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सोमवार, 28 जून 2010

सीएनएन- आईबीएन 7 और टोरंटो के सत्य का विकृतिकरण

   ‘सीएनएन -आईबीएन 7’ चैनल के समाचारों का स्तर लगातार गिरता जा रहा है। इस चैनल की खबरों में असत्य के प्रयोग बढ़ गए हैं। जनता के हितों के लिए संघर्ष करने वालों को तरह-तरह से कलंकित किया जा रहा है। इस कड़ी में नया मामला टोरंटो से जी-20 देशों की बैठक के मौके पर हुए शांतिपूर्ण प्रदर्शन की खबर से जुड़ा है।
    चैनल ने जी-20 देशों की बैठक के मौके पर हुए शांतिपूर्ण प्रदर्शन को ‘उत्पात’ की संज्ञा दी। लगता है किसी कमअक्ल के संवाददाता ने यह खबर लिखी है। उसे शांतिपूर्ण प्रदर्शन और उत्पात में भाषिक अंतर और अर्थ का ज्ञान नहीं है। शांतिपूर्ण प्रदर्शकारियों को ‘हिंसा पर उतारू’ कहा। आरंभ में लिखा ‘दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाले देशों के समूह जी-20 की शिखर बैठक की मेजबानी कर रहे कनाडा के सबसे बड़े शहर एवं देश की वित्तीय राजधानी टोरंटो में हजारों प्रदर्शनकारी हिंसा पर उतारू हो गए।’प्रदर्शनकारियों को चैनल ने ‘उपद्रवी’ कहा। (विस्तार से इस चैनल की बेवसाइट पर जाकर देखें)  
 (शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारी को पीटते पुलिस वाले)    
     इस खबर के प्रसंग में पहली बात यह कि यह प्रदर्शन शांतिपूर्ण था। दूसरी बात यह कि प्रदर्शन की खबर को तोड़मरोड़ करके पेश किया गया है।
   इस प्रदर्शन में क्या हुआ इसके बारे में समग्रता में सूचनाएं देने की आईबीएन 7 ने जरूरत ही महसूस नहीं की। तथ्य यह हैं कि सम्मेलन स्थल पर किसी भी प्रदर्शन को कना़डा सरकार ने रोकने के आदेश पहले से ही दिए हुए थे।
    

(तोड़फोड़ करते पुलिस वाले)
      दूसरी महत्वपूर्ण सूचना यह कि पुलिस ने बड़ी निर्ममता के पत्रकारों के साथ दुर्व्यवहार किया। पत्रकार आग नहीं लगा रहे थे। वे समाचार संकलन कर रहे थे,लेकिन कनाडा पुलिस नहीं चाहती थी कि पुलिस की बर्बरता को कैमरों में कैद किया जाए।
     प्रेस फोटोग्राफरों की पीठ में प्लास्टिक गोलियां मारी गयीं और अनेक पत्रकार जख्मी भी हुए हैं। टोरेंटो के अखबार पुलिस के प्रेस फोटोग्राफरों पर किए गए हमलों की खबरों से भरे पड़े हैं लेकिन आईबीएन7 के संवाददाता को यह सब नजर नहीं आया। यह सब लोग जानते हैं कि इस शांतिपूर्ण प्रदर्शन में कुछ अराजकतावादी भी थे और जो कुछ तोड़फोड़ हुई उसमें इनका और कनाडा पुलिस के सादा कपड़ों में मौजूद पुलिस वालों का हाथ था।जिससे प्रदर्शनकारियों को बदनाम किया जा सके।   
    यहां हम कॉमन ड्रीम डॉट कॉम  में छपी रिपोर्ट का एक अंश उद्धृत करना चाहेंगे।
लिखा है-
 In a remarkable series of Tweets early Sunday morning, journalist Steve Paikin of public broadcaster TV Ontario said he witnessed "police brutality" against a reporter and the arrests of peaceful demonstrators.
"I saw police brutality tonight. It was unnecessary. They asked me to leave the site or they would arrest me. I told them I was doing my job," he Tweeted.
"As I was escorted away from the demonstration, I saw two officers hold a journalist. The journalist identified himself as working for 'the Guardian.' He talked too much and pissed the police off. Two officers held him a third punched him in the stomach. Totally unnecessary. The man collapsed. Then the third officer drove his elbow into the man's back. No cameras recorded the assault. And it was an assault."
Paikin had been at a demonstration in Toronto's Esplanade neighborhood, a densely-populated area near the waterfront. He said police moved in on a crowd of peaceful, "middle class" protesters and began arresting them.
"Police on one side screamed at the crowd to leave one way. Then police on the other side said leave the other way. There was no way out," he Tweeted. "So the police just started arresting people. I stress, this was a peaceful, middle class, diverse crowd. No anarchists. Literally more than 100 officers with guns pointing at the crowd. Rubber bullets and smoke bombs ready to be fired. Rubber bullets fired."
Paikin, a respected journalist who has hosted national election debates in Canada, said he was "escorted" away by police before he could see how many people were arrested, "but it must have been dozens."
"I have lived in Toronto for 32 years. Have never seen a day like this. Shame on the vandals and shame on those that ordered peaceful protesters attacked and arrested."
Earlier in the day, police told media that a small group of "Black bloc" demonstrators broke off from a protest of 10,000 people and began smashing storefront windows along the city's trendy Queen Street.
The CBC News Network reported that protesters smashed in the windows of an American Apparel outlet, pulled out the mannequins and spread feces on the floor. The storefronts of McDonald's and Starbucks locations were also damaged, as were numerous bank branches.
Police shut down all public transit in the city center, including subway and streetcar lines. They also shut down a large downtown shopping complex after reports of looting. AFP reported that some 200 people were trapped inside, unable to leave after the mall was put into lockdown.

"When the G20 protest began turning violent Saturday, police abandoned some of their police cars,"  "This one was briefly occupied on Queen Street."
एक अन्य बेवसाइट ने लिखा है कि प्रदर्शनकारियों में से जिन लोगों ने उपद्रव मचाया वे सादा बर्दी में पुलिसवाले ही थे। ‘ग्लोबल रिसर्च डॉट कॉम’ ने लिखा है-
Toronto is right now in the midst of a massive government / media propaganda fraud. As events unfold, it is becoming increasingly clear that the 'Black Bloc' are undercover police operatives engaged in purposeful provocations to eclipse and invalidate legitimate G20 citizen protest by starting a riot. Government agents have been caught doing this before in Canada.
 Montebello 2007 Riot Prevented - Identical Boots Exposed Undercover Police Provocateurs
 At the ‘Security and Prosperity Partnership’ meeting protests at Montebello Quebec on August 20, 2007, a Quebec union leader caught and outed three masked undercover Quebec Provincial Police operatives dressed as ‘black bloc’ protestors about to start a riot by throwing rocks at the security police. See the following videos documenting this event.
इस सिलसिले में ‘ग्लोबल रिसर्च डॉट कॉम’ ने 2007 और 2010 के पुलिसवालों के जूतों के फोटोग्राफ दिए हैं जिन्हें हम यहां पर दे रहे हैं। इससे आईबीएन 7 के इस झूठ का खंडन होता है कि उपद्रव करने वाले प्रदर्शनकारी थे। विस्तार से ये तथ्य ‘ग्लोबल रिसर्च डॉट कॉम’ पर देखे जा सकते हैं।










प्रणव राय-विनोद दुआ की कार-सेवा


      एनडीटीवी की प्रणवराय-विनोद दुआ टीम अब नंगे रूप में मनमोहन सरकार और कांग्रेस की भक्ति में सक्रिय हो गई है। ये लोग खबरों में कारसेवा कर रहे हैं। इस चैनल की खबरों में खासकर हिन्दी चैनल एनडीटीवी इंडिया में कांग्रेस की भक्ति और विपक्ष पर कटाक्ष का धारदार तरीके से इस्तेमाल हो रहा है। कांग्रेस और मनमोहन सरकार की भक्ति का ताजा उदाहरण है 26 जून को आपातकाल की बरसी पर किसी कार्यक्रम का टीवी पर न होना। वैसे सीएनएन-आईबीएन ने भी 26 जून पर कोई कार्यक्रम नहीं दिया।
   सन् 1975 को इसी दिन भारत में आपातकाल लगाया था। आपातकाल पर किसी भी कार्यक्रम का न आना टीवी चैनलों में बढ़ रहे नव्य-उदार नजरिए को सामने लाता है। आपातकाल कोई साधारण घटना नहीं थी,बल्कि स्वतंत्र भारत की असाधारण राजनीतिक घटना थी। इन दोनों ही चैनलों की बेवसाइट पर आपातकाल से संबंधित किसी भी कार्यक्रम की कोई जानकारी नहीं है।
    दूसरा प्रसंग हाल ही में पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतों के बढ़ाए जाने और सरकारी नियंत्रण हटाने का है। एनडीटीवी इंडिया ने इस पर जिस तरह से खबरें दी हैं वह इस बात का प्रमाण है कि यह चैनल बड़े ही घटिया तरीके से विपक्ष और प्रतिवाद के बारे में प्रचार कर रहा है।
       एनडीटीवी ने काग्रेस के प्रवक्ता की प्रेस कांफ्रेंस की रिपोर्टिंग की तो उसके बयान को वगैर किसी टिप्पणी के पेश किया। इसके विपरीत जब विपक्ष की रिपोर्टिंग की तो खबर के बीच में अपने मंतव्य को व्यक्त किया,विपक्ष का मूल्य-निर्णय किया ।
     एनडीटीवी यह तो जानता है कि पेशेवर ढ़ंग से खबर पेश करने का मनलब क्या है ? प्रणवराय-विनोद दुआ यह भी जानते हैं कि खबर में संवाददाता की राय का समावेश नहीं किया जाना चाहिए। यदि संवाददाता अपनी राय व्यक्त करना चाहे तो यह काम वह स्वतंत्र रूप से कर सकता है। लेकिन खबर में राय देना और मूल्य निर्णय देना पेशेवर प्रस्तुति नहीं कही जाएगी। यह खबर का मेनीपुलेशन है। नमूना देखें कांग्रेस प्रवक्ता के बयान को शीर्षक दिया - ‘तेल की कीमतों में बढ़ोतरी मजबूरी में की गई’, इस खबर में संवाददाता ने अपनी राय व्यक्त करने की कोशिश नहीं की। साथ ही यह भी आभास दिया कि पेट्रोलियम पदार्थों की कीमत बढ़ाना अपरिहार्य कदम था। मजबूरी थी।
   दूसरी खबर का शीर्षक था -ईंधन कीमतों में वृद्धि पर बीजेपी-लेफ्ट का प्रदर्शन’, इस खबर को उसी तरह पेश नहीं किया जैसे काग्रेस की खबर को पेश किया था। इस खबर में खबर के अलावा संवाददाता ने भाजपा के बारे में, उसके प्रतिवाद के बारे में मूल्य-निर्णय किया है जो समाचार-मूल्य का सीधे उल्लंघन है। इस खबर को पूरा पढ़ना समीचीन होगा।-
ईंधन कीमतों में वृद्धि पर बीजेपी-लेफ्ट का प्रदर्शन
एनडीटीवी इंडिया
दिल्ली/कोलकाता, शनिवार, जून 26, 2010

