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रविवार, 24 जून 2012

सीमेंट के कार्टेल कारोबारियों पर 6,300 करोड़ का जुर्माना


भारत में नव्य आर्थिक उदार नीतियों के गंभीर दुष्परिणाम आने लगे हैं। बाजार की चालक शक्तियों के कामकाज में सरकार की हस्तक्षेप न करने की नीति का यह परिणाम निकला है कि अब एक ही क्षेत्र में व्यापार करने वाली बड़ी कंपनियां आपस मिलकर समूह या कार्टेल बनाकर कारोबार कर रही हैं। इस तरह का कारोबार एकाधिकार विरोधी भारतीय कानूनों की नजर में अवैध है। लेकिन बड़े पूंजीपतियों का कार्टेल बनाकर कारोबार करना जारी है। इसके जरिए वे अवैध ढ़ंग से आम उपभोक्ता से मनमाने दाम वसूल रहे हैं। कायदे से कार्टेल बनाकर काम करने वाली कंपनियों पर भारी जुर्माना ठोंकने के साथ दंड़ स्वरूप उनके कारोबार को बंद कर दिए जाने का कानूनी प्रावधान होना चाहिए।

भारत की यह ठोस वास्तविकता है कि यहां इजारेदारी एवं एकाधिकार विरोधी कानून हैं इन पर निगरानी और दंड देने वाली न्यायिक व्यवस्था भी है इसके बावजूद एकाधिकार के विस्तार को रोकने में सरकार और कानून असफल रहे हैं। हाल ही में सीमेंट कंपनियों का कार्टेल बनाकर व्यापार करने का मामला सामने आया है।जिसके तहत कम्पटीशन कमीशन ऑफ इण्डिया ने 11 सीमेंट कंपनियों के ऊपर 6,300 करोड़ रूपये का जुर्माना किया है। इनमें प्रमुख हैं-एसीसी,अंबुजा सीमेंट,अल्ट्राटेक सीमेंट और श्री आदि ।

उल्लेखनीय है मई-जून में पिछले साल जितनी सीमेंट बिकी थी उससे 14 फीसदी ज्यादा सीमेंट इस साल बिकी है। इस साल 16.26 मिलियन टन सीमेंट की खपत दर्ज की गयी है। जबकि विगत वर्ष इस अवधि में 14.20 मिलियन टन सीमेंट की बिक्री हुई थी। यह भी देखा गया है कि राष्ट्रीयस्तर पर सीमेंट के उपभोग की प्रकृति में बुनियादी तौर पर परिवर्तन आया है। सीमेंट के सकल उत्पादन का मई महिने में 79फीसद उपभोग किया गया जबकि इसी अवधि में पिछले साल मात्र 76 फीसदी अंश का ही उपभोग हो पाया था। सीमेंट की सबसे ज्यादा खपत आंध्र, कर्नाटक,केरल ,तमिलनाडु ,दिल्ली,उत्तराखंड,हरियाणा,पंजाब,राजस्थान और हिमाचल प्रदेश में दर्ज की गयी।

जिन 11 सीमेंट कंपनियों पर कम्पटीशन कमीशन ऑफ इण्डिया ने जुर्माना ठोका है वे कई सालों से निर्बाध ढ़ंग से कार्टेल बनाकर काम करती रही हैं। कम्पटीशन कमीशन ऑफ इण्डिया ने इन कंपनियों को विगत 3 सालों में कमाए मुनाफे में से आठ फीसद अंश जुर्माने के तौर पर तुरंत जमा करने का आदेश दिया है। कमीशन ने अपने फैसले में कहा है ये सीमेंट कंपनियां कार्टेल बनाकर काम करती रही हैं जोकि कानूनन जुर्म है। साथ ही इन कंपनियों ने सीमेंट का उत्पादन घटाया है और मनमाने दाम बढ़ाए हैं। फैसले में कहा गया है कि इस अवधि के दौरान सीमेंट की मांग घटी है। मांग घटने की स्थिति में सीमेंट के दाम में गिरावट आनी चाहिए लेकिन हुआ है उलटा। बाजार में सीमेंट की मांग घटने बावजूद सीमेंट के दाम बढ़ाए गए।

कमीशन ने सन् 2011 में की गयी जांच के दौरान पाया कि सन् 2008-10 के दौरान एसीसी सीमेंट ने 8,150करोड़ रूपये का कारोबार किया ,इस पर आठ फीसद जुर्माना 652करोड़ रूपये बैठता है। अंबुजा सीमेंट ने 6,896 करोड़ रूपये का कारोबार किया जिसके आधार पर 552 करोड़ रूपये जुर्माना देने और इसी तरह अल्ट्राटेक सीमेंट ने 9,142करोड़ रूपये का कारोबार किया है और उसे 731करोड़ रूपये का जुर्माना देने आदेश दिया है। उल्लेखनीय है आदित्य बिड़ला ग्रुप ने सन् 2010 में अपने सीमेंट व्यापार को अल्टाटेक में समाहित कर दिया था। इसके अलावा लघु सीमेंट उत्पादक कंपनियों पर कम जुर्माना लगाया गया है। कमीशन ने अपनी जांच में पाया कि 39प्रतिशत सीमेंट निर्माताओं ने मिलकर कार्टेल बनाया है।

भारत में सीमेंट के 183 बड़े और 360 छोटे प्लांट हैं। इनमें तकरीबन 40 प्लांट की उत्पादन क्षमता 330 मिलियन टन है। यह सकल सीमेंट उत्पादन का 97 प्रतिशत है। कमीशन के अनुसार सीमेंट उद्योग का सकल राष्ट्रीय कारोबार 37,500 करोड़ रूपये का है।

उल्लेखनीय है सन् 1989 में सीमेंट को वि-नियंत्रित किया गया और सन् 1991 में इन कंपनियों ने कार्टेल बनाकर काम आरंभ किया । सन् 2007 में सबसे पहले मोनोपॉली एंड रिस्ट्रक्टिव ट्रेड प्रैक्टिस कमीशन (एमआरटीपीसी) ने इस तथ्य को रेखांकित किया कि सीमेंट कंपनियां कार्टेल बनाकर कारोबार कर रही हैं और अपने एक फैसले में उस समय उसने सभी सीमेंट निर्माता कंपनियों को कार्टेल बनाकर काम करने के लिए दोषी करार दिया था। इस फैसले के आने के आने के बाद से केन्द्र सरकार ने कोई भी ऐसा कदम नहीं उठाया जिससे सीमेंट कंपनियों को कार्टेल बनाकर काम करने से रोका जाए।

हाल ही में कम्पटीशन कमीशन ऑफ इण्डिया ने 11सीमेंट कंपनियों के खिलाफ जो फैसला दिया है उसके खिलाफ ये कंपनियां कंपटीशन एप्लीटेड ट्रिब्यूनल में जल्द ही अपील करेंगी।

उल्लेखनीय है इन कंपनियों के खिलाफ विगत एक साल से जांच चल रही थी। एक विश्लेषक के अनुसार जिन 11कंपनियों पर तीन साल के कारोबार के आधार जुर्माना लगाया गया है वह इन कंपनियों के कुल मुनाफे का 40 प्रतिशत बैठता है। इससे सीमेंट क्षेत्र में नकारात्मक संकेत जाने का खतरा भी है और ऐसी स्थिति में सीमेंट उद्योग में मंदी के आने की संभावनाएं व्यक्त की जा रही हैं ,जबसे सीमेंट कंपनियों पर भारी जुर्माना ठोका गया है तब से सीमेंट कंपनियों के शेयरों में 15 प्रतिशत तक की गिरावट आयी है।





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शुक्रवार, 24 जून 2011

सिंगूर की लूटलीला, टीवी और अराजक राजनीति



भारत के इतिहास में किसी मुख्यमंत्री ने जमीन की खरीद-फरोख्त के मामले में ऐसा भद्दा मजाक नहीं किया जैसा पश्चिम बंगाल की ममता सरकार ने सिंगूर के मामले में किया है। टाटा को राज्य सरकार की लीज पर दी गयी जमीन,जिसके 85 प्रतिशत मुआवजे का भुगतान हो गया,टाटा और अन्य का उस पर 3000 हजार करोड़ खर्च हो गया,और उसे एक ही झटके में कानून के बहाने राज्य सरकार ने अवैध ढ़ंग से हस्तगत कर लिया। कलकत्ता उच्चन्यायालय में टाटा की ओर से याचिका दायर की गई है। जिस पर सुनवाई चल रही है। दूसरी ओर राज्य सरकार जिद पर अड़ी है वो अपनी राजनीतिक प्रतिज्ञाओं को अमलीजामा पहनाकर ही दम लेगी। सिंगूर में पहले कारखाना खोले जाने के पहले पंगा,मध्य में पंगा,स्थापना के बाद पंगा,अब बंद कारखाने पर पंगा।
    सिंगूर में चल रहे जमीन और उद्योग के इस अंतहीन पंगे से कई सवाल उठे हैं क्या पश्चिम बंगाल में फिर से औद्योगिक विकास होगा ? क्या अराजक राजनीति का अंत होगा ? परिस्थितियां बता रही हैं कि राज्य में आने वाले समय में जमीन के सवाल पर बड़ी लड़ाईयां होंगी।काफी खून खराबा होगा।
     सिंगूर के नए प्रसंग में पहला सवाल यह है कि राज्य सरकार ने टाटा को लीज पर दी गयी जमीन वापस लेने के पहले टाटा से बात करने की कोशिश क्यों नहीं की ? किसी विकल्प की खोज क्यों नहीं की ? टाटा को राज्य सरकार ने पहले बुलाया था तो सभ्यता का तकाजा है कि ममता सरकार टाटा को बुलाकर कहती कि हम जमीन वापस चाहते हैं ? टाटा ने किसानों की जमीन नहीं ली थी ,यह जमीन राज्य सरकार ने ली थी।  
ममता बनर्जी को 400 एकड़ जमीन वापस लेनी थी ,यह उन किसानों की जमीन है जिन्होंने मुआवजे के चैक नहीं लिए। 400एकड़ की बजाय सारी जमीन को टाटा से क्यों वापस लिया गया ? नैनो कारखाने के लिए 600 एकड़ जमीन काफी थी जैसा ममता कह रही थीं, वे 600 एकड़ छोड़ क्यों नहीं पायीं ? टाटा से पूरी जमीन लेकर ममता सरकार किसकी सेवा करना चाहती हैं ? वे चाहती तो अनिच्छुक किसानों को मुँह मांगा दिला सकती थीं।
ममता बनर्जी ने अपनी राजनीतिक सनक में नैनो के बने बनाए कारखाने को चलने नहीं दिया,सरकार बनाने के बाद उसे चालू करने का प्रयास नहीं किया,उलटे टाटा को राज्य सरकार द्वारा दी गई जमीन वापस लेली,टाटा को बगैर कोई मुआवजा दिए।टाटा और उसकी सहयोगी कंपनियों का 3हजार करोड़ रूपया खर्च हो गया।यह राजनीतिक मिलिटेंसी है,जो किसी कानून को नहीं मानती।
सिंगूर में नैनो के कारखाने में 22जून 2011 को जमकर लंपटों ने लूटपाट की है।ममतापंथी स्टार आनंद ,कोलकाता टीवी,न्यूज टाइम आदि बांग्ला चैनलों ने नैनो कारखाने में की गई लूटमार की खबर नहीं दिखाई। जबकि पृष्ठभूमि में लूटमार के फुटेज चल रहे थे। एकमात्र 24घंटा और आकाश चैनल ने यह खबर दी। नेशनल चैनलों पर भी ब्लैकआउट था इस खबर पर। 24 घंटा बाद ममतापंथी चैनल दिखा रहे हैं कि कारखाने में किस तरह की सुरक्षा है। सिंगूर के नैनो कारखाने में जब लूट हो रही थी टीवी चैनल एकदम ब्लैकआउट किए थे। असल में पश्चिम बंगाल में किसी बंद कारखाने को वामशासन में मजदूरों ने नहीं लूटा था। यह बेमिसाल घटना है। कलकता उच्चन्यायालय ने भी सुनवाई के दौरान लूटपाट की घटना को लज्जित करने वाली घटना कहा है।
  



















