मुक्तिबोध की रचनाओं के तीन चरण हैं। पहला 1934-35, दूसरा 1953 से 1959 और तीसरा 1959 से 1964 । अगर पहले चरण की कविताओं और कहानियों को साथ-साथ देखा जाए और समान प्रश्नों की आवाजाही को रेखांकित किया जाए तो मौटे तौर पर यह प्रतीति होती है कि यथार्थ के प्रेक्षण में बाहरी रूपों का अंकन अपनी बहुलता में आता है; इसके साथ ही यथार्थ के गहरे और विशद अनुभवों के छोर पकड़ते हुए वे आंतरिक अनुभव-संसार के संवेदन-तंत्र के विषम, ऊबड़-खाबड़ मनोजगत में प्रवेश करते हैं। अंदर-बाहर की यह आवाजाही और संक्रमणशीलता उनकी कविता-कहानी को एक नई रचनाशीलता, एक विशिष्ट प्रकार की भावभंगी निर्मित करती है।
'हृदय की प्यास' 1935 में लिखी गई कविता को देखें -पता चलेगा कि 'उन्माद के रंग में रंगा प्यार' वस्तुत: 'हृदय की ज्वाल-सी यह प्यास' है। रोमांटिक मनोभूमि की अंत:यात्रा बहुत-कुछ छायावादी आंदोलन के प्रभाव को दरशाती है। हालांकि उस ज़माने में माखनलाल चतुर्वेदी , प्रसाद और निराला का मिला-जुला असर मुक्तिबोध को स्वत्व की तलाश की ओर उन्मुख कर रहा है और 'यौवन के खिले अरमान' की एक अस्पष्ट -अबूझ पहेली कविता में अंकित होती है। परिवर्तन का एक तीक्ष्ण बोध 'जाग्रत असफलता' शीर्षक कविता में है क्योंकि 'जीवन की जाग्रत असफलता' में ही सुख है, 'कितने ज्वालामुखी धधकते रहते हैं' कण-कण में परिवर्तित होते'। और सबसे बढ़कर आत्महत्या की यह पहचान कि 'मेरी पतझर पीली-पीली, यह रोने का समय नहीं क्या?'
1935 की 'अनुरोध' कविता शीर्षक कविता में:
चिर पतझर यह जीवन-जग में, अपनी साध लिये आयी है
स्मृति-विस्मृति की तान मुखर है बंधनमय, आदर्श हँस क्यों?
'मैं' और 'तुम' की तत्कालीन कथनभंगिमा में 'तू और मैं' में 'मैं' उन्माद है' और 'तू' तरल अवसाद' है। 1936 की एक लंबी कविता 'पीले पत्तों के जग में' बारह अनुच्छेद हैं और हर अनुच्छेद के अंत में एक टेक बारंबार आती है- 'पीले पत्तों के इस जग में जब झंझा-से तुम बन आये। यह कविता सुमित्रानंदन पंत की 'छाया' शीर्षक कविता के कथ्य और अभिप्राय से भिन्न दिशा में हमें ले चलती है। 'छाया' में स्त्री पराधीनता से विषण्ण रचनाकार स्त्री को संबोधित कर पूछता है 'कौन-कौन तुम परिहतवसना, म्लानमना भू पतिता-स्त्री?' और आगे अपने समाज में स्त्री समुदाय के अवसादपूर्ण दृश्य का रेखांकन उस झंझा से भिन्न है, जो पतझड़ के जीर्ण शीर्ण मनोलोक में सारे सूखे जर्जर पत्तों को उलट-पुलट कर बिखेर देती है। पंत की कविता में स्त्री की अवस्था का वर्णन है- 'पीले पत्तों की शय्या पर तुम विरक्ति-सी, मूर्च्छा-सी ।' पतझड़ और झंझा के प्रतीक मुक्तिबोध की रचनाओं में वही अर्थ नहीं देते जो पंत की रचनाओं से व्यंजित होते है। यहाँ 'तू' पूंजीवादी दुनिया की अराजकता की झंझा है जो रचनाकार के अवसादपूर्ण मनोलोक को झंझोड़ती चलती है। गाढ़े प्रेम की आत्मीयता के क्षणों के द्वंद प्रारंभिक कविताओं में मुक्तिबोध के यहाँ बार-बार आते हैं; एक-दूसरे की अतृप्ति को लेखते हुए।