यूपीए सरकार ने जैसे ही शुक्रवार को तेल और गैस की कीमतें बढ़ाने का ऐलान किया विपक्ष विरोध में खड़ा हो गयातेल गैस की बढ़ी हुई कीमतों के खिलाफ शनिवार को दिल्ली में बीजेपी ने चक्का जाम किया। दिल्ली के सबसे व्यस्त आईटीओ चौराहे पर बीजेपी के कार्यकर्ता धरना प्रदर्शन पर उतर आए और यहां घंटों जाम लगा रहा। वहीं मुंबई में भी बीजेपी के कई बड़े नेताओं ने तेल-गैस की बढ़ी कीमतों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया। इनमें गोपीनाथ मुंडे, स्मृति ईरानी ने बीजेपी के कई कार्यकर्ताओं समेत गिरफ्तारी भी दीं।
उधरईंधन कीमतों में वृद्धि के खिलाफ माकपा समर्थित सीटू की हड़ताल के आह्वान का असर सार्वजनिक परिवहन पर देखने को मिला है।  राज्यभर में 24 घंटे की हड़ताल के कारण बस, मिनी बस और टैक्सियां सड़कों पर नहीं दिखीं लेकिन मेट्रो सेवाएं सामान्य हैं। पूर्वी रेलवे के सूत्रों ने कहा कि हड़ताल से रेल सेवाओं को अलग रखा गया है।  हवाई अड्डा के सूत्रों ने कहा कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर विमान सेवाएं सामान्य थीं।
एक तरफ सरकार आम लोगों को महंगाई से मार रही है तो दूसरी तरफ मुख्य विपक्षी दल बीजेपी विरोध की नौटंकी कर रही है। उसने शुक्रवार को दिल्ली में ऐसे लोगों को लेकर जूलूस निकाला जिनको बेघर होने का दर्द है लेकिन बीजेपी ऐसे जता रही है जैसे कि वे पेट्रोल-डीज़ल के खिलाफ सड़कों पर हैं। पेट्रोल-डीज़ल और रसोई गैस की बढ़ी क़ीमतों के खिलाफ बीजेपी ने दिल्ली के गोल डाकखाने पर एक प्रदर्शन का आयोजन किया। पुलिस ने ज्यादातर कार्यकर्ताओं को एहतियातन हिरासत में ले लिया। जुलूस में चल रही महिलाओं की गोद में छोटे बच्चे भी थे। हमें शक हुआ कि आखिर इतने छोटे बच्चों के साथ क्या ये वाकई महंगाई के लिए सड़क पर उतरी हैं।
इसमें कोई शक नहीं कि इन पर महंगाई की भी भारी मार पड़ रही है लेकिन बीजेपी जैसी राष्ट्रीय पार्टी के कुछ कार्यकर्ता अपना उल्लू सीधा करने के लिए इनकी भावनाओं से खेल रहे हैं। इन लोगों का घर टूटा है लेकिन वे इनका इस्तेमाल महंगाई के मुद्दे पर सरकार को घेरने के लिए कर रहे हैं।’’
     यहां पर जो पंक्तियां रेखांकित की गई हैं उन्हें गौर से देखने से चैनल की पक्षधरता सहज ही समझ में आ जाएगी। सवाल यह है कि क्या खबर में संवाददाता की राय को शामिल करना सही होगा ? खबर या राय या मूल्य-निर्णय का फार्मूला सही है तो उसे कांग्रेस वाली खबर पर लागू क्यों नहीं किया ? असल में , यह मंहगाई के प्रतिवाद का उपहास उड़ाना है। नव्य-उदारतावाद की नीतियों के प्रतिवाद का उपहास करो,यही नीतिगत फार्मूला है जिससे टीवी चैनल संचालित हैं। वे प्रतिवाद को नौटंकी कह रहे हैं और चैनल के द्वारा की जा रही सरकारी कारसेवा को खबर की वस्तुगत प्रस्तुति कह रहे हैं।      

गुरुवार, 28 जनवरी 2010

मुसलमान,राष्ट्रवाद और युध्द की भाषा




     टेलीविजन के इतिहास में ग्यारह सितंबर मील का पत्थर दिन था।विमान अपहरण और उसके बाद अमरीका के प्रतीक चिह्नों पर आत्मघाती हमलों का सीधा प्रसारण अनेक नए मसलों,अर्थों और संभावनाओं को सामने लेकर आया है।इस घटना के बाद टेलीविजन के पर्दे पर कई तब्दीलियां देखी गयी हैं।खासकर उपग्रह चैनलों में इस्लाम के प्रति रवैयये में बदलाव आया है।
    
ग्यारह सितंबर के पहले टेलीविजन पर इस्लाम की नकारात्मक छवि पेश की जाती थी।किन्तु ग्यारह सितंबर के बाद इस्लाम के बारे में सकारात्मक इमेज के कुछ टुकड़े सामने आए हैं।जबकि मुसलमान के बारे में टेलीविजन का रवैयया अभी भी बदला नहीं है।मुसलमान की नकारात्मक छवि का प्रसारण अभी भी जारी है।


मुसलमान की नकारात्मक छवि के जरिए यह प्रचार किया जा रहा है कि मुसलमान हिंसक होते हैं।इस्लाम हिंसा को वैधता प्रदान करता है।मुसलमान अपनी औरतों का शोषण और दमन करते हैं।मुस्लिम औरतें यदि बुर्का के अलावा कुछ और पहनें तो उनका भविष्य सुरक्षित नहीं है। खासकर मिनी स्कर्ट पहने तो जिंदगी खतरे में पड़ सकती है।
   


टेलीविजन में मुसलमान हमेशा पश्चिम के किसी भी सकारात्मक तत्व को घृणा और अस्वीकार करते दिखाया जाता है।मसलन्,मुसलमान लोकतंत्र विरोधी है,बहुलतावाद विरोधी है,स्वतंत्रता विरोधी है,नागरिक अधिकारों का विरोधी है।इस तरह के स्टीरियोटाईप प्रचार अभियान की खूबी यह है कि इसमें इजराइली जीवन शैली और पश्चिमी जीवन शैली को मुस्लिम जीवन शैली की तुलना में श्रेष्ठ करार दिया जाता है।इस तरह के प्रचार अभियान के मुस्लिम युवा खासतौर पर निशाना हैं।उन्हें पश्चिमी मूल्यों जैसे डेटिंग,ड्रिंकिग ,डांसिंग और पार्टीबाजी से अलग दिखाया जाता है।टेलीविजन का जोर इस तथ्य पर रहता है कि मुस्लिम युवक पश्चिम संस्कारों को नहीं मानते।


स्टीरियोटाईप प्रस्तुतियों के मूल्य-निर्णय के लिए किसी सामाजिक ग्रुप से जुड़ा होना जरूरी है। स्टीरियोटाईप वस्तुत:वगैर किसी बौध्दिक श्रम के स्वचालित अनुकरण भाव पैदा करता है। जबकि स्टीरियोटाईप के लिए निजी ग्रुप का होना जरूरी है।खासकर बाहरी या बहिष्कृत ग्रुप के खिलाफ।ऐसे स्थिति में वगैर सोचे अपने ग्रुप के भावों के आधार पर व्यवहार करते हैं,सोचते हैं,बोलते हैं,लिखते हैं।
    


टेलीविजन में जब भी कोई खबर मुसलमानों के बारे में पेश की जाती है तो उन्हें'अन्य' की कोटि में रखा जाता है।'अन्य' की कोटि में रखने के कारण उसके निर्माण में परिश्रम नहीं करना पड़ता।हमारे सोच में पुराने प्रतीक सक्रिय हो जाते हैं,पुराने फ्रेम या संदर्भ सक्रिय हो जाते हैं।इन्हें हम बिना परखे अपना लेते हैं।स्टीरियोटाईप से माध्यम प्रक्रिया का सरलीकरण हो जाता है।कालान्तर में यही सरलीकरण समस्या बन जाता है।इसके परिणामस्वरूप नकारात्मक इमेज जन्म लेती है।
      
ग्यारह सितंबर की घटना और इराक युध्द के अमरीकी चैनलों में भावुकता की बाढ़ थी। वहां रिपोर्टर 'इस्लाम के खिलाफ संदेह और अविश्वास को सबसे बड़ी सेवा मान रहे थे।'अमरीकी चैनलों में 'मुस्लिम मिलिटेंट' या इस्लामिक टेररिस्ट'पदबंध का सबसे ज्यादा प्रयोग किया गया।इस तरह की प्रस्तुतियां 'मुसलमान' और 'आतंकवादी' के बीच घालमेल कर रही थीं।सवाल किया जाना चाहिए कि यदि 'मुस्लिम टेररिस्ट' पदबंध का प्रयोग सही है तो 'क्रिश्चियन टेररिस्ट' पदबंध का प्रयोग भी सही होगा।क्योंकि कुछ आतंकवादी ईसाईयत की हिमायत में गर्भपात कराने वाले डाक्टर की हत्या को न्यायपूर्ण ठहराते हैं।क्या ऐसे हत्यारों को 'क्रिश्चियन टेररिस्ट' कहा जाए?
    