                      




मंगलवार, 9 फ़रवरी 2010

किसानों के प्रति टेलीविजन का रोमांस

               
     टेलीविजन स्वभावत: रोमैंटिक है। इसमें रोमैंटिक भावबोध जितना बिकता है यथार्थबोध उतना नहीं बिकता।कृषि पर घमासान मचा है। किंतु किसान गायब है। कृषि सब्सीडी, किसान की पामाली और भुखमरी के चित्र गायब हैं। किसानों के नाम पर मंत्रियों और आला अफसरों के चित्र दिखाए जा रहे हैं। किसी भी चैनल ने यह बताने की जरूरत महसूस नहीं की है कि आखिरकार विश्व अर्थव्यवस्था में किसान किस स्थान पर है ? हमारे देश में किसान कहां चला गया है ?स्वयं किसान अपनी बदहाली के मुद्दों पर क्या सोच रहे हैं

मजेदार बात यह है कि विश्व व्यापार की कृषि संबंधी वार्ताओं में सरकारी प्रतिनिधिमंडल में किसान संगठनों को नहीं बुलाया जाता। सवाल किया जाना चाहिए  क्या पेशेवर कूटनीतिक विमर्श में किसानों की प्रतीकात्मक उपस्थिति भी जरूरी नहीं है फ़र्ज करो विकसित देशों ने अपने किसानों को देने वाली समस्त सब्सीडी खत्म कर दी होती तो क्या इससे किसान को बेमौत मरने से बचाया जा सकता था ?

क्या पूंजीवाद में बगैर सब्सीडी के किसान को तबाही से बचाना संभव है क्या उद्योग का बगैर सब्सीडी के निर्माण और विकास संभव है ?क्या यूरोप और अमेरिका के किसानों की समस्त सब्सीडी खत्म कर दी जाए तो यूरोप और अमेरिका के किसान बच पाएंगे ?दूसरी बात यह है कि क्या अमेरिका और यूरोप में किसानी का रूप वही है जो तीसरी दुनिया के देशों में है ?क्या अफ्रीकी किसान और भारतीय,चीनी,ब्राजीलियन किसान की बुनियादी समस्याएं और अमेरिकी किसानों की समस्याएं एक हैं ?क्या यूरोपीय आर्थिक समुदाय के देशों में किसानों की जिंदगी में वे समस्याएं हैं जिन्हें तीसरी दुनिया का किसान झेल रहा है।

कहने का तात्पर्य यह है कि किसानों की सब्सीडी के सवाल को बाजार,वाणिज्य और उद्योग के दृष्टिकोण से चैनलों में उठाया जा रहा है।यह कृषि का नहीं वाणिज्य का सवाल बनकर सामने आया।वाणिज्य के सवाल के रूप में पेश करने से इस सवाल के जितने समाधान सुझाए जाएंगे वे सभी व्यापार के हित में होंगे कृषि और कृषक के हित में नहीं होंगे।

 क्या यह विचारणीय मुद्दा नहीं है कि विश्व बहुसंख्यक कृषक आबादी की पामाली के सवाल पर बातें की जाएं ?विश्व की समस्त सरकारों पर सामूहिक तौर पर यह दबाव पैदा किया जाय कि कृषियोग्य और खाली जमीन को खेतिहर किसानों में बांट दिया जाय।अथवा गरीब किसानों के कर्जे माफ कर दिए जाएं। सब्सीडी के सवाल पर जितनी भी चर्चाएं चैनलों में आईं उनमें किसानों के वास्तव मुद्दे एकसिरे से गायब थे। विश्व में किसान जीवन का आज सामाजिक अस्तित्व दांव पर लगा  है।
    
चैनलों में किसानों की अनुपस्थिति को कृषि जीवन के आंकड़ों के जरिए भरने की कोशिश की जाती है।यानी किसान को मत देखो किसान के आंकड़ों को देखो।किसान के साक्षात् जीवन का दृश्यों से गायब होना और उसका आंकड़ा बन जाना इस युग की सबसे बड़ी त्रासदी है।सच यह है कि किसान आंकड़ा नहीं है।वह साक्षात् हाड़ - मांस का जीता-जागता मनुष्य है।हम जब किसी व्यक्ति, समुदाय अथवा वर्ग को जीवन से अपदस्थ करना चाहते हैं तो आंकड़ा बना देते हैं।मनुष्य का आंकड़े या डाटा में रूपान्तरण नए युग की सबसे भयानक त्रासदी है।

गांव में जितने लोग भूख के शिकार हैं उतने ही फीसद शहरों की झुग्गी-झोंपड़ियों में रहनेवाले भूख के शिकार हैं। आम लोगों की क्रयशक्ति घट रही है। सुनिश्चित रोजगार योजनाओं का पूरी तरह अभाव है। हम चीन से प्रतिस्पर्धा करना चाहते हैं किन्तु यह भूल जाते हैं कि चीन के किसान की तुलना में भारत के किसान से बिजली का दुगुना दाम लिया जाता है।भारत में कृषि निवेश घटा है। भुखमरी बढ़ी है।

किसानों के प्रति बैंकों का सौतेला व्यवहार रहा है। बैंक किसी भी किसान को ट्रैक्टर के लिए गांव की जमीन के टुकड़े पर कर्ज नहीं देतीं। यदि कोई बैंक कर्ज मुहैय्या कराएगी तो बदले में किसान को कम से कम तीस बीघा जमीन गिरवी रखनी होगी। इसके विपरीत शहर के किसी भी जमीन के टुकड़े पर बने प्लाट के बदले या जमीन के बदले बैंक से तुरंत कार के लिए कर्ज मिल जाता है।शहर के लोग जब भी गांव जाते हैं वे पर्यटक की तरह जाते हैं।

 किसान नेता शरद जोशी के द्वारा सुझाव दिया जा रहा है कि केन्द्र सरकार को एसेंसियल फूड कमोडिटी एक्ट को खत्म कर देना चाहिए, एफसीआई को बंद कर देना चाहिए। शरद जोशी शायद यह नहीं जानते कि आजादी के पहले एफसीआई जैसी संस्थाओं के अभाव में ब्रिटिश शासन के दौरान सबसे ज्यादा अकाल पड़े। साम्राज्यवाद के नए पैरोकार यही चाहते हैं कि ये दोनों चीजें खत्म कर दी जाएं।इससे सबसे ज्यादा नुकसान गरीबों को होगा।आज हमारे पास खाद्य का सुरक्षित भंडार है।इसके जरिए किसी भी आपात्कालीन स्थिति का सामना किया जा सकता है। अकाल और सूखे की स्थिति से समय रहते निबट सकते हैं। बड़े किसानों के पैरोकारों को किसानों की दरिद्रता से कोई मतलब नहीं है।उन्हें तो फसल चाहिए चाहे जिस कीमत पर पैदा हो। 

उल्लेखनीय है कि केन्द्र सरकार ने 1980 से सिंचाई के क्षेत्र में निवेश बंद कर दिया। इसके कारण फसल पूरी तरह अनुकूल मानसून पर टिक गई है। अनुकूल मानसून नहीं होने पर फसल तबाह हो जाती है। केन्द्र सरकार को यदि किसानों के हितों की इतनी ही चिंता है तो उसे कृषि उपजों के न्यूनतम बिक्री मूल्य की ही घोषणा करके शांत नहीं हो जाना चाहिए। बल्कि एफसीआई के जरिए कृषि उपज की बाजिव दामों पर खरीद की व्यवस्था भी करनी चाहिए। यह तर्क दिया जा रहा है कि सरकारी गोदामों में अनाज रखने की जगह नहीं है अत: सरकार नहीं खरीदेगी। इसके परिणामस्वरूप किसानों को औने-पौने दामों पर अपनी फसल को बेचने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। इससे किसानों की तबाही बढ़ी है और व्यापारियों के पौ-बारह हो गए हैं।

केन्द्र सरकार की किसान विरोधी नीतियों का दुष्परिणाम यह हुआ है कि आंध्र,महाराष्ट्र और कर्नाटक में किसानों द्वारा आत्महत्या के सबसे ज्यादा मामले प्रकाश में आए हैं। इन राज्यों में सबसे ज्यादा पूंजी निवेश हो रहा है। किसान विकसित चीजों की खेती कर रहे हैं।इन फसलों के लिए बैंकों से कर्ज नहीं मिलते।ऐसी स्थिति में किसान सूदखोरों से ज्यादा ब्याज पर कर्ज लेते हैं। जब फसल बिक नहीं पाती तो उनके पास आत्महत्या के अलावा कोई चारा नहीं बचता। क्योंकि उनकी फसल को सरकार खरीदती नहीं है।

आज यदि किसानों के प्रति सच्चे दिल से सरकार कोई काम करना चाहे तो उसके सामने कोई बाधा टिक नहीं सकती।बैंक आंकड़े बताते हैं कि बैंकों का सबसे ज्यादा बकाया पूंजीपतियों पर है न किसानों के पास। अंधेरगर्दी का आलम यह है कि उ.प्र.में किसानों से दस घंटे बिजली  सप्लाई के आधार पर बिजली के बिल भेज दिए गए जबकि बिजली की सप्लाई तीन साढ़े तीन घंटे से ज्यादा नहीं हुई। ऐसी स्थिति में किसान यदि बिलों का भुगतान नहीं करते तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। आंकड़े बताते हैं कि बिजली चोरी सबसे ज्यादा गांवों में नहीं शहरों में होती है। कहने का तात्पर्य यह है कि केन्द्र सरकार किसानों के हितों की चैम्पियन होने का ढ़ोंग करना बंद करे।

सोमवार, 4 जनवरी 2010

पियरे बोर्दिओ और नव्य-उदारतावाद - 10- समापन किश्त

11 सितम्बर के बाद ग्लोबलाइजेशन की नीतियां  बदली हैं। सारी दुनिया में अमेरिका ने ग्लोबलाईजेशन विरोधी ताकतों को आतंकवादी ताकतों के साथ एकमेक किया है। ग्लोबलाईजेशन विरोधियों को पूंजीवाद के शक्तिशाली प्रतीकों पर हमले के लिए जिम्मेदार ठहराया जाने लगा है। ग्लोबलाईजेशन विरोधियों के हमलों का केन्द्र बदला है। मजेदार बात यह है कि आतंकवादी गिरोहों जैसे अलकायदा आदि के हमले भी अमरीकी साम्राज्यवाद के प्रतीक केन्द्रों पर हो रहे थे और ग्लोबलाईजेशन विरोधी ताकतें भी उसके प्रतीक केन्द्रों को निशाना बना रही थीं। इन दोनों के प्रतिरोध और राजनीति में बुनियादी अंतर था। 


अलकायदा वगैरह ने अमरीकी प्रतीकों पर प्रतिरोधस्वरूप हमले किए,बम फेंके, लोगों की हत्या की। जबकि ग्लोबलाईजेशन विरोधियों ने न तो कहीं बम फेंके और न कहीं हमला किया,हां प्रतिवाद में मैकडोनाल्ड आदि संस्थाओं के ठिकानों,रेस्तरांओं आदि पर प्रतिवाद जरुर किया,किंतु यह सारा आयोजन राजनीतिक था,इसके पीछे हिंसाचार सक्रिय नहीं था। इस प्रतिवाद के निशाने पर बहुराष्ट्रीय कंपनियां थीं। ग्लोबलाईजेशन विरोधी प्रतिवाद प्रतीकों के विरोध से शुरू हुआ और ग्लोबलाईजेशन की नीतियों के विरोध तक फैला। आतंकवादी ग्रुपों के द्वारा अमरीकी प्रतीक भवनों पर हमले करके उन्हें बमों से उड़ा दिया गया जबकि ग्लोबलाईजेशन विरोधी ताकतों ने ऐसा कुछ भी नहीं किया,इसके बावजूद अमरीकी प्रचार अभियान में अमरीकी प्रतीकों पर प्रतिवाद करने वालों को एक ही केटेगरी में रख दिया गया।
   
अमरीकी साम्राज्यवाद की विचारधारा का ग्लोबलाईजेशन विरोधियों ने एकाधिक दृष्टिकोणों से विरोध किया है। यह विरोध विचारधारात्मक था। विचारधारा का दायरा व्यापक था,उसकी सीमा तय करना मुश्किल है,वह कहीं भी दिखाई नहीं देती बल्कि सब जगह सक्रिय रहती है। मसलन् मैकडोनाल्ड के रैस्तरां का प्रतीकात्मक विरोध यह सवाल पैदा कर ही सकता है कि क्या रैस्तरां का विरोध करने से विचारधारा का विरोध होता है ? जी हां, वह रैस्तरां है साथ ही प्रतीक भी है। 


  ग्लोबल विरोधी मुहिम में प्रतीकों का प्रतिवाद संघर्ष का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है। 11 सितम्बर की घटना के पहले ग्लोबलाईजेशन विरोधियों ने अमरीकी साम्राज्यवाद के प्रतीकों पर जमकर प्रतिरोध संगठित किया,किंतु 11 सितम्बर के बाद रणनीति बदल दी। चूंकि अमरीकी प्रतीकों पर प्रतिवादी हमले अलकायदा वगैरह के जरिए भी होने लगे अत: ग्लोबलाईजेशन विरोधियों ने सिम्बल या प्रतीकों पर प्रतिरोध की बजाय सारवान ढ़ंग से प्रतिरोध संगठित करने का फैसला लिया। 


  बड़े मीडिया ने अलकायदा और ग्लोबल विरोधियों को अमरीका के खिलाफ घृणा के प्रचारक की कोटि में रख दिया और इनको एक ही थैली के चट्टे-बट्टे के रुप में पेश किया। ग्लोबलाईजेशन विरोधियों ने प्रतीकों पर प्रतिरोध व्यक्त करने की बजाय न्याय और समानता के आधार पर वैचारिक हमले तेज कर दिए। इसी के आधार पर उन्होंने आतंकवादी और तत्ववादी संगठनों के अमरीकी विरोध से भिन्न छवि पेश की।
    
   11 सितम्बर की घटना के बाद हठात् 'सुरक्षा' के सवाल केन्द्र में आ गए, सुरक्षा को सामाजिक सुरक्षा और फिर राष्ट्रीय सुरक्षा तक फैला दिया गया,इसके बहाने जनता के जनतांत्रिक हितों और अधिकारों पर हमले तेज कर दिए गए, साधारण नागरिकों की गतिविधियों पर निगरानी रखी जाने लगी, उनकी व्यक्तिगत जिन्दगी को जासूसी कैमरों और गुप्तचरों के हवाले कर दिया गया और राष्ट्रीय सुरक्षा को सरकारी राष्ट्रवाद में वैचारिक तौर पर तब्दील कर दिया गया। इस तरह सुरक्षा से शुरू हुआ सिलसिला सरकारी राष्ट्रवाद तक पहुँच गया। यही वह बिंदु है जहां ग्लोबलाईजेशन विरोधियों के साथ अमरीकी प्रशासन की सीधी तकरार नजर आती है। 


    11 सितम्बर की घटना ने दूसरा वैचारिक परिवर्तन यह किया कि ग्लोबलाईजेशन की बहस अचानक मीडिया से गायब हो गयी और उसकी जगह लोकतंत्र पर बहस होने लगी। जनतंत्र के बहाने जो बहस सामने आई उसमें देशों से कहा गया कि वे सार्वजनिक कल्याण के लिए जो धन खर्च करते हैं उसमें कटौती करें,श्रम कानून बदलें,पर्यावरण संरक्षण के नाम पर लगी बंदिशें हटा लें। शिक्षा बजट में कटौती करें। यह सब जब तक नहीं करते वे विश्व बाजार में व्यापार नहीं कर सकते,निवेश के लिए अनुकूल माहौल नहीं बना सकते,विश्व प्रतिस्पर्धा में भाग नहीं ले सकते। यदि देशों की सरकारे उपरोक्त रास्ते का पालन करती हैं तो उनके देश का तेजी से विकास होगा देश तरक्की करेगा। ज्यादा से ज्यादा जनतंत्र होगा। यह अमेरिकी साम्राज्यवाद का एकदम नया विश्व एजेण्डा था। इसके खिलाफ प्रतीकात्मक प्रतिरोध से कुछ भी होने वाला नहीं था,यही वजह है कि ग्लोबल विरोधी संघर्ष ने सामाजिक न्याय और समानता के नजरिए के आधार पर अमरीकी प्रचार अभियान के जनतंत्र के स्वांग को वैचारिक और राजनीतिक तौर पर नंगा किया। इसके साथ इस प्रसंग में वैचारिक वैविध्य को बनाए रखा।
     


ग्लोबलाईजेशन के राजनीतिक विमर्श में वैचारिक एकरुपता पैदा करने की बजाय वैचारिक वैविध्य पर जोर दिया गया। इस अर्थ में यह प्रतिरोध पहले के अमरीकी प्रतिवादों की तुलना में ज्यादा व्यापक और जनतांत्रिक था। इसके विपरीत नव्य-उदारतावाद प्रत्येक स्तर पर आर्थिक केन्द्रीकरण पर जोर देता है।केन्द्रीकरण और एकरुपता पर जोर देता है। यह वैविध्य के खिलाफ युध्द की घोषणा है।


    नव्य-उदारतावाद के खिलाफ आंदोलन संगठित करने के लिए जरुरी है कि राजनीतिक, वैचारिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक वैविध्य की रक्षा की जाय,भिन्ना -भिन्ना किस्म की राजनीति करने के माहौल को बनाए रखा जाय,इसका अर्थ नियमों को न मानना नहीं हैं,प्रशासन को अस्वीकार करना नहीं, बल्कि जनतंत्र के बंद दरवाजों को खोलना है,जनतंत्र का विस्तार करना है। 


जिन क्षेत्रों में जनतांत्रिक अधिकार नहीं हैं वहां जनतांत्रिक अधिकारों को प्रतिष्ठित करना है। यह स्थिति पैदा करने के लिए जरुरी है कि विभिन्ना क्षेत्रों में जो संघर्ष चल रहे हैं उनकी आवाजों को अपने घरों में आने दें,उन संघर्षों के साथ अपनी एकजुटता का प्रदर्शन करें। विविधता,प्रगति और जनतंत्र को सामाजिक संघर्षों की धुरी बनाएं, और इसके आधार पर अलग-अलग कार्यक्रमों के आधार पर विभिन्ना वर्गों और सामाजिक समुदायों को संगठित और आंदोलित करें। ग्लोबलाईजेशन का वास्तविक प्रतिवाद तब ही हो सकता है जब ग्लोबलाईजेशन की एकरुप बनाने और केन्द्रीकरण की नीतियों का प्रत्येक स्तर पर विरोध किया जाय।




ग्लोबलाईजेशन ने ग्लोबल विरोधियों के सामने तीन रास्ते छोड़े हैं, 1.वे हाशिए पर चले जाएं अथवा 2.आत्मसात् करें अथवा 3.अपराधीकरण के शिकार बनें। हम इन तीनों ही विकल्पों को एकसिरे से ठुकराएं और अपनी सुविधा और समझ के अनुसार विकल्प तय करें। 


साथ ही यह भी ध्यान रहे कि ग्लोबलाईजेशन का विरोध करने का यह अर्थ नहीं है कि आप ग्लोबलाईजेशन के बाहर हैं,उसके नेटवर्क के बाहर हैं,बल्कि इसका अर्थ यही है कि ग्लोबलाईजेशन के खिलाफ गंभीरता के साथ संघर्ष करते हुए जनतंत्र को और भी ज्यादा व्यापक अर्थवान,प्रभावी और गंभीर बनाएं,ग्लोबलाईजेशन के जनविरोधी फिनोमिना और नीतियों का विरोध करें। 


हम जनतंत्र का ऐसा वातावरण और संरचनाएं बनाएं जो स्थानीय,राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर जनतंत्र को अर्थपूर्ण अभिव्यक्ति दे। ग्लोबल विरोधी होने का अर्थ कूपमंडूक होना नहीं है, तत्ववादी और राष्ट्रवादी होना नहीं है। बल्कि सच्चे अर्थ और वैज्ञानिक समझ के साथ जनतंत्र,समानता और सामाजिक न्याय के पक्ष में समझौताविहीन संघर्ष को जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में ले जाना है। इसी अर्थ में ग्लोबलाईजेशन विरोधी ताकतें अंतर्राष्ट्रीयतावादी हैं और अन्तर-संबंधों पर जोर देने का काम करती हैं। मानवाधिकारों को लागू करने की मांग करती हैं।


 ग्लोबलाईजेशन का अर्थ अमेरिका उसके अनुयायियों के लिए सिर्फ व्यापार और बहुराष्ट्रीय निगमों का राष्ट्रीय सीमाओं के पार से अबाध प्रवेश करने और व्यापार करने की आजादी है। सार्वजनिक संपदा का निजीकरण करना इसका लक्ष्य है। 


जबकि ग्लोबलाईजेशन विरोधियों का बुनियादी लक्ष्य है राष्ट्रीय,स्थानीय संपदा की लूट-खसोट को रोकना,मानवाधिकारों की रक्षा करना,संप्रभु राष्ट्र की रक्षा करना,राष्ट्र के आत्मनिर्भर विकास पर जोर देना। सभी राष्ट्रों के बीच समानता की धारणा का प्रसार करना और शोषण,गुलामी,विस्थापन और शरणार्थी बनाने के सभी प्रयासों का विरोध करने के साथ युध्द की राजनीति का विरोध करना ग्लोबल विरोधी संघर्ष की धुरी है। यही वे बिंदु हैं जिन पर तत्ववादियों के साथ ग्लोबल विरोधियों का वैचारिक अंतर है।
       


दूसरा बड़ा अंतर है बम और जनता की हिस्सेदारी का। तत्ववादी-आतंकवादी संगठन बम-बंदूक की राजनीति के जरिए हिंसाचार पैदा करके अमरीका का विरोध करते हैं,जबकि ग्लोबल विरोधी ताकतें अपने राजनीतिक कार्यक्रम के आधार पर जनता की शिरकत,संघर्ष और कुर्बानियों के जरिए विरोध करते हैं,वे हिंसा के उपायों का सहारा नहीं लेते अपितु राज्य के हिंसाचार का शिकार बनते हैं। 


   आतंकवादियों -तत्ववादियों का लक्ष्य है हिंसा का समाज स्थापित करना, ग्लोबलपंथियों का लक्ष्य है लूट,फूट और उपभोग का समाज स्थापित करना,इन दोनों से भिन्न ग्लोबल विरोधी ताकतों का लक्ष्य है समानता,जनतंत्र और सामाजिक विकास केन्द्रित सामाजिक व्यवस्था का निर्माण करना, शोषण के सभी किस्म के रुपों का विरोध करना और मानवाधिकारों के प्रति  सामाजिक चेतना और जिम्मेदारी के भावबोध का निर्माण करना।
(लेखक-जगदीश्वर चतुर्वेदी, सुधा सिंह)





मंगलवार, 24 नवंबर 2009

मनमोहन का दीवाना अमेरि‍का


            आज कुछ समय पहले भारतीय चैनलों पर भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का अमेरि‍का के राष्‍ट्रपति‍ बराक ओबामा द्वारा कि‍या जा रहा राजकीय स्‍वागत समारोह लाइव दि‍खाया जा रहा था। इस प्रसारण में इन दोनों नेताओं ने लोकतंत्र की साझा परंपरा का गुणगान कि‍या। पुरानी दोस्‍ती की यादों को दोहराया । राष्‍ट्रपति‍ ओबामा ने तो यहॉं तक याद दि‍लाया कि‍ जब साठ साल पहले तत्‍कालीन प्रधानमंत्री पंडि‍त जवाहरलाल नेहरू अमेरि‍का राजकीय अति‍थि‍ के रूप में आए थे तो उस समय उन्‍होंने क्‍या कहा था । जबाव में पंडि‍तजी ने क्‍या कहा था।
     इसी प्रसंग में याद आता है कि‍ उस समय के अमेरि‍की मीडि‍या ने नेहरूजी की अमेरि‍का यात्रा का बड़ा ही खराब कवरेज दि‍या था,एक बड़े अखबार ने तो कार्टून छापा था जि‍समें नेहरूजी को भीख का कटोरा लि‍ए दि‍खाया था। नेहरूजी उस समय के कवरेज पर बेहद दुखी हुए थे।
     आज किंतु अमेरि‍का की स्‍थि‍ति‍ बदली हुई है। अमेरि‍की मीडि‍या और राजनीति‍क गलि‍यारों में मनमोहन सिंह के भोज में शामि‍ल होने के लि‍ए जबर्दस्‍त होड़ मची है। अमेरि‍की की मौजूदा मंदी की अवस्‍था में चीन के बाद सबसे ज्‍यादा मदद भारत ने की है। भारत ने अमेरि‍की रि‍जर्व बैंक के सबसे ज्‍यादा बॉण्‍ड खरीदकर पूंजी नि‍वेश कि‍या है। आज  भारत की मदद से ही अमेरि‍का अपनी मंदी के कष्‍टों से उबर पा रहा है। मनमोहन सिंह के द्वारा सुझाए गए सभी नीति‍गत आर्थिक सुझावों को पि‍छले दि‍नों 'जी 20' ग्रुप के देशों की बैठक में माना गया। अमेरि‍का में मनमोहन सिंह की यात्रा का कवरेज इतना शानदार आ रहा है कि‍ उसे देखकर हमारे भाजपा नेता भी चि‍न्‍ता में होंगे। क्‍योंकि‍ अटलबि‍हारी बाजपेयी की अमेरि‍का यात्रा का कवरेज बड़ा खराब आया था, मुझे याद है वालस्‍ट्रीट जरनल ने उन्‍हें अंदर के पेज 9 पर संक्षेप में चार पंक्‍ति‍ की खबर देकर छापा था। सीनेट में वे जब बोलने गए तो आधे सदस्‍य गायब थे। इसकी तुलना में मनमोहन सिंह का कवरेज देखने लायक है। 'वाशिंगटन टाइम्‍स' का नमूना देखें-

 
 
 
 
 
 
Tuesday, November 24, 2009

Tea Party react: Conservatives seek litmus test for RNC funding

Eager to ensure that "tea partiers" don't undermine GOP candidates, conservative members of the Republican National Committee are pursuing the creation of a rule that would bar the Republican Party from funding candidates who fail a conservative litmus test.
The group is circulating a petition among committee members that would enshrine former President Ronald Reagan's proposition that his 80 percent friend was not his 20 percent enemy. The rule would require Republican candidates to share at least 80 percent of the party's main tenets to be eligible for party aid.
The resolution, if adopted, would withhold party money from the candidates and from the National Republican Senatorial Committee and the National Republican Congressional Committee - the two party affiliates charged with electing Republicans to Congress.
"This is an '80-percent unity for conservative principles' resolution, and if some consider this is a litmus test, so be it, because as a party we must stand by our basic principles in defense of our freedom," said Oregon RNC member Solomon Yue.
The resolution "imposes standards for candidate financial support, which includes both the $5,000 in cash contributions to the candidate and the $42,100 in coordinated expenditures [in primary and general elections]," said Jim Bopp Jr., a constitutional lawyer who is chairman of the National Republican Conservative Caucus and an RNC member from Indiana.
Members of the conservative group within the RNC tell The Washington Times that, besides aiming to make the GOP more consistently and reliably conservative by promoting lower taxes, keeping spending levels in check and focusing on national security, they want to head off an already emerging third party inspired by the anti-spending tea-party movement.
The third-party movement picked up steam during the recent special congressional election in upstate New York.
In that election, the RNC and the NRCC contributed large sums to liberal Republican Dee Dee Scozzafava's campaign, despite the presence of Conservative Party candidate Doug Hoffman. Mrs. Scozzafava in the end bowed out and endorsed the Democratic candidate, Bill Owens, who eventually won the race.
RNC Chairman Michael S. Steele said afterward that he made no attempt to persuade Mrs. Scozzafava to stay neutral or endorse the Conservative Party candidate.
Neither the NRCC nor NRSC would comment about the resolution. The RNC may spend up to $84,200 in coordinated expenditures for a House race, and the maximum is $2,284,900 for a Senate campaign, if the state party assigns its coordinated expenditure limit to the RNC.
The resolution could pose problems for candidates such as Florida Gov. Charlie Crist, who's facing a stiff primary challenge from former Florida House Speaker Marco Rubio in the race to replace outgoing Sen. Mel Martinez, a Republican. Mr. Rubio is favored by the conservative wing of the party, which has been frustrated by Mr. Crists embrace of President Obamas stimulus package and his support for energy policy based on fears of climate change.
The NRCC has reached out to conservatives in recent weeks to make sure their leaders can support the committee's top-tier challengers in next year's elections.
One party strategist, speaking on the condition of anonymity to freely discuss the touchy intraparty issues involved, urged the RNC members to be careful.
The strategist said a litmus test would send the wrong message to independents whom the party is looking to attract, and said primaries are the best tests of who represents Republicans in each state or district.
"We already have screen tests in place, and they are called Republican voters. If a candidate doesn't support the principles of the party, Republican voters aren't going to choose them as a candidate, which renders the whole coordinated-funds issue completely moot," the strategist said. "Respectfully, some of these committee members need to take a step back and realize this is unnecessarily harmful."
The RNC conservatives' move could put pressure on Mr. Steele.
His allies on the RNC have privately argued against the 80 percent rule, which sponsors want to have debated and put to a vote at the January meeting of the RNC in Honolulu.
The last time a resolution to bar funding to Republican candidates was attempted was in 1991, when social conservative Tim Lambert, an RNC member from Texas, narrowly lost a floor vote on his proposal not to help pro-choice Republican candidates.
Some of the party's most prominent figures, including former Chairman Haley Barbour, now Mississippi governor, were flown into the meeting to speak against the Lambert resolution, arguing that it was a litmus test and thus did not comport with the GOP's "big tent" philosophy.



गुरुवार, 17 सितंबर 2009

सभ्‍य देश का झूठा राष्‍ट्रपति‍

अमेरि‍का के राष्‍ट्रपति‍ बराक ओबामा ने हाल ही में स्‍वास्‍थ्‍य और चि‍कि‍त्‍सा की अमेरि‍का में स्‍थि‍ति‍ को लेकर हाल ही में अपने देश की सीनेट में जब बयान दि‍या तब उस बयान को लेकर सीनेटरों ने ओबामा को झूठा तक करार दे दि‍या। यह मामला थमा ही नहीं था कि‍ भू.पू.राष्‍ट्रपति‍ जि‍मी कार्टर ने आग में घी डालने वाला बयान दे डाला कि‍ ओबामा के खि‍लाफ जो लोग हल्‍ला मचा रहे हैं वे ओबामा के प्रति‍ रंगेभेदीय घृणा व्‍यक्‍त कर रहे हैं। कार्टर साहब के बयान में सच का लेशमात्र भी अंश नहीं है । सच यह है कि‍ राष्‍ट्रपति‍ ओबामा ने सीनेट में असत्‍य कहा था। ओबामा ने अपनी 40 मि‍नट के भाषण की शुरूआत ही इस वाक्‍य से की थी 'एक चि‍न्‍ता की खबर है', ' यह पता चला है कि‍ 65 साल की उम्र के तकरीबन आधे से ज्‍यादा अमरीकी आगामी 10 सालों अपनी स्‍वास्‍थ्‍य सुरक्षा गारंटी खो देंगे।'' और '' एक-ति‍हाई से ज्‍यादा लोगों के पास एक वर्ष से भी ज्‍यादा समय तक कोई स्‍वास्‍थ्‍य सुरक्षा गारंटी नहीं होगी।'' सीनेटरों ने चीखकर ओबामा के बयान का प्रति‍वाद कि‍या और कहा कि‍ राष्‍ट्रपति‍ झूठ बोल रहे हैं। तथ्‍य ओबामा के बयान की पुष्‍टि‍ नहीं करते।
मि‍शिंगन वि‍श्‍ववि‍द्यालय के द्वारा सन्1997- 2006 के बीच 17 हजार लोगों में सर्वे कि‍या गया। उससे यह तथ्‍य सामने आया है कि‍ उपरोक्‍त दशक के दौरान 47.7 प्रति‍शत लोगों ने अपनी स्‍वास्‍थ्‍य सुरक्षा गारंटी खो दी। इसी अवधि‍ में 36 फीसद ऐसे भी लोग थे जि‍नके पास एक वर्ष तक कोई स्‍वास्‍थ्‍य सुरक्षा गारंटी नहीं थी। असल में ओबामा ने इस सर्वे के आंकड़ों का दुरूपयोग कि‍या है और कहा कि‍ ऐसा भवि‍ष्‍य में हो सकता है। जबकि‍ यह सर्वे भवि‍ष्‍य के बारे में नहीं था अतीत के बारे में था। मजेदार बात यह है कि‍ इस तर्क वि‍तर्क का काले गोरे से कोई संबंध नहीं है। इसके बावजूद भू.पू.जि‍मी कार्टर जैसे दि‍ग्‍गज नेता ने इस बहस को रंगभेदीय रंग दे दि‍या। जि‍मी कार्टर जो कह रहे हैं उसमें सत्‍य यही है कि‍ अमेरि‍का में अभी भी रंगभेद है। रंगभेदीय उत्‍पीडन अभी भी जारी है। लेकि‍न ओबामा के खि‍लाफ हाल ही में जि‍स तरह की प्रति‍क्रि‍याएं आई हैं उनमें ज्‍यादातर नस्‍लभेदीय नहीं हैं। मजेदार बात यह है जि‍स दि‍न जि‍मी कार्टर ने अपना बयान दि‍या उसी दि‍न स्‍कूली बच्‍चों की एक बस में बच्‍चों के बीच मारपीट हो गयी और उसे एक नस्‍लभेदीय नजरि‍ए से प्रेस में हवा दे दी गयी। प्रेस में छपे बयान में कहा गया कि‍ बस में सफर करने वाले गोरे बच्‍चे अब काले बच्‍चों के हाथों सुरक्षि‍त नहीं हैं।
सच यह है कि‍ ओबामा को गोरे-काले सभी रंगत के लोगों से व्‍यापक जनमर्थन मि‍ला था,इसके बावजूद उनकी जीत को सुनि‍श्‍चि‍त बनाने में श्‍वेत फंडामेंटलि‍स्‍टों और ईसाई फंडामेंटलि‍स्‍टों की भी महत्‍वपूर्ण भूमि‍का थी।
जि‍मी कार्टर का बयान ओबामा को पुन: अस्‍मि‍ता की राजनीति‍ के वि‍वाद में ले जा सकता है, इससे अमेरि‍का में अस्‍मि‍ता की बहस फि‍र से जोर पकड़ सकती है।
'अस्मिता के सम्मोहन' के साँचे में सजाकर जब चीजें पेश की जाती हैं तो आप आलोचनात्मक नजरिए से मूल्यांकन करने में असमर्थ होते हैं। 'अस्मिता सम्मोहन' की राजनीति में आकर्षण और सम्मोहन दोनों है। इसके आधार पर विरोधियों को सम्मोहित करते हैं। छलते हैं। निरूत्तर करते हैं। यह खोखला सम्मोहन है। वह विरोधी को 'सम्मोहन' के नियमों के अनुसार खेलने के लिए मजबूर करता है। 'सम्मोहन' में वही देखते हैं जो दिखाया जाता है।
मीडिया प्रचार में ओबामा अश्वेत है, अश्वेत का अमरीका में जीतना सारी दुनिया में अश्वेतों या दलितों या वंचितों को प्रेरणा देता है। ओबामा अश्वेत है इसे अस्वीकार नहीं किया जा सकता है। अश्वेत होने के नाते वह युवाओं और राजनीति का आदर्श प्रेरक के रूप में उभर कर आए थे । लेकि‍न औबामा जि‍स वि‍चारधारा और राजनीति‍ का प्रति‍नि‍धि‍त्‍व करते हैं वह श्‍वेतों की राजनीति‍ है। ओबामा अमरीका की अश्वेत राजनीतिक परंपरा का हिस्सा नहीं है, वे कारपोरेट राजनीति के प्रतिनिधि हैं। कारपोरेट राजनीति के बिना ओबामा की कोई हैसियत नहीं है। ओबामा को लोग राष्‍ट्रपति‍ के रूप में जानते हैं न कि अश्वेत नेता के रूप में। अश्वेत असंतोष को ओबामा ने राजनीतिक पूंजी में तब्दील किया है। जिस तरह अन्य रिपब्लिकन नेता अश्वेत राजनीति के फल भोगते रहे हैं उसी तरह ओबामा भी फल भोग रहे हैं।
राजनीति सत्ता का खेल है । व्यक्ति जब एकबार सत्ता के खेल में शामिल हो जाता है तो उसकी श्वेत,अश्वेत,हिन्दू,मुसलमान, दलित,नारी आदि की पहचान गायब हो जाती है। राजनीति की अपनी स्वतंत्र पहचान और राजनीतिक प्रक्रियाएं होती हैं जिसमें सिर्फ एक ही पहचान बचती है वह है राजनेता की और एक ही खेल होता है सत्ता का खेल। बाकी सब नाटक है।
राजनेता की पहचान व्यक्ति की समस्त अस्मिताओं को हजम कर जाती है। राजनेता कभी भी सत्ता के खेल के बाहर नहीं होता। श्वेत,अश्वेत,नारी,दलित आदि रूप सामाजिक जीवन में असर दिखाते हैं। व्यक्ति जब राजनीति करने लगता है तो वह सामाजिक पैराडाइम के बाहर चला जाता है। राजनीति उसका मूल पैराडाइम होता है। राजनीति पावर का क्षेत्र है अस्मिता का नहीं।
आंबेडकर दलित थे किंतु अंतत राजनीति का हिस्सा बने। राजनीति के पावरगेम का हिस्सा बने। दक्षिण अफ्रीका में अफ्रीकी कांग्रेस अश्वेतों का दल है,एक से बढ़कर एक अश्वेत क्रांतिकारी नेता इस दल ने पैदा किए हैं किंतु अंतत: अफ्रीकी कांग्रेस को राजनीति करनी है तो पावरगेम का हिस्सा बनना होगा और अश्वेत भावबोध को त्यागना होगा। आज अफ्रीकी कांग्रेस सत्ता की राजनीति कर रही है उसके कार्यकलापों का अस्मिता के कार्यकलापों के साथ प्रतीकात्मक संबंध है , निर्णायक संबंध पावरगेम के साथ है। श्रीमती इंदिरागांधी स्त्री थीं किंतु राजनीति के पावरगेम का हिस्सा थीं। यही दशा मायावती,ममता बनर्जी, जयललिता आदि नेत्रियों की है। सत्ता की राजनीति की चौपड़ में जब अस्मिता शामिल हो जाती है तो अस्मिता नहीं रहती बल्कि राजनीतिक पावरगेम में रूपान्तरित हो जाती है।
ओबामा अब काले नहीं हैं,डेमोक्रेट भी नहीं हैं। अमरीकी राजनीति के पावरगेम के नायक हैं। पावरगेम, नायक के द्वारा नहीं पावरगेम के मदारियों के द्वारा संचालित होता है। पावर वह है जो व्यक्ति पर प्रभुत्व स्थापित करता है। पावर के सामने व्यक्ति को समर्पण करना जरूरी है। पावर के सामने व्यक्ति का समर्पण ही राजनीति की धुरी है।
राजनीति के पावरगेम में शामिल होने के बाद व्यक्ति एक ऑब्जेक्ट बनकर रह जाता है। पावरगेम का अपना अनुशासन है। वह व्यक्ति के सामान्य कार्यव्यापार को इस तरह निर्देशित करता है जिससे सबको स्वाभाविक लगे। वह राजनीति के एथिक्स,व्यवहार आदि सीखता है। व्यक्ति आज्ञाकारी और ज्यादा उपयोगी हो जाता है। ओबामा ने कारपोरेट हि‍तों और अमरीका की प्रचलि‍त नव्‍य उदार नीति‍यों के सामने समर्पण कि‍या है और वे वही सब काम कर रहे हैं जो वि‍गत राष्‍ट्रपति‍ बुश कर रहे थे। इसका ही यह दुष्‍परि‍णाम है कि‍ अमेरि‍का में ओबामा की जनप्रि‍यता में तेजी से गि‍रावट आयी है।

शनिवार, 12 सितंबर 2009

चैनलों की कर्म संस्‍कृति‍ और नया माहौल

भारत में टेलीवि‍जन चैनलों की बाढ़ आयी हुई है। चैनलों का यह सि‍लसि‍ला थमने वाला नहीं है। चैनलों की चमक अपील करती है। चैनलों के इस हंगामे में अगर कोई वंचि‍त है तो चैनलों में काम करने वाले लोग। चैनलों की कर्मसंस्‍कृति‍ अभी तक परि‍भाषि‍त नहीं है। चैनलों के अंदर कि‍स तरह का प्रशासन और संचालन प्रणाली हो,कर्मचारि‍यों के कि‍स तरह के पद और पगार आदि‍ हो, काम के घंटे कि‍तने हों, कर्मचारि‍यों की तरक्‍की के नि‍यम क्‍या हों,इत्‍यादि‍ सवालों पर हमारा मीडि‍या उद्योग अभी तक चुप क्‍यों है ? अनेक चैनल हैं जि‍नमें काम करने वालों को समय पर पगार नहीं मि‍लती,जो लोग काम करते हैं उन्‍हें सही तनख्‍वाह नहीं मि‍लती। औने-पौने दामों पर चैनलों में लोग काम कर रहे हैं। नौकरी के मामले में सबसे ज्‍यादा अनि‍श्‍चि‍त भवि‍ष्‍य अगर कि‍सी का है तो चैनल कर्मचारि‍यों का है। केन्‍द्र सरकार अभी तक यह तय क्‍यों कर पायी है कि‍ चैनलों में काम करने वालों की सेवाशर्त्‍तें क्‍या होंगी ? चैनलकर्मि‍यों का अबाध शोषण जारी है। क्‍या केन्‍द्र सरकार कि‍सी भयावह तबाही का इंतजार कर रही है ? तमाम कि‍स्‍म के वि‍षयों पर जमकर लि‍खने वाले पत्रकारों को चैनलों में काम करने वालों की दुर्दशापूर्ण अवस्‍था पर लि‍खने का मन क्‍यों नहीं होता ? हमारे पत्रकार नि‍हि‍तस्‍वार्थी मानसि‍कता के फ्रेम के बाहर आकर चैनलों में काम करने वालों की दशा-दुर्दशा पर कुछ भी क्‍यों नहीं लि‍खते ? हमारे न्‍यायालयों में आए दि‍न जनहि‍त याचि‍का दायर करने वाले मानवाधि‍कार कर्मी इस मसले पर चुप क्‍यों हैं ? कायदे से अखबारों से लेकर नेट तक चैनलों के अंदरूनी तंत्र के उद्घाटन के बारे में सुनि‍योजि‍त ढ़ंग से मुहि‍म चलायी जानी चाहि‍ए। इस काम के लि‍ए जो भी उपयुक्‍त पद्धति‍ हो उसे लागू कि‍या जाना चाहि‍ए।
प्रत्‍येक चैनल के अंदरूनी संसार,कार्यप्रणाली,नौकरी करने वालों की संख्‍या,प्रत्‍येक पद पर काम करने वालों की पगार,काम के घंटे आदि‍ के ब्‍यौरे कि‍सी न कि‍सी रूप में प्रकाशि‍त कि‍ए जाने चाहि‍ए। साथ ही संबंधि‍त चैनल का मालि‍क कौन है, कि‍स तरह संचालन के लि‍ए धन एकत्रि‍त कि‍या है। कौन और कि‍तने हि‍स्‍सेदार हैं। प्रबंधन का तरीका क्‍या है, कर्मचारि‍यों की सेवाशर्ते क्‍या हैं इत्‍यादि‍ सवालों पर सि‍लसि‍लेबार ढ़ंग से रहस्‍योद्धाटन कि‍या जाना चाहि‍ए। इससे चैनलों के बारे में पारदर्शि‍ता बढेगी।
चैनल कर्मि‍यों का पना बृहत्‍तर संगठन हो प्रत्‍येक चैनल में उसकी शाखाएं हों, जि‍ससे वे एकजुट होकर प्रबंधन के साथ बातें कर सकें,अपनी समस्‍याएं सुलझा सकें।वि‍भि‍न्‍न मजदूर संगठनों को भी इन कर्मचारि‍यों को संगठि‍त करने के बारे में सोचना चाहि‍ए। चैनल कर्मियों के प्रभावशाली संगठन के अभाव में चैनल मालि‍क अपने कर्मि‍यों के साथ अमानवीय व्‍यवहार कर रहे हैं। चैनल संस्‍कृति‍ ने मीडि‍या में जि‍स अराजकता और नि‍यमहीनता को जन्‍म दि‍या है उसके उद्घाटन के बाद ही मालि‍कों के ऊपर दबाव बनेगा। केन्‍द्र सरकार भी समझेगी कि‍ आखि‍रकार वह कोई ब्रॉडकास्‍टिंग के नि‍यमन का तंत्र बनाए । अभी चैनल मालि‍कों ने अपना संगठन बना लि‍या है और इसके जरि‍ए वे सरकार के साथ अपनी सौदेबाजी करते रहते हैं। मालि‍कों के संगठन ने कभी अपने सदस्‍य चैनल में चल रही अनि‍यमि‍तताओं की ओर ध्‍यान ही नहीं दि‍या है, वे सि‍र्फ अपने धंधे के वि‍स्‍तार और संरक्षण के सवालों पर ही सक्रि‍य होते हैं। चैनलकर्मी और चैनलों की कर्मसंस्‍कृति‍ उनकी चि‍न्‍ता के केन्‍द्र में नहीं है। यह स्‍थि‍ति बदलनी चाहि‍ए। चैनलों की उठापटक की खबरें, कर्मचारि‍यों की समस्‍याओं पर तरह तरह के लेख और अन्‍य सूचनाएं अभी बहुत कम मात्रा में सि‍र्फ नेट पर ही दि‍खते हैं। प्रेस में उन्‍हें प्रमुखता नहीं दी जाती।‍
दूसरी ओर चैनल संस्कृति ने तर्क के मुहावरे, भाषा का मर्म और बाजार के विकास के नियम बदल दिए हैं। बौध्दिकों में भ्रम पैदा किया है। बोगस,खोखले,सतही और कृत्रिम को महत्ता दिलाई है। आदर्श बनाया है।चैनलों में सब ग्लोबल और इकसार नहीं है,बल्कि प्रतिरोधी और क्षेत्रीय भी है।चैनल संस्कृति वस्तुत: अस्मिता संस्कृति है।मासकल्चर है।लैटिन अमेरिका, मध्यपूर्व,यूरोपीय यूनियन और भारत का अनुभव बताता है कि चैनलों के प्रसार ने स्वतंत्र राष्ट्रों की संप्रभुता, क्षेत्रीय एकजुटता को मजबूत बनाया है।चैनलों के माध्यम से साझा भाषा और सभ्यता का निर्माण हो रहा है।जहां-जहां चैनल संस्कृति अपने पैर पसार रही है वहां पर जनता में संपर्क,एकजुटता और करीबीपन बढ़ा है। यह स्थिति आज से दस बरस पहले नहीं थी।भाषायी एकता मजबूत हुई है। ज्ञान ,खबरों,मनोरंजन,शिक्षा आदि में इजाफा हुआ है।सूचना पाने का अधिकार और मनोरंजन प्राप्ति के अधिकार के रूप में दो नए अधिकारों का जन्म हुआ है।क्षेत्रीय जरूरतों के कारण क्षेत्रीय खबरों का भी जन्म हुआ है।टेलीविजन ने खबरों को देशज सीमाओं के बाहर ले जाकर अपने लिए नया 'स्पेस' बनाया है।इस प्रक्रिया में दर्शक भी देशज सीमाओं के बाहर जा रहे हैं। इसके कारण दर्शकों के एक काल्पनिक समुदाय का जन्म हुआ है।
नवजागरण के साथ प्रेस क्रांति ने जातीय भाषा,जातीय व्यापार और जातीय चेतना का निर्माण किया था।इसके परिणामस्वरूप साधारण लोगों में जातीय भाषा के प्रति आकर्षण पैदा हुआ।ऐसा सामाजिक समूह उभरकर आया जो अपनी भाषा में लिखता,बोलता था।किंतु अपने क्षेत्र के बाहर अन्य भाषा का इस्तेमाल करता था।भारत में जब प्रेस आया तो उसने संस्कृति की तमाम दीवारों को गिरा दिया।सांस्कृतिक संकीर्णता के बंधनों से मुक्त किया और राष्ट्रीय अस्मिता को बढावा दिया।बहुराष्ट्रीय उपग्रह चैनलों ने मूलत: इस स्थिति को बल पहुँचाया।प्रेस की नई तकनीकों,सैटेलाइट और इंटरनेट ने दूर से स्वतंत्र सूचना के संप्रसारण की अनंत संभावनाओं के द्वार खोले हैं। चैनल संस्कृति के आने के पहले तक प्रत्येक देश की सरकार का अपने देश के सूचना बाजार पर नियंत्रण था।किंतु चैनल संस्कृति ने एक ही झटके में इस इजारेदारी को तोड़ दिया।आज सूचना देशज संपत्ति न होकर सार्वभौम संपत्ति का रूप ले चुकी है।राष्ट्रीय सीमाओं से परे एक व्यापक बाजार जन्म ले चुका है।तमाम किस्म के भाषायी अंतरों के बावजूद क्षेत्रीय एकीकरण बढ़ा है।
तकनीकी प्रोन्नति के कारण राष्ट्र-राज्य की प्रकृति में भी बदलाव आया है। परंपरागत राष्ट्रवाद और राष्ट्र की धारणा में परिवर्तन आया है ।यह परिवर्तन कैसा होगा ?किस दिशा में ले जाएगा ?इसके बारे में कोई नहीं जानता।पूंजीवादी उत्पादन संबंधों में तेजी से परिवर्तन आ रहा है।इसके कारण राष्ट्र की भूमिका सीमित होकर रह गई है।इस क्रम में सत्ता को चुनौती देने वालों की नई जमात पैदा हो गई है।जिन्हें हम भारत में कठमुल्ले या साम्प्रदायिक, मध्य-पूर्व में फंडामेंटलिस्ट और लैटिन अमेरिका में ड्रग माफिया के नाम से जानते हैं। इन्हें समाचार चैनलों ने हवा दी है।
आज हमारे सामने परा-राष्ट्रवाद और नई माध्यम तकनीकी द्वारा पैदा की गई चुनौतियां गंभीर संकट पैदा कर रही हैं।चैनलों के द्वारा भूमंडलीय सांस्कृतिक रूपों के अबाधित प्रसार ने महानगरीय संस्कृति के लिए गंभीर संकट पैदा किया है।इसके परिणामस्वरूप महानगरों में ग्लोबल और महानगरीय दोनों ही सांस्कृतिक रूप और एटीट्यूट्स प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं। इस प्रक्रिया में सांस्कृतिक वैविध्य को स्वीकार करने या उसकी प्रशंसा करने वालों की तादाद में इजाफा हुआ है।चैनल संस्कृति के आने के पहले तक हमारे संस्कृति ने महानगरीय संस्कृति को तरजीह दी और क्षेत्रीय या स्थानीय संस्कृति को दोयम दर्जे का स्थान दिया।इस समूची प्रक्रिया को चैनलों ने एकसिरे से पलट दिया है।
बहुराष्ट्रीय समाचार चैनलों ने स्थानीय संस्कृति,स्थानीय खबरों,स्थानीय सामाजिक एवं राजनीतिक संगठनों, स्थानीय सोच और स्थानीय नेताओं को तरजीह दी है। महानगरीय बोध की बजाय स्थानीय बोध और स्थानीय संस्कृति को बढ़ावा दिया है।इसे भाषायी चैनलों में सहज ही देख सकते हैं।यह नए किस्म का क्षेत्रीयतावाद है।समाचार चैनलों में स्थानीय विवादों और झगड़ों को पेश किया जा रहा है।समाचार चैनलों का स्थानीयतावाद,क्षेत्रीयतावाद और बहुभाषिकता अंतत:जनतांत्रिकीकरण की अपार संभावनाओं के द्वार खोल रहा है।समाचार चैनलों में स्थानीय संगठनों की विभिन्न मसलों पर होनेवाली बहसों में हिस्सेदारी बढ़ी है।मौजूदा शासन व्यवस्था इससे मजबूत हुई है।महानगर और छोटे शहरों या कस्बों के बीच संबंध मजबूत हुआ है। सभी चैनलों के मुख्यालय महानगरों में हैं।आरंभ में इन चैनलों पर महानगर हावी था।किंतु आज भाषायी वैविध्य और स्थानीयतावाद एवं क्षेत्रीयतावाद हावी है।यह टेलीविजन पर प्रेस का प्रभाव है।

( मोहल्‍ला लाइव और भड़ास ब्‍लाग पर 12 सि‍तम्‍बर 2009 को प्रकाशि‍त )

सोमवार, 13 जुलाई 2009

कांग्रेस और नव्य उदार चुनावी प्रौपेगैण्डा

कांग्रेस और नव्य उदार चुनावी प्रौपेगैण्डा

जनता कृतघ्न नहीं होती। जनता की सेवा करने का लाभ मिलता है। जो राजनीतिक दल जनता के आर्थिक हितों का ख्याल रखता है जनता उसके प्रति समर्थन व्यक्त करने से कभी संकोच नहीं करती। विगत पांच सालों में मनमोहन सरकार ने जनहित ( किसानों की कर्जमाफी,छठा वेतन आयोग, ग्रामीण विकास रोजगार योजना आदि) के जो कदम उठाए थे उनके बदले जनता ने कांग्रेस को सरकार बनाने का मौका देकर अपने कृतज्ञभाव का प्रदर्शन किया है। पन्द्रहवीं लोकसभा के चुनाव परिणाम इस धारणा को पुष्ट करते हैं कि भारत की जनता ने नव्य आर्थिक उदारीकरण को अंतत: अपनी स्वीकृति दे दी है। नव्य आर्थिक उदारीकरण की जो प्रक्रिया भारत में शुरू हुई थी उसके जनक प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह हैं। इसबार का चुनाव कांग्रेस ने मनमोहन सिंह को नायक बनाकर लड़ा। यह ऐसा नायक जिसके पास नव्य उदारवादी एजेण्डा है। लंबे समय के बाद कार्यक्रम सहित प्रधानमंत्री का चेहरा जनता के सामने आया था। बाकी प्रधानमंत्री पद के दावेदारों के पास प्रतिक्रिया का कार्यक्रम था। फलत: वे जनता को अपील नहीं कर पाए।

पन्द्रहवीं लोकसभा का चुनाव नव्य उदारीकरण के प्रौपेगैण्डा की जीत है। इस जीत के नायक हैं मनमोहन और मुख है टेलीविजन। कांग्रेस पार्टी ने अपने नियमों की कैद से बाहर आकर पहली बार प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी के तौर पर मनमोहन सिंह का नाम प्रचारित किया। कांग्रेस के द्वारा प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के नाम को केन्द्र में रखकर लड़ा गया यह पहला लोकसभा चुनाव था। देश की जनता में मनमोहन सिंह की छवि नव्य उदारतावादी आर्थिक नीतियों के जनक की है। पन्द्रहवीं लोकसभा के चुनाव परिणाम नव्य उदारतावाद के प्रति आम जनता के एक बड़े अंश के समर्पण का संकेत है। यह जीत नहीं विभ्रम है।

कांग्रेस को अपने समानधर्मा दलों के साथ बगैर किसी 'न्यूनतम साझा कार्यक्रम' के अपने ही कार्यक्रम पर साझा सरकार बनाने का पहलीबार मौका मिला है। इस सरकार में वे दल शामिल हैं जिनके बीच चुनाव पूर्व समझौता था। केन्द्र सरकार को उन दलों का भी समर्थन प्राप्त है जो चुनाव के समय कांग्रेस को हराने की अपील कर रहे थे।

आखिरकार मनमोहन सिंह और उनके सहयोगी कैसे जीते ? असल में यह जीत कांग्रेस के मीडिया प्रबंधन और नव्य उदार उम्मीदों की जीत है। यह जीत इसलिए भी संभव हुई है क्योंकि विपक्ष ने टीवी चैनलों की भूमिका को लेकर पहले कोई रणनीति नहीं बनायी और इसके कारण कांग्रेस को चैनलों का अबाधित दोहन करने का सुनहरा मौका मिल गया।

कांग्रेस ने विस्तार के साथ टेलीविजन प्रबंधन पर ध्यान दिया। बहुभाषी चैनलों का जमकर इस्तेमाल किया। मीडिया के इतिहास में सन् 1971 के चुनाव के बाद कांग्रेस का इलैक्ट्रोनिक मीडिया का यह सबसे प्रभावशाली राजनीतिक दोहन था। सन् 1971 में स्व.श्रीमती इंदिरा गांधी ने रेडियो मीडियम का प्रभावशाली इस्तेमाल करके प्रचार के मैदान में सबके छक्के छुड़ा दिए थे और रेडियो के तत्कालीन आक्रामक प्रचार के गर्भ से अधिनायकवाद का खतरा पैदा हुआ। ठीक वैसा ही आक्रामक रूख इसबार टीवी चैनलों की प्रस्तुतियों में दिखाई दिया है।

कांग्रेस की मीडिया रणनीति के प्रमुख बिंदु हैं -कांग्रेस ने देश के साथ अपनी पहचान जोड़कर पेश की। स्वयं को धर्मनिरपेक्षता और आर्थिक सुधारों का प्रतीक बताया। दूसरी ओर भाजपा को वरूण गांधी के अल्पसंख्यक विरोधी भाषण को लेकर उलझा दिया। कांग्रेस को इसका फायदा मिला और अल्पसंख्यकों खासकर मुसलमानों के बीच में अपनी इमेज चमकाने का मौका मिला। वरूण गांधी के भाषण का मसला गैर जरूरी था, तकरीबन पन्द्रह दिनों तक भाजपा इस झंझट में फंसी रही और कांग्रेस ने बेहतर मीडिया प्रबंधन के जरिए इस मसले को टेलीविजन समाचारों के मुख्य मुद्दे से हटने नहीं दिया और इस मुद्दे पर एनडीए के नेताओं के अन्तर्विरोधी बयानों को इतना उछाला कि भाजपा का एकजुट एनडीए का नारा प्रभाव पैदा नहीं कर पाया।

दूसरा ,बायनरी अपोजीशन और निष्कलंक इमेज का सार्वजनिक प्रचार अभियान में जमकर इस्तेमाल किया । मनमोहन सिंह-सोनिया गांधी की छवि जेण्डर संतुलन का भावबोध पैदा कर रही थी। साथ ही इन दोनों नेताओं ने निष्कलंक राजनेता का भी संदेश दिया। इन दोनों के खिलाफ किसी के पास कोई आरोप नहीं था। पंडित जवाहरलाल नेहरू के बाद पहलीबार ऐसा प्रधानमंत्री जनता के बीच में था जो पांच साल शासन करने के बाद निष्कलंक था और सादगी का प्रतीक था। सादगी और निष्कलंक इमेज ने साधारण लोगों को आकर्षित किया।

तीसरा, वंशवाद का विरोध, मनमोहन-सोनिया -राहुल की इमेजों का अहर्निश प्रक्षेपण अप्रत्यक्ष रूप में यह संदेश भी देता है कि कांग्रेस वंशवाद नहीं चाहती। वंशवाद की परंपरा से कांग्रेस ने अपने को अलग किया है। यह अप्रत्यक्ष संदेश इतना प्रभावशाली था कि लालकृष्ण आडवाणी और एनडीए एकदम निष्प्रभावी हो गए। यह इमेज तैयार करते समय विज्ञापन निर्माताओं ने सिगरेट के विज्ञापनों की रणनीति का वैचारिक तौर पर सहारा लिया । एनडीए और भाजपा के तर्कों का प्रतिवाद किया। यह वैसे ही था जैसे सिगरेट बनाने वाली कंपनियां ध्रूमपान का विरोध करने वालों के तर्कों का अपनी इमेजों के जरिए अप्रत्यक्ष तौर पर प्रतिवाद करती हैं। सोनिया और राहुल के बीच में मनमोहन सिंह का होना उन सभी तर्कों का प्रत्युत्तार है जो यह कहते हैं कि कांग्रेस वंशवाद चाहती है। साथ ही यह भी कहा कि सोनिया और राहुल सत्ताा में कोई पद नहीं चाहते। यह संदेश इतना प्रभावशाली था कि लालकृष्ण आडवाणी के प्रचार अभियान का मूल मुद्दा ही निष्प्रभावी हो गया।

चौथा, आर्थिक उदारीकरण के खिलाफ विपक्ष की विचारधारात्मक मुहिम को बड़े ही कौशल के साथ 'विकास' और 'आशा' के संदेश के बहाने निशाना बनाया गया। इसकी शुरूआत 'जय हो' की धुन की खरीद के साथ हुई। मजेदार बात यह है जिन चीजों,भाषा रूपों आदि के साथ नकारात्मक अर्थ जुड़ा है उनका सचेत रूप से प्रयोग रोका गया। मसलन् कांग्रेस ने अपने प्रचार अभियान में 'नव्य आर्थिक उदारतावाद' पदबंध और उससे जुड़ी भाषिक केटेगरी का प्रयोग नहीं किया। इसके विपरीत विपक्ष के द्वारा नव्य आर्थिक उदारतावाद के खिलाफ चलायी जा रही मुहिम का कांग्रेस ने 'विकास' के प्रचार के जरिए जबाव दिया। कांग्रेसी नेता चैनलों में चालीकी के साथ 'आर्थिक सुधार' पदबंध का इस्तेमाल करते थे। वे कभी 'आर्थिक उदारतावाद' अथवा 'नव्य आर्थिक उदारवाद' पदबंध का किसी भी मंच पर,टीवी टॉक शो आदि में इस्तेमाल नहीं करते थे।

पांचवां, कांग्रेस ने अपने प्रचार अभियान में विपक्ष पर आक्रामक हमले कम किए और अपने कार्यक्रमों और उनके लागू न कर पाने की कमियों का जिक्र ज्यादा किया। साथ ही कांग्रेस के कार्यक्रमों को जो दल या राज्य सरकारें लागू कर रही हैं उनकी प्रशंसा भी की। फलत: प्रचार अभियान को दलीय घृणा के पैराडाइम के बाहर कर दिया। इस क्रम में यह संदेश गया कांग्रेस सहिष्णु और सामंजस्यवादी राजनीतिक पार्टी है।

छठा, चौदहवीं लोकसभा में कांग्रेस के नेतृत्व में सरकार बनी थी। लोकसभा चुनाव के बाद यूपीए गठबंधन अस्तित्व में आया। यूपीए ने चौदहवीं लोकसभा का चुनाव नहीं लड़ा था। यूपीए ने पहलीबार पन्द्रहवीं लोकसभा का चुनाव लड़ा और कांग्रेस ने विभिन्न दलों के साथ क्षेत्रीय स्तर पर सीट समझौता किया। समझौते में जो दल शामिल थे उन्हें ही लेकर नयी सरकार का गठन किया गया। इस समूची प्रक्रिया में यह तथ्य उभरता है कि कांग्रेस के नेतृत्व में कांग्रेस के घोषणापत्र से सहमत दलों को केन्द्र में पहलीबार साझा सरकार बनाने का मौका मिला है। सरकार में शामिल दलों में आर्थिक नीतियों को लेकर कोई बुनियादी मतभेद नहीं है। जबकि पिछली सरकार में ऐसा नहीं था, वामपंथी दलों का अनेक नीतियों के साथ मतभेद था जिसके कारण बार-बार केन्द्र सरकार की फजीहत हुई और इस फजीहत को आम जनता ने अच्छी नजरों से नहीं देखा और उन तत्वों को पराजित कर दिया जो प्रतिदिन राजनीतिक कलह करते थे।

यह धारणा रही है कि संयुक्त मोर्चे की राजनीति में आंतरिक कलह करने वालों को जनता अच्छी नजर से नहीं देखती और उन्हें सबक सिखाती है । उल्लेखनीय है जनता पार्टी के शासनकाल के दौरान सोशलिस्टों और संघ परिवार के आंतरिक कलह को जनता ने अच्छी नजरों से नहीं देखा उन्हें लंबे समय के लिए राजनीति से छुट्टी दे दी गयी, पश्चिम बंगाल में वाम के आंतरिक कलह और कांग्रेस और वाम के कलह को अच्छी नजर से नहीं देखा,केरल में माकपा का आंतरिक कलह पराजय का कारण बना। कहने का तात्पर्य यह है कि राजनीतिक कलह को जनता पसंद नहीं करती। टीवी प्रौपेगैण्डा में कांग्रेस की तरफ से राजनीतिक कलह सबसे चर्चित विषय था। जबकि विज्ञापन और मुद्रित प्रचार सामग्री में 'विकास' का प्रौपेगैण्डा प्रमुख था।

सातवां, कांग्रेस नेताओं ( सोनिया गांधी,मनमोहन सिंह,राहुलगांधी ) के भाषण छोटे और उत्तोजनारहित थे। इसके विपरीत क्षेत्रीय दलों के नेताओं के भाषण आलोचना और उत्तोजनाभरे थे। कांग्रेस ने अपने तीन बड़े नेताओं और प्रमुख क्षेत्रीय नेताओं के भाषणों के प्रचार के लिए राष्ट्रीय और क्षेत्रीय चैनलों का जमकर इस्तेमाल किया और बहुत कम लागत में अपने विचारों का प्रचार किया।

भाषणकला- सोनिया गांधी,मनमोहन सिंह और राहुल गांधी के भाषणों में एक साझा तत्व है वह यथार्थकेन्द्रिकता। इन तीनों नेताओं ने अपने भाषणों में यथार्थ को प्रस्तुत करके जनता को पर्सुएट किया। यथार्थकेन्द्रिक भाषणकला हमेशा लघु भाषण पर जोर देती है। यथार्थ को बताकर दिल जीतने की कला स्वत: प्रामाणिक है उसके लिए बाहर से प्रमाण जुटाने और तर्क देने अथवा सहयोगी प्रचार सामग्री की जरूरत नहीं पड़ती। यथार्थकेन्द्रिक भाषणकला सकारात्मक होती है। 'आशा' का संचार करती है। आम लोगों की कल्पनाशीलता को स्पर्श करती है। इसमें सबके सुखी भविष्य की कल्पना अन्तनिर्हित होती है।

कहीं-कहीं इन तीनों नेताओं ने विमर्श की कला का भी अपने भाषणों में इस्तेमाल किया और उस क्रम में अपने विरोधियों की कमियों का तथ्यपूर्ण उद्धाटन किया। इन तीनों नेताओं के भाषण छोटे, खुले और यथार्थकेन्द्रिक थे। खुले भाषण का अपना ही सुख है इसमें श्रोता अपनी कल्पना से बाकी खाली जगह भरने की कोशिश करता है। खुले भाषण की पध्दति इसलिए भी अपनायी गयी क्योंकि न्यूनतम बातों या मुद्दों पर,न्यूनतम शब्दों में बोलना था। इसके कारण्ा भाषण के प्रति रूचि बनी रहती है और उसका प्रभाव भी होता है। कांग्रेस के तीनों नेताओं ने अपने भाषण में निर्विवाद भाषिक प्रयोगों का इस्तेमाल किया। विवादास्पद भाषिक प्रयोगों से बचते हुए भाषा का जो रूप सामने आया वह पूर्णत: यथार्थवादी था।

यथार्थवादी भाषिक प्रयोग नए अर्थ की सृष्टि करते हैं। वे श्रोता को भाषणकर्ता के साथ जोड़ते हैं। सहयोग का भाव पैदा करते हैं। आम लोगों की इच्छा को सम्बोधित करते हैं। इच्छाओं को जगाते हैं। मसलन् राहुल गांधी का पुरूलिया में यह कहना कि पुरूलिया तो सबसे पिछड़ा जिला है,उत्तार प्रदेश से भी पिछड़ा है। इसमें तथ्य भी है और इच्छाएं भी हैं। इच्छा यह है कि पुरूलिया को पिछड़ा नहीं होना चाहिए।इसी तरह राहुल गांधी या सोनिया गांधी ने जब ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के तहत गरीबों को काम न दिए जाने का सवाल उठाया तो वे वस्तुत: इच्छाओं को अभिव्यक्ति दे रहे थे। यह इच्छा व्यक्त की कि ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के तहत गरीबों को 100 दिन काम मिले। इच्छा को जगाने वाली रणनीति कारगर साबित हुई ।

कांग्रेस का त्रर्िमूत्तिा नेतृत्व जब इच्छा जगा रहा था तब मूलत: आम जनता के विश्वासों और अपने राजनीतिक लक्ष्य के बीच मेनीपुलेट कर रहा था। मसलन् जनता यह चाहती है कि उसे ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के तहत 100 दिन का काम मिले किंतु संभवत: यह नहीं चाहती कि नव्य उदारतावाद का एजेण्डा जारी रहे। क्योंकि वह जानती नहीं है कि नव्य उदारवाद किसे कहते हैं। यही वह बिंदु है जहां कांग्रेसी नेता अपने भाषणों के जरिए जनता की इच्छा और अपने राजनीतिक लक्ष्यों के बीच घालमेल करने में सफल रहे हैं और यही वजह है कि इसबार के चुनाव परिणाम नव्य-उदारतावादी नीतियों की विजय महसूस हो रहे हैं।

इन तीनों नेताओं के भाषणों में यथार्थकेन्द्रिकता के फ्रेमवर्क का इस तरह इस्तेमाल किया गया कि भाषण में शामिल राजनीतिक पाठ स्वत: सक्रिय हो उठा। यह ऐसा सक्रिय पाठ है जिसकी सतह पर कहीं पर भी भनक नहीं मिलती किंतु लोगों के मन में सक्रिय हो उठता है। संभावित राजनीतिक पाठ के आम दर्शकों में सक्रिय हो उठने का एक अन्य कारण है कांग्रेस की त्रर्िमूत्तिा का भाषण को विमर्श के दायरे के बाहर रखना। उल्लेखनीय है कि लाल कृष्ण आडवाण्ाी ने बार-बार जो भी हमला किया उसका जबाव भाषणों से नहीं प्रेस काँफ्रेस के जरिए दिया गया। भाषण को विमर्श के दायरे के बाहर रखा गया और प्रेस काँफ्रेस को विमर्श का मंच बनाया। प्रेस काँफ्रेस में विमर्श बोगस होता है। इस तरह लालकृष्ण आडवाणी के वैचारिक हमलों को प्रेस कॉफ्रस के जरिए जबाव देकर निष्प्रभावी बनाया गया। इसके विपरीत सोनिया गांधी और राहुल गांधी के भाषणों में गर्मी या ऊर्जा का भी एहसास था।

यथार्थकेन्द्रिक भाषणकला यथार्थ को बदलने की ओर ठेलती है। यथार्थ के परिवर्तन के सेतु के रूप में त्रि‍मूर्त्‍ति नेतृत्व का प्रक्षेपण सफल रहा। इन तीनों ने अपने भाषणों में व्यवहारवाद का जमकर इस्तेमाल किया और यह संदेश दिया कि जो जरूरी और व्यवहारिक है वही हमने किया।

कहा गया वाम का समर्थन लेना व्यवहारवाद था, धर्मनिरपेक्षता अथवा नव्य उदारतावाद का विरोध नहीं। व्यवहारवाद के प्रयोग के कारण ही कोई भी पार्टी कांग्रेस के साथ जुड़ने के लिए तैयार है,भाषणों में संप्रेषित व्यवहारवाद का ही सुफल था कि सपा,बसपा,राजद,लोजपा आदि दलों ने चुनाव के तुरंत बाद ही अपने समर्थन का एलान कर दिया।

कांग्रेस के तीनों नेताओं के भाषणों का मूल दर्शन है व्यवहारवाद। व्यवहारवाद के कारण वे शत्रु की भी प्रशंसा करने में संकोच नहीं करते। मजेदार बात यह है ये तीनों नेता जिन बातों को अपने भाषणों में उठा रहे थे उन्हें लोग जानते थे और जिन बातों को लोग जानते हैं उन्हें जब आप यथार्थकेन्द्रिक आधार से पेश करते हैं तो प्रभावी बनाते हैं।

इसी प्रसंग में सबसे महत्वपूर्ण है अस्मिता राजनीति का पैराडाइम परिवर्तन। इस बार के चुनाव में राहुल गांधी के माध्यम से कांग्रेस ने 'युवा अस्मिता' को केन्द्र में रखा और उनके भाषणों में युवावर्ग की मौजूदगी ने अस्मिता राजनीति के सकारात्मक पैराडाइम की शुरूआत की है। यह सच है कि अस्मिता की राजनीति खोखली राजनीति है, कार्यक्रमरहित राजनीति है। यह बात मायावती, मुलायमसिंह, लालकृष्ण आडवाणी,लालू यादव पर जिस तरह लागू होती है वैसे ही राहुल गांधी पर भी लागू होती है। किंतु एक बुनियादी फर्क है धर्म और जाति की अस्मिता के स्थान पर युवा अस्मिता का केन्द्र में आना सकारात्मक है। धर्म,जाति आदि की अस्मिता राजनीति का हाशिए पर जाना और 'युवा अस्मिता' की राजनीति का केन्द्र में आना वस्तुत मासकल्चरीय युवा अस्मिता का चरमोत्कर्ष है।

भारतीय भाषणकला के अंतिम नायक अटलबिहारी बाजपेयी थे और उनकी इस चुनाव में अनुपस्थिति ने भाषणकला का अंत कर दिया। भारतीय भाषणकला की विदाई का एक सिरा अटलजी से जुड़ा है तो दूसरा सिरा सोनिया गांधी से जुड़ा है। यह संयोग है कि सोनिया गांधी का नेता के रूप में राष्ट्रीय क्षितिज में उदय भाषणकला के अंत के प्रतीक के दौर में उस समय हुआ जब अटलजी का सूरज ढ़ल रहा था। मनमोहन सिंह के चौदहवीं लोकसभा का प्रधानमंत्री बनना और अटलजी का जाना,ये सारी चीजें भाषणकला के लोप का संकेत है। यह नव्य उदार वातावरण की पराकाष्ठा है। नव्य उदार वातावरण भाषणकला को अप्रासंगिक बनाता है। अब लोगों की भाषणों में दिलचस्पी कम हो जाती है। अब लोग सुनना कम और देखना ज्यादा चाहते हैं। यही वह प्रस्थान बिंदु है जहां से टीवी एक बड़े संप्रेषक के तौर पर दाखिल होता है।

आज हमारे बीच में अच्छे राजनीतिक भाषणकला के पारखी राजनेताओं का एकसिरे से अभाव है। सोनिया के आगमन के साथ लिखित सार्वजनिक भाषण की परंपरा का आना नियमबध्द भाषणकला की वापसी है। नियमबध्द भाषणकला स्वभावत: स्वतंत्रता विरोधी है। यह बोलने वाले को स्वतंत्रता नहीं देती। राहुल गांधी रट्टू नेता के रूप में बोलते हैं। स्वतंत्र भाषणकला की उनमें संभावनाएं हैं किंतु कांग्रेस ने जो रास्ता चुना है उसमें कम से कम बोलना मूल मंत्र है। राजनेता जब कम से कम बोलने के रास्ते पर चल पड़ें तो भाषणकला के दुबारा जिंदा होने की संभावनाएं नहीं हैं।

आश्चर्य की बात यह है सोनिया बगैरह के विकल्प के रूप में जो नेता सामने आ रहे हैं वे भी लिखित भाषण पढ़ते हैं अथवा अप्रासंगिक ज्यादा बोलते हैं। मायावती ने लिखित भाषण पढ़े,जबकि लालू, मुलायम,नरेन्द्र मोदी,बुध्ददेव भट्टाचार्य और आडवाणी की सबसे ज्यादा शक्ति अप्रासंगिक चीजों पर खर्च हुई। मसलन् मनमोहनसिंह कमजोर प्रधानमंत्री हैं। यह बात एकसिरे से भाषणकला के लिहाज से ही नहीं बल्कि राजनीति के लिहाज से भी अप्रासंगिक है। उसी तरह बुध्ददेव भट्टाचार्य का औद्योगीकरण का एजेण्डा पश्चिम बंगाल के औद्योगिक वातावरण के नष्ट हो जाने के बाद अप्रासंगिक एजेण्डा है। पश्चिम बंगाल के औद्योगीकरण का नारा सन् 1977 में दिया जाता तो प्रासंगिक था आज कोई भी विश्वास नहीं करेगा कि माकपा या वामपंथ उद्योग लगाना चाहते हैं। दूसरी बात यह कि माकपा के चिंतन में औद्योगीकरण नहीं आता, यदि ऐसा होता तो केरल सबसे बड़ा उद्योग संपन्न राज्य होता। वहां पर तो किसी ममता बनर्जी का संकट नहीं था। यही हाल त्रिपुरा का है। इसी तरह लालू यादव और मुलायम सिंह यादव जैसे नेताओं के पास कोई सकारात्मक एजेण्डा ही नहीं था। ये दोनों नेता अपने प्रान्तों (बिहार और उत्तार प्रदेश) के मुख्यमंत्रियों की असफलता का राग अलाप रहे थे जिसकी कोई अपील नहीं थी।

समग्रता में देखें तो भारत में भाषणकला का समापन हो चुका है। कांग्रेस नेतृत्व को इस बात का श्रेय जाता है कि उन्होंने राजनीति को भाषण के दायरे बाहर कर दिया है। राजनीति को बातचीत और टॉक शो में तब्दील कर दिया है। इसबार के चुनाव में टेलीविजन में जितने बड़े पैमाने पर टीवी टॉक शो आयोजित हुए हैं उसने मीडिया प्रबंधन कला की ओर ध्यान खींचा है।

राजनीति जब टॉक शो में आने लगती है तो उसकी प्रकृति बुनियादी तौर पर बदल जाती है। राजनीति के अराजनीतिकरण का समग्र वातावरण बनता है। टीवी टॉक शो आम जीवन की राजनीतिक गर्मी को अपहृत कर लेता है। फलत: इसबार के चुनाव में गली,चौराहे,पंचायत,चौपाल आदि पर राजनीतिक गर्मी गायब थी और टीवी में गरमागरम चर्चाएं हो रही थीं।

( लेखक की सद्य प्रकाशि‍त कि‍ताब '' मीडि‍या और चुनावी नव्‍य उदार प्रौपेगैण्‍डा'', प्रकाशक- अनामि‍का पब्‍लि‍शि‍र्स एंड डि‍स्‍ट्रीब्‍यूटर (प्रा.लि‍.) ,4697 /3,21 ए,अंसारी रोड़ ,दरि‍यागंज,नई दि‍ल्‍ली,110002)

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