गुरुवार, 10 दिसंबर 2009

सुंदर यूटोपिया है मानवाधिकार


 आज कितने देश हैं जहां मानवाधिकार सुरक्षित हैं ?  कितनी सरकारें उनका पालन कर रही हैं ? मानवाधिकार आज के युग की सबसे बड़ी दुर्घटना है। अमरीका,ब्रिटेन,फ्रांस,जापान,जर्मनी,रूस से लेकर भारत तक मानवाधिकारों की हालत खस्ता है। उनके बारे में आप जितनी लंबी फेहरिस्त बना सकते हैं बना लीजिए चारों ओर उल्लंघन नजर आएगा। 


मानवाधिकार का सबसे जघन्य उल्लंघन तो नस्लवादी भेदभाव है जिसमें आज अमरीका आकंठ डूबा हुआ है। सारे आंकड़े और जीवन का यथार्थ यह तथ्य संप्रेषित कर रहे हैं कि अमरीका में नस्लवादी भेदभाव चरमोत्कर्ष पर है किंतु चैनलों से वह गायब है। प्रिंट मीडिया से गायब है सिर्फ नेट पर कुछ स्थानों पर इसके बारे में जानकारियां और ब्यौरे मिलते हैं। 


मीडिया के लिए मानवाधिकार विशुध्द माया है,खेल है। जिन देशों में मानवाधिकार नहीं हैं वहां पर हल्ला इस बात को लेकर है कि मानवाधिकार नहीं हैं, किंतु जिन देशों के संविधान में मानवाधिकार हैं वहां पर उनका उल्लंघन खूब हो रहा है। किंतु प्रतिवाद का पता नहीं है। हठात् किसी मुद्दे पर छोटा सा प्रतिवाद होता है और मीडिया शोर मचाना शुरू कर देता है और फिर कुछ समय के बाद शोरगुल बंद हो जाता है। 
   
    जिन देशों में मानवाधिकार हैं वहां के मानवाधिकार हनन के आंकड़े चौंकाने वाले हैं। मानवाधिकारों  पर बात करना अच्छा लगता है। चटपटा लगता है। मानवाधिकारों का सत्ता के साथ स्थायी अन्तर्विरोध है वह सत्ता चीन की हो या अमरीका या भारत की हो। कोई भी राज्य मानवाधिकारों को लागू करना नहीं चाहता। मानवाधिकार कागज पर जितने अच्छे लगते हैं। इनको व्यवहार में पालन करते ही राजसत्ता के साथ अन्तर्विरोध शुरू हो जाता है। मानवाधिकार क्या हैं ? व्यवहार में इनका कैसे पालन किया जाए ? मानवाधिकारों के आदर्श राज्य के रूप में किस देश को मानक मानते हैं ? जिन देशों ने मानवाधिकारों का सबसे ज्यादा हल्ला मचाया हुआ है उन्हीं देशों के द्वारा मानवाधिकारों का सारी दुनिया में हनन हुआ है। मानवाधिकार सुंदर यूटोपिया है। वैसी ही जैसे समाजवाद था।
   
    मानवाधिकार और लोकतंत्र का मौजूदा दौर में कोई विकल्प नहीं है। मानवाधिकार में दो पदबंध हैं 'मानव' और 'अधिकार' इन दोनों पदबंधों को लेकर हमारी समझ क्या है ? किंतु इन दोनों पदबंधों के बीच में दो चीजें और हैं एक है 'सत्ता' और दूसरी चीज है 'मानवीय अस्तित्व '। मानवीय अस्तित्व के बुनियादी समाधानों को दरकिनार करके सिर्फ अभिव्यक्ति की आजादी के आधार पर मानवाधिकार के बारे में चर्चा करना बेमानी है। सत्ता और मानवीय अस्तित्व का धर्मनिरपेक्षीकरण मानवाधिकार की सर्वोच्च अभिव्यक्ति है। अभिव्यक्ति की आजादी से भी ज्यादा महत्वपूर्ण है मानवीय अस्तित्व को बचाए रखने की बुनियादी संरचनाओं का निर्माण। मानवाधिकारों में शिक्षा,स्वास्थ्य,मकान,पर्यावरण, अल्पसंख्यक,स्त्री ,मीडिया, राजनीतिक स्वतंत्रता, राष्ट्रीय संप्रभुता की रक्षा आदि आते हैं। इस कार्य में सत्ता और मीडिया की सकारात्मक भूमिका होनी चाहिए।
     