ज्यादातर उपग्रह चैनलों ने तयशुदा व्याख्या के ढ़ांचे में खबरों की प्रस्तुति की।'अच्छे' और 'बुरे' के बीच में संघर्ष के तौर पर वर्गीकरण किया।इसे अमरीका ने 'आतंकवाद के खिलाफ युध्द'कहा।सीमोन फ्रेशर विश्वविद्यालय में कम्युनिकेशन के प्रोफेसर रॉबर्ट हैकेट ने अमरीकी टेलीविजन की प्रस्तुतियों पर टिप्पणी करते हुए कहा कि'मुझे चिंता है कि बहुत कुछ संकुचित दृष्टिकोण से बताया गया।इसे युध्द की बजाय'मानवता के प्रति अपराध' या'आतंकी कार्रवाई' कहना सही होगा।


हमने खास तरह की खबरों को दबाया और खास तरह की खबरों को बताया।इसके कारण हम दर्शकों को कम सूचनाएं दे पाए।इसके कारण दर्शकों की प्रतिक्रियाएं भी हल्की रहीं।हैकेट का मानना है कि इस तरह अमरीकी विदेशनीति को बचाने के लिए बड़े पैमाने पर वैचारिक श्रम किया गया।कायदे से हमें किसी फ्रेम विशेष पर जोर दिए बिना जनता को सभी तार्किक परिप्रेक्ष्यों के तहत सूचनाएं देनी चाहिए थी।संयुक्त राष्ट्र संघ और अंतर्राष्ट्रीय कानूनों के तहत आतंकवादियों के खिलाफ क्या कार्रवाई हो सकती थी इस पर बहस होनी चाहिए थी।साथ ही अमरीकी विदेशनीति के दोहरे चरित्र पर भी बहस होनी चाहिए थी।बताया जाना चाहिए था कि किस तरह विदेशनीति अमरीका के हितों को नुकसान पहुँचा रही है।




इराक युध्द हो या राष्ट्रवादी उन्माद का समय हो ऐसे में माध्यम किसके साथ हों यह सबसे महत्वपूर्ण है।अमरीकी माध्यमों के रूख से सारी दुनिया के माध्यम प्रभावित हो रहे थे।अत: अमरीकी माध्यमों पर पत्रकारिता और राष्ट्रवाद के बीच संतुलन बनाने की सबसे ज्यादा जिम्मेदारी थी।


ध्यान रहे संकट की अवस्था में माध्यमों को राज्य के साथ नहीं जनता के साथ होना चाहिए।जनता के साथ होने का मतलब है ठोस खबरें,खोजी खबरें,विश्लेषण,विचारों और परिप्रेक्ष्य की बहुलता की रक्षा और प्रस्तुति।ऐसी स्थिति में हमें सवाल करना चाहिए कि हमारी सरकार क्या कर रही है ?हमें कहां और किस दिशा में ले जाना चाहती ?साथ ही हमें इस क्रम में पैदा होने वाले अंतर्विरोधों और दुविधाओं को उजागर करना चाहिए।हमें जनता की बहस में मदद करनी चाहिए।जिससे वह सही निर्णय ले सके।हमें सभी स्रोतों के प्रति आग्रह से बचना चाहिए।तथ्यों की परीक्षा करनी चाहिए।


झूठ और तथ्य में फर्क करना चाहिए।अफवाहों को खारिज करना चाहिए।कोई भी पत्रकार अपने देश की सबसे अच्छी सेवा तब ही कर सकता है जब वह आलोचनात्मक दृष्टिकोण रखे और स्वतंत्र हो।चाहे मसला कितना ही सही क्यों न हो।


पत्रकारों का राष्ट्रवादी उन्माद आम जनता को खून की नदी में डुबो देता है। राष्ट्रवाद की अपील पत्रकार के दिमाग को कुंद कर सकती है।किसी भी पत्रकार को राष्ट्रविरोधी कहकर लांछित नहीं किया जाना चाहिए।क्योंकि राष्ट्रवाद पदबंध भावनात्मकता को भड़काने वाला है।


संकट के समय संवेदनशील सूचनाओं को जारी नहीं किया जाना चाहिए।ऐसी सूचनाएं भी नहीं छापनी चाहिए जिनसे आतंकवादियों को मदद मिले।ध्यान रहे पत्रकार की भावनाओं का कोई अन्य दुरूपयोग न करे।हमें राष्ट्रवाद से ज्यादा जनता के हितों से जुड़े मसलों पर ध्यान देना चाहिए।ध्यान रहे जब युध्द के बादल छाए हों तो सबसे पहले 'सत्य' की हत्या होती है।पत्रकार का काम सत्य की रक्षा करना और राष्ट्रवाद यह कार्य करने नहीं देता।


युध्द की भाषा हथियार तय करते हैं।हथियार की भाषा मीडिया तय करता है।यही वजह है कि मीडिया को हथियार का खुदा कहा गया है।युध्द और भाषा का रिश्ता विलोम का रिश्ता है।युध्द के दौरान मीडिया जिस भाषा का इस्तेमाल करता है वह अमूमन ठंडी, भ्रम,भय और सामंजस्य पैदा करने वाली होती है। भ्रम और भय की भाषा का आम तौर पर वे लोग इस्तेमाल करते हैं जो कमजोर या अपराधी होते हैं।


इराक पर अमेरिकी गठबंधन के हमले के लिए मीडिया में काफी अर्सा पहले से तैयारियां चल रही थीं।इसकी बानगी के तौर पर टेलीविजन चैनलों में मुख्य शीर्षक और कुछ पदबंधों के नामों पर गौर करना समीचीन होगा।मसलन्, 'प्रिएमटिव वार','वेपन ऑफ मास डिस्ट्रक्शन','टेरर','रिजीम चेंज' आदि।इसी तरह मुख्य शीर्षक में सीएनएन ने युध्द के पहले कहा 'शो डाउन इराक',युध्द शुरू होने के बाद कहा 'इराक वार' बीबीसी ने कहा 'शो डाउन सद्दाम',एमएसएनबीसी ने कहा 'इराक वाच','काउण्ट डाउन इराक',डीडी ने कहा 'खाड़ी युध्द 2' आदि।ये सारे भाषायी प्रयोग इराक पर अमेरिकी गठबंधन सेना के हमलावर चरित्र को छिपाते थे।
     
मजेदार बात यह है कि बीबीसी और सीएनएन के पर्दे पर कभी यह नहीं कहा गया कि अमेरिकी या ब्रिटिश सेना ने इराक पर हमला किया। अमेरिका-ब्रिटेन को कभी हमलावर नहीं कहा गया।साथ ही इराक पर अमेरिका-ब्रिटेन के कब्जे को कभी इराक पर आधिपत्य या कब्जा नहीं कहा गया। इराक से बीबीसी संवाददाता जब भी रिपोर्ट भेजता।यही कहता कि हमारे संवाददाता को इराकी सेना की सेंसरशिप या निगरानी या स्वीकृति के बाद ही रिपोर्ट भेजने का मौका मिला है। जबकि अमेरिकी गठबंधन सेना के साथ चल रहे संवाददाताओं ने यह कभी नहीं कहा कि उन्हें गठबंधन सेना की सेंसरशिप या स्वीकृति के बाद ही रिपोर्ट भेजने का अवसर मिला है।


कहने का तात्पर्य यह कि इराकी सेंसरशिप को उभारा गया और गठबंधन सेना की सेंसरशिप को छिपाया गया।जबकि गठबंधन सेना ने घोषित तौर पर सेंसरशिप जारी की थी। 'वेनकूवर सन' के अंतर्राष्ट्रीय मामलों के संवाददाता और बीस वर्षों से युध्द संवाददाता का काम करने वाले जोनाथन माथ्रोप ने लिखा कि इराक कवरेज के दौरान जो सामग्री पेश की गई उससे यह अर्थ संप्रेषित हुआ है कि इस युध्द का जमीन और खून से कोई लेना-देना नहीं है।


इराक कवरेज की भाषा के बारे में स्टेनफोर्ड विश्वविद्यालय के मनोवैज्ञानिक डा.अलबर्ट बांदुरा का मानना है कि नैतिक रूप से अवांछित सरोकारों से बचने का आसन तरीका यह है कि ऐसी भाषा का इस्तेमाल किया जाए जो युध्द को वैध बनाए।यदि पत्रकार 'जार्गन' या 'रेहटोरिक' की भाषा से अलग करने में असमर्थ होता है तो मीडिया में युध्द के नैतिक विरोधों को खत्म कर देता है।



               

