सोमवार, 14 सितंबर 2009

साइबरस्‍पेस में घायल प्रभाष जोशी -राजेन्‍द्र यादव

साइबर संस्‍कृति‍ से परहेज करने वालों की इन दि‍नों शामत आयी हुई है।प्रभाष जोशी-राजेन्‍द्र यादव जैसे बडे लेखक जो नेट से नफरत करते हैं अथवा नेट पर लि‍खे को संवाद योग्‍य नहीं समझते,उनकी दि‍माग की नसें तनी हुई हैं। वे नेट से होने वाले हमलों से घायल हैं और कराह रहे हैं। साइबर घायलों का कहीं इलाज नहीं होता, कोई अस्‍पताल उनकी केयर नहीं करता।यहां तक कि‍ गांठ की बुद्धि‍ भी काम नहीं देती।समझ में ही नहीं आता कि‍ नेट पर इतने ताबडतोड हमले के पीछे राज क्‍या है ? वह भी ऐसे लेखकों से जि‍नका साहि‍त्‍य और पत्रकारि‍ता में कुछ भी दांव पर नहीं लगा है। नेट लेखकों का यदि‍ जमीनी स्‍तर पर कहीं कुछ दांव पर लगा हो तो वे अपने लगुए-भगुओं से कहकर ठीक भी करा दें। लेकि‍न इस नेट का क्‍या करें इसने तो रातों की नींद और दि‍न का चैन हराम कर दि‍या है। नेट पर इन दोनों महानुभावों के बारे में कोई तीखी आलोचना प्रकाशि‍त होती है,तुरंत भक्‍तगण दौडे जाते हैं,महाराज कुछ करो ये चुप नहीं हो रहे। वे दोनों अपने भक्‍तों से कहते हैं जाओ और धावा बोल दो। धावा बोलने के चक्‍कर में कुछ लोग वापस अपने घर आकर सो जाते हैं। जि‍नकी मजबूरी है वे उल्‍टी सीधी टि‍प्‍पणि‍यां लि‍खकर अपने गुरू के प्रति‍ दायि‍त्‍व की इति‍श्री समझ लेते हैं।
प्रभाष जोशी-राजेन्‍द्र यादव को 'हिंदीयुगल' कहना ठीक होगा। इन दोनों की तान को जि‍स तरह नेट ने बेताला कि‍या है उसने नेट लेखन और प्रिंट लेखन से जुडे कुछ बडे सवालों को उठा दि‍या है। 'हिंदीयुगल' पर हुए हमले का पहला सबक है नेट का हमला स्‍थानीय नहीं ग्‍लोबल होता है। 'जनसत्‍ता' या 'हंस' को स्‍थानीय पाठक पढते हैं । नेट को ग्‍लोबल पाठक पढ़ते हैं। दूसरा सबक ,नेट लेखन और इमेज वर्षा अंतत: वर्चुअल यथार्थ है,यथार्थ नहीं है। इसकी यथार्थ से संगति‍ खोजना बेवकूफी है।
नेट लेखन,इमेज,भाषा,प्रतीक आदि‍ कि‍सी को भी पढने,लि‍खने और समझने के लि‍ए हमें वर्चुअल रि‍यलि‍टी से वाकि‍फ होना होगा। यह लेखन और इमेज का रेगि‍स्‍तान है। लेखन के रेगि‍स्‍तान के नि‍यम वैसे ही होते हैं जैसे रेगि‍स्‍तान के होते हैं। लेखन के रेगि‍स्‍तान में लि‍खे को देखकर हिंदी के इन लेखकों के भक्‍तों को यह भी लगा कि‍ इस प्रक्रि‍या में कोई 'फेक' लि‍ख रहा है। मजेदार बात यह थी कि‍ अनेक 'फेक' नाम से बहस में राय भी दे रहे थे, इससे 'फेक' जैसा भी रहा था। नेट लेखन का 'फेक' लगना और अखबार लेखन का वास्‍तव लगना यह अपने आपमें आनंद की चीज है।
जब नेट पर बहस चल नि‍कली तो बेलगाम थी। जि‍सके मन में जो आ रहा था लि‍ख रहा था। कोई अनुशासन नहीं,कोई संपादक नहीं।कोई सेंसरशि‍प नहीं। सब कुछ पारदर्शी वर्चुअल था। बहस में बार बार वि‍षयान्‍तर हो रहा था लोग बहस को पकड़कर मुद्दे पर ला रहे थे और बार-बार बहस हाथ नि‍कली जा रही थी और यही नेट के रेगि‍स्‍तान की खूबी है। जैसे रेगि‍स्‍तान में अंधड मि‍ट्टी के टीले को एक जगह से उठाकर दूसरी जगह ले जाता है ठीक वैसे ही नेट लेखन चीजें जहां हैं वहां नहीं रहने देता। सबवर्सि‍ब भूमि‍का अदा करता है।
नेट की बहसों में लेखकगण नि‍जी कल्‍पनाशीलता के आधार पर शि‍रकत करते हैं। यथार्थ के आधार पर शि‍रकत नहीं करते हैं। वि‍भि‍न्‍न वेबसाइट वालों ने प्रभाष जोशी के रवि‍वार डॉट कॉम वाले साक्षात्‍कार को प्रकाशि‍त करके उस पर जब बहस चलायी और यूजरों से प्रति‍क्रि‍याएं मांगी तो प्रभाष जोशी का साक्षात्‍कार बार-बार उनकी बडी ही त्रासद छवि‍ बना रहा था। पढने वाले प्रभाष जोशी को बडे ही दुखी भाव से देख रहे थे और मन ही मन कह रहे थे प्रभाषजी आपने ऐसा क्‍यों कहा। यदि‍ यह सब न कहते तो इतनी फजीहत तो कम से कम नहीं होती। इस मामले में नेट लेखक रि‍यलि‍टी टीवी के पैटर्न का अनुगमन करते हैं। नेट पर जो आता जो आता गया अपना राग सुनाता गया और चीजों को पारदर्शी रूप में देखता गया। आप प्रभाष जोशी के पक्ष में बोलें या वि‍पक्ष में अंत में नाटक तो प्रभाषजोशी-राजेन्‍द्रयादव का ही हो रहा था। नेट लीला का यह रि‍यलि‍टी टीवी रूप था,जि‍समें वर्चुअल रि‍यलि‍टी अपना खेल खेल रही थी। इसमें 'अच्‍छे' और 'बुरे' के बीच का वर्गीकरण भी चल रहा था।
नेट लेखन में सामान्‍य लेखन की तरह नैति‍क पक्ष भी प्रच्‍छन्‍न रूप में आ धमकता है। इस पूरी प्रक्रि‍या से सबसे ज्‍यादा प्रभावि‍त और पीडि‍त महसूस प्रभाष-राजेन्‍द्र यादव और उनकी भक्‍तमंडली महसूस कर रही थी। नेट की शक्‍ति‍ ने प्रभाषजोशी-राजेन्‍द्र यादव की पूरी कि‍स्‍सागो क्षमता को सोख लि‍या था,पढने वाले तकलीफ पा रहे थे,कुछ आराम महसूस कर रहे थे। अब प्रभाषजोशी- राजेन्‍द्रयादव स्‍वयं नेट पर एक कहानी बनकर रह गए थे। वे दोनों परेशान थे कि‍ हमने जो कहा नहीं, कि‍या नहीं, पता नहीं कहां से खोज खोजकर हमारे आख्‍यान के साथ नत्‍थी कर दि‍या गया और जो आख्‍यान बनाया जा रहा था वह टुकडों में बि‍खरा हुआ था। कोई टुकडा इस वेब पर था तो कोई दूसरा टुकड़ा अन्‍य वेब पर था। इन दोनों की कहानी का एक हि‍स्‍सा 'क' के बयान में था तो अन्‍य पहलू 'ख' के बयान में था। ये दोनों महारथी अपनी नेट कहानी पहचान नहीं पा रहे थे। इन्‍हें अपने चेहरे और वि‍चार अपने नजर नहीं आ रहे थे। इसी को कहते हैं नेट वि‍पर्यय।
ये दोनों ही लेखक अपने शब्‍दों के असर को पहचान नहीं पा रहे थे, सोचने में असमर्थ पा रहे थे कि‍ उनके शब्‍दों का इतना व्‍यापक प्रभाव है। जो तल्‍खी और गुस्‍सा इन दोनों पर चली बहस में सामने आया है वह यह बताने के लि‍ए पर्याप्‍त है कि‍ शब्‍दों के प्रभाव को ध्‍यान में रखकर लि‍खना चाहि‍ए। जो मन में आया बोल दि‍या,जो मन में आया लि‍ख दि‍या, इसका कम से कम लेखक और बडे लेखक को तो खास तौरपर ख्‍याल रखना चाहि‍ए। इन दोनों के लेखन पर चली बहस ने नेट पाठकों का अच्‍छा खासा मनोरंजन भी कि‍या,कुछ मर्माहत हुए तो कुछ लोगों को अपना गुस्‍सा जाहि‍र करने का मौका मिला।
नेट लेखन में नि‍ज-संदर्भ,बि‍डम्‍वना,प्रामाणि‍कता और पुनरावृत्‍ति पर सबसे ज्‍यादा लि‍खा जाता है। यह उत्‍तर आधुनि‍क खेल यहां पर भी चला। जो आलोचनात्‍मक टि‍प्‍पणि‍यां आयीं वे यथार्थ का अति‍क्रमण करने वाली थीं।‍ यथार्थ में इन दोनों लेखकों ने जो कहा उसकी इनके लेखन के सांस्‍कृति‍क संदर्भ में मीमांसा की गई। प्रभाष जोशी-राजेन्‍द्र यादव के भक्‍त चाहते थे,अतीत को अतीत रहने दो उसे अब सामने लाने से क्‍या लाभ जबकि‍ अन्‍य कह रहे थे जब बहस उनके लेखन के सांस्‍कृति‍क संदर्भ पर हो रही है तो हमें उनके अतीत और व्‍यवहार को भी वि‍वादि‍त गद्य के साथ जोडकर देखना चाहि‍ए। वे इन दोनों लेखकों के बहाने वर्तमान में प्रेस और समाज की दशा पर भी बातें कर रहे थे।
'हिंदीयुगल' के भक्‍त मानकर चल रहे थे नेट की बहस मूर्त्‍तिभंजन है। जबकि‍ अन्‍य ऐसा नहीं मानते। इस बहस में सब कुछ नि‍र्मि‍त था,कुछ भी स्‍वाभावि‍क नहीं था,इन दोनों का इति‍हास भी नि‍र्मि‍त था। हम असल में यथार्थ लेखकों से मुठभेड नि‍र्मि‍त लेखक के जरि‍ए कर रहे थे। उसका वैकल्‍पि‍क इति‍हास भी बना रहे थे। वर्चुअल रि‍यलि‍टी का नि‍यम है कि‍ जब तक लोग हजम नहीं कर लेते तब तक समझो कुछ नहीं हुआ है। प्रभाष जोशी-राजेन्‍द्र यादव को जब लोगों ने हजम कर लि‍या तब ही पता चला कि‍ आखि‍र हुआ क्‍या है ?
'हिंदीयुगल' का वैकल्‍पि‍क इति‍हास वह है जो यूजरों के अनुभवों से छनकर सामने आया,इसकी हमें कम जानकारी थी। यूजरों ने अपने व्‍यक्‍ति‍गत अनुभवों की एक-एक रेखा खींचकर जो चि‍त्र बनाया वह वास्‍तव लेखक की प्रचारि‍त इमेज से एकदम भि‍न्‍न था। यह वह इति‍हास है जो इन दोनों की व्‍यावसायि‍क इमेज और प्रति‍ष्‍ठा के बाहर है। जब लोग अपनी राय दे रहे थे तो कुछ लोग प्रमाण मांगरहे थे उनसे यही कहना है कि‍ प्रमाण तो लि‍खि‍त पंक्‍ति‍यां ही हैं।इस प्रक्रि‍या में इन दोनों के बारे में बना हुआ भक्‍ति‍ का प्रभामंडल नष्‍ट हुआ । नेट लेखन मूलत: प्रभामंडल नष्‍ट करता है। यदि‍ आपने भक्‍ति‍ भाव से लि‍खा है तो यूजर उसे कभी ग्रहण नहीं करेगा। नेट की बहस में यूजर अपने अनुभवों के साथ दाखि‍ल हो रहे थे और इन दोनों के आभामंडल को नष्‍ट कर रहे थे। साथ ही इन दोनों की रोमैंटि‍क इमेज को भी इस बहस ने नष्‍ट कि‍या। नेट पर सस्‍ती भावुकता और भक्‍ति‍ अपील नहीं करती बल्‍कि‍ आलोचनात्‍मक वि‍वेक अपील करता है। वै‍कल्‍पि‍क नजरि‍या अपील करता है।
( मोहल्‍ला लाइव पर 14 सि‍तम्‍बर 2009 को प्रकाशि‍त )

रविवार, 13 सितंबर 2009

14 सि‍तम्‍बर हिंदी दि‍वस पर वि‍शेष- संचार क्रांति‍ में हिंदी रैनेसां

साइबर युग में हिंदी दि‍वस का वही महत्‍व नहीं है जो आज से बीस साल पहले था। संचार क्रांति‍ ने पहलीबार भाषा वि‍शेष के वर्चस्‍व की वि‍दाई की घोषणा कर दी है। संचार क्रांति‍ के पहले भाषा वि‍शेष का वर्चस्‍व हुआ करता था, संचार क्रांति‍ के बाद भाषा वि‍शेष का वर्चस्‍व स्‍थापि‍त करना संभव नहीं है। अब कि‍सी भी भाषा को हाशि‍ए पर बहुत ज्‍यादा समय तक नहीं रखा जा सकता। अब भारत की सभी 22 राजकाज की भाषाओं का फॉण्‍ट मुफ्त में उपलब्‍ध है। भारतीय भाषाओं का साफ्टवेयर बनना स्‍वयं में भाषायी वर्चस्‍व की समाप्‍ति‍ की घोषणा है। संचार क्रांति‍ ने यह संदेश दि‍या है कि‍ भाषा अब लोकल अथवा स्‍थानीय नहीं ग्‍लोबल होगी। भाषा की स्‍थानीयता की जगह भाषा की ग्‍लोबल पहचान ने ले ली है। अब प्रत्‍येक भाषा ग्‍लोबल है। कोई भाषा राष्‍ट्रीय,क्षेत्रीय अथवा आंचलि‍क नहीं है।

उपग्रह क्राति‍ के साथ ही संचार क्रांति‍ हुई और हम सब नए भाषायी पैराडाइम में दाखि‍ल हुए हैं। भाषा की स्‍थानीयता खत्‍म हुई है। बहुभाषि‍कता का प्रसार हुआ है। अब वि‍भि‍न्‍न भाषाओं में लोग आसानी के साथ संवाद कर रहे हैं। एक- दूसरे को संदेश और सामग्री संप्रेषि‍त कर रहे हैं। अब हिंदी की स्‍थानीय अथवा राष्‍ट्रीय स्‍वीकृति‍ की समस्‍या नहीं है। बल्‍कि‍ संचार क्रांति‍ ने हिंदी और अन्‍य सभी भाषाओं को ग्‍लोबल स्‍वीकृति‍ दि‍लायी है। आज वे कंपनि‍यां और कारपोरेट घराने हिंदी का कारोबार करने के लि‍ए मजबूर हैं जो कभी यह मानते थे कि‍ वे सि‍र्फ अंग्रेजी का ही व्‍यवसाय करेंगे। इस प्रसंग में रूपक मडरॉक के स्‍वामि‍त्‍व वाले 'न्‍यूज कारपोरेशन' का उदाहरण देना समीचीन होगा। इस कंपनी की प्रति‍ज्ञा थी कि‍ वह समाचारों का सि‍र्फ अंग्रेजी में ही प्रसारण करेगा, और उसने सारी दुनि‍या में अंग्रेजी के ही न्‍यूज चैनल खोले,लेकि‍न भारत में आने के बाद पहलीबार उसे अपनी प्रति‍ज्ञा हिंदी के आगे तोड़नी पड़ी और स्‍टार न्‍यूज का हिंदी में पहलीबार प्रसारण शुरू हुआ। हिंदी सत्‍ता और महत्‍ता का लोहा एमटीवी संगीत चैनल ने भी माना। एमटीवी के सारी दुनि‍या में अंग्रेजी संगीत चैनल हैं,इस कंपनी ने भारत में जब संगीत चैनल खोलने का फैसला कि‍या तो हिंदी संगीत चैनल के रूप में एमटीवी आया। संचार क्रांति‍ के दबावों के कारण ही भारत सरकार ने तकरीबन 1300 करोड रूपया भारतीय भाषाओं के सॉफ्टवेयर के नि‍र्माण और मुफ्त सप्‍लाई पर खर्च कि‍या है। भाषाओं के उत्‍थान के लि‍ए इतना ज्‍यादा पैसा पहले कभी खर्च नहीं कि‍या गया। इसका सुफल जल्‍दी ही सामने आने वाला है। अब तेजी से हिंदी और भारतीय भाषाओं में भाषान्‍तरण हो रहा है भाषाओं का पहले की तुलना में आज भाषान्‍तरण और संवाद तेजी से हो रहा है। आप सहज ही अपनी भाषा में लि‍खी सामग्री को कि‍सी भी देशी वि‍देशी भाषा में रूपान्‍तरि‍त कर सकते हैं।सि‍र्फ कम्‍प्‍यूटर चलाना आता हो और इंटरनेट कनेक्‍शन हो। उपग्रह क्रांति‍ ने भाषाओं रीयल टाइम में संवाद और संचार को जन्‍म दि‍या है। भाषाओं में तत्‍क्षण संवाद की संभावना पहले कभी नहीं थीं। व्‍यक्‍ति‍ के मि‍लने के बाद ही संवाद होता था,अब तो व्‍यक्‍ति‍ नहीं भाषाएं मि‍ल रही हैं। भाषाओं के लि‍ए संचार क्रांति‍ रैनेसां लेकर आयी है।

उपग्रह क्रांति‍ के कारण यह संभव हो पाया है कि‍ आज भारतीय भाषाओं के टीवी और रेडि‍यो चैनल वि‍श्‍वभर में कहीं पर भी डीटीएच सेवाओं के जरि‍ए देखे और सुने जा सकते हैं।इंटरनेट के जरि‍ए भाषायी प्रेस सारी दुनि‍या में पढा जाता है। इस प्रक्रि‍या में भाषाओं की स्‍थानीयता खत्‍म हुई है। भाषाओं के रैनेसां का युग है। हिंदी आज स्‍वाभावि‍क तौर पर भारत की पहचान का मूलाधार बन गयी है। यह सब संचार क्रांति‍ के कारण संभव हुआ है।

नाइन इलेवन की घटना के बाद अमेरि‍का में जि‍स तरह के सुरक्षा उपाय कि‍ए गए हैं उसके कारण वहां पर सुपर कम्‍प्‍यूटर में सारी दुनि‍या के सभी भाषाओं के ईमेल और तमाम कि‍स्‍म की सामग्री की छानबीन अहर्निश चलती रहती है। इसके कारण अमेरि‍का ने तय कि‍या कि‍ वह अपने देश के स्‍कूलों में चीनी,हिंदी,रूसी आदि‍ भाषाओं के पठन-पाठन की खास व्‍यवस्‍था करेगा। सुरक्षा कारणों और सैन्‍य वर्चस्‍व को बनाए रखने के लि‍हाज से अमेरि‍का में हिंदी के अध्‍यापन की व्‍यापक व्‍यवस्‍था पर ध्‍यान दि‍या जा रहा है। न्‍यूज कारपोरेशन, डि‍जनी,सीएनएन,सोनी,एमटीवी आदि‍ कंपनि‍‍यां भारत के मीडि‍या बाजार में प्रवेश करने के लि‍ए सबसे पहले हिंदी में चैनल ,प्रेस और मीडि‍या प्रोडक्‍ट लेकर आई हैं। अब वे देशी समाचारपत्रों में पैसा लगा रहे हैं।

बांग्‍ला के आनंद बाजार प्रकाशन,जागरण प्रकाशन,अमर उजाला प्रकाशन ,हिंदुस्‍तान टाइम्‍स,टाइम्‍स ऑफ इंडि‍या आदि‍ में वि‍देशी कंपनि‍यों का पूंजी नि‍वेश इस बात का संकेत है कि‍ भाषायी मीडि‍या में बहुराष्‍ट्रीय मीडि‍या कंपनि‍यां नतमस्‍तक होकर पैसा लगाने आ रही हैं और अंग्रेजी की तुलना में देशज भाषाओं की महत्‍ता को स्‍वीकार कर रही हैं। इस क्रम में हिंदी को स्‍वाभावि‍क बढत मि‍ली है,अन्‍य भाषाएं भी इस प्रक्रि‍या में अपना वि‍कास करेंगी। इस अर्थ में यह भाषाओं के नवजागरण का दौर है। हिंदी में अनुवाद और डबिंग का इतना व्‍यापक बाजार पैदा हुआ है इसके बारे में हमने कभी सोचा भी नहीं था। अनुवाद का ही तकरीबन 12 हजार करोड रूपये का भारत में बाजार है।कई हजार करोड रूपये का डबिंग का बाजार है,अभी तो कई बाल चैनल 24 घंटे हिंदी में डब कि‍ए गए कार्यक्रम दि‍खाते रहते हैं। वि‍ज्ञापनों में हिंदी वि‍ज्ञापन अकेले 7-8 हजार करोड के बाजार को घेरे हुए हैं। पहले अनूदि‍त वि‍ज्ञापन होते थे अब हिंदी के मौलि‍क वि‍ज्ञापन तैयार हो रहे हैं।

कोई भाषा कि‍तनी ताकतवर है यह इस बात से तय होता है कि‍ व्‍यापार और आर्थि‍क मीडि‍या उसमें है या नहीं। अंग्रेजी के बाद हिंदी अकेली भाषा है जि‍समें व्‍यापारि‍क चैनल और अखबार हैं, जैसे एनडीटीवी प्रोफि‍ट,जी बि‍जनेस, सीएनबीसी आवाज आदि‍। इसी तरह बि‍जनेस स्‍टैंडर्ड, इकोनॉमि‍क टाइम्‍स जैसे आर्थि‍क अखबार सस्‍ते दामों पर हिंदी में नि‍कल रहे हैं। आर्थि‍क अखबार और टीवी चैनलों का हिंदी में आना ,हिंदी में धडाधड इंटरनेट सामग्री का आना, तेजी से ब्‍लॉग संस्‍कृति‍ का वि‍कास इस बात का संकेत हैं कि‍ हिंदी अब ग्‍लोबल भाषा है सही अर्थों में देशी वि‍देशी नागरि‍कों की वि‍श्‍वभाषा है। सैटेलाइट हिंदी चैनलों के करोड़ों दर्शक भारत के बाहर हैं यह सब संभव हुआ है संचार क्रांति‍,उपग्रह क्रांति‍, कम्‍प्‍यूटर और डि‍जि‍टलाईजेशन के कारण।

कहने का तात्‍पर्य यह है हिंदी आज वास्‍तव अर्थों में ग्‍लोबल भाषा है । हिंदी मीडि‍या ग्‍लोबल स्‍तर पर संचार कर रहा है। यह हिंदी का नया पैराडाइम है। यह राज्‍य,कारपोरेट जगत और तकनीकी कैद से मुक्‍त एक नए रैनेसां की शुरूआत है। आओ हम संचार क्रांति‍ का स्‍वागत करें और अपने को हिंदी संस्‍कृति‍ के साथ 'ई' साक्षर भी बनाएं। 'ई' साक्षरता के बि‍ना हम और हमारी भाषाएं नहीं बचेगी। आज प्रत्‍येक हिंदीभाषी की यह जि‍म्‍मेदारी है कि‍ वह अपने को संचार क्रांति‍ से जोड़े और अपने को 'ई' साक्षर बनाए।
(भड़ास ब्‍लाग पर 13 सि‍तम्‍बर 2009 को प्रकाशि‍त )

अमरीका का राजनीति‍क सच

अमरीका की कारपोरेट राजनीति की धुरी है 'कारपोरेट जनतंत्र' (अमरीकी लोकतंत्र को जनता का जनतंत्र समझने की भूल नहीं करनी चहिए) ,अंधराष्ट्रवाद और यहूदीवाद। अमरीका की राजनीति में कोई भी दल सत्ता में आए उसे अंधराष्ट्रवाद और यहूदीवाद के पैराडाइम के तहत ही अपना राजनीतिक कार्यक्रम घोषित करना होता है। ओबामा भी इसी दायरे में परिक्रमा कर रहे हैं। अनेक मामलों में ओबामा और उनके सहयोगी अंधराष्ट्रवाद और यहूदीवाद के कट्टर समर्थक हैं। इस तथ्य की पुष्टि ओबामा के द्वारा जो नयी प्रशासनिक टीम बनायी जा रही है उसमें शामिल व्यक्तियों की राजनीतिक समझ और भूमिकाओं के अब तक के रिकॉर्ड के आधार पर आसानी से समझी जा सकती है।
दूसरी ओर बहुराष्ट्रीय मीडिया अंधराष्ट्रवाद और यहूदीवाद के पैराडाइम से बंधा है। यही वजह है कि अंधराष्ट्रवादी और यहूदीवादी कट्टरपंथियों के विचारों को इसबार के चुनावों में व्यापक कवरेज मिला है। बहुराष्ट्रीय मीडिया नीति है अंधराष्ट्रवाद और यहूदीवाद को तार्किक ,'जेनुइन' और 'स्वाभाविक' विचार के रूप में पेश करो। यही फिनोमिना हमारे देश में स्थानीय मीडिया ने भी आत्मसात कर लिया है। अंधराष्ट्रवादी, कट्टरपंथी और कंजरवेटिव राजनीतिक शक्तियों का कवरेज प्रतिदिन बढ़ रहा है। उन्हें लोकतंत्र का संरक्षक और जनता का हितैषी बताया जा रहा है।
'नाइन इलेवन ' की घटना के बाद अमरीकी राजनीति ज्यादा आक्रामक और अधिनायकवादी रूझानों की ओर बढ़ी है। राष्ट्रीय संप्रभुता को अस्वीकार करने की भावना और भी ज्यादा बलवती हुई है। 'राजनीतिक आक्रामकता' और 'कारपोरेट अधिनायकवाद' का बाजार की आक्रामक रणनीति के साथ गहरा संबंध है। इस प्रक्रिया को प्रभावी बनाने में टेलीविजन ने केन्द्रीय भूमिका अदा की है। टेलीविजन के विस्तार के साथ 'कारपोरेट अधिनायकवाद' का विस्तार हुआ है। साथ ही 'शो बिजनेस' संस्कृति ने समूचे परिदृश्य को घेर लिया है।
'शो बिजनेस' संस्कृति साधारण आदमी की सोचने की क्षमताओं का अपहरण कर लेती है। यह ऐसा वातावरण बनाती है कि व्यक्ति को दमन-उत्पीडन में मजा आने लगता है। सब समय अपने कर्म और कुकर्म की वैधता तलाशते रहते हैं। स्वयं के हाथों अपनी पीठ ठोंकते हैं। स्वयं को शाबाशी देते हैं। आज किसी भी चीज पर पाबंदी की जरूरत नहीं है। मसलन् टीवी परेशान कर रहा है अथवा इंटरनेट परेशान कर रहा है तो पाबंदी लगाने की जरूरत नहीं है। बल्कि इनके जरिए जो सूचनाएं संप्रेषित की जा रही हैं वे ठंडी हैं, सक्रिय नहीं करतीं और थोथा ज्ञानबोध पैदा करती हैं। ये हमारे अज्ञानबोध अथवा चीजों को छिपाने में मदद करती हैं। पहले हम सूचनाओं के जरिए उद्धाटत करते थे इनदिनों सूचना के जरिए छिपाने का काम करते हैं। फलत: सत्य अप्रासंगिक हो जाता है। आज मनुष्य के जीवन में असंख्य समस्याएं हैं,पीड़ाएं हैं,असंख्य विचलन हैं,असंख्य किस्म के दबाव हैं इसके कारण हम विनाश और तबाही से भी प्रेम करने लगे है। हमें तबाही से भिन्न वातावरण नजर ही नहीं आता। हम मीडिया में अपने ही विनाश का आनंद लेते रहते हैं। अपने ही विनाश पर तालियां बजाते रहते हैं। विनाश की खबर अब परेशान नहीं करती बल्कि दर्प,विजय और आनंद के साथ दाखिल होती है।
'शो बिजनेस' का ही कमाल है कि आज सबसे ज्यादा क्लासिक बिक रहे हैं,देखे जा रहे हैं,विचारवान साहित्य भी बिक रहा है किंतु इस समूची प्रक्रिया में ज्ञान का प्रबंधन कर लिया गया है। आलोचनात्मक विश्लेषण का प्रबंधन कर लिया गया है। हमें बताने वाले ज्ञानी लोग मीडिया पर अहर्निश बैठे रहते हैं कि क्या सही और क्या गलत है और इसके बावजूद हमें सही और गलत में अंतर करने में असुविधा हो रही है। पहले हम तथ्य और विचारों को व्यवस्थित करके ,वर्गीकृत करके पढ़ते थे, जिनके लिए ये विचार हुआ करते थे वह जनता भी इस कार्य में सक्षम होती थी आज किंतु यह स्थिति एकसिरे से बदल गयी है।
टेलीविजन युग में चीजों,वस्तुओं और विचारों की रोचक प्रस्तुति की बजाय प्रत्येक चीज को मनोरंजक रूप दे दिया गया है। टेलीविजन संस्कृति के जरिए आप स्वयं को जान सकते हैं। टीवी की प्रत्येक स्टोरी का यह अर्थ नहीं है कि उसका सामाजिक प्रभाव होगा ही। टीवी प्रस्तुतियों का लक्ष्य होता है दर्शक को आगे की स्टोरियों के प्रति आकर्षित करना, उसके इंतजार में बिठाए रखना। किताब और अन्य माध्यमों की यह विशेषता है कि वे अपनी शैली और अंतर्वस्तु की निरंतरता को बनाए रखती हैं किंतु टेलीविजन में ऐसा कुछ भी नहीं है। टीवी को निरंतर देखने के कारण हम टीवी विच्छिन्नाता के आदी हो जाते हैं। टेलीविजन ज्ञानमीमांसात्मक तौर पर यह धारणा पैदा करता है कि हम टीवी में जो कुछ भी देखते हैं वह अतिरंजित होता है। अतिरंजित प्रस्तुति के कारण उसकी प्रस्तुतियों को गंभीरता से लेने की जरूरत नहीं है।
टेलीविजन विमर्श के सैध्दान्तिक चरित्र को निर्मित करने में सुरियलिस्ट अथवा अति-यथार्थवादी परिप्रेक्ष्य हमारी मदद कर सकता है। नील पोस्टमैन ने '' एम्युजिंग अवरसेल्व्स टु डेथ: पब्लिक डिसकोर्स इन दि एज ऑफ शो बिजनेस'' (पेंगुइन बुक्स,1985) में लिखा है टेलीविजन खबरें मूलत: संचार विरोधी सैध्दान्तिकी के ढांचे में सजाकर पेश की जाती हैं। इनका लक्ष्य होता है तर्क,विवेक, क्रम और अन्तर्विरोध की विदायी।
राबर्ट मेकनील के अनुसार टेलीविजन खबरों में प्रत्येक चीज संक्षिप्त रहती है। जिससे किसी के ध्यान पर दबाव न पड़े, बल्कि दर्शक सहजभाव से वैविध्य,विविष्टता,एक्शन और मूवमेंट को ग्रहण करता रहे। दर्शक किसी अवधारणा ,चरित्र और समस्या पर चंद सैकिण्ड से ज्यादा ध्यान न दे। खबर को 'खाने के कौर' की तरह होना चाहिए,उसमें जटिलताएं न हों, नॉनसेंस अपरिहार्य है, इस गुण के कारण संदेश सहज होता है।
टीवी में दृश्य प्रस्तुतियों को विचारों का विकल्प बनाकर पेश किया जाता है। एंकर की बकबक अराजकता है। अमरीकी लोग व्यापक मनोरंजन करते हैं और पश्चिमी जगत के सबसे कम सूचना सम्पन्ना नागरिक माने जाते हैं। वे प्रत्येक विषय पर अपनी राय भी रखते हैं। उनकी राय को राय न कहकर भावनाएं कहना ज्यादा सटीक होगा। वे किसी विषय पर राय नहीं अपनी भावनाओं की अभिव्यक्त करते हैं। ये भावनाएं प्रति सप्ताह बदलती रहती हैं। राय प्रति सप्ताह नहीं बदलती। राय टिकाऊ होती है भावनाएं अस्थिर होती हैं। अमरीकी नागरिकों की इन बदलती भावनाओं को हम बदलते हुए विभिन्ना किस्म की रायशुमारी में निरंतर देखते हैं। रायशुमारी की राय इसलिए बदलती रहती है क्योंकि प्रति सप्ताह तथ्य बदलते रहते हैं। इस प्रक्रिया में टेलीविजन यह विभ्रम पैदा करता है कि वह सूचना दे रहा है और सूचनाप्राणी तैयार कर रहा है। टेलीविजन के द्वारा दी गयी तथाकथित सूचना 'कुसूचना' (डिसइन्फोर्मेशन) होती है। 'कुसूचना' का अर्थ असत्य सूचना नहीं है बल्कि इसका अर्थ दिग्भ्रमित करने वाली सूचना है। गलत सूचना, अप्रासंगिक सूचना, सतही सूचना,ऐसी सूचना जो जानकारी का विभ्रम पैदा करे। बल्कि वह जो जानता है उससे भी दूर ले जाए । ज्ञान से परे ले जाए । ज्ञान से विच्छिन्न कर दे।
आज खबर को मनोरंजन के पैकेज में तैयार किया जाता है। फलत: टीवी खबर मनोरंजन तो करती है सूचना नहीं देती। जनता को प्रामाणिक सूचनाओं से वंचित करती है। हम यह भूलते जा रहे हैं कि सुसंगत सूचना सम्पन्न का अर्थ क्या होता है। अज्ञानता को हमेशा दुरूस्त किया जा सकता है। किंतु अज्ञानता को ज्ञान के रूप में ग्रहण नहीं किया जा सकता है। वाल्टर लिपमैन ने लिखा है '' आजादी का कोई अर्थ नहीं यदि समुदाय के पास झूठ को खोज निकालने के उपकरण ही न हों।'' प्रशिक्षित प्रेस एक तरह से झूठ के उद्धाटन का काम करता है। टेलीविजन की सारी मुश्किलें यहीं पर छिपी हैं। असत्य की चादर को उघाड़ने का काम वह नहीं कर पाता। टीवी इमेजों का लक्ष्य दर्शक अथवा उपभोक्ता के अंदर अपील पैदा करना लक्ष्य होता है सत्य को पेश करना लक्ष्य नहीं होता। टीवी में विवेक और विज्ञापन में अंतर करना मुश्किल हो गया है। विवेक और विज्ञापन में भेद करना मुश्किल हो गया है।
(भड़ास ब्‍लाग पर भी प्रकाशि‍त )

शनिवार, 12 सितंबर 2009

'ई मेल' और प्रति‍गामी उन्‍माद

हाइपर टेक्स्ट का सबसे अच्छा रूप है 'ई-मेल'। कम्प्यूटर खोलो ,अपना 'ईमेल' खाता खोलो आपको अनेक पत्र मि‍लेंगे। परि‍चि‍त -अपरि‍चि‍त सभी के पत्र मि‍लेंगे। ऐसे भी संदेश मि‍लेंगे कि‍ आप चौंक जाएं। आप चाहें तो इन्हें पढ़ें , कूड़ेदान में फेंकें ,उपेक्षा करें अथवा मिटा दें। असल में 'ई-मेल' होते ही हैं कचरा। इससे ज्‍यादा उनका कोई महत्‍व नहीं होता। 'ई-मेल' के अनुभव का यथार्थ अनुभवों के साथ क्‍या रि‍श्‍ता है ? इस सवाल पर गंभीरता से वि‍चार करने की जरूरत है। वास्तव जीवन में आप अपने अनुभवों को लिखते हैं।किंतु कम्प्यूटर संदेश में लिखते समय अनुभव करते हैं।संपर्क करते हैं। तुरंत जबाव प्राप्त करते हैं। उपेक्षा भी करते हैं। असल में कम्प्यूटर में लेखन ही अनुभव है। 'ई-मेल' बिना संदर्भ का अनुभव है। 'ई-मेल' का कोई संदर्भ सूत्र नहीं होता।जो संदेश आप प्राप्त कर रहे हैं जरूरी नहीं है कि वह संदेश किसी परिचित का हो।ये संदेश आत्म संदर्भ में बोलते हैं। निजी भावों को व्यक्त करते हैं।
पत्र लिखने में अनुभव पहले आता है उसे हम लिपिबध्द करते हैं। किंतु कम्प्यूटर में लेखन ही अनुभव है।इसके कारण लेखन का आधार ही बदल गया है।यह तब ही बदलेगा जब आपके पास कम्प्यूटर हो और उसका आप इस्तेमाल करते हों। लेखन के सामने संपर्क लिखा रहता है।यह अनुभव है।साझा अनुभव है।यहां हम शब्दों को नहीं व्यक्ति को छोड़ते हैं। 'ई-मेल' पाने और 'ई-मेल' देने में आप पाएंगे कि आपके पास सिर्फ टेक्स्ट होता है। व्यक्ति तो कहीं दूर छूट गया।इसमें भाषा बदल जाती है।इसमें भाषा होती है , अनुभव होता है किंतु संवेदनाएं नहीं होतीं। अनुभवों का विस्तार होता है। किंतु संवेदनाओं का लोप हो जाता है।यहां भाषा में सिर्फ अनुभव होता है।संवेदना गायब हो जाती है। संवेदना के अभाव के कारण इसमें जिम्मेदारी का भाव भी नहीं आता।यही वजह है कि 'ई-मेल' की वैधता नहीं है।उसे आप तुरंत नष्ट कर देते हैं।यहां तो लेखन ही अनुभव है।
'ई-मेल' की दुनिया में विचरण करते हुए पाएंगे कि आप अपनी आवाज खोते जा रहे हैं। आप सूचनाओं के साझीदार होते हैं। संवेदनाओं और जिम्मेदारी के भाव के साझीदार नहीं होते ।यहां 'पथ' हैं। ये ऐसे 'पथ' हैं जिनके नीचे जमीन नहीं है।यह सीमाहीन मैदान है।फलत: हम सब जगह हैं और कहीं भी नहीं हैं।यहां आपकी आवाज ठंडी हो चुकी है।संवेदनाएं ठंडी हो चुकी हैं। आपके असामान्य क्षणों को शब्दों में रूपान्तरित कर दिया गया है।इनमें संवेदना नहीं है। कम्प्यूटर की संकेत भाषा में परवर्ती पूंजीवाद के विकास के अर्थ छिपे हैं।जैसे- कनेक्शन, लिंक,नोडस के बीच रिलेशनशिप,नरेटिव का पुनरोदय,मेमोरी,एक्सपीरिएंस आदि इन सबको पाने या इनमें से किसी एक पर जाने का अर्थ है 'इसे तुरंत लागू करो।'इस तरह विचारों की आंधी चलती रहती है।इसकी गति तेज है।यहां समूह,अर्थ का साझीदार है। शब्दों के अर्थ बदल रहे हैं।संकेतभाषा का प्रयोग खूब होने लगा है।
कम्‍प्‍यूटर भाषा में साझीदार जैसा कुछ नहीं होता। आपको जो संदेश देता है अथवा जि‍सका संदेश आप पढते हैं अथवा जि‍सके साथ बातें करते हैं,लि‍खकर संवाद करते हैं। यह सारा वर्चुअल में करते हैं। इसका वास्‍तव संसार से कोई लेना देना नहीं है। वर्चुअल संदेश का भी यही हाल है। वर्चुअल यथार्थ को वास्‍तव यथार्थ समझने की भूल नहीं करनी चाहि‍ए। वर्चुअल यथार्थ के तर्क अलग हैं,यथार्थ के तर्क अलग हैं। मसलन जो लोग वर्चुअल में पार्टनर के साथ बातें करते हैं,वर्चुअल पार्टनर के साथ सेक्‍स करते हैं,वे यह सब वर्चुअल में करते हैं। वास्‍तव में नहीं। यह नकली सेक्‍स है। अधूरा सेक्‍स है। वहां यथार्थ में कोई पार्टनर नहीं होता। यहां पर साझेदार के रूप में भाषा होती है, या प्रतीकात्‍मक इमेज होती है। जि‍से देखते हैं।पढते हैं।संवाद करते हैं।सेक्‍स करते हैं। लेकि‍न वास्‍तव में वहां कोई नहीं होता। मजेदार बात यह है जि‍ससे आप बातें कर रहे होते हैं अथवा जि‍स अनजान का आप ईमेल पढ रहे होते हैं वह आपके साथ ही संवाद नहीं कर रहा बल्‍कि‍ एक ही साथ अनेक के साथ संवाद कर रहा होता। इस अर्थ में नेट का संवाद,संपर्क,संदेश,इमेज सब कुछ साझा होता है,सामुदायि‍क होता है। यहां संदेश का संप्रेषक अनुपलब्‍ध होता है। सि‍र्फ संदेश,इमेज, प्रतीक और भाषा होती है कोई वास्‍तव व्‍यक्‍ति‍ नहीं होता।
नेट पर जब आप पढते हैं तो लगता यही है कि‍ आप ही पढ रहे हैं,नेट पर जब आप कि‍सी के साथ सेक्‍स करते हैं,हस्‍तमैथुन करते हैं अथवा कोई भी क्रि‍या करते हैं तो यही लगता है कि‍ आप ही कर रहे हैं। लेकि‍न दूसरी ओर कोई नहीं होता। वहां तो सि‍र्फ भाषा, इमेज, शब्‍द आदि‍ ही होते हैं वास्‍तव में आपके सामने कोई मनुष्‍य नहीं होता,एक वर्चुअल पर्दा होता है। जब तक यह पर्दा खुला है आप महसूस करते हैं,पर्दा बंद तो बाकी चीजें गायब हो जाती हैं। कहने का तात्‍पर्य यह है कि‍ नेट पर प्रत्‍येक चीज मौत और जीवन के परे होती हैं।यहां न तो कोई चीज मरी है और न कोई चीज जिंदा है। वह कुछ भी नहीं है। यहां सि‍र्फ आभास है और आभास को ही हम सच समझने लगते हैं।
आप कम्‍प्‍यूटर में जो कुछ लि‍खा है उसे नष्‍ट कर सकते हैं, अनेक बार नष्‍ट नहीं भी होता है। आज वास्‍तवि‍कता यह है कि‍ आपके कम्‍प्‍यूटर में जो कोई चीज सामने नष्‍ट भी कर दी गयी है तो उसे महाकम्‍प्‍यूटर की स्‍मृति‍ में से खोजकर नि‍काला जा सकता है। इस संदर्भ में देखें तो आपका 'ई-मेल' सुरक्षि‍त है,अन्‍य के पास। यह आपकी प्राइवेसी के सार्वजनि‍क हो जाने की सूचना भी है। पहले आप पत्र लि‍खते थे कि‍सी को तो पत्र नि‍जी तौरपर सुरक्षि‍त रहता था,आज सार्वजनि‍क तौर पर सुरक्षि‍त रहता है। 'ई-मेल' में एक खासकर कि‍स्‍म का उन्‍माद नि‍हि‍त है। आप जब कि‍सी को 'ई-मेल' करते हैं तो आप नहीं जानते कि‍ आपका 'ई-मेल' कौन पढ रहा है। 'ई-मेल' के संप्रेषण में सबसे ज्‍यादा अनि‍श्‍चि‍तता नि‍हि‍त है। 'ई-मेल' हमेशा ऐसी परि‍स्‍थि‍ति‍यों में पढा जाता है जि‍नका आप अनुमान नहीं लगा सकते। पहले आपको संचार करते समय अनुमान रहता था कि‍ आप कैसी परि‍स्‍थि‍ति‍यों में संप्रेषण कर रहे हैं। अन्‍य की प्रति‍क्रि‍याओं का पूर्वानुमान लगा सकते थे। आमने सामने जब संवाद करते हैं तो हावभाव,भाषा,भंगि‍मा,परि‍वेश आदि‍ के जरि‍ए अनुमान कर लेते हैं कि‍ क्‍या स्‍थि‍ति‍ है और कैसे प्रति‍क्रि‍या दें। 'ई-मेल- अथवा नेट संचार में तो आप जानते ही नहीं हैं कि‍ अब क्‍या होगा,कैसी प्रति‍क्रि‍या आएगी। कि‍स तरह के लोग प्रति‍क्रि‍या देंगे।
साइबरस्‍पेस में बहुस्‍तरीय अस्‍मि‍ताओं के साथ संवाद करते हैं,अनि‍श्‍चि‍त और अपरि‍चि‍तों के साथ संवाद करते हैं। इस परि‍वेश को तकनीक के जरि‍ए परि‍भाषि‍त नहीं कि‍या जा सकता। साइबरस्‍पेस में संवाद के कई रूप प्रचलन में हैं। सबसे पहला अति‍सरलीकृत रूप है, इसके मानने वाले तर्क देते हैं कि‍ साइबरस्‍पेस में ,'ई-मेल' या संवाद के दौरान दो परि‍चि‍त जब संवाद करते हैं तो वे वास्‍तव के ही लोग होते हैं। साइबरस्‍पेस भी अन्‍य माध्‍यमों की तरह ही एक माध्‍यम है। यह अति‍सरलीकृत तर्क है। इस प्रसंग में पहली बात यह कि‍ साइबरस्‍पेस का संवाद सीधे प्रभावि‍त करता है। वह आपकी स्‍वायत्‍त तत्‍काल छीन लेता है। आप जब आमने सामने संवाद करते हैं तो अपनी नि‍जता,स्‍वायत्‍तता बनाए रखते हैं। लेकि‍न ज्‍योंही साइबरस्‍पेस में मि‍लते हैं अपनी स्‍वायत्‍तता से वंचि‍त हो जाते हैं। एक और भी मि‍थ प्रचारि‍त कि‍या जा रहा है हमें साइबरस्‍पेस पि‍तृसत्‍तात्‍मक दबावों,भावों आदि‍ से मुक्‍त करता है और हम मुक्‍तभाव से संवाद करते हैं। पि‍तृसत्‍तात्‍मक दबाव हमें मुक्‍त भाव से संवाद नहीं करने देते। एक अन्‍य तर्क यह भी दि‍या जा रहा है कि‍ साइबरस्‍पेस शानदार स्‍पेस है ऐसा स्‍पेस जो हमने पहले कभी नहीं देखा। वे सभी तर्क देने वाले साइबरस्‍पेस की वि‍लक्षणता पर मुग्‍ध हैं। इस तरह के सभी कि‍स्‍म के तर्क एक ही बात की पुष्‍टि‍ करते हैं कि‍ साइबरस्‍पेस उन्‍मादना से भरा है। साइबरस्‍पेस का उन्‍माद के अलावा और कोई नाम संभव नहीं लगता है। साइबरस्‍पेस का अनुभव उन्‍मादी अनुभव है। यह वैसा ही उन्‍माद है जैसा कि‍सी जमाने में कम्‍युनि‍स्‍टों और क्रांति‍कारि‍यों में हुआ करता था,हाल के वर्षों में इसी उन्‍माद को 'जै श्री राम' की राजनीति‍ में भी देखा गया। यह मूलत: प्रति‍गामी एटीटयूट है। प्रति‍गामी इस अर्थ में कि‍ यहां व्‍यक्‍ति‍ स्‍वयं से ही बातें करता है,स्‍वयं से ही सेक्‍स करता है, स्‍वयं के साथ उलझना और सुलझना ही प्रति‍गामि‍ता का लक्षण है। वह छद्म वातावरण बनाता है,नकली चीजों से बातें करते रहते हैं।
प्रति‍गामि‍ता के फ्रेम में ही उन्‍माद आता है ।‍ उन्‍मादी सपनों को यथार्थ में रूपान्‍तरि‍त नहीं कर सकते। कहने का अर्थ यह है प्रति‍गामी परि‍दृश्‍य हमेशा नकली होता है और नकली वातावरण पर टि‍का होता है। परवर्ती पूंजीवाद का यथार्थ मूलत: प्रति‍गामी होता है और इसकी प्रत्‍येक चीज प्रति‍गामि‍ता से भरी है,चूंकि‍ साइबरस्‍पेस परवर्ती पूंजीवाद के संचार का सर्वोच्‍च शि‍खर है अत: प्रति‍गामि‍ता का भी सर्वोच्‍च शि‍खर है,फेक का भी चरम है।
साइबरस्‍पेस में बहुस्‍तरीय प्रति‍गामि‍ता का वि‍स्‍फोट हो रहा है। आज अस्‍मि‍ता भी स्‍थि‍र नहीं है। अस्‍मि‍ता बार-बार बदल रही है,हम देखते हैं कभी लिंग ,कभी जाति‍,कभी धर्म, कभी गोत्र,कभी देश,कभी भाषा आदि‍ की अस्‍मि‍ताएं एक ही व्‍यक्‍ति‍ के अंदर से व्‍यक्‍त होने लगती हैं। ये सभी बुनि‍यादी तौर पर नकली और प्रति‍गामी हैं।

( भड़ास ब्‍लाग पर भी प्रकाशि‍त )

चैनलों की कर्म संस्‍कृति‍ और नया माहौल

भारत में टेलीवि‍जन चैनलों की बाढ़ आयी हुई है। चैनलों का यह सि‍लसि‍ला थमने वाला नहीं है। चैनलों की चमक अपील करती है। चैनलों के इस हंगामे में अगर कोई वंचि‍त है तो चैनलों में काम करने वाले लोग। चैनलों की कर्मसंस्‍कृति‍ अभी तक परि‍भाषि‍त नहीं है। चैनलों के अंदर कि‍स तरह का प्रशासन और संचालन प्रणाली हो,कर्मचारि‍यों के कि‍स तरह के पद और पगार आदि‍ हो, काम के घंटे कि‍तने हों, कर्मचारि‍यों की तरक्‍की के नि‍यम क्‍या हों,इत्‍यादि‍ सवालों पर हमारा मीडि‍या उद्योग अभी तक चुप क्‍यों है ? अनेक चैनल हैं जि‍नमें काम करने वालों को समय पर पगार नहीं मि‍लती,जो लोग काम करते हैं उन्‍हें सही तनख्‍वाह नहीं मि‍लती। औने-पौने दामों पर चैनलों में लोग काम कर रहे हैं। नौकरी के मामले में सबसे ज्‍यादा अनि‍श्‍चि‍त भवि‍ष्‍य अगर कि‍सी का है तो चैनल कर्मचारि‍यों का है। केन्‍द्र सरकार अभी तक यह तय क्‍यों कर पायी है कि‍ चैनलों में काम करने वालों की सेवाशर्त्‍तें क्‍या होंगी ? चैनलकर्मि‍यों का अबाध शोषण जारी है। क्‍या केन्‍द्र सरकार कि‍सी भयावह तबाही का इंतजार कर रही है ? तमाम कि‍स्‍म के वि‍षयों पर जमकर लि‍खने वाले पत्रकारों को चैनलों में काम करने वालों की दुर्दशापूर्ण अवस्‍था पर लि‍खने का मन क्‍यों नहीं होता ? हमारे पत्रकार नि‍हि‍तस्‍वार्थी मानसि‍कता के फ्रेम के बाहर आकर चैनलों में काम करने वालों की दशा-दुर्दशा पर कुछ भी क्‍यों नहीं लि‍खते ? हमारे न्‍यायालयों में आए दि‍न जनहि‍त याचि‍का दायर करने वाले मानवाधि‍कार कर्मी इस मसले पर चुप क्‍यों हैं ? कायदे से अखबारों से लेकर नेट तक चैनलों के अंदरूनी तंत्र के उद्घाटन के बारे में सुनि‍योजि‍त ढ़ंग से मुहि‍म चलायी जानी चाहि‍ए। इस काम के लि‍ए जो भी उपयुक्‍त पद्धति‍ हो उसे लागू कि‍या जाना चाहि‍ए।
प्रत्‍येक चैनल के अंदरूनी संसार,कार्यप्रणाली,नौकरी करने वालों की संख्‍या,प्रत्‍येक पद पर काम करने वालों की पगार,काम के घंटे आदि‍ के ब्‍यौरे कि‍सी न कि‍सी रूप में प्रकाशि‍त कि‍ए जाने चाहि‍ए। साथ ही संबंधि‍त चैनल का मालि‍क कौन है, कि‍स तरह संचालन के लि‍ए धन एकत्रि‍त कि‍या है। कौन और कि‍तने हि‍स्‍सेदार हैं। प्रबंधन का तरीका क्‍या है, कर्मचारि‍यों की सेवाशर्ते क्‍या हैं इत्‍यादि‍ सवालों पर सि‍लसि‍लेबार ढ़ंग से रहस्‍योद्धाटन कि‍या जाना चाहि‍ए। इससे चैनलों के बारे में पारदर्शि‍ता बढेगी।
चैनल कर्मि‍यों का पना बृहत्‍तर संगठन हो प्रत्‍येक चैनल में उसकी शाखाएं हों, जि‍ससे वे एकजुट होकर प्रबंधन के साथ बातें कर सकें,अपनी समस्‍याएं सुलझा सकें।वि‍भि‍न्‍न मजदूर संगठनों को भी इन कर्मचारि‍यों को संगठि‍त करने के बारे में सोचना चाहि‍ए। चैनल कर्मियों के प्रभावशाली संगठन के अभाव में चैनल मालि‍क अपने कर्मि‍यों के साथ अमानवीय व्‍यवहार कर रहे हैं। चैनल संस्‍कृति‍ ने मीडि‍या में जि‍स अराजकता और नि‍यमहीनता को जन्‍म दि‍या है उसके उद्घाटन के बाद ही मालि‍कों के ऊपर दबाव बनेगा। केन्‍द्र सरकार भी समझेगी कि‍ आखि‍रकार वह कोई ब्रॉडकास्‍टिंग के नि‍यमन का तंत्र बनाए । अभी चैनल मालि‍कों ने अपना संगठन बना लि‍या है और इसके जरि‍ए वे सरकार के साथ अपनी सौदेबाजी करते रहते हैं। मालि‍कों के संगठन ने कभी अपने सदस्‍य चैनल में चल रही अनि‍यमि‍तताओं की ओर ध्‍यान ही नहीं दि‍या है, वे सि‍र्फ अपने धंधे के वि‍स्‍तार और संरक्षण के सवालों पर ही सक्रि‍य होते हैं। चैनलकर्मी और चैनलों की कर्मसंस्‍कृति‍ उनकी चि‍न्‍ता के केन्‍द्र में नहीं है। यह स्‍थि‍ति बदलनी चाहि‍ए। चैनलों की उठापटक की खबरें, कर्मचारि‍यों की समस्‍याओं पर तरह तरह के लेख और अन्‍य सूचनाएं अभी बहुत कम मात्रा में सि‍र्फ नेट पर ही दि‍खते हैं। प्रेस में उन्‍हें प्रमुखता नहीं दी जाती।‍
दूसरी ओर चैनल संस्कृति ने तर्क के मुहावरे, भाषा का मर्म और बाजार के विकास के नियम बदल दिए हैं। बौध्दिकों में भ्रम पैदा किया है। बोगस,खोखले,सतही और कृत्रिम को महत्ता दिलाई है। आदर्श बनाया है।चैनलों में सब ग्लोबल और इकसार नहीं है,बल्कि प्रतिरोधी और क्षेत्रीय भी है।चैनल संस्कृति वस्तुत: अस्मिता संस्कृति है।मासकल्चर है।लैटिन अमेरिका, मध्यपूर्व,यूरोपीय यूनियन और भारत का अनुभव बताता है कि चैनलों के प्रसार ने स्वतंत्र राष्ट्रों की संप्रभुता, क्षेत्रीय एकजुटता को मजबूत बनाया है।चैनलों के माध्यम से साझा भाषा और सभ्यता का निर्माण हो रहा है।जहां-जहां चैनल संस्कृति अपने पैर पसार रही है वहां पर जनता में संपर्क,एकजुटता और करीबीपन बढ़ा है। यह स्थिति आज से दस बरस पहले नहीं थी।भाषायी एकता मजबूत हुई है। ज्ञान ,खबरों,मनोरंजन,शिक्षा आदि में इजाफा हुआ है।सूचना पाने का अधिकार और मनोरंजन प्राप्ति के अधिकार के रूप में दो नए अधिकारों का जन्म हुआ है।क्षेत्रीय जरूरतों के कारण क्षेत्रीय खबरों का भी जन्म हुआ है।टेलीविजन ने खबरों को देशज सीमाओं के बाहर ले जाकर अपने लिए नया 'स्पेस' बनाया है।इस प्रक्रिया में दर्शक भी देशज सीमाओं के बाहर जा रहे हैं। इसके कारण दर्शकों के एक काल्पनिक समुदाय का जन्म हुआ है।
नवजागरण के साथ प्रेस क्रांति ने जातीय भाषा,जातीय व्यापार और जातीय चेतना का निर्माण किया था।इसके परिणामस्वरूप साधारण लोगों में जातीय भाषा के प्रति आकर्षण पैदा हुआ।ऐसा सामाजिक समूह उभरकर आया जो अपनी भाषा में लिखता,बोलता था।किंतु अपने क्षेत्र के बाहर अन्य भाषा का इस्तेमाल करता था।भारत में जब प्रेस आया तो उसने संस्कृति की तमाम दीवारों को गिरा दिया।सांस्कृतिक संकीर्णता के बंधनों से मुक्त किया और राष्ट्रीय अस्मिता को बढावा दिया।बहुराष्ट्रीय उपग्रह चैनलों ने मूलत: इस स्थिति को बल पहुँचाया।प्रेस की नई तकनीकों,सैटेलाइट और इंटरनेट ने दूर से स्वतंत्र सूचना के संप्रसारण की अनंत संभावनाओं के द्वार खोले हैं। चैनल संस्कृति के आने के पहले तक प्रत्येक देश की सरकार का अपने देश के सूचना बाजार पर नियंत्रण था।किंतु चैनल संस्कृति ने एक ही झटके में इस इजारेदारी को तोड़ दिया।आज सूचना देशज संपत्ति न होकर सार्वभौम संपत्ति का रूप ले चुकी है।राष्ट्रीय सीमाओं से परे एक व्यापक बाजार जन्म ले चुका है।तमाम किस्म के भाषायी अंतरों के बावजूद क्षेत्रीय एकीकरण बढ़ा है।
तकनीकी प्रोन्नति के कारण राष्ट्र-राज्य की प्रकृति में भी बदलाव आया है। परंपरागत राष्ट्रवाद और राष्ट्र की धारणा में परिवर्तन आया है ।यह परिवर्तन कैसा होगा ?किस दिशा में ले जाएगा ?इसके बारे में कोई नहीं जानता।पूंजीवादी उत्पादन संबंधों में तेजी से परिवर्तन आ रहा है।इसके कारण राष्ट्र की भूमिका सीमित होकर रह गई है।इस क्रम में सत्ता को चुनौती देने वालों की नई जमात पैदा हो गई है।जिन्हें हम भारत में कठमुल्ले या साम्प्रदायिक, मध्य-पूर्व में फंडामेंटलिस्ट और लैटिन अमेरिका में ड्रग माफिया के नाम से जानते हैं। इन्हें समाचार चैनलों ने हवा दी है।
आज हमारे सामने परा-राष्ट्रवाद और नई माध्यम तकनीकी द्वारा पैदा की गई चुनौतियां गंभीर संकट पैदा कर रही हैं।चैनलों के द्वारा भूमंडलीय सांस्कृतिक रूपों के अबाधित प्रसार ने महानगरीय संस्कृति के लिए गंभीर संकट पैदा किया है।इसके परिणामस्वरूप महानगरों में ग्लोबल और महानगरीय दोनों ही सांस्कृतिक रूप और एटीट्यूट्स प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं। इस प्रक्रिया में सांस्कृतिक वैविध्य को स्वीकार करने या उसकी प्रशंसा करने वालों की तादाद में इजाफा हुआ है।चैनल संस्कृति के आने के पहले तक हमारे संस्कृति ने महानगरीय संस्कृति को तरजीह दी और क्षेत्रीय या स्थानीय संस्कृति को दोयम दर्जे का स्थान दिया।इस समूची प्रक्रिया को चैनलों ने एकसिरे से पलट दिया है।
बहुराष्ट्रीय समाचार चैनलों ने स्थानीय संस्कृति,स्थानीय खबरों,स्थानीय सामाजिक एवं राजनीतिक संगठनों, स्थानीय सोच और स्थानीय नेताओं को तरजीह दी है। महानगरीय बोध की बजाय स्थानीय बोध और स्थानीय संस्कृति को बढ़ावा दिया है।इसे भाषायी चैनलों में सहज ही देख सकते हैं।यह नए किस्म का क्षेत्रीयतावाद है।समाचार चैनलों में स्थानीय विवादों और झगड़ों को पेश किया जा रहा है।समाचार चैनलों का स्थानीयतावाद,क्षेत्रीयतावाद और बहुभाषिकता अंतत:जनतांत्रिकीकरण की अपार संभावनाओं के द्वार खोल रहा है।समाचार चैनलों में स्थानीय संगठनों की विभिन्न मसलों पर होनेवाली बहसों में हिस्सेदारी बढ़ी है।मौजूदा शासन व्यवस्था इससे मजबूत हुई है।महानगर और छोटे शहरों या कस्बों के बीच संबंध मजबूत हुआ है। सभी चैनलों के मुख्यालय महानगरों में हैं।आरंभ में इन चैनलों पर महानगर हावी था।किंतु आज भाषायी वैविध्य और स्थानीयतावाद एवं क्षेत्रीयतावाद हावी है।यह टेलीविजन पर प्रेस का प्रभाव है।

( मोहल्‍ला लाइव और भड़ास ब्‍लाग पर 12 सि‍तम्‍बर 2009 को प्रकाशि‍त )

फैंटेसी के युग में लेखक का अवमूल्‍यन

यह लेखक और लेखन के अवमूल्यन का दौर है। इस दौर में लेखन का मूल्य आंकना सबसे मुश्किल काम है। लेखकीय प्रमोशन लेखन के बल पर नहीं होरहा बल्कि प्रमोशन योजनाओं के जरिए हो रहा है। लेखकों में आज के सवाल और आज का साहित्य गंभीरता के साथ विश्लेषित नहीं हो रहा बल्कि प्रचार अभियान में शिरकत का महत्व बढ़ गया है। सब कुछ प्रायोजित हो रहा है। समीक्षा से लेकर सम्मेलन के बहस-मुबाहिसों तक प्रायोजन का चक्र चल रहा है।
बुर्जुआ विचारधारा पर बातें करने की बजाय निहितस्वार्थ के सवालों पर बातें कर रहे हैं। भुखमरी और मजदूरों की कम पगार ,छंटनी आदि के सवालों पर बातें करने की बजाय श्रम के कमोडिफिकेशन पर बातें कर रहे हैं। उपभोग,वि‍नि‍मय और वि‍तरण के सवालों पर सतही वि‍मर्श कर रहे हैं। प्रति व्यक्ति स्कूल और कॉलेज में क्या व्यय किया जा रहा है उन पर बातें कर रहे हैं। अथवा हम स्वयं को महत्व देने वाले सवालों पर ज्यादा चर्चा कर रहे हैं। अन्य के बारे में बातें करने की फुरसत ही नहीं है। अथवा जब मौका मिल जाता है तो मार्क्‍सवाद को कैसे बदनाम किया जाए उसकी साख कैसे नष्ट हो रही है अथवा कैसे उसकी साख नष्ट की जाए ,इसके बारे में मशगूल हैं। इस तरह का विमर्श अच्छे बौध्दिक परिवेश का लक्षण नहीं है।
स्लोवाक ज़ीजेक के शब्दों को उधार लेकर कहें तो यह फैंटेसी की महामारी का दौर है। इमेजों ने हमारी तर्कबुध्दि को पूरी तरह घेर लिया है। ऑडियो-वीडियो मीडिया ने इसे चरमोत्कर्ष पर पहुँचाया है। हमारी समूची कार्यप्रणाली पर सीडीरूम पध्दति हावी हो गयी है। सीडीरूम पध्दति का अर्थ है '' यहां क्लिक करो, वहां जाओ, इस फ्रेगमेंट का इस्तेमाल करो, अथवा इस स्टोरी और सीन का इस्तेमाल करो।'' फैंटेसी की महामारी का व्यवहार में परिणाम यह निकला है कि अब प्रत्येक काम अर्जेंसी के रूप में किया जाता है।
इस युग की मुख्य लाक्षणिक विशेषता है कि इसमें पूर्व-आधुनिक विचारधाराएं हठात् केन्द्र में आ गयी हैं। इसके अलावा फंडामेंटलिज्म,राष्ट्रवाद, जनजातिवाद आदि तमाम किस्म की इरेशनल विचारधाराएं भी केन्द्र में आ गयी हैं। प्रगति अमूर्त हो गयी है। व्यवहारवादी तर्क केन्द्र में हैं। कॉमनसेंस का प्रभुत्व बढ़ गया है। यह '' गैर-विचारधारा'' अथवा '' उत्तर-विचारधारा '' का क्षेत्र है। लोग यह भी कहने लगे हैं कि विचारधारा के युग का अंत हो गया है। जबकि सच यह है कि यह सब भी विचारधारा का क्षेत्र है।
'उत्‍तर वि‍चारधारा' में आत्म की प्रस्तुति पर सबसे ज्यादा जोर दिया जा रहा है। आत्म पर जोर के कारण प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष किसी न किसी रूप में विचारधारा के सवालों को हमने त्याग दिया है। 'मैं' और सिर्फ 'मैं' में लेखक उलझा हुआ है। 'मैं' की भूमिका महत्वपूर्ण होकर रह गयी है। विचारधारात्मक सरोकारों की जगह निजी सरोकारों ने ले ली है। निजी रूचि,इच्छा,मंशा आदि‍ की अभि‍व्‍यक्‍ति‍ ने ले ली है। अब विचारधारा को सांस्कृतिक विश्लेषण के एक उपकरण के रूप में हमने इस्तेमाल करना बंद कर दिया है। 'आत्म' अथवा 'मैं' पर जोर देने के कारण हमारे लेखक अब नव्‍य उदारतावादी राजनीति की सेवा में लग गए हैं।अब उन्होंने परि‍वर्तनकामी विचारधारा की सेवा करनी बंद कर दी है। इसमें हमारे वामपंथी लेखकों का अधिकांश हिस्सा शामिल है।
'' उत्तर -विचारधारा'' के युग में मीडिया निर्मित इमेजों और सेतुओं से हम गुजर रहे हैं। उन्हीं के गर्भ से जो सवाल उठ रहे हैं उनमें उलझ रहे हैं। प्रतीकों की व्यवस्था के शिकार बन रहे हैं और स्वयं भी प्रतीक बन रहे हैं। हमने विचारधारा के आधार पर विश्लेषित करना एकदम बंद कर दिया है। हम जब इस तरह करने लगते हैं तो व्यक्ति को पूरी तरह गुलाम बना देते हैं। आज जरूरत इस बात की है कि व्यक्ति के औपनिवेशिकरण को कैसे खत्म किया जाए,इसके उपाय सोचने की जरूरत है। आज व्यक्ति और परमानंद के बीच का अंतराल खत्म हो चुका है। आनंददायी फेंटेसियों ने हमें घेरा हुआ है। हम जब चाहते हैं हमें आनंद उपलब्ध है। आनंद और व्यक्ति के बीच की दूरी का खात्मा बहुत ही बड़ी त्रासदी है। आज आप किसी भी किस्म की मनोवैज्ञानिक फैंटेसी को संगठित कर सकते हैं। उसका प्रबंधन कर सकते हैं। अब युध्द भी फैंटेसी में बदल चुका है। मौत अथवा त्रासदी के आख्यान फैंटेसी का हिस्सा हैं।
नव्‍य उदारतावादी जनतंत्र अपने द्वारा पैदा की गई समस्याओं के अधूरे समाधान पेश कर रहा है। असमानता चरमोत्कर्ष पर है। इसे दूर करने का परवर्ती पूंजीवाद के पास कोई समाधान नहीं है। वे यह भी बता पा रहे हैं कि आखिरकार पूंजीवाद की अबाधि‍त विजय के बावजूद असमानता निरंतर क्यों बढ़ती रही है। यहां तक कि कल्याणकारी राज्य का सपना भी असमानता को खत्म नहीं कर पाया। इतनी बड़ी असफलता के बावजूद परवर्ती पूंजीवाद के विचारक दावा कर रहे हैं कि उन्होंने बाजी मार ली !
परवर्ती पूंजीवाद का सबसे बड़ा गुण है वह फेक अथवा नकली को मूल्यवान बना देता है। नकली में ही हम असली का आनंदबोध लेने लगते हैं। नकल को असल समझने लगते हैं। नकल को वर्चुअल के जरिए ग्रहण करते हैं, देखते हैं। फेक का वर्चुअल होना और वर्चुअल अभौतिक होना अथवा अप्रासंगिक होना स्वयं अनेक किस्म की समस्याओं को पैदा कर रहा है। फेक और वर्चुअल के नेटवर्क ने अपना भौतिक आधार बना लिया है। आज वह स्वयं भौतिक शक्ति बन गया है। इसके फलस्वरूप व्यक्ति ऐतिहासिक और परा-ऐतिहासिक दोनों ही रूप में एक साथ नजर आ रहा है। वर्चुअल तकनीक ने व्यक्ति और समाज की नए किस्म की भूमिकाओं को जन्म दिया है। नए किस्म के सरोकार पैदा किए हैं। नए किस्म का आनंद और नये किस्म की ज्ञानचर्चा को जन्म दिया है। यह वर्चुअल की नयी मुक्तिदायी शक्ति है जिसे समझने की जरूरत है। हमें वर्चुअल रियलिटी के बारे में संकीर्णतावादी नजरिए से नहीं देखना चाहिए। हमें समझना चाहिए कि किस तरह नयी वर्चुअल अवस्था ,वास्तव अवस्था से भिन्न है। किस तरह वर्चुअल यथार्थ ,सामाजिक यथार्थ से भिन्न है।
वर्चुअल यथार्थ में और सामाजिक यथार्थ में बुनियादी अंतर है। वर्चुअल यथार्थ एक तरह से सामाजिक यथार्थ का फैंटेसीमय तर्क है। यह सामाजिक यथार्थ का चरम है। इसी वजह से परिचित और अपरिचित दोनों लगता है। वर्चुअल रियलिटी और सामाजिक यथार्थ के बीच के अंतराल का साइबरस्पेस रेडीकलाइजेशन कर देता है। यही हमारे आत्मगतबोध का निर्माता है। यहां तक कि हमारी ईगो को भी वर्चुअल बना देता है।
साइबर संस्कृति के परिप्रेक्ष्य में यदि लेखक और लेखन को देखें तो नए किस्म की चीजें सामने नजर आएंगी। आज प्रामाणि‍क अथवा ऑथेन्टिक के सवाल केन्द्रीय सवाल हैं। साइबर संस्कृति में प्रामाणिकता की पुष्टि पहले की जाती है। बाद में अन्य बातें होती हैं। पहले व्यक्ति स्वयं प्रमाण था। आज उसे प्रमाण देना होता है। आज आप जब फोन करके अपना बिल का पता करना चाहते हैं तो फोन पर बैठी साइबर कन्या प्रमाण मांगती है। जन्ततिथि पूछती है। जन्मतिथि आपकी प्रामाणिक पहचान बन गयी है। यदि जन्मतिथि ठीक नहीं बता पाते हैं तो मामला गड़बड़ा सकता है। साइबर संस्कृति का मंत्र है '' बनाओ और दो।'' इसके बीच में यथार्थपरक प्राथमिकताएं काम नहीं करतीं। आप जब अपनी प्रामाणिकता का प्रमाण दे रहे होते हैं तो यह भी बता रहे होते हैं कि आप क्या हैं और क्या करना चाहते हैं। इसी अर्थ में क्या हैं और क्या करना चाहते हैं , को अलग करके नहीं देखा जा सकता।
लेखक या पत्रकार के नाते हम किसी घटना या विषय का चयन करते हैं और फिर उसे पेश करते हैं। लोग जानते हैं कि घटना घटी है तो उसका क्या अर्थ है ? हम घटना की छवि लेते हैं। उसके बारे में लिखते हैं। हम भरसक कोशिश करते हैं कि प्रामाणिक रूप में पेश करें। प्रामाणिक प्रस्तुति मीडिया में भी करते हैं और साहित्यिक विधाओं में भी प्रामाणिक प्रस्तुति पर जोर देते हैं। लोग देखते और पढ़ते हैं। वे समझते भी हैं। किंतु ज्योंही आप अपनी बात कहकर खत्म करते हैं तो लोग उम्मीद करते हैं घटना का भिन्न रूप प्रस्तुत क्यों नहीं किया गया। क्योंकि किसी भी घटना अथवा विषयवस्तु की प्रस्तुति अनेक रूपों में हो सकती है। भिन्न रूप में चीजों को सजाया भी जा सकता है। लेखक अथवा पत्रकार से यथार्थ की भिन्न प्रस्तुति की मांग के प्रति हमेशा प्रतिरोध व्यक्त किया जाता है। यह प्रतिरोध और कोई नहीं स्वयं लेखक अथवा पत्रकार करते हैं। वे सत्ता के आख्यान और नजरिए से इस कदर बंधे होते हैं कि भिन्न प्रस्तुति कर ही नहीं पाते। यथार्थ की भिन्न प्रस्तुति के कारण ही गोदान महान रचना बन पायी। कफन कहानी क्लासिक कहानी बन पायी। यथार्थ की भिन्न प्रस्तुति के प्रति लेखक यहां अपना प्रतिरोध व्यक्त नहीं करता। यही वह बिंदु है जहां हमें गंभीरता से विचार करना चाहिए। एक ही घटना की प्रस्तुति में अनेक किस्म के नजरिए सक्रिय रहते हैं। घटना में शामिल सभी पक्ष अपने तरीके से यथार्थ को पेश करना चाहते हैं और अपने ही पक्ष पर बल देना चाहते हैं। किंतु यदि सीधे-सीधे घटना में शामिल वर्गों या समूहों अथवा व्यक्तियों की बातों को सीधे पेश कर दिया जाए तो इससे न तो यथार्थ के मर्म को संप्रेषित कर पाएंगे और न इससे यथार्थ का दर्जा ही ऊँचा उठा पाएंगे। यथार्थ का दर्जा ऊँचा उठाने के लिए जरूरी है कि घटना में अथवा यथार्थ में शामिल पात्रों के नजरिए से पेश करने की बजाय भिन्न नजरिए से मर्म को चित्रित किया जाए। प्रेमचंद के समूचे चित्रण विशेषता है कि वह यथार्थ के मर्म को पात्रों से भिन्न नजरिए से उद्धाटित करते हैं। यह वह मर्म है जो छिपा है। हमें कथानक कहते समय यह ध्यान रखना चहिए कि आखिरकार हम किस फ्रेमवर्क में अपनी बातें कह रहे हैं।
हमें यह भी सवाल करना चाहिए कि आखिरकार लेखन क्या है ? रोलां बार्थ ने सही लिखा है कि लेखन प्रत्येक आवाज ,प्रत्येक विचार के उदय का विध्वंस है। लेखन तटस्थ,सामंजस्यपूर्ण,विकल्प के स्थानों से भरा, जिसमें व्यक्ति छिपा रहता है। नकारात्मक इस अर्थ में कि इसमें सभी किस्म की अस्मिताओं का लोप हो जाता है। जबकि उसका आरंभ ही अस्मिता और लेखन से होता है। लेखक जब लिखता है तो वह स्वयं का ही लोप कर बैठता है। लेखन का आरंभ लेखक की मौत है।

( भड़ास ब्‍लाग पर 14 सि‍तम्‍बर 2009 को प्रकाशि‍त)

शुक्रवार, 11 सितंबर 2009

धर्म का अधि‍कार

हिंदी के बुद्धि‍जीवि‍यों में धर्म 'इस्‍तेमाल करो और फेंको' से ज्‍यादा महत्‍व नहीं रखता। अधि‍क से अधि‍क वे इसके साथ उपयोगि‍तावादी संबंध बनाते हैं। धर्म इस्‍तेमाल की चीज नहीं है। धर्म मनुष्‍यत्‍व की आत्‍मा है। मानवता का चरम है। जि‍स तरह मनुष्‍य के अधि‍कार हैं ,लेखक के भी अधि‍कार हैं,वैसे ही धर्म के भी अधि‍कार हैं।धर्म और कलाएं मनुष्‍य के लि‍ए हैं। मनुष्‍य के बाहर इनका कोई अस्‍ति‍त्‍व नहीं है। उदयप्रकाश ने सही रेखांकि‍त कि‍या है कि‍ हमने धर्म की इकहरी और उपयोगितावादी भूमि‍का पर ही ज्‍यादातर समय ध्‍यान केन्‍द्रि‍त कि‍या है। धर्म के मर्म को कभी समझने का प्रयास ही नहीं कि‍या। धर्म का उपयोगि‍तावाद कब से जीवन में आया यह ठीक ठीक बताना संभव नहीं है। धर्म का स्‍थान उपयोगि‍ता में नहीं मनुष्‍यत्‍व में है।‍ उदयप्रकाश ने लि‍खा है '' सचमुच ‘धर्म’ कहते ही हम स्वयं को उस प्रदूषित अवधारणा के बीचों-बीच पाते हैं, जिसे हमारे समय और निकट अतीत की राजनीति, सत्ता, पूंजी और मीडिया ने चौतरफा पैदा किया है।'' धर्म के वि‍मर्श का यह उपयोगि‍तावादी क्षेत्र है। उदय प्रकाश ने धर्मनि‍रपेक्ष और साम्‍प्रदायि‍कता के संदर्भों से लेकर मार्क्‍सवाद तक के व्‍यापक संदर्भों में चली धर्म संबंधी बहसों के बारे में बड़े ही सटीक सवाल उठाए हैं और उनकी सही बि‍न्‍दुओं पर आलोचना की है।
धर्म पर कोई भी बहस उपयोगि‍तावादी फ्रेमवर्क में नहीं की जा सकती। यह बहस का सीमि‍त दायरा है। धर्म को जब तक मनुष्‍य के अन्‍मर्ग्रथि‍त हि‍स्‍से के रूप में नहीं देखेंगे, मनुष्‍यत्‍व के नि‍र्माण के प्रकल्‍प के रूप में नहीं देखेंगे, धर्मवि‍ज्ञान के नजरि‍ए से नहीं देखेंगे,एक सर्जक के हृदय की नजर से जब तक नहीं देखेंगे तब तक धर्म के मर्म को पकडना संभव नहीं है।
रवीन्‍द्रनाथ टैगोर से बडा कोई आधुनि‍क धर्मनि‍रपेक्ष लेखक नहीं हुआ। अनेक मामलों में उनकी समझ अपने युग के सभी वि‍चारकों ,आलोचकों ,रचनाकारों और कला मनीषि‍यों के वि‍चारों की सीमाओं को भेदती हुई मनुष्‍यत्‍व के मर्म तक गयी है। रवीन्‍द्रनाथ टैगोर का जि‍क्र इसलि‍ए भी जरूरी है कि‍ उन्‍होंने एक परंपरा भी बनायी थी,जि‍से हिंदी वाले दूसरी परंपरा कहते हैं। इस परंपरा में धर्म के बारे में रवीन्‍द्रनाथ के जो वि‍चार हैं,वे हम सभी लेखकों, बुद्धि‍जीवि‍यों,राजनीति‍ज्ञों आदि‍ के लि‍ए जानना बेहद जरूरी हैं। मैं अभी तक समझ नहीं पाया कि‍ रवीन्‍द्रनाथ के धर्म संबंधी वि‍चारों का हिंदी लेखकों पर प्रभाव क्‍यों नहीं पड़ा,जो रवीन्‍द्र परंपरा के हिंदी में उत्‍तराधि‍कारी हैं ,उन पर इस परंपरा का हजारीप्रसाद द्वि‍वेदी के बाद असर क्‍यों नहीं पड़ा ? उदयप्रकाश ने धर्म की सर्जनात्‍मक भूमि‍का को लेकर जो सवाल उठाए हैं। वे नए सवाल नहीं हैं,बल्‍कि‍ पुराने सवाल हैं । उदयप्रकाश के लेख का हिंदी में सर्जनात्‍मक धरातल पर खडे होकर धर्म की हि‍मायत में लि‍खा शानदार वैज्ञानि‍क लेख है। कूपमंडूकों को उदयप्रकाश भटके हुए लग सकते हैं,भाजपा के कैंप में जानते हुए लग सकते हैं,धर्म भीरू लग सकते हैं,पदलोलुप लग सकते हैं, इनमें उदयप्रकाश कुछ भी हों या न हों, लेकि‍न उन्‍होंने जो लेख लि‍खा है और जि‍स परि‍प्रेक्ष्‍य में लि‍खा है,ऐसा लेख हिंदी में पहले कि‍सी भी लेखक ने नहीं लि‍खा। रवीन्‍द्रनाथ टैगोर ने एक व्‍याख्‍यान ब्रह्मसमाज में 26 जनवरी1912 को दि‍या था,इस व्‍याख्‍यान का शीर्षक था 'धर्म का अधि‍कार' प्रत्‍येक भारतीय को यह लेख पढना चाहि‍ए।धर्मनि‍रपेक्ष हिंदी लेखकों खासकर प्रगति‍शीलों को तो जरूर पढना चाहि‍ए। इस लेख से उस समस्‍या पर हम गंभीरता से सोच सकते हैं जि‍सके बारे में उदयप्रकाश ने ध्‍यान खींचा है। उदयप्रकाश ने हो सकता है रवीन्‍द्रनाथ टैगोर का उपरोक्‍त लेख पढा हो,संभव है नहीं भी पढा हो। लेकि‍न इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है आश्‍चर्य की बात है कि‍ रवीन्‍द्रनाथ और उदयप्रकाश के वि‍चार काफी हद तक मि‍लते हैं। यह बताना इसलि‍ए भी जरूरी है क्‍योंकि‍ हम उदयप्रकाश को संघी नहीं बनाना चाहते,पोंगापंथि‍यों की जमात में शामि‍ल करना नहीं चाहते। हिंदी के तथाकथि‍त संपादक और वि‍चारक बडी ही जल्‍दी फैसले देते रहे हैं, उदयप्रकाश के बारे में उनके फैसले वैसे ही आते रहे हैं जैसे हरि‍याणा की सर्वखाप पंचायतें प्रेमीयुगलों की मौत का फरमान जारी करती हैं। उदयप्रकाश कहीं 'हिंदी की सर्वखाप पंचायत' के फैसले के शि‍कार न हों,यही सोचकर मैंने रवीन्‍द्रनाथ टैगोर के प्रसि‍द्ध व्‍याख्‍यान 'धर्म का अधि‍कार' का यहां जि‍क्र कि‍या है। उसकी अनेक बातों को नए सि‍रे से समझने की भी जरूरत है।
रवीन्‍द्रनाथ टैगोर ने लि‍खा है '' जि‍न महापुरूषों की वाणी आज तक पृथ्‍वी पर अमर है उन्‍होंने कभी दूसरों के मन को खुश करते हुए अपनी बात कहना नहीं चाहा।वे जानते थे कि‍ मनुष्‍य अपने मन से कहीं बड़ा है- मनुष्‍य अपने को जो समझता है वहीं उसकी समाप्‍ति‍ नहीं है। इसीलि‍ए महापुरूषों ने अपना दूत सीधे मनुष्‍यत्‍व के राज-दरबार में भेजा; बाहरी दरवाजे के चौकीदार को मीठी बातों से प्रसन्‍न करके अपने काम का मूल्‍य नष्‍ट नहीं कि‍या।''
धर्म के खि‍लाफ बोलना बहुत आसान है। धर्म के उपयोगी रूपों की हि‍मायत में पोंगापंथि‍यों,पंडि‍तों,महंतों आदि‍ की तरह बोलना और भी आसान है। लेकि‍न धर्म को मनुष्‍यत्‍व के नि‍र्माण के उपकरण के रूप में व्‍याख्‍यायि‍त करना बेहद मुश्‍कि‍ल काम है। जि‍न लोगों ने धर्म की आलोचना की ,धर्म का शोषण कि‍या उन सभी के वि‍चारों का समाज में आज क्‍या स्‍थान है ? इस तरह के लोग सैंकडों सालों से धर्म के बारे में लि‍ख रहे हैं। उनके वि‍चार आज कहीं पर भी प्रभाव छोडते नजर नहीं आते। जि‍नके लि‍ए धर्म मर चुका था, धर्म पोंगापंथ था,जनता के लि‍ए अफीम था। वे भी गुमनामी में जा चुके हैं। धर्म अभी भी सीना ताने खड़ा है। राज्‍य का धर्मनि‍र्मूल करने के लि‍ए जि‍न्‍होंने इस्‍तेमाल कि‍या आज वे कहां हैं ? धर्म कहां है ? इसे सहज ही अपनी आंखों से देख सकते हैं। धर्म के उपदेश असाध्‍य प्रतीत होते हैं। लेकि‍न सच्‍चा मनुष्‍य वही है जो असाध्‍य की साधना करता है। रवीन्‍द्रनाथ टैगोर लि‍खा है '' स्‍वल्‍पमप्‍यस्‍य धर्मस्‍य त्रायते महतो भयात्'' अर्थात् अल्‍प-मात्र धर्म महाभय से रक्षा कर सकता है।
हिंदी में लेखकों के लीक से भि‍न्‍न वि‍चारों को, महान वि‍चारों को हमने कभी सम्‍मान की नजर से नहीं देखा। हिंदी लेखक बनि‍ए की गणि‍त लगाकर लि‍खता है,वह सच बोलते हुए हि‍चकता है । उसने लंबे समय से सच बोलना बंद कर दि‍या है। हिंदी लेखक ने सच बोलना जब से बंद कि‍या है । तब से हिंदी में वि‍चारों की कंगाली आ गयी है। हिंदी लेखक लि‍खता खूब है कि‍ लेकि‍न मायावी संसार पर लि‍खता है। सत्‍य पर नहीं लि‍खता। यही वजह है कि‍ वह अंत में 'तू-तू मैं -मैं' करने लगता है। दुश्‍मनी ठान लेता है। इस प्रक्रि‍या में वह सोचता है महान हो गया ,लेकि‍न होता एकदम उल्‍टा है हिंदी लेखक महान होने की बजाय ओछा होता चला गया है। एक दूसरे को नीचा दि‍खाना, नुकसान पहुंचाना, फतवे जारी करना,सृजन नहीं है। यह तो वि‍ध्‍वंस है। मनुष्‍यत्‍व से पतन है।
हिंदी के वातावरण को घ्‍यान में रखकर उदयप्रकाश ने लि‍खा है '' मार्क्सवाद जैसे व्यापक दर्शन के ऐसे बौद्धिक परिसीमन के पीछे उस अभिजनीकरण की प्रकिया है, जिसके तहत मार्क्सवाद को सेमिनारों और किताबी बहसों का विषय बना डाला गया। उसे उसके लोकप्रिय ‘पब्लिक स्फियर’से काट कर, उसकी सामाजिक धार को कुंद कर डाला गया। इसके पीछे स्वयं को ‘मार्क्सवादी’ घोषित कर, सामाजिक ‘अवांगार्द’ बनने का ओहदा धारण कर लेने वाले उन निम्नपूंजीवादी और सत्तापरस्त बौद्धिकों-अभिजनों का षडयंत्र था, जो वास्तविकता में यथास्थिति को बनाए रखना चाहते थे और मूलगामी सामाजिक अथवा राजनीतिक परिवर्तन के प्रति भयभीत थे। आज भी कुल मिलाकर मार्क्सवाद की मुख्यधारा पर उन्हीं का वर्चस्व है। मार्क्सवाद और वैज्ञानिक दृष्टिकोण को ‘नास्तिकता’ (एथीइज़्म) तक परिसीमित करने और समाजवाद को ‘धर्म’ के विरुद्ध ‘दुश्मन नंबर एक’ के धरातल पर ला खड़ा करने का सारा खेल इनका ही खेला हुआ है, जो दुर्भाग्य से आज तक जारी है।'' मार्क्‍सवादी चिंतकों की तस्‍वीर का यह एक पहलू है।
वास्‍तवि‍कता यह है कि‍ हिंदी के मार्क्‍सवादि‍यों ने बातें करने से ज्‍यादा कुछ नहीं कि‍या। न साहि‍त्‍य की थ्‍योरी बनायी, और न मार्क्‍सीय आलोचना के कोई नए मानक ही तैयार कि‍ए। मार्क्‍सवाद के वि‍चारों को यदि‍ हमने कार्ल मार्क्‍स से आगे पहुंचाया होता तो हम समझते कि‍ कुछ तरक्‍की की है। लेकि‍न सच यह है कार्ल मार्क्‍स ने जहां पर छोडा था उसकी भी रक्षा हम नहीं कर पाए हैं, हम मार्क्‍सवाद के अच्‍छे चौकीदार भी साबि‍त नहीं हुए हैं। कार्ल मार्क्‍स आधुनि‍क युग के महानतम वि‍चारक हैं। उनके कि‍ए को दुनि‍या के अनेक देशों के मार्क्‍सवादि‍यों ने नई बुलंदि‍यों तक पहुंचाया है। नयी धारणाएं,नयी व्‍याख्‍याएं और दर्शन के क्षेत्र में नयी संभावनाओं के द्वार खोले हैं। हमने एक कमजोर बच्‍चे की तरह मार्क्‍सवाद की कुछ गि‍नति‍यां रट लीं और समझने लगे मार्क्‍सवाद में हमारा योगदान है। हमारे मार्क्‍सवादी 'तोतारटंत माकर्सवाद' को ही समग्र ज्ञान मानने लगे। जबकि‍ सच यह है मार्क्‍सवाद ज्ञान नहीं है,ज्ञान का एक रूप है, असली ज्ञान तो सत्‍य है। हमारे महापुरूषों ने कहा था ''सत्‍यं ज्ञानं अनन्‍तं ब्रह्म'- अनन्‍त स्‍वरूप ब्रह्म ही सत्‍य है। जि‍से देखते हैं,जि‍से ज्ञान का अन्‍ति‍म वि‍षय समझते हैं उससे सत्‍य कहीं बडा है।
भारतीय मार्क्‍सवादी जानते हैं मार्क्‍सवाद के वि‍कास के लि‍ए जि‍स एकांत साधना और ज्ञान के उच्‍चधरातल की जरूरत है वह उनके पास नहीं है। मार्क्‍सवाद सेमीनार में पैदा नहीं हुआ था। महापुरूषों के वि‍चार अन्‍तरसाधना से पैदा होते हैं बाह्य साधना से पैदा नहीं होते। जब भी कोई वि‍चार,शास्‍त्र,दर्शन,राजनीति‍क दर्शन,राजनीति‍क एक्‍शन ,साहि‍त्‍य आदि‍ में भेद का शास्‍त्र बन जाता है तो वह अपने को बौना बना लेता है। मार्क्‍सवाद को हमने एक-दूसरे को बौना दि‍खाने के अस्‍त्र के रूप में इस्‍तेमाल कि‍या और स्‍वयं बौने बनते चले गए।
भारत में धर्म के वि‍चारकों ने भेद के सभी कि‍स्‍म के रूपों की मुखालफत की है। उन्‍होंने सत्‍य को छोटा करके नहीं देखा है। सत्‍य को दैनंन्‍दि‍न प्रयोजनों से दूर रखकर चर्चा की है। सत्‍य को हमारे हिंदी आलोचकों और अध्‍यापकों ने प्रयोजन के खूंटे से बांध दि‍या है। सत्‍य को हमने समझा नहीं है सत्‍य के साथ हमने समझौते कि‍ए हैं। सत्‍य के साथ समझौतों का ही दुष्‍परि‍णाम है कि‍ आज हम डरपोक और आत्‍मवि‍श्‍वासवि‍हीन हो गए हैं। हमारी आत्‍मा को कोई लल्‍लू-पंजू वि‍चारक,आलोचक,लेखक,राजनेता अपहृत कर लेता है।
धर्म के बारे में हमारी कभी भी सही समझ नहीं रही है। हमने पूजा-पाठ को ही धर्म मान लि‍या है। धर्म के आलोचकों ने इसी को धर्म मानकर इस पर वैचारि‍क हमला बोला है। भारत के धर्मनि‍रपेक्ष और मार्क्‍सवादी वि‍मर्श की यह सीमा है। धर्म पर मार्क्‍सवादि‍यों ने प्रयोजन के दायरे के परे जाकर कभी वि‍चार ही नहीं कि‍या। रवीन्‍द्रनाथ टैगोर ने लि‍खा है '' जो मनुष्‍य ब्रह्म को न जानकर केवल जप-तप में समय काटता है,'अन्‍तवदेवास्‍य तद्भवति '- उसका सारा जप-तप नष्‍ट हो जाता है।''
उदयप्रकाश ने महात्‍मा बुद्ध का अपने लेख में वि‍स्‍तार के साथ जि‍क्र कि‍या है,उस संदर्भ में एक ही बात जोड़नी है वह यह कि‍ गौतम बुद्ध की समस्‍त साधना का मूलाधार है सत्‍य की खोज। सत्‍य को पाने की आकांक्षा का ही सुपरि‍णाम है कि‍ आज मानव सभ्‍यता इतने ऊंचे धरातल तक अपने को वि‍कसि‍त कर पायी है। सत्‍य की खोज ही वह बिंदु है जहां पर लेखक भी मनुष्‍यत्‍व के वि‍कास में अपना महत्‍वपूर्ण योगदान करता है। लेखक के पास सत्‍य न हो तो लेखक नहीं बन सकता। मनुष्‍यता की कुंजी सत्‍य के पास है अन्‍य कि‍सी के पास नहीं है।
रवीन्‍द्रनाथ टैगोर ने लि‍खा है '' धर्म में ही मनुष्‍य का श्रेष्‍ठ परि‍चय मि‍लता है। धर्म का मनुष्‍य पर जि‍स मात्रा में अधि‍कार होता है उसी के अनुसार मनुष्‍य अपने आपको पहचानता है। सम्‍भव है कोई व्‍यक्‍ति‍ राजपुत्र होने पर भी अपने आपको भूल जाय। लेकि‍न देश के लोगों की ओर से बार-बार ताकीद की जानी चाहि‍ए। उसके पैतृक गौरव की याद दि‍लाना आवश्‍यक है ; उसे लज्‍जि‍त करना,यहां तक कि उसे दण्‍ड देना भी आवश्‍यक हो सकता है।लेकि‍न उसे मूर्ख कहकर समस्‍या को आसान करने की कोशि‍श वृथा है। यदि‍ वह मूर्ख की तरह व्‍यवहार करे तो भी सत्‍य को उसके सामने स्‍थि‍र करके रखना है। इसी तरह धर्म मनुष्‍य से कहता है: 'तुम अमृत के पुत्र हो,यही सत्‍य है'।‍ धर्म मनुष्‍य को कि‍सी तरह राह भूलने नहीं देता कि‍ 'मनुष्‍य' शब्‍द से कि‍तनी बड़ी -बड़ी बातों का बोध होता है। यही धर्म का प्रधान कार्य है।''
रवीन्‍द्रनाथ टैगोर ने यह भी लि‍खा , '' शरीर के लि‍ए जैसे मस्‍ति‍ष्‍क है वैसे ही मानव समाज के लि‍ए धर्म है।धर्म का आदर्श ही मानव-प्रकृति‍ को अन्‍दर -अन्‍दर से सारी वि‍कृति‍यों के वि‍रूद्ध लडाई करने के लि‍ए प्रवृत्‍त करता रहता है।''
जो लोग आए दि‍न धर्म की आलोचना करते हैं,उन्‍हें ध्‍यान में रखकर रवीन्‍द्रनाथ न लि‍खा था '' हि‍साब-कि‍ताब करके धर्म को छोटा नहीं बनाया जा सकता , कोई उसे कि‍सी परि‍माण में माने या न माने, उसी को एकमात्र 'मानवीय' बताकर पूर्ण रूप से सामने रखना होगा।''
हिंदी के लेखकों और आलोचकों की मुश्‍कि‍ल यह है कि‍ वे धर्म और साहि‍त्‍य को अलग -अलग खांचों में रखकर देखते हैं। वे धर्म,मनुष्‍य और साहि‍त्‍य के बीच के अन्‍तस्‍संबंध को अभी तक देख ही नहीं पाए हैं। आदि‍कवि‍ से लेकर भक्‍ति‍ आंदोलन के कवि‍यों तक यह अन्‍तस्‍संबंध साफ दि‍खाई देता है। यहां तक कि‍ भारतेन्‍दु के यहां भी इसकी छाप नजर आती है। उसके बाद पता नहीं कबसे यह संबंध टूट गया। धर्म,मनुष्‍य और साहि‍त्‍य को अलग कर दि‍या गया। हम साहि‍त्‍य से प्‍यार करने लगे और धर्म से नफरत।
इस प्रक्रि‍या में पहले हाथ से धर्म गया अब साहि‍त्‍य भी जा रहा है। रह गयी हैं कुछ कि‍ताबें ,संपादक,अध्‍यापक,आलोचक और साहि‍त्‍य गायब है। साहि‍त्‍य का वि‍मर्श गायब है। धर्म हाथ से जाएगा तो कलाएं भी जाएंगी। हिंदी में कलावंतों और कलाबोध की क्‍या दशा है यह हम सब अच्‍छी तरह जानते हैं। हिंदीभाषी शहरों में कला के ट्यूटर तक नहीं मि‍लते। आस्‍वाद करने वाले तो दूर-दूर तक नजर नहीं आते और कला दीर्घाएं हजारों कि‍लोमीटर दूर जा चुकी हैं। साहि‍त्‍य की अवस्‍था इससे बेहतर नहीं है। इस समूची प्रक्रि‍या का दयानंद सरस्‍वती के सुधार आंदोलन और उपयोगि‍तावाद के साथ गहरा संबंध है। लेकि‍न मूल बात यह कि‍ धर्म को हमने पहले त्‍यागा। धर्म को त्‍यागने का अर्थ है मनुष्‍यता को त्‍यागना। धर्म को त्‍यागकर कोई लेखक मनुष्‍यत्‍व के मर्म को नहीं पकड सकता। धर्म बैर की नहीं प्‍यार की चीज है, घृणा की नहीं मोहब्‍बत की चीज। धर्म की सतही और पोंगापंथी बातें धर्म का सही रूप नहीं हैं। प्रत्‍येक समझदार व्‍यक्‍ति‍ ने धर्म के दुरूपयोग,पाखंड,कर्मकांड आदि‍ का वि‍रोध कि‍या है। धर्म का अर्थ बाह्याचार नहीं है।धर्म अंदर की चीज है।धर्म हमारे अन्‍त:करण में होता है। धर्म हमारी प्राणवायु है।
साहि‍त्‍य हमारे हृदय से नि‍कलता है और मनुष्‍य के हृदय को ही सम्‍बोधि‍त करता है। लेखक हृदय के आदेश पर ही लि‍खता है। पार्टी,वि‍चारधारा,राष्‍ट्र आदि‍ के आदेश पर नहीं लि‍खता। धर्म का बाह्याडंबर अन्‍त:करण को सम्‍बोधि‍त नहीं करता फलत: अन्‍त:करण को बदलने की उसमें क्षमता नहीं है।
धर्म स्‍वभावत: प्रगति‍शील है, मानवीय है। हमें सोचना चाहि‍ए धर्म से कटने के कारण कहीं समाज और सभ्‍यता से हमारा संबंध वि‍च्‍छेद तो नहीं हो गया ? सभ्‍यता वि‍मर्श धर्म में मि‍लता है,सृजन का वि‍मर्श भी धर्म की गोद में बैठकर ही आया है। जि‍तने भी क्‍लासि‍क हैं वे धर्मवि‍मुख होकर नहीं लि‍खे गए, हमारे पास जि‍तने भी बेहतरीन लेखक,महापुरूष, दार्शनि‍क आदि‍ हैं वे सभी धर्मप्राण थे।
उदयप्रकाश ने सही लि‍खा है ,''‘धर्म’ के अंतर्विरोधों के बीच से ही उसकी सामाजिक जड़ता और उसके अमानवीकरण तथा सांस्थानीकरण के विरुद्ध विद्रोह फूटते रहे हैं। हमारे देश के अपने इतिहास में भी अंधविश्वासों और कर्मकांडों के विरुद्ध, ब्राह्मणवाद और पुरोहितवाद के विरुद्ध अथवा जड़ और प्रतिगामी सामाजिक रीति-रिवाजों, परंपराओं के विरुद्ध धर्म की किसी प्रशाखा ने ही सबसे सक्षम विद्रोह किया था।'' मैं यहां सि‍र्फ अपने ज्‍योति‍षशास्‍त्र के तजुर्बे से बता सकता हूं कि‍ फलि‍त ज्‍योति‍ष के पाखंड के खि‍लाफ जि‍तना वि‍स्‍तार के साथ प्राचीन और मध्‍यकाल में सि‍द्धान्‍त ज्‍योति‍ष के वि‍द्वानों ने आम जनता को शिक्षि‍त कि‍या था उतना कि‍सी और नहीं कि‍या। स्‍वयं आर्यभट को वि‍ज्ञानसम्‍मत वि‍चार व्‍यक्‍त करने के कारण प्रसि‍द्ध राजज्‍योति‍षी वराहमि‍हि‍र ने कहीं नौकरी नहीं लेने दी।आर्यभट को दर दर की ठोकरें खानी पड़ीं लेकि‍न उन्‍होंने ज्‍योति‍ष संबंधी अपने वैज्ञानि‍क वि‍चारों को ति‍लांजलि‍ नहीं दी।
उदयप्रकाश ने लि‍खा है '' यहां यह समझा पाना लगभग असंभव है भगत सिंह का लेख ‘मैं नास्तिक क्यों हूं’ या राहुल जी का ‘तुम्हारी क्षय हो’ का उपयोग सांप्रदायिक राजनीति, समाज सुधार, कर्मकांड और ब्राह्मणवाद के विरुद्ध तो हो सकता है, लेकिन सृजन और कला, साहित्य,संगीत, वास्तु और शिल्प आदि के क्षेत्रों में अगर उसे यथावत् किसी सौंदर्यशास्त्र के वैकल्पिक स्वरूप के बतौर लागू करने का प्रयत्न किया गया तो परिणाम घातक होंगे।'' उदयप्रकाश की इस धारणा से पूरी तरह सहमत होना संभव नहीं है। इसका प्रधान कारण है कि‍ भगतसिंह और राहुल साकृत्‍यायन दोनों ही धर्म की सकारात्‍मक भूमि‍का देखने में असमर्थ रहे हैं। उनके यहां धर्म के प्रति‍ इकहरा नजरि‍या व्‍यक्‍त हुआ है, इससे साम्‍प्रदायि‍कता आदि‍ को परास्‍त करना संभव नहीं है।
इस प्रसंग में रवीन्‍द्रनाथ टैगोर के 29 अगस्‍त 1921 को पढे गए नि‍बंध 'सत्‍य का आह्वान ' का हवाला देना चाहूंगा। तमाम कि‍स्‍म के क्रांति‍कारी असहयोग आंदोलन की आलोचना कर रहे थे, और अलग से क्रांति‍ का बि‍गुल बजाए हुए थे,बंग भंग का राजनीति‍क वातावरण था। इस प्रसंग में टैगोर ने लि‍खा '' जब तक राष्‍ट्र तैयार नहीं है तब तक क्रान्‍ति‍ का प्रयत्‍न करना गलत मार्ग पर चलना है। यह मार्ग उचि‍त मार्ग की तुलना में छोटा है,लेकि‍न उस पर चलकर हम लक्ष्‍य तक नहीं पहुँचते ,रास्‍ते में दोनों पाँव कांटों से जख्‍मी हो जाते हैं।प्रत्‍येक वस्‍तु का पूरा दाम देना होता है -यदि‍ आधा ही दाम दि‍या गया तो रूपया भी जाता है और वस्‍तु भी नहीं मि‍लती। वे दु:साहसी युवक समझते थे कि‍ सारे देश के लि‍ए यदि‍ कुछ लोग आत्‍मोत्‍सर्ग करें तो क्रांति‍ सफल होगी।उनके लि‍ए यह सर्वनाशा था,देश के लि‍ए एक सस्‍ती बात।देश का उद्धार समस्‍त देश के अन्‍त:करण से होना चाहि‍ए,उसके एक अंश से नहीं।''
एक अन्‍य चीज जि‍से ध्‍यान में रखना चाहि‍ए। टैगोर के ही शब्‍दों में '' मनुष्‍य मधुमक्‍खी की तरह नहीं है जो एक ही तरह का छत्‍ता बनाती है, न वह मकड़ी की तरह है जो एक ही 'पैटर्न' का जाल बुनती है।उसकी सबसे बड़ी शक्‍ति‍ है उसका अन्‍त:करण। मनुष्‍य का पूरा दायि‍त्‍व अन्‍त:करण के सामने है। अभ्‍यासपरता के सामने नहीं।'' उदयप्रकाश ने धर्म को सृजन से डरते हुए जोड़ा है इसलि‍ए 'धर्म' को संि‍गल कॉमा में बंद करके लि‍खा है। यह मानसि‍क दबाव कहां से आता है ? उदयप्रकाश को डर है धर्म की खुलकर हि‍मायत कहीं अन्‍य कि‍स्‍म के वि‍वाद पैदा न कर दे। धर्म डरने, दुत्‍कारने अथवा बहि‍ष्‍कार करने की चीज नहीं है। हजारों वर्षों से धर्म का दुरूपयोग,बहि‍ष्‍कार,दुत्‍कार आदि‍ सब कुछ चल रहा है, इसके बावजूद धर्म का प्रवाह अव्‍याहत बना हुआ है। इसका अर्थ है कि‍ कहीं कोई ऐसी शक्‍ति‍ जरूर होगी जो धर्म को आगे ले जा रही है। इस पहलू का रवीन्‍द्रनाथ ने बड़ा ही सुंदर वि‍वेचन कि‍या है।
लि‍खा है, '' मनुष्‍य की शक्‍ति‍ के दो पक्ष हैं : एक पक्ष का नाम है 'कर सकता है' और दूसरे पक्ष का नाम है 'करेगा'। पहला पक्ष उसके लि‍ए सहज है,लेकि‍न उसकी तपस्‍या दूसरे पक्ष की ओर है। धर्म मनुष्‍य के 'करेगा' पक्ष के सर्वोच्‍च शि‍खर पर खड़ा होकर उसके समस्‍त 'कर सकता है' को पुकारता है ; उसे वि‍श्राम नहीं करने देता ; उसे कि‍सी सामान्‍य लाभ से ही सन्‍तुष्‍ट नहीं होने देता। जहॉं मनुष्‍य का 'कर सकता है' इसी 'करेगा' के नि‍र्देशन में आगे बढ़ता जाता है वहीं मनुष्‍यता की वीरता है-वहीं उसका सत्‍य -रूप से आत्‍मलाभ है।'' धर्म की मूल क्षमता यह है कि‍ वह मनुष्‍य को असाध्‍य कार्य करने में सक्षम बनाता है। मनुष्‍य की अक्षमता,मूर्खता,दुष्‍टता,शैतानि‍यों आदि‍ को अस्‍वीकार करता है और सि‍र्फ मनुष्‍यता पर बल देता है। धर्म बंदी नहीं बनाता,धर्म वि‍चारों की गुलामी भी नहीं थोपता। धर्म कहीं से भी अंधवि‍श्‍वास,पुनर्जन्‍म आदि‍ की हि‍मायत नहीं हैं। अंधवि‍श्‍वास,पुनर्जन्‍म आदि‍ की बातें उन लोगों ने की हैं जो धर्म को अन्‍त:करण से काटकर बाह्याचारों के रूप में देखते हैं।
एक मायने में धर्म और कला सृजन एक ही लक्ष्‍य की पूर्त्‍ति करते हैं । दोनों मनुष्‍यत्‍व का संदेश देते हैं। दोनों हृदय के साथ संवाद करते हैं,अन्‍त:करण की अभि‍व्‍यक्‍ति‍ करते हैं। दोनों से पुण्‍य मि‍लता है। हृदय को शांति‍ मि‍लती है। तनाव दूर होता है। दोनों सर्जनात्‍मक हैं, ऊर्जा से भरे हैं। दोनों मनुष्‍य को और भी बेहतर मनुष्‍य बनाते हैं। दोनों के बि‍ना मनुष्‍य अधूरा है। इनमें से कि‍सी भी एक त्‍यागा नहीं जा सकता।
धर्म का स्‍तर उठाने के लि‍ए हमें वहां से आगे सोचना चाहि‍ए जहां पर हमारे पूर्वज धर्म के वि‍मर्श को छोड़ गए थे। हमने इस वि‍मर्श को आगे नहीं बढाया है बल्‍कि‍ और भी पीछे की ओर ,सतही चीजों की ओर ले गए हैं। इससे हमारा धर्मबोध वि‍कृत हुआ है। धर्म और कलाओं के प्रति‍ हमें पुराने नुस्‍खे को अपनाना होगा,पुराना नुस्‍खा था '' अभी और'',हम जहां थे उससे आगे के बारे में सोचें। कला और धर्म जहां है उससे आगे के बारे में सोचें। इस प्रक्रि‍या को जि‍तनी दूर तक ले जा सकें,ले जाएं। इससे मानवीय चेतना के नए दि‍गंत खुलेंगे।
हमें धर्म के बारे में सहजबुद्धि‍ के धरातल पर खड़े होकर नहीं सोचना चाहि‍ए। हमें धर्म को वि‍श्‍वास के आधार से भी नहीं देखना चाहि‍ए। धर्म अंदर की चीज है, मनुष्‍यत्‍व का मर्म है। उसे सहज,सस्‍ता,चमकीला बनाने से वह सामाजि‍क तकलीफ देता है।जो लोग ऐसा करते हैं वे धर्म नहीं 'ठगी धर्म' करते हैं। रवीन्‍द्रनाथ टैगोर ने लि‍खा है '' धर्म मनुष्‍य की पूर्ण शक्‍ति‍ की अकुण्‍ठि‍त वाणी है। उसमें कोई द्वि‍धा नहीं है। वह मनुष्‍य को मूर्ख कहकर स्‍वीकार नहीं करता,और न दुर्बल कहकर अवज्ञा करता है। वह मनुष्‍य को पुकारकर कहता है- ' तुम अजेय हो,अभय हो,अमर हो।' धर्म की शक्‍ति‍ से ही मनुष्‍य असंभव लगने वाले कामों में जुट जाता है, और ऐसे स्‍तर पर पर पहुँच जाता है जि‍सकी वह स्‍वप्‍न में भी कल्‍पना नहीं कर सकता। इसी धर्म के मुख से कहलाएं : 'तुम मूढ़ हो , समझ न सकोगे' तो फि‍र मनुष्‍य की मूढ़ता कौन दूर करेगा ?यदि‍ धर्म से ही हम कहलाएं: 'तुम अक्षम हो,कुछ न कर सकोगे', तो मनुष्‍य को शक्‍ति‍ कौन देगा ?'' '' वास्‍तव में हीन-से -हीन मनुष्‍य के लि‍ए सम्‍मान का एकमात्र स्‍थान धर्म ही है।''
(देशकाल डॉट कॉम पर 11 सि‍तम्‍बर 2009 को प्रकाशि‍त)

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