  मानवाधिकार कोई कागजी घोषणा नहीं हैं। बल्कि मनुष्य के अस्तित्व से जुड़े हैं। मनुष्य के अस्तित्व रक्षा के जितने भी उपाय और तंत्र हैं उनका मानवाधिकारों के साथ गहरा संबंध है। कहीं पर यह संबंध दोस्ताना है कहीं पर शत्रुतापूर्ण है। मनुष्यों के अधिकार का संबंध अब पशुओं और प्रकृति के अधिकार और अस्तित्व रक्षा के साथ जोड़ दिया गया है। मानवाधिकार वह व्याधि है अथवा वह चाशनी है जिसमें आप कोई भी चीज डुबो दीजिए सब कुछ मीठा लगेगा। मानवाधिकार मन के गुलगुले हैं। इन्हें सब खाना चाहते हैं किंतु इनको हासिल करने के लिए कीमत नहीं देना चाहते। बिना कीमत अदा किए मानवाधिकार नहीं मिलते और जब मानवाधिकार मिलते हैं तो फिर से उल्लंघन शुरू हो जाता है। मानवाधिकार पाना और तोड़कर फिर पाना यह सतत प्रक्रिया है।
   
     मानवाधिकार हैं इसका प्रमाण क्या है ? मानवाधिकारों का हनन हुआ है इसका प्रमाण क्या है ? अधिकार और हनन में कभी न खत्म होने वाला संग्राम चलता रहा है।  मानवाधिकारों का विकास कभी भी  सामाजिक- आर्थिक विकास के बिना संभव नहीं । मानवाधिकार सिर्फ अभिव्यक्ति की आजादी नहीं है। मानवाधिकार सिर्फ राजनीतिक दल बनाने का अधिकार नहीं है। मानवाधिकारों के सभी प्रचलित मानक जिन देशों में संवैधानिक तौर पर मिलते हैं वहां पर भी मानवाधिकार हनन होता है और जहां पर अभिव्यक्ति की आजादी नहीं है वहां पर अभिव्यक्ति की आजादी का ज्यादा हनन होता है और हंगामा ज्यादा होता है। मानवाधिकारों का संबंध मानवीय अस्तित्व रक्षा के बुनियादी लक्ष्यों को अर्जित करने  के साथ  है। मानवाधिकार सिर्फ अभिव्यक्ति और राजनीतिक आजादी तक ही सीमित नहीं है। इसमें मानवीय अस्तित्व के बुनियादी सवाल भी शामिल हैं।
      मानवाधिकारों का एकसिरा मनुष्य के धर्मनिरपेक्ष वातावरण के निर्माण से जुड़ा है तो दूसरा सिरा राष्ट्रीय संप्रभुता की रक्षा से जुड़ा है। मजेदार बात यह है कि अमेरिका मार्का मानवाधिकारपंथी कभी भी मानवाधिकारों को धर्मनिरपेक्षता और राष्ट्रीय संभुता के साथ जोड़कर नहीं देखते। बल्कि मानवाधिकारों की रक्षा की आड़ में अधर्मी तत्ववादियों से लेकर तमाम किस्म की प्रतिक्रियावादी शक्तियों को संरक्षण देने का काम अमेरिका करता रहा है। साथ ही राष्ट्रीय संप्रभुता को निशाना बनाता रहा है। 


दूसरी बात यह कि मानवाधिकारों को मात्र लोकतंत्र से जोड़कर देखना भी मानवाधिकारों को शक्ति प्रदान नहीं करता। लोकतंत्र और मानवाधिकार हों, किंतु धर्मनिरपेक्षता न हो तो मानवाधिकारों के नाम पर पीछे की दिशा में ले जाने वाली ताकतें दुरूपयोग करने लगती हैं। अफगानिस्तान, ईराक, पाकिस्तान आदि इसके आदर्श उदाहरण हैं।


 मानवाधिकारों का आधुनिक मनुष्य के निर्माण की प्रक्रियाओं के साथ गहरा संबंध है। आधुनिक मनुष्य वह है जो धर्मनिरपेक्ष है, लोकतांत्रिक है, अन्य की रक्षा के प्रति वचनबध्द है,बहिष्कारवादी नहीं है। मानवीय सभ्यता के विकास की सभी उपलब्धियों को बचाने और आगे जाने के भावबोध से सन्नध्द है। 
        



1 टिप्पणी:

  1. अंजाम देखा आपने
    हुस्ने मुबारक का

    था मिस्र का भी वही
    जो है हाल भारत का

    परजीवियों के राज का
    तख्ता पलट कर दो

    जन में नई क्रांति का
    जोश अब भर दो

    उठो आओ हिम्मत करो
    क्रांति का परचम धरो

    मत भूलो यह सरोकार
    अच्छा है मानवाधिकार

    राजेश सिंह

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