रविवार, 13 सितंबर 2009

अमरीका का राजनीति‍क सच

अमरीका की कारपोरेट राजनीति की धुरी है 'कारपोरेट जनतंत्र' (अमरीकी लोकतंत्र को जनता का जनतंत्र समझने की भूल नहीं करनी चहिए) ,अंधराष्ट्रवाद और यहूदीवाद। अमरीका की राजनीति में कोई भी दल सत्ता में आए उसे अंधराष्ट्रवाद और यहूदीवाद के पैराडाइम के तहत ही अपना राजनीतिक कार्यक्रम घोषित करना होता है। ओबामा भी इसी दायरे में परिक्रमा कर रहे हैं। अनेक मामलों में ओबामा और उनके सहयोगी अंधराष्ट्रवाद और यहूदीवाद के कट्टर समर्थक हैं। इस तथ्य की पुष्टि ओबामा के द्वारा जो नयी प्रशासनिक टीम बनायी जा रही है उसमें शामिल व्यक्तियों की राजनीतिक समझ और भूमिकाओं के अब तक के रिकॉर्ड के आधार पर आसानी से समझी जा सकती है।
दूसरी ओर बहुराष्ट्रीय मीडिया अंधराष्ट्रवाद और यहूदीवाद के पैराडाइम से बंधा है। यही वजह है कि अंधराष्ट्रवादी और यहूदीवादी कट्टरपंथियों के विचारों को इसबार के चुनावों में व्यापक कवरेज मिला है। बहुराष्ट्रीय मीडिया नीति है अंधराष्ट्रवाद और यहूदीवाद को तार्किक ,'जेनुइन' और 'स्वाभाविक' विचार के रूप में पेश करो। यही फिनोमिना हमारे देश में स्थानीय मीडिया ने भी आत्मसात कर लिया है। अंधराष्ट्रवादी, कट्टरपंथी और कंजरवेटिव राजनीतिक शक्तियों का कवरेज प्रतिदिन बढ़ रहा है। उन्हें लोकतंत्र का संरक्षक और जनता का हितैषी बताया जा रहा है।
'नाइन इलेवन ' की घटना के बाद अमरीकी राजनीति ज्यादा आक्रामक और अधिनायकवादी रूझानों की ओर बढ़ी है। राष्ट्रीय संप्रभुता को अस्वीकार करने की भावना और भी ज्यादा बलवती हुई है। 'राजनीतिक आक्रामकता' और 'कारपोरेट अधिनायकवाद' का बाजार की आक्रामक रणनीति के साथ गहरा संबंध है। इस प्रक्रिया को प्रभावी बनाने में टेलीविजन ने केन्द्रीय भूमिका अदा की है। टेलीविजन के विस्तार के साथ 'कारपोरेट अधिनायकवाद' का विस्तार हुआ है। साथ ही 'शो बिजनेस' संस्कृति ने समूचे परिदृश्य को घेर लिया है।
'शो बिजनेस' संस्कृति साधारण आदमी की सोचने की क्षमताओं का अपहरण कर लेती है। यह ऐसा वातावरण बनाती है कि व्यक्ति को दमन-उत्पीडन में मजा आने लगता है। सब समय अपने कर्म और कुकर्म की वैधता तलाशते रहते हैं। स्वयं के हाथों अपनी पीठ ठोंकते हैं। स्वयं को शाबाशी देते हैं। आज किसी भी चीज पर पाबंदी की जरूरत नहीं है। मसलन् टीवी परेशान कर रहा है अथवा इंटरनेट परेशान कर रहा है तो पाबंदी लगाने की जरूरत नहीं है। बल्कि इनके जरिए जो सूचनाएं संप्रेषित की जा रही हैं वे ठंडी हैं, सक्रिय नहीं करतीं और थोथा ज्ञानबोध पैदा करती हैं। ये हमारे अज्ञानबोध अथवा चीजों को छिपाने में मदद करती हैं। पहले हम सूचनाओं के जरिए उद्धाटत करते थे इनदिनों सूचना के जरिए छिपाने का काम करते हैं। फलत: सत्य अप्रासंगिक हो जाता है। आज मनुष्य के जीवन में असंख्य समस्याएं हैं,पीड़ाएं हैं,असंख्य विचलन हैं,असंख्य किस्म के दबाव हैं इसके कारण हम विनाश और तबाही से भी प्रेम करने लगे है। हमें तबाही से भिन्न वातावरण नजर ही नहीं आता। हम मीडिया में अपने ही विनाश का आनंद लेते रहते हैं। अपने ही विनाश पर तालियां बजाते रहते हैं। विनाश की खबर अब परेशान नहीं करती बल्कि दर्प,विजय और आनंद के साथ दाखिल होती है।
'शो बिजनेस' का ही कमाल है कि आज सबसे ज्यादा क्लासिक बिक रहे हैं,देखे जा रहे हैं,विचारवान साहित्य भी बिक रहा है किंतु इस समूची प्रक्रिया में ज्ञान का प्रबंधन कर लिया गया है। आलोचनात्मक विश्लेषण का प्रबंधन कर लिया गया है। हमें बताने वाले ज्ञानी लोग मीडिया पर अहर्निश बैठे रहते हैं कि क्या सही और क्या गलत है और इसके बावजूद हमें सही और गलत में अंतर करने में असुविधा हो रही है। पहले हम तथ्य और विचारों को व्यवस्थित करके ,वर्गीकृत करके पढ़ते थे, जिनके लिए ये विचार हुआ करते थे वह जनता भी इस कार्य में सक्षम होती थी आज किंतु यह स्थिति एकसिरे से बदल गयी है।
टेलीविजन युग में चीजों,वस्तुओं और विचारों की रोचक प्रस्तुति की बजाय प्रत्येक चीज को मनोरंजक रूप दे दिया गया है। टेलीविजन संस्कृति के जरिए आप स्वयं को जान सकते हैं। टीवी की प्रत्येक स्टोरी का यह अर्थ नहीं है कि उसका सामाजिक प्रभाव होगा ही। टीवी प्रस्तुतियों का लक्ष्य होता है दर्शक को आगे की स्टोरियों के प्रति आकर्षित करना, उसके इंतजार में बिठाए रखना। किताब और अन्य माध्यमों की यह विशेषता है कि वे अपनी शैली और अंतर्वस्तु की निरंतरता को बनाए रखती हैं किंतु टेलीविजन में ऐसा कुछ भी नहीं है। टीवी को निरंतर देखने के कारण हम टीवी विच्छिन्नाता के आदी हो जाते हैं। टेलीविजन ज्ञानमीमांसात्मक तौर पर यह धारणा पैदा करता है कि हम टीवी में जो कुछ भी देखते हैं वह अतिरंजित होता है। अतिरंजित प्रस्तुति के कारण उसकी प्रस्तुतियों को गंभीरता से लेने की जरूरत नहीं है।
टेलीविजन विमर्श के सैध्दान्तिक चरित्र को निर्मित करने में सुरियलिस्ट अथवा अति-यथार्थवादी परिप्रेक्ष्य हमारी मदद कर सकता है। नील पोस्टमैन ने '' एम्युजिंग अवरसेल्व्स टु डेथ: पब्लिक डिसकोर्स इन दि एज ऑफ शो बिजनेस'' (पेंगुइन बुक्स,1985) में लिखा है टेलीविजन खबरें मूलत: संचार विरोधी सैध्दान्तिकी के ढांचे में सजाकर पेश की जाती हैं। इनका लक्ष्य होता है तर्क,विवेक, क्रम और अन्तर्विरोध की विदायी।
राबर्ट मेकनील के अनुसार टेलीविजन खबरों में प्रत्येक चीज संक्षिप्त रहती है। जिससे किसी के ध्यान पर दबाव न पड़े, बल्कि दर्शक सहजभाव से वैविध्य,विविष्टता,एक्शन और मूवमेंट को ग्रहण करता रहे। दर्शक किसी अवधारणा ,चरित्र और समस्या पर चंद सैकिण्ड से ज्यादा ध्यान न दे। खबर को 'खाने के कौर' की तरह होना चाहिए,उसमें जटिलताएं न हों, नॉनसेंस अपरिहार्य है, इस गुण के कारण संदेश सहज होता है।
टीवी में दृश्य प्रस्तुतियों को विचारों का विकल्प बनाकर पेश किया जाता है। एंकर की बकबक अराजकता है। अमरीकी लोग व्यापक मनोरंजन करते हैं और पश्चिमी जगत के सबसे कम सूचना सम्पन्ना नागरिक माने जाते हैं। वे प्रत्येक विषय पर अपनी राय भी रखते हैं। उनकी राय को राय न कहकर भावनाएं कहना ज्यादा सटीक होगा। वे किसी विषय पर राय नहीं अपनी भावनाओं की अभिव्यक्त करते हैं। ये भावनाएं प्रति सप्ताह बदलती रहती हैं। राय प्रति सप्ताह नहीं बदलती। राय टिकाऊ होती है भावनाएं अस्थिर होती हैं। अमरीकी नागरिकों की इन बदलती भावनाओं को हम बदलते हुए विभिन्ना किस्म की रायशुमारी में निरंतर देखते हैं। रायशुमारी की राय इसलिए बदलती रहती है क्योंकि प्रति सप्ताह तथ्य बदलते रहते हैं। इस प्रक्रिया में टेलीविजन यह विभ्रम पैदा करता है कि वह सूचना दे रहा है और सूचनाप्राणी तैयार कर रहा है। टेलीविजन के द्वारा दी गयी तथाकथित सूचना 'कुसूचना' (डिसइन्फोर्मेशन) होती है। 'कुसूचना' का अर्थ असत्य सूचना नहीं है बल्कि इसका अर्थ दिग्भ्रमित करने वाली सूचना है। गलत सूचना, अप्रासंगिक सूचना, सतही सूचना,ऐसी सूचना जो जानकारी का विभ्रम पैदा करे। बल्कि वह जो जानता है उससे भी दूर ले जाए । ज्ञान से परे ले जाए । ज्ञान से विच्छिन्न कर दे।
आज खबर को मनोरंजन के पैकेज में तैयार किया जाता है। फलत: टीवी खबर मनोरंजन तो करती है सूचना नहीं देती। जनता को प्रामाणिक सूचनाओं से वंचित करती है। हम यह भूलते जा रहे हैं कि सुसंगत सूचना सम्पन्न का अर्थ क्या होता है। अज्ञानता को हमेशा दुरूस्त किया जा सकता है। किंतु अज्ञानता को ज्ञान के रूप में ग्रहण नहीं किया जा सकता है। वाल्टर लिपमैन ने लिखा है '' आजादी का कोई अर्थ नहीं यदि समुदाय के पास झूठ को खोज निकालने के उपकरण ही न हों।'' प्रशिक्षित प्रेस एक तरह से झूठ के उद्धाटन का काम करता है। टेलीविजन की सारी मुश्किलें यहीं पर छिपी हैं। असत्य की चादर को उघाड़ने का काम वह नहीं कर पाता। टीवी इमेजों का लक्ष्य दर्शक अथवा उपभोक्ता के अंदर अपील पैदा करना लक्ष्य होता है सत्य को पेश करना लक्ष्य नहीं होता। टीवी में विवेक और विज्ञापन में अंतर करना मुश्किल हो गया है। विवेक और विज्ञापन में भेद करना मुश्किल हो गया है।
(भड़ास ब्‍लाग पर भी प्रकाशि‍त )

शनिवार, 12 सितंबर 2009

चैनलों की कर्म संस्‍कृति‍ और नया माहौल

भारत में टेलीवि‍जन चैनलों की बाढ़ आयी हुई है। चैनलों का यह सि‍लसि‍ला थमने वाला नहीं है। चैनलों की चमक अपील करती है। चैनलों के इस हंगामे में अगर कोई वंचि‍त है तो चैनलों में काम करने वाले लोग। चैनलों की कर्मसंस्‍कृति‍ अभी तक परि‍भाषि‍त नहीं है। चैनलों के अंदर कि‍स तरह का प्रशासन और संचालन प्रणाली हो,कर्मचारि‍यों के कि‍स तरह के पद और पगार आदि‍ हो, काम के घंटे कि‍तने हों, कर्मचारि‍यों की तरक्‍की के नि‍यम क्‍या हों,इत्‍यादि‍ सवालों पर हमारा मीडि‍या उद्योग अभी तक चुप क्‍यों है ? अनेक चैनल हैं जि‍नमें काम करने वालों को समय पर पगार नहीं मि‍लती,जो लोग काम करते हैं उन्‍हें सही तनख्‍वाह नहीं मि‍लती। औने-पौने दामों पर चैनलों में लोग काम कर रहे हैं। नौकरी के मामले में सबसे ज्‍यादा अनि‍श्‍चि‍त भवि‍ष्‍य अगर कि‍सी का है तो चैनल कर्मचारि‍यों का है। केन्‍द्र सरकार अभी तक यह तय क्‍यों कर पायी है कि‍ चैनलों में काम करने वालों की सेवाशर्त्‍तें क्‍या होंगी ? चैनलकर्मि‍यों का अबाध शोषण जारी है। क्‍या केन्‍द्र सरकार कि‍सी भयावह तबाही का इंतजार कर रही है ? तमाम कि‍स्‍म के वि‍षयों पर जमकर लि‍खने वाले पत्रकारों को चैनलों में काम करने वालों की दुर्दशापूर्ण अवस्‍था पर लि‍खने का मन क्‍यों नहीं होता ? हमारे पत्रकार नि‍हि‍तस्‍वार्थी मानसि‍कता के फ्रेम के बाहर आकर चैनलों में काम करने वालों की दशा-दुर्दशा पर कुछ भी क्‍यों नहीं लि‍खते ? हमारे न्‍यायालयों में आए दि‍न जनहि‍त याचि‍का दायर करने वाले मानवाधि‍कार कर्मी इस मसले पर चुप क्‍यों हैं ? कायदे से अखबारों से लेकर नेट तक चैनलों के अंदरूनी तंत्र के उद्घाटन के बारे में सुनि‍योजि‍त ढ़ंग से मुहि‍म चलायी जानी चाहि‍ए। इस काम के लि‍ए जो भी उपयुक्‍त पद्धति‍ हो उसे लागू कि‍या जाना चाहि‍ए।
प्रत्‍येक चैनल के अंदरूनी संसार,कार्यप्रणाली,नौकरी करने वालों की संख्‍या,प्रत्‍येक पद पर काम करने वालों की पगार,काम के घंटे आदि‍ के ब्‍यौरे कि‍सी न कि‍सी रूप में प्रकाशि‍त कि‍ए जाने चाहि‍ए। साथ ही संबंधि‍त चैनल का मालि‍क कौन है, कि‍स तरह संचालन के लि‍ए धन एकत्रि‍त कि‍या है। कौन और कि‍तने हि‍स्‍सेदार हैं। प्रबंधन का तरीका क्‍या है, कर्मचारि‍यों की सेवाशर्ते क्‍या हैं इत्‍यादि‍ सवालों पर सि‍लसि‍लेबार ढ़ंग से रहस्‍योद्धाटन कि‍या जाना चाहि‍ए। इससे चैनलों के बारे में पारदर्शि‍ता बढेगी।
चैनल कर्मि‍यों का पना बृहत्‍तर संगठन हो प्रत्‍येक चैनल में उसकी शाखाएं हों, जि‍ससे वे एकजुट होकर प्रबंधन के साथ बातें कर सकें,अपनी समस्‍याएं सुलझा सकें।वि‍भि‍न्‍न मजदूर संगठनों को भी इन कर्मचारि‍यों को संगठि‍त करने के बारे में सोचना चाहि‍ए। चैनल कर्मियों के प्रभावशाली संगठन के अभाव में चैनल मालि‍क अपने कर्मि‍यों के साथ अमानवीय व्‍यवहार कर रहे हैं। चैनल संस्‍कृति‍ ने मीडि‍या में जि‍स अराजकता और नि‍यमहीनता को जन्‍म दि‍या है उसके उद्घाटन के बाद ही मालि‍कों के ऊपर दबाव बनेगा। केन्‍द्र सरकार भी समझेगी कि‍ आखि‍रकार वह कोई ब्रॉडकास्‍टिंग के नि‍यमन का तंत्र बनाए । अभी चैनल मालि‍कों ने अपना संगठन बना लि‍या है और इसके जरि‍ए वे सरकार के साथ अपनी सौदेबाजी करते रहते हैं। मालि‍कों के संगठन ने कभी अपने सदस्‍य चैनल में चल रही अनि‍यमि‍तताओं की ओर ध्‍यान ही नहीं दि‍या है, वे सि‍र्फ अपने धंधे के वि‍स्‍तार और संरक्षण के सवालों पर ही सक्रि‍य होते हैं। चैनलकर्मी और चैनलों की कर्मसंस्‍कृति‍ उनकी चि‍न्‍ता के केन्‍द्र में नहीं है। यह स्‍थि‍ति बदलनी चाहि‍ए। चैनलों की उठापटक की खबरें, कर्मचारि‍यों की समस्‍याओं पर तरह तरह के लेख और अन्‍य सूचनाएं अभी बहुत कम मात्रा में सि‍र्फ नेट पर ही दि‍खते हैं। प्रेस में उन्‍हें प्रमुखता नहीं दी जाती।‍
दूसरी ओर चैनल संस्कृति ने तर्क के मुहावरे, भाषा का मर्म और बाजार के विकास के नियम बदल दिए हैं। बौध्दिकों में भ्रम पैदा किया है। बोगस,खोखले,सतही और कृत्रिम को महत्ता दिलाई है। आदर्श बनाया है।चैनलों में सब ग्लोबल और इकसार नहीं है,बल्कि प्रतिरोधी और क्षेत्रीय भी है।चैनल संस्कृति वस्तुत: अस्मिता संस्कृति है।मासकल्चर है।लैटिन अमेरिका, मध्यपूर्व,यूरोपीय यूनियन और भारत का अनुभव बताता है कि चैनलों के प्रसार ने स्वतंत्र राष्ट्रों की संप्रभुता, क्षेत्रीय एकजुटता को मजबूत बनाया है।चैनलों के माध्यम से साझा भाषा और सभ्यता का निर्माण हो रहा है।जहां-जहां चैनल संस्कृति अपने पैर पसार रही है वहां पर जनता में संपर्क,एकजुटता और करीबीपन बढ़ा है। यह स्थिति आज से दस बरस पहले नहीं थी।भाषायी एकता मजबूत हुई है। ज्ञान ,खबरों,मनोरंजन,शिक्षा आदि में इजाफा हुआ है।सूचना पाने का अधिकार और मनोरंजन प्राप्ति के अधिकार के रूप में दो नए अधिकारों का जन्म हुआ है।क्षेत्रीय जरूरतों के कारण क्षेत्रीय खबरों का भी जन्म हुआ है।टेलीविजन ने खबरों को देशज सीमाओं के बाहर ले जाकर अपने लिए नया 'स्पेस' बनाया है।इस प्रक्रिया में दर्शक भी देशज सीमाओं के बाहर जा रहे हैं। इसके कारण दर्शकों के एक काल्पनिक समुदाय का जन्म हुआ है।
नवजागरण के साथ प्रेस क्रांति ने जातीय भाषा,जातीय व्यापार और जातीय चेतना का निर्माण किया था।इसके परिणामस्वरूप साधारण लोगों में जातीय भाषा के प्रति आकर्षण पैदा हुआ।ऐसा सामाजिक समूह उभरकर आया जो अपनी भाषा में लिखता,बोलता था।किंतु अपने क्षेत्र के बाहर अन्य भाषा का इस्तेमाल करता था।भारत में जब प्रेस आया तो उसने संस्कृति की तमाम दीवारों को गिरा दिया।सांस्कृतिक संकीर्णता के बंधनों से मुक्त किया और राष्ट्रीय अस्मिता को बढावा दिया।बहुराष्ट्रीय उपग्रह चैनलों ने मूलत: इस स्थिति को बल पहुँचाया।प्रेस की नई तकनीकों,सैटेलाइट और इंटरनेट ने दूर से स्वतंत्र सूचना के संप्रसारण की अनंत संभावनाओं के द्वार खोले हैं। चैनल संस्कृति के आने के पहले तक प्रत्येक देश की सरकार का अपने देश के सूचना बाजार पर नियंत्रण था।किंतु चैनल संस्कृति ने एक ही झटके में इस इजारेदारी को तोड़ दिया।आज सूचना देशज संपत्ति न होकर सार्वभौम संपत्ति का रूप ले चुकी है।राष्ट्रीय सीमाओं से परे एक व्यापक बाजार जन्म ले चुका है।तमाम किस्म के भाषायी अंतरों के बावजूद क्षेत्रीय एकीकरण बढ़ा है।
तकनीकी प्रोन्नति के कारण राष्ट्र-राज्य की प्रकृति में भी बदलाव आया है। परंपरागत राष्ट्रवाद और राष्ट्र की धारणा में परिवर्तन आया है ।यह परिवर्तन कैसा होगा ?किस दिशा में ले जाएगा ?इसके बारे में कोई नहीं जानता।पूंजीवादी उत्पादन संबंधों में तेजी से परिवर्तन आ रहा है।इसके कारण राष्ट्र की भूमिका सीमित होकर रह गई है।इस क्रम में सत्ता को चुनौती देने वालों की नई जमात पैदा हो गई है।जिन्हें हम भारत में कठमुल्ले या साम्प्रदायिक, मध्य-पूर्व में फंडामेंटलिस्ट और लैटिन अमेरिका में ड्रग माफिया के नाम से जानते हैं। इन्हें समाचार चैनलों ने हवा दी है।
आज हमारे सामने परा-राष्ट्रवाद और नई माध्यम तकनीकी द्वारा पैदा की गई चुनौतियां गंभीर संकट पैदा कर रही हैं।चैनलों के द्वारा भूमंडलीय सांस्कृतिक रूपों के अबाधित प्रसार ने महानगरीय संस्कृति के लिए गंभीर संकट पैदा किया है।इसके परिणामस्वरूप महानगरों में ग्लोबल और महानगरीय दोनों ही सांस्कृतिक रूप और एटीट्यूट्स प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं। इस प्रक्रिया में सांस्कृतिक वैविध्य को स्वीकार करने या उसकी प्रशंसा करने वालों की तादाद में इजाफा हुआ है।चैनल संस्कृति के आने के पहले तक हमारे संस्कृति ने महानगरीय संस्कृति को तरजीह दी और क्षेत्रीय या स्थानीय संस्कृति को दोयम दर्जे का स्थान दिया।इस समूची प्रक्रिया को चैनलों ने एकसिरे से पलट दिया है।
बहुराष्ट्रीय समाचार चैनलों ने स्थानीय संस्कृति,स्थानीय खबरों,स्थानीय सामाजिक एवं राजनीतिक संगठनों, स्थानीय सोच और स्थानीय नेताओं को तरजीह दी है। महानगरीय बोध की बजाय स्थानीय बोध और स्थानीय संस्कृति को बढ़ावा दिया है।इसे भाषायी चैनलों में सहज ही देख सकते हैं।यह नए किस्म का क्षेत्रीयतावाद है।समाचार चैनलों में स्थानीय विवादों और झगड़ों को पेश किया जा रहा है।समाचार चैनलों का स्थानीयतावाद,क्षेत्रीयतावाद और बहुभाषिकता अंतत:जनतांत्रिकीकरण की अपार संभावनाओं के द्वार खोल रहा है।समाचार चैनलों में स्थानीय संगठनों की विभिन्न मसलों पर होनेवाली बहसों में हिस्सेदारी बढ़ी है।मौजूदा शासन व्यवस्था इससे मजबूत हुई है।महानगर और छोटे शहरों या कस्बों के बीच संबंध मजबूत हुआ है। सभी चैनलों के मुख्यालय महानगरों में हैं।आरंभ में इन चैनलों पर महानगर हावी था।किंतु आज भाषायी वैविध्य और स्थानीयतावाद एवं क्षेत्रीयतावाद हावी है।यह टेलीविजन पर प्रेस का प्रभाव है।

( मोहल्‍ला लाइव और भड़ास ब्‍लाग पर 12 सि‍तम्‍बर 2009 को प्रकाशि‍त )

शुक्रवार, 14 अगस्त 2009

पुस्‍तक अंश 'भूमंडलीकरण और ग्‍लोबल मीडि‍या', 'टेलीवि‍जन में मजदूरवर्ग का अधूरा आख्‍यान'


टेलीविजन का मजदूरवर्ग के साथ गहरा अंतर्विरोध है। टेलीविजन की प्रकृति अ-जनतांत्रिक है। जबकि मजदूरवर्ग की प्रकृति जनतांत्रिक है। मजदूरों के मसले अमूमन खबर नहीं बनते। खबर तब ही बनते हैं जब मजदूरवर्ग हड़ताल पर जाता है। मजदूरवर्ग की खबरें सामान्य खबर की कोटि में नहीं आतीं। ये वर्ग विशेष की खबरें हैं। टेलीविजन हमेशा इस वर्ग की खबरों को सामान्य खबर की कोटि में रखकर पेश करता है। टेलीविजन के लिए मजदूरवर्ग की हड़ताल और आम जनता के बीच अंतर्विरोध है। जबकि अवधारणात्मक और सामाजिक तौर पर मजदूरवर्ग के संघर्षों का आम जनता के हितों के साथ अंतर्विरोध नहीं है और न टकराहट है। किंतु ज्योंही मजदूरवर्ग हड़ताल पर जाता है अथवा अपने हकों की लड़ाई शुरू करता है उसका समूचे समाज के साथ अंतर्विरोध दिखाने पर टेलीविजन जोर देने लगता है। टेलीविजन यह भूल जाता है कि जिस तरह जनतंत्र में नागरिकों के हक होते हैं, जिम्मेदारियां होती हैं,उसी तरह मजदूरवर्ग के भी हक होते हैं,जिम्मेदारियां होती हैं। जिस तरह नागरिकों को अपने सामान्य जीवनयापन की अनुकूल परिस्थितियों की जरूरत होती है, उसी तरह मजदूरवर्ग को भी सामान्य नागरिक परिवेश, आवश्यक सुविधाएं और सौहार्द्रपूर्ण

वातावरण कीजरूरत होती है।

टेलीविजन प्रस्तुतियों में मजदूरवर्ग की हड़ताल हो या सामान्य राजनीतिक कार्रवाई हो आदि सभी मामलों में टेलीविजन पूर्वाग्रह से काम लेता है।जब तक हड़ताल की संभावना नहीं होती तब तक मजदूरवर्ग को टेलीविजन पर्दे पर आने नहीं दिया जाता। टेलीविजन जब हड़ताल की खबर का प्रसारण करता है तो पहला संदेश यह देता है कि यूनियनवाले आर्थिक स्थिति बिगाड़ने की कोशिश कर रहे हैं। यूनियन के नेता की छवि हड़ताली नेता के रूप में पेश की जाती है। आम तौर पर हड़ताल की खबर को विकास विरोधी खबर के तौर पर पेश किया जाता है।उन तत्वों,संगठनों आदि पर बल होता है जो हड़ताल विरोधी होते हैं। उनके बयानों को बगैर किसी प्रमाण के पेश किया जाता है। इसके विपरीत मजदूरों के प्रामाणिक बयानों और तथ्यों को छिपाया जाता है। हड़ताल के मुद्दों को तमाम किस्म की सेंसरशिप से गुजरना होता है। उन्हें चलताऊ ढ़ंग से पेश किया जाता है। आम तौर पर मजदूरों के बारे में टेलीविजन में मजदूर विरोधी लोग ज्यादा बोलते नजर आते हैं। टेलीविजन कैसे मजदूर विरोधी मानसिकता का प्रदर्शन करता है इसका आदर्श नमूना है टेलीविजन पर आने वाली व्यापारिक खबरें। इन खबरों में जब कभी यह बताया जाता है कि फलां-फलां कंपनी ने इस तिमाही या साल में मुनाफा कमाया तो इसका श्रेय मालिक को दिया जाता है न कि मजदूरों को। आज हिन्दुस्तान की ज्यादातर मुनाफा कमाने वाली कंपनियां मजदूरों के श्रम के कारण मुनाफे पर चल रही हैं। किंतु कोई कंपनी जब मुनाफा कमाती है तो टेलीविजन पर्दे पर मालिक या मुख्य प्रबंधक की छवि दिखाई देती है कंपनी के मजदूर नेता की छवि दिखाई नहीं देती। मजदूरों के जीवन में सालों-साल जो कुछ भी घटता है उसकी ओर टेलीविजन कभी ध्यान नहीं देता। किंतु हड़ताल पर तुरंत ध्यान देता है। हड़ताल के पहले मजदूर किस तरह की मुसीबतों का सामना करते रहे हैं,उनके घरों में किस तरह की मुश्किलों से परिवारीजनों को गुजरना पड़ा है। बच्चे समय पर स्कूल जा पाते हैं या नहीं। मजदूरों की औरतों को किस तरह की मुश्किलों से दो-चार होना पडता है। मजदूर परिवार को दो जून की रोटी मिल रही है या नही ? ये सारी चिन्ताएं टेलीविजन की नहीं है।

टेलीविजन कैमरा मजदूर बस्तियों में प्रवेश ही नहीं करता।कभी यह जानने की कोशिश नहीं की जाती कि आखिरकार मजदूर कैसे रहते हैं ?मलिन बस्तियों में कैमरा जाएगा,वेश्यालयों और वेश्या बस्तियों में टेलीविजन वाले जाएंगे किंतु मजदूर बस्तियों में नहीं जाएंगे । इसका प्रधान कारण यह है कि मजदूर परजीवी नहीं है। वह उत्पादक शक्ति है। समाज को पैदा करके देता है। कैमरे में यदि उत्पादक शक्तियों का संसार उजड़ा हुआ नजर आएगा इससे मीडिया के उस प्रचार की पोल खुल जाएगी कि मजदूरों को बहुत वेतन मिलता है। सामान्य तौर पर पूंजीपतिवर्ग की छोटी सी समस्या भी खबर बन जाती है किंतु मजदूरों के बड़े-बड़े हादसे भी खबर नहीं बन पाते। सामान्य तौर पर धनियों की बस्ती में कोई चोरी की घटना हो जाती है तो मुख्य खबर बन जाती है किंतु मजदूरों की बस्तियों, मलिन बस्तियों में गुंड़े सनसनाते घूमते रहते हैं। उत्पीड़न करते रहते हैं।किंतु खबर नहीं बन पाती। सवाल उठता है कि मजदूर रैली या प्रदर्शन या धरना या हड़ताल क्यों करते हैं ? क्या वे काम चोर हैं ? क्या उनके कारण पूंजीपति के मुनाफों में कमी आई है ?जी नहीं।

मजदूर हड़ताल या रैली तब निकालते हैं जब प्रशासन उनकी तकलीफों की तरफ ध्यान नहीं देता। यहां तक कि उनकी शिकायतों को भी कोई नहीं सुनता। मजदूर शौकिया तौर पर हड़ताल या रैली के अस्त्र का इस्तेमाल नहीं करते। बल्कि मजबूरी में,अपनी बातों को प्रशासन तक प्रभावशाली रूप में पहुँचाने के लिए ऐसा करते हैं। ये उनकी अभिव्यक्ति के रूप हैं। टेलीविजन अपनी अभिव्यक्ति पर किसी भी किस्म का हमला बर्दाश्त नहीं कर सकता किंतु समाज के कमजोर तबकों खासकर उत्पादक शक्तियों की अभिव्यक्ति के रूपों के खिलाफ माहौल बनाने में सबसे आगे रहता है।यही मीडिया का अधिनायकत्व है।इससे जनतंत्र का विकास बाधित होता है।

मीडिया का एक रूप वह भी है जिसे हम 'नागरिक पत्रकारिता' के नाम से जानते हैं। नागरिक पत्रकारिता साधारण लोगों की चुनाव के समय मदद करती है।मतदाताओं को समूह में गोलबंद करती है।साम्प्रदायिक ,धार्मिक विद्वेष,जातिगत संकीर्णता,स्त्री उत्पीडन,बाल शोषण आदि के खिलाफ प्रचार करती है। हमें कायदे से इस तरह की पत्रकारिता के परिप्रेक्ष्य का समाचारों में ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल करना चाहिए।इस परिप्रेक्ष्य के लिए जरूरी है कि राजनीति के बारे में ज्यादा से ज्यादा सोचें। राजनीति के बेहतर आयामों को सामने लाएं। विभिन्न सामाजिक समूहों की राजनीति में हिस्सेदारी को सुनिश्चित बनाएं। यदि किसी क्षेत्र विशेष में अपराध पनप रहे हैं तो केन्द्रित रूप से उनको उजागर करना।जनता में मानवाधिकारों के बारे में जागरूकता पैदा करना।

नई सूचना और मीडिया तकनीकी जनतंत्र की सेवा के लिए है। जनतंत्र के निषेध के लिए नहीं है। आज किसी भी पत्रकार के पास तकनीकी ने शिकायत का अवसर नहीं छोड़ा है। 'जगह के अभाव' और 'समय के दबाव' और 'संसाधनों का अभाव' के नाम पर आज कोई भी पत्रकार जनता की उपेक्षा नहीं कर सकता। इंटरनेट ने इन तीनों कारणों की छुट्टी कर दी है। आज हमारे पास एक दर्जन से ज्यादा समाचार चैनल हैं। किंतु किसी चैनल का लक्ष्य जन सेवा का मिशन नहीं है। बल्कि ज्यादा से ज्यादा वस्तुओं की मार्केटिंग करना इनका प्रधान लक्ष्य है। समाचार चैनलों में एक-दूसरे से बेहतर खबरें देने की होड़ नहीं है। बल्कि ज्यादा से ज्यादा विज्ञापन पाने की होड़ लगी है। उनमें चर्चित व्यक्तित्व को दिखाने ,अपराध और हिंसा की खबर दिखाने, मनोरंजन और खेल की खबरें दिखाने,उसमें भी सीमित अवसरों पर विशेष कार्यक्रम दिखाने की प्रवृत्ति मिलती है। इन दिनों समाचार चैनल व्यवहार में स्कण्डल चैनल के रूप में काम कर रहे हैं। किसी ठोस मसले पर वृत्तचित्र यदा-कदा ही सामने आते हैं। किसी ठोस समस्या पर वृत्तचित्र दिखाना मुश्किल हो गया है।

नई मीडिया तकनीकी ने निजी और सामाजिक की परिभाषा बदल दी है। कल तक जो निजी मसला था। वह आज सार्वजनिक हो चुका है। जो सार्वजनिक था वह निजी बन गया है। मीडिया इस संबंध में प्रतिगामी नजरिए से काम ले रहा है। साधारण लोगों से लेकर बड़े लोगों तक के निजी मसलों पर चटखारे लेकर मीडिया जिस तेज गति से सक्रिय होता रहा है। वह माध्यम अध्येताओं के लिए चिन्ता की बात है। आज समाचार चैनल निजी मसलों पर जिस तरह ध्यान दे रहो हैं उस तरह सार्वजनिक हित के सवालों पर बहस नहीं चला रहे हैं। आज चैनलो की रूचि इसमें है कि किस राजनीतिज्ञ या चर्चित मीडिया व्यक्तित्व की सेक्स जिन्दगी या निजी जिन्दगी कैसी है ? वह इस क्षेत्र में किस तरह के घोटाले कर रहा है। किंतु चैनलों ने कभी किसी बड़े मीडिया प्रतिष्ठान में संपादक या अन्य के द्वारा किए जा रहे स्त्री शोषण, परपीडक आनंद या स्त्री रिपोर्टर के यौन शोषण के प्रसंगों पर कभी कुछ क्यों नहीं कहा। अमेरिका में बिल क्लिंटन के सेक्स स्कैण्डल को जिस तरह उछाला गया क्या मीडिया वाशिंगटन पोस्ट के किसी प्रख्यात पत्रकार द्वारा किए जा रहे सेक्स कांड के बारे में बता सकता है ? जी नहीं। यदि चैनल ऐसा करने लगे तो पत्रकारों की साख ही खत्म हो जाएगी। चैनलों के द्वारा निजी मसलों को राष्ट्रीय बनाने के पीछे मुख्य कारण है अपनी रेटिंग बढ़ाना,ज्यादा विज्ञापन पाना, जनता का वाजिब मुद्दों से ध्यान हटाना। इन दिनों मीडिया में जनतंत्र के मुद्दे गायब हैं। जनता को सही अर्थ में मीडिया ने परिभाषित करना बंद कर दिया है। कायदे से मीडिया को जनतंत्र के संसाधनों का खजाना बनाया जा सकता है। विभिन्न मुद्दों ,सवालों,घटनाओं और खबरों के बारे में तथ्यपूर्ण जानकारी देना मीडिया की भूमिका है। विभिन्ना नजरिए से इस कार्य को किया जाना चाहिए।

विभिन्न टीवी चैनलों को गौर से देखें तो पाएंगे कि वहां ताजा कार्यक्रम बहुत कम मात्रा में दिखाए जा रहे हैं।सभी चैनलों पर पुराने और बासी कार्यक्रमों का प्रसारण हो रहा है।अपवाद स्वरूप सिर्फ खेल और चुनाव के कार्यक्रम ताजा होते हैं।बाकी सब कुछ पुराना दिखाया जा रहा है। यह सिलसिला तब से शुरू हुआ जब से हमने डिजिटल तकनीकी के युग में प्रवेश किया। खासकर डिजिटल पर्सनल वीडि‍यो रिकॉर्डर के आने के बाद सारी दुनिया में टीवी का चरित्र बदल गया। इसने कार्यक्रम देखने के मामले में समय की बंदिश खत्म कर दी। टीवी के जरिए लाइव प्रसारण की जो धारणा जुड़ी थी उसे खत्म कर दिया। एक जमाने में माइक्रोसॉफ्ट के मालिक बिल गेट ने कहा था '' हम अमेरिकी लोग जब किसी घटना को राष्ट्रीय स्तर पर महसूस करते हैं तो उसका प्रधान कारण है कि टीवी पर हम उसे एक साथ देखते हैं। इसी अर्थ में टीवी राष्ट्रीय एकता का प्रतीक है। क्योंकि घटना के प्रसारण के क्षण में हम एक साथ होते हैं।'' इसके विपरीत न्यूयार्क टाइम्स ने जनवरी 1999 के सम्पादकीय में लिखा कि ''टीवी हमें अदृश्य भविष्य की ओर ले जा रहा है। जिसके कारण हम राष्ट्रीय बोध की भावना खोते जा रहे हैं। 'डिजिटल पर्सनल वीडियो रिकॉर्डर ' ने इस बोध को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया है। यह संभव है कि परंपरागत टीवी तुरंत न मरे। किंतु यह सच है कि धीरे-धीरे मर जाएगा।''

नए तकनीकी दौर में टीवी या तो पूरी तरह अमरीका समर्थक है या पूरी तरह अमरीका विरोधी है। यह स्थिति टीवी के बुनियादी चरित्र से मेल नहीं खाती। प्रसिध्द फ्रांसीसी माध्यम विशेषज्ञ रूडोल्फ अर्नहाइम ने लिखा है कि ''टेलीविजन में यथार्थ की मौलिक कलात्मक प्रस्तुति के तत्व नहीं हैं। बल्कि वह यथार्थ से हमारा संबंध पुनर्निर्धारित करता है। वह हमें बेहतर ढ़ंग से शिक्षा देता है कि बहुआयामी और बहुस्तरीय घटनाओं की उत्पत्ति एक ही साथ हो रही है।वह ऐसी स्थिति की ओर ले जाता है जहां पर हमारी शारीरिक संरचना की धीमी गति और आंखों की कमी उजागर होती है। इस प्रक्रिया में हम ज्यादा भद्र ,कम आत्मकेन्द्रित बनते हैं। यह हमारे अनुभवों को व्यापक बनाने का औजार है। इस माध्यम ने हमारी संवेदनाओं पर समय और देश की सीमाओं का अतिक्रमण करके विजय प्राप्त की है। यह हमारी संवेदनाओं को अतिरिक्त तौर पर समृध्द बनाता है।''

अपराध और हिंसा की खबरों के अलावा भी खबरें हैं उनके साथ संतुलन कायम करते हुए खबरें प्रसारित की जानी चाहिए। एक खास किस्म के हिंसाचार और अपराध की ही निरंतर खबरें केन्द्र में बने रहने का अर्थ है कि अन्य किसी क्षेत्र में कोई घटना नहीं घट रही है। इस तरह जो समाचार आ रहे हैं वे असंतुलित हैं,सामाजिक स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हैं,यहां तक विषाक्त भी हैं। यह पत्रकारिता नहीं नशीली पत्रकारिता है। मीडिया इस तरह की खबरों के जरिए पेट भर देना चाहता है,समाचार के समूचे समय को घेर लेना चाहता है। इसके पीछे प्रधान कारण है रेटिंग और ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाने की अंतहीन भूख। इसके कारण पत्रकारिता के मूल्यों का क्षय हो रहा है। हम ज्यादा से ज्यादा मीडिया उन्माद के शिकार होते जा रहे हैं। इस चक्कर में प्रत्येक खबर बगैर सांस लिए पेश की जा रही है। जिससे पृथ्वी कांपने लगती है। टीवी समाचार प्रस्तोताओं ने पीत पत्रकारिता के सभी फार्मूलों को आत्मसात कर लिया है। अब प्रत्येक दिन एक ही काम है खबरों के जरिए मनोरंजन करना। कायदे से विचार करें तो हम खबरें मनोरंजन के लिए नहीं देखते बल्कि वस्तुगत ढ़ंग से किसी घटना या समस्या के बारे में सूचनाएं हासिल करने के लिए देखते हैं। समाचार की आत्मा है सत्य।

मनोरंजन की पध्दति ( अतिरंजना, यथार्थ और फैंटेसी से पलायन) का जब समाचार में इस्तेमाल किया जाएगा तो इससे अनैतिक कार्यव्यापार में इजाफा होगा। समाचार में नीतिहीनता का प्रवेश होगा। पत्रकारिता की सत्य को उद्धाटित करने की भूमिका खत्म हो जाएगी। अब हम समाचारों में शो मैन की पध्दति का इस्तेमाल कर रहे हैं। जिसमें हिंसा,सेक्स,उत्तोजना और सेलिब्रेटी के ऊपर फोकस रहता है। हमारे समाचार चैनल स्थानीय खबरों के नाम पर हिंसा और अपराध की खबरों के प्रसारण में इस तरह व्यस्त हो गए हैं कि उससे दर्शक को हिंसा अथवा अपराध के बारे कोई शिक्षा नहीं मिलती। वे अपराध और हिसा के कवरेज को लेकर गुणवत्ताापूर्ण कवरेज या रिपोर्टिंग के सभी मानकों को तोड़ रहे हैं। वे दर्शकों को शिक्षित करने की बजाय भड़काने का काम कर रहे हैं। इस संदर्भ में बांग्ला चैनलों के द्वारा सिंगूर के किसान आंदोलन को लेकर भड़काऊ शैली ,पुस्तक मेले को लेकर उन्माद पैदा करने वाली शैली,निठारी कांड को लेकर उन्माद पैदा करने वाली पध्दति का इस्तेमाल अंतत: दर्शकों की गलत शिक्षा कर रहा है। हमारे समाचार चैनलों का सबसे बड़ा स्रोत हैं विज्ञापन। वे उसका आर्थिक और धार्मिक तत्व हैं। धार्मिक चैनलों से लेकर समाचार चैनलों तक सभी में तीन फार्मूलों के आधार पर समाचार प्रचारित किए जा रहे हैं और वह है 1.शोमैनशिप का फार्मूला,2.अंगभंग और 3.त्रुटिपूर्ण प्रस्तुति।

अंग-भंग की खबरों में आतंकवाद,स्वाभाविक अथवा मानवनिर्मित विध्वंस और अपराध खबरें आती हैं। हमारी रात की खबरों में पचास फीसदी से ज्यादा खबरें इन क्षेत्रों की होती हैं।इनमें भी सबसे ज्यादा अपराध,उसके बाद विध्वंस और सबसे कम युध्द की खबर होती हैं। अंग-भंग की खबरें या हिंसाचार की खबरें सबसे ज्यादा बिकती हैं इसके लिए सरल दिमाग की जरुरत होती है।इसमें पुनरावृत्तिा का तत्व प्रमुख होता है। पुनरावृत्ति के जरिए संघर्ष,उडान,खून और क्षेत्र विशेष के तत्व का इस्तेमाल किया जाता है।

त्रुटिपूर्ण फार्मूले के तहत हमारे साथ खबर का लगाव पेश किया जाता है और हमारे साथ उसके जीवंत संबंध को स्थापित करने की कोशिश की जाती है। समाचार वाले ऐसा करते समय हमें कृतार्थ करते हैं। हम इस फ्रेम में पेश की गई खबरों को अथवा त्रुटिपूर्ण अपील वाली खबरों को समाचार के प्रोमोज,एंकर की बतकही या चाट,हल्की खबरों में देख सकते हैं ,और सेलिब्रेटी न्यूज असल में त्रुटिपूर्ण खबर का इंडेक्स तैयार करती है। ऐसी खबरें रात के समाचारों में तकरीबन पैंतीस फीसदी तक होती हैं। हिंसा की खबरें बुध्दिमत्तापूर्ण तरीके से भी पेश की जा सकती हैं ,नागरिक के सामाजिक सरोकारों को निर्मित करने में मददगार साबित हो सकती हैं। अथवा हिंसा की खबरें सिर्फ बिना सोचे समझे पेश कर दी जाती हैं और परोस दी जाती हैं। टीवी चैनलों का मुख्य लक्ष्य है दर्शक का ध्यान खींचना,किंतु अच्छी टीवी पत्रकारिता के लिए जरुरी है कि एक अच्छा वीडियो फुटेज हो, अच्छा विचार हो,आप ज्योंही इसे पेश करेंगे आपका दर्शक भाग जाएगा। इसका अर्थ है विचार और इमेज बोरिंग होते हैं,धीमे होते हैं,वे दर्शक का मनोरंजन नहीं करते। जबकि समाचार चैनलों का लक्ष्य है दर्शक का ध्यान खींचना,इस काम में उन्हें एक अच्छे वीडियो इमेज और अच्छे विचार से मदद नहीं मिलती। वे भावुकता को उभारने वाली इमेजों को पेश करते हैं। उसी को अच्छा टेलीविजन कहते हैं। उनके लिए उस सामग्री के लिए समय नहीं है जो उनके पास नहीं है। वे विश्लेषण के पक्ष में नहीं हैं,जटिलता के पक्ष में नहीं हैं।मनुष्य के दिमाग की गहराईयों में जाने के लिए जिस गंभीरता की जरूरत होती है उसके पक्ष में नहीं हैं। अच्छा टेलीविजन मानवीय बुध्दि की उत्तोजक पुनरावृत्तिा वाली मानसिकता के साथ कदम मिलाकर चलता है। टेलीविजन खबरें जल्दी में होती हैं सारे दिन उन्हें जिस उद्विग्नता के साथ तैयार किया जाता है शाम होते ही उन्हें जल्दी-जल्दी परोस दिया जाता है। वे इतनी जल्दी में होते हैं कि खबरों की पुनरावृत्ति के अलावा वे और कोई काम नहीं करते।

आप चाहे जितने बुध्दिमान और विद्वान रहें वे आपका ध्यान खींचकर रहेंगे। इन बातों को कहने का अर्थ यह नहीं है कि टीवी में काम करने वाले लोग पेशेवर नहीं हैं। अथवा टीवी में कोई भी पत्रकार सही ढ़ंग से काम नहीं करता,बल्कि यह कह सकते हैं कि टीवी में तकनीकी क्षेत्र में काम करने वाले लोग बड़े परिश्रमी होते हैं,यहां तक कि कई प्रतिभाशाली पत्रकार भी टीवी में हैं। इसके बावजूद यह कहना पड़ेगा कि टीवी का पेशेवराना काम पेशेवर पत्रकारिता की कोटि में नहीं आता।यह वीडियो प्रोडक्शन का पेशेवर रुप है। इसमें समाचार की खोज, संकलन और रिपोर्टिंग का महत्व नहीं है बल्कि आप शो कैसा पेश करते हैं उसका महत्व है। टीवी खबरों में कभी-कभार ही ऐसी स्टोरी आती है जो उसने स्वयं खोजी हो। टीवी के लिए स्टोरी खोजने के लिए जिस परिश्रम और धन की जरुरत है वह उसके पास नहीं है अथवा वे खर्च करना नहीं चाहते। यही वजह है कि वे ज्यादातर समाचार पत्रों में छपी खबरों का पीछा करते हैं और जन-संपर्क के फार्मूले का इस्तेमाल करते हैं। यही उनकी स्टोरी की राय का प्राथमिक स्रोत होता है। स्टोरी चयन करते समय भावनाओं को भड़काने वाली स्टोरियों को प्राथमिकता से चुना जाता है। इसमें दर्शक को सूचना देने या उसका नजरिया बनाने का भाव नहीं होता। कभी यह भी होता है कि जो स्टोरी दर्शक की राय बना रही है या उसे सूचनाएं दे रही है उसके साथ ही भावकुतापूर्ण स्टोरी पेश कर दी जाती है।

सच यह है कि गुणवत्ताापूर्ण खबरों के लिए व्यापक संसाधन और ज्यादा प्रयासों की जरुरत होती है। किंतु चैनलों के पास इस सबका अभाव दिखाई देता है। वे अपनी खबरों के मामले में गंभीरता के साथ परिश्रम नहीं करते। संस्थानगत स्मृति से जुड़ी खबरें, वीट्स, अथवा समुदाय विशेष की खबरें न्यूनतम होती हैं। अथवा दुर्लभ होती हैं। वे ज्यादातर मामलों में समाचारपत्रों की खबरों पर ही निर्भर करते हैं। उनके यहां तथ्यों की वैधता को जांचने का कोई ढ़ांचा नहीं है अथवा उसमें कमजोरी रहती है। जैसाकि कहा जाता है कि व्यावसायिक संस्कृति में गंभीरता का दाम नहीं है। वीडियो न्यूज के वातावरण में काम करना पाठ की संस्कृति नहीं है। पाठ की संस्कृति का स्टोरी के क्षेत्र में खोज, चयन और पत्रकारिता के नियम ये तीनों चीजें मिलकर पत्रकारिता का निर्माण करते हैं। जबकि वीडियो समाचार की आदत और संस्कृति किसी भी स्टोरी को भावुकता उभारने वाले प्रोडक्ट के रुप में पेश करती है। इसी आधार पर उसका संपादन करके प्रसारित किया जाता है।

टेलीविजन पत्रकारों की ये सारी कमजोरियां बेकार हैं अथवा अप्रासंगिक हैं। क्योंकि उनका सबसे बड़ा काम तो यही है कि वे शाम को खबर के ऊपर सबका ध्यान खींच लेते हैं। इसी अर्थ में स्थानीय खबरें लाभकारी होती हैं। हमें इस स्थिति को बदलना चाहिए। हमारे नागरिकों के दिमाग को रोज सीधे,सरलतम चीजों का आदी बनाया जा रहा है। आज सूचना-सम्पन्ना नागरिक को महज उपभोक्ता में तब्दील कर दिया गया है। उसे शिरकत करने के लिए उद्बुध्द करने की बजाय दर्शक बने रहने और बैठे-बैठे मनोरंजन करने का आदी बना दिया गया है। हमें इस स्थिति को तोड़ना चाहिए। हमें सूचना सम्पन्ना नागरिक की जरुरत है, व्यापक सामाजिक हित के सवालों और समस्याओं पर शिक्षित करने वाले मीडिया की जरुरत है। उसी से अच्छा टेलीविजन बनेगा। हमें टीवी को विचारों की प्रतिस्पर्धा, ठोस सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक खबरों का मीडियम बनाना चाहिए, अभी यह भावुक प्रतिस्पर्धा का माध्यम है।

इसी संदर्भ में ज़ीन-लुक-गोदार्द ने कहा था कि '' टीवी विस्मृति के लिए बना है।'' यह तेज और जल्दी ही अपदस्थ कर देने वाला या भुला देने वाला माध्यम है। जबकि साहित्य ऐसा नहीं है। बच्चों के संदर्भ में टीवी हिंसा का सवाल केन्द्रीय सवाल है, टीवी हिंसा का बच्चों पर गहरा असर होता है। टीवी के संदर्भ में अंतर्वस्तु का प्रश्न बड़ा सवाल नहीं है ,बल्कि बच्चों का टीवी देखना और उसकी आदतें सबसे बड़ी समस्या है। बच्चे जब टीवी देखते हैं और उसके आदी बन जाते हैं तो इससे बच्चे की स्वाभाविक ढ़ंग से देखने की दृष्टि बाधित होती है। बच्चे की स्वाभाविक और अनिर्देशित ढ़ंग से खोज करने की मनोदशा पलट जाती है। एक तरुण का यह स्वाभाविक धर्म है कि वह रोज वास्तव जगत के संपर्क में आए,उसका स्पर्श करे, आस्वाद ले,वास्तव जगत को पकड़े या स्पर्श करे, उसकी गंध ले,उसे मेनीपुलेट करे,और यह सब वह अपने द्वारा निर्धारित क्रम के जरिए करे, इस तरह जब बच्चा सक्रिय होता है,खोज करता है तो अपनी बुध्दि का विकास करता है, किंतु ज्योंही वह वीडियो निर्मित जगत के संपर्क में आता है वह इन सब चीजों से वंचित हो जाता है।

टीवी जिस तरह बच्चों की गतिविधियों को अपदस्थ करता है वैसे ही वयस्कों की गतिविधियों को भी अपदस्थ करता है। इसका सीधा परिणाम अपराध रोकने में दिखाई देता है। आज हमारे देश में सबसे ज्यादा टीवी देखा जा रहा है ध्यान रहे टीवी का देखना नागरिक की शिरकत को अपदस्थ करता है। इसका व्यापक संदर्भ सामुदायिक संबंधों और तानेबाने से जुड़ा है।समाज व्यवस्था से जुड़ा है। हम इस सबके लिए क्या कर रहे हैं ? यह सच है कि सब कुछ परिवर्तनीय है। साक्षर और सक्रिय आदमी हमेशा अच्छी चीज की ओर आकर्षित होता है। हमें उसको मद्देनजर रखते हुए योजनाएं बनानी चाहिए। हम टीवी देखने पर अपना जितना कीमती समय खर्च करते हैं उतना समय यदि समाज,घर और परिवार के बीच में खर्च करें तो हम नागरिक के दायित्वों का ज्यादा जिम्मेदारी के साथ निर्वाह कर सकते हैं।

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