पर पाँचवे दशक के प्रारंभ की एक कविता 'खोल ऑंखे' में भीषण वास्तविकताओं का क्रूर संसार है। मुक्तिबोध के वे पिछले प्रश्न अब उन्हें अपनी गिरफ्त में नहीं लेते। अब ज्ञान लिप्सा, एक नूतन स्वप्न का संचार बनकर आती है-
'जिस देश प्राणों की जलन में',
एक नूतन स्वप्न का संचार हो,
ओ हृदय मेरे, उस ज्वलन की भूमि में बिछ जा स्वयं ही;
औ' तड़पकर उस निराले देश में तू खोल आंखे।'
'तारसप्तक' में संकलित 1942 की एक कविता पूंजीवादी व्यवस्था का स्पष्ट रेखांकन करती है। 'पूंजीवादी समाज के प्रति' जैसी रचना 'पूंजीवाद' के संपूर्ण विध्वंस के क्षण की वैचारिक कल्पनाशीलता और ऊष्मा से आलोकित है:
तेरे वक्त में भी सत्य का अवरोध
तेरे रक्त से भी घृणा आती तीव्र
अर्थात 'तू है मरण', तू है व्यर्थ, तेरा ध्वंस केवल एक तेरा अर्थ'
समाज के भविष्य के बारे में मुक्तिबोध की यह रणनीतिक समझ है और इस समझ को हम मुक्तिबोध की रचना-यात्रा का एक प्रस्थान बिंदु मान सकते हैं। 'लाल सलाम' (14 जून 1944 के दिन 'लोकयुध्द' नामक पत्रिका में प्रकाशित) में सोवियत संघ की समाजवादी सभ्यता का कैसा उल्लासपूर्ण स्वागत है ! कुछ पहले रवीन्द्रनाथ टैगोर भी इसे 'नई सभ्यता' की संज्ञा दे चुके हैं। मुक्तिबोध के शब्दों में-
कोई नई सभ्यता, यह है सौ सूर्यों का प्रात,
अब तो सौ समुद्र, सौ नदियाँ, सौ चंद्रों की रात।
उत्पीड़ित जनगण के अंतराष्ट्रीय भाईचारे के विराट लोक में विचरण करते हुए मुक्तिबोध सारी संकीर्ण सरहदों को तोड़ते हुए 1948 के आस-पास लिखित कविता 'जन-जन का चेहरा एक' में कहते हैं:
जन-जन के शीर्ष पर
शोषण का खड्ग अति घोर एक।
दुनिया के हिस्सों में चारों ओर
जन-जन का युध्द एक
मस्तक की महिमा
व अन्तर की ऊष्मा
से उठती है ज्वाला अतिक्रुध्द एक।
संग्राम घोष एक
जीवन-संताप एक।
क्रांति का, निर्माण का, विजय का सेहरा एक
चाहे जिस देश , प्रांत, पुर का हो
जन-जन का चेहरा एक।
उल्लेखनीय है कि इसी भावभूमि पर भिन्न ढंग की कविता 'अमन का राग' है जो उसी समय शमशेर ने लिखी थी। यहीं से आत्म-साक्षात्कार और प्रिया के प्रेमगान का काव्यलेखन मुक्तिबोध के यहाँ लगभग ख़त्म होने लगता है और '48 में ही मुक्तिबोध का इस सच्चाई से सामना होता है कि कोई रचनाशीलता सिर्फ 'अपनी आत्मा की परछाईं' नहीं है। 'पीला तारा' शीर्षक कविता इसी अर्थ का उदघोष है। लगभग ऐसे ही दौर की एक कविता 'बबूल' है, जो केदारनाथ अग्रवाल की 'बबूल' कविता से अलग किस्म की रचना है। निराला के 'कुकुरमुत्तों' के प्रतीक के बाद 'बबूल' का प्रतीक प्रगतिशील काव्यान्दोलन के महत्तवपूर्ण उपकरण के रूप में आता है:
वह बबूल
जो चिरनिर्वासित,
एक प्रतीक बना है केवल जन-जन के नि:सीम त्याग का।
'पथरेखा खिंचेगी ही' शीर्षक 1950 के आस-पास की कविता स्वाधीन भारत के पूंजीपति भूस्वामी वर्ग की आर्थिक नीति से संबध्द एक मार्मिक कविता थी। अकाल और भुखमरी से तबाह दरिद्र जनगण की चिंता स्वाधीन भारत की सरकार को है ही नहीं। इसी को लक्षित करते हुए मुक्तिबोध लिखते हैं:
यदि यह बदरिया गगन में छाकर उधर ही गयी
बरगदों की प्यास
मूलों में उभर उठ ऐंठकर
बंध व्यंग्य आकृति में अगर
घिर ही गयी
तल ताल का यदि सूखकर
लम्बी दरारों में हृदय की भूख भर
भूरी हँसी हँस ही दिया
यदि हर्ष-व्याकुल विहग बिजली तार पर
बैठा कि लटका
काल ने ग्रस ही लिया
फिर भी तुम्हारी आस है
अभी तक 'नेहरू मॉडल' की तथाकथित मिश्रित अर्थव्यवस्था से संतप्त आक्रोश का जन-उभार शुरू नहीं हुआ है और नई कविता का युगारंभ अज्ञेय तथा 'परिमल' के नेतृत्व में सुगबुगाना शुरू ही हुआ है। अमरीकी नेतृत्व वाले विश्व पूंजीवाद, शीतयुध्द और कांग्रेस कल्चरल फ्रीडम की ओर से अर्थव्यवस्था और संस्कृति के क्षेत्र में भीतरघात के तहत मार्क्सवाद, प्रगतिशील आंदोलन और समाजवाद के लिए उभरने वाले जनसंघर्षौं पर आक्रमण 1951-52 के बाद शुरू होता है।
इसी कालबिंदु से भारत के यथार्थ का भयंकर जनविरोधी रूप खुलकर सामने आता है। स्वाधीनता आंदोलन के मूल्यों पर प्रहार शुरू होता है। मुक्तिबोध की सृजनात्मकता इस जटिल यथार्थ की विडंबनाओं को अभिव्यक्त करने की दृष्टि से सर्वथा नई कथनभंगी में करवट बदलती है। अब उन्हें श्रमशील जनगण का चेहरा दिखाई देता है-
धुंधल में खोये इस
रास्ते पर आते-जाते दीखते हैं
लठधारी बूढ़े से पटेल बाबा
ऊँचे से किसानदादा
वे दाढ़ीधारी देहाती मुसलमान चाचा और
बोझा उठाये हुए
मांएं, बहनें, बेटियाँ
सबको ही सलाम करने की इच्छा होती है।
'अब संघर्षों के अंगारे', 'लाल-लाल सितारे-से' 'बुलाते मुझे पास निज'। आज़ाद हिन्दुस्तान के महत्त्वाकांक्षी मध्यवर्गीय बुध्दिजीवी की तुलना में मुक्तिबोध अपनी वर्गीय सीमाओं का अतिक्रमण कर डि-क्लास होने की छटपटाहट का अनुभव करते हैं। जबकि सत्ता के गलियारे में चक्कर लगाने वाले-
यश: लोलुप व्यक्ति की तेजोमय सत्ता
आधुनिक आदमखोर रावण के घर पर
भिश्तीगिरी करती है
बीसवीं सदी के पाँचवे दशक की यह विडंबना इक्कीसवीं सदी के पहले दशक में और भी जघन्य रूप धारण चुकी है। आज के हालात को समझने के लिए मुक्तिबोध की लम्बी कविता 'जिंदगी का रास्ता' के अनेक दृष्यखंड पुनर्पाठ की मांग करते है:
पूंजीवादी ह्रास की गटर
मध्यवर्गीय बुध्दिशील अवसरवादी केकड़े
खेलते शिकार हैं
आनन्दोल्लास से-
