शुक्रवार, 21 मई 2010

आदर्श 'किसान सैनिक'

माओ के जमाने में 'किसान सैनिक' आदर्श हुआ करता था। माओ का उस जमाने में कहना था कि सीखना है तो कामरेड ली फेंग से सीखो। वही 'किसान सैनिक' का आदर्श था। इसी 'किसान सैनिक' को आधार बनाकर चीनी नैतिकता का सारा तामझाम खड़ा किया गया। वही शिक्षा से लेकर राजनीति तक सभी क्षेत्रों में नैतिकता को परिभाषित करने वाला प्रधान तत्व था। अचानक माओ के बाद इसी 'किसान सैनिक' का रूपान्तरण नयी बाजार अर्थव्यवस्था की संरचनाओं के अनुरूप किया जा रहा है जिससे यह मध्यवर्ग को अपील कर सके। माओ ने ली फेंग को मुक्ति दी थी, ली फेंग पीपुल्स लिबरेशन आर्मी का सैनिक था। उसे कोई नहीं जानता था। किंतु अचानक सन् 1962 में उसकी एक ट्रैफिक दुर्घटना में मौत हो गयी। यह चीन में लम्बी छलांग का दौर था। उसके प्रेरक प्रतीक के रूप में ली फेंग को प्रचारित किया गया।ली फेंग इस बात का प्रतीक था कि वह कभी आराम नहीं करता था। क्रांतिकारी भावों से भरा था। वह चीन जनमुक्तिसेना,कम्युनिस्ट पार्टी और माओ के प्रति वफादार था।
ली फेंग के मरने के बाद उसकी एक डायरी भी मिली जिसके बारे में कहा जाता है कि वह नकली है। इसी ली फेंग को आदर्श सैनिक और आदर्श चीनी नागरिक के रूप में प्रतिष्ठित किया गया। लंबे समय तक ली फेंग को चीन ने अपने प्रौपेगैण्डा मॉडल के प्रतीक रूप में इस्तेमाल किया। ली फेंग का गुण था कठिन परिश्रम, कभी सवाल न पूछने वाला किसान,यही चीनी प्रशासन की आधारशिला भी यही विचार था। फेंग की इमेज के साथ सैनिक की पोशाक का भी महिमामंडन हुआ।
ली अच्छे काम करने वालों का प्रतीक था,इसकी बीजिंग के शासकों के प्रति वफादारी थी। उस पर अनेक गाने लिखे गए, किताबें लिखी गयी, फिल्में बनीं। ली फेंग को खासकर चीनी बच्चों के सामने आदर्श मॉडल के रूप में पेश किया जाता था। अब ली फेंग का पूरी तरह रूपान्तरण हो चुका है। इस प्रसंग में एक नयी किताब आयी है '' ली फेंग 1940-1962', इस किताब में बताया गया है कि नया ली फेंग ज्यादा नरमदिल इंसान है। ली फेंग पहले की तुलना में ज्यादा सहिष्णु और आज्ञाकारी है।
किताब में बताया गया है कि ली हमेशा कपड़े नहीं पहनता था, जैसाकि उसकी सेना की पोशाक में हमेशा दिखाया गया। बल्कि बताया जा रहा है कि ली लेदर जैकेट और शानदार घड़ी पहनता था। (ये सारी चीजें 50 और 60 के दशक में लग्जरी में गिनी जाती थीं ) ,किताब में यह भी कहा गया है कि ली फेंग की गर्ल फ्रेंड भी थी। ली की ट्रक ड्राईविग की तुलना बीएमडब्ल्यू कार ड्राईविंग के साथ की गई है। अभी हाल ही में एक फोटो नजर आया है जिसमें ली फेंग बीजिंग के तेएनमैन स्क्वायर में मोटर साईकिल चलाता दिखता है। चूंकि मौजूदा दौर फैशन के लिहाज से ज्यादा महत्वपूर्ण है और इसमें रिबेलियस या बागी तेवरों का व्यापक प्रचार किया जा रहा है। अत: ली फेंग को भी रिबेल के रूप में पेश किया जा रहा है। रिबेल या बागी होने के कारण उसके हेयरस्टाइल फैशनेबुल हो गए हैं। उल्लेखनीय है ली फेंग जब सेना में था उस समय फैशनेबुल बाल रखने पर पाबंदी थी। इस किताब के संपादक का कहना है कि दुख की बात है कि आज के युवा ली फेंग को नहीं जानते। वे नहीं जानते कि ली फेंग कैसे चीन का प्रतीक बन गया था। आज के युवा ली फेंग को जानें इसके लिए उसके बारे में अनेक फोटोग्राफ भी किताब में दिए गए हैं जिनमें बताया गया है कि ली फेंग साधारण किसान परिवार से आया था। उसने सेना में ड्राइवर की नौकरी ली। ली फेंग की नयी निर्मित इमेज को चीन प्रशासन ने बगैर किसी स्पष्टीकरण के जारी किया है।
चीन प्रशासन का मानना है कि ली फेंग के नए रूप के जरिए मध्यवर्ग के दिलों पर राज किया जा सकता है। ली फेंग की पहले जो इमेज माओ के जमाने में प्रौपेगैण्डा के लिए इस्तेमाल की गयी थी और आज जिस नयी इमेज का प्रचार किया जा रहा है ये दोनों ही नकली इमेज हैं, निर्मित इमेज हैं। इनका यथार्थ से कोई लेना-देना नहीं है।
प्रौपेगैण्डा के क्रम में ऑन लाइन कम्प्यूटर गेम के रूप में '' लर्न फ्रॉम ली फेंग'' नामक कम्प्यूटर गेम जारी किया गया है। इसे नस्दाक ने तैयार किया है। यह एक चीनी साफटवेयर कंपनी है। इस गेम के जरिए बच्चों में राष्ट्रभक्ति,आज्ञाकारिता पैदा करने की कोशिश की जा रही है। उल्लेखनीय है कि ऑनलाइन गेम कम्युनिटी में डेढ़ करोड़ युवा शामिल हैं।
उल्लेखनीय है कि यह गेम चीनी बच्चों को ज्यादा अपील नहीं कर पा रहा है। इसका प्रधान कारण है कि चीनी युवावर्ग में प्रतिक्रियावादी राष्ट्रवाद की अपील सबसे ज्यादा है जब कभी मौका मिलता है तो यह प्रतिक्रियावादी राष्ट्रवाद सड़कों पर निकल आता है। कभी जापान के खिलाफ, कभी फ्रांस के खिलाफ हिंसक प्रदर्शनों में तब्दील हो जाता है। चीनी युवा प्रतिक्रियावादी राष्ट्रवाद के कारण चीनी युवा हमेशा गुस्से से भरे होते हैं वैसे ही जिस तरह विश्वहिन्दू परिषद या संघ परिवार के संगठनों में साम्प्रदायिक राष्ट्रवाद कूट-कूटकर भरा है। प्रतिक्रियावादी राष्ट्रवाद चीनी युवाओं में भरा पड़ा है और मौका पाते ही अपने नस्लवादी चरित्र को व्यक्त कर बैठता है। असल में चीन का समूचा माहौल बौध्दिक अज्ञानता और पिछड़ेपन सेभरा हुआ है जिसके कारण प्रतिक्रियावादी राष्ट्रवाद अभी भी फलफूल रहा है।

रविवार, 16 मई 2010

भारतीय रेडियो तरंगों के लुटेरे और गुलाम बुद्धिजीवी-नेता

       हिन्दी ब्लॉगरों और बेव लेखकों ने पिछले दिनों कमाल का काम किया थ्री जी स्पेक्ट्रम के बारे में चल रहे घोटाले पर जमकर लिखा। केन्द्रीय संचारमंत्री और उसके साथ जुड़े घोटालों का पर्दाफाश किया।
      सबसे पहले थ्री जी स्पेक्ट्रम का पर्दाफाश टीवी चैनल ‘आजतक’ और ‘हेडलाइन टुडे’ ने किया। कैसे भारत में संचार मंत्रालय रेडियो तरंगों की लूट का केन्द्र बना है और कैसे मंत्री की नियुक्ति से लेकर रेडियो तरंगों की निजी क्षेत्र के हाथों बिक्री तक समूचे मामले में पारदर्शिता का अभाव है, नियम तोड़े जा रहे हैं, कम दामों पर भारतीय कंपनियां तरंगों की खरीद करके विदेशी कंपनियों को कई गुना ज्यादा दामों पर बेच रही हैं इत्यादि पहलुओं का अनेक ब्लॉगरों और बेव पत्रिकाओं में उदघाटन भी हुआ है।  
    टीवी चैनलों का दावा है कि तरंगों की बिक्री के मामले में 60 हजार करोड़ रुपये का घोटाला हुआ है। इस घोटाले में दो मीडिया सैलीबरेटी बरखा दत्त और वीर सिंघवी के नाम भी आए हैं। इन दोनों की वर्तमान संचारमंत्री को वांछित मंत्री पद दिलाने में भूमिका रही है। यह मसला संसद में भी उठा है,विपक्षी दलों ने काफी हंगामा किया है और भारत के इतिहास का इसे सबसे बड़ा घोटाला कहा है।
    इस प्रसंग में हमारे सारे एक्सपोजर लेखक कहीं न कहीं यह मानकर चल रहे हैं कि थ्री जी स्पेक्ट्रम की बिक्री के मामले सीधे संचारमंत्री दोषी है और लॉबिंग करने वाले अपराधी हैं। सारे मसले को जिस तरह पेश किया गया है उससे मूल सवाल और मूल अपराधी ही गायब हो गया है।
    मूल सवाल आवंटन में ईमानदारी का नहीं है। रेडियो तरंग राष्ट्रीय संपत्ति है और अंतर्राष्ट्रीय समझौते के तहत इनका राष्ट्र को ही आवंटन होता है। रेडियो तरंग अमूल्य है और इसका निजी क्षेत्र में व्यापार नहीं किया जा सकता।
     कांग्रेस पार्टी ने बड़ी चालाकी से अमेरिकन पूंजीपतियों के मार्ग का अनुसरण करते हुए रेडियो तरंगों को निजी क्षेत्र के हाथों बेचने का सिलसिला आरंभ किया और दूरसंचार और मीडिया के क्षेत्र में इसे गैट समझौते के तहत निजी क्षेत्र को बेचने और धन कमाने का फैसला लिया।
      रेडियो तरंगे बेचना राष्ट्रद्रोह है और इसे किसी भी तर्क से स्वीकार नहीं किया जा सकता। रेडियो तरंगों को जब निजी क्षेत्र के हाथों बेचा जा रहा था उस समय तरंगों के स्वामित्व के सवाल पर किसी भी राजनीतिक दल ने आवाज नहीं उठायी, सभी दल नव्यउदारवाद पर बहस कर रहे थे। मीडिया में भी रेडियो तरंगों के स्वामित्व पर कभी बहस नहीं हुई। रेडियो तरंगों के स्वामित्व का प्रश्न कभी संसद में भी नहीं उठा। यह हमारी गुलाम मनोदशा का संकेत है।
     यूनेस्को में एक जमाने में भारत सरकार की यह नीति रही है कि रेडियो तरगों को निजी क्षेत्र को नहीं सौंपा जा सकता। सारी दुनिया के अधिकांश देश इस पर एकमत थे लेकिन अमेरिकी बहुराष्ट्रीय संचार कंपनियां चाहती थीं कि रेडियो तरंगों को निजी क्षेत्र के हवाले कर दिया जाए। इसके लिए अंत में उन्होंने विश्व व्यापार संगठन और गैट वार्ताओं के चोर दरवाजे का इस्तेमाल किया और सारी दुनिया की रेडियो तरंगों को निजी क्षेत्र के हाथों सौंपने का रास्ता खोज निकाला।  रेडियो तरंगों की चोरी के लिए भाषा और मुहावरे को बदला गया।
     दूरसंचार और मीडिया को विदेशी निजी पूंजी निवेश के लिए खोल देने की वकालत की गयी। मुक्त व्यापार के नाम पर रेडियो तरंगों पर राष्ट्र के स्वामित्व को खत्म किया गया। जिस समय यह सब चल रहा था हमारे अक्लमंद बुद्धिजीवी रेडियो तरंगों के स्वामित्व के सवाल पर नहीं नीम और हल्दी के पेटेंट के सवालों में उलझे हुए थे। यह हमारे बुद्धिजीवियों की गुलामी और बहुराष्ट्रीय कंपनियों की भक्ति का आदर्श उदाहरण है। हमें सवाल करना चाहिए के गैट वार्ताओं पर हजारों लेख लिखने वालों ने रेडियो तरंगों के सवाल पर एक भी लेख क्यों नहीं लिखा,जो लोग नीम,हल्दी,चावल के पेटेंट पर हंगामा कर रहे थे वे रेडियो तरंगों के सवाल पर चुप क्यों थे आज भी वे चुप क्यों हैं ?
    गैट और विश्व व्यापार संगठन की वार्ताओं में रेडियो तरंगों के सवाल पर क्या हो रहा है इसे केन्द्र सरकार ने छिपाया। राजनीतिक दल रेडियो तरंगों के स्वामित्व के सवाल पर चुप थे। किसी भी राजनीतिक दल ने रेडियो तरंगों के निजीकरण का सीधे विरोध नहीं किया। संसद में रेडियो तरंगों के सवाल पर कभी बहस ही नहीं हुई।
      गैट वार्ताओं के नाम पर जो समझौता हुआ उसके जरिए चालाकी से रेडियो तरंगों की लूट का रास्ता खुल गया। इसके लिए बहुत सुंदर नाम दिया दूरसंचार और मीडिया में विनिवेश। दूरसंचार से लेकर मीडिया तक जो लोग विनिवेश कर रहे हैं वे बुनियादी तौर पर रेडियो तरंगों की लूट कर रहे हैं।
     रेडियो तरंगों की लूट अक्षम्य अपराध है। इन तरंगों को बेचना भी अपराध है। लेकिन गैट वार्ताओं के जरिए पिछले दरवाजे से रेडियो तरंगों की लूट का मार्ग निकाल लिया गया। इस लूट का सबसे ज्यादा लाभ निजी क्षेत्र की संचार कंपनियों और बहुराष्ट्रीय संचार और मीडिया कंपनियों को हुआ है। वे रातों-रात अरबों-खरबों का मुनाफा कमाने लगीं हैं और भारत सरकार का दूरसंचार विभाग गरीब होता चला गया। हमें बताया गया यह संचार क्रांति है,ज्ञानसमाज और सूचना समाज की ओर प्रयाण है। एक तरफ रेडियो तरंगे बेची जा रही थीं इससे राष्ट्र कंगाल बन रहा था दूसरी ओर ज्ञान ही शक्ति है,मीडिया ही शक्ति है का नारा देकर दिग्भ्रमित किया जा रहा था। 
       रेडियो तरंगे दुनिया की सबसे मूल्यवान संपदा है। बहुराष्ट्रीय संचार कंपनियां रेडियो तरंगों की लूट के जरिए राजनीति को पूरी तरह नियंत्रित रखती हैं। संचारमंत्री के टेप की बातचीत का मीडिया में आना इस बात का संकेत तो है ही कि तरंगों के आवंटन में घोटाला हो रहा है उससे भी बडी बात यह है कि इस घोटाले की टेप को टीवी चैनल के जरिए प्रसारित कराकर दूरसंचार कंपनियां केन्द्र सरकार पर दबाब बनाना चाहती हैं,वे तरंगों के मामले में ब्लैकमेल कर रही हैं। सरकार और राजनीतिक दलों को अपने इशारों पर नाचने के लिए मजबूर कर रही हैं।
     यह हम सब जानते हैं कि कांग्रेस-भाजपा दोनों ही पार्टियां दूरसंचार क्षेत्र के निजीकरण और इस क्षेत्र में निजी पूंजी निवेश के पक्ष में रहीं हैं। सिर्फ वामदलों ने दूरसंचार में निजी पूंजी के प्रवेश का विरोध किया था।रेडियो तरंगों के स्वामित्व पर वे भी चुप थे। बाकी दलों ने विनिवेश का समर्थन किया था। मूल बात यह कि जब आप एकबार दूरसंचार में निजी क्षेत्र के प्रवेश पर एकमत हैं तो आपको रेडियो तरंगों को निजी कंपनियों को बेचना होगा। रेडियो तरंगों का बेचना अपराध है राष्ट्रद्रोह है।    
     जब से दूरसंचार कंपनियों को रेडियो तरंगें बेची जा रही हैं तब से दूरसंचार कंपनियां ,केन्द्र सरकार और दलों की नीति निर्धारक बन गयी हैं और स्थायी तौर पर विभिन्न राजनीतिक दलों को धन मुहैय्या कराने का काम कर रही हैं। दूरसंचार कंपनियों को रेडियो तरंगें किसी भी कीमत पर नहीं मिलनी चाहिए ये तरंगें संपदा उत्पादन का समुद्र हैं। इसे किसी भी कीमत पर रोका जाना चाहिए।     
            





शनिवार, 15 मई 2010

बलिहारी माओवाद की



         सच मानिए मैं माओवादियों की हिंसा को लेकर जितना नाराज था आज वैसे नाराज नहीं हूँ। माओवाद के लिए अनेक लोग तरह-तरह की बातें करते हैं, निंदा करते हैं ,लेकिन आज मैं माओवादियों पर खुश हूँ और उनके पौरूष पर बलिहारी हूँ कि उनकी वजह से सैंकड़ों-हजारों घरों में कम से कम चूल्हे तो जल रहे हैं।
     मंत्री से लेकर कॉस्टेबिल तक ,गांव के गरीब से लेकर हथियार सप्लाई देने वालों तक सभी को उनके कारण धंधा मिला है। सबको माओवादियों के नाम पर खाने कमाने का मौका मिला है। कल तक बुर्जुआ राज्य का पैसा वे हराम मानते थे। अब उनके पास बुर्जुआ पंचायतों के कई हजार करोड़ रुपये विकास के नाम पर पहुँच रहे हैं। अकेले झारखण्ड में दो हजार करोड़ रुपये सीधे माओवादियों के क्रांतिकारी कोष में पहुँच रहे हैं। इससे यह भी सीखने को मिला है कि बुर्जुआ कोष और माओवादी क्रांतिकारी तिजोरी में ज्यादा दूरी नहीं होती है।   
       माओवाद का सबसे बड़ा लाभ तो विकास उद्योग को हुआ है। विकास उद्योग से जुड़ा समूचा पूंजीवादी खेमा सीआईआई के बैनर तले उन इलाकों की ओर जाने वाला है जहां पर माओवादी सक्रिय हैं।
     यानी सुदूर आदिवासी अंचलों में भारत के कारपोरेट घराने स्कूल बगैरह खोलने जा रहे हैं। विकास का धंधा करने जा रहे हैं।  केन्द्र सरकार ने भी माओवाद प्रभावित इलाकों में विकासकार्यों पर खर्चा करने लिए अरबों-खरबों की योजनाएं बनायी है। ये माओवादी न होते तो ये योजनाएं और बड़े पूंजीपति आदिवासियों के विकास की बातें ही नहीं करते और परवर्ती पूंजीवादी विकास उद्योग माओवाद प्रभावित अंचलों की ओर जाने के बारे में सोचता तक नहीं।  
       मनमोहन सरकार को नींद से जगाने और सुरक्षा उपकरणों की खरीद पर व्यापक ध्यान देने की जरुरत ही तब महसूस हुई जब माओवाद ने 136 जिलों में पैर फैला लिए। इससे सुरक्षाबलों को नए और अत्याधुनिक हथियार मिले हैं। माओवादी न आए होते तो अत्याधुनिक हथियारों की जरुरत भी महसूस नहीं होती। इस चक्कर में हजारों युवाओं को आतंक विरोधी दस्तों में कम से कम नौकरी तो मिली, ये नौजवान शिक्षक तो नहीं बन पाए लेकिन पुलिसवाले तो बन गए।
    माओवाद प्रभावित इलाकों में स्कूल,कॉलेज, चिकित्सा आदि की सामान्य व्यवस्था से शांति बनाए रख सकते थे, वहां 50 हजार अर्द्धसैन्यबलों को धंधे पर लगा दिया गया है। यदि इतने ही शिक्षक,डाक्टर,सरकारी कर्मचारियों को माओवाद प्रभावित इलाकों में विकास कार्यों पर नौकरी पर लगा दिया गया होता तो माओवाद का विस्तार ही नहीं होता।
      मैं माओवादियों से इस कारण बेहद खुश हूँ कि उन्होंने सभी किस्म की नैतिकता को नष्ट करके हिंसा को वैध ,‘क्रांतिकारी’ और ‘पवित्र’ बनाया है। हिंसा के मामले में माओवादी अपराधी गिरोहों के दादागुरु हैं। इलाका दखल में दाऊद इब्राहीम के बड़े भाई हैं। 136 जिलों में समानान्तर व्यवस्था स्थापित करके उन्होंने समानान्तर अर्थव्यवस्था चलाने वालों को अचम्भित कर दिया है।
    वे इस मायने में उत्तम हैं कि उन्होंने दलाली और जबरिया धन वसूली को क्रांतिकारी कार्यक्रम का हिस्सा बनाया है। माओवादियों की चौथ वसूली ने माफिया और अपराधी गिरोहों को ‘क्रांतिकारी’ बनने का मार्ग दिखाया है।
     बुर्जुआजी के नकली आंसुओं को देख देखकर हम बोर हो गए थे। माओवादी हिंसाचार ने अब नकली आंसू तो बंद करा ही दिए साथ ही अब माओवादियों से पीडि़त किसी भी व्यक्ति के असली आंसू भी नजर नहीं आते।
    पहले माओवादियों की कोई भी मीडिया सामान्य प्रेस रिलीज तक नहीं छापता था ,अब खोज खोजकर माओवादियों की खबरें छापते हैं। माओवादी नेताओं के टीवी से लाइव साक्षात्कार दिखाए जा रहे हैं। यह मीडिया का माओ प्रेम उत्तम है।
     मैं खुश हूँ कि माओवादी क्रांतिकारियों और कारपोरेट मीडिया में भाईचारा बढ़ा है। कारपोरेट मीडिया के लिए माओवाद अस्पृश्य नहीं रह गया है। माओवादियों के लिए भी कारपोरेट मीडिया अस्पृश्य नहीं है। धन्य है कारपोरेट मीडिया और माओवाद का भाईचारा।
     पहले पूंजीपति से पैसा लेना और प्रतिष्ठानी मीडिया में छपना माओवादी बुरा मानते थे।  कारपोरेट मीडिया में छपने वाले की निंदा करते थे । बड़ी पूंजी को हिकारत की नजर से देखते थे आज किंतु ऐसा नहीं है पूंजीपतियों से नियमित चौथ वसूली माओवादी क्रांतिकारियों की आदर्श गतिविधि है।
    पुलिस ऑपरेशन से पहले अकेले लालगढ़ में प्रतिमाह 90 लाख की चौथ वसूली माओवादी करते थे। झारखण्ड की खानों से प्रति खान 15-25 प्रतिशत की क्रांतिकारी चौथ वसूली के दस्तावेज मधुकोड़ा के यहां छापों में मिले हैं।
    माओवादियों के पास पहले धन का अभाव था आज इतना पैसा है कि खर्च नहीं कर पा रहे हैं। आज माओवादियों की मंथली पगार पर क्रांतिकारी सैनिकों से लेकर बुद्धिजीवियों की पूरी फौज काम कर रही है। मैं खुश हूँ कि कम से कम पूँजी की गुलामी को माओवादियों ने अपने क्रांतिकारी क्रार्यक्रम का हिस्सा तो बनाया। 
      माओवादी पहले पूंजीवादी उपकरणों का विरोध करते थे लेकिन अब अत्याधुनिक बुर्जुआ संचार उपकरणों से लेकर मशीनगन तक का इस्तेमाल करने में उन्हें परेशानी नहीं होती।
     पहले वे पेटी-बुर्जुआ और बुर्जुआ लेखकों से परहेज करते थे लेकिन इन दिनों उन्हें अरुंधती राय से लेकर मेधा पाटकर तक सभी बुर्जुआ पैसे से जीने वाले लेखकों ,स्वयसेवकों और बुद्धिजीवियों में क्रांतिकारी संभावनाएं नजर आ रही हैं। वे उन्हें पहले डि-क्लास करने की सोचते थे अब स्वयं माओवादियों ने अपना स्तर क्रांतिकारी से बुर्जुआ की ओर मोड़ दिया है।
     यह अच्छी बात है कि माओवादियों से प्रभावित बुद्धिजीवियों,लेखकों और मीडियाकर्मियों के द्वारा बुर्जुआ संस्थानों में काम करना और माओवाद का जप करना पुण्य का काम समझा जाता है। बुर्जुआ के वेश में माओवादी प्रतिबद्ध बुद्धिजीवी वैसे ही सुंदर लगते है जैसे बूरे की मिठाई पर पिस्ता लपेट दिया गया हो।
    माओवाद का मानना है कि क्रांति का लक्ष्य है सत्ता पर कब्जा जमाना। लेकिन ये बंदे सत्ता की ओर नहीं आदिवासी जंगलों की ओर भाग रहे हैं। माओवाद का ऐसा सटीक पाठ पढ़ाने के लिए हम माओवादियों के कृतज्ञ हैं ,काश माओ यहां आकर देख पाते।
                          

















आत्मघाती है इंटरनेट सेंसरशिप

      चीन के जो लोग गुण गाते रहते हैं उन्हें देखना चाहिए कि चीन में मानवाधिकारों की दशा क्या है ?  अल्पसंख्यकों और आम नागरिकों के प्रति चीन प्रशासन का रुख क्या है ?
     खबर आयी है कि चीन के सिनजियांग क्षेत्र में 10 महिने बाद इंटरनेट सेवाएं बहाल कर दी गयी हैं। उल्लेखनीय है कि 10 महिना पहले इस इलाके के अल्पसंख्यकों के खिलाफ व्यापक हिंसाचार हुआ था और उसके बाद इंटरनेट सेवाएं बंद कर दी गयीं। इस क्षेत्र में 10 महिनों से मोबाइल सेवाएं बंद थीं। एसएमएस भेजना बंद था। टेक्स्ट संदेश भेजने पर पाबंदी थी। राज्य प्रशासन ने उपग्रहसंचालित समस्त संचार नेटवर्क को बंद कर दिया था। स्मरणीय है गुजरात और मुंबई के दंगों के समय नेट सेवाएं अथवा किसी भी किस्म का उपग्रह संचार इतने लंबे समय तक कभी बंद नहीं किया गया।
     उल्लेखनीय है चीन की आबादी में 10 में से 6 लोग इस क्षेत्र में रहते हैं। इस इलाके में तुर्की से आयी उइघूर मुस्लिम जाति की आबादी ज्यादा है। लेकिन इस इलाके के समस्त कारोबार और रिहायशी इलाकों में हेन जाति के लोगों को कम्युनिस्ट प्रशासन ने अन्य प्रान्तों से लाकर जबर्दस्ती बसाया है फलतः उइघूर जाति के लोगों को व्यापक स्तर पर उपेक्षा का सामना करना पड़ रहा है।
    सन् 2009 के जुलाई माह में ये लोग हेन जाति का वर्चस्व थोपे जाने का विरोध कर रहे थे और मांग कर रहे थे कि उनके साथ भेदभाव खत्म हो,उस समय उनके प्रदर्शन पर पुलिसबलों का हमला हुआ और 200 लोग मारे गए। सैंकड़ों लोग घायल हुए और इसके बाद इंटरनेट सेवाएं बंद कर दी गयीं।
      प्रशासन के द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया है -
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To all netizen friends throughout Xinjiang:

Greetings!

