गए जबकि बिजली की सप्लाई तीन साढ़े तीन घंटे से ज्यादा नहीं हुई। ऐसी स्थिति में किसान यदि बिलों का भुगतान नहीं करते तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। आंकड़े बताते हैं कि बिजली चोरी सबसे ज्यादा गांवों में नहीं शहरों में होती है। कहने का तात्पर्य यह है कि केन्द्र सरकार किसानों के हितों की चैम्पियन होने का ढ़ोंग करना बंद करे।

सोमवार, 8 फ़रवरी 2010

सभ्यता की तबाही है सांस्कृतिक चक्काजाम -2-

''सांस्कृतिक चक्काजाम'' ने प्रतिक्रियावादी भाषा के प्रयोगों को केन्द्रीय महत्व दिया है। व्यावसायिकता-कामुकता और अनुदारवाद को आदर्श अनुभव के रूप में पेश किया जा रहा है।
 '' सांस्कृतिक चक्काजाम'' का प्रमुख वैचारिक रूप है '' इज्म'' अथवा ''वाद'' ,नई परिस्थितियों में प्रतिदिन नए-नए ''वाद'' जन्म ले रहे हैं। इगोइज्म, ट्राइवलिज्म, सेक्टेरियनिज्म और इम्पीरियलिज्म आदि। इन सभी 'वाद' में एक चीज साझा है, इनमें स्वयं के नजरिए के प्रति आब्शेसन है।आग्रह है। आज हमें '' मी'', ''वी'', ''अस'', और ''अदर्स'' के पदबंधों में सोचने के लिए बांध दिया गया है। 
    
'' सांस्कृतिक चक्काजाम'' का ही परिणाम है सारी दुनिया के बाजार अमेरिकी सांस्कृतिक मालों से पटे पड़े हैं। यही हाल मीडिया उत्पादों और टीवी कार्यक्रमों का है। एकतरफा ढ़ंग से अमेरिका के सांस्कृतिक मालों और मीडिया उत्पादों का निर्यात किया जा रहा है। स्थानीय सांस्कृतिक मालों अथवा गैर पश्चिमी जगत के सांस्कृतिक मालों का  उतनी मात्रा में पश्चिमी देशों के लिए निर्यात नहीं हो रहा है जिस अनुपात में पश्चिमी देशों के सांस्कृतिक मालों का गैर पश्चिमी देशों की ओर निर्यात हो रहा है। सांस्कृतिक मालों के विनिमय के क्षेत्र में इस तरह की असमाता का प्रधान कारण है ''सांस्कृतिक चक्काजाम।' इसे कुछ लोग ''इलैक्ट्रोनिक नव्य उपनिवेशवाद'' भी कहते हैं। किसी के लिए ''सांस्कृतिक साम्राज्यवाद'' है।

''सांस्कृतिक चक्काजाम'' का प्रधान लक्ष्य है अमेरिकी मूल्यों ,विश्वासों,जीवन शैली आदि का प्रचार करना। इस कार्य में सबसे प्रभावी मीडियम के रूप में टीवी उभरकर सामने आया है।
    
 ''सांस्कृतिक चक्काजाम'' का सबसे पहला मंत्र है स्थानीय संस्कृति को अपदस्थ करो। स्थानीय आख्यान को अपदस्थ करो, उसकी जगह पश्चिमी आख्यान को पेश करो। स्थानीय आधुनिकता को अपदस्थ करो ,उसके बदले पश्चिमी आधुनिकता को स्थापित करो।

'' सांस्कृतिक चक्काजाम'' का अर्थ '' उपभोग के स्वर्ग'' का प्रचार करना। ''उपभोग के स्वर्ग '' में वही दाखिल हो सकता है जो पश्चिमी संस्कृति में रचा-बसा है। ''सांस्कृतिक चक्काजाम'' जब चीजों को माल बनाता है तो हम सिर्फ माल ही नहीं खाते, बल्कि समूची प्रकृति, जमीन, संस्कृति, दृश्य प्रस्तुतियां, यहां तक कि मानवीय शरीर का भी उपभोग करते हैं। यह एक तरह का प्रतीकात्मक उपभोग भी है। जब हम सांस्कृतिक उपभोग कर रहे होते हैं तो आत्मसात कर रहे होते हैं, सांस्कृतिक हमला कर रहे होते हैं, सांस्कृतिक उत्पीडन कर रहे होते हैं। सांस्कृतिक कुर्बानी कर रहे होते हैं। इसी क्रम में सांस्कृतिक अधिकार खो रहे होते हैं।
      
''सांस्कृतिक चक्काजाम'' हमें ''उपभोग के स्वर्ग'' की यात्रा कराता हुआ एक ऐसी दुनिया में ले जाता है जहां से हम निकल नहीं पाते, अपनी संस्कृति को खो देते हैं, अपने सांस्कृतिक अधिकारों को खो देते हैं। ''सांस्कृतिक जाम'' जब ''अपदस्थ'' करता है तो पश्चिमी आधुनिकता को विसंदर्भीकृत करते हुए पेश करता है। जिसके बाद उसका नया संदर्भ बनाता है। यह नया संदर्भ अन्य या 'अदर' के साथ बनाया जाता है।

 जब हम ''सांस्कृतिक चक्काजाम'' में फंस जाते हैं तो हमें यह सवाल करना चाहिए कि कौन किसको हजम कर रहा है ? हमारे मीडिया के पर्दे पर पर्यटन के जितने भी विज्ञापन आ रहे हैं अथवा पर्यटन संबंधी कार्यक्रम आ रहे हैं अथवा धार्मिक प्रसारण आ रहे हैं , इनमें जो पाठ रचा जा रहा है, उपभोग के स्वर्ग का जो नया आख्यान रचा जा रहा है उसकी धुरी है ''पश्चिम का पाठ और संस्कृति।''

'' सांस्कृतिक चक्काजाम'' का सबसे आदर्श उदाहरण है थ्योरी का ग्लोबल स्तर पर वितरण। पश्चिमी सैध्दान्तिकियों का जिस तरह प्रसार और इस्तेमाल हो रहा है उसने देशज सैध्दान्तिकी के विकास की ओर से हमारा ध्यान ही हटा दिया है। खासकर ग्लोबल कल्चर के बारे में हम जितना पढ़ ,सुन या देख रहे हैं। यह सब पश्चिमी सैध्दान्तिकी की चोरी की हुई सामग्री है।

     भारत के संदर्भ में पर्यटन, धर्म और स्थानीय संस्कृतियों को जिस तरह नवीकृत किया जा रहा है और विसंदर्भीकृत रूप में जिस तरह पश्चिमी संस्कृति को हमारे गले में उतारा जा चुका है और पश्चिमी उपभोग के स्वर्ग को हमारे पर्यटन,धर्म और देशज संस्कृति से जोड़ा गया है उसने गंभीर संकट पैदा कर दिया है। अब पर्यटन में घूमना प्रमुख है,जानना और जुड़ना प्रमुख नहीं है। 

धर्म हमारे जीवन में उपभोग की सामग्री कभी नहीं रहा। धर्म की शरण में व्यक्ति जाता था उपभोग से बचने के लिए। किंतु नया धर्म उपभोग का महिमामंडन करता है। प्रदर्शनप्रियता,उत्सवधर्मिता और उपभोक्तावाद का हिस्सा बन गया है। 

यही हाल प्रकृति  का है, प्रकृति को भी हमने उपभोग के हवाले कर दिया है, प्रकृति का संरक्षण और पल्लवन हमारा लक्ष्य था, प्रकृति का उपभोग हम वहीं तक करते थे जहां तक प्रकृति का क्षय न हो, किंतु प्रकृति के प्रति नया नजरिया उपभोग को महत्व देता है। उपभोग से न तो धर्म बचता है, न पर्यटन या तीथार्टन और न प्रकृति। 

उपभोग का रास्ता अंतत: पश्चिमी मार्ग है, सांस्कृतिक जाम का मार्ग है। यह सांस्कृतिक क्षय का मार्ग है। हमें इस सवाल पर भी सोचना चाहिए कि क्या उपभोग का कोई देशी रास्ता हो सकता है ? संस्कृति,पर्यटन,धर्म मीडिया के क्षेत्र में '' सांस्कृतिक जाम'' इस बिंदु से प्रारंभ होता है कि आखिरकार आने वाले की इच्छाएं क्या हैं ?उन इच्छाओं की संतुष्टि को प्रमुख स्थान दिया गया है।

'' सांस्कृतिक चक्काजाम'' का एक अन्य फिनोमिना है जिसे '' नैतिक भय'' कहते हैं। ''सांस्कृतिक चक्काजाम'' सबसे ज्यादा '' नैतिक भय'' के सवाल उठाता है, ये सवाल जितने जल्दी उठते हैं उतनी ही जल्दी गायब भी हो जाते हैं। ''नैतिक भय'' उस समय ज्यादा सताता है जब लोग नयी तकनीक के संपर्क में आते हैं। नयी तकनीक के संपर्क में आते ही पहला परिणाम यह निकलता है कि लोगों का स्थापित संस्थानों के प्रति विश्वास डगमगाता है। ऐसे में '' नैतिक भय'' के सवाल अतिरंजित रूप में मीडिया के पर्दे को घेर लेते हैं।

 ''नैतिक भय'' के सवालों को हाल के वर्षों में जिस तरह कवरेज मिला है उससे हमने कुछ भी सीखा नहीं है। '' नैतिक भय'' के प्रश्नों में इंटरनेट पोर्नोग्राफी, बच्चों का खासकर पोर्नोग्राफी में शोषण, मोबाइल फोन के जरिए एमएमएस के सवाल, क्लोनिंग के सवाल ज्यादा उछाले गए हैं, इसके अलावा नैतिक-अनैतिक, श्लील-अश्लील के सवाल भी केन्द्र में आ गए हैं। इस संदर्भ में अचानक नैतिकता के स्वयंभू संरक्षक मैदान में आ डटे हैं। इनमें ज्यादातर वे लोग हैं जो न तो नैतिकता के बारे में जानते हैं और न जिनका कानून के बारे में ज्ञान है और न जो अधिकारी विद्वान् ही हैं। इस प्रसंग में हम बुनियादी बात भूल ही गए कि तकनीक समाज के प्रति तटस्थ नहीं होती है।




सभ्यता की तबाही है सांस्कृतिक चक्काजाम -1-


मीडियाजनित जरूरतें प्रत्येक प्रचार अभियान के साथ बदल जाती हैं। इसी तरह मजूदरों को भी  बांट दिया जाता है। स्थायी मजदूर का अस्थायी मजदूर से भेद किया जाता है। बेकार से दूर रहने को कहा जाता है। ''सांस्कृतिक चक्काजाम''  फिनोमिना के तहत मजदूरों को हायरार्की से जोड़कर पेश किया जाता है। बिजनेस एग्जीक्यूटिव अपने को मालिक समझता है। उसका हायरार्की में सिर्फ जीवनशैली, नस्ल और लिंगभेद के अंतर को कम करके पेश किया जाता है। ''सांस्कृतिक चक्काजाम'' का प्रधान लक्ष्य है युवाओं का आर्थिक,राजनीतिक और वैचारिक शोषण करना।
        साम्राज्यवादी मनोरंजन और विज्ञापन के निशाने पर युवावर्ग है। इस प्रचार अभियान में सामान्य सांस्कृतिक संदेश दिया जाता है कि आधुनिकता अमेरिकी उत्पादों के उपभोग से जुड़ी है। युवाओं को लक्ष्य बनाने के दो लाभ हैं पहला आर्थिक लाभ है,दूसरा है, युवाओं के विद्रोही भाव को नियंत्रित करना, उसे नष्ट करना। यही वजह है कि युवाओं में सत्ताविरोधी भावबोध का क्षय हुआ है। अराजनीतिक भावबोध बढ़ा है।

अमेरिकी मीडियाजनित ''सांस्कृतिक चक्काजाम'' तीसरी दुनिया के देशों में दोहरे भ्रम की सृष्टि कर रहा है। पहला ' अंतर्राष्ट्रीय' का भ्रम, दूसरा 'वर्गातिक्रमण' का भ्रम। इसी तरह टेलीविजन की छद्म इमेजों के जरिए झूठी आत्मीयता और काल्पनिक संपर्क बनाया जा रहा है। इन संपर्कों के जरिए ही निजी समस्याओं के समाधान सुझाए जा रहे हैं। इस तरह की प्रस्तुतियों का संदेश साफ है ,जो पीड़ित है उसे ही अपनी गरीबी के लिए जिम्मेदार ठहराया जा रहा है। सफलता को व्यक्तिगत प्रयास से जोड़कर पेश किया जा रहा है।
  
   '' सांस्कृतिक चक्काजाम'' का लक्ष्य है वाम को अलग-थलग करना,वर्चस्व को स्थापित करना। इसके लिए वाम को काटने के लिए भ्रष्ट राजनीतिक भाषा का इस्तेमाल किया जा रहा है। जिससे पश्चिमी दुनिया के बड़े पूंजीवादी राष्ट्रों के द्वारा किए जा रहे हमलों, हिंसाचार आदि से ध्यान हटाया जा सके। वाम की भाषा में प्रतिक्रियावादी अंतर्वस्तु को बड़े पैमाने पर अस्सी के दशक में प्रक्षेपित किया गया। पूंजीवाद के पक्षधरों को 'रिफार्मर' ,'रिवोल्यूशनरी' आदि कहा गया। जबकि इनके विरोधियों को 'कंजरवेटिव' कहा गया।

'' सांस्कृतिक चक्काजाम '' वैचारिक भ्रम निर्मित करता है। राजनीतिक भाषा के जरिए राजनीतिक 'डिसओरिएंटेशन' पैदा करता है। राजनीति का अर्थ बदल देता है। इस राजनीतिक मेनीपुलेशन से बहुत सारे प्रगतिशील व्यक्तियों का भी नजरिया प्रदूषित कर देता है। परिणामत: वे सबसे ज्यादा असहाय होते हैं।

''सांस्कृतिक चक्काजाम'' ने 'दक्षिणपंथी' और 'वामपंथी' का अर्थ ही नष्ट कर दिया है। यह अर्थ अनेक तरीकों से नष्ट किया जा रहा है। फलत: इस अंतर का विचारधारा के लिहाज से कोई अर्थ ही नहीं रह गया है। वाम की भाषा को भ्रष्ट करके वे वाम और दक्षिण की साम्राज्यवाद विरोधी राजनीतिक अपील और व्यवहार को भी भ्रष्ट बना देता है।

'' सांस्कृतिक चक्काजाम'' की एक अन्य रणनीति है जनता को संवेदनहीन बनाना। पश्चिमी देशों की सेनाओं के द्वारा किए जा रहे हिंसाचार और हत्याओं को उसने रूटिन और सर्वस्वीकृत गतिविधि बना दिया है। इराक पर भीषण बमबारी को वीडियोगेम का रूप दे दिया है। मानवता के विरूद्ध किए जा रहे अपराधों को नाटकीय-मनोरंजक बना दिया है। आम जनता के पुराने विश्वास को नष्ट कर दिया है जिसके आधार पर वह सोचती थी कि मानवीय दुख बड़ी चीज है। आज मानवीय दुख बड़ी चीज नहीं रह गया है। मानवीय पीड़ा को अब हम गलत नहीं मानते। युध्द की नई तकनीक के आधार पर आधुनिकता को परिभाषित किया जा रहा है।
      
मासमीडिया में अभिजनों और पश्चिम के युद्धास्त्रों का महिमामंडन चल रहा है। ''सांस्कृतिक चक्काजाम'' की विचारधारा ने खबरों में जनसंहारक अस्त्रों को मानवीय निर्मिति के रूप में पेश किया है। इसके विपरीत तीसरी दुनिया के पीड़ितों का कहीं पर भी चेहरा नजर नहीं आता, उन्हें '' आक्रामक-आतंकवादी'' के रूप में पेश किया जा रहा है। ग्लोबल स्तर पर मेनीपुलेशन को बरकरार रखने के लिए राजनीति की भाषा को भ्रष्ट बना दिया गया है। अनुमान,सट्टेबाजी, माफिया गिरोहों द्वारा जमीन हथियाने की मुहिम, व्यापार और संपदा को हथियाने वालों को '' सुधारक '' के रूप में पेश किया जा रहा है।

'' लेबर फ्लैग्जिविलटी' के नाम पर मजदूरों के अधिकारों पर हमले तेज हो गए हैं। वे सबसे ज्यादा असुरक्षित और असहाय हो गए  हैं। इजारेदारी तोड़ने के नाम पर सार्वजनिक क्षेत्र के कारखानों को बहुराष्ट्रीय निगमों को सौंपा जा रहा है। '' रिकनवर्जन'' के नाम पर 19वीं शताब्दी में मजदूरों ने जो सामाजिक अधिकार हासिल किए थे उन्हें छीना जा रहा है। 'रिस्ट्रक्चरिंग' के नाम पर स्पेशलाइजेशन ,उत्पादन की आमदनी का सट्टा बाजार में निवेश किया जा रहा है। ' डिरेगूलेशन' के नाम पर राष्ट्रीय कल्याण के लक्ष्य को नियमित करने के लक्ष्य को तिलांजलि दे दी गयी है और उसकी जगह अंतर्राष्ट्रीय बैंकिंग,बहुराष्ट्रीय सत्ता से जुड़े अभिजन के हाथों सत्ता सौंप दी गयी है।

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मेरा बचपन- माँ के दुख और हम

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