लगभग अठारह पृष्ठों की यह काव्यकृति भारत के तत्कालीन यथार्थ के दूरगामी भविष्य में झांकती चलती है। 'जन-जन के दमन के काले अंधकार बीच, गगन में उठते ग़रीबों के हाहाकार बीच' यह कविता अपने आप में महाकाव्यात्मक रूपक जैसी वर्णनात्मक व्यंजना के कारण भी तरोताजा है।
1959 से 1964 के बीच मुक्तिबोध ने लगभग 65 कविताएँ लिखी हैं, जिनमें 'एक भूतपूर्व विद्रोही का आत्मकथन', 'दिमागी गुहा अंधकार का ओरांग-उटांग', 'ओ काव्यात्मन् फणिधर', 'चकमक की चिनगारियाँ', 'एक स्वप्नकथा', 'ब्रहमराक्षस', 'अंधेरे में', 'लकड़ी का रावण' और 'भूल-गलती' जैसी अधिकांश लम्बी कविताएँ शामिल हैं। विसंगतियों को नई काव्यभाषा और फैंटेसी के रूपक-बिम्ब -प्रतीक के माध्यम से मुक्तिबोध आत्मसंघर्ष की व्याप्ति, नीरंध्र अंधलोक और मक्कार शासकवर्ग की छलना के नये उद्धाटित सत्य अंकित किये हैं।
इन्हीं रचनाओं के भाष्य के क्रम में आधुनिकतावादी और कलावादी अपने विरसे में मुक्तिबोध की उपलब्धियों को हड़पने की कोशिश करते रहे हैं। अगर इन रचनाओं के युग-संदर्भ, सामाजिक-राजनीतिक उथल-पुथल के घटना-प्रसंग को ध्यान में रखा जाए तो यह स्पष्ट हो जाता है कि समाजवाद के लिए संघर्ष की उदविग्नता इन कविताओं का प्राणतत्व है। रूपवादी दृष्टि से मुक्तिबोध के काव्योत्कर्ष को सिर्फ भाशा-शैली, रूपक, बिम्ब, प्रतीक और फैंटेसी में ढूंढना एकांगी विश्लेषण की ओर ले जाता है। उनकी कहानियों, अपूर्ण उपन्यास, समालोचनात्मक निबंध और डायरियों को कविताओं के साथ-साथ पुनर्पाठ करने पर कहीं संदेह नहीं रह जाता कि वे पश्चिम के किसी प्रतिक्रियावादी दर्शन के शिकार नहीं हुए थे। ऐसा आरोप लगाकर मुक्तिबोध को लांछित करने का अभियान अब पराजित अतीत के अधोलोकों में दफ़न हो चुका है। खासकर इस संदर्भ में बर्गसां के संदेहवाद और फ्रायड की मनोग्रंथि का प्रभाव उन पर बताया जाता रहा है जबकि उनकी रचनाओं से इस प्रभाव का कोई संकेत नहीं मिलता।
आज के आक्रामक पूंजीवाद और चारों तरफ फैल रहे आक्रामक व्यक्तिवाद के माहौल में मुक्तिबोध एक आलोकस्तंभ की तरह दिशा निर्देश देते हैं और आधुनिकतावादियों-कलावादियों से कतई सहमत प्रतीत नहीं होते। रचना की अंतर्वस्तु में अंत:प्रवेश से ही मुक्तिबोध का पुनर्पाठ हिन्दी आलोचना को समृध्द करता है।
निराला, नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल, शील, त्रिलोचन, शमशेर बहादुरसिंह आदि की रचनाशील अंतर्धारा के करेंट्स अलग-अलग अपना महत्त्व रखते हैं। मुक्तिबोध की रचनाशीलता में जिस तरह आवेग-संवेग और तार्किक विवेक घुलमिल कर एकाकार हो जाता है, वह उनकी अपनी विशिष्टता है। प्रगतिशील और यथार्थवादी रचनाशीलता के सभी पक्षधर कृतिकार एक ही ध्रुव पर मौजूद हों, इस कसौटी की वजह से अनेक मार्क्सवादी समीक्षकों ने गलतियाँ की हैं। हमें उनकी गलतियों से सीखना और सबक लेना चाहिए।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें