रविवार, 7 फ़रवरी 2010

सांस्कृतिक चक्काजाम में असहाय संस्कृति -





आधुनिक मीडिया ने  '' सांस्कृतिक चक्काजाम'' कर  दिया है। रेडियो, फिल्म, टीवी और इंटरनेट सांस्कृतिक जाम के सबसे बड़े मीडियम हैं। ''सांस्कृतिक चक्काजाम'' की परंपरा उन सांस्कृतिक जुलूसों की तरह है जो हमारे शहरों में किसी न किसी रूप में निकलते रहते हैं। ''सांस्कृतिक चक्काजाम'' का मूलाधार हैं सांस्कृतिक उद्योग के कलाकार-रचनाकार। ये वे कलाकार हैं जो नारा दे रहे हैं ''उनको कोई रोक नहीं सकता।'' ''सांस्कृतिक चक्काजाम'' की धुरी हैं विज्ञापन। विज्ञापनों के जरिए यह जाम लग रहा है। ''सांस्कृतिक चक्काजाम'' में शामिल कलाकारों का रवैयया काफी खतरनाक है। वे हमेशा पराजय,अतिरंजना,अतिवास्तविकता, सनसनी और कुंठा के भाव में रहते हैं। इन कलाकारों के पास जिन्दगी का राग नहीं है।

 ''सांस्कृतिक चक्काजाम'' में शामिल होने वाले लोग यह बात बार-बार कहते हैं कि वे संस्कृति की रक्षा के लिए काम कर रहे हैं। वे यह मानने को तैयार ही नहीं हैं कि उनके द्वारा सांस्कृतिक जाम लगा दिया गया है। इसके कारण संस्कृति का समूचा परिवहन ठप्प हो गया है। ऑडिएंस को सांस्कृतिक हवा मिलनी बंद हो गयी है। ''सांस्कृतिक चक्काजाम'' का बुनियादी लक्ष्य है ''सांस्कृतिक भ्रम या दुविधा'' पैदा करना।
      
''सांस्कृतिक चक्काजाम'' का '' कल्चरल जैमिंग'' के नाम से चले आंदोलन के साथ कोई संबंध नहीं है। वह मीडिया में विकल्प का आन्दोलन था, जबकि ''सांस्कृतिक चक्काजाम'' कारपोरेट फिनोमिना है। इसके कुछ चर्चित रूप हैं जैसे '' अमेरिका ऑन वार'' ,सवाल किया जाना चाहिए  अमेरिका कब युध्द की अवस्था में नहीं था ? 


जब तक शीतयुध्द चल रहा था ,अमेरिका के पास बहाना था, जब शीतयुध्द खत्म हो गया तो उसने आतंकवाद के खिलाफ जंग का एलान कर दिया। जब अमेरिका आतंकवाद के खिलाफ जंग में मशगूल नहीं रहता तो अचानक एड्स के खिलाफ जंग आ जाती है, कभी बच्चों के कामुक शोषण के खिलाफ जंग का एलान करता नजर आता है, कहने का अर्थ यह है कि अमेरिका हमेशा जंग में लगा रहता है। 


गौर करें तो अमेरिका की जंग हमारी व्यक्तिगत जिन्दगी को सीधे प्रभावित करने लगती है, हम अपने जीवन के वास्तव मसलों को भूल जाते हैं। अमेरिका के द्वारा छेड़ी गयी जंग में हमेशा अमेरिका को अपना परिप्रेक्ष्य याद रहता है ,साधारण जनता का परिप्रेक्ष्य याद नहीं रहता। विन लादेन को अमेरिका ने जनप्रिय बनाया, सच यह है कि मुस्लिम देशों की मुश्किल से पांच फीसद आबादी भी उसके बारे में नहीं जानती थी, उसकी कार्रवाईयों का समर्थन नहीं करती थी,अमेरिका के द्वारा उसे पहले समर्थन दिया गया, हीरो बनाया गया और बाद में शत्रु नम्बर एक घोषित किया गया। इसके कारण विन लादेन जनप्रिय हो उठा। पहले के मीडिया में यूरोप का जगत प्रभुत्व बनाए हुए थे, बाद में अमेरिकी प्रभुत्व सामने आ गया। खबरों में इसी जगत का जाम लगा है। इसे प्रथम विश्व कहते हैं। यही ''सांस्कृतिक चक्काजाम'' की धुरी है।
     
 '' सांस्कृतिक चक्काजाम'' का ही परिणाम है कि हम ''मासकल्चर'' का जो रूप आज देख रहे हैं, उसमें ''मासकल्चर'' जैसा कुछ भी नहीं है। आज मासकल्चर में '' मास'' या '' समूह'' जैसा कुछ भी दिखाई नहीं देता। चॉयज के विस्फोट ने हमें दरिद्र बना दिया है।
  
द्वितीय विश्व युध्द के बाद जो संस्कृति उभरकर आई थी उसमें मासमीडियाजनित यथार्थ प्रभुत्व बनाए हुए था। किंतु इंटरनेट के आने के बाद तो स्थिति में गुणात्मक परिवर्तन आया है। इंटरनेट हमें अतीत की ओर ले गया है। लोकल की ओर ले गया है, आज हमारे सामने चॉयज हैं किंतु समझ नहीं है,सूचनाएं हैं, किंतु सूचनाओं के विश्लेषण का अभाव है।


 चॉयज के विस्फोट ने हमें पहले की तुलना में और भी दरिद्र बनाया है। '' सांस्कृतिक चक्काजाम'' के तहत ही हमारे मीडिया के पर्दे पर ,अखबारों में हठात् कभी कभी महिलाओं के रक्षा के सवाल आ जाते हैं। इनमें से ज्यादातर सवाल जिन घटनाओं को लेकर उठते हैं, वे वास्तव घटनाएं होती हैं ,किंतु इनका कभी हमने गंभीरता के साथ मूल्यांकन नहीं किया कि आखिरकार ऐसा क्यों होता है कि एक औरत की हत्या की खबर तो छोटी खबर होती है ,किंतु किसी लड़की के साथ की गई छेड़खानी की खबर बड़ी खबर होती है। सवाल किया जाना चाहिए क्या औरत की मौत की खबर से ज्यादा महत्वपूर्ण सेक्सुअल हिरासमेंट की खबर होती है ?
       