With direct concern from the Party Central Committee and after careful research by the Autonomous Regional Party Committee, it was decided to fully restore Internet service in our region on May 14th.

Since July, as our region began control over Internet communications and implementation of a gradual re-opening, Internet users far and wide have given their complete understanding and immense support, actively contributing to the protection of our region’s social stability and creating favorable conditions for implementing the reinstatement of the Internet throughout the region. For this, we express our heartfelt gratitude to all our netizen friends.

The Internet has become a vital component of the life of modern society. It is the gateway through which the Party committee and the government communicate to the vast multitudes as well as a channel for hearing public opinion and the collective wisdom of the people. Through their active comments and suggestions, netizens have expressed their love of Xinjiang and their boundless enthusiasm for building a better Xinjiang. They have shown to the world that people of every ethnicity in Xinjiang are simple, forgiving, sincere, and optimistic at heart.

The construction of a healthy, wholesome Internet community not only touches open economic and social development, but also concerns the personal interests of Internet users. We must value today’s hard-earned stability, value the completely open environment of the Internet, and use the Internet for the expression of good and in service of what is good.

It is the intense desire of peoples throughout all of Xinjiang to quicken the pace of economic and social development in Xinjiang. Soon, the Central Committee will open the Xinjiang Work Conference, which aims to formulate a strategy for advancing developmental breakthroughs and long-lasting peace in Xinjiang, and so Xinjiang has a historical and an important opportunity for considerable growth, opening, and development. In order to tightly grasp this opportunity, bring maximum benefit to the lives of peoples of all ethnicities, and continue the promotion of social harmony stability, the cooperation of netizens throughout the region, including cadres and peoples of all ethnicities, is necessary.

Xinjiang will appear before the world with an attitude of even greater confidence and openness. There can be no open Xinjiang without an open Internet, which is something we must create, hand in hand, for an even brighter future for the region. We hope that netizens will continue, as before, to be vigilant, to support the development and growth of Xinjiang, and, using the Internet as a platform, continue to offer poignant criticisms and excellent policy ideas for development and stability in Xinjiang; together building and even more prosperous and thriving Xinjiang. Xinjiang looks forward to a brighter tomorrow.

Wishing netizens blessings, happiness, and health,
 Autonomous Regional Party Committee Ministry of Propaganda
14 May 2010    
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    उल्लेखनीय है इंटरनेट सेवाएं बहाल करने के पहले कम्युनिस्ट पार्टी को इस क्षेत्र के पार्टी सचिव वेंग ली क्वान को उनके पद से हटाना पड़ा। पार्टी सचिव के रहते हुए इंटरनेट सेवाएं बहाल करना संभव नहीं था क्योंकि ये जनाब घनघोर मुस्लिम विरोधी हैं।
      इस क्षेत्र में सेंसरशिप लगाने से चीन का ही नुकसान हुआ है। इस इलाके के जिन लोगों को इंटरनेट का इस्तेमाल करना होता था उन्हें पश्चिमी चीन के गंगजू इलाके में जाकर नेट सेवाओं का इस्तेमाल करना होता था। इस दौरान अनेक कम्युनिस्ट विरोधी नेट कार्यकर्ताओं को जेल में ड़ाल दिया गया और नेट के कानूनों में भी एक फरवरी 2010 से परिवर्तन किया गया है। जिस क्षेत्र में इंटरनेट सेंसरशिप लगायी गयी वहां पर दो करोड़ की आबादी रहती है।
    विश्व के इतिहास में इतनी बड़ी आबादी पर नेट सेंसरशिप किसी भी देश ने अभी तक लागू नहीं की गयी थी। जब सारा समाज नेट पर निर्भर हो गया हो ऐसे में नेट पर पाबंदी सारी जनता को अपार कष्ट देने के बराबर है। यह चीन का औद्योगिक उत्पादन में बड़ा सम्पन्न इलाका है।
     यह विलक्षण बात है कि नव्यउदार मुक्त सूचनाप्रवाह का चीन को सबसे ज्यादा लाभ मिला और चीन में ही इंटरनेट सेवाओ पर सबसे बड़ी सेंसरशिप भी लगी। इंटरनेट सेंसरशिप चीन का आत्मघाती कदम था आशा है भविष्य में नेट सेंसरशिप से चीन के कम्युनिस्ट बाज आएंगे।  















चीन और पश्चिम बंगाल में भाषायी अंधलोकवाद

( कॉमरेड वेंग लीक्वान) 
      चीन की कम्युनिस्ट पार्टी ने अंततः पश्चिमी सिनजियांग क्षेत्र के पार्टी सचिव वेंग लिक्वान को सचिव पद से हटा दिया है और उनकी पदावनति कर दी गयी है। उल्लेखनीय है जुलाई 2009 में सिनजियांग उईघूर क्षेत्र में भयानक दंगे हुए थे जिनमें चीनी मुसलमानों की बड़े पैमाने पर संपत्ति नष्ट हुई थी और 200 से ज्यादा निर्दोष नागरिक मारे गए थे। सचिव साहब दंगे और मुसलमानों के खिलाफ हमले रोकने में पूरी तरह असफल रहे। चीन की कम्युनिस्ट पार्टी ने इस क्षेत्र के सचिव को हटाकर दंगे रोकने में पार्टी की असफलता को एकतरह से मान लिया है। वेंग की जगह झांग चुन सियान को इस क्षेत्र का पार्टी सचिव बनाया गया है। यह खबर चीन की सरकारी समाचार एजेंसी सिंहुआ ने आज दी है।  
   उल्लेखनीय है वेंग लीक्वान 1994 - 2010 तक इस क्षेत्र में पार्टी सचिव और केन्द्रीय समिति के सदस्य रहे हैं। सन् 1966 से पार्टी सदस्य हैं। ये जनाब अल्पसंख्यकों के प्रति कड़े रवैय्ये के लिए जाने जाते हैं। इनका स्थानीय संस्कृति और भाषा के प्रति पूर्वाग्रह रहा है। वेंग ने अल्पसंख्यकों के इलाके में उनकी  उईघूर भाषा के बदले मेनडेरियन भाषा को प्राइमरी स्कूलों में लागू किया और अल्पसंख्यकों की भाषा को सरकारी ऑफिसों और स्कूलों में प्रतिबंधित कर दिया।
     अल्पसंख्यकों के प्रति इस तरह के सख्त रुख के कारण जिस तरह भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी को लौहपुरुष कहा जाता है उसी तरह वेंग को भी लौहपुरुष कहा जाता है।
     पश्चिम बंगाल में भी अल्पसंख्यकों की भाषा हिन्दी के प्रति माकपा के नेताओं का एक वर्ग भेदभावपूर्ण बर्ताव करता रहा है। हिन्दी की अल्पसंख्यकों की भाषा के रुप में संवैधानिक तौर पर जो व्यवस्था होनी चाहिए वह 34 साल के वाम शासन में नहीं हो पायी है।
      पश्चिम बंगाल सरकार के तहत चलने वाली पश्चिम बंग हिन्दी अकादमी का 8 साल से गठन नहीं हुआ है। 15 सालों से लेखकों को पुरस्कार नहीं दिए गए हैं। 6-7 साल से एक भी मीटिंग नहीं हुई है। अकादमी के पास कोई स्थायी कर्मचारी नहीं है। राज्य सरकार ने कई वर्षों से अकादमी के किसी भी आयोजन के लिए एक भी पैसा नहीं दिया है।
     जनवादी लेखक संघ और अन्य प्रगतिशील संगठन और उनसे जुड़े लेखक जो आए दिन दिल्ली हिन्दी अकादमी और दूसरी हिन्दी संस्थाओं को लेकर बयान देते रहते हैं पश्चिम बंग हिन्दी अकादमी के बारे में एक शब्द नहीं बोल रहे हैं।    
      हिन्दीभाषी लोगों के प्रति माकपा का रवैय्या किस तरह सौतेलेपन का शिकार है इसे एक ही उदाहरण से सहज ही समझा जा सकता है निकट भविष्य में राज्य में 80 नगरपालिकाओं के चुनाव होने वाले हैं। माकपा के उम्मीदवारों की सूची में 50 उम्मीदवार भी हिन्दीभाषी नहीं हैं, हां, उर्दूभाषी मुस्लिम प्रत्याशियों को कुछ सीटों पर ममता बनर्जी के मुसलमान कार्ड को काटने के लिए जरुर खड़ा किया गया है। जबकि अकेले कोलकाता में 30 लाख से ज्यादा हिन्दीभाषी रहते हैं उनमें गिनती के 1-2 उम्मीदवार हिन्दीभाषी खड़े किए गए हैं।
     जिस तरह चीन की कम्युनिस्ट पार्टी हेन जाति के वर्चस्व को अन्य जातियों के खिलाफ इस्तेमाल करती रही है ठीक वैसे ही मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टीँ पश्चिम बंगाल में बंगाली अंधलोकवाद का भाषायी अल्पसंख्यकों के प्रति औजार की तरह चालाकी के साथ इस्तेमाल करती रही है।
    भारत में भाजपा में हिन्दू और हिन्दी वर्चस्व को लेकर अंधलोकवादी ऱुझान है जिनके आधार पर वह भाषायी और धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ आए दिन आक्रामक व्यवहार और हमले करती रही है।
       भाषायी अल्पसंख्यकों के प्रति पश्चिम बंगाल में सामान्यतौर पर दोयम दर्जे के नागरिक जैसा व्यवहार होता है। उल्लेखनीय है भाषायी अल्पसंख्यकों के प्रति भेदभावपूर्ण रवैय्या सोवियत संघ से लेकर यूगोस्लाविया तक, चैकोस्लोवाकिया से चीन तक समाजवाद का साझा फिनोमिना है। यह फिनोमिना पश्चिम बंगाल में भी खूब फलफूल रहा है। बांग्ला अंधलोकवाद के कारण आज बंगाली जाति और बांग्ला भाषा के प्रति असम,उड़ीसा, झारखण्ड में उग्र प्रतिक्रियाओ का चक्र चल रहा है। भाषायी अंधलोकवाद अंततः राष्ट्रीयस्तर पर राजनीतिक तौर पर अप्रासंगिक बनाता है और सामाजिक विभाजन पैदा करता है काश हमारे यहां यह बीमारी न आयी होती ?    






शुक्रवार, 14 मई 2010

नव्य उदार मार्ग का कुपरिणाम हैं चीनी बच्चों पर हमले

(चीन में हाल के कातिलाना हमलों में घायल 2 साल का बच्चा अस्पताल में)
       चीन में विगत दो महीनों से बच्चों पर जिस तरह के कातिलाना हमले हो रहे हैं इससे समूचे चीन में हंगामा उठ खड़ा हुआ है। चीन के विशेषज्ञों ने इस पर अपनी राय जाहिर करते हुए कहा है कि ये हमले अंधाधुंध नव्य पूंजीवादी आर्थिक विकास का परिणाम है। विगत दस सप्ताह में 8 हमले हुए हैं।
     विशेषज्ञों का मानना है कि आर्थिक विकास के चक्कर में विकास का मानसिक स्वास्थय पर क्या असर हो रहा है इसकी अनदेखी हुई है। सारे देश में अंधाधुंध आर्थिक विकास हुआ है उसका देश के नागरिकों के मानसिक स्वास्थ्य पर क्या असर हो रहा है इसके बारे कभी सोचा ही नहीं गया।
      Agence France-Presse, Associated Press समाचार एजेंसी को दिए साक्षात्कार में बीजिंग स्थित चीनी विश्वविद्यालय के राजनीति और कानून विभाग के प्रो.मा अइ का मानना है कि हमने आर्थिक तरक्की पर ध्यान केन्द्रित किया और लेकिन मानसिक दशा को उन्नत बनाने पर ध्यान नहीं दे पाए। विगत 30 सालों के परिवर्तन की गति बेहद तेज रही है। हाल के हमलों में कुल मिलाकर 17 छोटे बच्चे मारे गए हैं और 50 बच्चे घायल हुए हैं। हमलावरों में से एक ने आत्महत्या कर ली जबकि एक हमलावर को पुलिस के हवाले कर दिया गया है। हमलावर समाज में इस तरह के हमले करके बदला लेना चाहते हैं और आम जनता को शॉक देना चाहते हैं। ये हमले व्यापक सामाजिक-मनोवैज्ञानिक बीमारी की अभिव्यक्ति हैं।
     विगत 30 सालों में चीन के समाज में खुलापन आया है अनेक किस्म की सुविधाओं और स्वतंत्रताओं को आम जनता भोग रही है। आज चीनी नागरिक का नव्यउदार पूंजीवादी आर्थिक सुधारों के बुनियादी लक्षणों से मुकाबला हो रहा है। पूंजीवादी समाज का लक्षण है कुत्ता कुत्ते को खाता है। यह लक्षण विकासशील चीनी समाज को खा रहा है।
     शंघाई स्थित तोंगजी विश्वविद्यालय के मानसिकरोग विशेषज्ञ मिशेल फिलिप का कहना है कि चान के महानगरों के बाहर छोटे शहरों और कस्बों में डाक्टर यह नहीं जानते कि मनोरोग क्या है ? अनेक मनोरोगी अपना इलाज सामाजिक कलंक होने के कारण नहीं करा पाते। डा. फिलिप ने चीन में पिछले साल सर्वे करके पाया कि देश में सत्रह करोड़ तीस लाख मनोरोगी हैं। इनमें सिजोफ्रेनिया से लेकर शराब की लत से पैदा हुई मानसिक बीमारियों के शिकार लोग भी शामिल हैं। इनमें से 91 प्रतिशत लोगों का कभी इलाज ही नहीं हुआ है।    
                   



प्रेम पाने का नहीं देने का नाम है

       प्रेम पर इन दिनों अनेक कोनों से हमले हो रहे हैं। प्रेम आज विवाद और हिंसा का विषय बना हुआ है। अतःप्रेम के सवाल पर गंभीरता के साथ विचार करना समीचीन होगा। सवाल यह है प्रेमीयुगल प्रेम के अलावा क्या करते हैं ?  प्रेम का जितना महत्व है उससे ज्यादा प्रेमेतर कार्य-व्यापार का महत्व है।
   प्रेम में निवेश वही कर सकता है जो सामाजिक उत्पादन भी करता हो, प्रेम सामाजिक होता है, व्यक्तिगत नहीं। प्रेम के सामाजिक भाव में निवेश के लिए सामाजिक उत्पादन अथवा सामाजिक क्षमता बढ़ाने की जरूरत होती है।
       प्रेम में जिसका सामाजिक उत्पादन ज्यादा होगा उसका ही वर्चस्व होगा। प्रेम करने वालों को सामाजिक तौर पर सक्षम,सक्रिय,उत्पादक होना चाहिए। सक्षम का प्रेम सामाजिक तौर पर उत्पादक होता है। ऐसा प्रेम परंपरागत दायरों को तोड़कर आगे चला जाता है।
      पुरानी नायिकाएं प्रेम करती थीं, और उसके अलावा उनकी कोई भूमिका नहीं होती थी। प्रेम तब ही पुख्ता बनता है, अतिक्रमण करता है जब उसमें सामाजिक निवेश बढ़ाते हैं। व्यक्ति को सामाजिक उत्पादक बनाते हैं। प्रेम में सामाजिक निवेश बढ़ाने का अर्थ है प्रेम करने वाले की सामाजिक भूमिकाओं का विस्तार और विकास।
    प्रेम पैदा करता है, पैदा करने के लिए निवेश जरूरी है, आप निवेश तब ही कर पाएंगे जब पैदा करेंगे। प्रेम में उत्पादन तब ही होता है जब व्यक्ति सामाजिक तौर पर उत्पादन करे। सामाजिक उत्पादन के अभाव में प्रेम बचता नहीं है, प्रेम सूख जाता है। संवेदना और भावों के स्तर पर प्रेम में निवेश तब ही गाढ़ा बनता है जब  आप सामाजिक उत्पादन की प्रक्रिया में सक्रिय रूप से उत्पादक की भूमिका अदा करें ।
         प्रेम के जिस रूप से हम परिचित हैं उसमें समर्पण को हमने महान बनाया है। यह प्रेम की पुंसवादी धारणा है। प्रेम को समर्पण नहीं शिरकत की जरूरत होती है। प्रेम पाने का नहीं देने का नाम है। समर्पण और लेने के भाव पर टिका प्रेम इकतरफा होता है। इसमें शोषण का भाव है। यह  प्रेम की मालिक और गुलाम वाली अवस्था है। इसमें शोषक-शोषित का संबंध निहित है।

      प्रेम का मतलब कैरियर  बना देना, रोजगार दिला देना,व्यापार करा देना नहीं है। बल्कि ये तो ध्यान हटाने वाली रणनीतियां हैं,प्रेम से पलायन करने वाली चालबाजियां हैं। प्रेम गहना,कैरियर ,आत्मनिर्भरता आदि नहीं है।
     प्रेम सहयोग भी नहीं है। प्रेम सामाजिक संबंध है, उसे सामाजिक तौर पर कहा जाना चाहिए, जिया जाना चाहिए। प्रेम संपर्क है, संवाद है और संवेदनात्मक शिरकत है। प्रेम में शेयरिंग केन्द्रीय तत्व है। इसी अर्थ में प्रेम साझा होता है,एकाकी नहीं होता। सामाजिक होता है ,व्यक्तिगत नहीं होता।
     प्रेम का संबंध दो प्राणियों से नहीं है बल्कि इसका संबंध इन दो के सामाजिक अस्तित्व से है। प्रेम को देह सुख के रूप में सिर्फ देखने में असुविधा हो सकती है। प्रेम का मार्ग देह से गुजरता जरूर है किंतु प्रेम को मन की अथाह गहराईयों में जाकर ही शांति मिलती है, प्रेमी युगल इस गहराई में कितना जाना चाहते हैं उस पर प्रेम का समूचा कार्य -व्यापार टिका है। प्रेम का तन और मन से गहरा संबंध है, इसके बावजूद भी प्रेम का गहरा संबंध तब ही बनता है जब आप इसे व्यक्त करें, इसका प्रदर्शन करें। प्रेम बगैर प्रदर्शन के स्वीकृति नहीं पाता। प्रेम में स्टैंण्ड लेना जरूरी है।

चीन में मुसलमान विरोधी आंधी

(प्रसिद्ध चीनी अर्थशास्त्री लाहम तोहती)                   
      चीन में मुसलमानों की खैर नहीं है। चीन के जिन इलाकों में मुस्लिम आबादी है वहां जबर्दस्त दमन चल रहा है,भारत में जो लोग मुसलमानों के हितैषी होने का दावा करते हैं चीन में चल रही मुस्लिम विरोधी आंधी पर चुप क्यों हैं ?
    पश्चिम बंगाल में मुसलमानों के साथ जिस तरह का सौतेला व्यवहार राज्य प्रशासन ने किया और मुसलमानों की घनघोर उपेक्षा की है उसके तथ्य और सत्य को सच्चर कमीशन की रिपोर्ट में बताया गया है। वाम में मुस्लिम विरोधीभाव चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के मुस्लिमविरोधी रुझान से काफी मिलता -जुलता है। चीन की कम्युनिस्ट पार्टी की कार्यप्रणाली के साथ पश्चिम बंगाल माकपा की कार्यप्रणाली और राज्य प्रशासन के अनेक लक्षण मिलते हैं। इस संदर्भ में चीन में मुसलमानों के साथ किए जा रहे बर्बर व्यवहार को जानना बेहद जरुरी है।
         खबर आयी है कि चीन के Uyghur  अल्पसंख्यक जाति के अनाथ बच्चों के साथ चीनी प्रशासन सबसे खराब अमानवीय व्यवहार कर रहा है। इस जाति के अनाथ बच्चों को एक अनाथाश्रम में नहीं रखा जा रहा है बल्कि कुछ अवधि के बाद उन्हें दूसरे शहर में स्थानांतरित कर दिया जाता है। अनाथ Uyghur बच्चों को कुत्ते और पोर्क का मांस खाने के लिए दिया जाता है और हेन जाति के लोगों के साथ रखा जाता है,उल्लेखनीय है पोर्क और कुत्ते का मांस मुसलमानों में वर्जिंत है। लेकिन इन अनाथ बच्चों को इसे जबर्दस्ती खिलाया जा रहा है। जो बच्चे प्रतिवाद करते हैं उनकी जमकर पिटाई की जाती है। यह खबर रेडियो फ्री एशिया ने प्रसारित की है।
     चीन में मुसलमानों के साथ किए जा रहे अमानवीय बर्ताव की सिर्फ मुसलमानों के द्वारा आलोचना नहीं हो रही है बल्कि अनेक कॉमरेड भी मुसलमानों के साथ किए जा रहे दुर्व्यवहार से परेशान हैं। झिनजियांग के 40 वर्षीय अर्थशास्त्री और शानदार शिक्षक लाहम तोहती ने भी मुसलमानों के साथ किए जा रहे बर्बर बर्ताव की तीखी आलोचना की है। ये जनाव कम्युनिस्ट पार्टी के बागी सदस्य हैं और कईबार अपनी साफगोई के लिए चीनी पुलिस ने उन्हें घर में नजरबंद करके भी रखा है। ये साहब चीन की श्रेष्ठतम यूनीवर्सिटी मिनज़ु यूनीवर्सिटी में बेहतरीन शिक्षक हैं और इनकी चीन में साख भी है।
     लाहम को चीन सरकार की दमनकारी नीतियों का विरोध करने के कारण ङाल ही में देश के बाहर जाने की अनुमति नहीं दी गयी। लाहम एक सेमीनार में भाग लेने के लिए तुर्की जाना चाहते थे। लाहम साहब को चीन प्रशासन ने जिस काली सूची में शामिल किया है उस पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए लाहम ने जो लेख लिखा है उसका यहां अंग्रेजी अनुवाद दे रहे हैं  इससे चीन के दमनकारी वातावरण पर व्यापक रोशनी पड़ती है। लाहम तोहती ने लिखा है-

These blacklists are always being used as weapons to trample the law for the sake of protecting “social order,” and so the law itself may as well be “illegal,” but of course the law can’t be illegal, therefore what’s illegal is the legitimacy of the government’s authority. Fairness and justice get flouted and eroded, and that’s a significantly harmful thing.
My name is Ilham Tohti, I am a Uyghur, and a legitimate citizen in possession of a valid People’s Republic of China ID who has for a long period of time conducted research on the “Xinjiang Problem.” At the end of March I received an invitation to the 2nd Turkic Culture Academic Conference  to be held in Izmir, Turkey from April 18th to the 24th. I knew from my current situation and past experiences that I had to inform the relevant “harmony” agencies that I was preparing to attend an academic conference. Through unceasing effort and multiple explanations they finally agreed to let me go abroad and attend the 2nd Turkic Culture Academic Conference. They seemed to believe I would not accept any interviews from the media or stay in Turkey… in the remaining time and with the help of a colleague, I sought out the school’s relevant departments, such as the Security Department, the Educational Administration Office, the Human Resources Office, the Organization Department, the Education Office, the college heads and classes at my institution, etc., etc., taking up a whole week’s time. When all was said and done I got them to put 13 red seals on my exit application. I started to worry that perhaps after leaving the country they wouldn’t let me back in. But when I expressed my concerns, they always responded: “How’s that possible? China is a country ruled by law.”
Though at that point all my concerns had not been addressed, I nevertheless went to the Turkish embassy to apply for a visa. At the Turkish embassy’s visa office I met with several other Uyghurs who were also planning to attend the 2nd Turkic Culture Academic Conference. The person in charge of visa applications at the Turkish embassy is Han Chinese, and I unfortunately already had the delight of experiencing his “attitude.” However, this time he appeared to be completely different person from when he completely refused, without reason, to accept my visa application materials back in November of 2009; his attitude was abnormally kind. Perhaps his attitude had something to do with the Turkish Ministry of Foreign Affairs understanding my concerns.
Getting the visa turned out to go quite smoothly. The day I received my visa, someone told me that the secretary of the Central Minzu Preparatory College, Arzigul, was informed that due to work requirements I was unable to leave the country. Learning this made me quite worried, as before I had gotten wind that certain relevant authorities were thinking of not letting me leave. That evening I was speaking with an Asia Weekly [亚洲周刊] reporter about the “Xinjiang Problem” when Domestic Security [国保]1 gave me a call and came over. Could it be that they weren’t letting me leave the country?  Two Domestic Security officers spoke with me the whole evening, exhausting me completely! They said I couldn’t go abroad and attend the academic research conference but didn’t show any sort of paperwork, relying just on spoken orders which is an even more preposterous violation of a legal citizen’s right to go abroad. I asked: which ministry is responsible for this? Which article of the PRC Law on Managing Entry and Exit of Citizens is being implemented here? These Domestic Security officers just offered excuses, saying they were informed by their superiors and were not privy to the exact particulars. One of them told me that his higher-ups decreed that I couldn’t leave the country but didn’t explain the reasons, and further suggested that I accept the “vacation” they had arranged for me,  to “another place” [in China] until the end of the conference in Turkey (and so two days later I took a plane to the South [of China] and there was “vacationed”2). I asked again: “Did you check and see which ministry this information was approved by?” They answered: “This is how the workflow is within the ministry, this is what the boss ordered, and even he’s not clear on what the relevant situation is, there’s no way to tell you.” When I tried to get him to show some documents and asked about compensation for the financial losses due to not being able to leave the country, I was met only with refusals. To all the relevant parties I express befuddlement at this reckless deprival of a citizen’s fundamental right to leave the country as well as deeply felt helplessness and regret. Analyzing the refusal to let me leave the country, perhaps it has something to do with being scared of someone “speaking the truth.” How is it that “Law Unsurpassed by None” can’t even protect one citizens most basic personal legal right?  The last half of last year I received invitations from Norway, Turkey, Sweden and several other countries, and each time I was prevented by the authorities from leaving the country. Perhaps I, Ilham Tohti, have been placed on a no-exit government blacklist? Are the authorities limiting one’s right to exit or enter the country to punish dissenting voices, or isolate them from the outside world?
I’ve thought about all these problems. Ilham Tohti, a citizen with a proper ID, apparently does not meet whatever standards there are in the “Exit and Entry Law” that exists only in the mouths of the authorities; it’s plain that this is an extremely outrageous affront against a citizen’s right to leave the country.
What legal basis is there to prevent me from leaving the country?
1. Section 1, Article 15 of the “Regulations for the Implementation of the Law on the Entry and Exit of Citizens of the People’s Republic of China” states, “Under the following conditions, Frontier Inspection officials at the customs checkpoint have the right to prevent exit or entry from the country: 1) one does not possess a PRC passport or other exit document; 2) one possesses an invalid PRC passport or invalid exit documents; 3) one possesses a forged or altered passport or documents, or is using the passport or documents of another person; 4) one refuses to offer documents for inspection.” This is for verifying the identity of those entering or exiting the country. Ilham Tohti has a valid ID and a valid passport, therefore, this regulation cannot be cited as the legal basis for preventing Ilham Tohti from leaving the country.
Section 1, Article 37 of the Constitution of the People’s Republic of China states that, “The freedom of person of citizens of the People’s Republic of China is inviolable,” while Section 3 states, “unlawful deprivation or restriction of citizens’ freedom of person by detention or other means is prohibited; and unlawful search of the person of citizens is prohibited.” As a citizen of the People’s Republic of China, leaving and entering the country is one of the legal personal freedoms of the complainant, and no work unit or individual may illegally deprive or limit this right.
Preventing Ilham Tohti, an ID carrying citizen, from leaving the country without any factual or legal basis is clearly illegal.
2. Section 1, Article 8 of the “Regulations of the People’s Republic of China on Frontier Inspection of Exit from or Entry Into the Country” states that “Under the following conditions, Frontier Inspection officials at the customs checkpoint have the right to prevent an individual from exiting or entering the country: 1) one does not possess exit or entry documents; 2) one possesses invalid exit or entry documents; 3) one possesses another person’s exit or entry documents; 4) one possesses forged or altered exit or entry documents; 5) one refuses to submit documents for inspection; 6) one enters or exits outside designated transit points; 7) the State Council or Ministry of State Security issues a notice prohibiting an one’s entry or exit; 8) Law or administrative rules and regulations prohibits exit or entry.” Because Ilham Tohti has a valid passport, was leaving through a legal transit point, has not been prohibited to leave by the State Council or the Ministry of State Security, and is not prohibited to leave by any law or administrative rule or regulation, this regulation cannot be cited as the legal basis for preventing Ilham Tohti from leaving the country.
3. When the authorities so brazenly deprive a citizen of his right to leave or enter the country, they seriously violate the 13th article of the Universal Declaration of Human Rights: 1) Everyone has the right to freedom of movement and residence within the borders of each state. 2) Everyone has the right to leave any country, including their own, and to return to their country.
Everything I’ve done is what any other reasonable citizen would do, and also is what any citizen with a sense of social responsibility ought to do. I believe that I will spare no effort in advocating my principles, I will continue laboring and appealing for fair, equitable treatment of the Uyghurs.  I call on friends who are Uyghur, Han, and of all other ethnicities to respect rule of law and human rights, to respect one’s own personal dignity and the dignity of others!!! Let us strive to become a people with dignity!














भूमंडलीकरण और ग्लोबल मीडिया से कैसे लड़ें


(दिमागी ख्बाब है भूमंडलीकरण)
           भूमंडलीकरण में अन्तर्विरोध निहित हैं। इसका संबंध पूंजीवाद के अन्तर्विरोधों से है। पूंजीवाद ने विश्व व्यवस्था के रुप में जब अपना विकास शुरु किया तो उसने सीमित रुप में सामन्तशाही के खिलाफ संघर्ष किया। पूंजीवादी सत्ता और औपनिवेशिक शासन व्यवस्था की स्थापना की। पुराने संबंधों को बरकरार रखा। इसके खिलाफ दुनिया के गुलाम मुल्कों में आजादी के लिए संघर्षों का सिलसिला चल निकला।
         आजादी के लिए संघर्ष पूंजीवादी भूमंडलीकरण के खिलाफ पहली सबसे बड़ी जंग हैं। तात्पर्य यह है कि भूमंडलीकरण मूलत: आजादी और आत्मनिर्भरता को छीनता है। यह परनिर्भरता और सैन्य-निर्भरता पैदा करता है। लोकतन्त्र को कमजोर बनाता है या उसे खत्म करता है। यह कार्य वह भूमंडलीय माध्यमों, भूमंडलीय संचारप्रणाली, भूमंडलीय नियमों,और निर्बाध प्रवेश के जरिये करता है।
       साम्राज्यवादी भूमंडलीकरण की विशेषता है पर-निर्भरता, सैन्य सहयोग और उपभोक्तावादी संस्कृति का प्रचार- प्रसार। इच्छा और आकांक्षाएं सामाजिक सरोकारों से जुड़ने की बजाय वस्तु प्राप्ति से जुडने लगती हैं। फलत: इच्छाओं का वस्तुकरण होने लगता है। जीवनशैली, खान-पान, प्रतीकों एवं चिह्नों के जरिये साम्राज्यवादी संस्कृति को जनप्रिय बनाने की कोशिशें तेज हो जाती हैं।इस क्रम में जहां एक ओर बहुराष्ट्रीय निगमों का विस्तार होता है। वहीं दूसरी ओर आम लोगों में भ्रम की सृष्टि होती है। यही वजह है कि किससे लडना है और कैसे लडना है ,इन सवालों पर नये किस्म के चिन्तन की जरुरत महसूस की जा रही है।नयी समझ के अभाव में संघर्ष के पुराने अस्त्र बेकार हो गए हैं।
     समाज में नयी परिस्थितियों के अनुरुप नयी कतारबंदी शुरु हुई है। समाज, संस्कृति, राजनीति, अर्थनीति,साहित्य आदि क्षेत्रों में नए सवाल उठे हैं। ये ऐसे सवाल हैं जो नए उत्तरों की मांग कर रहे हैं।
        साम्राज्यवादी भूमंडलीकरण का एकमात्र प्रत्युत्तर यही हो सकता है कि उत्पादक शक्तियों के पक्ष में खडे हों और चीजों, घटनाओं,संवृत्तियों,प्रवृतियों और व्यक्तियों को आलोचनात्मक दृष्टिकोण से देखें। जनमाध्यमों से परिचालित होना बंद कर दें।तर्क और सही समझ के आधार पर निर्णय लें।दिशाहीनता,अनालोचनात्मकता और उत्पादक शक्तियों के प्रति घृणाभाव अंतत: साम्राज्यवादी ताकतों की मदद करता है। यदि उपरोक्त सुझावों पर अमल करें तो पाएंगे कि साम्राज्यवादी संस्कृति धीरे -धीरे अपने असली चरित्र में सामने आ जाएगी। सादगी की बजाय चमक-दमक पूर्ण जीवनशैली,कृत्रिम भाषा और औपचारिकता के जरिये ध्यान रहे जनमाध्यम और विज्ञापन आम लोगों को अपने दृष्टिकोण में ढ़ालते हैं। अपने अनुरुप माहौल बनाते हैं। इस तिलिस्म को तोड़ने की जरुरत है।
        आज पूंजीवाद हमारे अन्दर से हमला कर रहा है। ह्रासशील और सहजजात वृत्तियों के जरिये हमला कर रहा है। इस हमले के खिलाफ संघर्ष ज्यादा कठिन है।विश्व पूंजीवाद के खिलाफ संघर्ष को मन के अन्दर और बाहर दो स्तरों पर चलाना होगा।
         मन में संघर्ष का अर्थ है काल्पनिक जीवन शैली या अमरीकी जीवन शैली के प्रति अनाकर्षक भावबोध की सृष्टि या देशी जीवन शैली के प्रति गहरी आस्थाएं पैदा करना।बाह्य जीवन में उन नीतियों के लिए लड़ना जो सार्वभौम संप्रभु राष्ट्र्,आत्मनिर्भर आर्थिकव्यवस्था,सादगीपूर्ण जीवनशैली और सामाजिक एकता बनाये, पर-निर्भरता, शानो-शौकत,और खोखली जीवनशैली के प्रति घृणा पैदा करे। 
        पूंजीवाद को कृत्रिमता पसंद है। तड़क-भड़क पसंद है। यदि किसी भी कारण से ये दोनों तत्व जीवन शैली में बने रहते हैं तो परायी संस्कृति के प्रति रुझान पैदा होता है। प्रभुत्वशाली संस्कृति अपना आधार निर्मित करती है। यहीं से यथार्थ और अनुभव में अंतर शुरु हो जाता है। वास्तविकता से दूरी बढ़ जाती है। जीवन में यह दूरी अलगाव की शक्ल में आती है। पूंजीवाद की सारी लीलाएं इसी अलगाव को भरने के नाम पर शुरु होती हैं। वह इसके लिए आभासी यथार्थ की सृष्टि करता है।आभासी यथार्थ से भरने की कोशिश करता है। रंगीन सपनों,एवं वस्तुओं से भरने की कोशिश करता है। 
        साम्राज्यवादी भूमंडलीकरण का सामाजिक स्तर पर यही प्रत्युत्तर हो सकता है कि ज्यादा से ज्यादा सामाजिक , राजनीतिक एवं सामूहिक गतिविधियों में हिस्सा लें।जो ताकतें साम्राज्यवाद के खिलाफ संघर्षरत हैं उनकी गतिविधियों में शामिल हों। जनमाध्यमों के कार्यक्रमों के बारे में आपस में निरन्तर गोष्ठियां करें। क्योंकि माध्यमों के बारे में जागरुकता ही दबाव पैदा करती है।ऐसी स्थिति के अभाव में जनमाध्यम दबाव पैदा करते हैं।
       इसके अलावा मातृभाषाओं के जरिए शिक्षा एवं प्रशासनिक कार्यवाही के संचालन की व्यवस्था की जानी चाहिए। देशी भाषा ,देशी संस्कृति,देशी जनमाध्यमों का स्वायत्त विकास और वैज्ञानिक दृष्टिकोण का प्रचार एवं वैज्ञानिक चेतना का निर्माण ही भूमंडलीकरण का विकल्प निर्मित करेगा। 
       ध्यान रहे भूमंडलीकरण मुद्रा और माल के प्रवाह के अतिरिक्त कुछ और भी है।यह विश्व के लोगों में अन्तरनिर्भरता बढ़ाने वाली प्रवृत्ति है। भूमंडलीकरण के कारण प्रत्येक क्षेत्र में केन्द्रीकरण और विश्व बाजार से जुड़ने के नाम पर बहुराष्ट्रीय कम्पनियों से जुडने की प्रवृत्ति बढ़ी है।इससे बाजार और राजनीति में इन ताकतों का प्रभुत्व बढ़ा है।आर्थिक,सामाजिक एवं सांस्कृतिक असंतुलन बढा है। कानून के शासन की अवहेलना बढ़ी है।इसके विकल्प के तौर पर कानून के शासन, विकेन्द्रीकरण, जनतांत्रिक शासन व्यवस्था और मानवाधिकारों के अनुपालन पर जोर देना होगा। 
       आज स्थिति यह हैकि ' ओईसीडी' के सदस्य राष्ट्रों में विश्व जनसंख्या का मात्र 19प्रतिशत हिस्सा रहता है।किन्तु माल और सेवा क्षेत्र में इनका 71 प्रतिशत बाजार पर कब्जा है। 58प्रतिशत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश इनके पास है। 91प्रतिशत इंटरनेट उपभोक्ता इन देशों में हैं। दुनिया में सबसे समृध्द दो सौ लोगों ने 1984 से लेकर 1998 के बीच अपनी आमदनी दुगुनी कर ली। सन् 1998 में इनकी कुल संपत्ति 1000 हजार डॉलर आंकी गयी।
         तीन सबसे बडे ख़रबपतियों के पास इतनी संपत्ति है जो समस्त अविकसित राष्ट्रों और उनकी 60 करोड़ आबादी के पास भी नहीं है। 262 अरब डॉलर के दूरसंचार व्यापार के 86 फीसदी हिस्से पर दस बहुराष्ट्रीय कंपनियों का कब्जा है।सन् 1993में विश्व में होने वाले अनुसंधान और विकास का चार फीसदी हिस्सा 10 देशों से आया। विकासशील देशों के स्वीकृत किए गए 80 फीसदी पेटेण्ट औद्योगिक देशों के बाशिन्दों के नाम हैं।
     दुनिया के 90 फीसदी पेटेण्टों को अमरीका नियंत्रित करता है।हॉलीवुड उद्योग ने 1997 विश्व में30 अरब डॉलर का व्यापार किया। इस सबके कारण विश्व में असंतुलन बढ़ा है।उपग्रह संचार प्रणाली और कम्प्यूटर व्यवस्था के विकास ने बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के हमलों को तेज किया है। संस्कृति उद्योग के माध्यम से सांस्कृतिक मालों की खरीद-फरोख्त बढ़ी है।सांस्कृतिक वैविध्य और जातीय पहचान के रुपों को खतरा बढ़ा है। नशीले पदार्थों की तस्करी,औरतों की बिक्री एवं जिस्म फरोशी,हथियारों की अवैध बिक्री,अपराध, हिंसा एवं विभाजनकारी ताकतों की गतिविधियों में इजाफा हुआ है।
      आज विश्व में20 करोड़ से ज्यादा लोग हैं जो विभिन्न किस्म के नशीले पदार्थों का सेवन करते हैं।विगत एक दशक में अफीम का उत्पादन दुगुना हो गया।कोका के पत्तों का उत्पादन दुगुने से भी ज्यादा हो गया।सन्1995में नशीले पदार्थों की बिक्री 400 अरब डॉलर आंकी गयी। यह सकल विश्वव्यापार का आठ प्रतिशत है।अकेले पूर्वी यूरोप से पॉच लाख औरतों की बिक्री दर्ज की गयी।अपराध जगत ने1500अरब डॉलर का कारोबार किया।काले-धंधे में इतनी तेजी का प्रधान कारण है बहुराष्ट्रीय कम्पनियों, सिंडीकेट माफिया गिरोहों की सक्रिय भागीदारी।



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गुरुवार, 13 मई 2010

बच्चों की हत्याओं के खिलाफ ब्लॉगर मैदान में उतरे

(घायल बच्चे को ऑपरेशन थियेटर में ले जाते हुए)
      चीन में आम आदमी आज जितना असुरक्षित है उतना पहले कभी नहीं था। आज देश में बच्चों से लेकर  बूढ़ों तक सभी असुरक्षा के वातावरण में रहने के लिए अभिशप्त हैं। आज के सभी अखबारों में चीन में बच्चों के ऊपर कातिलाना हमले की खबरें छपी हैं। ये कातिलाना हमले पिछले दो महिनों से चुन-चुनकर बच्चों पर हो रहे हैं एक स्कूल में तो ये हमले ऐसे वक्त हुए जब वहां पर पुलिस का कड़ा पहरा लगा हुआ था।
(मारे गए बच्चों के परिवारीजन)
     ताजा वाकया चीन के शानंजी प्रान्त के नानज़िंग शहर का है। यहां एक किंडरगार्डन स्कूल में हमलावरों ने 7 बच्चों और  2 वयस्कों की घेरकर हत्या कर दी है। इस घटना के बाद देश का प्रशासन हरकत में आ गया है,स्कूलों के दरवाजे पर कैमरे लगा दिए गए हैं। सुरक्षा बढ़ा दी गयी है। 
    बाद में पता चला है कि जिस बिल्डिंग में स्कूल चल रहा था उस बिल्डिंग का मालिक अपनी बिल्डिंग की लीज खत्म होने पर घर वापस मांग रहा था,स्कूल प्रशासन इसके लिए तैयार नहीं था ,इसके चलते मकान मालिक ने बच्चों की हत्या कर दी। पूरे चीन में बच्चों के स्कूलों पर पुलिस गश्त बढ़ा दी गयी है। चीन में मार्च से क्रमशःहो रहे स्कूली बच्चों पर हमलों को चीन ब्लॉगरों की कड़ी निंदा का सामना करना पड़ रहा है। हजारों-लाखों ब्लॉगरों ने स्कूली बच्चों हुए हमलों के खिलाफ लिखा है। हम भी इस तरह के बहशी हमलों की निंदा करते हैं। साथ ही यहां हम चीन के चर्चित महान ब्लॉगर हन हन की टिप्पणी दे रहे हैं-   
 (महान चीनी ब्लॉगर हन हन)
       In these most recent abnormal murder cases, the killers all chose kindergartens and elementary schools as their targets. I believe that in the hearts of many people who seek retaliation against society, killing in kindergartens and elementary schools has become in vogue, because in the process of killing people, the killer encounters the least resistance, is able to kill the greatest number of people, and is able to inflict the greatest amount of pain and terror in society. It has become the most effective way of avenging oneself against society. Apart from Yang Jia, almost all of the killers chose to start by killing those who were weakest. In a society that has no release valve, killing the weakest members of society has become the only release. I would advise deploying the security that is currently protecting all the local governments in the country to protect our nursery schools. A government that can’t even protect the children doesn’t need so many people to protect it.
In little more than a month, there have been murder cases on five school campuses, two within one week, with the Taizhou incident on April 29 and the Weifang incident on April 30. I don’t want to investigate the social reasons for these incidents. I just want to tell everybody, right here, that when the story of a person breaking into a kindergarten to slash up 32 children can’t become news, you have all been slashed as well. Not even one paper can report on this, because a few hundred kilometers away a grand meeting is being held, and hundreds of millions of fireworks will be released, while at the same time, in your old hometown of Taizhou, they want to hold the International Tourism Festival, the trade fair, and the OCT opening ceremony—those “three blessed events.”
Maybe, in the eyes of all those old farts, you are killjoys, intent on spoiling the big party





देशप्रेम का पाखंडी चीनी राग



       चीनी जनता में कम्युनिस्ट शासकों के प्रति तेजी से असंतोष बढ़ रहा है। चीन के कॉमरेड साम्राज्यवादी अवधारणाओं के शिकार हो गए हैं। साम्राज्यवादी धारणा में देश प्रेम का अर्थ सरकार प्रेम है। कॉमरेडों का मानना है जो देशप्रेमी है उसे चीन की कम्युनिस्ट सरकार का भी प्रेमी होना चाहिए।जो देशभक्त है उसे पार्टीभक्त होना चाहिए।  देशप्रेम और देशभक्ति का यह संकुचित और विकृत मार्ग है।   
     यह मानना गलत है कि देशप्रेमी को सरकार के नेताओं और मंत्रियों का भी प्रेमी होना चाहिए। यह सोच भी गलत है कि जो व्यक्ति सरकार प्रेमी नहीं बह देशप्रेमी नहीं।
     भारत में भी ऐसे लोग है जो देशप्रेम का अर्थ हिन्दू प्रेम मानते हैं। वंश परंपरा प्रेम मानते हैं। पार्टी विशेष से प्रेम मानते हैं।देशप्रेम की ये सब विकृत मान्यताएं हैं।  
    चीन जैसी दशा पश्चिम बंगाल में भी है। यहां पर कम्युनिस्टों में एक बड़ा तबका है जो बांग्ला प्रेम को पार्टी प्रेम के साथ (माकपा प्रेम के साथ ) गड्डमड्ड करके देखता है। देशभक्ति को पार्टीभक्ति के साथ एकमेक करके देखता है।
     देश प्रेम का अर्थ संपदा प्रेम,पार्टी प्रेम,वंश परंपरा प्रेम  और नेता प्रेम नहीं है। देशप्रेम का अर्थ है देश की जनता,प्रकृति, पशु-पक्षी,नदी-तालाब,जल,वन-जंगल,पेड़-पौधे,पर्वत,शहरी और ग्रामीण आदि के प्रति प्रेम और इनके अधिकारों की रक्षा के लिए संघर्ष। देशप्रेम वही हो सकता है जो अन्य को प्यार करता हो,अन्य के अधिकारों के प्रति समर्पित हो। देशप्रेम में अन्य के लिए त्याग और संघर्ष अनिवार्य चीजें हैं। हम कितने देशप्रेमी हैं यह इस बात से तय होगा कि अन्य के बारे में कितना सोचते हैं, अन्य के लिए कितनी जंग करते हैं।