अमेरिका ने यह शर्त लगायी है कि एड्स के लिए आर्थिक अनुदान तब दिया जाएगा जब संबंधित देश वेश्यावृत्ति के खिलाफ कदम उठाए। यह सवाल किया जाना चाहिए कि एड्स के लिए दी जाने वाली आर्थिक मदद का वेश्याओं से क्या संबंध ? वेश्यावृत्ति को यदि कोई सरकार खत्म करना चाहे तो वह कानूनी प्रावधानों के तहत आसानी से कार्रवाई कर सकती है। किंतु एड्स के नाम पर दी जाने वाली मदद का लक्ष्य पहले से मौजूद वेश्यावृत्ति विरोधी कानूनों को सक्रिय बनाना नहीं है ,जबकि सच यह है कि गरीब देशों में इन कानूनों की हालत बेहद खराब है।


 हमें सवाल करना चाहिए वेश्यावृत्ति घृणित अपराध है अथवा स्त्री हत्या ? मैं कहना चाहूँगा कि स्त्री हत्या वेश्यावृत्ति से ज्यादा घृणित अपराध है। असल में वेश्यावृत्ति विरोधी कानूनी प्रयासों के साथ जब अमेरिका ने एड्स को जोड़ा तो जाने -अनजाने कठमुल्ले ईसाईयों के ''सेक्सुअल फ्रीडम'' विरोधी एजेण्डे को ही आगे किया, उसे अपनी विदेशनीति का हिस्सा बनाया। भारत में भी धार्मिक कठमुल्ले है जो अपने 'सेक्सुअल फ्रीडम विरोधी' के एजेण्डे पर काम कर रहे हैं।इनके एजेण्डे को आए दिन टीवी चैनलों में व्यापक कवरेज भी दिया जाता है।  


कठमुल्ले ईसाई समुदाय अमेरिका में ''एण्टी सेक्सुअल एजेण्डा'' का जमकर प्रचार करते रहे हैं। इसी प्रचार का परिणाम है कि मीडिया में सेक्सुअल हिरासमेंट की खबर महत्व हासिल करती है जबकि स्त्री हत्या या डकैती की खबर दर्ज तक नहीं हो पाती। इस सवाल को उठाने का अर्थ यह नहीं है कि सेक्सुअल हिरासमेंट की हिमायत की जाए। किंतु '' सांस्कृतिक चक्काजाम'' अपना काम करता है। वह स्त्री हत्या की खबर को सामने आने नहीं देता हिरासमेंट की खबर को एजेण्डा बना देता है। इस तरह की खबरे '' डिसेक्सुलाइजिंग सोसायटी'' के फ्रेमवर्क में पेश की जाती है। सेक्सुअल हिरासमेंट की खबरों में स्त्री ही सत्य है, पुरूष की बातों पर कोई विश्वास नहीं करता।
        
'' सांस्कृतिक चक्काजाम'' में एक ओर अमेरिकी विरोधी उन्माद आता है तो कभी कभी  अमेरिकी संस्कृति का जयगान चलता रहता है। समग्रता में देखें तो अमेरिकी मूल्यों का महिमामंडन '' सांस्कृतिक चक्काजाम'' का सबसे बड़ा क्षेत्र है। हम संक्षेप में उन अमेरिकी मूल्यों को देखें जो टीवी में नजर आते हैं।

   मसलन् अमेरिकी दर्शकों को खासकर अमेरिकी औरतों को गैर-अमेरिकी संस्कृति के स्थानीय मर्दों से दूर रखने की कोशिश की जाती है। इस तरह के प्रयासों को स्त्री की मुक्ति के प्रयासों के रूप में देखा जाता है। इसी तरह अन्य संस्कृति की औरतों को उनके पति से मुक्त रहने के फार्मूले सुझाए जाते हैं। इसके लिए गैर-अमेरिकी संस्कृति की औरतों में यह भावना पैदा की जाती है कि तुम्हारा पति सही व्यवहार नहीं करता अथवा बुरा व्यवहार करता है। अमेरिकी बच्चों को अन्य संस्कृति के अभिभावकों और वयस्क चरित्रों से बचाने के प्रयास किए जाते हैं। अनाथ बच्चों को अवज्ञा के लिए उकसाया जाता है। बच्चों में अमेरिकी ईसाईयत के मूल्यों का प्रचार किया जाता है।

      अमेरिका यह आभास देता है कि उसका असल लक्ष्य है ग्लोबल व्यापार और सुरक्षा प्रदान करना। किंतु सच यह है कि अमेरिका का असली लक्ष्य है सांस्कृतिक चक्काजाम करना। इसके जरिए सांस्कृतिक साम्राज्यवाद को थोपा जाता है। अमेरिकी रवैयये में राजनीति दबाव का काम करती है। वे विचारधारात्मक दबाव ग्रुप की तरह इसका इस्तेमाल करते हैं।

    राजनीतिक चक्काजाम का सबसे बड़ा रूप है स्वयंसेवी संगठनों का विश्वव्यापी नेटवर्क। आज यही नेटवर्क अफगानिस्तान को चला रहा है। और भी अनेक देशों में इसकी निर्णायक भूमिका है। अमेरिका के अनेक ब्रॉण्ड हैं जो अपनी वजह से नहीं स्वयंसेवी संगठनों के प्रतिवाद की वजह से जाने जाते हैं।
   '' सांस्कृतिक चक्काजाम'' का ही परिणाम है कि आज अमेरिका का प्रधान लक्ष्य आर्थिक शोषण नहीं है बल्कि वे गैर अमेरिकी देशों के समाजों को अपने विचारों में ढ़ालना चाहते हैं, उसके लिए ही प्रयास करते रहते हैं। आर्थिक वर्चस्व स्थापित करना प्रधान लक्ष्य नहीं है बल्कि प्रधान लक्ष्य है विचारधारात्मक वर्चस्व स्थापित करना।

अमेरिकी साम्राज्यवाद के दो बुनियादी लक्ष्य हैं पहला आर्थिक है और दूसरा राजनीतिक है जिसके तहत सांस्कृतिक मालों पर कब्जा जमाना और सांस्कृतिक मालों के जरिए जनप्रियचेतना स्थापित करना। यही वह बिंदु है जो सांस्कृतिक चक्काजाम की धुरी है। सांस्कृतिक चक्काजाम ,सांस्कृतिक साम्राज्यवाद और मनोरंजन उद्योग के जरिए व्यापक मुनाफा बटोरा जाता है। वहीं दूसरी ओर लोगों को उनकी संस्कृति और जड़ों से अलग किया जाता है। उन्हें मीडियाजनित जरूरतों से बांध दिया जाता है।
   


     





शनिवार, 6 फ़रवरी 2010

मंहगा है टीवी गनोरंजन

मीडिया का वर्तमान परिप्रेक्ष्य डिजिटल केन्द्रित है। डिजिटल में दाखिल होने के बाद मीडिया की भूमिका बुनियादी तौर पर बदल गई है। प्रत्येक माध्यम का चरित्र बदला है। बदले रूपों को हमें प्रत्येक मीडिया के संदर्भ में स्वतंत्र रूप से विश्लेषित करने की जरूरत है।
टेलीविजन के बारे में हमारी कोई भी राय हो, टेलीविजन को हम कुछ भी नाम दें। टेलीविजन को देखें या न देखें, इसके बावजूद यह सच है कि टीवी ने हमारी आंखों को घेर लिया है। हम घंटों टीवी के सामने बैठे रहते हैं।

 टीवी समाचार और धारावाहिकों का लक्ष्य है दर्शक की चेतना के सबसे निचले स्तर को सम्बोधित करना। अभिरूचि के निम्नतम स्तर को सम्बोधित करना,निम्नतम बौध्दिक स्तर को सम्बोधित करना। टीवी का मुख्य लक्ष्य है दर्शक को बांधे रखना।  

टीवी के बारे में यह जनप्रिय है कि वह '' विवेकहीन मनोरंजन'' है। हमारे बीच ज्यादातर लोग ऐसे हैं जो यह नहीं मानते कि टीवी ने कुछ बिगाड़ा है। हम कभी भी यह चर्चा नहीं करते कि टीवी में अप्रासंगिक क्या आ रहा है ? अतार्किक क्या आ रहा है ? हम तो यही मानकर चल रहे हैं कि हमारा मनोरंजन हो रहा है। इसका अर्थ भी है कि हमने अपने तार्किक विवेक को ताक पर रख दिया है। जो लोग यह मनोरंजन परोस रहे हैं उन्हें भी यह सोचना चाहिए कि क्या उन्हें रचनात्मक अभिव्यक्ति का अवसर मिल रहा है। हमें यह भी देखना चाहिए कि क्या 'पेशेवर जगत' के बाहर की दुनिया को गंभीरता से ले रहे हैं या नहीं। क्या हम अपने पेशेवर जगत के माल के उत्पादन, विनिमय और सेवाओं को गंभीरता से ले रहे हैं या नहीं। यदि हम अपने आनंद-मनोरंजन के समय को अनालोचनात्मक ढ़ंग से खर्च करते हैं तो बेशुमार संपदा का उत्पादन कर सकते हैं।

     ज्यादा टेलीविजन देखने का गंभीर नकारात्मक प्रभाव हो सकता है। इसकी कभी  हमने चर्चा तक नहीं की है। हमारी टीवी पर बढ़ती हुई निर्भरता ने हमें मनोरंजनरहित अवस्था में पहुँचा दिया है। हम इकसार मासमीडिया के आदी हो गए हैं। हमें टीवी कम से कम राजनीतिक,सामाजिक ,आर्थिक और सांस्कृतिक खबरें देता है। आज टीवी सूचना सम्पन्ना नहीं बनाता बल्कि सूचना विपन्ना बनाता है। टीवी ने हमें दर्शकमात्र बनाकर रख दिया है, दर्शक और नजारे ही हमारी जिन्दगी का मंत्र बन गए हैं। दर्शकीय भाव से जिन्दगी को संतोष कम मिलता है, खोखलापन बढ़ता है।  

     दर्शक बन जाने और नजारे के आदी हो जाने के बाद अब हमें सिर्फ स्टार और चर्चित व्यक्तित्वों के ही दर्शन होते हैं। फलत: मीडिया व्यक्तित्वों के ग्लैमराईजेशन का शिकार बन जाता है। हमें सूचना संपन्ना बनाने के नाम पर इन चर्चित व्यक्तित्वों की अर्थहीन सूचनाएं बार-बार प्रसारित की जाती हैं, चंद चर्चित ज्ञानी लोग आए दिन टीवी पर अपना अज्ञान बघाारते रहते हैं। ये चंद लोग इस भ्रम में रहते हैं कि वे सारी दुनिया पर बोल सकते हैं, सारी दुनिया को जानते हैं, सभी विषयों के बारे में जानते हैं। 

     आप टीवी देखने पर जितना समय खर्च करते हैं ,धीरे धीरे आप भूल जाते हैं कि आखिरकार आप भी वे तमाम काम कर सकते हैं, उनमें आनंद ले सकते हैं, जिन्हें टीवी परोस रहा है। टीवी के कार्यक्रमों को देखकर उत्तोजित होने से अच्छा है स्वयं उन कार्यों को करना जो टीवी दिखाता है, देखकर रोमांचित होने से अच्छा स्वयं करके रोमांचित होना।

      मसलन् पर्यटन कार्यक्रम देखने से ज्यादा रोमांचित है पर्यटन करना। एमटीवी देखकर रोमांचित होने से बेहतर है स्वयं संगीत का अभ्यास करना। पोर्नोग्राफी देखकर रोमांचित होने से बेहतर है स्वयं और समाज को प्यार करना। एडवेंचर फिल्म देखने से बेहतर स्वयं एडवेंचर एक्शन करना। यदि आप टीवी में ज्यादा समय खर्च करते हैं तो आपको जीवन में ज्यादा समय नहीं मिलता। आप जितना टीवी देखते हैं उतने ही खोखले होते जाते हैं।
   
    टीवी आपके जीवन के वास्तविक रोमांच को खत्म कर देता है। यही वह बिंदु है जब आपके जीवन में मीडिया मुगल दाखिल होते हैं और आपको जीवन का विकल्प प्रदान करते हैं। विकल्प के तौर पर वे दूसरे दर्जे की सेक्स और हिसा की सामग्री पेश करते हैं। यह सामग्री उत्तेजित करती है, प्रभावित भी करती है। इसके बदले में आपको भुगतान करना पड़ता है। 

टीवी का रोमांच और मनोरंजन मुफ्त में नहीं मिलता, उसका पैसा देना होता है। यह पैसा कई स्तरों पर देते हैं, विज्ञापन में पैसा देते हैं, केबल चार्ज के रूप में देते हैं, ब्रॉडबैण्ड के रूप में देते हैं। टीवी सेट खरीदते समय पैसा देते हैं।  सिनेमा टिकट खरीदते समय पैसा देते हैं। कम्प्यूटर खरीदते समय पैसा देते हैं। 

मंगलवार, 2 फ़रवरी 2010

बौध्दिक संपदा के सवाल


    उत्तर -आधुनिक युग की सबसे बड़ी समस्या बौध्दिक संपदा के अधिकारों से जुड़ी है। बहुराष्ट्रीय कंपनियां आज समूची दुनिया पर एकच्छत्र बौध्दिक प्रभुत्व स्थापित करने के लिए गैट समझौते के तहत दबाब ड़ाल रही हैं। बौध्दिक संपदा के विभिन्न रुपों को अपने स्वामित्व में ला रही हैं। अत: बौध्दिक संपदा को ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में समझने की जरुरत है। यहां रचनाकारों से जुड़े सवालों पर संक्षेप में विचार किया जाएगा।
    उत्तर-आधुनिक के लिए साहित्य 'कंडोम' की तरह है ,यानी इस्तेमाल करो और फेंको का सिध्दान्त वे अधिकारों के क्षेत्र में भी लागू करते हैं। रचना लिखो और भूल जाओ। वे अधिकारों की बजाय उपभोग पर जोर देते हैं। लेखकीय अधिकारों को बाजार की शक्तियों के हितों के परिप्रेक्ष्य में व्याख्यायित करते हैं। कायदे से लेखकीय अधिकारों को लेखक और राष्ट्र के हितों के संदर्भ में देखा जाना चाहिए। बाजार के संदर्भ में लेखक के अधिकार सीमित होते हैं।जबकि राष्ट्र और नागरिक के संदर्भ में व्यापक सामाजिक -सांस्कृतिक लक्ष्यों की पूर्त्ति करते हैं। गैट समझौते की यह सीमा है कि उसमें बाजार के सार्वभौम लक्ष्यों की पूर्त्ति को प्रधानता दी गयी है।गैट वार्ताओं में व्यापार से संबंधित मुद्दे प्रमुख थे।लेखक और सर्जक के हितों के लिहाज से सोचा ही नहीं गया। गैट समझौता लेखकीय अधिकारों की दृष्टि से बर्न कन्वेंशन और  संशोधित ब्रूसेल्स घोषणा के प्रावधानों का उल्लंघन करता है।
    गैट समझौते में व्यक्तिगत हितों की बजाय सांस्थानिक हितों को महत्व दिया गया। लेखक की बजाय प्रकाशक के हितों को तरजीह दी गयी। लेखक के हितों को प्रकाशक के हितों के मातहत कर दिया। 

   ऐतिहासिक दृष्टिकोण से लेखक के अधिकारों पर विहंगम दृष्टिपात करें तो पाएंगे कि 18वीं और 19वीं शताब्दी में 'बौध्दिक संपदा संरक्षण' कानून बनाने का सिलसिला शुरु हुआ।यह वह दौर था जब साहित्य चोरी जोरों से हो रही थी।खासकर जर्मनी और अमेरिका में साहित्यिक कृतियों की अवैध रुप में बिक्री और छपाई व्यापक पैमाने पर हो रही थी। उन दिनों कॉपीराइट कानून में इसके खिलाफ कोई प्रावधान नहीं था।खासकर विदेशी लेखकों की कृतियों और चोरी और मुद्रण के खिलाफ कोई कानून नहीं था। परिणामस्वरुप अंग्रजी के आधे से ज्यादा उपन्यासों का चोरी छिपे प्रकाशन हो जाता था। इस तरह की परिस्थितियों में सन् 1840 से 1866 के बीच विभिन्न देशों में 88 द्विपक्षीय समझौते हुए। पूरी दुनिया में तेजी से पूंजीवादी व्यवस्था फैल रही थी। जिसके कारण लेखकों के सामने नई चुनौतियां पैदा हुईं।
    इसी संदर्भ में 1858 में ब्रूसेल्स में 'अंतर्राष्ट्रीय कॉपीराइट' कॉन्फ्रेंस हुई और राष्ट्र को आधार बनाकर साहित्यिक-कलात्मक कृतियों के अधिकारों के बारे में सोचा गया। सन् 1878 में अंतर्राष्ट्रीय साहित्य कांग्रेस का आयोजन किया गया। जिसमें साहित्य को 'बौध्दिक संपदा' मानने पर जोर दिया गया। इसी संस्था के प्रयासों से 'इंटरनेशनल लिटरेरी एंड आर्टिस्टिक एसोसिएशन का गठन हुआ।यह संगठन आज भी मौजूद है। इस संस्था का लक्ष्य था साहित्य को 'बौध्दिक संपदा' के रुप में संरक्षित रखना। इसकी सालाना कॉन्फ्रसों [लंदन 1879 ,वियना 1881, रोम 1882]में लेखकों के अधिकारों से जुड़े सवाल केन्द्र में थे।
    सन् 1882 में रोम कॉफ्रेंस में 'साहित्य को बौध्दिक संपदा ' मानते हुए प्रस्ताव पास किया गया। बाद में'इंटरनेशनल पोस्टल यूनियन' की बैठक में ऐसा ही प्रस्ताव आया।सन् 1886 में स्विट्जरलैंड के बर्न शहर में सम्मेलन हुआ जिसमें लेखकों की रचनाओं और कलाकृतियों के संरक्षण और बहुपक्षीय समझौते से संबंधित प्रस्ताव आया।साथ ही'साहित्य संपदा संघ' बनाने का प्रस्ताव आया। इस सम्मेलन से पहले 1884 ,1885 ,और1886 में तीन राजनयिक सम्मेलन इसी प्रश्न पर हुए। बर्न समझौते के तहत यूनियन में शामिल राष्ट्र के नागरिक या कानूनी प्रतिनिधि को ,चाहे उसका कार्य प्रकाशित हो या अप्रकाशित हो ,कानूनी संरक्षण दिया गया।
   
    उन्नीसवीं सदी में ही औद्योगिक संपदा के संरक्षण के लिए पेरिस में 1883 में सम्मेलन हुआ। इस सम्मेलन की घोषणाओं की तर्ज पर बर्न सम्मेलन हुआ।पेरिस कन्वेंशन की तर्ज पर ही 'विश्व बौध्दिक संपदा संगठन' के जरिए बहुपक्षीय समझौतों को संपन्न करने पर जोर दिया गया। बाद में इससे यूनेस्को के जरिए 'सार्वभौम कॉपीराइट कानून' बनाने में मदद मिली।
           नई सूचना तकनीकी के आने के बाद खासकर फोनोग्राम ,फिल्म ,रेडियो, टेलीविजन और उपग्रह प्रसारणों के कारण पुराने कानूनों में संशोधन की आवश्यकता महसूस की गई।इस दिशा में 1961 में रोम और 1971 में जेनेवा सम्मेलनों में विचार-विमर्श हुआ। नई तकनीकी के आने के बाद कॉपीराइट के दायरे में लेखक के अलावा  माध्यम,वितरक,उपग्रह चैनलों और केबल के जरिए चोरी छिपे प्रसारण और पुनरुत्पादक भी शामिल हो गया।सन् 1993 में यूनेस्को और 'विश्व बौध्दिक संपदा संगठन' द्वारा गठित विशेषज्ञ समिति ने उपग्रह संप्रेषण को 'ब्रॉडकास्टिंग' में शामिल किया। यह भी तय पाया गया कि ब्रॉडकास्टिंग करने वाले देश और संदेश ग्रहण करने वाले देशों को कॉपीराइट में शामिल किया जाय।साथ ही 'सीधा प्रसारण' को ब्रॉडकास्टिंग माना गया और बर्न कन्वेंशन में शामिल किया गया।जबकि केबल प्रसारणों को 'पब्लिक कम्युनिकेशन' 1980 में माना गया। इसके पहले 1973 और 1982 के 'विश्व दूरसंचार' कन्वेंशनों ने 'ब्राडकास्टिंग' और 'पब्लिक कम्युनिकेशन' के बीच के अंतर को मिटा दिया।
   कम्प्यूटर के आने के बाद कापीराइट के नए आयाम खुले।कम्प्यूटर प्रोग्राम के कॉपीराइट के मसले पर 1978 में विचार-विमर्श शुरु हुआ।इस विचार -विमर्श से निष्कर्ष निकला कि कम्प्यूटर प्रोग्राम के लिए कॉपीराइट कानून ही पर्याप्त है। किन्तु 'इलैक्ट्रोनिक पब्लिशिंग' के आने के बाद नई समस्याएं उठ खड़ी हुई हैं। कापीराइट कानून छपी पुस्तक पर लागू होता है।यदि कोई पुस्तक 'फ्लोपी' में हो तब यह कानून लागू नहीं हो सकता। इसी तरह इलैक्ट्रोनिकी संचित सांख्यिकी से प्राप्त सूचनाओं को जब इंटरनेट से प्राप्त करते हैं तब आंकड़ा निर्माता के अधिकारों की रक्षा कैसे की जाए ?

   आज आंकड़ों पर केन्द्रित नैटवर्कों का जाल तेजी से फैलता जा रहा है। सन् 1980 में 400 नैटवर्क थे जो 1986 में 3000और 1996 में यह संख्या बढकर 10000 को पार कर गई। आज अमरीका का बौध्दिक संपदा का अर्थशास्त्र 327 विलियन डॉलर से ज्यादा बैठता है। इसमें 5.5 मिलियन लोग काम कर रहे हैं।ये आंकड़े 1991 के हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि बौध्दिक संपदा के सवाल पर अमरीका और अन्य विकसित देशों के बड़े दांव लगे हुए हैं।
            

मासकल्चर का सच -2-




मासकल्चर में सामाजिक ऐक्य का अभाव होता है। यदि ऐक्य का भाव होता तो अमरीका सबसे ज्यादा ऐक्यबध्द समाज होता।असल में, मासकल्चर 'और-और' की लालसा पैदा करती है।वहॉ आकांक्षा की आंधी है ,वहाँ जो कुछ भी मिले आनंद नहीं मिलता।मासकल्चर इकसार पर बल देती है ,एकता पर नहीं।इकसारता में स्वाधीनता का निषेध है। मासकल्चर की नीति अजगर की नीति है।यह निगल जाने को एकीकरण कहते हैं।
     
संस्कृति और लोक संस्कृति 'सत्य' पर जोर देती है।जबकि मासकल्चर 'छद्म सत्य' या 'आभासी यथार्थ' पर जोर देती है। यह व्यवहार में अपना ही निषेध करता है।यह ऐसा यथार्थ है जिसका सामाजिक संबंधों पर नियंत्रण नहीं है।यह राजनीतिहीनता के आवरण में बडे पूंजीपति वर्ग की राजनीति करता है। 

इसी तरह पूंजीवादी संस्कृति से लड़ने के नाम पर जो लोग धर्म के उपकरणों के प्रयोग पर जोर देते हैं वे यह भूल जाते हैं कि धर्म के जरिए सामाजिक प्रभेदों को खत्म नहीं किया जा सकता। क्योकि धर्म का आधार प्रभेद और वैषम्य ही है। धर्म तर्कहीन होता है , वहाँ तर्क नहीं चलता ,वह परिवर्तन विरोधी होता है।धर्म जिन्हें पृथक् करता है वे अलग -अलग कमरों में रहते हैं और इनके दरवाजे दोनों ओर से बंद होते हैं। मासकल्चर भेद की संस्कृति है , इसका अबुध्दि से गहरा संबंध है।
          
उत्तर- आधुनिक भाव बोध पैदा करने में विज्ञापन और फैशन की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।उत्तर- आधुनिक फैशन संतोष नहीं देता।जबकि आधुनिकतावादी फैशन संतुष्टि देता था।कारण यह है कि उत्तर-आधुनिक युग में संतुष्टि की संभावनाएं खत्म हो गई हैं। आज उपभोग और वितरण के प्रश्न महत्वपूर्ण हो गए हैं। आज फैशन उपभोग को अतृप्ति की दिशा में ले जा रहा है। अनगिनत रुपों को जन्म दे रहा है।
          
फैशन की खूबी है कि वह सार्वभौम 'कोड्स' के तहत अपना विकास करता है।ये पूर्ववर्ती सांस्कृतिक 'कोड्स' को हजम करके आते हैं।वह उन्हें बॉधे रखता है ,उनका रुपान्तरण करता है , उन्हें दोहराता है ,उनका इस तरह पुनर्निर्माण करता है जिससे उनका निरन्तर उपभोग किया जा सके। इसमें रुप और स्टायल की चक्राकार परिक्रमा चलती रहती है।
        

मासकल्चर की विशेषता है कि वह वास्तविक विवादों से घृणा करती है। वह ऐसी सहिष्णुता को निर्मित करती है जिसमें सामाजिक चुनौतियों के प्रति डर बैठा हुआ है।ऐसा नागरिक बनाती है जो वगैर किसी प्रतिरोध के सब कुछ स्वीकार लेता है। जो व्यक्तिगत चयन की जिम्मेदारी से मुक्त होता है। वह ' फॉरवर्ड फॉर फॉरवर्डनेस' में यकीन करता है।वह ऐसी प्रगति में यकीन करता है जो दिशाहीन और अंतहीन है।जिसमें मूल्यों और विवेक व्यवस्था का क्रम टूट चुका है। 

जो व्यक्ति मासकल्चर के साथ कदम मिलाकर नहीं चलता वह पिछड़ा माना जाता है।यहॉ उदासीनता का साम्राज्य है ,फ़र्क न कर पाने वाली मूल्यहीन चीजों की बाढ़ है। मासकल्चर ऐसा जगत रचता है जहॉ प्रत्येक चीज अंत में अर्थहीन होकर रह जाती है।अब सिर्फ सिरों की गिनती तक चीजें सिमट जाती हैं। जीवन के प्रति गंभीरता के अभाव के कारण गंभीरता का कोई महत्व नहीं रह जाता।अपितु महत्वपूर्ण वह है जो अर्थहीन है। 

यह ऐसा युग है जहॉ बहुसंख्यक जनता की राय सही मानी जाती है।अगर कोई उसकी राय से सहमत नहीं है तो बहिष्कृत कर दिया जाता है।''सभी मानते हैं तुम भी मानो'' का सिध्दान्त इसकी धुरी है। अब सब कुछ 'रुटिन' में बदल जाता है। हम वास्तविक चुनौती के अनुभव से वंचित हो जाते हैं। शक्तिहीन और किंकर्त्तव्य विमूढ़ हो जाते हैं।

उत्तर - आधुनिक चिन्तक मासकल्चर और उपभोक्तावाद को सकारात्मक ढ़ंग से देखते हैं। उन्हें इसकी खामियां नजर ही नहीं आतीं।वे मासकल्चर में निहित संस्कृतिहीनता और उपभोक्तावाद में निहित दरिद्रीकरण की उपेक्षा करते हैं।

पूंजीवादी व्यवस्था में वस्तुओं का विस्तार एवं नित नए ब्रॉडों का प्रवेश एक आम नियम है। इसमें मजदूरों के श्रम और तकनीकी कौशल की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।मजदूरों के श्रम से निर्मित वस्तुएँ उसे विपन्न बनाती हैं। 

कार्ल मार्क्स ने '' 1844 की अर्थशास्त्र और दर्शन संबंधी पांडुलिपि'' में इस फिनोमिना पर लिखा था कि मजदूर जितना ही ज्यादा स्वयं को व्यय करता है ,वस्तुओं का इतर -संसार जिसे वह सर्जित करता है ,उसी के उपर और उसी के विरुध्द उतना ही शक्तिशाली होता जाता है ,उसके पास उतनी ही कम वस्तुएं रह जाती हैं। इसी क्रम में उपभोक्ता समाज का निर्माण होता है। आम लोगों की पगार की कीमत घटती जाती है और जीवन स्तर में गिरावट आ जाती है। इजारेदारियाँ दिन- दूनी रात चौगुनी तरक्की करती जाती हैं।मजदूर द्वारा उत्पादित संपदा शक्ति और आकार में जितनी बढती जाती है वह उतना ही निर्धन होता जाता है।मजदूर जितना ही ज्यादा माल पैदा करता है ,वह निरंतर उतना ही सस्ता माल बनता जाता है। लोगों की दुनिया का अवमूल्यन वस्तुओं की दुनिया के बढ़ते हुए मूल्य के क्रमानुपात में होता है।इस क्रम में मजदूर के श्रम का वस्तुकरण हो जाता है।श्रम के वस्तुकरण के कारण ही अब वह माल के दासत्व की अवस्था में पहुंच जाता है।अब उसके उपर वस्तुओं का शासन होता है। वह वस्तुओं का गुलाम हो जाता है।
       मजदूर जितना ही अधिक पैदा करता है उसके पास खपाने को उतना ही कम होता है ,वह जितना ही अधिक मूल्य सर्जित करता है ,उतना ही अधिक मूल्यहीन ,अधिक बेकार होता जाता है।उसका उत्पाद जितना ही अधिक सुनिर्मित होता है,मजदूर उतना ही अधिक विरुपित होता जाता है।उसका उत्पाद जितना ही अधिक सभ्य होता है मजदूर उतना ही बर्बर होता जाता है।श्रम जितना ही शक्तिशाली होता जाता है,मजदूर उतना ही अधिक शक्तिहीन होता जाता है। यह ठीक है कि श्रम धनवानों के लिए अद्भुत वस्तुएँ पैदा करता है ,लेकिन मजदूरों के लिए वह अभाव ही पैदा करता है।वह महल तैयार करता है ,लेकिन मजदूर के लिए झोंपड़े ही बनाता है।वह सौन्दर्य का सृजन करता है किन्तु मजदूर के लिए कुरुपता ही पैदा करता है। वह श्रम की मशीनों से प्रतिस्थापना करता है।वह बुध्दि का सृजन करता है लेकिन मजदूर के लिए मूर्खता ,जड़ता को पैदा करता है।

आमतौर पर विज्ञापनों में खाने-पीने , बच्चे पैदा करने, सुंदर आकर्षक वस्त्र पहनने ,अच्छे वाहनों पर सवारी करने पर जोर होता है। ये मूलत : उपभोग की प्रवृत्ति पर जोर देते हैं। किन्तु उपभोग पर जोर पाशव - अवस्था की ओर ले जाता है। इससे अमानवीय मूल्यों का सृजन होता है।

 ऐसी अवस्था को ध्यान में रखकर कार्ल मार्क्स ने लिखा था कि   '' जो पाशव है,वह मनुष्य बन जाता है और जो मनुष्य है वह पाशव बन जाता है। निस्संदेह ,खाना,पीना,संतानोत्पत्ति आदि भी विशुध्दत :मानव कार्य हैं। लेकिन विमुक्त रुप में ,अन्य समस्त मानव क्रिया-कलाप के क्षेत्र से पृथक् रुप में लिए जाने और एकमात्र चरम लक्ष्य में परिणत कर दिए जाने पर वे पाशव कार्य ही हैं।''

सोमवार, 1 फ़रवरी 2010

मासकल्चर का सच -1-


  लोक संस्कृति और लोक कलाओं का उत्तर - आधुनिक अवस्था में स्वरुप बुनियादी तौर पर बदल जाता है। इन कला रुपों में दैनन्दिन जीवन की गहरी छाप होती है। उत्तर -आधुनिक स्थिति इनका औद्योगिकीकरण कर देती है। उन्हें संस्कृति उद्योग का माल बना देती है। उनका मानकीकरण करती है।उनमें व्याप्त स्थानीयता का एथनिक संस्कृति के नाम पर दोहन करती है।इनकी प्रतिरोध क्षमता खत्म कर देती है। अब ये कला रुप सजावट की वस्तु और बाजारु कला रुप मात्र होकर रह जाते हैं। 

संस्कृति उद्योग की कलाकारों और कलाओं की परंपरा को बचाने में कोई रुचि नहीं होती । उसकी बुनियादी तौर पर इनसे ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाने में रुचि होती है।संस्कृति उद्योग के द्वारा इनका विस्तार होता है। साथ ही कलाओं के प्रति अज्ञान और उनसे दूरी भी बढ़ती है। 

हम संस्कृति को जितना उद्योग के हवाले करते जाते हैं उतना ही सांस्कृतिक अलगाव के शिकार बनते जाते हैं।आज सांस्कृतिक सीढ़ी पर जो सबसे उपर खड़ा है वह जनता की संस्कृति से सबसे ज्यादा अलग-थलग है।

असल में,कलाएं जब संस्कृति उद्योग का हिस्सा बन जाती हैं, तब उनका मासकल्चर में रुपान्तरण हो जाता है। अब हम संस्कृति या लोक संस्कृति के अंग नहीं रह जाते अपितु मासकल्चर का अंग बन जाते हैं।मासकल्चर मूर्ख और पेटू की संस्कृति है।अहं की संस्कृति है। सामाजिक ज़ुर्म की संस्कृति है।गौण वस्तुओं की संस्कृति है। यह नकल की संस्कृति है। 

रवीन्द्रनाथ टैगोर के शब्दों में '' आज हम बाजार की भीड़ और शोरगुल में सम्मिलित हो रहे हैं,नीचे उतर आए हैं,ओछे हो गए हैं....बड़े-बड़े अक्षरों के और ऊँचे स्वर के विज्ञापनों से अपने को औरों से बड़ा घोषित करने में संकोच नहीं होता।मजे की बात यह है कि जो कुछ हम कर रहे हैं सब नकल है। इसमें सत्य की मात्रा न के बराबर है।इसमें शान्ति नहीं ,संयम नहीं ,गाम्भीर्य नहीं ,शालीनता नहीं । इस नकल युग के आने के पहले हममें एक स्वाभाविक मर्यादा थी।इस मर्यादा से निर्धनता में भी हम संपन्न थे।उस समय मोटा खाने से या मोटा पहनने से हमारा गौरव घटता नहीं था।''

'' आज हमारी भद्रता सस्ते कपड़ों से अपमानित होती है ,घर में विलायती ढ़ंग की सजावट न हो तो उस पर आंच आती है।बैंक में हमारे नाम परजो अंक लिखे हैं वे कम हों तो हमारी भद्रता कलंकित होती है।हम यह भूल बैठे हैं कि ऐसी प्रतिष्ठा को सिर पर ढ़ोकर  उसका आदर करना वास्तव में अत्यन्त लज्जा का विषय है। जिन बेकार उत्तेजनाओं और उन्माद को हमने सुख मानकर चुना है उनसे हमारे समाज का अन्त:करण दासता के पाश में जकड़ा जा रहा है।''

कहने का तात्पर्य यह कि मासकल्चर ने भद्रता और सामाजिक हैसियत को वस्तुओं से जोड़ दिया है। भद्रता को बाजार के नियमों से जोड़ा। फलत: भद्रता सतही और प्रदर्शन की चीज हो गयी।उसका मानवीय आत्मीयता से संबंध टूट गया।

लोक संस्कृति सामूहिक बोध पैदा करती थी किन्तु मासकल्चर ने प्रभेदों को पैदा किया।ये प्रभेद आंतरिक और बाह्य दोनों हैं। इकसार संस्कृति के कारण हमारी प्रभेदों पर नजर नहीं जाती ,इसके परिणामस्वरुप मासकल्चर  से उपजे तनावों,अन्तर्विरोधों , सामाजिक वैषम्य और दरिद्रता को हम देख नहीं पाते। मासकल्चर के द्वारा पैदा की गयी समस्याओं के समाधान हम अमरीका की नकल पर कर रहे हैं इससे समस्याएं और भी उलझेंगी।
    
प्रश्न उठता है कि प्रभेद कहां पैदा होते हैं ? वहीं जहाँ अविश्वास और भय का पदार्पण होता है, जहां एक दूसरे को धोखा देकर हराने का प्रयत्न किया जाता है, वहां परस्पर व्यवहार में सहज भाव नहीं होता। 

मासकल्चर की विशेषता है कि वह संबंधहीन स्वाधीनता की वकालत करती है , उपभोग की स्वाधीनता की हिमायत करती है। यह शून्यतामूलक स्वाधीनता है जो निषेधात्मक है। जो मनुष्य को पीड़ित करती है। 

जो लोग प्रभेद पैदा करते हैं ,जो संस्कृति प्रभेद पैदा करती है , प्रभेदों का पोषण करती है , उसे स्वाधीनता का पक्षधर कहना निरर्थक है। मासकल्चर जिस स्वाधीनता और मुक्ति की बात करती है वह संबंधहीनता पैदा करती है ,उसके माध्यम से सामाजिक परिपूर्णता प्राप्त करना असंभव है।

 प्रभेदों को खत्म करने में वस्तुएं कभी भी सहायक नहीं हुई हैं। बल्कि वस्तुओं ने सामाजिक ईर्ष्या -डाह ,प्रतिस्पर्धा और प्रतिद्वन्द्विता को तीव्र किया है।वे निष्प्राण और तर्कशून्य होती हैं।इसी तरह तकनीकी को प्रभेदों को खत्म करने का माध्यम नहीं बनाया जा सकता। तकनीकी में वाणी नहीं होती। वह विश्व के स्वर में अपना स्वर नहीं मिला सकती। उसके पास हृदय की पुकार का उत्तर नहीं है। आज बड़े-बड़े माध्यम प्रचार कर रहे हैं कि यदि अभावों को दूर करना है तो तरह - तरह के उपकरण जुटाओ। किन्तु उपकरण हमारे सवालों को हल करने में असमर्थ रहे हैं।
    
रवीन्द्रनाथ टैगोर ने लिखा था कि '' मानव जीवन में जहॉ अभाव है वहीं उपकरण जमा हो जाते हैं , जहॉ पूर्णता है वहॉ मनुष्य का अमृत रुप व्यक्त होता है।इस अभाव और उपकरण के पक्ष मेंर् ईष्या है ,द्वेष है, वहां दीवार है, पहरेदार हैं,वहां व्यक्ति अपना प्रभाव बढ़ाना चाहता है और दूसरे पर आघात करता है।''


टैगोर की राय थी कि मासकल्चर
'शोर' या 'कोलाहल' की संस्कृति है।और 'कोलाहल के नशे में संयम असम्भव है।' इसीलिए इसे असंयम की संस्कृति कहना समीचीन होगा है। यह प्रौद्योगिकी पर बल देने वाली संस्कृति है।इसमें फलभोग की तीव्र इच्छा-शक्ति है। इसका ज्यों-ज्यों लोक बढ़ता जाता है ,मनुष्य दूसरों को अपमानित करने में नहीं हिचकता।यह सभ्यता चाहे जितना विस्तार करे मनुष्य का आत्मिक सत्य इस सबसे दुर्बल हो जाता है। 

कब्र से कोई नहीं लौटा नामवर जी




इसबार के दिल्ली के विश्व पुस्तक मेले में प्रसिद्ध आलोचक नामवर सिंह की चार किताबों के लोकार्पण का विज्ञापन 3-4 दिन पहले पढ़ा था , पढ़कर झटका लगा और सवाल उठा कि क्या नामवरजी को भी लोकार्पण जैसे बेहूदे कर्मकांड की जरुरत है ? क्या गुरुदेव भी साहित्यिक कर्मकांड में विश्वास करते हैं ? आखिरकार कर्मकांड पर क्यों उतर आए हैं नामवर जी ? असल समस्या यह है कि आलोचना को कब्रिस्तान तक पहुँचाने वाले नामवरजी ही हैं ,अब वह चाहते हैं कि आलोचना कब्र से लौट आए, गुरुदेव जानते हैं कब्र से कोई नहीं लौटा। अब कुछ आलोचना के वर्तमान हालात पर बातें करें।


आधुनिक हिन्दी आलोचना इन दिनों ठहराव के दौर से गुजर रही है,आलोचना में यह गतिरोध क्यों आया ? आलोचना में जब गतिरोध आता है तो उसे कैसे तोड़ा जाए ? क्या गतिरोध से मुक्ति के काम में परंपरा हमारी मदद कर सकती है ? क्या परंपरागत आलोचना के दायरे को तोड़ने की जरूरत है ? 
       आलोचना की दो पद्धतियां प्रचलन में हैं,इनमें पहली है रामविलास शर्मा की,दूसरी है नामवर सिंह की। दोनों के अंधभक्तों की कमी नहीं है। आलोचना में इसी अंधभक्ति के कारण सबसे ज्यादा समस्याएं पैदा हुई हैं। आलोचना में ठहराव अंधभक्ति और अनुकरण के कारण पैदा होता है। दूसरी ओर आलोचना पध्दति में श्रध्दा के तत्व का कोई स्थान नहीं है। आलोचना के लिए श्रद्धा की बजाय आलोचनात्मक विवेक की जरूरत होती है।

 किसी भी आलोचक की आलोचना एकांगी ढ़ंग से,वकील की शैली में नहीं की जानी चाहिए। आलोचना का अर्थ वकील की दलीलें नहीं है। आलोचक को वकील नहीं होना चाहिए। इसके अलावा आलोचना मे ठहराव आत्मगतबोध के कारण भी आता है,आलोचना को इच्छित दिशा में मोड़ना,आत्मगतता के तत्व का हावी हो जाना,आलोचना के यथार्थ से कट जाने का संकेत है।आलोचना मूलत: संवाद है,सापेक्ष संवाद है,समस्याकेन्द्रित संवाद है,पध्दतिगत संवाद है,आलोचना विनिमय है। आलोचना देती है तो लेती भी है। जो आलोचना इस दोहरी प्रक्रिया से नहीं गुजरती वह ठहराव की शिकार हो जाती है।
            यह जनतंत्र का युग है,इस युग का नायक है मनुष्य। मनुष्य और मानवतावाद इस दौर के विचारधारात्मक संघर्ष की धुरी हैं। किसी भी विचारधारा अथवा व्यवस्था की कसौटी है मानवाधिकार,पितृसत्ता और साम्राज्यवाद के प्रति उसका रुख क्या है ? नामवरजी ने इन पहलुओं पर कुछ भी नहीं लिखा। पितृसत्ता और साम्राज्यवाद की आलोचना के बिना आलोचना अप्रासंगिक है। 
         आलोचना जब एकांगी हो जाती है तो आलोचना में गतिरोध पैदा होता है,गतिरोध को तोड़ने अथवा आलोचनात्मक विकास की बुनियादी शर्त है आलोचना के सकारात्मक तत्वों की मींमासा पर जोर। मौजूदा आलोचनात्मक गतिरोध का एक अन्य कारण है अकादमिक स्तर पर आलोचना की सैध्दान्तिकी और पध्दति के पठन-पाठन,अनुसंधान की संरचनाओं और परंपरा का अभाव। इसी के गर्भ से यह भाव भी पैदा हुआ है कि कम लिखो और ज्यादा कमाओ, कम लिखो और ज्यादा कॉमनसेंस से सोचो और बोलो, हिन्दी में ज्यादा लिखने वाले को खराब और कम लिखने वाले को ज्यादा बेहतर माना जाता है।गोया ज्यादा लिखना पतन की निशानी हो !
           आलोचना में गतिरोध का एक अन्य महत्वपूर्ण कारण है आलोचना का वाचिक परंपरा तक सीमित रहना।अकादमिक अनुशासन,लिखित रूप में आलोचना के कम से कम प्रयास हुए हैं। आलोचना में ढर्रे पर सोचने की आदत है। आलोचना के ठहराव का एक अन्य कारण यह भी है उसमें सामान्यत: हीनताबोध है ,कुछ लोग यह मानकर चलते हैं कि गंभीर आलोचना तो फलां-फंला आलोचक ही कर सकता है, हम तो बेहतर सोच ही नहीं सकते।वहीं दूसरी ओर सोचने वाले आलोचकों की हालत इस कदर पतली है कि वे सोचते और पढ़ते कम बोलते ज्यादा हैं। अथवा दोहराते ज्यादा हैं। दोहराने वालों अथवा वाचाल किस्म के आलोचकों में आलोचनात्मक विनम्रता नहीं है,वे अन्य को कम पढ़ते हैं,जिसे पढ़ते हैं उसका नाम ,संदर्भ छिपाते हैं, अन्य की बातों को अपने नाम से,मौलिक समीक्षा के नाम से चलाते हैं । अपने लेखन में हिन्दी के अनुसंधान कार्य को उल्लेख योग्य नहीं समझते। इस सबका परिणाम है आलोचना में पैदा हुआ मौजूदा गतिरोध। नामवर जी इसके आदर्श रहे हैं।
       संभवत: हमारे स्वनाम धन्य आलोचकों को आलोचना में गतिरोध नजर ही न आए। यदि वे स्वाभाविक रूप में सोच रहे हैं कि गतिरोध नहीं है तो वे गलत हैं।सवाल किया जाना चाहिए हिन्दी में 'कविता के नए प्रतिमान' के बाद आलोचना की कोई भी उल्लेखनीय कृति क्यों नहीं आयी?यानी चालीस साल से ज्यादा समय गुजर चुका है और आलोचना में किसी कृति का न आना उल्लेखनीय दुर्घटना ही कही जाएगी। यह बात दीगर है कि इस दौर में नामवरजी के हजारों व्याख्यान हुए हैं,आलोचना में अनेक संपादकीय लेख आए हैं, किंतु उनके द्वारा आलोचना की किसी किताब का न आना,महज संयोग नहीं है। इसी तरह रामविलास शर्मा 'निराला की साहित्य साधना' के बाद आलोचना की कोई महत्वपूर्ण किताब नहीं दे पाए। जबकि इस बीच उनकी डेढ़ दर्जन किताबें आयीं। मै यहां आलोचना की मुकम्मल किताब के संदर्भ में ध्यान खींच रहा हूँ। इस तथ्य की ओर ध्यान खीचने का अर्थ यह नहीं है कि इस बीच आलोचना में कुछ भी लिखा ही नहीं गया। लिखा गया है ढ़ेरों किताबें आई हैं , हजारों लेख छपे हैं, हमने शब्दों और तर्कों के मैदान में परास्त करने का शास्त्र रचा है,आलोचना नहीं रची है।

 आलोचना जब परास्त करने, एक-दूसरे को ओछा दिखाने, मीन-मेख निकालने,छिद्रान्वेषण करने और बदनाम करने के लिए लिखी जाती है तो उसे आलोचना नहीं कहते। नामवर सिंह के द्वारा दिए गए असंख्य साक्षात्कार और लेख धीरे-धीरे किताबी शक्ल में आने शुरू हो गए हैं।उनका संवाद और साक्षात्कार विधा के रूप में मूल्यांकन होना अभी बाकी है। क्या यह सुनियोजित आलोचना है ? आलोचना के अनुशासन को केन्द्र में रखकर लिखी गयी आलोचना है ? इस बीच में यह प्रश्न भी विचारणीय है कि आलोचना किसे कहते हैं ? 
आलोचना का कोई एक रूप,प्रकार,स्कूल आदि तय करना मुश्किल है,आलोचना अनेकरूपा है। आलोचना को किसी एक स्थान,एक विचारधारा आदि में सीमित करके देखना सही नहीं होगा। हम जब आलोचना का वर्गीकरण करते हैं तो यह एक स्वाभाविक कार्य है,क्योंकि प्रत्येक किस्म की आलोचना स्वयं की संरचनाओं की भी आलोचना होती है। अच्छी आलोचना वह है जो आत्म-चेतस हो। चूंकि हिन्दी में आलोचना की आकांक्षा अभी भी बची है,बिखरे हुए रूप में आलोचना लिखी जा रही है अत: वह मौजूदा ठहराव से भी मुक्त होगी। आलोचना का स्वरूप बदलेगा। 

आलोचना का नया बदला हुआ रूप बहुत कुछ सम-सामयिक विचार,संचार तकनीक,पध्दति और इण्टरडिसिपिलनरी एप्रोच पर निर्भर है।आलोचना जितना एकांगी दायरों की कैद से मुक्त होगी वह ज्यादा जनतांत्रिक होगी। मसलन् नए दौर में आलोचना भी अपने को वर्चुअल बना चुकी है।आलोचना के वर्चुअल होने का अर्थ है आलोचना का अकेलापन। पहले आलोचना साहित्य से जुड़ी थी,साहित्य के पाठक से जुड़ी थी,आलोचक,लेखक और कृति के बीच प्रत्यक्ष संबंध था,किंतु लंबे समय से यह संबंध टूट चुका है। लेखक और आलोचक के बीच अंतराल पैदा हो गया है।
         आज स्थिति यह है कि आलोचक और लेखक दोनों में अपना अस्तित्व बनाए रखने की इच्छा तो है किंतु दोनों में एक साथ रहने,संवाद करने और एक-दूसरे से सीखने और सिखाने की आकांक्षा खत्म हो गयी है। फलत: लेखक अकेला है और आलोचक भी अकेला है। दोनों में अलगाव पैदा हो गया है। अब ये दोनों एक-दूसरे से सिर्फ प्रशंसा चाहते हैं,आलोचना नहीं चाहते। आलोचना रचना का स्पर्श करके निकल जाती है जिसे हम पुस्तक समीक्षा के नाम से जानते है।पुस्तक समीक्षा आलोचना का स्पर्श है,आलोचना नहीं है। रचना से बड़ा लेखक का अहं हो गया है। लेखक आलोचक की कंपनी पसंद करता है किंतु आलोचना पसंद नहीं करता,आलोचना करते ही नाराज हो जाता है। आलोचना वह है जिसमें विश्लेषण हो,व्याख्या हो,गहराई में जाकर विवेचन किया गया हो,शब्दों के बाहुल्य या शब्दों के अभाव को आलोचना नहीं कहते। रचना के मर्म का उद्धाटन किया जाय। आलोचना का काम यह भी है कि वह रचना को उसके व्यक्त लक्ष्य के परे ले जाय,पाठक को अनुशासित करने की बजाय खास किस्म की गतिविधि के लिए प्रेरित करे। आलोचना का बुनियादी कार्य है प्रतिरोध करना और धर्मनिरपेक्ष बनाना।जो आलोचना कठमुल्लापन अथवा पोंगापंथीभाव पैदा करती है उसे आलोचना नहीं कहते। आलोचना को जनतंत्र चाहिए। आलोचना और जनतंत्र की प्रक्रियाओं के गर्भ से धर्मनिरेक्ष समीक्षा विमर्श पैदा होता है। हिन्दी आलोचना में पितृसत्ता के खिलाफ संघर्ष का अभाव। नामवर सिंह साक्षात प्रमाण हैं उन्होंने कभी पितृसत्ता के खिलाफ नहीं लिखा। 

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